20191219

कच्ची हल्दी के अचार के फायदे और बनाने का तरीका


रसोई की शान होने के साथ-साथ हल्दी कई चमत्कारिक औषधीय गुणों से भी भरपूर है। आयुर्वेद में तो हल्‍दी को बेहद ही महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि हल्दी गुमचोट के इलाज में तो सहायक है ही साथ ही कफ-खांसी सहित अनेक बीमारियों के इलाज़ में काम आती है। इसके अलावा हल्दी सौन्दर्यवर्धक भी मानी जाती है और प्रचीनकाल से ही इसका उपयोग रूप को निखारने के लिए किया जाता रहा है। हल्दी हमारे रोज बनने वाले खाने में इस्तेमाल होती है। लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं कि इसका अचार भी डाला जाता है। यह अचार खाने के स्वाद को बढ़ा देता है।
हल्‍दी में ऐसे औषधीय गुण होते हैं, जो आपके समग्र स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर बनाए रखने में मददगार होते हैं। अंदरूनी चोट से लेकर कफ-खांसी और त्‍वचा की समस्‍याओं के इलाज के लिए गुणकार हल्‍दी का इस्‍तेमाल किया जाता है। हल्‍दी आपका रूप निखारने से लेकर कई बीमारियों के इलाज में मदद करती है। हल्‍दी एंटी बैक्‍टीरियल और एंटी इंफ्लामेटरी गुणों से भरपूर होने की वजह से आपके पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में भी मदद करती है।


कच्ची हल्दी के अचार के फायदे

आमतौर पर लोग हल्‍दी का खाने, दूध और पानी में मिलाकर सेवन करते हैं, लेकिन हल्‍दी की चटनी और अचार के रूप में भी इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
हल्‍दी का अचार ऐसे अनोखें गुणों से भरपूर है कि यह पुरूषों में प्रोस्‍टेट कैंसर के खतरे को कम कर सकती है। क्‍योंकि इसमें कैंसर विरोधी गुण होते हैं। इसमें ऐसे शक्तिशाली एंटीऑक्‍सीडेंट होते हैं, जो कैंसर बनाने वाली सेल्‍स से लड़ने में मदद करते हैं।
हल्‍दी का अचार इसलिए भी ज्‍यादा फायदेमंद माना जाता है, क्‍योंकि इसमें कच्‍ची हल्‍दी का इस्‍तेमाल होता है, जो कि हल्‍दी पाउडर के बजाय ज्‍यादा फायदेमंद है। यह आपके जोड़ों के दर्द को कम करने और पाचन को बढ़ावा देने में मददगार है।
हल्दी के अचार में लिपोपॉलीसेच्चाराइड की मौजूदगी होती है, जो कि आपके इम्‍युन सिस्‍टम को मजबूत बनाने में मदद करता है।
इतना ही नहीं, हल्‍दी का अचार आपके ब्‍लड शुगर को कंट्रोल रखने और डायबिटीज में भी फायदेमंद है। क्‍योंकि यह आपके इंसुलिन और ग्‍लूकोज लेवल को निंयत्रित करने में सहायक है।
इसमें मौजूद एंटी सेप्टिक और एंटी बैक्‍टीरियल गुणों की वजह से इंफेक्‍शन और त्‍वचा संबंधी समस्‍याओं को दूर करने में मददगार है।
कच्ची हल्दी का अचार खाने में तो स्वादिष्ट होता ही है इसमें अनेकों औषधीय गुण भी हैं. स्वाद में एकदम तीखा हल्दी का अचार की बस एक चौथाई चम्मच आपके खाने को एक नया स्वाद देगी.


कच्ची हल्दी का अचार बनाने का तरीका 
सामग्री -
कच्ची हल्दी - 250 ग्राम (कद्दूकस की हुई एक कप)
सरसों का तेल - 100 ग्राम (आधा कप)
नमक - 2 1/2 छोटी चम्मच
लाल मिर्च - आधा छोटी चम्मच
दाना मैथी - 2 1/2छोटी चम्मच दरदरी पिसी
सरसों पाउडर - 2 1/2 छोटी चम्मच
अदरक पाउडर - 1 छोटी चम्मच
हींग - 2-3 पिंच
नीबू - 250 ग्राम ( 1/2 कप का रस)


विधि -

हल्दी को छीलिये और धोकर पानी सुखाने के लिये थोड़ी देर के लिये धूप में रख दीजिये या सूती कपड़े से पोंछ कर पानी हटा दीजिये.
अब इस छिली हल्दी को कद्दूकस कर लीजिये या बारीक काट लीजिये. चूंकि हल्दी का अचार एकदम कम मात्रा में खाया जाता है इसलिये छोटे टुकडों के अचार के बजाय कद्दूकस की गई हल्दी का अचार अधिक सुविधाजनक होता है.
सरसों का तेल कढ़ाई में डाल कर अच्छी तरह गरम करके, थोड़ा सा ठंडा कर लीजिये, तेल में हींग, मैथी और सारे मसाले और कद्दूकस की गई हल्दी डाल कर अच्छी तरह मिलाइये.
हल्दी के अचार को प्याले में निकालिये और अचार में नीबू का रस डालकर अच्छी तरह मिलाकर हल्दी के अचार को ढककर रख दीजिये. 4-5 घंटे बाद अचार चमचे से फिर से ऊपर नीचे करके मिला दीजिये.
हल्दी का अचार बन चुका है, हल्दी के अचार को एकदम सूखे कांच या चीनी मिट्टी के कन्टेनर में भर कर रख लीजिये, सम्भव हो तो अचार के कन्टेनर को 2 दिन धूप में रख दें, धूप में रखने से अचार की सैल्फ लाइफ बढ़ जाती है और अचार स्वादिष्ट भी हो जाते हैं.
हल्दी का अचार यदि तेल में डुबा हुआ रखा हो तब यह अचार 6 महिने से भी ज्यादा अच्छा रहेगा.
सावधानी :-
अचार को निकालते समय हमेशा साफ और सूखी चम्मच प्रयोग में लाइये.





जोड़ों की कमजोर हड्डियाँ मजबूत बनाने के उपचार


हमारे शरीर को स्वस्थ और मजबूत हड्डियों के लिए कैल्शियम की जरूरत होती है. केवल यही नहीं बल्कि हमारी मांसपेशियों और नर्व सिस्टम के सुचारू तरीके से काम करने के लिए भी कैल्शियम जरूरी होता है. आइए जानते हैं कैल्शियम से भरपूर वे चीजें जिन्हें खाने से आपके शरीर की हड्डियां रहेंगी मजबूत और शरीर रहेगा स्वस्थ-

समय के साथ हमारे शरीर के अंग और हड्डियां कमजोर होते जाते हैं। मगर आजकल का खानपान और लाइफस्टाइल कई बार उम्र से पहले ही हड्डियों की कमजोरी का कारण बन रहा है। कमजोर हड्डियों की समस्या को ऑस्टियोपोरोसिस कहते हैं। इसके कारण होने वाले अर्थराइटिस को ऑस्टियोअर्थराइटिस कहते हैं। शोध बताते हैं कि साल 2030 तक लगभग 7 करोड़ लोग ऑस्टियोअर्थराइटिस का शिकार हो जाएंगे। कमजोर हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए लोग अक्सर कैल्शियम की गोलियां लेनी शुरू कर देते हैं, जो कई बार अन्य परेशानियों का कारण बनता है। जबकि ऐसे कई प्राकृतिक उपाय भी हैं, जिनसे आप अपनी हड्डियों को मजबूत बना सकते हैं।
कैल्शियम वाले आहार खाएं
ये बात सच है कि कैल्शियम आपकी हड्डियों के लिए फायदेमंद होता है। मगर इसके लिए बिना डॉक्टर की सलाह के कैल्शियम की गोलियां खाना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि कैल्शियम की अधिकता पथरी का कारण बनती है। मगर आप कैल्शियम से भरपूर आहार खा सकते हैं, जो प्राकृतिक होते हैं और इनसे आपको ढेर सारे दूसरे पौष्टिक तत्व भी मिल जाते हैं। कैल्शियम की कमी पूरी करने के लिए आप अपनी डाइट में दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स जैसे- दही, पनीर, योगर्ट, घी, मलाई, चीज़, मक्खन आदि का सेवन करें। इसके अलावा मछलियां, दालें और लेन्टिल्स, बादाम, हरी पत्तेदार सब्जियां, ओट्स संतरा आदि खाएं।
हड्डियां शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मजबूत हड्डियां मजबूत शरीर की निशानी हैं। कमजोर हड्डियां बुढ़ापे, बीमारी और अपंगता का प्रतीक हैं। हड्डियां शरीर में दूसरे अंगों को सहारा देती हैं और रेड एंड वाइट सेल्स बनाती हैं। हड्डियां मजबूत हों तो आपके गिरने या टकराने पर आसानी से टूटती नहीं हैं। हड्डियों को मजबूत बनाये रखने के लिए कैल्शियम बहुत जरूरी होता है।
आजकल सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे और युवा भी हड्डियों से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। हड्डियों के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण खराब डाइट है। खाने की कुछ चीजों के नियमित और अधिक सेवन से हड्डियों का कैल्शियम खत्म होने लगता है। भारत के 70 से 90 फीसदी लोग विटामिन डी की कमी का शिकार हैं, जो कमजोर हड्डियों का सबसे बड़ा कारण है।



