लेबाइल हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप)ज्यादा खतरनाक

                                             
आज के समय में अधिकतर लोग उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं और इसके इलाज के लिए दवाईयों का सेवन भी करते हैं। लेकिन लेबाइल हाइपरटेंशन एक ऐसा शब्द है, जिसके बारे में बहुत से लोग अनभिज्ञ हैं। यह उच्च रक्तचाप से थोड़ा अलग है। इसमें व्यक्ति के रक्तचाप में अचानक सामान्य से उच्च स्तर तक उतार-चढ़ाव होता है। हालांकि इस स्थिति में कुछ देर के लिए ही रक्तचाप उच्च होता है और उसके बाद सामान्य हो जाता है, इसलिए अधिकतर लोगों को इसके बारे में पता ही नहीं चलता।
हो सकता है खतरनाक
लेबाइल हाइपरटेंशन उच्च रक्तचाप से कहीं अधिक घातक साबित हो सकता है। दरअसल, रक्तचाप में एकदम से व अस्थायी वृद्धि दिल व अन्य अंगों पर दबाव डालती है। अगर रक्तचाप में बार-बार बहुत अधिक उतार-चढ़ाव आता है तो इससे गुर्दे, रक्त वाहिकाओं, आंखों व हद्य को काफी नुकसान पहुंच सकता है। इतना ही नहीं इससे स्ट्रोक यहां तक कि व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है, अगर इसका समय रहते उपचार शुरू न किया जाए।


बचें इन ट्रिगर्स से

सरोज सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी व सीनियर कंसल्टेंट डॉ जयदीप बंसल बताते हैं कि ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जिनके कारण यह लेबाइल हाइपरटेंशन व्यक्ति को अधिक परेशान कर सकता है। सबसे पहले तो रक्तचाप में वृद्धि इमोशनल स्ट्रेस के कारण हो सकती है। अगर लेबाइल हाइपरटेंशन से पीड़ित व्यक्ति किसी स्थिति में बहुत अधिक चिंतित या तनावग्रस्त है, तो दिन में कई बार उसके रक्तचाप में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त खानपान भी इस समस्या को प्रभावित करता है। खाने में सोडियम की अधिकता या अत्यधिक कैफीन का सेवन ऐसे लोगों के लिए एक ट्रिगर की तरह काम करता है। वहीं कुछ लोगों में रक्तचाप केवल तभी उच्च होता है, जब वह डॉक्‍टर से मिलते हैं या उनकी कोई सर्जरी आदि होती है। दरअसल, ऐसे में वह अपने हेल्थ को लेकर काफी अधिक चिंता करते हैं। लेबाइल हाइपरटेंशन के इस रूप को व्हाइट कोट हाइपरटेंशन या व्हाइट कोट सिंड्रोम भी कहा जाता है।
पहचानें लक्षण
डा जयदीप बंसल के अनुसार, आमतौर पर इस बीमारी का आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि इसे कोई निर्धारित लक्षण नहीं होते। लेकिन जो लोग इस समस्या से पीड़ित होते हैं, उनके शरीर में अक्सर कुछ बदलाव देखे जाते हैं, जिसके आधार पर इसकी पहचान की जा सकती है। जैसे-
सिरदर्द
दिल में घबराहट
कानों में झनझनाहट या टिनिटस
हालांकि इस बात पर भी गौर करें कि यह शारीरिक समस्याएं होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति लेबाइल हाइपरटेंशन से पीड़ित है। यह परेशानियां अन्य भी कई कारणों से होती हैं। इसलिए शरीर में इस तरह के बदलाव होने पर डॉक्‍टर से परामर्श लेना बेहद आवश्यक है।
जरूरी है इलाज
लेबाइल हाइपरटेंशन के इलाज का सबसे पहला कदम है कि रक्तचाप को हमेशा ही मॉनिटर किया जाए, क्योंकि इस स्थिति में 15 से 20 मिनट में भी रक्तचाप बढ़ सकता है और फिर सामान्य हो सकता है। इसलिए यह देखना बेहद आवश्यक है कि दिन में कितनी बार रक्तचाप में उतार-चढ़ाव आता है। वहीं रक्तचाप के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयां जैसे डायूरेटिक्स या एसीई अवरोधक आदि इसमें किसी काम नहीं आती। बल्कि इसके इलाज के जरिए जरूरी है कि इमोशनल स्ट्रेस या तनाव को नियंत्रित किया जाए। इसलिए डॉक्‍टर की सलाह पर अल्प्राजोलमए क्लोनोपिन, डायजेपामए लोरज़ेपमए पेरोक्सेटीनए सेरट्रलाइन जैसी एंटी-स्ट्रेस दवाईयों का सेवन किया जा सकता है।


करें यह प्रयास

कहते हैं कि प्रिवेंशन इज़ बेटर देन क्योर अर्थात रोकथाम इलाज से बेहतर है। इसलिए आप भी अपनी स्थिति को सुधारने व भविष्य में लेबाइल हाइपरटेंशन को रोकने के लिए कुछ प्रयास कर सकते हैं। इसमें धूम्रपान व शराब छोड़ने से लेकर नमक व कैफीन की मात्रा को सीमित करें। वही तनाव आप पर हावी न हो, इसके लिए व्यायाम, मेडिटेशन, डीप ब्रीदिंग, योगा आदि को अपनी दिनचर्या का ही एक हिस्सा बनाएं।
लक्षण को जाने
आमतौर पर इस बीमारी का आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि इसे कोई निर्धारित लक्षण नहीं होते। लेकिन जो लोग इस समस्या से पीड़ित होते हैं, उनके शरीर में अक्सर कुछ बदलाव देखे जाते हैं, जिसके आधार पर इसकी पहचान की जा सकती है। जैसे-
सिरदर्द
दिल में घबराहट
कानों में झनझनाहट या टिनिटस
हालांकि इस बात पर भी गौर करें कि यह शारीरिक समस्याएं होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति लेबाइल हाइपरटेंशन से पीड़ित है। यह परेशानियां अन्य भी कई कारणों से होती हैं। इसलिए शरीर में इस तरह के बदलाव होने पर डॉक्‍टर से सलाह लेना बेहद जरुरी है।
कैसे करें इलाज
लेबाइल हाइपरटेंशन के इलाज का सबसे पहला कदम है कि रक्तचाप को हमेशा ही मॉनिटर किया जाए, क्योंकि इस स्थिति में 15 से 20 मिनट में भी रक्तचाप बढ़ सकता है और फिर सामान्य हो सकता है। इसलिए यह देखना बेहद आवश्यक है कि दिन में कितनी बार रक्तचाप में उतार-चढ़ाव आता है। वहीं रक्तचाप के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयां जैसे डायूरेटिक्स या एसीई अवरोधक आदि इसमें किसी काम नहीं आती। बल्कि इसके इलाज के जरिए जरूरी है कि इमोशनल स्ट्रेस या तनाव को नियंत्रित किया जाए। इसलिए डॉक्‍टर की सलाह पर अल्प्राजोलमए क्लोनोपिन, डायजेपामए लोरज़ेपमए पेरोक्सेटीनए सेरट्रलाइन जैसी एंटी-स्ट्रेस दवाईयों का सेवन किया जा सकता है।
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हरी मिर्च खाने के फायदे व नुकसान


यदि आप मसालेदार भोजन करने के आदि हैं तो बिना हरी मिर्च के ये संभव नहीं है. जाहिर है इसके इस्तेमाल से खाने में स्वाद आ जाता है. हरी मिर्च का तड़का केवल खाने का स्वाद ही नही बढ़ाता बल्कि इसमें शरीर के लिए ज़रूरी कई सारे विटामिन्स की आपूर्ति भी कारता है. इसके सेवन से आपको सेहत के कई सारे फायदे मिलते हैं. जिन लोगों में आयरन की कमी होती है उनके लिए हरी मिर्च बहुत फायदेमंद है क्योंकि हरी मिर्च आयरन का प्राकृतिक स्रोत है. इसलिए इसे खाने से ऑस्टियोपोरोसिस की संभावना कम होती है. हरी मिर्च विटामिन के और एंटीऑक्सिडेंट का बहुत अच्छा स्रोत है. इसमें मौजूद एंटीबैक्टीरियल गुण कई प्रकार के संक्रमण से हमे दूर रखते हैं.
हरी मिर्च स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। हरी मिर्च एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर होती है। हरी मिर्च कई तरह की होती है। शिमला मिर्च भी हरी मिर्च की श्रेणी में आती है जो कि स्वास्थ्य के लिए उपयोगी सुपरफूड होता है। भारतीय घरों में हरी मिर्च पाउडर और हरी मिर्च का खाना बनाने, मसालों और चटनी आदि बनाने में इस्तेमाल करते हैं साथ ही इसे कच्चा खाने का इस्तेमाल कर सकते हैं।
हरी मिर्च में पोषक तत्व
विटामिन c- 239 प्रतिशत
आयरन- 5 प्रतिशत
मैग्नीशियम- 5 प्रतिशत
विटामिन A- 19 प्रतिशत
फाइबर – 6 प्रतिशत
पोटेशियम – 9 प्रतिशत
इम्यूनिटी बूस्टसोडियम – 9 मिग्रा होता है
इसी के साथ कैल्शियम आदि पोषक तत्व भी काफी मात्रा में होते हैं। हरी मिर्च में काफी कम मात्रा में कैलोरी होती है इसके प्रति 100 ग्राम में सिर्फ 40 कैलोरी होती है।
बैक्टीरिया संक्रमण से बचाता है –
मिर्च में बैक्टीरिया रोधी गुण होते हैं। इसलिए यह बैक्टीरिया के कारण होने वाले संक्रमण से शरीर को बचाता है और बीमारियों के खतरे को कम करता है।


हृदय को फायदा

यदि आप चाहते हैं कि आपका ह्रदय स्वस्थ रहे तो आपको भी हरी मिर्च का असवान करना चाहिए. क्योंकि यह यह बुरे कोलेस्ट्रॉल को कम करके धमनियों के सख्त होने को रोकती है. इसके अलावा यह फिब्रिनोल्य्टिक की गतिविधि को बढाकर हमारे शरीर में खून को जमने से रोकने में मदद करता है जिससे दिल का दौरा आने की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है.
खाना पचाने के लिए लाभकारी
मिर्च में फाईबर पर्याप्त मात्रा में होता है इसलिए इसे खाने से पाचन तंत्र को मदद मिलती है। यहीं कारण है कि खाना पचाने के हेतु हरी मिर्च का सेवन लाभकारी होता है।
तनाव को कम करने में
जब आप हरी मिर्च का सेवन करते हैं तो यह एंडोर्फिन नामक एक हार्मोन के स्तर को बढ़ा देती है। एंडोर्फिन तनाव को कम करके मूड को ठीक करने वाला एक हार्मोन होता है इसलिए हरी मिर्च का सेवन करने से तनाव कम होता है।हरी मिर्च मस्तिष्क में एंडोर्फिन का रिसाव करके हमारी मनोदशा में सुधार करती है और हम खुश महसूस करते हैं. इसलिए लोग व्यंजनों में अधिक मिर्च होने पर भी इसे खाते रहते हैं. इसलिए आप कह सकते हैं कि हरी मिर्च मस्तिष्क के लिए भी फायदेमंद है.
वजन घटाने में
हरी मिर्च डाइटिंग करने वाले लोगों के लिए भी बेहद उपयोगी है. क्योंकि इसके सेवन से वजन घटाने में भी मदद मिलती है. जब हम तीखा खाना खाते हैं तो हमारे शरीर में बनने वाली ऊष्मा से ही हमारे शरीर की कैलोरी जलती है. इसके सेवन से मेटाबोलिज्म के स्तर को भी बढ़ जाता है.
त्वचा के लिए लाभकारी
मिर्च में विटामिन सी के साथ विटामिन ई भी पर्याप्त मात्रा में होता है । इसका सेवन करने से त्वचा को नेचुरल ऑयल मिलता है जिससे त्वचा खूबसूरत और निखरी बनी रहती है।


