नसों मे सूजन के उपचार

                                               


कभी आपने देखा होगा कि हाथ और पैरो में दर्द की वजह से अचानक से नसों में सूजन दिखने लगती है। जिसे वैरिकोज वेंस कहा जाता है, यह एक खतरनाक बीमारी का रूप ले सकता है। कई बार ये इतनी सूजन इतनी बढ़कर हो जाती हैं कि पैरों के बाहर तक दिखने लगती हैं। क्या आप जानते हैं इसका कारण क्या है वेरिकोस वेन, जिसे वेरिकोसिटीस भी कहा जाता है। इस स्थिति में हाथ और पांव में सूजन, फैलाव, अतिरिक्त खून से भर जाना आदि होता है। वेरिकोस वेन न सिर्फ दर्दभरा होता है बल्कि अंग विशेष का रंग नीला या लाल भी हो जाता है। सामान्यतः वेरिकोस वेन होने पर अंग में सूजन ही देखने को मिलती है। यह समस्‍या आमतौर पर महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती है। गर्भावस्था, मेनोपोज, शरीर के मध्यभाग में दबाव बनना, खासकर पेट में और मोटापे के कारण पैरों में अतिरिक्त भार पड़ने के कारण वेरिकोस वेन की समस्‍या होने लगती है। लेकिन ज्‍यादा व्‍यस्‍त होने और खानपान के अभाव में यह समस्‍या किशोरी और युवतियों में भी देखी जा सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक वेरिकोस वेन ज्यादातर पैर के निचले हिस्से में होता है। क्‍या है वैरिकोज वेंस की समस्‍या? जब नसें ठीक से काम नहीं तो उस स्थिति को वैरिकोज वेंस कहा जाता है। पैरों से ब्लड को नीचे से ऊपर हार्ट तक ले जाने के लिए पैरों की नसों में वाल्वे होते हैं, इन्हीं की सहायता ग्रैविटेशन के बाद भी रक्त नीचे से ऊपर यानि हर्ट तक पहुंचता है। लेकिन अगर ये वाल्व खराब हो जाए या पैरों में कोई समस्या आ जाए, तो ब्लड ठीक से ऊपर चढ़ नहीं पाता और पैरों में ही जमने लगता है। जब शरीर में ब्लड जमने लगता है तब नसें कमजोर हो जाती हैं और फूलने लगती हैं। नसों में सूजन आने का कारण आपकी दिनचर्या में शुमार कुछ ऐसी आदते हैं जो आपके लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है। देर तक खड़े रहना इस समस्या को ज्यादातर उन लोगों में देखा जा सकता है। जिन्हें लगातार एक ही जगह पर खड़ा रहना पड़ता है।
आपने अक्सर देखा होगा कि कभी पैरों या टांगों में त्वचा के ऊपर मकड़ी के आकार की नीले रंग की उभरी हुई नसें दिखाई देती हैं। कभी यह पैरों या टांगों की अपेक्षा जांघों पर ज्यादा दिखाई देती हैं या फिर टखने के पास कभी ये नीली नसें पैरों या टांगों पर काफी बड़े आकार में हो जाती हैं। कभी आपने गौर किया होगा आपके परिवार के सदस्यों की बांह पर नीली नसें ज्यादा मात्रा में उभरी हुई होंगी और साथ ही साथ हाथ में सूजन भी आती होगी। कभी आपने कुछ लोगों में विशेषत: छाती के ऊपरी हिस्से में और गर्दन के निचले हिस्से पर उभरी हुई नीली नसों का जमाव देखा होगा।
कुछ लोगों में उभरी हुई केंचुएनुमा बड़े आकार की नसें पेट के एक तरफ हिस्से पर या दोनों तरफ देखी होंगी। ये गुच्छेनुमा उभरी हुई नीली नसों का जमाव चाहे छाती या गर्दन पर हो, चाहे बांह या पेट पर हो, चाहे जांघों या फिर पैरों या टांगों पर हों, उसको सामान्य न समझकर गंभीरता से लें अन्यथा लापरवाही के कारण इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ये असामान्य तरीके से त्वचा पर दिखने वाली उभरी हुई नीली नसें शरीर के अंदर विभिन्न रोगों की ओर इशारा करती हैं। अत: शरीर के किसी भी अंग पर उभरी हुई नीली नसों को गंभीरता से लें और तुरंत किसी वैस्कुलर सर्जन से परामर्श लें।
आखिर क्यों दिखती है ये उभरी हुई नसें?
