Wednesday, June 21, 2017

मिर्गी रोग जड़ से नष्ट करें योग आसन और प्राणायाम से




   मिर्गी एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर है। इस बीमारी से पीडि़त व्‍यक्ति को बार-बार दौरे पड़ते हैं। व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। इस समस्या में रोगी को शरीर में खिंचाव होने लगता है इसके अलावा हाथ तथा पैरो में अकड़न होने लगती है। और वह व्यक्ति मूर्छित होकर गिर पड़ता है। योग बहुत प्रभावशाली है, मिर्गी में भी लोगो को इसका फायदा मिलता है। विशेषज्ञों की मानें तो योग के जरिये मिर्गी को भी ठीक किया जा सकता है। इसके लिए अनुलोम-विलोम को सबसे बेहतर माना जाता है।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम

अनुलोम विलोम प्राणायम से मिर्गी का इलाज किया जा सकता है। इसे करने के लिए सबसे पहले सुखासन में बैठ जाये। अब इस आसान की शुरुवात नाक के बाये छिद्र से करे। सर्वप्रथम उंगली की सहायता से नाक का दाया छिद्र बंद करें व बाये छिद्र से लंबी सांस लें। इसके बाद बायें छिद्र को बंद करे, तथा दायें वाले छिद्र से लम्बी सांस को छोड़े। इस पूरी प्रक्रिया को कम से कम 10-15 मिनट तक दोहराइएं। साँस को छोड़ने और लेने का काम सहजता से करे। गलत तरीके से करने पर नुकसान हो सकता है।

योग के अन्य आसन  प्राणायाम जो मिर्गी में फायदेमंद


कपालभाति प्राणायाम


    कपालभाति प्राणायाम दिन में सुबह के समय, सूर्योदय के पहले करने पर अधिक लाभ होता है। इस प्राणायाम अभ्यास को नया नया शुरू करने वाले व्यक्ति को दो से तीन मिनट में थकान महसूस हो सकती है| परंतु एक या दो हफ्तों के अभ्यास के बाद कोई भी सामान्य व्यक्ति लगातार पांच मिनट से अधिक समय तक कपालभाति प्राणायाम करनें के लिए सक्षम हो जाता है।
कपालभाति प्राणायाम हमेशा शुद्ध वातावरण में ही करना चाहिए। पद्मासन में बैठ कर इस आसान को करने पर अधिक लाभ होता है।
कपालभाति प्राणायाम करने के लिए किसी अच्छी शांत और स्वच्छ जगह का चयन करके, वहाँ पर आसन बिछा कर पद्मासन में बैठ जाए।
अब आगे कपालभाति प्राणायाम की शुरुआत करने के लिए श्वास सामान्य गति से शरीर के अंदर की और लेनी होती है। और तेज़ गति से बाहर निकालनी होती है। यह पूरी प्रक्रिया एक रिद्म में होनी चाहिए।
प्रत्येक सेकंड में एक बार पूरी सांस को तेजी के साथ नाक से बाहर छोड़ें, इससे पेट अन्दर चला जाएगा। कपालभाती में प्रत्येक सेकंड में एक बार सांस को तेजी से बाहर छोड़ने के लिए ही प्रयास करना होता है| साँस को छोड़ने के बाद, सांस को बाहर न रोककर बिना प्रयास किये सामान्य रूप से सांस को अन्दर आने दें| प्रत्येक सेकंड में साँस को तेजी से बाहर छोड़ते रहे| इस हिसाब से एक मिनट में सांठ बार और कुल पाँच मिनट में तीनसौ बार आप वायु (सांस) बाहर फैंकनें की क्रिया करें। (थकान महसूस होने पर बीच बीच में रुक कर विश्राम अवश्य लेते रहें)।
शुरुआत में अगर एक मिनट में साठ बार सांस बाहर फैंकने में थकान हों, तो एक मिनट में तीस से चालीस बार सांस बाहर निकालें और अभ्यास बढ्ने के साथ साथ गति को प्रति मिनट साठ सांस तक ले जायें।
कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास लंबे समय तक सही तरीके से करने पर इसकी अवधि पांच मिनट से पंद्रह मिनट तक बढ़ाई जा सकती है। यानी की पांच-पांच मिनट के तीन चरण।
AIDS, कैंसर, एलर्जी, टीबी, हेपीटाइटस और दूसरी ऐसी जटिल बीमारी के रोगी को कपालभाति प्राणायाम दिन में तीस मिनट तक करना चाहिए। और अगर ऐसा रोगी दिन में सुबह और शाम दोनों समय कपालभाति प्राणायाम तीस तीस मिनट कर सके तो और भी बहेतर होगा।
स्वस्थ व्यक्ति कपालभाति प्राणायाम को प्रति दिन एक ही बार करे तो भी उसे बहुत अच्छे शारीरिक और मानसिक लाभ होता है।