जुकाम और साइनस के लिए

कैप्साइसिन नामक तत्व हरी मिर्च में पाया जाता है जो कि म्यूकस को तरल बनाता है। यह नाक और साइनस के छिद्रों को खोलने में मदद करता है। इसलिए हरी मिर्च खाना सर्दी-जुकाम और साइनस इंफेक्शन के लिए फायदेमंद होता है।
ब्लड शुगर लेवल को सही रखने में
डायबिटीज के रोगियों के लिए हरी मिर्च खाना बहुत लाभदायक होता है। हरी मिर्च खाने से रक्त शर्करा का लेवल सही बना रहता है इस कारण डायबिटीज के पीड़ित लोगों के लिए हरी मिर्च खाना लाभकारी रहता है|
आँखो के लिए
हमारी आँखो के लिए फायदेमंद विटामिन सी और बीटा-कैरोटीन भी हरी मिर्च में मौजूद होता है. हमेशा हरी मिर्ची को अंधेरी जगह पर रखें क्योंकि रोशनी और धूप के संपर्क में आने से इसके अंदर का विटामिन सी ख़त्म हो जाता है.
इम्यूनिटी बूस्ट
विटामिन सी हरी मिर्च में पर्याप्त मात्रा में होता है। आपने अक्सर महसूस किया होगा की हरी मिर्च खाने से बंद नाक खुल जाती है। हरी मिर्च का सेवन करने से उसमें मौजूद विटामिन सी इम्यूनिटी बूस्ट करते हैं। जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
हड्डियों और दांतों के लिए
हरी मिर्च में भी नारंगी के जैसा ही विटामिन सी मौजूद होता है. आपको बता दें कि विटामिन सी हमारे शरीर में हड्डियों और दांतों की मजबूती के लिए बेहद आवश्यक होता है. इसके सेवन से हड्डियां और दांत को भी मजबूत बनते हैं.
खून की कमी दूर करने में
मिर्च मे पर्याप्त मात्रा में आयरन होता है। इसलिए इसे खाने से खून में हिमोग्लोबिन की कमी नहीं होती है। यहीं कारण है कि हरी मिर्च खाने से खून की कमी जैसे रोग नहीं होते हैं।


कैंसर का खतरा दूर होता है

मिर्च में एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं जो मुक्त-मूलकों को खत्म करते हैं और कैंसर के खतरे को दूर करते हैं।
उच्च रक्तचाप में
उच्चरक्तचाप की समस्या से पीड़ित व्यक्ति भी हरी मिर्च का सेवन करके अपनी परेशानी कम कर सकते हैं. हरी मिर्च में रक्तचाप को नियंत्रण करने के गुण होते हैं. इसलिए उच्च रक्तचाप के मरीज को अपने आहार में संतुलित मात्रा में हरी मिर्च को शामिल करना चाहिए.
सावधानी -
* हरी मिर्च में मौजूद कैप्साइसिन पेट की गर्मी को बढ़ाता है जिससे अनेकों प्रकार की स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानियां हो सकती हैं.
* इसमें अधिक फाइबर होता है इसलिए डायरिया होने का खतरा होता है.
* इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट अल्सर की सम्भावना को बढ़ा सकते हैं.
* हरी मिर्च के अधिक सेवन से पेट में जलन और चक्कर की समस्या भी हो सकती है.
* हरी मिर्च के अधिक सेवन से मधुमेह सामान्य से भी नीचे हो जाता है.
* इसके अधिक सेवन से आप को त्वचा सम्बंधित एलर्जी हो सकती है.

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किडनी स्टोन के रामबाण घरेलू,आयुर्वेदिक नुस्खे





किडनी में स्टोन होना एक आम समस्या है. यूरीन में कई रासायनिक तत्व मौजूद होते हैं. यूरिक एसिड, फॉस्फोरस, कैल्शियम और ऑक्जेलिक एसिड. यही सारे रासायनिक तत्व स्टोन बनाने के लिए उत्तरदायी होते हैं.
इसके साथ ही बहुत अधिक मात्रा में विटामिन डी के सेवन से, शरीर में लवणों के असंतुलन से, डीहाइड्रेशन से और अनियमित डाइट की वजह से भी किडनी में स्टोन हो जाता है.
किडनी में स्टोन हो जाने की वजह से पेट में हर वक्त दर्द बना रहता है. इसके अलावा बार-बार यूरीन डिस्चार्ज करना, शौच के दौरान दर्द होना, बहुत ज्यादा पसीना आना और उल्टी होना इसके लक्षण हैं.
किड्नी में स्टोन यूरिन सिस्टम का एक रोग है जिसमें किड्नी के अंदर छोटे-छोटे पत्थर जैसी कठोर पदार्थ बन जाती है। आम तौर पर ये पदार्थ पेशाब के रास्ते से बाहर निकल जाती है लेकिन कई बार ये इतने सख्त होते हैं जिससे बाहर निकल नहीं पाते हैं और गुर्दे में ही ठहर जाते हैं। जिससे पेशाब बाहर नहीं आ पाती है।


गुर्दे की पथरी अलग अलग आकार की हो सकती है| कुछ पथरी रेत के दानों की तरह बहुत हीं छोटे आकार के होते हैं तो कुछ बहुत हीं बड़े। आमतौर पर छोटे मोटे पथरी मूत्र के जरिये शरीर के बाहर निकल जाया करते हैं लेकिन जो पथरी आकार में बड़े होते हैं वे बाहर नहीं निकल पाते एवं मूत्र के बाहर निकलने में बहुत ही बाधा डालते हैं उससे बहुत हीं ज्यादा पीड़ा उत्पन्न होती है। पथरी का दर्द कभी-कभी बर्दाश्त से बाहर हो जाता है। इसमें पेशाब करने में बहुत दिक्कत होती है और कई बार पेशाब रूक जाता है। पथरी होने की कोई उम्र नहीं होती है, यह किसी भी उम्र में हो सकती है।

इससे पहले आप गुर्दे की पथरी बाहर निकलने के लिए उपचार जानते उससे पहले आपको जानना होगा आखिर पथरी होती क्यों हैं इसके क्या लक्षण हैं।
गुर्दे या पित्त की पथरी के कारण
बचपन में मिट्टी खाने से कई कण गुर्दे में ही ठहर जाते हैं।
पानी कम पीने की वजह से पेशाब सही से नहीं होती है। जिसकी वजह से विषैले पदार्थ बाहर नहीं आ पाते हैं।
जोर से पेशाब आने पर पेशाब नहीं करने से गुर्दे की पथरी के लिए लापरवाही है।
कम पानी पीने की वजह से शरीर से विषैले पदार्थ बहार नहीं आ पाते हैं। यह प्रमुख कारण है पथरी होने के। इसलिए रोजाना भरपूर पानी पियें।


पथरी होने के लक्षण

गुर्दे की पथरी में पेशाब रुक-रुक कर होना।
पेशाब करते समय दर्द होना और 10 मिनट के बाद दर्द अचानक गायब होना।
पेशाब का रंग पीला, भूरा, गुलाबी या लाल होना।
बुखार आना या उल्टी करने को मन करना।
पथरी के दर्द में ठीक से बैठ ना पाना, न ठीक से खड़े हो पाना, ना ही ठीक से सो पाना।
पथरी के कारण कमर में दर्द होना।
पेशाब में अजीब सी बदबू आना पथरी का लक्षण होता है।
पथरी निकालने के घरेलू उपाय और इलाज
पथरी का घरेलू उपाय के लिए भरपूर पानी पिएं
ज्यादा से ज़्यादा पानी पीए। एक दिन में कम से कम 2 से 3 लीटर पानी पीए। शरीर में पानी की कमी होने से गुर्दे में पानी कम छंटता है। पानी कम छनने से शरीर मे मौजूद कैल्शियम, यूरिक एसिड और दूसरे पथरी बनने वाले तत्व गुर्दे में फस जाते हैं। जो बाद में धीरे धीरे पथरी बन जाते है। जीरे और चीनी को समान मात्रा मे पीसकर एक – एक चम्मच ठंडे पानी से रोज 3 बार लेने से लाभ होता है।
करेला 
करेला वैसे तो बहुत कड़वा होता है और आमतौर पर लोग इसे कम पसंद करते है। परंतु पथरी मे यह रामबाण की तरह काम करता है। करेले में मैग्नीशियम और फास्फोरस नामक तत्व होते है, जो पथरी को बनने से रोकते है। इसलिए आप चाहें तो करेले का जूस पीएं या करेले की सब्जी को आहार में शामिल करें।
*पका हुआ जामुन पथरी से निजात दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पथरी होने पर पका हुआ जामुन खाना चाहिए।
*किडनी में स्‍टोन को निकालने में बथुए का साग भी बहुत ही कारगर होता है। इसके लिए आप आधा किलो बथुए के साग को उबाल कर छान लें। अब इस पानी में जरा सी काली मिर्च, जीरा और हल्‍का सा सेंधा नमक मिलाकर, दिन में चार बार पीने से शीघ्र ही फायदा होता है।
*आंवला का पथरी में बहुत फायदा करता है। आंवला का चूर्ण मूली के साथ खाने से मूत्राशय की पथरी निकल जाती है।

*मिश्री, सौंफ, सूखा धनिया लेकर 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर डेढ लीटर पानी में रात को भिगोकर रख दीजिए। अगली शाम को इनको पानी से छानकर पीस लीजिए और फिर पानी में मिलाकर इसका घोल बना लीजिए, इस घोल को पी‍जिए।ऐसा नियमित रूप से करें शीघ्र ही पथरी निकल जाएगी।


अंगूर

अंगूर मे एलुमिनियम और सोडियम क्लोराइड बहुत ही कम मात्रा में होता है। इसलिए किडनी मे स्टोन के उपचार के लिए अंगूर बहुत ही उत्तम माना जाता है। साथ ही अंगूर प्राकृतिक मूत्रवर्धक के रूप में उत्कृष्ट रूप में काम करता है क्यूंकि इसमें पोटेशियम नमक तत्व और पानी भरपूर मात्रा में होते है। जो पथरी को बाहर निकलने में मदद करते हैं।
प्याज
प्याज में पथरी नाशक तत्व होते है इसका सेवन कर आप किड्नी के स्टोन से निजात पा सकते हैं। लगभग 70 ग्राम प्याज को पीसकर और उसका रस निकालकर पीए। सुबह खाली पेट प्याज के रस का नियमित सेवन करने से पथरी छोटे-छोटे टुकड़े होकर निकल जाती है।
पथरी का घरेलू उपाय अजवाइन
अजवाइन एक अच्छा मूत्रवाहक है और किडनी के लिए टॉनिक के रूप में काम करता है। गुर्दे में पथरी के गठन को रोकने के लिए अजवाइन का स्तेमाल मशाले के रूप मे या चाय में नियमित रूप से किया जा सकता है। यह पथरी को धीरे-धीरे तोड़कर मूत्र से बाहर धकेलने में मदद करता है।
नियमित रूप से केला खाएं
पथरी की समस्या से निपटने के लिए केला खाना चाहिए क्यूंकि इसमें विटामिन बी 6 होता है। विटामिन बी 6 ओकजेलेट क्रिस्टल को बनाने से रोकता और तोड़ता है। साथ ही विटामिन बी-6, विटामिन बी के अन्य विटामिन के साथ सेवन करना किड्नी में स्टोन के इलाज मे काफ़ी मददगार होता है। एक शोध के मुताबिक विटामिन-बी की 100 से 150 मिलीग्राम दैनिक खुराक गुर्दे की पथरी की चिकित्स्कीय उपचार में बहुत फायदेमंद हो सकता है।
नींबू रस और जैतून का तेल
नींबू का रस और जैतून का तेल का मिश्रण, गुर्दे की पथरी के लिए रामबाण उपचार में से एक है। पथरी का पहला लक्षण होता है दर्द का होना। दर्द होने पर 60 ML लीटर नींबू के रस में उतनी ही मात्रा में जैतून का तेल मिलकर सेवन करने से आराम मिलता है। नींबू का रूस और जैतून का तेल पूरे स्वस्थ्य के लिए अच्छा रहता है और आसानी से मिल भी जाता है।
तुलसी
तुलसी की चाय कोई भी किड्नी हेल्त के लिए बहुत ही सफल प्राकृतिक उपचार है। यह किड्नी में पथरी के इलाज के लिए एक सही उपाय है। शुद्ध तुलसी का रस लेने से पथरी को यूरिन के रास्ते निकालने में सहायता मिलती है। कम से कम एक महीना तुलसी के पत्तो के रूस के साथ शहद लेने से आप फर्क महसूस कर सकते है। साथ ही आप तुलसी के कुच्छ ताजे पत्तो को रोजाना चबा भी सकते है।
अनार का रस
अनार का रस गुर्दे की पथरी के खिलाफ एक बहुत ही सही और आसान घरेलू उपाय है। अनार के कई स्वस्थ्य लाभ के अलावा इसके बीज और रस में खट्टेपन और कासेले गुण के कारण इसे किड्नी में पथरी के लिए एक प्राकृतिक उपाय के रूप मे माना जाता है। रोजाना अनार का जूस पियें और पथरी से छुटकारा पाएं।


