पेट की गेस के आयुर्वेदिक घरेलु उपाय





भाग दौड़ भरी इस जिन्दगी में शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसे पेट की गैस की परेशानी का अनुभव न हुआ हो। यह एक ऐसी बीमारी है, जो हर किसी को आसानी से जकड़ लेती है और बहुत परेशान भी करती है।
पेट की गैस क्यों बनती है?
गैस बनने के कई कारण होते हैं, जिनमें असंयमित होकर अनियमित आहार खाना , अधिक खट्टे, तीखे, मिर्च मसालेदार, बादी बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन , देर रात तक जागना , भोजन में सलाद का अभाव, पानी कम पीना, चना, उड्द, मटर, मूग, आलू, मसूर, गोभी चावल आदि का अधिक सेवन करना, क्रोध शोक, चिंता जैसे मानसिक कारण, परिश्रम न करना, यकृत रोग की उपस्थिति, मांसाहार का सेवन आदि।

पेट की गैस का घरेलू उपचार -


*प्रतिदिन 3 छोटी हरड मुंह में डालकर चूसते रहने से भी पेट की गैस की समस्या दूर हो जाती है|
*गाजर का रस पीने से रक्त की अशुद्धि और पेट की गैस दूर होती है।
*थोड़ा-सा सेंधा नमक तथा कालीमिर्च और लौंग 4-4 पीसकर आधी कटोरी पानी में उबालकर पीने से पेट की गैस में आराम मिलता है।
*पेट की गेस में पुदीना बेहद फायदेमंद है|
*पांच ग्राम अजवायन, 10 कालीमिर्च और 2 पीपल के पत्तो को शाम के समय पानी में भिगो दें और प्रात: समय इसे पीसकर शहद में मिलाकर 250 मि.ली. पानी के साथ सेवन करने से पेट की गैस का दर्द मिट जाता है।
*भुनी हुई हींग पीसकर सब्जी में डालकर खाने से पेट की गैस मिट जाती है।
*‘हिंगाटक चूर्ण’ पानी के साथ सेवन करने से पेट के सभी प्रकार के वायु विकार मिट जाते हैं।


गैस की रामबाण दवा – 

छिलका रहित लहसुन 10 ग्राम, जीरा, शुद्ध गंधक, सोंठ, सैंधा नमक, कालीमिर्च, *पिप्पली और घी में भुनी हुई हींग प्रत्येक 5-5 ग्राम लेकर सभी को पीसकर उसमे थोडा सा नीबू रस डालकर चने के आकार की गोलियां बनाकर सुरक्षित रख लें। यह 1-2 गोली भोजनोपरांत सेवन करते रहने से अपच, अजीर्ण , गैस की बीमारी ठीक हो जाती है |
*एक सेब छीलकर इसके इर्द-गिर्द जितनी भी लौंगें आ सकें उन्हें चुभो दें। फिर उस सेब को 40 दिन तक किसी सुरक्षित स्थान पर रखे दें। उसके बाद इन लौंगों को निकालकर किसी साफ-स्वच्छ शीशी में रख ले। भोजनोपरांत दिन में 2 बार 1-1 लौंग चूसने से पेट के सभी रोगों और पेट की गैस से भी मुक्ति मिल जाती है | यह पेट की गैस का रामबाण इलाज है |
*3 ग्राम कालीमिर्च और 6 ग्राम मिश्री पीसकर लेने से अफारा मिट जाता है। परंतु ऊपर से पानी न पिएं। यह भी एक अच्छी गैस की दवा है |

*पेट की गैस हो जाने पर पिसी हुई हल्दी 1 ग्राम में पिसा हुआ नमक 1 ग्राम मिलाकर गर्म पानी के साथ सेवन करने से गैस निकलकर पेट हल्का हो जाता है।
*एक चम्मच अजवाइन के साथ चुटकी भर काला नमक भोजन करने के बाद चबाकर खाने से पेट की गैस शीघ्र ही निकल जाती है।
*अदरक और नींबू का रस एक-एक चम्मच की मात्रा में लेकर उसमें थोड़ा-सा काला नमक मिलाकर भोजन के बाद दोनों समय सेवन करने से गैस की सारी तकलीफें दूर हो जाती हैं और खाना भी ठीक से हजम हो जाता है |
*भोजन करते समय बीच-बीच में लहसुन, हींग थोड़ी मात्रा में खाते रहने से गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है |  

*हरड, सोंठ का पाउडर आधा-आधा चम्मच की मात्रा में लेकर उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर भोजन के बाद पानी से सेवन करने से पाचन ठीक होता है और पेट की गैस की समस्या से भी छुटकारा मिलता है |
*नीबू का रस व मूली खाने से गैस की तकलीफ नहीं होती और पाचन क्रिया सुधरती है।
इसके अतिरिक्त सिर्फ अजवायन के चूर्ण को गर्म पानी के साथ सेवन करने से अफारा, पेट का तनाव, बदहजमी आदि रोगों में लाभ होता है। आवश्यकतानुसार 1-2 सप्ताह तक लगातार प्रयोग करें। इससे पेट की गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है |
*125 ग्राम दही के मट्ठे में अजवायन 2 ग्राम और आधा ग्राम काला नमक (पीसकर व मिलाकर) भोजनोपरांत सेवन करने से पेट की गैस, अफारा, कब्ज आदि में बहुत लाभ होता है। आवश्यकतानुसार 1-2 सप्ताह तक प्रयोग करें।
*लहसुन की 1-2 कली छीलकर, बीज निकाली हुई मुनक्का में लपेटकर भोजनोपरांत थोडा सा चबाकर निगल लें यह पेट की गैस की अचूक दवा है |
*अदरक का रस, नीबू का रस और शहद प्रत्येक 6-6 ग्राम दिन में 3 बार सेवन करने से पेट की गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है |
*प्याज के रस में काला नमक और हींग पीसकर व मिलाकर पीने से पेट की गैस और गैस का दर्द ठीक हो जाता है
*गुड़ और मैथीदाना को उबालकर पीने से पेट की गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है।
नोट – जिन लोगों को गर्म तासीर वाली वस्तुएं हजम न होती हो या जिनके शरीर में जलन अनुभव होता हो, उन्हें भी मैथीदाना का प्रयोग नहीं करना चाहिए या जो लोग कमजोर हों अथवा चक्कर आते हों, उन्हें भी मैथीदाने का निरंतर प्रयोग नहीं करना चाहिए।
*काली हरड (इसको छोटी हरड, बाल हरड़, आदि नामों से भी जाना जाता है) को पानी से भली-भांति धोकर किसी साफ-स्वच्छ कपड़े से पोंछकर साफ करके सुरक्षित रख लें। भोजनोपरांत दिन में 2 बार 1 हरड को मुंह में रखकर चूसने से गैस व कब्ज में लाभ होता है। हरड भी पेट की गैस की रामबाण दवा होती है
*पेट के आसन करने से भी पेट के रोगों में लाभ मिलता है।
*शराब, चाय, कॉफी, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट जैसे व्यसन से बचें।
प्राकृतिक वेगों को रोके रखने की आदत छोड़े। दिन में सोना छोड़ दें और रात्रि को मानसिक परिश्रम और तनाव से बचें।
*मानसिक तनाव, अशांति, भय, चिंता, क्रोध, के कारण पाचन अगों के आवश्यक पाचक रसों का स्राव कम हो जाता है, जिससे अजीर्ण की तकलीफ हो जाती है और अजीर्ण का विकृत रूप पेट की गैस की बीमारी पैदा करता है।
*भोजन में मूंग , चना, मसूर, मटर अरहर, आलू, सेम फली , चावल तथा तेज मिर्च मसाले युक्त आहार अधिक मात्रा में सेवन न करें। शीघ्र पचने वाले आहार जैसे सब्जियां, खिचड़ी, चोकर सहित बनी आटे की रोटी, मट्ठा, दूध, तोरई, कददू , पालक, टिंडा, शलजम, अदरक, आंवला (Amla), नीबू (Lemon)आदि का सेवन अधिक करना चाहिए।
*भोजन खूब चबा-चबाकर आराम से खाना चाहिए। बीच-बीच में अधिक पानी न पिएं। भोजन के दो घंटे बाद एक-दो गिलास पानी पिएं, थोड़ी भूख शेष रह जाए, उतना ही भोजन करें।
*दोनों समय के मुख्य भोजन के बीच हल्का नाश्ता फल आदि अवश्य खाएं। तले, गरिष्ठ भोजन से परहेज करें।
भोजन सादा, सात्विक और प्राकृतिक अवस्था में सेवन करने का प्रयत्न करें। ठंडा और बासी भोजन करने से बचें।
*दिन भर में 8-10 गिलास पानी का सेवन अवश्य करें। प्रतिदिन कोई न कोई व्यायाम करने की आदत बनाएं। शाम को घूमने जाएं। समय निकाल कर प्रात: भ्रमण करना श्रेष्ठ होता है|