भ्रामरी प्राणायाम 

सर्वप्रथम किसी स्वच्छ जगह का चयन करके, आसन बिछा कर पद्मासन अथवा सुखासन में बैठ जायें। मन को शांत कर के अपनी सांस सामान्य कर लें।
अब अपने दोनों हाथों को बगल में अपने दोनों कंधों के समांतर फैला लें, और फिर अपनी कोहनियों को मोड़ कर हाथों को अपने कानों के पास ले आयें। फिर अपनें दोनों नेत्रों (आँखों) को बंद कर लें|
उसके बाद अपने हाथों के दोनों अँगूठों से अपने दोनों कान बंद कर दें। (Note- भ्रामरी प्राणायाम करते वक्त कमर, गरदन और मस्तक स्थिर और सीधे रखने चाहिए)।
अब अपने दोनों हाथों की पहली उंगली को आँखों की भौहों के थोड़ा सा ऊपर लगा दें। और बाकी की तीन तीन उँगलियाँ अपनी आंखों पर लगा दीजिये।
अपने दोनों हाथों को ना तो अधिक दबाएं और ना ही एक दम फ्री छोड़ दें। अपने नाक के आस-पास दोनों तरफ से लगी हुई तीन-तीन उँगलियों से नाक पर हल्का सा दबाव बनायें।
दोनों हाथों को सही तरीके से लगा लेने के बाद अपने चित्त (मन) को अपनी दोनों आंखों के बीछ केन्द्रित करें। (यानि की अपना ध्यान अज्न चक्र पर केन्द्रित करें)।
और अब अपना मुह बिल्कुल बंद रखें और अपने नाक के माध्यम से सामान्य गति से सांस अंदर लें| फिर नाक के माध्यम से ही मधु-मक्खी जैसी आवाज़ (humming sound) करते हुए सांस बाहर निकालें। (Important- यह अभ्यास मुह को पूरी तरह से बंद कर के ही करना है)।
सांस बाहर निकालते हुए अगर “ॐ” का उच्चारण किया जाए तो इस प्राणायाम का लाभ अधिक बढ़ जाता है।
सांस अंदर लेने का समय करीब 3-5 सेकंड तक का होना चाहिए और बाहर छोड़ने का समय 15-20 सेकंड तक का होना चाहिए।
भ्रामरी प्राणायाम कुर्सी(chair) पर बैठ कर भी किया जा सकता है। परंतु यह अभ्यास सुबह के समय में सुखासन या पद्मासन में बैठ कर करने से अधिक लाभ होता है।






ताड़ासन 

इसके लिए सबसे पहले आप खड़े हो जाए और अपने कमर एवं गर्दन को सीधा रखें।
अब आप अपने हाथ को सिर के ऊपर करें और सांस लेते हुए धीरे धीरे पुरे शरीर को खींचें।
खिंचाव को पैर की अंगुली से लेकर हाथ की अंगुलियों तक महसूस करें।



इस अवस्था को कुछ समय के लिए बनाये रखें ओर सांस ले सांस छोड़े।
फिर सांस छोड़ते हुए धीरे धीरे अपने हाथ एवं शरीर को पहली अवस्था में लेकर आयें।
इस तरह से एक चक्र पूरा हुआ।
कम से कम इसे तीन से चार बार प्रैक्टिस करें।


नटराज आसान

सबसे पहले आराम की मुद्रा में खड़े हो जाएं.
शरीर का भार बाएं पैर पर स्थापित करें और दाएं घुटने को धीरे धीरे मोड़ें और पैर को ज़मीन से ऊपर उठाएं.
दाएं पैर को मोड़कर अपने पीछे ले जाएं.
दाएं हाथ से दाएं टखने को पकड़ें.
बाएं बांह को कंधे की ऊँचाई में उठाएं.
सांस छोड़ते हुए बाएं पैर को ज़मीन पर दबाएं और आगे की ओर झुकें.
दांए पैर को शरीर से दूर ले जाएं.
सिर और गर्दन को मेरूदंड की सीध में रखें.
इस मुद्रा में 15 से 30 सेकेण्ड तक बने रहें.



वृक्षासन
  • आप सबसे पहले सीधे खड़े हों जाएं या ताड़ासन में आ जाएं।
  • पैरों के बीच की जगह को कम करें और हाथों को सीधा रखें।
  • दायां पैर उठाएं और दाएं हाथ से टखना पकड़ लें।
  • दाईं एड़ी को दोनों हाथों की सहायता से बाईं जांघ के ऊपरी भाग यानी जोड़ पर रखें।
  • पंजों की दिशा नीचे की ओर हो और दाएं पांव के तलवे से जांघ को दबाएं।
  • ध्यान रहे मुड़े हुए पांव को दूसरे पांव के साथ समकोण बनाए।
  • अब हथेंलियों और अंगुलियों को प्रार्थना की मुद्रा में जोड़ें, ऊपर उठाएं और छाती पर रखें फिर धीरे-धीरे उन्हेंं उठाकर सिर से ऊपर ले जाएं।
  • आपके दोनों हाथ सिर से सटे होनी चाहिए।
  • कुछ समय तक शरीर का संतुलन बनाए रखें और इस अवस्था अपने हिसाब से धारण किये हुए रहे।
  • अब हाथ नीचे ले जाएं और मूल अवस्थाे में लौट आएं।
  • फिर इसी प्रक्रिया को दूसरे तरफ से करें।
  • यह एक चक्र हुआ।
  • इस तरह से आप 3 से 5 चक्र करें।