तरबूज

गुर्दे की पथरी को बाहर निकलने के लिए तरबूज एक बहुत ही आसान इलाज है। तरबूज में लगभग ९०% से ज्यादा पानी पाया जाता है जो शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकलने में आसानी करता है। रोजाना ज्यादा तरबूज खाएं उतना ही आपका पथरी कम होगा। इससे आपको ज्यादा से ज्यादा पेशाब आएगी और बार-बार पेशाब से पथरी पिघलेगी।
व्हीट ग्रास
व्हीट ग्रास को पानी में उबालकर ठंडा कर लें. इसके नियमित सेवन से किडनी के स्टोन और किडनी से जुड़ी दूसरी बीमारियों में काफी आराम मिलता है. इसमे कुछ मात्रा में नींबू का रस मिलाकर पीना और बहतर हो सकता है
.गुर्दे की पथरी के आयुर्वेदिक उपचार
पपीते के जड़ 5-8 ग्राम पीस लें अब इसमें 50-100 ग्राम पानी से घोल कर साफ़ कपडे से छान लें और मरीज को पीला दें। 21 से 25 दिन इस घोल को पिलाकर पथरी पेशाब के साथ बाहर निकल जाएगी।
पत्थरचट्टा के पत्तों को पानी में उबाल कर काढ़ा बनाये फिर पियें। लगातार 2 हफ्ते ऐसा करने से आप पथरी से निजात पा लेंगे।
*आंवले के चूर्ण को मूली के साथ रोजाना सुबह के समय खाएं। इससे पेशाब से समन्धित रोग दूर होंगे।
पथरी निकलने के आयुर्वेदिक इलाज में पके हुए जामुन खाएं। जल्द ही पथरी से छुटकारा मिलेगा।
दो चम्मच मिश्री, 15 बड़ी इलाइची के दाने, एक चम्मच खरबूज के बीज की गिरी को एक गिलास पानी में अच्छे से घोल लें फिर उसके बाद पी लें। नियमित रूप से सुबह-शाम सेवन करें इससे पथरी का उपचार सही तरह से होगा।
*रोजाना नारियल पानी पियें, किरा, पका पपीता पथरी को बाहर निकालने में मदद करते हैं।
पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

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विशिष्ट परामर्श-


पथरी के भयंकर दर्द को तुरंत समाप्त करने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित होती है,जो पथरी- पीड़ा बड़े अस्पतालों के महंगे इलाज से भी बमुश्किल काबू मे आती है इस औषधि की 2-3 खुराक से आराम लग जाता है| वैध्य श्री दामोदर 9826795656 की जड़ी बूटी - निर्मित दवा से 30 एम एम तक के आकार की बड़ी पथरी भी आसानी से नष्ट हो जाती है|
गुर्दे की सूजन ,पेशाब मे जलन ,मूत्रकष्ट मे यह औषधि रामबाण की तरह असरदार है| आपरेशन की जरूरत ही नहीं पड़ती| औषधि से पथरी न गले तो मनी बेक गारंटी युक्त है|






पेट मे गैस बनने के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार



पेट से संबंधित कई तरह की समस्याओं में पेट में गैस बनना एक आम समस्या है। छोटी उम्र से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक, हर उम्र के व्यक्ति को कभी न कभी इस समस्या का सामना करना पड़ा है। पेट में गैस बनने के कई कारण हो सकते हैं जैसे अत्यधिक भोजन करना, ज्यादा देर तक भूखे रहने, तीखा या चटपटा भोजन करना, ऐसा भोजन करना जो पचने में कठि‍न हो, ठीक तरीके से चबाकर न खाना, ज्यादा चिंता करना, शराब पीना, कुछ बीमारियों व दवाओं के सेवन के कारण भी पेट में गैस सकती है।

आयुर्वेद में, इस स्थिति को क्रॉनिक गैस्ट्रिटिस कहा जाता है। यह मुख्य रूप से पित्त दोष के बढ़ने के कारण होता है। भले ही गैस बनना या एसिडिटी होना कोई बड़ी बीमारी न हो, लेकिन अगर इसका इलाज समय रहते न किया जाए, तो ये अल्सर जैसी बीमारी का रूप भी धारण कर सकती है। आमतौर पर पेट में गैस तब बनती है, जब बैक्टीरिया उन कार्बोहाइड्रेट को उत्तेजित कर देते हैं, जो छोटी आंत में ठीक से पच नहीं पाते। ऐसा ज्यादातर फाइबर युक्त आहार खाने से होता है। वैसे तो गैस की समस्या से बचने के लिए लोग कई दवाओं का सहारा लेते हैं, इसके बजाए अगर घरेलू उपायों  को आजमाया जाए, तो इस गंभीर समस्या से जल्द छुटकारा पाया जा सकता है।


अस्वस्थ खान-पान और गलत दिनचर्या की वजह से पेट में गैस बनने की समस्या लगभग हर किसी को है। आए दिन लोगों को पेट में गैस बनने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार गैस बनना या पेट फूलना एक सामान्य बात है। ज्यादातर लोगों के साथ यह समस्या है। लेकिन अगर आप नियमित रूप से इससे पीडि़त हैं, तो यह लैक्टोज असहिष्णुता, हार्मोनल असंतुलन या किसी प्रकार की आंत्र रूकावट जैसे गंभीर विकार का संकेत भी हो सकता है। पेट में गैस की समस्या से बचने के लिए दवाओं के बजाय प्राकृतिक व आयुर्वेदिक उपायों का सहारा लेना अच्छा होता है। आज के इस आर्टिकल में हम आपको पेट में गैस बनने की समस्या से राहत दिलाने वाले कुछ ऐसे आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में बताएंगे, जिन्हें अपनाकर आप कुछ ही समय में पेट फूलने या गैस की समस्या से राहत पा सकते हैं।

पेट में गैस या अपच कोई बीमारी नहीं है, बल्कि ये पाचन क्रिया का ही एक हिस्सा है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहां आपके पाचन तंत्र में अतिरिक्त गैस जमा हो जाती है। पेट में गैस बनने की समस्या से निपटने के लिए ये समझना जरूरी है कि ऐसा होता क्यों है। गैस आपके पाचन तंत्र में दो तरह से जमा हो सकती है। भोजन करते या पीते समय आप हवा को निगलते हैं, जिससे ऑक्सीजन और नाइट्रोजन आपके शरीर में प्रवेश करती है। दूसरा महत्वपूर्ण कारण है, जब आप भोजन को पचाते हैं, तब हाइड्रोजन, मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें उत्सर्जित होती हैं और पेट में जमा हो जाती हैं। यदि यह ज्यादा मात्रा में है, तो बहुत असुविधा पैदा कर सकती है।
पेट में गैस या अपच होना काफी कुछ आपके दैनिक भोजन विकल्पों पर भी निर्भर करता है। खासतौर से सेम, पत्तागोभी, छोले या दाल जैसे खाद्य पदार्थ आसानी से पच नहीं पाते हैं। ये बृहदांत्र से गुजरते हैं, जिसमें बहुत सारे बैक्टीरिया होते हैं, जो गैसों को जारी करते समय भोजन को तोड़ने में मदद करते हैं, जिससे आप असहज महसूस कर सकते हैं। कुछ मामलों में गैस गुदा से होकर गुजरती है, तो उस पर मौजूद बैक्टीरिया सल्फर मिलाते हैं, जिससे गैस में गंध बढ़ जाती है। पेट में गैस कभी-कभी दर्द के साथ हो सकती है या नहीं भी हो सकती। गैस की परेशानी से छुटकारा पाने के लिए घरेलू उपचारों की मदद ली जा सकती है।
पेट में गैस होने पर कई बार आपको शर्मिन्दा होना पड़ता है। अगर आप जल्द से जल्द इससे राहत पाना चाहते हैं, तो इसके लक्षणों को जरूर जान लें।
भूख न लगना
बदबूदार सांस या डकार आना
उल्टी या दस्त होना
पेट फूल जाना
पेट के दाहिनी तरफ दर्द होना
बदूबदार गैस पास होना
बेचैनी होना
पेट की गैस की समस्या से बचने के लिए दवा लेना सही है, लेकिन इससे समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी। इसके लिए अच्छा है कि आप घरेलू उपायों को अपनाएं। इसके दो फायदे हैं। एक तो यह आपके घर में ही मौजूद हैं, जिससे आपका जेब खर्च नहीं बढ़ेगा, वहीं अन्य दवाओं की तरह इसके कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। तो नीचे जानते हैं पेट की गैस को भगाने के कुछ असरदार घरेलू नुस्खों के बारे में।
अजवाइन
आयुर्वेद में अजवाइन को बहुत असरदार बताया गया है। पेट की गैस के लिए अजवाइन बहुत अच्छा आयुर्वेदिक उपचार है। अगर आपके पेट में गैस बन जाती है, तो गर्म पानी के साथ एक चम्मच अजवाइन लें, इससे एसिडिटी से तुरंत राहत मिल जाएगी। दरअसल, अजवाइन में थाइमोल नामक एक यौगिक होता है, जो गैस्ट्रिक रस को स्त्रावित करता है, जो पाचन में आपकी मदद करता है। अगर आपको गैस की समस्या अक्सर ही रहती है, तो आप रोजाना दिन में कभी भी एक बार इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। आप पहले से बेहतर महसूस करेंगे।
गैस का रामबाण इलाज हींग
आपके किचन में मौजूद हींग गैस की समस्या से निपटने का रामबाण इलाज है। पेट में गैस बनने पर आधा चम्मच हींग को गर्म पानी के साथ मिलाएं और पी लें। हींग एक एंटी फ्लैटुलैंट के रूप में कार्य करता है, जो पेट में अतिरिक्त गैस उत्पन्न करने वाले आंत बैक्टीरिया के विकास को रोकता है। आयुर्वेद के अनुसार हींग, शरीर के वात दोष (वायु से उत्पन्न होने वाला दोष) को संतुलित करने में मदद करता है। जब कोलोन में वात बढ़ जाता है, तो गैस का निर्माण होता है।


