आयुर्वेदिक चिकित्सा- क्या क्यूँ कैसे?


आयुर्वेद वैज्ञानिक होने के साथ-साथ प्रकृति के नियमों पर आधारित है, जिनमें प्राथमिक सिद्धांत हैं :- पंचमहाभूत (जल, वायु, अग्नि, आकाश तथा पृथ्वी) और त्रिदोष (वात, पित्त तथा कफ)।
स्वास्थ्य :-
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियाः। प्रसन्नामेंद्रिय मनरू स्वस्थ इत्यभिधीयते॥ [सुश्रुत संहिता 15.38] शारीरिक दोषों (वात, पित्त, कफ), अग्नि (चयापचय, metabolism), धातुओं (रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा शुक) तथा मल (मल, मूत्र तथा स्वेद) इन सभी का तारतम्य तथा इनके साथ-साथ इंद्रियों (ज्ञानेंद्रियाँ तथा कर्मेंद्रियाँ), मानसिक (सत्व, रज, तम) बौद्धिक तथा आध्यात्मिक सामंजस्य-तारतम्य अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है।
आहार, निद्रा तथा ब्रह्मचर्य को त्रिदंड माना जाता है जिन पर स्वास्थ्य आधारित है। इनका सम्यक् रूप से पालन करने से रोगों से स्वतः रक्षा हो जाती है।
''स्वास्थ्य रक्षणम् आतुरस्य रोगप्रशमनम् च" स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगी मनुष्य के रोग को दूर करना ही आयुर्वेद का मूल उद्देश्य है।
स्वास्थ्य के नियमों का पालन न करने तथा बाहरी कारणों से रोगों की उत्पत्ति होती है तथा उनका निवारण औषधियों तथा शोधन क्रियाओं अर्थात् पंचकर्म से किया जाता है। स्वस्थ रहने के लिए रसायन औषधियों का भी प्रयोग किया जाता है, जिससे रोग प्रतिरोधक शक्ति कायम रहे।
शारीरिक दोष (वात, पित्त, कफ) तथा मानसिक दोष (रज और तम), में विकृति होने से रोग की उत्पत्ति होती है।
चिकित्सा दो प्रकार :: शोधन (पंचकर्म द्वारा) तथा संशमन (औषधियों द्वारा)। पंचकर्म में पांच क्रियाओं का वर्णन है, जिससे विकृत दोषों को शारीरिक शुद्धिकरण करके निकाल दिया जाता है और रोगोत्पत्ति के फलस्वरूप एकत्रित विषाक्त पदार्थों को भी शरीर से निकालकर संपूर्ण शुद्धिकरण किया जाता है।
पंचकर्म पाँच प्रकार की शोधन प्रक्रियाएं ::


(1). स्नेह (तेल लगाना) :-
जिस कर्म से शरीर में स्निग्धता, मृदुता और द्रवता आती है, उसे स्नेहन कहा जाता है। स्नेहन में बाह्य तथा अभ्यंतर दो प्रकार होते हैं। बाह्य स्नेहन में अभ्यंग, शिरोधारा, नेत्र तर्पण, कटिबस्ति, उरोवस्ति, जानुवस्ति आदि क्रियायें आती हैं, जो भिन्न-भिन्न रोगों में लाभकारी होती हैं। आभ्यंतर स्नेहन में औषधि युक्त घी या तेल रोगी को पिलाया जाता है।शास्रोक्त क्रम बद्ध मात्रा में देने से शरीर पुष्ट और मजबूत होता है तथा पंचकर्म के जरिए प्रकुपित दोषों को शरीर का शोधन करते हुए निकालने में सहायक होता है। इस क्रिया में शरीर की विविध प्रकार के तेलों की मालिश की जाती है, इससे चिरकालीन संचित दोष, वात दोष जिससे शरीर स्थित हड्डियाँ व मोटापा आदि दोषों को बढ़ाने वाला वात दोष ऊपर आ जाता है।