ये उभरी हुई नसें शरीर के ऊपरी सतह पर स्थित शिराओं यानी वेन्स का जाल है, जो सामान्य परिस्‍थितियों में त्वचा पर ज्यादा उभार नहीं लेती हैं और शरीर के अंदर स्थित मोटी-मोटी शिराओं वाले सिस्टम से जुड़ी रहती हैं। ऊपरी सतह में स्थित शिराओं का जाल ऊपरी सतह से अशुद्ध खून को इकट्ठा कर शरीर की गहराई में स्थित बड़ी शिराओं के सिस्टम में पहुंचाता है, जहां से सारा अशुद्ध खून इकट्ठा होकर दिल से होते हुए फेफड़े में शुद्धिकरण के लिए पहुंचता है। अगर किसी वजह से शरीर के अंदर गहराई में स्‍थित मोटी शिराओं के सिस्टम में रुकावट आ जाती है तो ये बाहरी सतह से आने वाले खून को स्वीकार नहीं कर पाता है जिससे अशुद्ध बजाय अंदर जाने के खाल के अंदरुनी सतह में समाहित रहता है जिससे खाल के नीचे स्थि‍त शिराओं के सिस्टम में अशुद्ध खून की मात्रा ज्यादा होने से ये नीली नसें खाल के ऊपर उभरकर बड़ी मात्रा में दिखाई देने लगती है।


आपकी बांह या हाथ में उभरी हुई नसों का कारण
अगर आपके शरीर में बांह या हाथ पर उभरी हुई नीली नसें अचानक दिखने लगी हों और बराबर हों तो इसका कारण हाथों से अशुद्ध खून इकट्ठा करने वाली वेन यानी शिरा में या तो खून के कतरे स्थायी रूप से जमा हो गए हैं या फिर गर्दन या कंधे के पास स्‍थित कोई ट्यूमर या कैंसर की गांठ उस पर बाहर से दबाव डाल रही है। कभी-कभी गर्दन या कंधे के पास स्थि‍त कैंसर वाले ट्यूमर की सिंकाई के दौरान भी सूजन के साथ नीली नसों के उभरने की आशंका हो सकती है।
जांघों या टांगों में उभरी हुई नीली नसों का दिखना
अगर आपकी जांघ में मकड़ी के जाले की तरह जगह-जगह नीली नसें उभरी हुई दिख रही हैं तो इसको सामान्य न समझें। इसको किसी वैस्क्युलर या कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनकी सलाह जरूर लें। इस तरह की उभरी हुई नीली नसों के दो कारण होते हैं- एक कारण क्रोनिक वीनस इन्सफीशियन्सी यानी सीवाआई का रोग है जिसमें वेन के अंदर स्थित कपाट यानी दरवाजे कमजोर पड़ जाते हैं। सामान्यत: इन शिराओं में स्थित कपाट अशुद्ध खून को एक ही दिशा में ऊपर चढ़ाने की अनुमति देते हैं जिससे टांगों में अशुद्ध खून की ज्यादा मात्रा इकट्ठा न हो पाए। ऊपर चढ़ा हुआ खून अगर वापस आने की कोशिश करता है तो ये कपाट आपस में बंद हो जाते हैं जिससे खून नीचे वापस नहीं आ पाता है। जब ये कपाट किन्हीं कारणों से बंद हो जाते हैं या इनकी संरचना में कोई गंभीर परिवर्तन हो जाता है तो ऊपर चढ़ने वाले खून का कुछ या ज्यादा हिस्सा इन कपाटों के कमजोर होने की वजह से ऊपर जाकर फिर ‍नीचे की ओर आ जाता है।