नींबू का रस और बेकिंग पाउडर

पेट में बनने वाली ज्यादा गैस को कम करने के लिए नींबू का रस और बेकिंग सोडा एक सरल उपाय है। गैस की समस्या से राहत पाने के लिए 1 चम्मच नींबू का रस और आधा चम्मच बेकिंग सोडा को एक कप पानी में घोलें। खाना खाने के बाद इसे पीएं। बता दें कि यह कार्बन डाईऑक्साइड बनाने में आपकी मदद करता है, जिससे पाचन प्रक्रिया भी सुगम बनती है।
जीरे का पानी
जीरा पानी गैस्ट्रिक या गैस की समस्या को जड़ से खत्म करने का सबसे अच्छा आयुर्वेदिक उपाय है। दरअसल, जीरे में मौजूद आवश्यक तेल, लार ग्रंथियों को उत्तेजित कर भोजन के बेहतर पाचन में मददगार होता है। इसके साथ ही यह अतिरिक्त गैस बनने से रोकता भी है। अगर आप पेट की गैस से राहत पाना चाहते हैं, तो 1 चम्मच जीरा को दो कप पानी में 10-15 मिनट के लिए उबालें। इसे ठंडा होने दें और खाना खाने के बाद इस पानी को पीएं। ऐसा करने से पेट में गैस की समस्या का समाधान जल्दी हो जाएगा।
आयुर्वेदिक दवा अदरक
अगर आपके पास में जब चाहे गैस बनती है, तो अदरक एक बेहतर आयुर्वेदिक दवा है। पेट में गैस की समस्या से बचने के लिए एक चम्मच ताजा अदरक को किस लें और इसे एक चम्मच नीम्बू के रस के साथ खाना खाने के बाद लें। गैस से राहत पाने के लिए अदरक की चाय पीना भी एक प्रभावी घरेलू उपाय है। आपको बता दें कि अदरक एक नेचुरल कार्मिनेटिव एजेंट (पेट फूलने से राहत देने वाला एजेंट के रूप में कार्य करता है) है। इसलिए पेट में गैस से बचने के लिए अपनी दिनचर्या में भी आप अदरक का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इलायची
कई लोगों को खाना खाने के तुरंत बाद गैस बनने लगती है, जिससे उनका पेट फूलने लगता है। कई लोगों को इस दौरान बेचैनी भी होने लगती है। गैस को चुटकियों में भगाने के लिए इलायची बेहतर आयुर्वेदिक व घरेलू उपाय है। इसका इस्तेमाल करने के लिए एक पिसी हुई इलायची को हींग, सूखे अदरक और काले नमक के साथ पांच ग्राम के बराबर अनुपात में मिलाएं। अगर आपको पेट में गैस अक्सर बनती है, तो इस मिश्रण को दिन में दो से तीन बार गुनगुने पानी के साथ लें। गैस बनने से रूक जाएगी और आपको राहत महसूस होगी।
त्रिफला चूर्ण
हर्बल पाउडर त्रिफला भी कब्ज या गैस की समस्या से निपटने में काफी मददगार है। जब भी आपको गैस की शिकायत हो, आधा चम्मच त्रिफला को पानी में 5-10 मिनट के लिए उबालें और सोने से पहले इसे पी लें। इस मिश्रण के सेवन की मात्रा का बेहद ध्यान रखें, क्योंकि इसमें हाई फाइबर होता है। अगर आप इसे अधिक मात्रा में ले लेते हैं, तो यह सूजन का कारण भी बन सकता है।
आयुर्वेदिक उपचार छाछ
पेट में गैस बनना यूं तो आम समस्या, लेकिन नियमित रूप से अगर ये समस्या हो, तो आप छाछ पीकर घर में इसका इलाज कर सकते हैं। दोपहर के खाने के बाद एक गिलास छाछ में भुना हुआ जीरा और सूखा हुआ अदरक पाउडर मिलाकर पीने से इस बीमारी को ठीक करने में मदद मिलेगी।
सौंफ के बीज चबाएं
आपने देखा होगा कि हर इंडियन रेस्टोरेंट में खाने के बाद सौंफ सर्व की जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि सौंफ के बीजों को पेट में गैस को बनने से रोकने और पाचन में सुधार करने के लिए जाना जाता है। इसलिए खाने के बाद हमेशा एक से दो चुटकी सौंफ का सेवन जरूर करें। पेट में गैस कभी नहीं बनेगी।
हींग, काली मिर्च का पेस्ट
पेट में गैस या एसिडिटी होने पर कई बार सबके सामने शर्मिंदा भी होना पड़ता है। अब आप इस समस्या से जल्द से जल्द निजात चाहते हैं, तो हींग और काली मिर्च एसिडिटी या कब्ज की समस्या से राहत पाने की घरेलू मेडिसिन है। इसे बनाने के लिए काली मिर्च, सोंठ लें। दोनों को पीसकर एक बारीक चूर्ण बना लें। मिश्रण में एक ग्राम हींग और दो ग्राम सेंधा नमक मिलाएं। इसमें पानी की कुछ बूंद डालें और पतला सा पेस्ट बनाएं। इस पेस्ट को पैन में डालकर थोड़ा गर्म करें और पेट पर लगाएं। दो घंटे तक इसे पेट पर लगा रहने दें और फिर पानी से साफ कर लें। इस पेस्ट को आप गैस बनने पर कभी भी लगा सकते हैं। तुरंत आराम मिलेगा।


पुदीना

पेट में यदि गैस बन रही हो, तो तुरंत पुदीने का देसी नुस्खा अपना लें। ये तो सभी जानते हैं कि पुदीना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसका सेवन कर लिया जाए, तो बहुत सी परेशानियों से निजात पाई जा सकती है। अगर आपके पेट में गैस बनती है, तो पुदीने का जूस या पुदीने की च
नींबू
आप सोच भी नहीं सकते कि, छोटा सा दिखने वाला नींबू आपके पेट में गैस की समस्या का समाधान कर सकता है। अगर आपको ज्यादा गैस बनने की परेशानी है, तो एक गिलास पानी में नींबू निचोड़कर, उसमें थोड़ा सा काला नमक, जीरा, अजवाइन , दो चम्मच मिश्री और पुदीने का रस मिलाकर पीएं। इससे पेट की गैस से जल्द छुटकारा मिलेगा
लहसुन
लहसुन पेट में गैस बनने की समस्या का समाधान आसानी से कर सकता है। इसे कई तरह से उपयोग लाया जा सकता है। आप चाहें तो इसे आग में भूनकर या फिर जूस बनाकर या फिर खाने में डालकर भी खा सकते हैं। जिन लोगों की कब्ज की समस्या आए दिन बनी रहती है, उन्हें कच्चा लहसुन खाना चाहिए। ऐसा करने से बहुत जल्दी आराम मिलता है और कब्ज की समस्या बार-बार नहीं होती।
सेब का सिरका
सही समय पर खाना न खाने से भी पेट में गैस की समस्या बनी रहती है। इसके लिए सेब का सिरका बेहतर घरेलू उपचार माना जाता है। इसका इस्तेमाल करने के लिए गुनगुने पानी में दो चम्मच सेब का सिरका मिलाकर पीएं। स्वाद में थोड़ा खट्टा जरूर लगेगा, लेकिन गैस से तुरंत आराम दिलाने के लिए ये बहुत अच्छा उपाय है।
लौंग
पेट में गैस की समस्या कितनी भी पुरानी क्यों न हो, लौंग इसके लिए बहुत फायदेमंद है। लौंग को अगर शहद के साथ लिया जाए, तो इससे कब्ज की समस्या से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा आप चाहें, तो लौंग को चूसने से भी गैस की परेशानी आपको नहीं होगी।
दालचीनी


दालचीनी पेट को हल्का करती है और गैस की समस्या से राहत दिलाती है। बता दें कि दालचीनी गैस्ट्रिक एसिड और पेप्सिन के स्त्राव को पेट की वॉल्स से दूर करती है, जिससे गैस नहीं बनती। दालचीनी का इस्तेमाल आप दो तरह से कर सकते हैं। पहला तो एक कप गर्म दूध में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और पी जाएं। आप चाहें तो स्वाद के लिए इसमें शहद मिला सकते हैं। इसके अलावा आप चाहें तो दालचीनी की चाय बनाकर पी सकते हैं। इसे बनाने के लिए एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं। पांच मिनट तक इसे पानी में उबलने दें। उबलने के बाद मिश्रण को ठंडा होने दें और फिर पी लें। गैस बनना तुरंत बंद हो जाएगी।

अगर पाचन तंत्र के माध्यम से अगर गैस नहीं निकलती, तो यह सूजन और बैचेनी का कारण बन सकती है। घरेलू उपचारों को अपनाने के साथ अगर अपनी दिनचर्या और आदतों में कुछ बदलाव किए जाएं, जो गैस और सूजन से राहत मिल सकती है। पेट में गैस की समस्या से निजात पाने के लिए नीचे हम आपको कुछ सुझाव दे रहे हैं, जिन्हें अगर आपने अपनी दिनचर्या में शामिल किया, तो आपको जीवन में कभी गैस की समस्या नहीं होगी।

ध्यान दें
पेट में गैस बनने से रोकना चाहते हैं तो धीरे-धीरे चबाकर भोजन करें।
छोटे-छोटे बाइट खाएं और कई बार खाएं।
भोजन खाने के बाद लेटे नहीं बल्कि सीधे बैठें।
खाना खाने के बाद थोड़ा टहल लें।
बहुत ज्यादा ठंडा पानी या ड्रिंक ना पीएं। इससे भी गैस बनती है।
अगर आप च्यूइंग गम चबाते हैं, तो इसे बदं कर दें।
गैस बनाने वाले खाद्य पदार्थों को खाने से बचें।
सेाडा या अन्य काबार्नेट ड्रिंक्स पीने से बचें।
पेट में गैस है, तो डेयरी उत्पादों का सेवन न करें।
फिजिकली एक्टिव रहें, ताकि आपको गैस की समस्या रोज-रोज न बने।
धुम्रपान से दूरी बनाए रखें।
अपनी लाइफस्टाइल में एक्सरसाइज को शामिल करें।
स्ट्रॉ यानि पाइप के जरिए पानी पीने से बचें।


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खून(हेमोग्लोबिन) बढ़ाने वाले फल


अक्सर महिलाओं या बच्चों को कुपोषण या पौष्टिक तत्व के अभाव के कारण खून की कमी या एनीमिया रोग हो जाता है। एनीमिया रोग आयरन की कमी से होता है और आयरन की आवश्यकता हीमोग्लोबिन बनाने के लिए होती है। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला प्रोटीन है, जो शरीर के विभिन्न अंगों तथा ऊतकों में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। यदि आपको आहार से आयरन की उतनी मात्रा नहीं मिल पा रही, जितनी की आपके शरीर को ज़रूरत है, तो आपको आयरन की कमी या आयरन की कमी से होने वाला रोग एनीमिया हो सकता है। इसीलिए आज हम आपको हीमोग्लोबिन बढ़ाने वाले या खून बढ़ाने वाले फल के विषय में बताने जा रहे हैं ताकि आप इनका सेवन करके खून की कमी से होने वाले रोग यानि एनीमिया रोग से बच सकें। खून की कमी से आसान से आसान काम भी दूभर हो जाता है. शरीर सुस्त पड़ जाता है और हड्डियां कमजोर. शरीर में खून की कमी को दूर करने के लिए फलों का सेवन करना चाहिए. अगर आपको कोई रोग नहीं है तो भी इन फलों का सेवन करें, स्वास्थ्य लाभ होगा.
सेब-
कहा जाता है कि हर दिन एक सेब खाने से आप तमाम बीमारियों से दूर रह सकते हैं. बीमारियों को दूर रखने के साथ ही सेब की मदद से शरीर में खून की कमी को भी पूरा किया जा सकता है. सेब के सेवन से भी शरीर में हीमोग्लोबिन को बढ़ाया जा सकता है.


अंगूर-

शरीर में खून की कमी की पूर्ति के लिए अंगूर भी काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. अंगूर में विटामिन, पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन जैसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर में जरूरी तत्वों की पूर्ति करते हैं. शरीर में खून की कमी की भरपाई के लिए अंगूर का सेवन करना चाहिए.


अनार-
शरीर में खून की कमी के पूरी करने के लिए अनार सबसे अच्छा उपाय है. यह खाने में तो स्वादिष्ट होता ही है इसके कई फायदे भी होते हैं. अनार कैल्शियम, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम, तांबा, लोहा और विटामिन्स से जैसे तत्वों से भरपूर होता है. अनार खाने से शरीर में खून की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है.
गाजर-
फलों के अलावा सब्जी भी खून बढ़ाने में काफी मदद कर सकती है. सब्जियों में अच्छी सेहत के गाजर काफी फायदेमंद रहती है. साथ ही गाजर के सेवन से खून की कमी को भी दूर किया जा सकता है. गाजर का रोजाना जूस पीने से भी काफी फायदा मिलता है.