फिश ऑयल सप्लीमेंट्स लें

कैल्शियम की कमी पूरी करने के लिए, हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए और जोड़ों के नैचुरल ऑयल को बढ़ाने के लिए आप फिश ऑयल सप्लीमेंट्स का प्रयोग कर सकते हैं। दरअसल ऑस्टियोअर्थराइटिस का कारण हड्डियों की कमजोरी के साथ-साथ जोड़ों में जमा यूरिक एसिड भी होता है। इस यूरिक एसिड को कम करने के लिए आपको मछलियों का सेवन करना चाहिए और इसके सप्लीमेंट्स का सेवन करना चाहिए।
वजन घटाएं
अक्सर हड्डियों की कमजोरी और जोड़ों की समस्याएं उन लोगों में देखने को मिलती हैं, जिनका वजन ज्यादा होता है। मोटापे के कारण आपके जोड़ों पर अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे हड्डियां जल्दी कमजोर हो जाती हैं। अगर आप लंबे समय तक अपने हाथों-पैरों को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो आपको अपना वजन कम रखना चाहिए। अगर आप पहले से जोड़ों की समस्या के शिकार हैं, तो आपको अपना वजन घटाना शुरू कर देना चाहिए, वर्ना बाद में परेशानियां और ज्यादा बढ़ सकती हैं।
धूप सेकें
शरीर के लिए आपके भोजन में मौजूद कैल्शियम तब तक उपयोगी नहीं है, जब तक आपके शरीर में विटामिन डी की कमी है। विटामिन डी की कमी को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि आप धूप सेकें। इसके लिए सुबह उठने के बाद 30 मिनट गुनगुनी धूप में गुजारें या खुले मैदान में खेलें। कमजोर हड्डियों के कारण आपको ऐसे खेल नहीं खेलने चाहिए जिनमें बहुत ज्यादा उछल-कूद करनी पड़ती है, बल्कि ऐसे खेल चुनें, जिनमें बिना हड्डियों पर दबाव डाले और कैलोरीज बर्न कर सकें। जैसे- बैडमिंटन, खोखो आदि। इसके अलावा आप पैदल चल सकते हैं, दौड़ सकते हैं और योगासन या एक्सरसाइज कर सकते हैं।
कैल्शियम की कमी दूर करने के उपाय
रागी
रागी एक प्रकार का अनाज होता है, जो कैल्शियम से भरपूर होता है, रागी के आटे से बनी रोटियां या परांठे का सेवन करने से कैल्शियम की कमी दूर होती है और हड्डियां मजबूत बनती हैं।
 सहजन
कैल्शियम की कमी दूर करने में सहजन भी बहुत कारगर होता है, ऐसा माना जाता है की 100 ग्राम सहजन में 5 गिलास दूध के बराबर कैल्शियम होता है, कैल्शियम की कमी दूर करने के लिए आप सहजन की पत्ती और इसके फल का सेवन कर सकते हैं।
अंडे
अगर कोई व्यक्ति मांसाहारी है, तो वह व्यक्ति अंडे का अंदर का पीला भाग खा सकता है। अंडे के पीले भाग के अंदर काफी मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हड्डियों को मजबूती प्रदान करते हैं।


संतरे का रस

सुबह के समय ऑरेंज जूस पीना शरीर के लिए सबसे ज्यादा अच्छा माना जाता है। यह शरीर में सभी कमी को पूरी करता है तथा शरीर को हमेशा फिट रखता है।
हरी बीन्स
अन्य सब्जियों की तरह, हरी बीन्स विटामिन ए, सी, और के, और फोलिक एसिड, फाइबर, पोटेशियम और फोलेट का एक बेहतर स्रोत है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इस हरी सब्जी में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जिन्हें कैटेचिन के रूप में भी जाना जाता है। इससे आपको हार्ट डिजीज, कैंसर और डायबिटीज को रोकने में मदद मिलती है।
हड्डियों को कमजोर बना सकती हैं ये चीजें-
पालक
बेशक हरे पत्तेदार सब्जियों में कैल्शियम का मात्रा अधिक होती है लेकिन पालक, चुकंदर के साग और कुछ फलियों में ऑक्सालेट्स की मात्रा अधिक होती है, जो कैल्शियम के अवशोषण को प्रभावित करती हैं। यही वजह है कि आपको पालक जैसी सब्जियों का बहुत ज्यादा सेवन नहीं करना चाहिए|
चाय और कॉफी
चाय और कॉफी का ज्यादा सेवन करने से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। इसमें मौजूद कैफीन हड्डियों की सेहत के लिए बहुत हानिकारक होता है|
नमक और शराब
शराब पीने से शरीर में कैल्शियम की मात्रा कम होने लगती है जो हड्डियों की कमजोरी का कारण बनती है। ज्यादा मात्रा में नमक का इस्तेमाल करने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। दरअसल नमक में सोडियम होता है जो शरीर में जाने के बाद कैल्शियम को यूरीन के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल देता है।





20191216

सरसों के बीज के स्वास्थ्य लाभ


सरसों का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है। सरसों के तेल को भोजन पकाने के काम में लाया जाता है। सरसों सेहत की दृष्टि से बहुत फायदेमंद होती है। इसमें पोषक तत्व बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। खाना बनाने में ज्यादातर लोग सरसों के तेल का इस्तेमाल करते हैं। सरसों के बीज अचार बनाने में उपयोग में लाए जाते हैं। आज हम आपको सरसों के सेवन से होने वाले फायदे बताएंगे।
सरसों के बीजों में एंटी बैक्टीरियल और एंटीसेप्टिक गुण पाए जाते हैं। इसमें मैग्निशियम, कैल्शियम, फास्फोरस और सेलेनियम जैसे तत्व भी होते हैं, जो सेहत के लिए काफी लाभदायक हैं। आइए जानते हैं सरसों के बीच चबाने के फायदे।अगर आप सरसों के बीज चबा-चबाकर खाते हैं तो इससे आपका हृदय स्वस्थ होता है। सरसों के बीज खाने से हमारी धमनियां पूरी तरह से खुल जाती हैं, जिससे रक्त संचार सुचारू रूप से होने लगता है और हार्ट अटैक पड़ने की संभावना भी बहुत कम हो जाती है।
सर्दियों में वजन घटाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इसका कारण यह है कि सर्दियों में आपको भूख ज्यादा लगती है और ठंडे मौसम में आलस के कारण एक्सरसाइज करना भी मुश्किल होता है। ऐसे में आप अपने वजन को लगातार बढ़ने नहीं दे सकते हैं क्योंकि मोटापा कई तरह की जानलेवा बीमारियों का कारण बनता है। मगर यह भी सही नहीं है कि मोटापे के डर से आप अपनी लपलपाती जीभ को जबरदस्ती रोकें और बोरिंग चीजें खाएं। आपकी इस समस्या का निवारण हैं 'सरसों के बीच' (Mustard Seeds)। जी हां, ऐसे कई भारतीय मसाले हैं, जिनके सेवन से आपका मेटाबॉलिज्म तेज होता है और आपका वजन घटने लगता है। ऐसा ही कमाल का इंग्रीडिएंट है 'सरसों का बीज'। अपने रोज के खाने में अगर आप आधा चम्मच सरसों के बीज डालते हैं, तो आपको निम्न फायदे मिलते हैं।
वजन घटाने में क्यों है फायदेमंद?



सरसों के बीजों में कैलोरीज बहुत कम होती हैं, मगर इनमें फाइबर की मात्रा अच्छी होती है। इंग्लैंड की Oxford Polytechnic Institute द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक 1 चम्मच सरसों के बीज आपके मेटाबॉलिज्म को 25% तक बढ़ा देते हैं। इससे आप हर घंटे कम से कम सामान्य से 45 कैलोरीज ज्यादा बर्न करते हैं। इसके अलावा सरसों के बीजों के कॉम्प्लेक्स फाइबर को पचाने के लिए पेट को एक्सट्रा मेहनत करनी पड़ती है, जिसके कारण आप कुछ एक्सट्रा एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं।
कैंसर अल्जाइमर जैसे रोगों से बचाते हैं सरसों के बीज
सरसों के बीजों के इस्तेमाल से आपका दिल और दिमाग दोनों स्वस्थ रहते हैं। सरसों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स आपको कैंसर और अल्जाइमर जैसी कई बीमारियों से बचाते हैं। इन बीजों की खास बात ये है कि इसमें शुगर नहीं होता है, इसलिए ये आपके दिल के लिए भी सेहतमंद हैं। सरसों के रोजाना सेवन से धमनी रोगों (कार्डियोवस्कुलर डिजीज) से भी छुटकारा मिलता है।
खाने का स्वाद बढ़ाते हैं सरसों के बीज