अभ्यंग :- शास्त्रोक्त विशिष्ट पद्धति से शरीर पर घी अथवा औषधियुक्त तेल की मालिश करने को अभ्यंग कहा जाता है। यह त्वचा की रुक्षता, कमजोर व्यक्ति, अत्यंत शारीरिक श्रम किया हुआ अथवा मानसिक तनाव से युक्त, अनिद्रा रोग, वात रोग जैसे संधिवात, पक्षाघात, कंपवात, अवबाहुक में लाभकारी है। इसके अतिरिक्त स्वेद कर्म से पहले तथा पंचकर्म से पहले भी पूर्वकर्म के रूप में भी अभ्यंग किया जाता है।
ज्वर, अपच, गर्भिणी तथा विकृत कफ दोष जैसे कास, श्वास आदि में अभ्यंग नहीं करना चाहिए। रोग के अनुसार महानारायण तैल, क्षीरबला तैल, धनवंतरम तैल, महामाषतैल अथवा गौघृत आदि से अभ्यंग प्रशिक्षित परिचारक द्वारा करना चाहिए।
शिरोधारा :- सिर-माथे पर दूध, औषधि युक्त तेल आदि तरल पदार्थ डालना शिरोधारा कहलाता है। इससे सिर में दर्द, मस्तिष्क रोग, शिरोरोग, नाड़ी दौर्बल्य, अनिद्रा, मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप, पक्षाघात, अर्दित (फेशियल पैरालिसिस) अपस्मार (मिर्गी) तथा अकाल बालों का पकना या सफेद होना इत्यादि रोगों में लाभ होता है। शिरोधारा कोमा, ज्वर, निम्न रक्तचाप तथा सर्दी-खाँसी में नहीं करना चाहिए।
नेत्र तर्पण :- आँखों पर औषधियुक्त घृत अथवा तेल डालने को नेत्रतर्पण कहा जाता है। यह क्रिया आँखों से धुंधला दिखना, आँखों का दुखना, रूक्षता, रतौंधी तथा वात व पित्ज अक्षि रोगों में अत्यंत लाभकारी है। रोगानुसार इस नेत्र तर्पण क्रिया में त्रिफलाधृत आदि का प्रयोग किया जाता है। यह क्रिया दृष्टिवर्धन का कार्य भी करती है।
नस्य कर्म :- औषधियुक्त स्नेह अथवा चूर्ण को नासा मार्ग से देने को नस्य कहा जाता है। नासा को सिर का द्वार माना गया है तथा इस मार्ग से दी गई औषधि सिर तथा संपूर्ण शरीर से दोषों का निष्कासन करती है। यह पंचकर्म का एक कर्म है जो कि सिर, गला, आँख, नाक तथा कान की व्याधियों में विशेषतया लाभ पहुँचाती है।
नस्य कर्म शिरः शूल, अकाल बालों का सफेद होना, बाल गिरना, पक्षाघात, सर्दी-खाँसी, पुराना जुकाम, मिर्गी के दौरे की बीमारी, गर्दन की हड्डी में दर्द, नाक में नाकड़ा-असामान्य अतिप्रवाह होना, आदि रोगों में लाभकारी होता है।
नस्यकर्म अपच, खाँसी, नशे की हालत में, बच्चों को, गर्भिणी को तथा जिन्हें नाक के अंदर चोट लगी हो को नहीं करना चाहिए। नस्य कई प्रकार के होते हैं। इसमें प्रयुक्त औषधियाँ एवं पूर्ण रूप में औषधीय तेल, घृत आदि का उपयोग रोग तथा रोगी की प्रकृति के अनुसार किया जाता है।