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   लिवर को हिंदी में जिगर कहा जाता है. यह शरीर की सबसे महत्वपूर्ण और बड़ी ग्रंथी है. यह पेट के दाहिनी ओर नीचे की तरफ होता है. लिवर शरीर की बहुत सी क्रियाओं को नियंत्रित करता है. लिवर खराब होने पर शरीर की कार्य करने की क्षमता न के बराबर हो जाती है और लिवर डैमेज का सही समय पर इलाज कराना भी जरूरी होता है नहीं तो यह गंभीर समस्या बन सकती है. गलत आदतों की वजह से लीवर खराब होने की आशंका सबसे ज्यादा होती है. जैसे शराब का अधिक सेवन करना, धूम्रपान अधिक करना, खट्टा ज्यादा खाना, अधिक नमक सेवन आदि. सबसे पहले लिवर खराब होने के लक्षणों को जानना जरूरी है. जिससे समय रहते आपको पता रहे और इलाज सही समय पर हो सके.

लिवर के रोगों के कारण-

*मलेरिया, टायफायड से पीडित होना.
* रंग लगी हुई मिठाइयों और डिं्रक का प्रयोग करना.
* सौंदर्य वाले कास्मेटिक्स का अधिक इस्तेमाल करना.
*. चाय, काफी, जंक फूड आदि का प्रयोग अधिक करना.
* दूषित मांस खाना, गंदा पानी पीना, मिर्च मसालेदार और चटपटे खाने का अधिक सेवन करना.
*पीने वाले पानी में क्लोरीन की मात्रा का अधिक होना.
* शरीर में विटामिन बी की कमी होना.
* एंटीबायोटिक दवाईयों का अधिक मात्रा में सेवन करना.
*. घर की सफाई पर उचित ध्यान न देना.
*लिवर खराब होने से शरीर पर ये लक्षण दिखाई देने लगते हैं.
*लीवर बड़ा हो जाता है तो पेट में सूजन आने लगती है , जिसको आप अक्सर मोटापा समझने की भूल कर बैठते हैं.

* मुंह का स्वाद खराब होना आदि
* लिवर वाली जगह पर दबाने से दर्द होना.

* भूख न लगने की समस्या, बदहजमी होना, पेट में गैस बनना.
*शरीर में आलसपन और कमजोरी का होना.
प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा लिवर को ठीक करने के उपाय. इन उपायों के द्वारा लिवर के सभी तरह के कार्य पूर्ण रूप से सही कार्य करने लगते हैं. लिवर को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है टाॅक्सिंस वायरस. इसलिए लिवर का उपचार करने से पहले रोगी का खून साफ होना जरूरी है ताकी लिवर पर जमें दूषित दोष नष्ट हो सके और लीवर का भार कम हो सके. इसलिए रोगी को अतरिक्त विश्राम की जरूरत होती है.

प्राकृतिक चिकित्सा कैसे करें?

सुबह उठकर खुली हवा में गहरी सांसे ले. प्रातःकाल उठकर कुछ कदम पैदल चलें और चलते चलते ही खुली हवा की गहरी सांसे लें. आपको लाभ मिलेगा.
सप्ताह में सरसों की तेल की मालिश पूरे शरीर में करें. मिट्टी का लेप सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर जरूर लगाएं. आप सप्ताह में एक बार वाष्प का स्नान भी लें. सन बाथ भी आप कर सकते हो.

आहार चिकित्सा

लिवर संबंधी बीमारी को दूर करने में आहार चिकित्सा भी जरूरी है. यानि क्या खाएं और कितनी मात्रा में खायें यह जानना भी जरूरी हैं. लिवर की बीमारी से परेशान रोगीयों के लिए ये आहार महत्वपूर्ण होते हैं.
लिवर की बीमारी में जूस का सेवन महत्वपूर्ण माना जाता है. लिवर के रोगी को नारियल पानी, शुद्ध गन्ने का रस, या फिर मूली का जूस अपने आहार में शामिल करना चाहिए. पालक, तोरई, लौकी, शलजम, गाजर, पेठा का भी जूस आप ले सकते हो.
दिन में 3 से 4 बार आप नींबू पानी का सेवन करें. सब्जियों का सूप पीएं, अमरूद, तरबूज, नाशपाती, मौसमी, अनार, सेब, पपीता, आलूबुखारा आदि फलों का सेवन करें.
सब्जियों में पालक, बथुआ, घीया, टिंडा, तोरई, शलजम, अंवला आदि का सेवन अपने भोजन में अधिक से अधिक से करें. सलाद, अंकुरित दाल को भी अधिक से अधिक लें. भाप में पके हुए या फिर उबले हुए पदार्थ का सेवन करें.लिवर की बीमारी को दूर करने के लिए आप इन चीजों का सेवन अधिक से अधिक करें.
जामुन लिवर की बीमारी को दूर करने में सहायक होता है. प्रतिदिन 100 ग्राम तक जामुन का सेवन करें. सेब का सेवन करने से भी लिवर को ताकत मिलती है. सेब का सेवन भी अधिक से अधिक करें. गाजर का सूप भी लिवर की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है. यदि लिवर में सूजन है तो खरबूजे का प्रयोग अधिक से अधिक करें. पपीता भी लिवर को शक्ति देता है.
आंवला विटामिन सी के स्रोतों में से एक है और इसका सेवन करने से लीवर बेहतर तरीके से काम करने लगता है . लीवर के स्वास्थ्य के लिए आपको दिन में 4-5 कच्चे आंवले खाने चाहिए. एक शोध साबित किया है कि आंवला में लीवर को सुरक्षित रखने वाले सभी तत्व मौजूद हैं.
लीवर की बीमारियों के इलाज के लिए मुलेठी एक कारगर वैदिक औषधि है . मुलेठी की जड़ को पीसकर पाउडर बनाकर इसे उबलते पानी में डालें. फिर ठंड़ा होने पर साफ कपड़े से छान लें. इस चाय रुपी पानी को दिन में एक या दो बार पिएं.
पालक और गाजर का रस का मिश्रण लीवर सिरोसिस के लिए काफी फायदेमंद घरेलू उपाय है. गाजर के रस और पालक का रस को बराबर भाग में मिलाकर पिएं. लीवर को ठीक रखने के लिए इस प्राकृतिक रस को रोजाना कम से कम एक बार जरूर पिएं
सेब और पत्तेदार सब्जियों में मौजूद पेक्टिन पाचन तंत्र में जमे विष से लीवर की रक्षा करता है.कैसे करें लिवर का बचावलिवर (Liver) का बचाव करने के लिए आपको बस इन आसान कामों को करना है और पूरे नियम से करना है. क्योंकि लिवर शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है इसलिए आपको अपने जीवनशैली में थोड़ा सा परिवर्तन लाना होगा. ताकि आप लिवर की बीमारी से बच सकें.
जब भी आप सुबह उठें तो 3 से 4 गिलास पानी का सेवन जरूर करें. उसके बाद आप पार्क में टहलें. दिन में हो सके तो 2 से 3 बार नींबू पानी का सेवन करें. लिवर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक काम भी करते रहें. कभी भी भोजन करते समय पानी का सेवन न करें और खाने के 1 घंटे बाद ही पानी का सेवन करें. चाय, काफी आदि से दूर रहें. किसी भी तरह के नशीली चीजों का सेवन न करें. तले हुए खाने से दूर ही रहें. साथ ही जंक फूड, पैकेज्ड खाने का सेवन न करें.
अनुलोम विलोम प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम को प्रातः जरूर करें. इन सभी बातों को ध्यान में यदि आप रखेगें तो आप लिवर की बीमारी से बचे रहेगें.
लीवर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने के लिए सेब के सिरके का इस्तेमाल करें. खाना खाने से पहले सेब का सिरका पीने से चर्बी कम होती है. एक चम्मच सेब का सिरका एक गिलास पानी में मिलाएं और इसमें एक चम्मच शहद भी मिलाएं. इस मिश्रण को दिन में दो या तीन बार तक पींए.
आंवला भी लिवर की बीमारी को ठीक करता है. इसलिए लिवर को स्वस्थ रखने के लिए दिन में 4 से 5 कच्चे आंवले खाने चाहिए|
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कलर थेरेपी के उपयोग और फायदे