चुकंदर-

खून की कमी को दूर करने के लिए चुकंदर काफी फायदेमंद साबित होता है. रोजाना चुकंदर के सेवन से शरीर में खून की मात्रा को पर्याप्त स्तर तक लाया जा सकता है. वहीं चुकंदर और अनार को मिलाकर जूस पीने से भी काफी फायदा मिलता है. दोनों का जूस बनाकर पीने से शरीर में खून बनाया जा सकता है.
तरबूज़
तरबूज 91 प्रतिशत पानी होता है। इसमें 6 प्रतिशत शक्कर और बहुत ही कम फैट होता है। इसमें न्यूट्रीएंट्स ढेर सारे हैं। हर बार तरबूज खाने पर आपको विटामिन ए, बी6 और सी मिलता है। इसके अलावा बहुत सारा ल्योकोपेन, एंटीऑक्सीडेंट और अमीनो एसिड मिलता है। साथ ही यह है खास स्त्रोत पोटेशियम के लिए।
टमाटर
टमाटर देता है काफी सारा विटामिन ई (एल्फा टोकोफेरोल), थियामिन, निआचिन, विटामिन बी6, मैग्निसियम, फॉस्फोरस और कॉपर। इसके साथ ही यह फायबर, विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन के, पोटेसियम और मैग्नीज़ का भी बढिया स्त्रोत है।
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नसों मे सूजन के उपचार

                                               


कभी आपने देखा होगा कि हाथ और पैरो में दर्द की वजह से अचानक से नसों में सूजन दिखने लगती है। जिसे वैरिकोज वेंस कहा जाता है, यह एक खतरनाक बीमारी का रूप ले सकता है। कई बार ये इतनी सूजन इतनी बढ़कर हो जाती हैं कि पैरों के बाहर तक दिखने लगती हैं। क्या आप जानते हैं इसका कारण क्या है वेरिकोस वेन, जिसे वेरिकोसिटीस भी कहा जाता है। इस स्थिति में हाथ और पांव में सूजन, फैलाव, अतिरिक्त खून से भर जाना आदि होता है। वेरिकोस वेन न सिर्फ दर्दभरा होता है बल्कि अंग विशेष का रंग नीला या लाल भी हो जाता है। सामान्यतः वेरिकोस वेन होने पर अंग में सूजन ही देखने को मिलती है। यह समस्‍या आमतौर पर महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती है। गर्भावस्था, मेनोपोज, शरीर के मध्यभाग में दबाव बनना, खासकर पेट में और मोटापे के कारण पैरों में अतिरिक्त भार पड़ने के कारण वेरिकोस वेन की समस्‍या होने लगती है। लेकिन ज्‍यादा व्‍यस्‍त होने और खानपान के अभाव में यह समस्‍या किशोरी और युवतियों में भी देखी जा सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक वेरिकोस वेन ज्यादातर पैर के निचले हिस्से में होता है। क्‍या है वैरिकोज वेंस की समस्‍या? जब नसें ठीक से काम नहीं तो उस स्थिति को वैरिकोज वेंस कहा जाता है। पैरों से ब्लड को नीचे से ऊपर हार्ट तक ले जाने के लिए पैरों की नसों में वाल्वे होते हैं, इन्हीं की सहायता ग्रैविटेशन के बाद भी रक्त नीचे से ऊपर यानि हर्ट तक पहुंचता है। लेकिन अगर ये वाल्व खराब हो जाए या पैरों में कोई समस्या आ जाए, तो ब्लड ठीक से ऊपर चढ़ नहीं पाता और पैरों में ही जमने लगता है। जब शरीर में ब्लड जमने लगता है तब नसें कमजोर हो जाती हैं और फूलने लगती हैं। नसों में सूजन आने का कारण आपकी दिनचर्या में शुमार कुछ ऐसी आदते हैं जो आपके लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है। देर तक खड़े रहना इस समस्या को ज्यादातर उन लोगों में देखा जा सकता है। जिन्हें लगातार एक ही जगह पर खड़ा रहना पड़ता है।
आपने अक्सर देखा होगा कि कभी पैरों या टांगों में त्वचा के ऊपर मकड़ी के आकार की नीले रंग की उभरी हुई नसें दिखाई देती हैं। कभी यह पैरों या टांगों की अपेक्षा जांघों पर ज्यादा दिखाई देती हैं या फिर टखने के पास कभी ये नीली नसें पैरों या टांगों पर काफी बड़े आकार में हो जाती हैं। कभी आपने गौर किया होगा आपके परिवार के सदस्यों की बांह पर नीली नसें ज्यादा मात्रा में उभरी हुई होंगी और साथ ही साथ हाथ में सूजन भी आती होगी। कभी आपने कुछ लोगों में विशेषत: छाती के ऊपरी हिस्से में और गर्दन के निचले हिस्से पर उभरी हुई नीली नसों का जमाव देखा होगा।
कुछ लोगों में उभरी हुई केंचुएनुमा बड़े आकार की नसें पेट के एक तरफ हिस्से पर या दोनों तरफ देखी होंगी। ये गुच्छेनुमा उभरी हुई नीली नसों का जमाव चाहे छाती या गर्दन पर हो, चाहे बांह या पेट पर हो, चाहे जांघों या फिर पैरों या टांगों पर हों, उसको सामान्य न समझकर गंभीरता से लें अन्यथा लापरवाही के कारण इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ये असामान्य तरीके से त्वचा पर दिखने वाली उभरी हुई नीली नसें शरीर के अंदर विभिन्न रोगों की ओर इशारा करती हैं। अत: शरीर के किसी भी अंग पर उभरी हुई नीली नसों को गंभीरता से लें और तुरंत किसी वैस्कुलर सर्जन से परामर्श लें।
आखिर क्यों दिखती है ये उभरी हुई नसें?
ये उभरी हुई नसें शरीर के ऊपरी सतह पर स्थित शिराओं यानी वेन्स का जाल है, जो सामान्य परिस्‍थितियों में त्वचा पर ज्यादा उभार नहीं लेती हैं और शरीर के अंदर स्थित मोटी-मोटी शिराओं वाले सिस्टम से जुड़ी रहती हैं। ऊपरी सतह में स्थित शिराओं का जाल ऊपरी सतह से अशुद्ध खून को इकट्ठा कर शरीर की गहराई में स्थित बड़ी शिराओं के सिस्टम में पहुंचाता है, जहां से सारा अशुद्ध खून इकट्ठा होकर दिल से होते हुए फेफड़े में शुद्धिकरण के लिए पहुंचता है। अगर किसी वजह से शरीर के अंदर गहराई में स्‍थित मोटी शिराओं के सिस्टम में रुकावट आ जाती है तो ये बाहरी सतह से आने वाले खून को स्वीकार नहीं कर पाता है जिससे अशुद्ध बजाय अंदर जाने के खाल के अंदरुनी सतह में समाहित रहता है जिससे खाल के नीचे स्थि‍त शिराओं के सिस्टम में अशुद्ध खून की मात्रा ज्यादा होने से ये नीली नसें खाल के ऊपर उभरकर बड़ी मात्रा में दिखाई देने लगती है।


आपकी बांह या हाथ में उभरी हुई नसों का कारण
अगर आपके शरीर में बांह या हाथ पर उभरी हुई नीली नसें अचानक दिखने लगी हों और बराबर हों तो इसका कारण हाथों से अशुद्ध खून इकट्ठा करने वाली वेन यानी शिरा में या तो खून के कतरे स्थायी रूप से जमा हो गए हैं या फिर गर्दन या कंधे के पास स्‍थित कोई ट्यूमर या कैंसर की गांठ उस पर बाहर से दबाव डाल रही है। कभी-कभी गर्दन या कंधे के पास स्थि‍त कैंसर वाले ट्यूमर की सिंकाई के दौरान भी सूजन के साथ नीली नसों के उभरने की आशंका हो सकती है।
जांघों या टांगों में उभरी हुई नीली नसों का दिखना
अगर आपकी जांघ में मकड़ी के जाले की तरह जगह-जगह नीली नसें उभरी हुई दिख रही हैं तो इसको सामान्य न समझें। इसको किसी वैस्क्युलर या कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनकी सलाह जरूर लें। इस तरह की उभरी हुई नीली नसों के दो कारण होते हैं- एक कारण क्रोनिक वीनस इन्सफीशियन्सी यानी सीवाआई का रोग है जिसमें वेन के अंदर स्थित कपाट यानी दरवाजे कमजोर पड़ जाते हैं। सामान्यत: इन शिराओं में स्थित कपाट अशुद्ध खून को एक ही दिशा में ऊपर चढ़ाने की अनुमति देते हैं जिससे टांगों में अशुद्ध खून की ज्यादा मात्रा इकट्ठा न हो पाए। ऊपर चढ़ा हुआ खून अगर वापस आने की कोशिश करता है तो ये कपाट आपस में बंद हो जाते हैं जिससे खून नीचे वापस नहीं आ पाता है। जब ये कपाट किन्हीं कारणों से बंद हो जाते हैं या इनकी संरचना में कोई गंभीर परिवर्तन हो जाता है तो ऊपर चढ़ने वाले खून का कुछ या ज्यादा हिस्सा इन कपाटों के कमजोर होने की वजह से ऊपर जाकर फिर ‍नीचे की ओर आ जाता है।
ये वापस आने की क्रिया निरंतर दोहराए जाने पर अशुद्ध खून खाल के नीचे स्थित शिराओं में इकट्ठा होना शुरू हो जाता है जिससे खाल पर नीली नसों का उभार दिखने लगता है। ये शिराओं में स्थित कपाट लोगों में प्रतिदिन नियमित न चलना व व्यायाम का अभाव होने से कमजोर पड़ जाते हैं और अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाते। कपाटों की संरचना में परिवर्तन नसों में खून के कतरे कुछ समय के लिए इकट्ठा होने की वजह से आंशिक रूप से नष्ट हो जाते हैं जिससे वे आपस में ठीक से बंद नहीं हो पाते जिससे ऊपर चढ़ा हुआ अशुद्ध खून नीचे आना शुरू हो जाता है और खाल के नीचे उभरी हुई नस दिखने लगती है।
शिराओं में रुकावट भी उभरी हुई नसों का एक महत्वपूर्ण कारण
एक और महत्वपूर्ण कारण जांघों पर नीली नसें उभरने का डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी डीवीटी होता है व पैरों में खून के कतरे अचानक जमा हो जाते हैं। अगर इनका समय रहते नियमित इलाज नहीं किया गया तो ये खून के कतरे स्थायी रूप से टांगों की नसों में जमा हो जाएंगे जिससे अशुद्ध खून की शिराओं के जरिए अंदर चढ़ने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है जिससे खाल के नीचे स्‍थित शिराओं में अशुद्ध खून इकट्ठा होना शुरू हो जाता है और टांगों व जांघों पर नीली नसों के उभार को जन्म देता है। कभी-कभी उभरी हुई नीली नसों में अशुद्ध खून अत्यधिक मात्रा में इकट्ठा होने लगता है तो नसों का आकार मकड़ी के जाले की तरह न रहकर बड़े आकार का हो जाता है, मरीज की टांगों व जांघों की खाल पर केंचुए के आकार का दिखता है। इन्हें मेडिकल भाषा में 'वेरिकोज वेन्स' कहते हैं। अगर टांगों व जांघों पर उभरी हुई नीली नसों का समुचित इलाज नहीं किया गया तो पैरों पर काले निशान व एक्जिमा व बड़े-बड़े घाव बन जाते हैं जिससे मरीज को बड़े दुखदायी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।