रक्त मोक्षण :- दूषित रक्त को शरीर से निकालने की विधि को रक्तमोक्षण कहा गया है। शस्त्र अथवा जलौका से दूषित रक्त को रोग के अनुसार शरीर के विशिष्ट भाग का चयन करके निकाला जाता है। त्वचा तथा रक्तवाहिनी के रोगों में रक्त मोक्षण से लाभ होता है। पंचकर्म करने से पहले स्नेहन तथा स्वेदन किए जाते हैं। स्नेहन तथा स्वेदन पंचकर्म से पहले करना आवश्यक ही नहीं बल्कि बहुतायत में तो इन्हीं दो पूर्वकर्मों को करके दोषों का सात्क्वय शरीर में ला सकते हैं तथा शरीर को स्वस्थ बना सकते हैं। ये दोनों पूर्व कर्म पंचकर्म का अभिन्न अंग हैं तथा शरीर में बाह्य रूप में आभ्यंतर रूप में दिए जाते हैं।
(2). स्वेदन-स्वेत (पसीना देना) :- इसका प्रयोग पित्त दोष व उसी से उत्पन्न रोगों को दूर करने में किया जाता है। स्वेदन कर्म भी पंच कर्म से पूर्व की जाने वाली अत्यंत आवश्यक क्रिया है। इस प्रक्रिया से शरीर से स्वेद अथवा पसीना निकलता है तथा दोषों का निष्कासन त्वचा मार्ग से होता है। इस प्रक्रिया में औषधि युक्त काढ़े से वाष्प दिया जाता है अथवा कपड़े, पत्थर या रेत से गर्मी देकर स्वेदन कर्म कराया जाता है। ये दोनों पूर्णकर्म करने से भी दोषों का तथा शरीर में संचित रोग रूपी विष का निष्कासन होता है।
(3). वमन् :- प्रकुपित कफ दोष का मुख्यद्वार से उल्टी के रूप में निष्कासन। इसका प्रयोग चिरकालीन संचित कफ-खाँसी आदि रोगों को दूर करने में होता है।
(4). विरेचन :- दस्त लगाना-प्रकुपित पित्त दोष को गुदा मार्ग से मल के साथ निष्कासन करना। इससे चिरकालीन संचित दोष दूर हो जाते हैं।


(5). वस्ति :-
इसमें एनिमा लगाकर मल की सफाई की जाती है और आँतों में चिपका मल निकाल दिया जाता है।गुदामार्ग अथवा मूत्रमार्ग द्वारा औषधियों को विशेष यंत्र द्वारा प्रविष्ट करवाना। यह प्रकुपित वात दोष का शोधन करती है।
(5.1). निरुह अथवा आस्थापन वस्ति :- यह औषधि युक्त कषायों से दी जाती है तथा अत्यधिक रूप में प्रकुपित वात दोष का निष्कासन करके शुद्धि करती है।
(5.2). अनुवासन अथवा स्नेह वस्ति :- यह औषधियुक्त तेल, घी अथवा दोनों को मिलाकर रोगानुसार प्रकुपित वायु दोष के निष्कासन के लिए गुदामार्ग द्वारा दी जाती है।
(5.3). कटिवस्ति :- कटिबस्ति क्रिया में रोगी की कमर के निचले हिस्से (कटि प्रदेश) में उड़द की दाल के आटे का एक गोल यंत्र बनाकर रखा जाता है तथा उसमें औषधि युक्त सुखोष्णा तैल डालकर रखा जाता है। कटिबस्ति क्रिया स्नेहन तथा स्वेदन की मिश्रित क्रिया है। इससे कमर में दर्द, कटिशूल (लंबर स्पॉन्डिलाइटिस), स्लिप डिस्क, गृध्रसी (सियाटिका) आदि रोगों में लाभ होता है। इस क्रिया को कमर की तपेदिक अथवा कैंसर में नहीं करना चाहिए।