हस्तपादासन

सबसे पहले जमीन पर एक आसन बिछा लें।
इसके बाद सीधे खड़े हो जाएं। अब पैरों को एक दूसरे से दूर ले जाएं।
इसके बाद अपने दोनों हाथों का एक सीध में उपर की तरफ ले जाइये।



अब आप अपने हाथों को धीरे.धीरे पैरों तक ले जाएं और जमीन को छूएं और अपने सिर को घुटनों से लगाने की कोशिश करें।
साथ ही साथ अपनी उंगलियों के पोरों के जरिए भी जमीन को छूने की कोशिश करें।



जब आप हस्तपादासन योग को कर रहे हों तब अपनी सासों को सामान्य ही रखें।
आसन को पहले बहुत ही आराम से करें।
हस्तपादासन को दिन में दो बार करें।

सर्वांगासन

सर्वांगासन  करने की विधि-
अब बात आती है कि इस आसन को आसानी से कैसे किया जाए। पहले पहले लोग इस आसन को करने से घबराते हैं लेकिन नीचे दिए गए तरीके का अनुसरण करते हुए आप इसको बहुत सरलता के साथ कर सकते हैं।
पीठ के बल लेट जाएं।
हाथों को जांघों के पास रखें।
अब आप अपनें पैरों को पहले 30 डिग्री पर फिर 60 डिग्री और उसके बाद 90 डिग्री तक ले कर जाएं।



हाथों को दबाकर नितंब ऊपर की ओर उठाते हुए पांवों को सिर की ओर लाएं।

सहारे के लिए हथेलियां पीठ पर रखें।
आप अपने शरीर को सीधा इस तरह से करते हैं कि ठोड़ी छाती पर आकर लगें।
ठोड़ी छाती पर इस तरह से लगाते हैं की गर्दन के थाइरोइड वाले हिस्से में दबाब पड़े।
अपने हिसाब से इस मुद्रा को धारण करें।
फिर पैरों को पहले 60 डिग्री पर फिर 30 डिग्री और धीरे-धीरे मूल अवस्था में लौटें।
जब आप नीचे लौटते हैं तो अपने हाथों को नितंब के नीचे लाएं ताकि आप अपने शरीर को बेगैर किसी चोट के आरंभिक अवस्था में ला सके।
हलासन
हलासन योग को करने का नियम:How to do Halasan
एक समतल सतह पर चादर को बिछाकर आराम से बैठ जाए|
सर्वांगासन की मुद्रा की तरह इस आसन में भी आपको जमीन पर पीठ के बल लेटना हैं।
दोनों पैरों को आपस में मिलाये।
अपनी हथेलियों को कमर के नजदीक जमीन पर रखे।



शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दे ।
अब अपनी साँस को अन्दर की ओर खींचे और पेट को अन्दर की और कमर से मिलाने का प्रयास करें अब पैरों को धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठाये।
दोनों पैर ऊपर ले जाते समय धीरे-धीरे साँस को छोड़ते रहें और पैरों को सिर के ऊपर से गुजार कर सिर के पीछे तक ले जाने का प्रयास करें|
शुरुआत में इस स्थिति में आने के लिए शरीर की मांसपेशियों पर जोर पड़ता हैं पर निरंतर अभ्यास से आप इस क्रिया को करने में सक्षम हो जाते हैं
अपने क्षमता के अनुसार इस स्तिथि में रुकने के पश्चात , धीरे-धीरे सामान्य मुद्रा में आ जाएँ|
ये ध्यान रहे की इस संपूर्ण क्रिया में आपके घुटने न मुड़े।


पवन-मुक्तासन

पवनमुक्तासन करने की प्रक्रिया
अपनी पीठ के बल लेट जाएँ और पैरों को साथ में कर ले और हाथों को शरीर के साथ जोड़ लें|
गहरी लंबी साँस अंदर लें और साँस छोड़ते हुए अपने दाएँ घुटने को अपनी छाती के पास ले कर आएँ| जंघा को हाथों से पकड़ते हुए पेट पर दबाएँ|
दोबारा से एक लंबी गहरी साँस ले और छोड़ते हुए अपने सर और छाती को ज़मीन से उठाएँ| अपनी ठोड़ी को अपने दाएँ घुटने से लगाएँ|
आसन में रहें और लंबी गहरी साँसे लेते रहें|
ध्यान दे: साँस छोड़ते हुए अपने घुटने को हाथों से कस कर पकड़ लें| छाती पर दबाव बनाएँ| साँस लेते हुए, ढीला छोड़ दे|
साँस छोड़ते हुए, वापस ज़मीन पर आ जाएँ और विश्राम करें|
यह पूरी प्रक्रिया बाएँ पैर के साथ करें और फिर दोनों पैरों के साथ करें|
चाहे तो आगे-पीछे थोड़ा झूल सकते है| दाएँ-बाएँ भी ३-५ बार झूल सकते हैं और उसके बाद विश्राम करें|








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