आप ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं, आत्मविश्वास में कमी पाते हैं, सोच स्पष्ट नहीं हो पाती तो रंग चिकित्सा आपकी सहायता कर सकती है। 



रंग चिकित्सा के उपयोग और फायदे-

रंगों का हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है। रंगों की इस ताकत ने उपचार के लिए भी उपयोगी बना दिया। कई सारी बीमारियां हैं, जिनके उपचार के लिए रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इन खूबियों के कारण इसे कलर थेरेपी यानी रंग चिकित्सा का नाम दिया गया है।

बढ़ रही है लोकप्रियता-

भारत में यह चिकित्सा अभी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई है, लेकिन यूट्यूब पर इससे संबंधित लगभग डेढ़ लाख वीडियो मौजूद हैं। इनमें काफी भारतीयों से संबंधित भी हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अब भारत में भी लोकप्रिय हो रहा है।

कैसे आया प्रचालन में -

रंगों और इंसानी व्यवहार को देखते हुए तमाम लोगों ने इसपर शोध किए। इनमें से एक नाम जर्मनी के नामी लेखक, कलाकार व दार्शनिक गोथ का भी है। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि रंगों का हमारी भावनाओं पर सीधा असर पड़ता है। कुछ ऐसे ही शोधों से यह विचार आया कि क्यूं न रंगों का इस्तेमाल इंसान के मूड से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने में किया जाए।

हर रंग कुछ कहता है-

हमारी आंखें रंग को देखती हैं, वो दिमाग को मैसेज भेजती हैं और हमारा दिमाग ऐसे रसायन पैदा करता है, जो हमें नाक-मुंह सिकोड़ने या स्माइल करने का सिग्नल देते हैं। किसी कपड़े की दुकान पर दो युवतियों को कपड़े पसंद करते हुए देखकर आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं।

कैसे काम करती है यह कलर थैरेपी

इसके दो तरीके हैं। इसमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लायी जाती है रोशनी। सूरज की रोशनी को अपनी जरूरत के हिसाब के रंग में से गुजारते हुए शरीर के किसी खास हिस्से पर फेंका जाता है। लैंप जैसी मशीन के जरिए भी रोशनी फेंकी जाती है। इसके अलावा शरीर पर सीधे-सीधे पेंट भी किया जाता है। ये रंग हर्बल होते हैं। अलग-अलग परेशानियों के लिए अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।

एक बार आजमाएं-

अगर कभी सर्दी व कफ हो जाए तो लाल रंग की रोशनी को छाती के ऊपर पांच से सात मिनट तक डाले रखें। आपको जरूर लाभ होगा।
सावधानी भी है जरूरी
लाल: 5 से 10 मिनट, सिर, चेहरे पर कभी नहीं।
संतरी: 5 से 10 मिनट
पीला: 15 मिनट
हरा: 10 से 25 मिनट
नीला: 10 मिनट तक, सिर के आसपास ज्यादा देर तक नहीं।
रंग और उसका असर

लाल रंग : 

हिम्मत, जोश और ऊर्जा
लाल रंग से हीमोग्लोबीन बढ़ता है, जो शरीर में ऊर्जा पैदा करता है। आयरन की कमी और खून से जुड़ी दिक्कतों में इस रंग का इस्तेमाल बड़े काम का साबित होता है।

संतरी:

खुशी, आत्मविश्वास और संपूर्णता
ये रंग आपको दिनभर खुशमिजाज रख सकता है। ये रंग जीवन के लिए भूख पैदा करता है। ये हमें हमारी भावनाओं से जोड़ता है और हमें स्वतंत्र व सामाजिक बनाता है।

पीला:



आंतों के रोग के कारण ,लक्षण व उपचार





आंतों के रोग का कारण व लक्षण

बिना चबाए भोजन निगलनेवालों,लगातार कुछ-न-कुछ खाते रहनेवालों, पानी कम पीनेवालों, चिकनाई का कम सेवन करनेवालों का आतों के रोग की चपेट में आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ज्यादा गरिष्ठ भोजन आंतों की कार्यप्रणाली को बिगाड़ देता है। रोग गंभीर होने पर ऑपरेशन भी करवाना पड़ सकता है। आतों में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं-जैसे आंतों में जलन, जख्म, सूजन, पीड़ा व आंत्र ज्वर।

आंतों के रोग का उपचार



*. मौसमीः

आत्रज्वर में मौसमी का सेवन लाभदायक होता है।

* केलाः

आत्रज्वर के रोगियों को केला काफी मात्रा में खाना चाहिए। इससे बहुत लाभ होता है। इससे आंतों की सूजन भी समाप्त हो जाती है।

* सेवः

सेव खाने से आतों के जख्म ठीक हो जाते हैं व सूजन मिट जाती है। सेव का रस पीने से आतों के घावों में आराम मिलता है।

* बेरः

बेर ठंडा व रक्तशोधक फल है। इसके सेवन से आतों के घाव ठीक हो जाते हैं।

3. संतराः

आंत के रोगियों को नित्य एक गिलास संतरे का रस पीना चाहिए।

* बेलः

पेट के भीतर की बड़ी आंतों में सूजन आ गई हो तो बेलपत्र का रस तथा बेलगिरी का हलवा साथ में लीजिए। पहले रस पी जाइए फिर पके हुए बेल का गूदा या हलवा खा जाइए। बेलपत्र का रस सूजन व घावों का इलाज करेगा तथा गूदे का हलवा सब कुछ पूर्ववत बना देगा।

* चुकंदर व गाजर का रसः

बड़ी आंत की सूजन में 185 ग्राम गाजर का रस 150 ग्राम चुकंदर का रस व लगभग 160 ग्राम खीरे का रस मिलाकर पीने से काफी आराम मिलता है।

* नारंगीः

नारंगी गर्मी शांत करनेवाली होती है। आत्रज्वर के रोगी को दूध में नारंगी का रस मिलाकर पिलाएं या फिर दूध पिलाकर नारंगी खिलाएं दिन में कई बार नारंगी खिलाएं। इससे आत्रज्वर में काफी राहत मिलती है।

* अनारः

अनार खाने से आतों के विभिन्न रोगों में लाभ होता है।

धनिया

एक चम्मच साबुत बिना पिसा हुआ धनिया एक चम्मच बूरा खांड(चीनी) दोनों चबा चबाकर खाए और अंत में पानी से निगल जाएँ। दस्त पेट के रोगो में लाभ होगा।
रात को धनिया पानी में भिगोकर प्रात : पानी छानकर बूरा खांड(चीनी) या शक्कर मिलाकर नित्य पियें। ये प्रयोग अनेक लोगो पर सफलता पूर्वक आज़माया हुआ हैं।अजवायन
* साधारण जल से इसे खाने से बदहजमी, अरुचि व् मंदाग्नि मिटती है।
*गुनगुने पानी के साथ केवल अजवायन का चूर्ण खाने से बदहजमी, खांसी, पेट का तनाव, गुल्म (ट्यूमर), तिल्ली, कफ की खराबी, कफ और वायु की बहुत प्रकार की खराबियां दूर होती है। पेट के छोटे- बड़े केंचुए नष्ट हो जाते है। इन सब शिकायतों में आवश्यकता अनुसार सप्ताह- दो सप्ताह तक ले।
* अकेली अजवायन में चिरायते का कटुपोष्टिक, हींग का वायुनाशक और काली मिर्च का अग्निदीपक गुण समाया हुआ है। “एक यवानी शतमन्नपाचिका” अर्थात अकेली अजवायन सैकड़ो प्रकार के अन्न को पचाने वाली होती है। पेट दर्द, अफारा, वायुगोला, कफ, वात, शूल, वमन, कृमि, बवासीर, व् संक्रमण रोगो में यह बहुत ही लाभकारी है।
*अमृतधारा की दो-तीन बुँदे बताशे या खांड या पानी में डालकर लेने से पेट दर्द मिटता है। यदि एक बार में न मिटे तो आधा घंटे बाद फिर एक ऐसी खुराक लेने से आराम हो जाता है।
*तीन चम्मच ठंडे पानी में दो-तीन बुँदे अमृतधारा, सुबह शाम भोजन के बाद लेने से दस्त, आंव के दस्त, मरोड़, पेचिस, अतिसार, हैजा, खट्टी डकार, तेज प्यास, अधिक प्यास, पेट फूलना, पेट दर्द, खाना खाते ही उलटी या दस्त होना, मंदाग्नि, बादी, बदहजमी, आदि रोग मिटते है।