उपरोक्त सभी पंचकर्म की क्रियायें रोगी के शरीर से प्रकुपित दोषों को निकालने का कार्य करती हैं। शोधन के बाद जब औषधियों का सेवन किया जाता है तो शरीर में रोगों का शमन शीघ्र होता है तथा रसायन औषधियों के सेवन से शरीर बलशाली हो जाता है तथा शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है.आयुर्वेद के अंग :: आयुर्वेद या आयुर्विज्ञान शाश्वत अनादि कालीन है। सृष्टि का निर्माण करने के पूर्व ही ब्रह्मा जी ने इसकी रचना कर ली थी, क्योंकि प्राणियों के शरीर के साथ विकारों या रोगों का होना भी अवश्यंभावी है। इस अष्टांग के अंग हैं :- शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमार भृत्य, अगदतंत्र, रसायनतंत्र और बाजीकरण आयुर्वेद के आठ अंग हैं। [सुश्रुत संहिता, चरक, वाग्भट्ट]
आयुर्वेद का उद्गम वेद है। विश्व में जितनी भी चिकित्सा प्रणालियों का उदय व अस्त हुआ है और जो भी वर्तमान में हैं और भविष्य में होंगी, आयुर्वेद का अंग ही हैं। वेद विश्व का प्राचीनतम आगम या शास्त्र है। आयुर्वेद अथर्ववेद का उपांग है। वेद परम आस्तिक आगम माने जाते हैं अत: आयुर्वेद भी उपवेद होने से आस्तिकला (लोक, परलोक, कर्मवाद, नित्यानित्यत्व आदि) के अन्तर्गत है। चरक और सुश्रुत संहिताएँ क्रमश: वैशेषिक और साँख्य दर्शन पर आधारित हैं। चरक को षड्धातुक और सुश्रुत को चतुर्विंशतिक या राशिपुरुष माना जाता है।
खादयश्चेतनाषष्ठा धातव: पुरुष: स्मृत:। चेतना: धातुरप्यंक: स्मृत: पुरुष: संजक:।
यद्यपि निर्विकार पुरुष (चेतनमात्र) अनादि, अविनाशी है। उसका नवीन उत्पाद व नितान्त विनाश नहीं, किन्तु राशि संज्ञक (षडधातुक) पुरुष जन्म-मरण की परम्परान्तर्गत आदि व नाशमान भी माना गया है। इस जन्म-मरण परम्परा के प्रमुख कारण जीव के मोह, इच्छा, द्वेष तथा विविध प्रकार के कर्म हैं। इसी राशि पुरुष में ही कर्म, उनका फल, नाना भाँति के सुख-दुख, जीवन-मरण, ज्ञान-अज्ञान आदि भी प्रतिष्ठित हैं। राशि संज्ञक पुरुष के अपने पूर्वोपार्जित आयुष्यकाल में होने वाले सुख-दुखों के कारण व उनके नाश करने के उपायों के विवेचन का नाम ही आयुर्वेद है। चरक ने भी यही कहा है :-
हिताहितं सुखं दु:ख मायुस्तस्यहिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तिम् आयुर्वेद: स उच्यते॥ [चरक]
स्वास्थ्य-अस्वास्थ्य, रोग-चिकित्सा के मूल में भौतिक तत्वों (वात, पित्त, कफ इत्यादि) के अलावा, जीव के कर्म को भी प्रधान हैं अर्थात पुरुष के पुरुषार्थजन्य कर्मों के फलानुसार ही इसे स्वास्थकर बाह्य भौतिक सामग्री का सहयोग मिलता है। आयुर्वेद के प्रत्येक अंग के विश्लेषण में चेतना चेतनामूलक शरीर शास्त्र अक्षुण्ण रहता है।
आयुर्वेद में रोग और उनकी चिकित्सा का विभिन्न दृष्टिकोणों से अनेक प्रकार से वर्णन मिलता है।


रोग ::

"रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगिता"
वात, पित्त और कफ दोषों की विषमता का नाम रोग या विकार है और इन तीनों की समानता (निश्चित अनुपात) का नाम ही आरोग्य है।
"तददु:ख संयोगा व्याध्य:" [सुश्रुत]
मनुष्य के साथ किसी भी प्रकार दु:ख का नाम व्याधि है। रोगों का अधिष्ठान या आधार सभी शरीर और मन को माना है। रोगों के विकल्प यहाँ से गिनाये जाते हैं।