सरसों के बीजों का इस्तेमाल खाने में तड़का लगाने के लिए किया जा सकता है। साउथ इंडियन फूड्स में इन बीजों का इस्तेमाल विशेषकर किया जाता है, क्योंकि ये खाने का स्वाद बढ़ाते हैं। आप भी अपने रोजाना के खाने में आधा-एक चम्मच सरसों के दानों का इस्तेमाल करें। इससे आपको स्वाद भी मिलेगा और सेहत भी। इनके स्वाद के कारण ही बहुत सारे प्रॉसेस्ड फूड्स में भी मस्टर्ड सीड्स से बने सॉस और स्प्रेड का इस्तेमाल किया जाता है।
पेट और पाचन के लिए हैं फायदेमंद
सरसों के बीजों के इस्तेमाल से आपका पाचन बेहतर रहता है और कब्ज, गैस जैसी समस्याओं से भी राहत मिलती है। रोजाना इस्तेमाल से आपके पेट से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं। आप चाहें तो सरसों के बीजों को क्रश करके डिश और सलाद के ऊपर छिड़क कर भी इन्हें खा सकते हैं।




20191215

विटामिन बी12 की कमी के कारण लक्षण और जरूरी भोजन




इन दिनों काफी लोग विटामिन B12 की कमी से पीडित हो रहे हैं। नियमित विटामिन B12 को अपनी डाइट में शामिल करने से हृदय स्‍वस्‍थ रहता है, त्‍वचा फ्रेश दिखती है, शरीर में खून की कमी नहीं हो पाती और बाल मजबूत बनते हैं।
Vitamin B12 Benefits: सेहतमंद रहने के लिए विटामिन बी 12 भी बेहद जरूरी होता है। यह आपके हृदय को स्‍वस्‍थ रखने के साथ आपकी त्‍वचा व बालों के लिए भी फायदेमंद होता है। शरीर को स्‍वस्‍थ रखने के लिए संतुलित आहार व सभी जरूरी पोषक तत्‍वों का होना जरूरी है। विटामिन बी 12 कैंसर जैसी घातक बीमारियों के खतरे को कम करने में भी मददगार है। कई लोग शरीर में विटामिन बी 12 की पूर्ति के लिए कई सप्‍लीमेंट्स भी लेते हैं। आइए आज हम आपको बताते हैं कि आप किन-किन खाद्य पदार्थों के सेवन शरीर में विटामिन बी 12 की कमी को पूरा किया जा सकता है। कई शाकाहारी व मांसाहारी खाद्य पदार्थ हैं जिनमें विटामिन बी 12 भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
विटामिन बी12 शरीर की सभी कोशिकाओं की सक्रियता में बेहद अहम भूमिका निभाता है और शाकाहारियों में इसके कम होने की ज्यादा आशंका होती है
इस कॉलम के तहत पिछले आलेख में हमने विटामिनों पर बात करते समय विटामिन बी12 के बारे में बस थोड़ी सी ही चर्चा की थी. अब उसी महत्वपूर्ण चर्चा को हम यहां आगे बढ़ाते हैं.


इन विटामिनों की कमी कैसे पहचानें?
कई ऐसी स्थितियां हैं जिनमें हमें इन विटामिनों की कमी का संदेह होना चाहिए. जैसे –
1. अगर हमें खून की ऐसी कमी (एनीमिया) हो जाए जो सामान्य तौर पर दिए जाने वाले आयरन कैप्सूल लेने से ठीक न हो पा रही हो
2. यदि हमें बहुत थकान लगती हो लेकिन आम जांचों द्वारा भी जिसका कोई कारण साफ न हो पा रहा हो
3. यदि हाथ-पांव में अकारण झुनझुनी होती हो
4. यदि मुंह में बार-बार छाले आ जाते हों
5. यदि हमारी जीभ के दाने सपाट होकर वह सपाट जैसी हो गई हो
6. यदि हमारे होंठ किनारे से कट-पिट जाते हों
7. यदि हमारी भूख खत्म हो रही हो और इसका कोई साफ कारण न मिल रहा हो
8. यदि स्मरण शक्ति कम हो रही हो और लगभग डिमेंशिया जैसी स्थिति पैदा हो रही हो
9. यदि किसी को ऐसा एनीमिया हो जिसके साथ हल्का पीलिया भी रहता हो.
10. यदि चमड़ी का रंग पीला सा होता जा रहा हो
11. यदि चलने में लड़खड़ाहट होती हो, गिरने का डर लगता हो
12. यदि बार-बार दस्त लगते हों और वे ठीक न हो रहे हों.



विटामिन बी12 हमारे शरीर की तमाम सेल्स, चाहे वे हमारी चमड़ी में हों, आंत में या मुंह में, की कार्यप्रणाली के लिए यह जरूरी विटामिन है. इन सभी सेल्स का नियंत्रण इनमें स्थित न्यूक्लियस के डीएनए और आरएनए द्वारा होता है. और इनके लिए यह एक अनिवार्य विटामिन है. बी12 न मिले तो यह न्यूक्लियस काम ही नहीं करेगा, इसीलिए इसकी कमी हो तो हर सेल ठीक से काम करना बंद कर देगी.मांसाहारियों के लिये विटामिन बी12 के बेहतरीन श्रोत
शैलफिश (Shellfish) के 100 ग्राम में विटामिन B12 की 98.9μg (1648% DV) मात्रा होती है। 100 ग्राम लीवर (बीफ) में 83.1μg (1386% DV) विटामिन B12 होता है। वहीं टोफू मछली (Silken Tofu) के 100 ग्राम में 2.4μg (40% DV)। रेड मीट (बीफ) के 100 ग्राम में 6.0μg (100% DV) होता है। अंडे या चिकन के 100 ग्राम में 2.0μg (33% DV) होता है।
शाकाहारियों के लिये दूध और दही
100 ग्राम फैट रहित दही में (10% DV) विटामिन B12 व 15 प्रतिशत डेली वैल्यू (DV, रोजाना आवश्यक मात्रा) प्रति कप होता है। है। दही में बी-कॉम्‍पलेक्‍स विटामिन्‍स जैसे विटामिन बी2 और बी1 तथा बी12 भी होते हैं। वहीं 100 ग्राम कम वसा वाले दूध में 0.46μg (8% DV) तथा 19 प्रतिशत डेली वैल्यू (DV, रोजाना आवश्यक मात्रा) प्रति कप होता शाकाहारी लोगों के लिये आपके लिये दूध एक अच्‍छा विकल्प है। इसके अलावा सोया प्रोडक्‍ट सोया बीन, सोया दूध आदि में भी विटामिन B12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
चीज़ भी है एक अच्छा विकल्प (CHEESE)
पनीर में विटामिन बी 12 की मात्रा इसके प्रकार और किस्म पर निर्भर करती है। स्विस पनीर सबसे ज्यादा विटामिन B12 प्रदान करता है। 100 ग्राम (56% DV) स्विस चीज़ में 3.34μg होता है। कॉटेज चीज़ में भी विटामिन बी12 की मात्रा काफी अधिक होती है।
खमीर (YEAST EXTRACT SPREADS) में विटामिन बी12
ब्रिटेन और यूरोप में खमीर के सेवन का काफी प्रचलन है, और इसे अब अमेरिका में भी पसंद किया जाने लगा है। खमीर शाकाहारियों के लिये विटामिन बी12 का एक बेहतरीन श्रोत है। इस के 100 ग्राम में 0.5μg (8% DV) विटामिन बी12 होता है।