इसबगोल

इसबगोल इरिटेबल बाउल सिंड्रोम में बहुत लाभकारी हैं। इसबगोल फाइबर का बहुत अच्छा स्त्रोत हैं। ये मल को बांधकर रखता हैं। और इस रोग में तो ये रामबाण हैं। भोजन के १५ मिनट पहले एक चम्मच इसबगोल का छिलका ठन्डे पानी के साथ लेना चाहिए।

हल्दी

इस रोग में हल्दी बहुत लाभ करती हैं। भोजन के एक घंटा पहले या बाद में आधा चम्मच पिसी हल्दी की फंकी ठन्डे पानी से नित्य लीजिये। आंतो के रोगो में हल्दी बहुत गुणकारी हैं।

बेल, धनिया, मिश्री, सौंफ

अमीबोबायसिस, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, कई बार दस्त जाना, आंव, पेचिश, आदि पाचन तंत्र के रोग, चाहे नया रोग हो चाहे पुराना हो इनमे ये निम्नलिखित प्रयोग बहुत सफल हैं।
पिसा हुआ धनिया, मिश्री, सौंफ, बेल(बेलगिरी के फल) का चूर्ण इनको 100 – 100 ग्राम की मात्रा में मिलाये। अब इसमें एक चौथाई भाग अर्थात 25 ग्राम पीसी हुई सौंठ मिलाकर इस मिश्रण की दो दो चम्मच खाने से एक घंटा पहले चार बार पानी से फंकी ले।

घर पर बनाये चूर्ण.

सोंठ, नागरमोथा, अतीस और गिलोय ये सभी पंसारी (जो आयुर्वेदिक कच्ची दवा बेचता है) से मिल जाएँगी. इन सब का बराबर चूर्ण लेके मिक्स कर लें। फिर 10gm चूर्ण लेके 400ml पानी मे डाल के उबालिये फिर 100ml बच जाए तो उतार कर छान लीजिये। यह सुबह शाम खली पेट सेवन करना है।
    
गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि







चेहरे के ब्लेकहेड्स दूर करने के उपचार




 चेहरे पर पिंपल्स और मुंहासे ही नहीं बल्कि कई और समस्याएं भी होती है। ब्लैकहेड्स उन समस्याओं में से एक है। ब्लैकहेड्स के कारण हमारा चेहरा बेकार लगने लगता है। बहुत सी लड़कियां इन ब्लैकहेड्स को हटाने की कोशिश में भी लगी रहती हैं और इनको दबाकर निकालने की कोशिश करती हैं। इससे चेहरे पर निशान बन जाते हैं, जो कि आपकी सुंदरता में दाग लगा देते हैं।
  आज हम आपको कुछ ऐसे असरदार उपायों के बारे में बताने जा रहें हैं, जो कि आपकी त्वचा में होने वाले ब्लैकहेड्स को मिनटों में गायब कर देंगे।


ग्रीन टी (Green tea)


   ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट्स के साथ ही विटामिन्स भी होते हैं, जो हमारे चेहरे पर अतिरिक्त ऑयल को जमा नहीं होने देते हैं। आप सूखी ग्रीन टी को एक चम्मच पानी में मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें। अब इस पेस्ट को आप ब्लैकहेड्स पर लगाएं। इसे 2 से 3 मिनट तक स्क्रब करें। इसके बाद आप गुनगुने पानी से अपने चेहरे को धो लें। इसके बाद आप एक बेहतरीन मॉइश्चराइजर से अपनी त्वचा को मसाज कर लें।


नींबू का रस (Lemon Juice)


  इसे इस्तेमाल करने के लिए आप नींबू के रस में शहद मिला लें। इसके बाद आप इसमें चीनी मिलाएं। अब इस पेस्ट को ब्लैकहेड्स पर लगा लें। इसे 10 मिनट तक रब करें और इसके बाद आपको कुछ ही देर में ब्लैकहेड्स से छुटकारा मिल जाएगा। आप अपने चेहरे में दिन में दो बार इस उपचार को ट्राई कर सकती हैं।


बेकिंग सोडा (Baking Soda) 

प 3 चम्मच बेकिंग सोडा को पानी में मिलाकर एक पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट को आप अपने ब्लैकहेड्स पर लगाएं। इसके बाद आप थोड़ी देर ब्लैकहेड्स पर इस पेस्ट से मसाज करें। इसके बाद आप हल्के गर्म पानी से इस जगह को धो लें। ऐसा आप सप्ताह में दो बार करें

दालचीनी (Cinnamon)


दालचीनी पाउडर में नींबू का रस मिला लें। इसके बाद आप चुटकी भर हल्दी पाउडर इसमें मिला लें। इस पेस्ट को आप अपने चेहरे पर 10 से 15 मिनट तक लगाकर रखें। इसके बाद आप अपने चेहरे को धो लें। इससे आपको ब्लैकहेड्स से छुटकारा मिल जाएगा।

ओटमील (Oatmeal)


टमाटर जूस में ओटमील को मिला लें। इसके बाद आप एक चम्मच शहद को इसमें मिलाकर आप इस पेस्ट को ब्लैकहेड्स पर लगाकर स्क्रब करें। 10 मिनट के बाद आप अपने चेहरे को धो लें। इस उपचार का इस्तेमाल आप रोज कर सकती हैं। इससे आपकी त्वचा बिल्कुल साफ हो जाएगी।


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कफ दोष के लक्षण और आयुर्वेदिक घरेलु उपचार



कफ  याने बलगम हमारे गले व फेफड़ों में जमने वाली एक श्लेष्मा होती है जो खांसी या खांसने के साथ बाहर आता है। यह फायदेमंद और नुकसानदायक दोनों है। हमारे दैनिक सांस लेने क्रिया के समय जो गन्दगी हमारे शरीर में जाती है। उसे यह अपने में चिपका लेता है जो सुबह के समय नहाते या मुंह धोते समय खांसने से बाहर निकल जाता है। इस तरह ये हमारा फायदा करती है अगर यह ज्यादा हो जाती है तो सांस लेने में तकलीफ पैदा कर देती है। छाती भारी लगती है। यहां पर यह नुकसान करती है।
घरेलु उपचार
*घी : 
बालक की छाती पर गाय का घी धीरे-धीरे मसलने से जमा हुआ कफ (बलगम) निकल जाता है।
*हल्दी :
★ कफ (बलगम) जम जाने के कारण सांस लेने में छाती कांपती हो तो 1-2 बार कपड़े से छानकर गाय के मूत्र में थोड़ी-सी हल्दी मिलाकर पिलाना कफ (बलगम)-खांसी में फायदेमंद होता है।
★ श्लेष्मा, रेशा गिरता हो तो आधा चम्मच हल्दी की फंकी गर्म दूध से सेवन करना चाहिए।
★ कफ (बलगम) के कारण सीने में घबराहट पैदा होती है तो गर्म पानी के साथ नमक घोलकर पिलाना चाहिए।
★ जुकाम, दमा में कफ (बलगम) गिरता हो तो नियमित तीन बार 2 ग्राम हल्दी की फंकी गर्म पानी से लेना चाहिए।
. अदरक : 
अदरक को छीलकर मटर के बराबर उसका टुकड़ा मुख में रखकर चूसने से कफ (बलगम) आसानी से निकल आता है।
*सरसों :

★ सरसों के तेल में नमक मिलाकर मालिश करने से छाती में जमी हुई कफ (बलगम) Cough/balgam की गांठें निकल जाती हैं।
★ सत्यानाशी के पंचाग का पांच सौ ग्राम रस निकालकर उसको आग पर उबालना चाहिए। जब वह रबड़ी की तरह गाढ़ा हो जाए तब उसमें पुराना गुड़ 60 ग्राम और राल 20 ग्राम मिलाकर, खरलकर लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की गोलियां बना लेनी चाहिए, एक गोली दिन में तीन बार गरम पानी के साथ देने से दमे में लाभ होता है।
★ सरसों के पत्तों के रस का घनक्वाथ बनाकर इसमें बैन्जोइक एसिड समान भाग मिलाकर चने के बराबर गोलियां बनाकर रख लें।
★ इसकी एक गोली दिन में तीन बार सेवन करने से श्वास रोगी को लाभ होता है।
भांगरा :
★ तिल्ली बढ़ी हुई हो, भूख न लग रही हो, लीवर ठीक से कार्य न कर रहा हो, कफ व खांसी भी हो और बुखार भी बना रहे। तब भांगरे का 4-6 मिलीलीटर रस 300 मिलीलीटर दूध में मिलाकर सुबह-शाम के समय सेवन करने से लाभ होता है।
★ टायफाइड से पीड़ित रोगी को भांगरा के रस की 2-2 चम्मच मात्रा को दिन में 2-3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
★ गोद के बच्चे या नवजात बच्चे को कफ (बलगम) अगर होता है तो 2 बूंदें भांगरे के रस में 8 बूंद शहद मिलाकर उंगली के द्वारा चटाने से कफ (बलगम) निकल जाता है।
*. आंवला :
आंवला सूखा और मुलहठी को अलग-अलग बारीक करके चूर्ण बना लें और मिलाकर रख लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण दिन में दो बार खाली पेट सुबह-शाम हफ्ते दो बार जरूर लें। इससे छाती में जमा हुआ सारा कफ (बलगम) बाहर आ जायेगा।
*बहेड़ा : 
बहेड़ा की छाल का टुकड़ा मुंह में रखकर चूसते रहने से खांसी मिटती है और कफ (बलगम) आसानी से निकल जाता है और खांसी की गुदगुदी बन्द हो जाती है।
*रूद्राक्ष : 
बच्चे की छाती में अगर ज्यादा कफ (बलगम) जम गया हो और कफ निकलने की कोई आशा नज़र न आ रही हो तो ऐसे में रूद्राक्ष को घिसकर शहद में मिलाकर 5-5 मिनट के बाद चटाने से उल्टी द्वारा कफ (बलगम) निकल जाता है।