गर्भवती महिलाओं की टांगों पर उभरी नीली नसें

कभी-कभी गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की टांगों व जांघों पर मकड़ीनुमा नीली नसें अगर दिखाई पड़ें तो महिलाएं सावधान हो जाएं। ऐसी गर्भवती महिलाओं में डीवीटी यानी पैरों में स्थित शिराओं यानी वेन्स में खून के कतरे जमा होने की बड़ी आशंका रहती है। ऐसे में किसी वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनसे पैर में होने वाली डीवीटी की रोकथाम की सलाह ले लें। इन खून के कतरों के जमा होने को लापरवाही से न लें। अगर अचानक पूरे पैर में सूजन आ जाए तो तुरंत इलाज शुरू कर दें अन्यथा ये कतरे टांगों से खिसककर ऊपर जाकर फेफड़े की मोटी नस को बंद कर देते हैं और मरीज की सांस फूलने लगती है और जान जाने की आशंका बढ़ जाती है।
अगर शरीर पर उभरी हुई नीली नसें हैं तो क्या करें?
अगर आप शरीर के किसी भी हिस्से में मकड़ीनुमा या कैंचुएनुमा नीली नसों का जमाव देख रहे हैं तो हाथ पर हाथ धरकर न बैठें तथा तुरंत जनरल सर्जन की बजाय किसी वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनसे परामर्श करें। ये उभरी हुई नीली नसें क्यों हुईं, इसके कारणों को जानना जरूरी है तभी सही इलाज संभव हो सकता है। इसके लिए डॉप्लर स्टडी, मल्टी सीटी स्कैन, एमआर वीनोग्राम व डिजीटल सब्ट्रैक्शन वीनोग्राफी की जरूरत पड़ती है। कभी-कभी रेडियोन्यूक्लिइड वीनोग्राफी से भी मदद ली जाती है। फेफड़े का वेंटीलेशन परफ्यूजन स्कैन व पल्मोनरी एंजियोग्राफी की भी जरूरत पड़ सकती है। अत: हमेशा किसी ऐसे अस्पताल में जाएं, जहां इन सब अत्याधुनिक जांचों की सुविधा सुगम तरीके से उपलब्ध हो तथा अस्पताल में प्रवेश करने से पहले यह अवश्य सुनिश्चित कर लें कि वहां पर किसी वैस्क्युलर व कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन की उपलब्धता है या नहीं तथा धमनी व शिराओं के ऑपरेशन होते हैं या नहीं, जैसे शिराओं की बाईपास सर्जरी, वाल्वलोप्लास्टी इत्यादि। याद रखें कि ये मामूली-सी उभरी हुई दिखने वाली नसों की अनदेखी शरीर, हाथ व पैर के लिए बड़ी महंगी पड़ सकती है इसलिए खाल के ऊपर उभरी ऐसी नीली नसों को गंभीरता से लें।
उभरी हुई नसों का आधुनिक इलाज
अगर अंदर स्थित शिराओं में स्थायी रुकावट होती है तो वेनस बाईपास सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है। वेनस बाईपास सर्जरी में आइलिएक वेन बाईपास व आईवीसी बाईपास विधि प्रमुख है। इन ऑपरेशन में‍ शिराओं की रुकावट वाली जगह को बाईपास कर दिया जाता है जिससे अशुद्ध रक्त अबाध गति से ऊपर चढ़ता रहे। अगर शिराओं के कपाट बुरी तरह नष्ट हो चुके हैं तो वाल्वुलोप्लास्टी व एक्जीलरी वेन ट्रांसफर जैसी विशेष शल्य चिकित्सा की विधाएं अपनाई जाती हैं। अगर वैरिकोस वेन ज्यादा विकसित हो गई हैं और शिराओं में रुकावट नहीं है तो 'फ्लेबेक्टमी' नामक ऑपरेशन करना पड़ता है। आजकल ऐसे मरीजों में लेसर तकनीक का भी सहारा लिया जाता है। लेसर तकनीक के अलावा एक और आरएफए नामक आधुनिकतम तकनीक आजकल बड़ी लोकप्रिय हो रही हैं। इसमें कोई सर्जरी नहीं करनी होती है और न ही टांगों की खाल में कोई काटा-पीटी करनी पड़ती है। मात्र 24 घंटे में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। इस आरएफए उपचार के बाद मरीज अगले दिन से अपने ऑफिस या काम पर जाना शुरू कर देता है। कहीं कोई ड्रेसिंग कराने का झंझट नहीं और न ही उपचार के बाद घर पर आराम करने की जरूरत। यह तकनीक लेसर की तुलना में थोड़ी बेहतर साबित हो रही है। पर वेरिकोस वेन्स का मर्ज अगर बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा है तो विशेष किस्म की क्रमित दबाव वाली जुराबें, विशेष व्यायामों व दवाइयों से ही स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश की जाती है।
वेरिकोजवेन्स यानी नसों में सूजन जिसे आमतौर पर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन लंबे समय तक इसका इलाज कराया जाए तो यह गंभीर रूप धारण कर सकती है। इसके लिए देश में पहली ग्लू क्लोजर तकनीक से इसका मोहाली में इलाज शुरू हो गया है। फोर्टिस हॉस्पिटल में इस आधुनिक तकनीक से शुरू किया गया इलाज इतना सरल है कि मात्र पांच मिनट में सर्जरी हो जाती है। यहां तक एनेस्थीसिया की भी जरूरत नहीं पड़ती। एक स्पेशल कैथेटर रोगी की नस में लगाया जाता है और नस को एक विशेष टर्किश ग्लू के साथ अलग किया जाता है। डायरेक्टर, वेस्कुलर सर्जरी और तुर्की से आए ग्लोबल आरडी डॉ. मर्टेस, प्रोक्टर ने अनूठी तकनीक के बारे में बताया
वैरिकोज वेन्स, शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है लेकिन यह विशेषकर पैरों में देखा जाता है। इसकी बाहरी दिखावट से अलग इसके चलते होने वाला दर्द बढ़ता जाता है और नसों का गलना शुरू हो जाता है। परिस्थितियां उस समय दर्दनाक हो जाती हैं जब टांगों में भारीपन या जलन महसूस होने लगती है, उनमें धड़कन महसूस होती है, मांसपेशियों में ऐंठन और टांगों के निचले हिस्से में सूजन होने लगती है। लंबे समय तक बैठे या खड़े होने के बाद किसी को भी भयंकर दर्द का सामना करना पड़ता है। नई ग्लू क्लोजर उपचार में एक पेटेंट्ड वेनाब्लॉक कैथेटर का उपयोग किया जाता है जो कि एक नई एंडोवेस्कुलर तकनीक है जिससे वेनुएस रीफ्लक्स रोग का इलाज किया जा सकता है। भारत में मैकिनोको कैमिकल एबिलिऐशन ऑफ वैरिकोज वेन्स की शुरुआत डॉ. रावुल जिंदल ने की है जिन्होंने एक बार फिर से भारत में इस नई और बेहद दर्द रहित तकनीक को सबसे पहले पेश किया है।


यह है लक्ष्ण...
इसरोग के प्रमुख लक्षणों को आम तौर पर टांगों में खुजली और भारीपन, टखनों में सूजन, त्वचा के नीचे नीले रंग की नीली धमनियां दिखना, लाली, खुश्क और त्वचा की खुजली आदि हैं। कुछ लोगों में, टखने से ऊपर की त्वचा सिकुड़ सकती है क्योंकि इसके नीचे वसा काफी सख्त हो जाती है। इसके अन्य लक्षणों में सफेद आना, अनियमित निशान-जैसे पैच आदि शामिल होते हैं जो टखनों पर दिखाई दे सकते हैं या मरीज को गंभीर और ठीक ना होने वाले अल्सर भी हो सकते हैं। डॉ जिंदल ने बताया कि इलाज के बाद भी, रोगी को कुछ दवाएं लेनी पड़ती हैं और उपचार के बाद विशेष ख्याल भी रखना होता है। उन्होंने बताया कि ग्लू प्रोसीजर को बिना लोकल एनेस्थीसिया के किया जाता है और इससे कोई निशान भी नहीं पड़ता है। इसमें तो कोई कट लगता है और ना कोई स्टिचेज (टांके) आदि लगाए जाते हैं। उपचार के 24 घंटे के भीतर मरीज को छुट्टी दे दी जाती है।

वैरिकाज वेंस के घरेलु उपाय : पैर की नसों की सूजन का इलाज
1. सेब का सिरका :
यह वेरीकोज नसों का बेहतरीन इलाज है। यह शरीर को प्राकृतिक रूप से साफ़ करता है और रक्त के प्रवाह और संचार में सहायता करता है। जब आपका रक्त स्वाभाविक रूप से बहता है तो धमनियों का भारीपन और सूजन काफी हद तक कम हो जाता है।
शुद्ध सेब के सिरके को अपनी नसों के ऊपर की त्वचा पर लगाएं और अच्छे से मालिश करें। इसका प्रयोग रोज़ सोने से पहले और उठने के बाद करें। इस विधि का प्रयोग कुछ महीनों तक करें और अपनी धमनियों का आकार कम करें।


आप 2 चम्मच सेब के सिरके का मिश्रण एक गिलास पानी में करके इसका सेवन भी कर सकते हैं। अच्छे परिणामों के लिए दिन में 2 बार इसका सेवन करें और त्वचा में निखार प्राप्त करें। पैर की नसों की सूजन का इलाज
2. कायेन पेपर :
यह धमनियों के लिए काफी जादुई उपचार साबित हो सकता है। यह विटामिन सी और बायोफ्लैवोनॉइड्स से भरपूर होते हैं, जो रक्त के संचार में वृद्धि करते हैं और धमनियों में सूजन को ठीक करते हैं। पैर की नसों की सूजन का इलाज
1 चम्मच मिर्च पाउडर को 1 कप गर्म पानी में मिश्रित करें। पैर की नसों की सूजन का इलाज
इसे अच्छे से हिलाएं।
1 महीने तक इसका सेवन दिन में 3 बार करें।
3. जैतून का तेल :
नसों का उपचार करने के लिए आपका रक्त संचार अच्छा होना चाहिए। अगर आप रोज़ाना तेल को अपने नसों पर लगाएंगे तो इससे धीरे धीरे दर्द और सूजन कम होगा।
बराबर मात्रा में जैतून का तेल और विटामिन इ का तेल मिश्रित करें और इसे हल्का गर्म कर लें। इससे कुछ मिनटों तक अपने नसों पर मालिश करें। यह पद्दति 2 महीने तक हर दिन 2 बार दोहराएं।
आप इसमें साइप्रेस के तेल की 4 बूँदें और 2 चम्मच गर्म जैतून का तेल मिश्रित कर सकते हैं। इसे अच्छे से मिलाएं और अपने शरीर को आराम दें।
4. लहसुन :
लहसुन सूजन रोकने की सबसे बेहतरीन दवाइयों में से एक के रूप में जाना जाता है। यह वेरिकोज नसों की समस्या को भी हल करता है। .इसके अलावा यह रक्त की धमनियों में मौजूद विषैले पदार्थ निकालता है और रक्त के संचार में वृद्धि करता है।
लहसुन के 6 फाहे काटें और इन्हें एक साफ़ कांच के पात्र में डाल दें।
अब 3 ताज़े टुकड़ों से संतरे का अंश लें और इसे भी इस पात्र में डालें।
इसमें 2 चम्मच जैतून का तेल मिश्रित करें।
अब इस मिश्रण को 12 घंटों के लिए छोड़ दें।
अब इस पात्र को हिलाएं और इस मिश्रण की कुछ बूँदें अपनी उँगलियों पर डालें।
अपनी प्रभावित नसों पर इस मिश्रण से गोलाकार मुद्रा में करीब 15 मिनट तक मालिश करें।
अब इस प्रभावित भाग को रुई से ढक लें और रातभर के लिए छोड़ दें।
जब तक आप ठीक नहीं हो जाते, तब तक इस विधि का प्रयोग रोज़ाना करें।
अपने भोजन में ताज़े लहसुन को सारे जीवन के लिए शामिल करें।
5. अजवायन :
यह उत्पाद विटामिन सी से भरपूर होता है और कोलेजन का उत्पादन भी सुनिश्चित करता है। यह कोशिकाओं की मरम्मत और उनके पुनर्विकास में भी आपकी मदद करता है। यह केपिलरीज़ को मज़बूत बनाता है औए वेरीकोज नसों के लक्षणों को दूर करता है।
मुट्ठीभर कटी अजवाइन को 1 कप पानी में उबालें।
इसे आंच पर 5 मिनट रहने दें।
अब आंच से हटाकर इसे ढक दें।
जब यह हल्का सा गर्म रह जाए तो इसे छान लें।
इसमें 1 बूँद गुलाब और गेंदे के तेल की बूँदें मिश्रित करें।
इसे फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें।
इसे निकालकर इसमें रुई का कपड़ा डुबोएं।
इसे प्रभावित भाग पर लगाएं और तब तक दोहराएं जब तक आपकी समस्या का समाधान ना हो जाए।
कच्चा अजवाइन खाने से भी आपको काफी लाभ होगा।
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शरीर और दिमाग की सुस्ती दूर करने के उपचार

                                    
थकान होना या काम में मन न लगना ये दोनों ही आजकल अधिकांश लोगों में एक आम समस्या बन गई है। ऐसे में योग ही आपको काम के तनाव से मुक्ति दिलवा सकता है। लेकिन सबके पास योग पर घंटो खर्च करने का टाइम नहीं होता है। अगर आपके साथ भी यही समस्या है ,तो आप रोज सिर्फ दस मिनट शवासन करके घंटों काम करने के लिए रिचार्ज हो सकते हैं
इस आसन से तत्काल शारीरिक और मानसिक थकान दूर होती है। जो मानसिक रूप से जल्दी थक जाते हैं और तनाव ग्रस्त रहते हैं उनके लिए यह आसन अति उत्तम है। शवासन से मानसिक बीमारियां जैसे डिप्रेशन, हिस्टीरिया, चिंता, घबराहट, अनिद्रा आदि में लाभ होता है। यह आसन रक्तचाप, हृदयरोग और मधुमेह में भी लाभदायक है।