यही विटामिन बी12 हमारे नर्वस सिस्टम की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखने का काम भी करता है. यानी यह मस्तिष्क और शरीर की सारी तंत्रिकाओं में करंट के बहने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. तभी अगर इस विटामिन की कमी हो जाए तो हमें कई न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम पैदा हो सकती हैं. फिर विटामिन बी12 उन सेल्स के मैच्योर होने में भी बहुत जरूरी कारक है जो हमारी हड्डियों में रहकर रक्त बनाते हैं. इसीलिए शरीर में बी12 न हो तो हमें एक अलग ही किस्म का एनीमिया हो सकता है जिसे मेगालोब्लास्टिक एनीमिया कहते हैं.
इस विटामिन का बेहद जरूरी संगी-साथी फॉलिक एसिड होता है. यह भी इन सारे कामों में बराबर का रोल अदा करता है. इसीलिए कई बार तो शरीर में बी12 की मात्रा ठीक-ठाक भी रही हो लेकिन यदि फॉलिक एसिड की कमी हो जाए तब भी वे बीमारियां आ सकती हैं जो आमतौर पर बी12 की कमी से हुई मानी जाती हैं.
दरअसल ये दोनों विटामिन एक संगत में काम करते हैं. इसीलिए डॉक्टर भी विटामिन बी12 की कमी वाले मरीज को अकेला बी12 न देकर हमेशा इसे फॉलिक एसिड के साथ ही देते हैं.
विटामिन बी12 केवल मांस, मछली, दूध और पनीर से ही प्राप्त होता है. यह न तो हरी सब्जियों में होता है, न फलों में, जैसा कि हमें प्राय: गलतफहमी रहती है. हां फॉलिक एसिड लगभग हर भोज्य पदार्थ में मौजूद होता है – सारी सब्जियों में और फलों में. मीट-मछली में भी यह पाया जाता है. परंतु इनकी दिक्कत यह है कि इन्हें देर तक गर्म करने पर इनका फॉलिक एसिड नष्ट हो जाता है.
तो वे शाकाहारी लोग जो दूध, दही या पनीर भी नहीं लेते या नहीं ले पाते या बस कभी-कभी ही लेते हैं, उनमें विटामिन बी12 की कमी पैदा हो जाना एक आम स्वास्थ्य समस्या है. हमारे देश में एक बड़ी आबादी शाकाहारी है और अगर वह दूध-दही या पनीर भी नहीं लेती तो उसके लिए विटामिन बी12 की कमी का खतरा हमेशा रहता है. इसकी कमी के लक्षण अचानक सामने नहीं आते. बल्कि इसका तो अक्सर पता ही नहीं चल पाता क्योंकि डॉक्टर तक इस बारे में उस तरह से नहीं जानते या सोच पाते. इसी चक्कर में न जाने कितने विटामिन बी12 की कमी वाले लोगों का हमारे यहां डायग्नोसिस नहीं हो पाता|
क्या सिर्फ जरूरी भोजन की कमी से ही विटामिन बी12 की कमी हो सकती है?ऐसा नहीं है. कई बार विटामिन बी12 और फॉलिक एसिड युक्त भोजन लेने के बाद भी शरीर में इनकी कमी हो सकती है. क्योंकि हो सकता है यह सब आपके शरीर में तो जा रहा हो लेकिन आपकी आंतों में न के बराबर पच पाता हो. एट्राफिक गैस्ट्राइटिस और परनीसियस एनीमिया जैसी जटिल बीमारियों में यह हो सकता है. ऐसे में बी12 की कमी हो सकती है. यही स्थिति पेट के ऑपरेशन में आंत का कुछ हिस्सा निकाल देने के बाद भी हो सकती है और आंतों में सूजन की बीमारी (इनफ्लेमटरी वाली बीमारियां) में भी.
शरीर में कभी-कभी फॉलिक एसिड की मांग जरूरत से बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसा अमूमन गर्भवती स्त्रियों और नियमित डायलिसिस वाले मरीजों के साथ होता है. साथ ही गठिया आदि बीमारियों के लिए कुछ विशेष दवाइयां देने पर भी शरीर में फॉलिक एसिड की गंभीर कमी हो जाती है. इसलिए इन सारी स्थितियों में डॉक्टर पहले फॉलिक एसिड की गोलियां भी दे देता है.




20191202

सोरायसिस(छालरोग) के कारण लक्षण व उपचार



   

   कई ऐसे त्वचा रोग हैं, जो लंबे समय तक रोगी को परेशान करते हैं. कई बार लंबे समय तक इलाज के बावजूद ये ठीक नहीं होते हैं. ऐसे में रोगी निराश भी हो जाते हैं. सोरायसिस एक ऐसा ही रोग है, जो आॅटो इम्यून डिसआॅर्डर है. अगर सही तरीके से धैर्य रख कर इलाज कराया जाये, तो इस रोग से भी छुटकारा पाया जा सकता है.|
    सोरायसिस क्रॉनिक यानी बार बार होनेवाला ओटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर के अनेक अंगो को प्रभावित करता है. यह मुख्य रूप से त्वचा पर दिखाई देता है, इसलिए इसे चर्म रोग ही समझा जाता है. यह किसी भी उम्र में हो सकता है. एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में लगभग एक प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित हैं. यह रोग किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है पर अकसर 20-30 वर्ष की आयु में अधिक आरंभ होता है. 60 वर्ष की आयु के बाद इसके होने की आशंका अत्यंत कम होती है. 5-10 प्रतिशत रोगियों में माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य को भी इस रोग से पीड़ित देखा गया है. आयुर्वेद में सोरायसिस को एक कुष्ठ, मंडल कुष्ठ या किटिभ कुष्ठ जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. बोलचाल की भाषा में कुछ लोग इसे छाल रोग भी कहते हैं.


सोरायसिस के क्या हैं कारण

शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक प्रणाली की गड़बड़ी को इसका कारण माना जाता है. आयुर्वेद में विरुद्ध आहार या असंतुलित खान-पान के कारण पित्त और कफ दोषों में होनेवाली विकृति को इसका कारण बताया गया है. त्वचा की सबसे बाहरी परत (एपिडर्मिस) की अरबों कोशिकाएं प्रतिदिन झड़ कर नयी कोशिकाएं बनती हैं और एक महीने में पूरी नयी त्वचा का निर्माण हो जाता है. सोरायसिस में कोशिकाओं का निर्माण असामान्य रूप से तेज हो जाता है और नयी कोशिकाएं एक माह की जगह चार-पांच दिनों में बन कर मोटी चमकीली परत के रूप में दिखाई पड़ती हैं और आसानी से झड़ने लगती है. चोट लगने, संक्रामक रोग के बाद या अन्य दवाओं के कुप्रभाव के कारण भी सोरायसिस की शुरुआत होती है.

सोरायसिस रोग के लक्षण-

सोरायसिस कोहनी, घुटनों, खोपड़ी, पीठ, पेट, हाथ, पांव की त्वचा पर अधिक होता है. शुरुआत में त्वचा पर रूखापन आ जाता है, लालिमा लिये छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. ये दाने मिल कर छोटे या फिर काफी बड़े चकत्तों का रूप ले लेते है. चकत्तों की त्वचा मोटी हो जाती है.
हल्की या तेज खुजली होती है. खुजलाने से त्वचा से चमकीली पतली परत निकलती है. परत निकलने के बाद नीचे की त्वचा लाल दिखाई पड़ती है और खून की छोटी बूंदे दिखाई पड़ सकती हैं. खोपड़ी की त्वचा प्रभावित होने पर यह कभी रूसी की तरह या अत्यधिक मोटी परत के रूप में दिखाई पड़ती है. नाखूनों के प्रभावित होने पर उनमें छोटे-छोटे गड्ढे हो सकते हैं. विकृत हो कर मोटे या टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं. नाखून पूरी तरह नष्ट भी हो सकते हैं.
लगभग 20% सोरायसिस के पुराने रोगियों के जोड़ों में दर्द और सूजन भी हो जाती है, जिसे सोरायटिक आर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है. अधिकांश रोगियों में रोग के लक्षण ठंड के समय में बढ़ जाते हैं. पर कुछ रोगियों को गरमी के महीने में अधिक परेशानी होती है. तनाव, शराब के सेवन या धूम्रपान से भी लक्षण बढ़ जाते हैं. अधिक प्रोटीन युक्त भोजन जैसे-मांस, सोयाबीन, दालों के सेवन से भी रोग के लक्षणों में वृद्धि हो सकती है. यह छूत की बीमारी नहीं है.

जिद्दी त्वचा रोग है सोरायसिस-

सोरायसिस एक आटो इम्यून डिजीज है, जिसमें त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं और उनमें खुजली होती है. यह रोग काफी जिद्दी है और लंबे समय तक परेशान करता है. अगर धैर्य रख कर इसका उपचार सही तरीके से कराया जाये, तो इससे छुटकारा मिल सकता है. आयुर्वेद से इसके ठीक होने की संभावना अधिक होती है.

सोरायसिस रोग के अनेक प्रकार

प्लाक सोरायसिस :

लगभग 70-80 % रोगी प्लाक सोरायसिस से ही ग्रस्त होते हैं. इसमें कोहनियों, घुटनों, पीठ, कमर, पेट और खोपड़ी की त्वचा पर रक्तिम, छिलकेदार मोटे धब्बे या चकत्ते निकल आते हैं. इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है.

गट्टेट सोरायसिस :

यह अकसर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर छोटे -छोटे लाल दानों के रूप में दिखाई पड़ता है. प्रभावित त्वचा प्लाक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है. अनेक रोगी स्वत: या इलाज से चार-छह हफ्तों में ठीक हो जाते हैं. पर कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में परिवर्तित हो सकते हैं

सोरायसिस :
 

यह मुख्य रूप से हथेलियों और तलवों को प्रभावित करता है.
पुस्चुलर सोरायसिस: इस प्रकार में अकसर हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लालिमा से घिरे दानों में मवाद हो जाता है.

एरिथ्रोडार्मिक सोरायसिस :

इस प्रकार के सोरायसिस में चेहरे समेत शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लालिमा लिये चकत्ते हो जाते हैं. शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है, हृदय गति बढ़ जाती है और समय पर उचित चिकित्सा नहीं होने पर रोगी के प्राण जा सकते हैं.
इन्वर्स सोरायसिस : इसमे स्तनों के नीचे, बगल, कांख या जांघों के उपरी हिस्से में लाल बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं.

एलोपैथ चिकित्सा 

साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैं. 