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रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने के आहार





रोग प्रतिरोधक क्षमता हमें कई बीमारियों से सुरक्षित रखती है. छोटी-मोटी ऐसी कई बीमारियां होती हैं जिनसे हमारा शरीर खुद ही निपट लेता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने पर बीमारियों का असर जल्दी होता है. ऐसे में शरीर कमजोर हो जाता है और हम जल्दी-जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं.
हमारा इम्यून सिस्टम हमें कई तरह की बीमारियों से सुरक्ष‍ित रखता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता कई तरह के बैक्टीरियल संक्रमण, फंगस संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करता है. इन बातों से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इम्यून पावर के कमजोर होने पर बीमार होने की आशंका बढ़ जाती है. ऐसे में ये बहुत जरूरी है कि हम अपनी इम्यून पावर को बनाए रखें.
रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने के कई कारण हो सकते हैं. कई बार ये खानपान की लापरवाही की वजह से होता है, कई बार नशा करने की गलत आदतों के चलते और कई बार यह जन्मजात कमजोरी की वजह से भी होता है.
अब सवाल ये उठता है कि अगर इम्यून पावर कमजोर हो जाए तो उसे बढ़ाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? यहां ऐसे ही कुछ उपायों का जिक्र है जिन्हें आजमाकर आप एक सप्ताह के भीतर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं :
*ओट्स में पर्याप्त मात्रा में फाइबर्स पाए जाते हैं. साथ ही इसमें एंटी-माइक्राबियल गुण भी होता है. हर रोज ओट्स का सेवन करने से इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है.
* विटामिन डी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. इससे कई रोगों से लड़ने की ताकत मिलती है. साथ ही हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए और दिल संबंधी बीमारियों को दूर रखने के लिए भी विटामिन डी लेना बहुत जरूरी है.

* संक्रामक रोगों से सुरक्षा के लिए विटामिन सी का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है. नींबू और आंवले में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को दुरुस्त रखने में मददगार होता है.
* ग्रीन टी और ब्लैक टी, दोनों ही इम्यून सिस्टम के लिए फायदेमंद होती हैं लेकिन एक दिन में इनके एक से दो कप ही पिएं. ज्यादा मात्रा में इसके सेवन से नुकसान हो सकता है.
*. कच्चा लहसुन खाना भी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बूस्ट करने में सहायक होता है. इसमें पर्याप्त मात्रा में एलिसिन, जिंक, सल्फर, सेलेनियम और विटामिन ए व ई पाए जाते हैं.|
*दही के सेवन से भी इम्यून पावर बढ़ती है. इसके साथ ही यह पाचन तंत्र को भी बेहतर रखने में मददगार होती है|


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फिशर होने के कारण लक्षण और उपचार





क्या होता है फिशर-

आमतौर पर गुदा से संबधित सभी रोगों को बवासीर या पाइल्स ही समझ लिया जाता है, लेकिन इसमें कई और रोग भी हो सकते हैं। जिन्हें हम पाइल्स समझते हैं। ऐसा ही एक रोग है फिशर। इसे आयुर्वेद में गुदचीर या परिकर्तिका भी कहते हैं। इस रोग में गुदा के आसपास के क्षेत्र में एक चीरे या क्रैक जैसी स्थिति बन जाती है, जिसे फिशर कहते हैं।

फिशर होने के कारण -

फिशर होने का मूल कारण मन का कड़ा होना या कब्ज़ का होना है। जिन लोगों में कब्ज़ की समस्या होती है, उनका मल कठोर हो जाता है, जब यह कठोर मल गुदा से निकलता है तो यह चीरा या जख्म बनाता हुआ निकलता है। यह प्रथम बार फिशर बनने की संभावित प्रक्रिया है।

फिशर के लक्षण-

फिशर से पीड़ित रोगी को टॉयलेट जाते समय गुदा द्वार (Anus) बहुत अधिक दर्द होता है, यह दर्द ऐसा होता है जैसे किसी ने काट दिया हो, और यह दर्द काफी देर तक (2-4 घंटों) बना रहता है। कभी कभी तो पूरे दिन ही रोगी दर्द से परेशान रहता है। इस रोग के बढ़ जाने पर रोगी को बैठना भी मुश्किल हो जाता है। दर्द के कारण इससे पीड़ित रोगी टॉयलेट जाने से डरने लगता है।
कभी कभी गुदा में बहुत अधिक जलन होती है, जो कि कई बार तो टॉयलेट जाने के ४-५ घंटे तक बनी रहती है।
गुदा में कभी कभी खुजली भी रहती है।
फिशर के 1 साल से अधिक पुराना होने पर गुदा के ऊपर या नीचे या दोनों तरफ सूजन या उभार सा बन जाता है, जो एक मस्से या जैसे खाल लटक जाती है, ऐसा महसूस होता है। इसे बादी बवासीर या सेंटीनेल टैग (sentinel tag or sentinel piles) कहते हैं। इसको स्थायी रूप से हटाने के लिए सर्जरी या क्षार सूत्र चिकित्सा की जरुरत होती है. यह दवाओं से समाप्त नहीं होता।
टॉयलेट के समय खून कभी कभी बहुत थोडा सा आता है या आता ही नहीं है। यह खून सख्त मल (लेट्रीन) पर लकीर की तरह या कभी कभी बूंदों के रूप में हो सकता है।,

किसे होती है फिशर होने की अधिक संभावना? 

फिशर की बीमारी स्त्री, पुरुष, बच्चों, वृद्ध, या युवा किसी भी ऐसे व्यक्ति को हो सकती है, जिसे कब्ज़ रहती हो या मल कठिनाई से निकलता हो। ज़्यादातर निम्न लोगों को ये बीमारी होने की संभावना अधिक होती है : –
ऐसे लोग जिन्हें बाजार का जंक फूड जैसे पिज्जा, बर्गर, नॉन वेज, अत्यधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन खाने का शौक होता है
जो पानी कम पीते हैं
जो ज़्यादातर समय बैठे रहते हैं और किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम नहीं करते
महिलाओं मे गर्भावस्था के समय कब्ज़ हो जाती है जिससे, फिशर या पाईल्स हो सकते हैं। फिशर सामान्यतः भी महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है।

कैसे बचा जा सकता है फिशर से?


चूंकि फिशर होने का मूल कारण कब्ज़ व मल का सख्त होना होता है। अतः इससे बचने के लिए हमें भोजन संबंधी आदतों में ऐसे कुछ बदलाव करने होंगे जिससे पेट साफ रहे व कब्ज़ ना हो। जैसे: –
भोजन में फलों का सेवन
सलाद व सब्जियों का प्रचुर मात्रा में नियमित सेवन करना
पानी और द्रवों का अधिक मात्रा में सेवन करना
हल्के व्यायाम, शारीरिक श्रम, मॉर्निंग वॉक आदि का करना
छाछ (मट्ठे) और दही का नियमित सेवन करना
अत्यधिक मिर्च, मसाले, जंक फूड, मांसाहार का परहेज करना

क्या है फिशर का आयुर्वेद इलाज़? 