शवासन की विधि: 
इस आसन में आपको कुछ नहीं करना है। आप एकदम सहज और शांत हो जाएं तो मन और शरीर को आराम मिलेगा। दबाव और थकान खत्म हो जाएगी। साँस और नाड़ी की गति सामान्य हो जाएगी। इसे करने के लिए पीठ के बल लेट जाइए। पैरों को ढीला छोड़कर भुजाओं को शरीर से सटाकर बगल में रख लें। शरीर को फर्श पर पूर्णतया स्थिर हो जाने दें। अब शरीर के हर एक अंग पर ध्यान केन्द्रित करते हुए उन्हें बिल्कुल शांत एवं स्वस्थ महसूस करें । ऐसी कल्पना करें कि शरीर का हर एक अंग शांत, स्वस्थ, निरोग एवं शक्तिशाली बन रहा है। शवासन में आपका मन जितना अधिक शांत एवं एकाग्र होगा उतना ही अधिक लाभ होगा।
आज आपको बताते हैं कि सुस्ती के कारण क्या हो सकते है और ये सुस्ती आपके शरीर की किन कमियों की तरफ इशारा करती है। कभी-कभी आप पर्याप्त नींद नहीं ले पाते है और कभी ज़्यादा व्यस्त रहने के कारण भी आपके शरीर और दिमाग को आराम नहीं मिल पाता है।

ऐसी स्थितियों में थकान और सुस्ती महसूस होना स्वाभाविक है। लेकिन अगर आप सामान्य दिनचर्या और अच्छी नींद लेने के बावज़ूद भी थकान और सुस्ती महसूस करते हैं तो इसे सामान्य बात न समझे।
आपने शायद सोचा न हो, लेकिन हर समय महसूस होने वाली ये सुस्ती आपके शरीर के बारे में काफी कुछ बताती है। जिसे आप आज तक अनजाने में नज़रअंदाज़ करते आये हैं।
सुस्ती के कारण
सुबह का नाश्ता नहीं करना – 
सुबह जल्दबाज़ी में ऑफिस के लिए निकलने वाले उन लोगों में से अगर आप भी एक है, जो नाश्ता किये बिना ही घर से बाहर जाते है तो आपको दिनभर रहने वाली सुस्ती का ये एक बहुत बड़ा कारण हो सकता है। दिन की शुरुआत खाली पेट होने की बजाए ऐसे नाश्ते से होनी चाहिए जो प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स से भरपूर हो। ऐसा नाश्ता ही आपको दिन भर काम करने की ऊर्जा देता है।
शरीर में पानी की कमी होना – 
आप जानते हैं कि रोज़ाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना अच्छी सेहत के लिए ज़रूरी है लेकिन अगर आप कम पानी पीते है तो ये भी आपकी सुस्ती का कारण बन सकता है।
कम पानी पीने की स्थिति में शरीर के सभी अंगों में ऑक्सीजन का प्रवाह सही तरीके से नहीं हो पाता है और भोजन से निर्मित पोषक तत्व हर अंग तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाते हैं। इस स्थिति में आपका शरीर थकान और शिथिलता महसूस करता है जो आपकी सुस्ती का कारण बनता है।
आयरन की कमी होना –
 आयरन की कमी का सम्बन्ध भी शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह से होता है और इसकी कमी होने पर एनीमिया रोग हो जाता है जिसके कारण दिन भर सुस्ती का अनुभव होता है और व्यक्ति का स्वाभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है।
ज़्यादा सोचने की आदत – 
ज्यादा सोचने की आदत भी सुस्ती का कारण बन सकती है। जब आप अनावश्यक विचारों में दिमाग को व्यस्त बनाये रखते हैं तो कुछ समय बात आपको सिर दर्द की शिकायत होने लगती है और आपका शरीर थकान और सुस्ती महसूस करने लगता है।
एक्सरसाइज से दूरी बना लेना – 
हो सकता है कि आप रोज़ाना जिम जाते हो या फिर रेगुलर एक्सरसाइज करते हों। लेकिन जिस दिन आप थोड़ा सुस्त महसूस करते हैं उस दिन जिम और एक्सरसाइज की छुट्टी कर देते हैं। ऐसा करना ही सुस्ती को बुलावा देने जैसा है क्यूँकि वर्कआउट नहीं करने की स्थिति में आप ज्यादा सुस्त महसूस करने लगते हैं और आपका पूरा दिन सुस्ती में ही गुज़रता है।
कैफीन भी है ज़िम्मेदार – 



लगातार काम करते रहने की स्थिति में दिमाग थक जाता है, ऐसे में फ्रेश फील करने के लिए आप कॉफी पीते हैं जो आपको एनर्जेटिक तो फील कराती है लेकिन ज्यादा कॉफी पीने की आदत आपको सुस्ती की तरफ ले जाती है।
कॉफी में मौजूद कैफीन की मात्रा शरीर में ज्यादा होने से भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर पूरे दिन की थकान के बाद भी रात को आप एक अच्छी नींद नहीं ले पाते हैं तो समझ जाइये कि ये आपके शरीर पर कैफीन का दुष्प्रभाव है जो अगले दिन आपको सुस्त बनाये रखेगा।
सुस्ती दूर करने के उपाय
ग्रीन टी पीना शुरू करें – 
ग्रीन टी का एक कप आपकी सुस्ती को दूर करने में काफी मदद कर सकता है, साथ ही इसके सेवन से आप अपना वज़न भी कम कर सकते है।
मालिश भी है फायदेमंद –
 थकान और सुस्ती महसूस करने पर, शरीर की खुशबूदार तेलों से मालिश की जाए तो शरीर की थकान भी दूर होगी, साथ ही ब्लड सर्कुलशन बढ़ने से आप एक्टिव महसूस करेंगे। उँगलियों के पोरो से चेहरे पर मसाज करने से भी आप अच्छा महसूस करेंगे।
दिनचर्या में सुधार लाए – 
रात की एक अच्छी नींद के बाद सुबह उठकर सैर पर जाएँ और व्यायाम करना शुरू कर दें। सुबह की ताज़ी हवा आपकी सुस्ती को दूर करने में काफी मददगार साबित होगी।
भोजन हो पौष्टिक – 
संतुलित और पौष्टिक भोजन आपके शरीर में स्फूर्ति लाता है। ऐसे भोजन में हरी सब्ज़ियाँ, दालें, दही और मौसमी फलों को शामिल करें, साथ ही भोजन में विटामिन की मात्रा बढ़ा दें।
अखरोट है काफी फायदेमंद – 
ओमेगा-3 फैटी एसिड्स अखरोट में पाए जाते है जो सुस्ती और थकान को दूर करते है और अवसाद की स्थिति से भी बचाते हैं। इसके अलावा, अगर आपको झपकियाँ आने की समस्या है तो अभी से अखरोट खाना शुरू कर दीजिये।
काम और आराम में संतुलन बनाये – 
लगातार एक जैसा काम करते रहने से आपको थकान के साथ बोरियत भी होने लगती है और उस काम के बारे में सोचकर ही आप सुस्त महसूस करने लगते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए जरुरी है कि आप कोई भी काम लगातार न करें, बल्कि उसे टुकड़ो में बाँट ले और बीच बीच में छोटे छोटे ब्रेक लेकर खुद को फ्रेश फील कराते रहें।
हल्का संगीत सुने –



 शरीर और मन की निष्क्रियता सुस्ती का रूप ले लेती है। इसे दूर करने के लिए आप म्यूजिक की मदद ले सकते हैं जो आपको पॉजिटिव ऊर्जा देगा और आपके मूड को भी बेहतर बना देगा जिससे आप कोई नया कार्य करने के लिए तैयार महसूस करेंगे और सुस्ती आप पर हावी नहीं हो सकेगी।
अनाज होगा मददगार – 
अगर आप चुस्त महसूस करना चाहते हैं तो भोजन में अनाज का सेवन शुरू कीजिये क्यूँकि अनाज में फाइबर की मात्रा ज़्यादा होती है और इसमें काम्प्लेक्स कार्बोहायड्रेट पाए जाते हैं। ये दोनों ही सुस्ती और थकान को मिटाने में मदद करते हैं।
अब आप सुस्ती के कारण जान चुके है और सुस्ती होना कोई सामान्य बात नहीं है और इसके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं ही जिम्मेदार है। ये हमारे ही हाथ में है कि हम एक चुस्त दुरुस्त दिनचर्या को चुनना चाहते है या फिर सुस्ती से भरे बोझिल दिनों को।
 अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित कर लीजिये, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना शुरू कीजिये, भोजन की पौष्टिकता पर ध्यान दीजिये और अपने आप को सकारात्मक विचारों से भरपूर रखिये ताकि आप हमेशा ऊर्जावान महसूस कर सकें।



नमक(सोडियम) के सेहत को फायदे व नुकसान




नमक का रासायनिक नाम सोडियम क्लोराइड है. Sodium chloride यानि नमक हमारे शरीर की कई गतिविधियों को सही से चलाने के लिए बहुत ज़रूरी है.
– नमक से मिलने वाला सोडियम हमारे शरीर का Fluid balance बनाने का काम करता है. आपने देखा होगा कि अगर किसी को दस्त, डायरिया हो तो उसे नमक-चीनी का घोल दिया जाता है, क्योंकि उसके शरीर में नमक की कमी हो जाती है.सोडियम मानव शरीर में पाए जाने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है सोडियम रक्त के विनियमन (regulation) के लिए सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइट्स (electrolytes) में से एक है। इस महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइट की अनुपस्थिति के कारण शारीरिक कार्यों को करने में परेशानी हो सकती है। यह शरीर के तरल पदार्थ को नियंत्रित करता है और मानव शरीर के अन्दर विद्युत आवेगों (electric impulses) को भी संचारित करता है। सोडियम नसों में पाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से सबसे आवश्यक तत्व है, जबकि यह मांसपेशियों के संकुचन की गति को नियंत्रित या संतुलित करने में भी मदद करता है।संक्षेप में कह सकते है कि सोडियम मानव आहार के रूप में, कोशिकीय सक्रियता को नियंत्रित करने और बनाये रखने के साथ-साथ तंत्रिका तंत्र को उचित कार्य करने के लिए आवश्यक तत्वों में से एक है।नमक और ‘सोडियम’ एक ही चीज नहीं हैं। क्योंकि नमक प्रकृति में प्रचुर मात्रा में पाये जाने वाला एक क्रिस्टलीय यौगिक है। जबकि सोडियम एक खनिज है। जो नमक में पाया जाने वाला एक रासायनिक तत्व है।

सोडियम क्या है
सोडियम एक धातु है जो बहुत प्रतिक्रियाशील है। सोडियम अति क्रियाशील होने के कारण प्रकृति में मुक्त अवस्था में नहीं पाया जाता है। सोडियम हमेशा लवण (salt) के रूप में पाया जाता है। सोडियम का सबसे सामान्य आहार के रूप सोडियम क्लोराइड उपस्थित है। सोडियम क्लोराइड को सामान्यतः टेबल साल्ट (table salt) नमक के रूप में जाना जाता है।
मनुष्य शरीर में सोडियम की पूर्ति के लिए सोडियम क्लोराइड का अधिकतर उपयोग करते हैं। खाद्य पदार्थों में, सोडियम क्लोराइड का उपयोग स्वाद उत्पन्न करने के लिए और भोजन को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है।