ये वापस आने की क्रिया निरंतर दोहराए जाने पर अशुद्ध खून खाल के नीचे स्थित शिराओं में इकट्ठा होना शुरू हो जाता है जिससे खाल पर नीली नसों का उभार दिखने लगता है। ये शिराओं में स्थित कपाट लोगों में प्रतिदिन नियमित न चलना व व्यायाम का अभाव होने से कमजोर पड़ जाते हैं और अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाते। कपाटों की संरचना में परिवर्तन नसों में खून के कतरे कुछ समय के लिए इकट्ठा होने की वजह से आंशिक रूप से नष्ट हो जाते हैं जिससे वे आपस में ठीक से बंद नहीं हो पाते जिससे ऊपर चढ़ा हुआ अशुद्ध खून नीचे आना शुरू हो जाता है और खाल के नीचे उभरी हुई नस दिखने लगती है।
शिराओं में रुकावट भी उभरी हुई नसों का एक महत्वपूर्ण कारण
एक और महत्वपूर्ण कारण जांघों पर नीली नसें उभरने का डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी डीवीटी होता है व पैरों में खून के कतरे अचानक जमा हो जाते हैं। अगर इनका समय रहते नियमित इलाज नहीं किया गया तो ये खून के कतरे स्थायी रूप से टांगों की नसों में जमा हो जाएंगे जिससे अशुद्ध खून की शिराओं के जरिए अंदर चढ़ने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है जिससे खाल के नीचे स्‍थित शिराओं में अशुद्ध खून इकट्ठा होना शुरू हो जाता है और टांगों व जांघों पर नीली नसों के उभार को जन्म देता है। कभी-कभी उभरी हुई नीली नसों में अशुद्ध खून अत्यधिक मात्रा में इकट्ठा होने लगता है तो नसों का आकार मकड़ी के जाले की तरह न रहकर बड़े आकार का हो जाता है, मरीज की टांगों व जांघों की खाल पर केंचुए के आकार का दिखता है। इन्हें मेडिकल भाषा में 'वेरिकोज वेन्स' कहते हैं। अगर टांगों व जांघों पर उभरी हुई नीली नसों का समुचित इलाज नहीं किया गया तो पैरों पर काले निशान व एक्जिमा व बड़े-बड़े घाव बन जाते हैं जिससे मरीज को बड़े दुखदायी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।


गर्भवती महिलाओं की टांगों पर उभरी नीली नसें

कभी-कभी गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की टांगों व जांघों पर मकड़ीनुमा नीली नसें अगर दिखाई पड़ें तो महिलाएं सावधान हो जाएं। ऐसी गर्भवती महिलाओं में डीवीटी यानी पैरों में स्थित शिराओं यानी वेन्स में खून के कतरे जमा होने की बड़ी आशंका रहती है। ऐसे में किसी वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनसे पैर में होने वाली डीवीटी की रोकथाम की सलाह ले लें। इन खून के कतरों के जमा होने को लापरवाही से न लें। अगर अचानक पूरे पैर में सूजन आ जाए तो तुरंत इलाज शुरू कर दें अन्यथा ये कतरे टांगों से खिसककर ऊपर जाकर फेफड़े की मोटी नस को बंद कर देते हैं और मरीज की सांस फूलने लगती है और जान जाने की आशंका बढ़ जाती है।
अगर शरीर पर उभरी हुई नीली नसें हैं तो क्या करें?