फिशर की तीव्र अवस्था में जब फिशर हुए ज्यादा समय न हुआ हो और कोई मस्सा या टैग न हो तो आयुर्वेद औषधि चिकित्सा से काफी लाभ मिल सकता है. साथ साथ यदि गर्म पानी में बैठकर सिकाई भी की जाए और खाने- पीने का ध्यान रखा जाये तो फिशर पूरी तरह से ठीक भी हो सकता है. आयुर्वेद में त्रिफला गुग्गुल, सप्तविंशति गुग्गुलु, आरोग्यवर्धिनी वटी, चित्रकादि वटी, अभयारिष्ट, त्रिफला चूर्ण, पंचसकार चूर्ण, हरीतकी चूर्ण आदि औषधियों का प्रयोग रोगी की स्थिति के अनुसार किया जाता है. इसके अतिरिक्त स्थानीय प्रयोग हेतु जात्यादि या कासिसादि तैल का प्रयोग किया जाता है.
पुराने फिशर में यदि सूखा मस्सा या सेंटिनल टैग फिशर के जख्म के ऊपर बन जाता है तो उसे हटाना आवश्यक होता है. तभी फिशर पूरी तरह से ठीक हो पाता है. टैग को हटाने के लिए या तो सीधा औज़ार या ब्लेड से काट देते हैं या क्षार सूत्र से बांधकर छोड़ देते हैं, 5 -7 दिनों में टैग स्वतः कटकर निकल जाता है. एक अन्य विधि जिसे अग्निकर्म कहते हैं, भी टैग को काटने के लिए अच्छा विकल्प हैं. इसमें एक विशेष यंत्र (अग्निकर्म यंत्र) की सहायता से टैग को जड़ से आसानी से अग्नि (heat ) के प्रभाव से काट दिया जाता है.
सेंटिनल टैग के निकलने के बाद चिकित्सक द्वारा गुदा विस्फ़ार (anal dilation ऐनल डाईलेशन) की कुछ सिट्टिंग्स देनी पड़ती हैं तथा कुछ औषधियाँ भी दी जाती हैं. क्षार सूत्र अग्निकर्म चिकित्सा से फिशर को पूरी तरह ठीक होने में लगभग 15 से 20 दिन लग जाते हैं|

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

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हर्निया का घरेलु आयुर्वेदिक इलाज




   पेट की मांसपेशिया या कहें पेट की दीवार कमजोर हो जाने से जब आंत बाहर निकल आती है तो उसे हर्निया कहते हैं। वहां एक उभार हो जाता है, जिसे आसानी से देखा जा सकता है। लंबे समय से खांसते रहने या लगातार भारी सामान उठाने से भी पेट की मांसपेशिया कमजोर हो जाती है। ऐसी स्थिति में हर्निया की संभावना बढ़ जाती है। इसके कोई खास लक्षण नहीं होते हैं लेकिन कुछ लोग सूजन और दर्द का अनुभव करते हैं, जो खड़े होने पर और मांसपेशियों में खिंचाव होने या कुछ भारी सामान उठाने पर बढ़ सकता है।
   हर्निया की समस्या जन्मजात भी हो सकती है। इसे कॉनजेनाइटल हर्निया कहते हैं। हर्निया एक वक्त के बाद किसी को भी हो सकता है और बिना सर्जरी के ठीक भी नहीं हो सकता। इसमें पेट की त्वचा के नीचे एक असामान्य उभार आ जाता है, जो नाभि के नीचे होता है। आंत का एक हिस्सा पेट की मांसपेशियों के एक कमजोर हिस्से से बाहर आ जाता है। इसके अलावा इंगुइंल हर्निया, फेमोरल हर्निया, एपिगास्त्रिक हर्निया, एम्ब्लाइकल हर्निया भी होता है, जो बहुत कम दिखता है।

हर्निया के घरेलू इलाज 

अगर हर्निया बड़ी हो, उसमें सूजन हो और काफी दर्द हो रहा हो तो बिना सर्जरी के इसका इलाज संभव नहीं है। लेकिन हर्निया के लक्षण पता लगने पर आप उसे घरेलू इलाज से कम कर सकते हैं। 

मुलैठी 

कफ, खांसी में मुलैठी तो रामबाण की तरह काम करता है और आजमाय हुआ भी है। हर्निया के इलाज में भी अब यह कारगर साबित होने लगा है, खासकर पेट में जब हर्निया निकलने के बाद रेखाएं पड़ जाती है तब इसे आजमाएं।

अदरक के जड़ 

अदरक की जड़ पेट में गैस्ट्रिक एसिड और बाइल जूस से हुए नुकसान से सुरक्षा करता है। यह हर्निया से हुए दर्द में भी काम करता है।

एक्यूपंक्चर

हर्निया के दर्द में एक्यूपंक्चर काफी आराम पहुंचाता है। खास नर्व पर दबाव से हर्निया का दर्द कम होता है।

बर्फ 

बर्फ से हर्निया वाले जगह दबाने पर काफी आराम मिलता है और सूजन भी कम होती है। यह सबसे ज्यादा प्रचलन में है।

बबूने का फूल 

पेट में हर्निया आने से एसिडिटी और गैस काफी बनने लगती है। इस स्थिति मेंम बबूने के फूल के सेवन से काफी आराम मिलता है। यह पाचन तंत्र को ठीक करता है और एसिड बनने की प्रक्रिया को कम करता है।

मार्श मैलो 

यह एक जंगली औषधि है जो काफी मीठी होती है। इसके जड़ के काफी औषधीय गुण हैं। यह पाचन को ठीक करता है और पेट-आंत में एसिड बनने की प्रक्रिया को कम करता है। हर्निया में भी यह काफी आराम पहुंचाता है।

हावथोर्निया 

यह एक हर्बल सप्लीमेंट है जो पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है और पेट के अंदर के अंगों की सुरक्षा करती है। यह हर्निया को निकलने से रोकने में काफी कारगर है। हावथोर्निया में Citrus Seed, Hawthorn और Fennel मिली होती है।


हर्निया में इन चीजों को नहीं करें 



हर्निया में ज्यादा तंग और टाइट कपड़ें नहीं पहनें।
बेड पर अपने तकिए को 6 इंच उपर रखें, ताकि पेट में सोते समय एसिड और गैस नहीं बन पाए।
एक ही बार ज्यादा मत खाएं, थोड़ी-थोड़ी देर पर हल्का भोजन लें।
खाने के तुरंत बाद झुकें नहीं।
शराब पीना पूरी तरह बंद कर दें।
प्रभावित जगह को कभी भी गर्म कपड़े या किसी भी गर्म पदार्थ से सेंक नहीं दें।
हर्निया में कसरत करने से परहेज करें।

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चर्म रोग नाशक आयुर्वेदिक घरेलु उपचार




अधिकतर समय धूप में बिताने वाले लोगों को चर्म रोग होने का खतरा ज्यादा होता है।
किसी एंटीबायोटिक दवा के खाने से साइड एफेट्स होने पर भी त्वचा रोग हो सकता है।
महिलाओं में मासिक चक्र अनियमितता की समस्या हो जाने पर भी उन्हे चर्म रोग होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
उल्टी, छींक, डकार, वाहर (Fart), पिशाब, और टट्टी इन सब आवेगों को रोकने से चर्म रोग होने का खतरा रहता है।
शरीर पर लंबे समय तक धूल मिट्टी और पसीना जमें रहने से भी चर्म रोग हो सकता है।
और भोजन के बाद विपरीत प्रकृति का भोजन खाने से कोढ़ का रोग होता है। (उदाहरण – आम का रस और छाछ साथ पीना)।
शरीर में ज़्यादा गैस जमा होने से खुश्की का रोग हो सकता है।
अधिक कसे हुए कपड़े पहेनने पर और नाइलोन के वस्त्र पहनने पर भी चमड़ी के विकार ग्रस्त होने का खतरा होता है।
नहाने के साबुन में अधिक मात्रा में सोडा होने से भी यह रोग हो सकता है।
खुजली का रोग ज़्यादातर शरीर में खून की खराबी के कारण उत्पन्न होता है।
गरम और तीखीं चिज़े खाने पर फुंसी और फोड़े निकल आ सकते हैं।
आहार ग्रहण करने के तुरंत बाद व्यायाम करने से भी चर्म रोग होने की संभावना रहती है।
त्वचा रोग के लक्षण 
दाद-खाज होने पर चमड़ी एकदम सूख जाती है, और उस जगह पर खुजलाने पर छोटे छोटे दाने निकल आते हैं। समान्यतः किसी भी प्रकार के चर्म रोग में जलन, खुजली और दर्द होने की फरियाद रहती है। शरीर में तेजा गरमी इकट्ठा होने पर चमड़ी पर सफ़ेद या भूरे दाग दिखने लगते हैं या फोड़े और फुंसी निकल आते हैं और समय पर इसका उपचार ना होने पर इनमें पीप भी निकलनें लगता है।
*त्वचा रोग होने पर भोजन में परहेज़ / Food Sobriety in Skin Disease in Hindi
त्वचा रोग होने पर बीड़ी, सिगरेट, शराब, बीयर, खैनी, चाय, कॉफी, भांग, गांजा या अन्य किसी भी दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन ना करें।
*बाजरे और ज्वार की रोटी बिलकुल ना खाएं। शरीर की शुद्धता का खास खयाल रक्खे।
त्वचा रोग हो जाने पर, समय पर सोना, समय पर उठना, रोज़ नहाना, और धूप की सीधी किरणों के संपर्क से दूर रहेना अत्यंत आवश्यक है।
त्वचा रोग में आयुर्वेदिक व घरेलू उपचार /
नहाते समय नीम के पत्तों को पानी के साथ गरम कर के, फिर उस पानी को नहाने के पानी के साथ मिला कर नहाने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है।
नीम की कोपलों (नए हरे पत्ते) को सुबह खाली पेट खाने से भी त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।