पुवा (पीयूवीए) थेरेपी : 

अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों के साथ सोरलेन के प्रयोग से भी आंशिक रूप से लाभ मिलता है पर रोग ठीक नहीं होता.
बीमारी ज्यादा गंभीर हो, तब मीथोट्रीक्सेट और साइक्लोस्पोरिन नामक दवाओं से सामयिक और आंशिक लाभ होता है, पर हानिकारक प्रभावों के कारण लंबे समय तक इनके प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है.
इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं. 
सेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में ही लेनी चाहिए. रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है. 

होमियोपैथी में उपचार-

सोरायसिस इम्युनिटी में गड़बड़ी के कारण होता है, इसलिए इसका उपचार करने का सबसे अच्छा तरीका इम्युनिटी में सुधार करना ही है. अत: इम्युनिटी को सुधारने के लिए सोरिनम सीएम शक्ति की दवा चार बूंद महीने में एक बार लें.



काली आर्च : अगर त्वचा से रूसी निकले, नोचने पर और अधिक निकले, रोग जोड़ों पर अधिक हो, तो काली आर्च 200 शक्ति की दवा चार बूंद रोज सुबह में दें.

पामर या प्लांटर सोरायसिस : 

अगर सोरायसिस हथेली या तलवों तक ही सीमित हो, तो इसके लिए सबसे अच्छी दवा फॉस्फोरस है. इसकी 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.

काली सल्फ : 

सोरायसिस सिर में भी होता है. सिर की त्वचा से सफेद रंग की रूसी निकले और गोल-गोल चकत्ते जैसे हों, तो काली सल्फ 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
रोग को ठीक होने में लंबा समय लग सकता है. अत: धैर्य रख कर उपचार कराना जरूरी है.



सोरायसिस की चिकित्सा-

यह एक हठीला रोग है, जो अकसर पूरी तरह से ठीक नहीं होता है. यदि एक बार हो गया, तो जीवन भर चल सकता है. अर्थात् रोग होता है, फिर ठीक भी होता है, लेकिन बाद में फिर हो जाता है. कुछ रोगियों में यह लगातार भी रह सकता है. हालांकि इसके कुछ रोगी अपने आप ठीक भी हो जाते हैं.
क्यों ठीक होते हैं अभी तक कारण अज्ञात है. कुछ नये रोगी धैर्य से खान-पान परहेज के साथ जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन और सावधानियों के साथ दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं अथवा रोग के लक्षणों से लंबी अवधि के लिए मुक्ति मिल जाती है. रोग के प्रारंभ में ही यदि आयुर्वेद विज्ञान से उपचार कराया जाता है, तो उपचार से रोग के ठीक होने की अधिक संभावना है. पुराने रोगियों को भी तुलनात्मक दृष्टि से कम खर्च में काफी राहत मिल जाती है. और रोगी बगैर परेशानी के सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है. एलोपैथ चिकित्सा प्रणाली में कुछ वर्षों पहले तक इसकी संतोषजनक चिकित्सा नहीं थी. विगत एक दशक में कई प्रभावकारी दवाएं विकसित हुई हैं, जिनके प्रयोग से लंबे समय तक रोग के लक्षणों से राहत मिल जाती है.

एलोपैथ चिकित्सा

साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैं.
इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं.
सेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी . रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है.






कुल्फ़ा(लोणाशाक) सब्जी के स्वास्थ्य लाभ


ये जंगली घास अक्सर ही खाली पड़ी जमीन में उग आती है,और हम इसको खरपतवार समझ कर फेंक देते हैं....इस जंगली घास को भारतीय भाषा में लोणी, बड़ी लोणा, लोणा शाक, खुरसा, कुलफा, लुनाक, घोल, लोनक आदि नामों से जाना जाता है.... English में इसको common Purslane, Kaun Purslane, Pussley, Pigweed कहा जाता है.... इसकी जड 25 साल तक नहीं मरती, और बारिश में या पानी मिलने पर दोबारा हरी हो कर फ़ैल जाती है. जो जड 25 सालों तक ख़त्म नहीं होता तो आप सोच सकते हो के इसमें कितनी Immunity होगी
कुल्फा गुणो से भरपूर एक ऐसी पत्तेदार सब्जी है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू. एच. ओ.) ने अपनी बहुत उपयोगी औषधीय पौधों की सूची में शामिल किया है। वानस्पतिक आधार पर यह एक खाने योग्य जंगली पौधा है जो गाँव से लेकर शहर तक कहीं भी बड़ी आसानी से पाया जा सकता है। ये बाग- बगीचों में, मैदानों में, सड़क किनारे कहीं भी अपने आप उगा हुआ दिख जाएगा पर भोजन में इस्तेमाल होने की वजह से लोग इसे अपने बागीचों में लगाते भी हैं और यह बाज़ारों में भी उपलब्ध है।
कुल्फा की पत्तियाँ छोटी, मोटी और अंडाकार होती है। इसकी डंठल और पत्तियाँ रसीली और लसलसी होती हैं। पत्तियाँ खाने में हल्की खट्टी और नमकीन (खारी) लगती हैं। कुल्फा की पत्तियाँ हरी और डंठल लाल-भूरा रंग लिए होती है। इनके रंग और आकार में क्षेत्रों के आधार पर थोड़ा परिवर्तन भी देखने को मिलता है। इसके फूल अत्यंत छोटे पीले रंग के होते हैं।
कुल्फा का साग बहुत ही प्रचलित व्यंजन है। इसे लोग दाल में डालकर, अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर या फिर मांसाहारी व्यंजनों में गोश्त के साथ भी पकाते हैं या मछली के साथ साइड डिश के रूप में भी खाते है।
देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग नाम से जाना जाता है। कुल्फा को बंगाली में बरा लोनिया (Bara loniya), गुजराती- मोटी (Moti), हिन्दी और पंजाबी – कुल्फा (Kulfa), कन्नड़ – डोड्डागूनी सोप्पू (Doddagooni soppu), मलयालम – कारिए चीरा (Karie cheera), मराठी – गोल (Ghol), उड़िया – पुरुनी साग (Puruni Sag), तमिल – परुप्पू कीराई (Paruppu keerai), तेलगु – पप्पू कूरा (Pappu koora) कहते है।


पोषण की दृष्टि से:
कुल्फा विटामिन्स, मिनेरल्स और डायटरी फ़ाइबर से भरपूर होता है। ये एंटीओक्सीडेंट और कैरेटिनोइड्स का अच्छा स्रोत है।
विटामिन और मिनेरल्स सयुंक्त रूप से शरीर के प्रतिरक्षण तंत्र की सुचारु क्रिया, ऊर्जा निर्माण, हड्डियों और दाँतों के निर्माण और मजबूती,मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र की सुचारु क्रियाशीलता के लिए और शरीर के द्रव संतुलन (फ्लुइड बैलेन्स ) के लिए ज़रूरी होते हैं।
एंटीऑक्सीडेंट रोगों से रक्षा, रोकथाम और बचाव में सहायक होते हैं।
कैरोटेनोइड्स नेत्र रोगों, कैंसर और हृदय रोगों के होने के खतरों को कम करता है।
कुल्फा विटामिन ए का बहुत अच्छा स्रोत है। ये विटामिन ए के बहुत अच्छे स्रोत वाली हरी पत्तेदार सब्जियों में से एक है। विटामिन बी कॉम्प्लेक्स वर्ग में ये राइबोफ्लेविन, नियसिन और पाइरिडॉक्सिन का अच्छा स्रोत है। इसमें विटामिन सी भी प्रचुर मात्रा में होता है। इसमें आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम, पोटैशियम और मैगनीज़ भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है।
इसमें अन्य पत्तेदार सब्जियों की अपेक्षा ज्यादा ओमेगा3 फैटी ऐसिड पाया जाता है। ओमेगा3 फैटी ऐसिड हृदय धमनी रोगों और स्ट्रोक से बचाव में सहायक है।
इसमें फ्लेवोनोइड्स और एलकेलोइड्स वर्ग के तत्व भी उपस्थित होते हैं जो इसे बहुत से रोगों से रक्षा, रोकथाम और इलाज में सक्षम बनाते हैं।
कुल्फा का लसलसा गुण म्युसीलेज जो की एक घुलनशील फाइबर है की वजह से होता है। घुलनशील फाइबर हृदय रोगों ,मधुमेह, मोटापे, कब्ज और दस्त से बचाव करने वाला होता है।
कुल्फा औषधीय गुणों से भी भरपूर है। विभिन्न शोधों और आयुर्वेद के विश्लेषण से उपलब्ध जानकारियों से पता चलता है कि:


कुल्फा शरीर को ठंडक पाहुचाने वाला (रेफ़रिजरेंट), पेशाब को बढ़ाने वाला (डाईयूरेटिक) स्कर्वी से बचाव एवं उपचार में सक्षम, जीवाणुरोधी, ज्वरनाशक, रक्त शोधक, रेचक, मधुमेहरोधी, तंत्रिकाओं और लिवर को सुरक्षा प्रदान करने वाला, हृदय रोगों से बचाव करने वाला, किडनी फंक्शन को सामान्य रखनेवाला, घावपूरक, शोथरोधी, अल्सररोधी है।
यह स्कर्वी, यकृत की बीमारियों जैसे लिवर डिसफंक्शन, वायरल हेपेटाइटिस और अल्कोहोलिक लिवर डिसॉर्डर के इलाज में लाभदायक है। ये कमजोर पाचन, पाइल्स, कब्ज, कोलाइटिस, दस्त, कॉर्निया की अपारदर्शिता (ओपेसिटीज़ ऑफ कॉर्निया), और चर्म रोगों के इलाज में भी लाभकारी है। ये कोलेस्टेरोल को नियंत्रित रख सकता है। ये आर्थेराइटिस होने की संभावना को कम करता है और इसके इलाज में भी उपयोगी है। इसमे रक्त में बढ़े हुये यूरिया, क्रेटिनिन, सोडियम और पोटेशियम के स्तर को कम करने का गुण भी पाया जाता है।
कुल्फा का पूरा पौधा औषधीय गुणों से भरपूर होता है इसके फूल और बीज मे  भी औषधीय गुण होते हैं।




20191129

अलसी के चौंकाने वाले फायदे



सुपर फुड अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। यह डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता है। स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा मंे पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है। *खाँसी होेने पर अलसी की चाय पीएं। पानी को उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें।एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए। *समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपराचूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर नील मधु तैयार करें। कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्यके लिए नील मधु उपयोगी है।
*डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी काॅफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फूड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है।शक्कर की मात्रा न्यूनतम है। 
*कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छः चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए। कैंसर की स्थिति मेें डाॅक्टर बुजविड के आहार-विहार की पालना श्रद्धा भाव से व पूर्णता से करनी चाहिए। कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए। 
*साफ बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें।मुखवास की तरह इसका सेवन करें। इसमें सैंधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी प्रयोग में न लें। बेसन में 25 प्रतिशत अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएं। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर  मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें। अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें अधिक फाइबर होता है, जो खूब पानी माँगता है।
दमा में दिलाये राहत

बहुत कम लोग यह बात जानते है, लेकिन दमा के रोगियों के लिए भी किसी चमत्कारी औषधि से कम नहीं है| दमा के रोगी एक चम्मच अलसी के पाउडर को आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और फिर इसे सुबह शाम छानकर इसका सेवन करे तो काफी लाभ होता है| 
खांसी से दिलाये छुटकारा -यदि ठंड के दिनों में आपको अकसर खांसी रहती है, तो ऐसे में अलसी की चाय का सेवन आपके लिए फायदेमंद होगा| इसके लिए अलसी का पाउडर बनाये| सादा पानी उबाल ले और उसमे अलसी का पाउडर मिलाये| इसका सेवन दिन में 2 से 3 बार करे|
ह्रदय रोग में फायदेमंद -भले ही अलसी के दाने छोटे छोटे हो, लेकिन इससे मिलने वाले फायदे बहुत बड़े है| आपको जानकर शायद आश्चर्य हो लेकिन अलसी का सेवन ह्रदय रोगो में भी फायदेमंद है| अलसी में पाया जाने वाला ओमेगा-3 जलन को कम और हृदय गति को सामान्य करने में मदद करता है| इसका नियमित सेवन करने से कार्डियो वेस्कुलर सिस्टम बेहतर बनता है। कुछ किये गए अध्यनों से पता चला है कि ओमेगा-3 से भरपूर भोजन करने से धमनियां सख्त नहीं पड़ती है। साथ ही यह व्हाइट ब्लड सेल्स को ब्लड वेसल के आंतरिक परत पर चिपका देता है, जिससे धमनियों में प्लैक जमने की संभावना भी कम हो जाती है|
जोड़ो के दर्द कम करे -ठंडी के दिनों में अक्सर वृद्ध लोगो को जोड़ो के दर्द में शिकायत रहती है| अलसी के बीजो का तेल जोड़ों के दर्द में राहत दिलाता है। इसके अलावा अलसी का नियमित सेवन शरीर को ऊर्जा व स्फूर्ति प्रदान करता है। कुछ लोगो के शरीर का वजन इतना ज्यादा होता है की उन्हें हमेशा पैरो में दर्द बना रहता है, लेकिन अलसी के सेवन से शरीर का भार कम होता है, वसा कम होता है| और यह हमारी खाने की ललक को भी कम करता है।अलसी खून को पतला बनाये रखती है, जिसके चलते शरीर में अच्छा कोलेस्ट्रोल बढ़ता है और खराब कोलेस्ट्रोल कम होता है और ह्रदय स्वस्थ रहता है।
*इसका रोजाना सेवन करने से महिलाओ मे होने वाली रजोनिवृत्ति संबंधी परेशानियों से राहत मिलती है। यह मासिक धर्म के दौरान ऐंठन को कम करके गर्भाशय को स्वस्थ बनाये रखता है।
*अलसी के सेवन से पैरो में रक्त का प्रवाह बढ़ता है, जिससे पेरो के घाव और फोड़े, फुंसी दूर हो जाते है| यहाँ तक की इसके तेल से मसाज करने पर पेरो के नाख़ून मुलायम और सुन्दर बनते है|
*डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी में प्रचुर मात्रा में फाइबर पाया जाता है| जिससे ब्लड शुगर नियंत्रित रहती है और डायबिटीज से शरीर पर होने वाले दुष्प्रभाव कम होते है|
*अलसी का सेवन पेट को साफ रखने में भी प्रभावशाली है। इसलिए स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम असली का सेवन जरूर करना चाहिए| आप चाहे तो अलसी के पाउडर को दूध, दही या ज्यूस में मिलाकर भी लिया जा सकता है|
अलसी के सेवन करने के तरीके- लसी से मिलने वाले लाभ तो बहुत है, लेकिन इस से मिलने वाले फायदों के लिए इसका सेवन सही तरीके से करना जरुरी है| यहाँ जानिए इसे किस तरह से लेना चाहिए|
अलसी के सेवन करने के तरीके अलसी से मिलने वाले लाभ तो बहुत है, लेकिन इस से मिलने वाले फायदों के लिए इसका सेवन सही तरीके से करना जरुरी है| यहाँ जानिए इसे किस तरह से लेना चाहिए| जो लोग कैंसर के रोगी है उन्हें 3 चम्मच अलसी का तेल पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर लेना चाहिए। स्वस्थ व्यक्ति रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ या फिर दाल और सब्जी के साथ ले सकते है| स्वस्थ व्यक्ति इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम ले सकता है| अलसी को सूखी कढ़ाई में रोस्ट कीजिये और मिक्सी में पीस लीजिये| लेकिन एकदम बारीक मत कीजिये और दरदरे पीसिये| भोजन के बाद इसे सौंफ की तरह खाया जा सकता है|

दमा के रोगी को एक चम्मच अलसी के पाउडर को आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और फिर उसे सुबह – शाम छानकर इसका सेवन करने से लाभ मिलता है| आप इसे गर्मी या सर्दी दोनों मौसम में खा सकते है| इसमें पाया जाने वाले फाइबर से हमें कई स्वास्थ लाभ पहुँचते है| कभी कभार इसके सेवन से बहुत प्यास लगती है, इसलिए इसका सेवन करते वक्त भरपूर मात्रा में पानी पिये| जो लोग कैंसर के रोगी है उन्हें 3 चम्मच अलसी का तेल पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर लेना चाहिए। *स्वस्थ व्यक्ति रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ या फिर दाल और सब्जी के साथ ले सकते है| *स्वस्थ व्यक्ति इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम ले सकता है| अलसी को सूखी कढ़ाई में रोस्ट कीजिये और मिक्सी में पीस लीजिये| लेकिन एकदम बारीक मत कीजिये और दरदरे पीसिये| भोजन के बाद इसे सौंफ की तरह खाया जा सकता है| *दमा के रोगी को एक चम्मच अलसी के पाउडर को आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और फिर उसे सुबह – शाम छानकर इसका सेवन करने से लाभ मिलता है| तो यह थे आलसी सेवन के फायदे |आप इसे गर्मी या सर्दी दोनों मौसम में खा सकते है| इसमें पाया जाने वाले फाइबर से हमें कई स्वास्थ लाभ पहुँचाते है| कभी कभार इसके सेवन से बहुत प्यास लगती है, इसलिए इसका सेवन करते वक्त भरपूर मात्रा में पानी पिये|