अगर आप शरीर के किसी भी हिस्से में मकड़ीनुमा या कैंचुएनुमा नीली नसों का जमाव देख रहे हैं तो हाथ पर हाथ धरकर न बैठें तथा तुरंत जनरल सर्जन की बजाय किसी वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनसे परामर्श करें। ये उभरी हुई नीली नसें क्यों हुईं, इसके कारणों को जानना जरूरी है तभी सही इलाज संभव हो सकता है। इसके लिए डॉप्लर स्टडी, मल्टी सीटी स्कैन, एमआर वीनोग्राम व डिजीटल सब्ट्रैक्शन वीनोग्राफी की जरूरत पड़ती है। कभी-कभी रेडियोन्यूक्लिइड वीनोग्राफी से भी मदद ली जाती है। फेफड़े का वेंटीलेशन परफ्यूजन स्कैन व पल्मोनरी एंजियोग्राफी की भी जरूरत पड़ सकती है। अत: हमेशा किसी ऐसे अस्पताल में जाएं, जहां इन सब अत्याधुनिक जांचों की सुविधा सुगम तरीके से उपलब्ध हो तथा अस्पताल में प्रवेश करने से पहले यह अवश्य सुनिश्चित कर लें कि वहां पर किसी वैस्क्युलर व कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन की उपलब्धता है या नहीं तथा धमनी व शिराओं के ऑपरेशन होते हैं या नहीं, जैसे शिराओं की बाईपास सर्जरी, वाल्वलोप्लास्टी इत्यादि। याद रखें कि ये मामूली-सी उभरी हुई दिखने वाली नसों की अनदेखी शरीर, हाथ व पैर के लिए बड़ी महंगी पड़ सकती है इसलिए खाल के ऊपर उभरी ऐसी नीली नसों को गंभीरता से लें।
उभरी हुई नसों का आधुनिक इलाज
अगर अंदर स्थित शिराओं में स्थायी रुकावट होती है तो वेनस बाईपास सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है। वेनस बाईपास सर्जरी में आइलिएक वेन बाईपास व आईवीसी बाईपास विधि प्रमुख है। इन ऑपरेशन में‍ शिराओं की रुकावट वाली जगह को बाईपास कर दिया जाता है जिससे अशुद्ध रक्त अबाध गति से ऊपर चढ़ता रहे। अगर शिराओं के कपाट बुरी तरह नष्ट हो चुके हैं तो वाल्वुलोप्लास्टी व एक्जीलरी वेन ट्रांसफर जैसी विशेष शल्य चिकित्सा की विधाएं अपनाई जाती हैं। अगर वैरिकोस वेन ज्यादा विकसित हो गई हैं और शिराओं में रुकावट नहीं है तो 'फ्लेबेक्टमी' नामक ऑपरेशन करना पड़ता है। आजकल ऐसे मरीजों में लेसर तकनीक का भी सहारा लिया जाता है। लेसर तकनीक के अलावा एक और आरएफए नामक आधुनिकतम तकनीक आजकल बड़ी लोकप्रिय हो रही हैं। इसमें कोई सर्जरी नहीं करनी होती है और न ही टांगों की खाल में कोई काटा-पीटी करनी पड़ती है। मात्र 24 घंटे में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। इस आरएफए उपचार के बाद मरीज अगले दिन से अपने ऑफिस या काम पर जाना शुरू कर देता है। कहीं कोई ड्रेसिंग कराने का झंझट नहीं और न ही उपचार के बाद घर पर आराम करने की जरूरत। यह तकनीक लेसर की तुलना में थोड़ी बेहतर साबित हो रही है। पर वेरिकोस वेन्स का मर्ज अगर बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा है तो विशेष किस्म की क्रमित दबाव वाली जुराबें, विशेष व्यायामों व दवाइयों से ही स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश की जाती है।