त्वचा के घाव ठीक करने के लिए नीम के पत्तों का रस निकाल कर घाव पर लगा कर उस पर पट्टी बांध लेने से घाव मिट जाते हैं। (पट्टी समय समय पर बदलते रहना चाहिए)।

मूली के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से किसी भी प्रकार के त्वचा रोग में राहत हो जाती है।
प्रति दिन तिल और मूली खाने से त्वचा के भीतर जमा हुआ पानी सूख जाता है, और सूजन खत्म खत्म हो जाती है।
मूली का गंधकीय तत्व त्वचा रोगों से मुक्ति दिलाता है।
मूली में क्लोरीन और सोडियम तत्व होते है, यह दोनों तत्व पेट में मल जमने नहीं देते हैं और इस कारण गैस या अपचा नहीं होता है।
मूली में मेग्नेशियम की मात्रा भी मौजूद होती है, यह तत्व पाचन क्रिया नियमन में सहायक होता है। जब पेट साफ होगा तो चमड़ी के रोग होने की नौबत ही नहीं होगी।
हर रोज़ मूली खाने से चहरे पर हुए दाग, धब्बे, झाईयां, और मुहासे ठीक हो जाते हैं।
त्वचा रोग में सेब के रस को लगाने से उसमें राहत मिलती है। प्रति दिन एक या दो सेब खाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। त्वचा का तैलीयपन दूर करने के लिए एक सेब को अच्छी तरह से पीस कर उसका लेप पूरे चहरे पर लगा कर दस मिनट के बाद चहरे को हल्के गरम पानी से धो लेने पर “तैलीय त्वचा” की परेशानी से मुक्ति मिलती है।
खाज और खुजली की समस्या में ताज़ा सुबह का गौमूत्र त्वचा पर लगाने से आराम मिलता है।
जहां भी फोड़े और फुंसी हुए हों, वहाँ पर लहसुन का रस लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
लहसुन और सूरजमुखी को एक साथ पीस कर पोटली बना कर गले की गांठ पर (कण्ठमाला की गील्टियों पर) बांध देने से लाभ मिलता है।
सरसों के तेल में लहसुन की कुछ कलीयों को डाल कर उसे गर्म कर के, (हल्का गर्म) उसे त्वचा पर लगाया जाए तो खुजली और खाज की समस्या दूर हो जाती है।
सूखी चमड़ी की शिकायत रहती हों तो सरसों के तैल में हल्दी मिश्रित कर के उससे त्वचा पर हल्की मालिश करने से त्वचा का सूखापन दूर हो जाता है।
हल्दी को पीस कर तिल के तैल में मिला कर उससे शरीर पर मालिश करने से चर्म रोग जड़ से खत्म होते हैं।
चेहरे के काले दाग और धब्बे दूर करने के लिए हल्दी की गांठों को शुद्ध जल में घिस कर, उस के लेप को, चेहरे पर लगाने से दाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।
करेले के फल का रस पीने से शरीर का खून शुद्ध होता है। दिन में सुबह के समय बिना कुछ खाये खाली पेट एक ग्राम का चौथा भाग “करेले के फल का रस” पीने से त्वचा रोग दूर होते हैं।
दाद, खाज और खुजली जैसे रोग, दूर करने के लिए त्वचा पर करेले का रस लगाना चाहिए।


रुई के फाये से गाजर का रस थोड़ा थोड़ा कर के चहेरे और गरदन पर लगा कर उसके सूखने के बाद ठंडे पानी से चहेरे को धो लेने से स्किन साफ और चमकीली बन जाती है।

-प्रति दिन सुबह एक कप गाजर का रस पीने से हर प्रकार के त्वचा रोग दूर होते हैं। सर्दियों में त्वचा सूखने की समस्या कई लोगों को होती है, गाजर में विटामिन A भरपूर मात्रा में होता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने से त्वचा का सूखापन दूर होता है।
-पालक और गाजर का रस समान मात्रा में मिला कर उसमें दो चम्मच शहद मिला कर पीने से, सभी प्रकार के चर्म रोग नाश होते हैं।
-गाजर का रस संक्रमण दूर करने वाला और किटाणु नाशक होता है, गाजर खून को भी साफ करता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने वाले व्यक्ति को फोड़े फुंसी, मुहासे और अन्य चर्म रोग नहीं होते हैं।
-काली मिट्टी में थोड़ा सा शहद मिला कर फोड़े और फुंसी वाली जगह पर लगाया जाए तो तुरंत राहत हो जाती है।
-फुंसी पर असली (भेग रहित) शहद लगाने से फौरन राहत हो जाती है।
शहद में पानी मिला कर पीने से फोड़े, फुंसी, और हल्के दाग दूर हो जाते हैं।
-सेंधा नमक, दूध, हरड़, चकबड़ और वन तुलसी को समान मात्रा में ले कर, कांजी के साथ मिला कर पीस लें। तैयार किए हुए इस चूर्ण को दाद, खाज और खुजली वाली जगहों पर लगा लेने से फौरन आराम मिल जाता है।
-हरड़ और चकबड़ को कांजी के साथ कूट कर, तैयार किए हुए लेप को दाद पर लगाने से दाद फौरन मीट जाता है।
-पीपल की छाल का चूर्ण लगा नें पर मवाद निकलने वाला फोड़ा ठीक हो जाता है। चार से पाँच पीपल की कोपलों को नित्य सुबह में खाने से एक्ज़िमा रोग दूर हो जाता है। (यह प्रयोग सात दिन तक लगातार करना चाहिए)।
-नीम की छाल, सहजन की छाल, पुरानी खल, पीपल, हरड़ और सरसों को समान मात्रा में मिला कर उन्हे पीस कर उसका चूर्ण बना लें। और फिर इस चूर्ण को गौमूत्र में मिश्रित कर के त्वचा पर लगाने से समस्त प्रकार के जटिल त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
-अरण्डी, सौंठ, रास्ना, बालछड़, देवदारु, और बिजौरे की छड़ इन सभी को बीस-बीस ग्राम ले कर एक साथ पीस लें। उसके बाद इन्हे पानी में मिला कर लेप तैयार कर लें और फिर उस लेप को त्वचा पर लगा लें। इस प्रयोग से समस्त प्रकार के चर्म रोग दूर हो जाते हैं।
-अजवायन को पानी में उबाल कर जख्म धोने से उसमे आराम मिल जाता है।
-गर्म पानी में पिसे हुए अजवायन मिला कर, उसका लेप दाद, खाज, खुजली, और फुंसी पर लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
-नमक मिले गर्म पानी से त्वचा को धोने या सेक करने से हाथ-पैर और ऐडियों की दरारें दूर होती हैं और दर्द में फौरन आराम मिल जाता है।
-खीरा खाने से चमड़ी के रोग में राहत मिलती है। ककड़ी के रस को चमड़ी पर लगाने से त्वचा से मैल दूर होता है, और चेहरा glow करता है। ककड़ी का रस पीने से भी शरीर को लाभ होता है।


-प्याज को आग में भून कर फोड़ों और फुंसियों और गाठों पर बांध देने से वह तुरंत फुट जाती हैं। अगर उनमें मवाद भरा हों तो वह भी बाहर आ निकलता है। हर प्रकार की जलन, सूजन और दर्द इस प्रयोग से ठीक हो जाता है। इस प्रयोग से infection का जख्म भी ठीक हो जाता है। प्याच को कच्चा या पक्का खाने से त्वचा में निखार आता है।