20191128

एक्जीमा,दाद,खाज के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार






 एक्जिमा एक प्रकार का चर्म रोग है। त्वचा के उत्तेजक, दीर्घकालीन विकार को एक्जिमा के नाम से जाना जाता है। इस रोग में त्वचा शुष्क हो जाती है और बार-बार खुजली करने का मन करता है क्योंकि त्वचा की ऊपरी सतह पर नमी की कमी हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप त्वचा को कोई सुरक्षा नहीं रहती, और जीवाणुओं और कोशाणुओं के लिए हमला करने और त्वचा के भीतर घुसने के लिए आसान हो जाता है। एक्जिमा के गंभीर मामलों में त्वचा के ग्रसित जगहों से में पस और रक्त का स्राव भी होने लगता है। यह रोग डर्माटाईटिस के नाम से भी जाना जाता है।
    मुख्य रूप से यह रोग खून की खराबी के कारण होता है और चिकित्सा न कराने पर तेजी से शरीर में फैलता है। एक्जिमा का रोग अपने रोगियों को उम्र और लिंग के आधार पर नहीं चुनता। एक्जिमा के रोग से ग्रस्त रोगी अन्य विकारों के भी शिकार होते हैं। यह किसी भी उम्र के पुरुष या महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। लेकिन कुछ आयुर्वेदिक उपचारों को अपनाकर इस समस्‍या के लक्षणों को कम किया जा सकता है।


खदिरारिष्ट
२० मिलीलीटर खदिरारिष्ट को २० मिलीलीटर पानी में मिलाकर खाना खाने के बाद दिन में दो बार लेने से फायदा होता है।
गुदुच्याड़ी तेल
एक औषधियुक्त तेल जिसे ग्रसित जगह पर लगाने से लाभ मिलता है।
पञ्चनिम्बडी चूर्ण
खाना खाने के बाद आधे से एक चमच पानी के साथ लेने से भी लाभ होता है।





नीम 
नीम रक्त विकारों में बहुत ही लाभकारी है | पाव भर सरसों के तेल में नीम की 50 ग्राम के लगभग कोंपलें पकाएं | कोंपले काली होते ही तेल नीचे उतार लें | छानकर बोतल में रखें और दिन में थोड़ा-थोड़ा एग्जिमा प्रभावित स्थान पर लगाएं | नीम की कोंपलों का रस 10 ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करते रहने से भी एक्जीमा ठीक हो जाता है |
आटे का लेप :
गेहूं के आटे का लेप करने से शरीर के सारे चर्म रोग दूर हो जाते हैं और खुजली में आराम मिलता है।
*तुलसी के पत्तों का रस पीने और लगाते रहने से लाभ होता है |
शुद्ध गुग्गूल-
आयुर्वेद की बहुत ही प्रचलित जड़ी बूटी, गुग्गूल में शुद्धि और तरोताजा करने के लिए अत्यधिक ओजस्वी शक्तियों का समावेश होता है।

एलोविरा 
एलोविरा के पौधे की पत्‍ती को काट लें और उसमें से निकलने वाले जेल को खुजली वाली जगह पर लगा लें। दिन में कम से कम चार से पांच बार ऐसा करने पर आपको आराम मिलेगा। साथ ही ठीक होने तक लगाने पर बाद में कभी खुजली नहीं होगी।
नींबू :
नींबू हर घर में आराम से मिल जाता है। इसलिए बॉडी में जहां पर भी खुजली हो रही हो उस जगह पर नींबू और गरी का तेल मिलाकर लगा लें। लगाने के तुरंत बाद खुजलाएं नहीं। थोड़ी देर में आराम मिल जाएगा।



छाछ -

. छाछ में एक साफ कपड़े का टुकड़ा भिगोकर त्वचा पर जलन, खुजली और बेचैनी वाले स्थान पर रखें | जितनी अधिक देर रख सकें, रखें | फिर उस स्थान को भली प्रकार साफ कर दें |

*खुबानी के पत्तों के रस का दाद-खाज पर प्रयोग करना भी लाभदायक है |
खीरे का रस:
खीरे को बारीक स्‍लाइस में काटकर दो घंटे के लिए रख दें। पूरा रस निकल जाने के बाद उसे छान लें और खुजली वाली जगह पर लगा लें। जरूर आराम होगा।
चन्दन
एक चम्मच कपूर के साथ एक चम्मच चन्दन की लई मिलाकर एक्जिमा से ग्रसित जगह पर लगाने से भी बहुत फायदा होता है।
नीम
नीम के कोमल पत्तों का रस निकालकर उसमें थोड़ी सी मिश्री मिला लें। इसे प्रतिदिन सुबह पीने से खून की खराबी दूर होकर एक्जिमा ठीक होने लगता है।

*चने के आटे में पानी मिलाकर पेस्ट सा बनाकर त्वचा के विकारग्रस्त स्थान पर लगाने से लाभ होता है | चने के आटे का उबटनके रूप में प्रयोग से मेकअप से होने वाला एक्जीमा भी ठीक हो जाता है |
*शुद्ध हल्दी भी एक्जिमा की चिकित्सा में लाभ  करती है। इसे एक्जिमा के चकतों पर लगाया जा सकता है और दूध में मिलाकर भी पीया जा सकता है।
हरड़-
4 हरड़ को गौमूत्र में पीसकर लेप बना लें। यह लेप प्रतिदिन दो से तीन बार एक्जिमा पर लगाने से लाभ होता है।




आहार और खान पान
दही और अचार जैसे खट्टी चीज़ों का सेवन बिलकुल ना करें।
करेले और नीम के फूलों का सेवन भी लाभकारी होता है।
क्या करें क्या ना करें
डिटरजेंट (कपडे धोने का पाउडर) को बिलकुल भी ना छुएं, पर अगर मजबूरी से छूना भी पड़े तो सूती दस्तानों का प्रयोग करें।
एक्जिमा से ग्रसित जगह पर तंग कपडे ना पहनें।
सिंथेटिक कपड़ों का भी बिलकुल प्रयोग ना करे, क्योंकि इससे पसीने के निष्काशन में कठिनाई होती है।
तरबूज जैसे फलों का नियमित रूप से सेवन करें।
गाजर और पालक के रस का मिश्रण पीने से भी एक्जिमा के ठीक होने में लाभ मिलता है।
पानी का भरपूर मात्रा में सेवन करें और चाहें तो संतरे का रस भी पी सकते हैं।
अध्ययनों से पता चला है कि टमाटर का रस भी एक्जिमा को चंद दिनों में ठीक करने में सहायक सिद्ध होता है।

20191126

गर्दन के दर्द के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार







गर्दन दर्द को कभी हलके में नहीं लेना चाहिये क्‍योंकि इससे कई लक्षणों का पता चलता है। गर्दन में दर्द की समस्‍या से ना तो आप ठीक से उठ-बैठ सकते हैं और ना ही रोज मर्रा के काम कर सकते हैं।
गर्दन में दर्द होना एक आम समस्या है।जिसे लोग अक्सर इग्नोर कर देते है। कई बार तो यह परेशानी इतनी बढ़ जाती है कि काम करने में और उठने-बैठने में भी मुश्किल होती है। गर्दन में लगातार दर्द रहने पर डॉक्टरी सलाह जरूर लेनी चाहिए।आज हम आपको इस परेशानी से निजात पाने के कुछ घरेलू उपाय बता रहे हैं, जिससे आपको काफी फायदा मिलेगा।

सीधे बैठे

गर्दन दर्द का एक कारण झुककर बैठना भी हो सकता है।काम करते समय हमेशा अपनी रीढ की हड्डी को सीधे रखकर ही बैठना चाहिए।

मसाज

गर्दन की दर्द में मसाज करने से बहुत फायदा मिलता है। मसाज से आप अच्‍छी नींद सो सकते है, लेकिन मसाज हमेशा हल्के हाथों से ही करनी चाहिए।

गर्म सिकाई

गर्म पानी की सिकाई करने से दर्द को बहुत आराम मिलता है।इससे खून का दौरा तेज हो जाता है।

अदरक

यह एक दर्द निवारक दवा के रूप में काम करती है। अगर आप अदरक पावडर को पानी में मिला कर पियें या फिर इसे घिस कर गरम पानी में मिला कर पेस्‍ट बना कर गरदन पर लगाएं तो राहत मिलेगी।

आइस पैक लगाएं

गरदन की दर्द में आइस पैक काफी लाभ पहुंचाता है। आप चाहें तो बरफ के टुकड़े को कपड़े में बांध कर दर्द पर रख सकते हैं। इससे दर्द में काफी आराम मिलेगा।

हींग एवं कपूर


गर्दन में दर्द होने पर हींग और कपूर बराबर मात्रा में लेकर सरसों के तेल में मिलाकर अच्छे से फेंटकर क्रीम की तरह बना लें।अब इस पेस्ट से गर्दन की हल्के हाथों से मसाज करने से दर्द में आराम मिलता है।

गरम पानी से स्‍नान

गुनगुने पानी का शॉवर लेने से आपकी गर्दन को आराम मिलेगा और जल्दी असर दिखाई देगा।

सही मुद्रा बना कर रखें

शरीर की सही मुद्रा बना कर रखने से भी गरदन का दर्द ठीक करने में सहायता मिलती है। अपने शरीर को एक दीवार पर सटा कर खड़ा कीजिये। अपनी पीठ और बुटक को दीवार से लगाइये और ठुड्डी को बिल्‍कुल सीधे रखिये। बस इसी मुद्रा में सारे दिन रहिये।




घुटनों के दर्द के अचूक असर उपचार


               
           