वेरिकोजवेन्स यानी नसों में सूजन जिसे आमतौर पर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन लंबे समय तक इसका इलाज कराया जाए तो यह गंभीर रूप धारण कर सकती है। इसके लिए देश में पहली ग्लू क्लोजर तकनीक से इसका मोहाली में इलाज शुरू हो गया है। फोर्टिस हॉस्पिटल में इस आधुनिक तकनीक से शुरू किया गया इलाज इतना सरल है कि मात्र पांच मिनट में सर्जरी हो जाती है। यहां तक एनेस्थीसिया की भी जरूरत नहीं पड़ती। एक स्पेशल कैथेटर रोगी की नस में लगाया जाता है और नस को एक विशेष टर्किश ग्लू के साथ अलग किया जाता है। डायरेक्टर, वेस्कुलर सर्जरी और तुर्की से आए ग्लोबल आरडी डॉ. मर्टेस, प्रोक्टर ने अनूठी तकनीक के बारे में बताया
वैरिकोज वेन्स, शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है लेकिन यह विशेषकर पैरों में देखा जाता है। इसकी बाहरी दिखावट से अलग इसके चलते होने वाला दर्द बढ़ता जाता है और नसों का गलना शुरू हो जाता है। परिस्थितियां उस समय दर्दनाक हो जाती हैं जब टांगों में भारीपन या जलन महसूस होने लगती है, उनमें धड़कन महसूस होती है, मांसपेशियों में ऐंठन और टांगों के निचले हिस्से में सूजन होने लगती है। लंबे समय तक बैठे या खड़े होने के बाद किसी को भी भयंकर दर्द का सामना करना पड़ता है। नई ग्लू क्लोजर उपचार में एक पेटेंट्ड वेनाब्लॉक कैथेटर का उपयोग किया जाता है जो कि एक नई एंडोवेस्कुलर तकनीक है जिससे वेनुएस रीफ्लक्स रोग का इलाज किया जा सकता है। भारत में मैकिनोको कैमिकल एबिलिऐशन ऑफ वैरिकोज वेन्स की शुरुआत डॉ. रावुल जिंदल ने की है जिन्होंने एक बार फिर से भारत में इस नई और बेहद दर्द रहित तकनीक को सबसे पहले पेश किया है।


यह है लक्ष्ण...
इसरोग के प्रमुख लक्षणों को आम तौर पर टांगों में खुजली और भारीपन, टखनों में सूजन, त्वचा के नीचे नीले रंग की नीली धमनियां दिखना, लाली, खुश्क और त्वचा की खुजली आदि हैं। कुछ लोगों में, टखने से ऊपर की त्वचा सिकुड़ सकती है क्योंकि इसके नीचे वसा काफी सख्त हो जाती है। इसके अन्य लक्षणों में सफेद आना, अनियमित निशान-जैसे पैच आदि शामिल होते हैं जो टखनों पर दिखाई दे सकते हैं या मरीज को गंभीर और ठीक ना होने वाले अल्सर भी हो सकते हैं। डॉ जिंदल ने बताया कि इलाज के बाद भी, रोगी को कुछ दवाएं लेनी पड़ती हैं और उपचार के बाद विशेष ख्याल भी रखना होता है। उन्होंने बताया कि ग्लू प्रोसीजर को बिना लोकल एनेस्थीसिया के किया जाता है और इससे कोई निशान भी नहीं पड़ता है। इसमें तो कोई कट लगता है और ना कोई स्टिचेज (टांके) आदि लगाए जाते हैं। उपचार के 24 घंटे के भीतर मरीज को छुट्टी दे दी जाती है।

वैरिकाज वेंस के घरेलु उपाय : पैर की नसों की सूजन का इलाज
1. सेब का सिरका :
यह वेरीकोज नसों का बेहतरीन इलाज है। यह शरीर को प्राकृतिक रूप से साफ़ करता है और रक्त के प्रवाह और संचार में सहायता करता है। जब आपका रक्त स्वाभाविक रूप से बहता है तो धमनियों का भारीपन और सूजन काफी हद तक कम हो जाता है।
शुद्ध सेब के सिरके को अपनी नसों के ऊपर की त्वचा पर लगाएं और अच्छे से मालिश करें। इसका प्रयोग रोज़ सोने से पहले और उठने के बाद करें। इस विधि का प्रयोग कुछ महीनों तक करें और अपनी धमनियों का आकार कम करें।