-प्रति दिन प्याज खाने वाले व्यक्ति को लू (Heat stroke) कभी नहीं लगती है।
-पोदीने और हल्दी का रस समान मात्रा में मिश्रित कर के दाद खाज खुजली वाली जगहों पर लगाया जाए तो फौरन राहत मिल जाती है।
*भोजन में अचार, नींबू, नमक, मिर्च, टमाटर तैली वस्तुएं, आदि चीज़ों का सेवन बिलकुल बंद कर देना चाहिए। (चर्म रोग में कोई भी खट्टी चीज़ खाने से रोग तेज़ी से पूरे शरीर में फ़ेल जाता है।)।
*अगर खाना पचने में परेशानी रहती हों, या पेट में गैस जमा होती हों तो उसका उपचार तुरंत करना चाहिए। और जब यह परेशानी ठीक हो जाए तब कुछ दिनों तक हल्का भोजन खाना चाहिए।
*खराब पाचनतत्र वाले व्यक्ति को चर्म रोग होने के अधिक chances होते हैं।
*त्वचा की किसी भी प्रकार की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को हररोज़ रात को सोने से पूर्व एक गिलास हल्के गुनगुने गरम दूध में, एक चम्मच हल्दी मिला कर दूध पीना चाहिए।
-पिसा हुआ पोदीना लेप बना कर चहेरे पर लगाया जाए और फिर थोड़ी देर के बाद चहेरे को ठंडे पानी से धो लिया जाए तो चहेरे की गरमी दूर हो जाती है, तथा स्किन चमकदार बनती है।
-गरम पानी में नमक मिला कर नहाने से सर्दी के मौसम में होने वाले त्वचा रोगों के सामने रक्षण मिलता है। और अगर रोग हो गए हों तो इस प्रयोग के करने से रोग समाप्त हो जाते हैं।
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वात रोगों के प्राकृतिक ,आयुर्वेदिक घरेलू उपचार




वात, पित्त और कफ तीनों में से वात सबसे प्रमुख होता है क्योंकि पित्त और कफ भी वात के साथ सक्रिय होते हैं। शरीर में वायु का प्रमुख स्थान पक्वाशय में होता है और वायु का शरीर में फैल जाना ही वात रोग कहलाता है। हमारे शरीर में वात रोग 5 भागों में हो सकता है जो 5 नामों से जाना जाता है।
वात के पांच भाग निम्नलिखित हैं-
• उदान वायु - यह कण्ठ में होती है।
• अपान वायु - यह बड़ी आंत से मलाशय तक होती है।
• प्राण वायु - यह हृदय या इससे ऊपरी भाग में होती है।
• व्यान वायु - यह पूरे शरीर में होती है।
• समान वायु - यह आमाशय और बड़ी आंत में होती है।
वात रोग के प्रकार :-
आमवात के रोग में रोगी को बुखार होना शुरू हो जाता है तथा इसके साथ-साथ उसके जोड़ों में दर्द तथा सूजन भी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगियों की हडि्डयों के जोड़ों में पानी भर जाता है। जब रोगी व्यक्ति सुबह के समय में उठता है तो उसके हाथ-पैरों में अकड़न महसूस होती है और जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है। जोड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने से रोगी के शरीर के अंगों की आकृति बिगड़ जाती है।

सन्धिवात :-

जब आंतों में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तो शरीर की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द तथा अकड़न होने लगती है।

गाउट :-

गाउट रोग बहुत अधिक कष्टदायक होता है। यह रोग रक्त के यूरिक एसिड में वृद्धि होकर जोड़ों में जमा होने के कारण होता है। शरीर में यूरिया प्रोटीन से उत्पन्न होता है, लेकिन किसी कारण से जब यूरिया शरीर के अंदर जल नहीं पाता है तो वह जोड़ों में जमा होने लगता है और बाद में यह पथरी रोग का कारण बन जाता है।

मांसपेशियों में दर्द:-

मांस रोग के कारण रोगी की गर्दन, कमर, आंख के पास की मांस-पेशियां, हृदय, बगल तथा शरीर के अन्य भागों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण रोगी के शरीर के इन भागों में दर्द होने लगता है। जब इन भागों को दबाया जाता है तो इन भागों में तेज दर्द होने लगता है।
   इस रोग के कारण हडि्डयों को जोड़ने वाली तथा जोड़ों को ढकने वाली लचीली हडि्डयां घिस जाती हैं तथा हडि्डयों के पास से ही एक नई हड्डी निकलनी शुरू हो जाती है। जांघों और घुटनों के जोड़ों पर इस रोग का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण इन भागों में बहुत तेज दर्द होता है।


वात रोग के लक्षण :-

• रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द रहता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के जोड़ों में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का मुंह सूखने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी को डकारें या हिचकी आने लगती है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में खुश्की तथा रूखापन होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की त्वचा का रंग मैला सा होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति को अपने शरीर में जकड़न तथा दर्द महसूस होता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के सिर में भारीपन होने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लगता है तथा उसका पेट भारी-भारी सा लगने लगता है।

वात रोग होने का कारण :-

• वात रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पक्वाशय, आमाशय तथा मलाशय में वायु का भर जाना है। 
• जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।
• जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।
• ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
• भोजन करने के बाद भोजन के ठीक तरह से न पचने के कारण भी वात रोग हो सकता है।

• जब अपच के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है और अजीर्ण के कारण कब्ज होता है तथा इन सबके कारण गैस बनती है तो वात रोग पैदा हो जाता है।
• पेट में गैस बनना वात रोग होने का कारण होता है।
• जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।



• जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।

• ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।

वात रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-

• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए। इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।
• कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।
• कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है। 
• शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है। 
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। 
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। फिर इसके बाद इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए। 




• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए। इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। 

• वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को एक टब में गरम पानी लेकर उसमें आधा चम्मच नमक डाल लेना चाहिए। इसके बाद जब टब का पानी गुनगुना हो जाए तब रोगी को टब के पास एक कुर्सी लगाकर बैठ जाना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को अपने पैरों को गरम पानी के टब में डालना चाहिए और सिर पर एक तौलिये को पानी में गीला करके रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अपनी गर्दन के चारों ओर कंबल लपेटना चाहिए। इस प्रकार से इलाज करते समय रोगी व्यक्ति को बीच-बीच में पानी पीना चाहिए तथा सिर पर ठंडा पानी डालना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी को कम से कम 20 मिनट में ही शरीर से पसीना निकलने लगता है जिसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वात रोग ठीक होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए 2 बर्तन लें। एक बर्तन में ठंडा पानी लें तथा दूसरे में गरम पानी लें और दोनों में 1-1 तौलिया डाल दें। 5 मिनट बाद तौलिये को निचोड़कर गर्म सिंकाई करें। इसके बाद ठंडे तौलिये से सिंकाई करें। इस उपचार क्रिया को कम से कम रोजाना 3 बार दोहराने से यह रोग ठीक होने लगता है।
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होठों को निखारने के घरेलू उपाय






   खूबसूरत गुलाबी होठ की चाहत सभी महिलाओं को होती है, लेकिन कम ही ऐसी होती हैं, जिन्हें ये मिल पाता है. गुलाबी होठ पाने के लिए महिलाएं कई तरह के कॉस्मेटिक प्रोडक्ट तक खरीद लेती हैं पर फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ता है. आगे की स्लाइड में हम आपको कुछ घरेलू उपचार बताएंगे, जिससे आपके होंठ गुलाबी हो सकते हैं:
   नींबू के रस को रोज रात को सोने से पहले अपने होठ में लगाएं. इस उपाय को कम से कम दो महीने करें.
नारियल पानी, खीरे का रस और नींबू के रस को मिलाकर होठ पर लगाने से होठों का कालापन दूर होता है.

   चुकंदर का रस लगाने से भी होठों का रंग गुलाबी होता है. बीट में लाल रंग प्राकृतिक रूप में मौजूद होता है, जिससे होंठ गुलाबी होते हैं. बीटरूट का रस होठ के कालेपन को भी दूर करता है.
सोने से पहले ग्लीसरीन, गुलाब जल और केसर को मिलाकर होठ में लगाने से भी होंठ निखरते हैं.
  

हल्दी पाउडर को मलाई के साथ मिलाकर होठ में लगाने से भी होंठों का कालापन दूर होता है.
अनार के दानों को मलाई के साथ पीसकर होठों पर लगाएं. इस उपाय को कुछ दिन करें. आपको फर्क दिखने लगेगा. होंठ गुलाबी और खूबसूरत हो जाएंगे|
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