सोडियम क्यों आवश्यक है
सोडियम एक आवश्यक पोषक तत्व है। सोडियम शरीर के विभिन्न कार्यों में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह तंत्रिका (nerve) और मांसपेशी के कार्यों को नियंत्रित करने में मदद करता है तथा रक्तचाप (blood pressure) को भी नियंत्रित करने में मदद करता है। सोडियम रक्त में घुलकर, पानी को आकर्षित करता है जिससे रक्त को तरल रूप में बनाए रखने में मदद करता है। शरीर में संरक्षण और तरल पदार्थ के परासरण दाब के नियंत्रण में यह महत्वपूर्ण है।
मानव शरीर में नसों और मांसपेशियों को ठीक तरह से काम करने के लिए एक विद्युत प्रवाह की आवश्यकता होती है। तथा विद्युत् चार्ज आयनों या अणुओं जिनमें सोडियम शामिल है, के नियंत्रित प्रवाह द्वारा तंत्रिका कोशिकाएँ और मांसपेशियाँ विद्युत् चार्ज उत्पन्न करती हैं। नसों को तंत्रिका तंत्र तक सूचनाओं को प्रेषित करने के लिए विद्युत गतिविधि की आवश्यकता होती है। इस कार्य में सोडियम पंप महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अतः मानव शरीर में विभिन्न क्रियाओं के संचालन के लिए सोडियम की उचित मात्रा का होना बहुत जरूरी है। मानव शरीर में सोडियम स्तर बहुत कम या बहुत अधिक होने पर किडनी (kidneys) सोडियम की सांद्रता को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। किडनी सोडियम स्तर कम होने पर इससे स्टोर करके रखता है एवं स्तर अधिक होने पर सोडियम को मूत्र में उत्सर्जित कर देती है।
प्रतिदिन कितना सोडियम खाएं
खाद्य एवं औषधि संस्थान प्रति दिन 2300 मिलीग्राम (2.3 Grams) से कम सोडियम का सेवन करने की सिफारिश करते है। कुछ संस्थाओं द्वारा 1500 मिलीग्राम (1.5 Gram) सोडियम सेवन की अनुशंसा की जाती है।
14 वर्ष की आयु के बच्चों और वयस्कों को प्रति दिन 2300 मिलीग्राम (2.3 Grams) से कम सोडियम का उपभोग करना चाहिए। तथा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोडियम की कम मात्रा उपभोग की जानी चाहिए। 2300 मिलीग्राम (2.3 Grams) सुरक्षित ऊपरी सीमा है, इससे अधिक मात्रा नुकसान दायक हो सकती है। पसीने के माध्यम से सोडियम को कम बहार करने वाले व्यक्तियों को प्रति दिन कम से कम 1500 (1.5 Gram) मिलीग्राम की आवश्यकता होती है।


सोडियम के स्रोत
शरीर को सोडियम की पूर्ति आहार के रूप में की जाती है नमक सोडियम का सबसे अच्छा और प्राकृतिक स्रोत है।इसके अलावा फलों में सोडियम के सबसे अच्छे स्रोतों के रूप में – अंगूर (Grapes), केला, बेर, खरबूजा (melons) तथा तरबूज (watermelons) प्रमुख है।
दूध डेयरी उत्पाद जैसे – दूध , दही (curd), पनीर और मावा से भी सोडियम की कुछ मात्रा प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा चुकन्दर, गाजर, पालक, अण्डे तथा अनाजों में भी सोडियम की अल्प मात्रा में पाया जाता है।
सोडियम के फायदे
सोडियम तरल पदार्थ संरक्षण, मांसपेशी संकुचन, तंत्रिका कार्यों में समर्थन, osmoregulation और एंजाइम प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एड्रेनल (adrenal) अपर्याप्तता, सनस्ट्रोक (sunstroke), और अत्यधिक पसीने के दौरान पर्याप्त सोडियम महत्वपूर्ण है।
त्वचा के लिए सोडियम के उपयोग
बहुत सी उम्र बढ़ने वाले क्रीम (anti-aging creams) में सोडियम एक महत्वपूर्ण हाइड्रेटिंग (hydrating) उत्पाद है। यह उम्र को तेजी से बढ़ाने वाले मुक्त कणों (free radicals) से रक्षा करता है। इसके अलावा यह स्वस्थ और युवा त्वचा को पुनःस्थापित करने में मदद करता है।
सोडियम का इस्तेमाल बचाता है सनस्ट्रोक से
सनस्ट्रोक (Sunstroke) मानव शरीर में गर्मी की नियंत्रण प्रणाली में विफलता के कारण होता है। यह बहुत उच्च तापमान के लगातार संपर्क में रहने के कारण होता है। शरीर में नमक (सोडियम) और पानी की कमी के कारण यह स्थिति अधिक प्रभावित करती है। पानी के अलावा, नमक और चीनी युक्त तरल पदार्थ पीने से सनस्ट्रोक के खतरे को कम किया जा सकता है। नमक को भी अधिक राहत प्रदान करने के लिए कच्चे मैंगो के रस के साथ मिश्रित किया जा सकता है। सनस्ट्रोक (Sunstroke) के मामले में सोडियम का उचित स्तर और द्रव संतुलन बहुत महत्वपूर्ण हैं।
मस्तिष्क कार्यों में सोडियम के फायदे
मस्तिष्क, शरीर के सोडियम (sodium) स्तर में बदलाव के प्रति बहुत संवेदनशील होता है; शरीर में सोडियम की कमी अकसर भ्रम और आलस्य के रूप में प्रकट होती है। सोडियम की उचित मात्रा दिमाग को तेज रखने में सहायता करती है। यह मस्तिष्क के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व है क्योंकि यह मस्तिष्क कार्य को बेहतर बनाने के लिए काम करता है।
सोडियम के लाभ हड्डियों के लिए
सोडियम पेशाब सम्बन्धी कैल्शियम (Ca) में सुधार करता है जिससे हड्डी को कम नुकसान और उनके पुनर्निर्माण में में सहायता मिलती है।
दांतों के लिए सोडियम का उपयोग
दांत को सड़ने से बचाने और दांतों को साफ रखने तथा मुँह की गंध को दूर करने के लिए सोडियम का उपयोग किया जा सकता है। सोडियम दांत और मुंह को साफ करने के लिए एक बहुत अच्छा मध्यम है। सोडियम नमक सामग्री मुंह और दांतों की सफाई में मदद करती है। सागर नमक (Sea salt) या साधारण नमक (common salt) को दांतों की सफाई के लिए सामान्य टूथपेस्ट के रूप में उपयोग किया जा सकता है।


सोडियम से लाभ द्रव स्तर को नियंत्रित करने में
सोडियम मानव शरीर में तरल स्तर को नियंत्रित करने में मदद करने वाले सभी खनिजों में से एक महत्वपूर्ण खनिज है। सोडियम और पानी का संतुलन आपस में बहुत निकटता से संबंध रखता हैं। सोडियम पंप इस कार्य के लिए जिम्मेदार होता है। सोडियम शरीर की कोशिकाओं में तरल पदार्थ के नियंत्रण के कारण, मानव शरीर में परासरण दबाव (osmotic pressure) को संतुलित करके रखता है।
सोडियम का सेवन रक्तचाप और दिल के इलाज में
दिल के सामान्य संकुचन या दिल की सामान्य क्रिया को बनाए रखने में सोडियम मदद कर सकता है। यह मानव शरीर के रक्तचाप को भी नियंत्रित रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन आहार के रूप में अतिरिक्त सोडियम मात्रा का सेवन करने से उच्च रक्तचाप होता है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो सकती है। जो अत्यधिक दबाव दिल की विफलता या हार्ट अटैक का कारण बन सकता है।
ग्लूकोज अवशोषण में सोडियम सहायक
सोडियम, कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज का अवशोषण करने में मदद करता है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर के कोशिका झिल्ली में पोषक तत्वों का आसान परिवहन होता है।
ज्यादा नमक से नुकसान :
कई लोग ऐसे हैं जो हर चीज में नमक ज्यादा खाने के आदी हैं. उनकी ऐसी आदत पड़ जाती है कि खाते समय उनका ध्यान इस ओर जाता ही नहीं कि वे शरीर के लिए जरुरी मात्रा से अधिक नमक खाए जा रहे हैं.
इसका परिणाम नुकसानदेह हो सकता है. बाजार में मिलनेवाले बहुत से मसालों, Snacks, Butter Spread और चीज़ वगैरह में भी ज्यादा नमक मिला हुआ होता है.
खाना खाते समय ऊपर से नमक बुरकना या थाली में अलग से नमक परोसना अच्छी बात नहीं है. इसके बजाय काला नमक या सेंधा नमक का प्रयोग करना फायदेमंद है क्योंकि उसमें मैग्नीशियम के अलावा कई अच्छे मिनरल्स भी मौजूद होते हैं.
– ज्यादा नमक के उपयोग से शरीर में पानी की कमी (Dehydration) होने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि शरीर में सोडियम के लेवल को कंट्रोल करनेवाले कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नीशियम की मात्रा घट जाती है.
– ज्यादा नमक वाला भोजन लंबे समय तक लेते रहने से दिल की धड़कनें बढ़ने लगती हैं और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. इससे दिल का दौरा या पैरालीसिस भी हो सकता है.
इन बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों को डॉक्टर की देखरेख में अपनी दवाइयां समय पर लेने के साथ ही अपने खानपान में नमक की मात्रा को कम करने की हरसंभव कोशिश करना चाहिए.
– शरीर में सोडियम का लेवल बढ़ने पर यह या तो खून में बना रहता है या किडनी अपनी क्षमता से अधिक काम करके इसे शरीर से बाहर निकाल देती हैं. ये दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं.
– बहुत से लोगों को यह लगता है कि वे दुबले होने के कारण स्वस्थ हैं और उन्हें या उनकी किडनियों को कभी कोई हानि नहीं पहुंच सकती जबकि अधिक नमक का प्रयोग सबको नुकसान पहुंचाता है.
– हमारे शरीर की मांसपेशियां सोडियम के साथ ही सही मात्रा में पोटेशियम और मैग्नीशियम लेने से रिलेक्स रहती हैं, लेकिन सोडियम अधिक मात्रा में लेने पर बाकी तत्वों का Ratio बिगड़ जाता है.
इससे शरीर में कई तरह की गड़बड़ियां हो सकती हैं. सोडियम की खुराक को दूसरे तत्वों खासकर मैग्नीशियम के द्वारा बैलेंस किया जाना बहुत ज़रूरी है.
– अनिद्रा (Insomnia) या आधासीसी सिरदर्द (Migraines) का शिकार होने पर ये जांच करनी चाहिए कि भोजन में सोडियम की तुलना में पर्याप्त मात्रा में मैग्नीशियम है या नहीं. मैग्नीशियम के सप्लीमेंट्स लेने से हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों और भोजन में अधिक नमक लेनेवाले व्यक्तियों को लाभ होता है.
इंसुलिन प्रतिरोध में वृद्धि सोडियम की कमी करें
सोडियम की कम मात्रा इंसुलिन प्रतिरोध में वृद्धि के लिए सहायक होती है। इंसुलिन प्रतिरोध तब होता है जब शरीर की कोशिकाएं, हार्मोन इंसुलिन (hormone insulin) के प्रति अच्छी तरह से प्रतिक्रिया नहीं करती हैं, इससे इंसुलिन और रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है।
इंसुलिन प्रतिरोध को मधुमेह और हृदय रोग सहित कई गंभीर बीमारियों का एक प्रमुख कारण माना जाता है। कम सोडियम के आहार का सेवन लगातार 7 दिनों तक करने से इंसुलिन प्रतिरोध में वृद्धि हो जाती है।


हृदय रोग का कारण सोडियम की कमी
सोडियम की मात्रा में कमी से रक्तचाप में भी कमी हो सकता है। रक्तचाप अनेक बीमारी के जोखिमों को बढ़ा सकता है।
कई अध्ययनों से पता चला है कि सोडियम की कम मात्रा दिल के दौरे, स्ट्रोक (strokes) और मृत्यु के जोखिम का कारण बन सकती है।
इसके अतिरिक्त सोडियम की उच्च मात्रा (प्रति दिन 3,000 मिलीग्राम या 3.0 ग्राम या इससे अधिक) दिल की बीमारी से होने वाली मृत्यु का कारण बनती है, जिसमें दिल के दौरे (heart attacks) और स्ट्रोक (strokes) शामिल हैं।
सोडियम की कमी से मधुमेह रोग
मधुमेह रोग में दिल के दौरे (heart attacks) और स्ट्रोक (strokes) आने के खतरे बढ़ जाते है। इसलिए, मधुमेह के रोगियों के लिए नमक सेवन सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है।
हालांकि, कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि सोडियम का कम स्तर, मधुमेह के व्यक्तियों में मृत्यु के जोखिम बढ़ा देता है।
सोडियम की कमी से कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स में वृद्धि
अध्ययनों से ज्ञात है कि कम सोडियम आहार का सेवन,एलडीएल (Low-density lipoprotein) कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स (Triglyceride) के स्तरों में वृद्धि करने के साथ-साथ हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
सोडियम की अधिकता का पेट पर प्रभाव
एक अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं और पुरुषों दोनों में पेट कैंसर से होने वाली मौत और सोडियम की खपत में वृद्धि के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध है। सोडियम के उच्च स्तर कैंसर के खतरे को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, पेट के अल्सर भी उच्च सोडियम सेवन से सम्बंधित होते हैं।