(1). द्विविध विकल्प ::
(1.1). अधिष्ठान भेद से रोग दो प्रकार के हैं :- शारीरिक और मानसिक।
"तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमतिद्विद्या शरीरं सत्व संज्ञंच व्याधी नामाश्रयीमल: एएतेमन: शरीराधिष्ठाना:"
(1.2). वागभट्ट ने निज और आगन्तुक के रूप में एक और विकल्प स्वीकार कर सभी रोगों का अन्तर्भाव उसमें किया है :-
"निजागन्तु विभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृता:"
निज (त्रिदोयज) और आगन्तुक (बाह्यकारणजन्य)।
(1.3). सुश्रुत में औषधि साध्य और शस्त्र साध्य के भेद से रोगों के दो प्रकार हैं :-
"द्विविधास्तु व्याध्य: शस्त्रसाध्या: स्नेहादि क्रिया साध्याश्च"
छेदन-भेदन आदि शल्य क्रियासाध्य रोगों को शास्त्र साध्य और स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचनादि साध्य रोगों को स्नेहादि क्रिया साध्य माना है।
(2). त्रिविध विकल्प :: "तच्च दु:खं त्रिविधम्"
(2.1).आध्यात्मिकम्, (2.2). आधिभौतिकम्, (2.3). आधिदैविकमिति।
सुश्रुत ने आत्म शब्द से मन सहित शरीर का ग्रहण किया है। अतएव वात, पित्त, कफ से उत्पन्न शरीर संभव ज्वरादिक और रज, तम, सत्व इनकी विषम स्थिति से उत्पन्न मानसिक विकार; ये सब आध्यात्मिक रोगों के अन्तर्गत आ जाते हैं। भूत शब्द का अर्थ प्राणी लिया गया है। अत: विविध प्रकार के प्राणियों से उत्पन्न होने वाले रोगों को आधिभौतिक समझना चाहिए। देव शब्द से विविध प्रकार की सुरयोनियाँ (यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, व्यन्तर आदि) स्वीकर की गई हैं। अत: इनके कारण उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के रोग (भूत बाधा आदि) आधिदैविक माने गये हैं।
दोष, कर्म से स्वतंत्र और दोनों के मिश्रित कारण से उत्पन्न होने वाले 3 प्रकार के रोगों का एक विकल्प और है :- (1). दृष्टापचारज, (2). पूर्वापराधज (कर्मज), (3). संकरज हारदुष्टापूर्वापराध (कर्मज) अर्थात् जो केवल वर्तमान, मिथ्याहार विहार से उत्पन्न होते हैं, वे दृष्टाराज हैं। जो पूर्व कर्मों से उत्पन्न होते हैं, वे पूर्वापराधज हैं। जो पूर्वोपाजित कर्म और मिथ्याहार-विहार दोनों कारणों से होते हैं, वे संकरज हैं।[वाग्भट्टाचार्य]
(3). चतुर्विध विकल्प :: ते चतुर्विधा:
"आगन्तव:, शरीरा:, मानसा:, स्वाभाविकायश्चेति"
(3.1). आगन्तुक, (3.2). शारीरिक, (3.3). मानसिक और (3.4). स्वाभाविक भेद से रोग 4 प्रकार के हैं। यद्यपि इनमें से शरीर और आगन्तुक ये दो विकल्प पहले भी आ चुके हैं। किन्तु विवेचक की अपनी कल्पना प्रश्नार्ह नहीं होता। अत: इस चतुर्विध विकल्प में भी इन्हें गिनाया गया है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, विषाद, हर्ष, दैन्य, मात्सर्य, इच्छा, द्वेष आदि मानसिक रोग हैं। भूख, प्यास, बुढ़ापा, मृत्यु, निद्रा आदि स्वाभाविक व्याधियाँ हैं। ये प्रत्येक प्राणी के लिये स्वाभाविक एवं अनिवार्य हैं और स्वस्थ मनुष्य में भी समान रूप से पाई जाती हैं। जब ये मात्रातीत या समय से पूर्व उत्पन्न होती हैं, तब निश्चित ही व्याधि रूप में होती हैं।