आप 2 चम्मच सेब के सिरके का मिश्रण एक गिलास पानी में करके इसका सेवन भी कर सकते हैं। अच्छे परिणामों के लिए दिन में 2 बार इसका सेवन करें और त्वचा में निखार प्राप्त करें। पैर की नसों की सूजन का इलाज
2. कायेन पेपर :
यह धमनियों के लिए काफी जादुई उपचार साबित हो सकता है। यह विटामिन सी और बायोफ्लैवोनॉइड्स से भरपूर होते हैं, जो रक्त के संचार में वृद्धि करते हैं और धमनियों में सूजन को ठीक करते हैं। पैर की नसों की सूजन का इलाज
1 चम्मच मिर्च पाउडर को 1 कप गर्म पानी में मिश्रित करें। पैर की नसों की सूजन का इलाज
इसे अच्छे से हिलाएं।
1 महीने तक इसका सेवन दिन में 3 बार करें।
3. जैतून का तेल :
नसों का उपचार करने के लिए आपका रक्त संचार अच्छा होना चाहिए। अगर आप रोज़ाना तेल को अपने नसों पर लगाएंगे तो इससे धीरे धीरे दर्द और सूजन कम होगा।
बराबर मात्रा में जैतून का तेल और विटामिन इ का तेल मिश्रित करें और इसे हल्का गर्म कर लें। इससे कुछ मिनटों तक अपने नसों पर मालिश करें। यह पद्दति 2 महीने तक हर दिन 2 बार दोहराएं।
आप इसमें साइप्रेस के तेल की 4 बूँदें और 2 चम्मच गर्म जैतून का तेल मिश्रित कर सकते हैं। इसे अच्छे से मिलाएं और अपने शरीर को आराम दें।
4. लहसुन :
लहसुन सूजन रोकने की सबसे बेहतरीन दवाइयों में से एक के रूप में जाना जाता है। यह वेरिकोज नसों की समस्या को भी हल करता है। .इसके अलावा यह रक्त की धमनियों में मौजूद विषैले पदार्थ निकालता है और रक्त के संचार में वृद्धि करता है।
लहसुन के 6 फाहे काटें और इन्हें एक साफ़ कांच के पात्र में डाल दें।
अब 3 ताज़े टुकड़ों से संतरे का अंश लें और इसे भी इस पात्र में डालें।
इसमें 2 चम्मच जैतून का तेल मिश्रित करें।
अब इस मिश्रण को 12 घंटों के लिए छोड़ दें।
अब इस पात्र को हिलाएं और इस मिश्रण की कुछ बूँदें अपनी उँगलियों पर डालें।
अपनी प्रभावित नसों पर इस मिश्रण से गोलाकार मुद्रा में करीब 15 मिनट तक मालिश करें।
अब इस प्रभावित भाग को रुई से ढक लें और रातभर के लिए छोड़ दें।
जब तक आप ठीक नहीं हो जाते, तब तक इस विधि का प्रयोग रोज़ाना करें।
अपने भोजन में ताज़े लहसुन को सारे जीवन के लिए शामिल करें।
5. अजवायन :
यह उत्पाद विटामिन सी से भरपूर होता है और कोलेजन का उत्पादन भी सुनिश्चित करता है। यह कोशिकाओं की मरम्मत और उनके पुनर्विकास में भी आपकी मदद करता है। यह केपिलरीज़ को मज़बूत बनाता है औए वेरीकोज नसों के लक्षणों को दूर करता है।
मुट्ठीभर कटी अजवाइन को 1 कप पानी में उबालें।
इसे आंच पर 5 मिनट रहने दें।
अब आंच से हटाकर इसे ढक दें।
जब यह हल्का सा गर्म रह जाए तो इसे छान लें।
इसमें 1 बूँद गुलाब और गेंदे के तेल की बूँदें मिश्रित करें।
इसे फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें।
इसे निकालकर इसमें रुई का कपड़ा डुबोएं।
इसे प्रभावित भाग पर लगाएं और तब तक दोहराएं जब तक आपकी समस्या का समाधान ना हो जाए।
कच्चा अजवाइन खाने से भी आपको काफी लाभ होगा।
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