घुटने का दर्द कैसे करें ठीक : –


 घुटनों के दर्द की समस्या आजकल आम होती जा रही है कई बार ऐसा भी होता है कि किसी कारणवश चोट लग जाने से या बढ़ती हुई उम्र के कारण या फिर व्रद्धावस्था में हड्डियों के कमजोर हो जाने से अक्सर घुटनों में दर्द होने लगता है. इस पोस्ट में हम आपको घुटनों कादर्द से राहत दिलाने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे बता रहे हैं जिनका उपयोग करने पर लगभग 7 दिन में ही आपको घुटनों के दर्द से राहत मिल जाएगी. अक्सर घुटनों में दर्द होना आम बात नही है. और यदि आप भी अपने घुटनों में होने वाले दर्द से परेशान है. आपको बैठने उठने में समस्या आती है. सीडियां चढ़ते-उतरते घुटनों में दर्द होता है तो परेशान न हो आपके लिए घुटनों का दर्द ख़त्म करने वाला इलाज है. घुटनों का दर्द का इलाज बेहद सरल और असरदार है. यदि आप इन उपायों को आजमतें है तो आपको घुटने के दर्द से राहत मिलेगी

घुटनों के दर्द का इलाज – 
यदि आपके घुटनों में लगातार या थोड़ा-थोड़ा दर्द या तेज दर्द बना रहता है तो यहां दिए गए घरेलू नुस्खे आजमाएं और आपको 7 से लेकर 15 दिन के अंदर-अंदर इन घरेलू नुस्खों से पूरा पूरा आराम मिल जाएगा और फिर कभी आपके घुटने दर्द नहीं करेंगे. घुटनों के लिए दर्द निवारक दवा बनाने के लिए आप नीचे दिए गए कुछ नुस्खे आजमाएं. माना जाता है कि बूढ़े होने पर हड्डियों में दर्द होना शुरू हो जाता है. लेकिन ऐसा नही है. घुटनों में दर्द होने के कई कारण है. जैसे गलत तरीके ज्यादा वजन उठाना अपने घुटनों को घंटों तक मोड़ कर बैठना घुटने में पुरानी चोट को नज़रंदाज़ व्यायाम करने से पहले बॉडी को स्ट्रेच और बॉडी वार्मअप न करना गलत खान-पान और रहन-सहन ये सभी घुटनों में होने वाले दर्द का कारण बन सकता है. इसे कुछ बातों का ध्यान रखें. ज्यादातर शरीर में होने वालें दर्द का कारण उपरोक्त ही है. इसलिए इन्हें दोहरायें नही. ये आपके के लिए काफी खतरनाक हो सकता है.

सौठ से बनी दर्द निवारक दवा -
सौंठ भी एक बहुत अच्छा दर्द निवारक दवा के रूप में फायदेमंद साबित हो सकता है, सौंठ से दर्दनिवारक दवा बनाने के लिए एक आप एक छोटा चम्मच सौंठ का पाउडर व थोड़ा आवश्यकतानुसार तिल का तेल इन दोनों को मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट जैसा बना ले. दर्द या मोच के स्थान पर या चोट के दर्द में आप इस दर्द निवारक सौंठ के पेस्ट को हल्के हल्के प्रभावित स्थान पर लगाएं और इसको 3 घंटे तक लगा रहने दें इसके बाद इसे पानी से धो लें. ऐसा करने से सप्ताह में आपको घुटने के दर्द में पूरा आराम मिल जाता है और अगर मांसपेशियों में भी खिंचाव महसूस होता है तो वह भी जाता रहता है.
दर्द निवारक हल्दी का पेस्ट -किसी चोट का दर्द हो या घुटने का दर्द आप इस दर्द निवारक हल्दी के पेस्ट को बनाकर अपनी चोट के स्थान पर या घुटनों के दर्द के स्थान पर लगाइए इससे बहुत जल्दी आराम मिलता है. दर्द निवारक हल्दी का पेस्ट कैसे बनाएं इसके लिए आप सबसे पहले एक छोटा चम्मच हल्दी पाउडर लें और एक चम्मच पिसी हुई चीनी और इसमें आप बूरा या शहद मिला लें, और एक चुटकी चूना मिला दें और थोड़ा सा पानी डाल कर इसका पेस्ट जैसा बना लें.
इस लेप को बनाने के बाद अपने चम्मच के स्थान पर या जो घुटना का दर्द करता है उस स्थान पर स्लिप को लगा ले और ऊपर से  बैंडेज या कोई पुराना सूती कपड़ा बांध दें और इसको रातभर लगा रहने दें और सुबह सादा पानी से इसको धो ले इस तरह से लगभग 1 सप्ताह से लेकर 2 सप्ताह तक ऐसा करने से इसको लगाने से आपके घुटने की सूजन मांसपेशियों में खिंचाव अंदरुनी रूप से होने वाले दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलता है और यह आप के दर्द को जड़ से खत्म कर देता है. दर्द के आराम दिलाये सौंठ का लेप
खजूर से घुटने में दर्द का इलाज -सर्दियों के मौसम में रोजाना 5-6 खजूर खाना बहुत ही लाभदायक होता है, खजूर का सेवन आप इस तरह भी कर सकते हैं रात के समय 6-7 खजूर पानी में भिगो दें और सुबह खाली पेट इन खजूर को खा ले और साथ ही वह पानी भी पी ले जिनको जिसमें आपने रात में खजूर भिगोए थे. यह घुटनों के दर्द के अलावा आपके जोड़ों के दर्द में भी आराम दिलाता
आपके घर में मौजूद कुछ दवाओं के द्वारा भी आप अपने घुटने का दर्द को दूर कर सकते है. इसके आपको आधा कप सरसों का तेल लेना है फिर उसमे कुछ लहसुन की कच्ची कालिया छिल कर दाल देनी है. फिर इस सरसों के तेल को धीमी आंच पर गर्म करना है. और तब तक इसे गर्म करना जब तक की लहसुन की कालिया पक न जाये. फिर इस तेल के मिश्रण को ठंडा होने के लिए छोड़ दें. ठंडा होने पर इसे अपने घुटनों में हल्के हाथों से मालिश करें. इस उपाय को यदि आप 1 से लेकर २ दिन इसे करें आपका घुटने का दर्द पूरी तरह से गायब हो जायेगा.
नारियल का तेल है बेहतर- नारियल के तेल के बड़े फायदे है नारियल का तेल केवल आपके बालों को ही मजबूत नही बनाता बल्कि ये आपके शरीर के कई हिस्सों को मजबूत बनाने में मदद करता है. आप यदि नारियल के तेल से अपने शरीर की मशाज़ करते है तो आपको शरीर में होने अकडन से निजात मिलेगी. और आप नारियल के भीतर मौजूद गिरी को खाते है तो भी ये आपके लिए फायदेमंद ही है क्योंकि ये सीधे आपके पेट पर असर करती है. और ये आपके घुटने का दर्द दूर करने में मदद करेगा.
अखरोट के सेवन से आपको काफी फायेदा होगा-  अखरोट जितना सख्त होता है उसे फायदे उठने ही मुलायम होते है. यदि आप रोजाना 2 से 3 अखरोट खाते है तो आपके लिए काफी फायदेमद रहेगा. अखरोट खाने का तरीका बेहद आसान है आपको रात में अखरोट की गिरी को भिगो कर रखना है फिर सुबह खाली पेट सेवन करना है ताकि आपकी पचाने की शक्ति पर असर न पड़े. ऐसा करने से आपके घुटने का दर्द खत्म होगा साथ ही आपकी हड्डिया भी मजबूत हो जायेंगी.
हल्दी का मिश्रण घुटने का दर्द मिटाए- उम्र के साथ साथ शरीर की कार्यशक्ति कम हो जाती है. और बृद होने पर जोड़ो में दर्द होने लगता है. और कमर और घुटने में दर्द होना आम बात हो जाती है. लेकिन कभी कभी ये दर्द असहनीय हो जाता है. घुटने का दर्द मिटाना चाहते है तो हल्दी के आयुर्वेदिक लेप का इस्तेमाल करें इस लेप को बनाने के लिए आपको एक चम्मच हल्दी लीजिये. फिर इसमें शक्कर या शहद के घोल में इसे मिला दीजिये. और इस मिश्रण में चूना (जो पान में इस्तेमाल होता है) अपनी आवश्यकतानुसार मिला लें. और इस मिश्रण को अच्छी तरह से फेंटे. जब ये पेस्ट बनकर तैयार हो जाये तो इस पेस्ट या लेप को अपने घुटनों में लगायें. कुछ ही देर में आपको घुटने का दर्द छूमंतर हो जायगा. 
यदि आपका वजन बढ़ा हुआ है तो आपको चलने में तकलीफ होना या फिर घुटनों में दर्द होना स्वाभाविक है. इसलिए सबसे पहले अपने वजन को कम कीजिये ताकि आपकी बॉडी फिट रहे है आपको अन्य बीमारियाँ न लगे. अपने शरीर को मजबूत बनायें सही नियमों के साथ व्यायाम करें. स्पोर्ट एक्टिविटीज में हिस्सा है और कुछ न कुछ करते रहे इससे आपके शरीर का तनाव और खिचाव कम होगा. और घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा.


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