(4). सप्तविध विकल्प :: सुश्रुत ने सात प्रकार के रोग भी माने हैं :-
"हिते पुन: सप्तविधा: व्याधय:"(4.1). आदि बल प्रवृत्ता:, (4.2). जन्म बलप्रवृत्ता:, (4.3). दोषबल प्रवृत्ता:, (4.4). संघात बलप्रवृत्ता:, (4.5). कालबल प्रवृत्ता:, (4.6). दैवबलप्रवृत्ता: और (4.7). स्वभावबल प्रवृत्ताश्चेति। [सुश्रुत सूत्र स्थान]


चिकित्सा के द्विविध विकल्प भेद ::

(1). संशोधन और संशमन भेद से दो प्रकार की चिकित्सा मानी गई है। पंचकर्म द्वारा शरीरस्थ कुपित दोषों का निर्हरण करना संशोधन चिकित्सा है। युक्तिपूर्वक प्रयोग की गई औषधियों द्वारा दोषों का उपशमन करना संशमन कहा गया है।
(2). बाह्य और आभ्यंतर के भेद से पु्न: दो प्रकार चिकित्सा के माने गये हैं। शस्त्र, क्षार, अग्निप्रयोग, प्रलेपादि के बाह्य प्रयोगों को बाह्य चिकित्सा तथा वमन, विरेचन, आस्थापन, शोणितमोक्षण को अभ्यन्तर चिकित्सा स्वीकार किया है। विविध प्रकार के शारीरिक रोगों का अपहरण इन्हीं प्रयोगों द्वारा होता है।
(3). अधिष्ठान भेद से पुन: चिकित्सा दो प्रकार के होते हैं :-
(3.1). शरीर रोग चिकित्सा और (3.2). मानस रोग चिकित्सा के क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, उन्माद, शोक आदि दोषों को त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का सेवन कर और आत्मा का स्वरूप चिन्तवन आदि आध्यात्मिक प्रयोगों से शमन किया जाता है। जबकि शारीरिक व्याधियों का उपचार युक्तिपूर्वक संयोजित विविध प्रकार की औषधियों के प्रयोग व बलि, मंगल, यज्ञादि को माना है।
प्रशाम्यत्यौषधै: पूर्वो दैवयुक्ति व्ययाश्रयै:। मानसोज्ञान विज्ञान धेर्यस्मृति समाधिभि:॥
(3.3). निज (शारीरिक) रोग चिकित्सा और आगन्तुक रोग चिकित्सा के भेद से भी चिकित्सा दो प्रकार की है। आगन्तुक रोगों के प्रतिकार हेतु प्रज्ञापराध (विवेक शून्यता) का परित्याग, इन्द्रियोपशमन, धैर्य, देशकाल के अनुरूप आचार-विचार और सदाचार का पालन अनिवार्य माना गया है।
चिकित्सा के त्रिविध विकल्प भेद :: सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा को प्रधान माना है। इस आधार पर शल्य क्रिया की दृष्टि से 3 भेद किये हैं। त्रिविधं कर्म :-
"पूर्व कर्म, प्रधान कर्म, पश्चात् कर्मच"
शल्य के पूर्व नियोजित उपकरणादि स्थानादि की व्यवस्था को पूर्व कर्म, शस्त्र क्रिया को प्रधान कर्म और उसके पश्चात पथ्य सेवन, विश्राम, व्रणबंधन आदि को पश्चात कर्म कहा है। यह विधान औषधीय (चिकित्सा) में भी लागू होता है। औषधादि की योजना (पूर्व कर्म), औषधि प्रयोग (प्रधानकर्म) और हित सेवन अहित परिहार (पश्चात कर्म)।
त्रिविधिमौषधम् :- (1). दैवव्यपाश्रयम्, (2). युक्ति व्यपाश्रय और (3). सत्वावजयश्चेति [च.सू.अ. 11]
मणिधारण, मंगलकार्य, होम, नियम, प्रायश्चित, उपवास आदि करना, दैव व्यपाश्रय चिकित्सा मानी गई है। आहार तथा औषध द्रव्यों की योजना को युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा कहा है। अहित कार्यों से निवृत्ति करना सत्वावजय या मनोनिग्रह माना गया है।
शारीरिक चिकित्सा को ही विधेय मानकर चरक ने पुन: तीन भेद किये है। 
(1). अन्त: परिमार्जन (अन्तरंग में (भीतर) औषधि प्रयोग) (2). बहि: परिमार्जन (त्वचा पर किये जाने वाले विविध अभ्यंग, आलेप, विलेप, सेंक आदि का प्रयोग) (3). शस्त्र प्रणिधानम (छेदन, भेदन आदि कर्म)।
दृष्टापचारज, पूर्वापराधज और संकरज (उभयहेतुक) भेद से तीन प्रकार के रोग माने हैं।
 इनके दृष्टिकोण से 3 प्रकार की चिकित्सा है :- (1). दोष (वातादि), विपरीत आहार औषधि का सेवन (2). कर्म प्रतिकूल धर्मादि का सेवन और (3). दोष (वातादि) कर्म का एक साथ क्षपण (नाश)। [आचार्य वाग्भट्ट]
विपक्ष शीलनात् पूर्व: (दोषज) कर्मज, कर्म संक्षयात्।
गच्छत्युभय जन्मातु दोषकर्मक्षयात्क्षयत्॥[अ.सू.अ.12]
(4). चिकित्सा के चतुर्विकल्प विकल्प भेद :: सुश्रुत ने चार प्रकार की चिकित्सा मानी है :- (1). संशोधन, (2). संशमन, (3). आहार और (4). आचार।
"संशोधन संशमनाहाराचार: सम्यक् प्रयुक्ता: निग्रहहेतव:"
आयुर्वेद में रोग उत्पन्न होने के पूर्व ही उसकी संत्रपादि अवस्थाओं में रोग का निर्हरण करने का स्पष्ट आदेश और विधान है। लोकव्यवहार में भी रोग और शत्रु को उत्पन्न या परिपुष्ट होने के पूर्व ही नष्ट कर देने का व्यवहार है। सुश्रुत का कथन—
संचयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थान संश्रयम्। व्यक्ति भेदं च योवेति दोषाणां स भवेद्भिषक॥


संचयऽपहृता दोषा: लभन्तेनोत्तरागति:। ते सूत्तरासुगतिषु भवन्ति बलवत्तरा॥[सुश्रुत]

जिन कारणों से रोग उत्पन्न हुए हैं उन-उन कारणों को दूर करने के लिये जिन-जिन उपायों का आश्रय लिया जाता है उन-उन आधारों के अनुसार चिकित्सा के अनेक भेद हो जाते हैं। चिकित्सा शब्द की उत्पत्ति किति रोग प्रतिकारे धातु से सन् प्रत्यय होकर हुई है। जिसका निरुक्त्यर्थ होता है रोगापहरण करने की इच्छा।
काय शब्द की व्युत्पत्ति :- काय शब्द चिञ्चयने धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है इकट्ठा करना या एकत्रित होना।[अरुणदत्त]
"चीयते प्रशस्त धातु मलैरितिकाय:"जो प्रशस्त रस रक्तादि धातुओं और मलों द्वारा जोड़ा जाय, पुष्ट किया जाय वह काय है।
"कायस्य चिकित्सा इति काय चिकित्सा" चिकित्सा की परिभाषा आचार्यों ने इस प्रकार की है
चतुर्णां भिषगादीनां शास्तानां धातुवैकृते:।
प्रवृत्ति र्धातुसाम्यार्था चिकित्से त्यभिधीयते॥[चरक]
याभि: क्रियाभिर्जायन्ते शारीरे धातव: समा:।
सा चिकित्सा विकारणां कर्मताद्भिषजांमतम्॥[सुश्रुत]
विकृत हुए रस-रक्तादि धातुओं को पुन: समावस्था में लाने के लिये योग्य चिकित्सक औषधि के प्रयोग को चिकित्सा कहते हैं। चिकित्सकों का कर्तव्य ही चिकित्सा है। सर्व सामान्य की दृष्टि में काय शब्द का अर्थ सप्त धातुमय शरीर यद्यपि होता है, किन्तु जहाँ काय चिकित्सा का प्रश्न है, प्राय: सभी आचार्यों और टीकाकारों ने काय शब्द का ध्वन्यर्थ या वाच्यार्थ जठराग्नि ही स्वीकार किया है। इसी उद्देश्य को लक्ष्य में रखकर सभी ने कायचिकित्सा का अर्थ शब्दान्तरों में समान ही प्राय: किया है। यथा :-
कायति शब्दं करोतीतिकाय:, शरीरं तच्च हृदय प्रधानाब्दस्य हृदयस्थानत्वात्, हृदयं हि सर्व शरीरे पोषनाव शिष्टमशुद्धं रत्तं रक्तवाहिनी शिराभ्यो गृहणाति शुद्धयर्थ च तत्फप्फुसे प्रक्षिपति’। शरीर के पोषक प्रधान धातु रक्त ‘धक-धक’ करने वाले हृदय द्वारा समस्त शरीर में भेजे जाते हैं। इससे शरीर या काय का आधार हृदय है।
काय अन्तराग्रस्तस्य चिकित्साकाय चिकित्सा।[ चक्रपाणि:]
चक्रपाणिजी अन्तराग्नि जठराग्नि को शरीर मानते हैं और जठराग्नि की चिकित्सा को काय चिकित्सा कहते हैं। यह रस रक्तादि धातुओं के मूल निर्माता के रूप में अग्नि को स्वीकार करते हैं। यह विकल्प भी शरीर के मूलाधार (अग्नि) में शरीर की उपचार से कल्पना कर किया गया है।
काय: सकलं शरीरं तस्य चिकित्सकाय चिकित्सा। प्राय: रसादे: सर्वांगव्यापकस्य दोषादेव ज्तरातिसार रक्त पित्तादय: सम्भवन्ति। किंवा कायतिशब्दं करोतीतिकाय: जठराग्नि:। [शिव दास सेन]
जठराग्नि से निर्मित होने वाले रसादि धातुओं से ही ज्वरादि की उत्पत्ति होती है इन्हें नाश करने के लिये सर्वप्रथम जठराग्नि की चिकित्सा आवश्यक होती है। अत: उसे ही काय माना है।
जठर: प्राणिनामग्नि: काय इत्यभिधीये। यस्तं चिकित्सेत्सीदन्तं सर्वेकाय चिकित्सक:॥[भोज]
प्राणियों की जठराग्नि ही शरीर है। दुर्बल हुई जठराग्नि की जो चिकित्सा करता है, वही काय चिकित्सक है।
यदत्रं देहधात्वोजो बलवर्णादिषोषकम्। तत्रांनाग्निहेनतु राहारान्तह्यपक्काद्रसादय:॥
[वाग्भट्ट]
देह के धातु ओज-बल आदि का पोषक अन्न है। उस अन्न का परिपाक जठराग्नि से होता है। अत: जठराग्नि ही काय है, अपक्व आहार से रसादि की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
आयुर्वेदो बलं स्वास्थ्यं मुत्सारोपचयौ प्रभा।
ओजस्ते जोऽनय: प्राणाश्चोक्ता देहाग्नि हेतुका:॥
जठराग्नि ही काय है। इस प्रकार जठराग्नि को यथावत् व्यवस्थित रखना ही आयुर्वेद की काय चिकित्सा है। यह कायचिकित्सा व्यापक है।

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