31.5.17

बरबेरिस वल्गेरिस के गुण लक्षण उपयोग





व्यापक-लक्षण
दर्द का किसी केन्द्र-स्थल से चारों तरफ फैलना पेशाब करते समय वृद्धि
गुर्दे का दर्द थकावट से रोग का बढ़ना
पित्त-पथरी का दर्द हरकत से रोग का बढ़ना
गठिये का चलता-फिरता दर्द बैठने के बाद उठने से बढ़ना
कमर का दर्द
दर्द का किसी केन्द्र-स्थल से चारों तरफ फैलना
यह इसका मुख्य लक्षण है जो इसी दवा में पाया जाता है। पथरी हो, गठिया हो-पथरी में दर्द गुर्दे से, विशेषकर बांये गुर्दे से उठ कर मूत्राशय, मूत्र-नली आदि सब जगह फैल जायगा; गठिये में किसी एक जोड़ में दर्द ठहरा होगा परन्तु वहां से चारों तरफ फैल रह होगा। बर्बेरिस पथरी तथा गठिये की दवा इसी लक्षण पर है क्योंकि पथरी में गुर्दे से दर्द चारों तरफ फैल जाता है। गठिये में यह दवा ऐसे गठिये के लिये है जिसमें दर्द किसी एक जोड़ पर ठहरा हुआ वहां से चारों तरफ फैल रहा होता है, बर्बेरिस के दर्द की विशेषता यह है कि यह दर्द किसी एक दिशा में नहीं जाता, चारों तरफ फैलता है।

गुर्दे का दर्द के लिए होम्योपैथिक दवा

गुर्दे में छोटी-छोटी पथरियां बन जाती हैं और उनमें से कोई छोटी-सी पथरी, गुर्दे से मूत्राशय तक मूत्र ले जाने वाली प्रणालिका से होती हुई, मूत्राशय की तरफ चल देती है। इस प्रणालिका में से गुजरती हुई वह बेहद दर्द पैदा कर देती है। उस समय गुर्दे से दर्द उठ कर चारों तरफ फैल जाता है। दर्द एक ओर गुर्दे की तरफ और दूसरी ओर मूत्राशय, मूत्र-नली की तरफ जाता है, अण्डकोश तक पहुंच सकता है। ऐसी अवस्था में बर्बेरिस आश्चर्यजनक तौर पर पथरी को निकाल का दर्द को शान्त कर देता है। इस दर्द का लक्षण है : पथरी के केन्द्र-स्थल से उठकर दर्द का चारों तरफ फैल जाना। गुर्दे के दर्द में सारसापैरिला भी उत्तम औषधि है।
पित्त-पथरी का दर्द के लिए होम्योपैथिक दवा
पित्त-पथरी में भी यही लक्षण होने पर बर्बेरिस इस दर्द का शमन कर देता है। यह दर्द भी पीठ में किसी एक स्थल को केन्द्र बना कर उठता है और चारों तरफ फैल जाता है।



गठिये का चलता-फिरता दर्द और होम्योपैथिक दवा

   गठिये में बैनजोइक एसिड तथा बर्बेरिस में बहुत समानता है। दोनों में यूरिक-ऐसिड अंगुलियों की गांठों में बैठ जाता है, परन्तु शिकायत सारे शरीर में चक्कर काट रही होती है। स्नायु-रज्जुओं में दर्द घूमा करती है। अंगुलियों तथा अंगूठों में बैठ-बैठे यकायक दर्द हुआ करती है। गठिये के रोग में गुर्दे, जिगर और हृदय पर भी कुछ-न-कुछ असर पहुंच जाया करता है। जहां तक गुर्दे का संबंध है, गठिये की शिकायत में कभी पेशाब ज्यादा आने लगता है, कभी कम हो जाता है, हल्का पेशाब, भारी रंगदार पेशाब। ऐसी अवस्था बैनजोइक ऐसिड तथा बर्बेरिस दोनों में पायी जाती है।
  जहां तक बर्बेरिस का प्रश्न है इसमें शरीर के किसी भी हिस्से में काटने का-सा दर्द हो सकता है, परन्तु यह दर्द स्थान बदलता रहता है। जब बर्बेरिस का रोगी बैठने लगेगा तब कमर के दर्द के मारे कहेगा – ‘ओह! कुछ देर बाद कहेगा घुटने में दर्द हो रहा है, फिर अंगूठे में, फिर सिर में-कभी दर्द यहां, कभी वहां, सारे शरीर में दर्द भ्रमण किया करता है। इस अवस्था के देर तक चलते रहने पर यूरिक ऐसिड के तलछट अंगुलियों में बैठ जाते हैं और रोगी की अंगुलियां छूने से भी दर्द किया करती हैं। जब रोग अंग-विशेष में बैठ जाता है, तब इस रोग की औषधि का निर्वाचन लीडम, सल्फर, एसक्युलस तथा लाइकोपोडियम में से करना होगा क्योंकि बर्बेरिस की हालत में तो दर्द घूमा करता है, किसी अंग-विशेष में ठहर नहीं जाता। चलता-फिरता दर्द इस औषधि की विशेषता है।
कमर का दर्द और होम्योपैथिक दवा
कमर का दर्द बर्बेरिस औषधि की विशेषता है। बैठी हुई हालत से उठने पर उसे विशेष दर्द होता है। रोगी को ऐसा लगता है कि कमर अकड़ गई है, सुन्न हो गई है। रस टॉक्स में भी यह लक्षण है।



सिर में सुन्नपन का होम्योपैथिक दवा

इसका एक विलक्षण-लक्षण यह है कि रोगी अनुभव करता है कि सिर बड़ा हो गया है। हर समय सिर पर ऐसे हाथ फेरता है मानो सिर पर से टोपी उतार रहा हो। सिर पर टोपी नहीं होती, परन्तु उसे ऐसे लगता है जैसे सिर पर टोपी चढ़ी हो। कई रोगी कहा करते हैं कि उन्हें सिर में सुन्नपन अनुभव होता है। सुन्नपन हो या सिर पर टोपी ओढ़ने का अनुभव हो-ये लक्षण बर्बेरिस के है।
गुर्दे में बुलबुला उठना
गुर्दे के स्थान में बुलबुला-सा उठने के समान बजबजाहट अनुभव करना भी इसका एक बर्बेरिस दवा का लक्षण है।
फिस्चुला के ऑपरेशन के बाद रोग होने की होम्योपैथिक दवा
कभी-कभी मल-द्वार के फिस्चुला के ऑपरेशन के बाद गुर्दे, जिगर या हृदय के रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। अगर इस समय चलते-फिरते दर्द उत्पन्न हो जायें, तो रोग बर्बेरिस से ठीक जो जायेगा।
आंख से दर्द का भिन्न दिशाओं में जाना
कभी-कभी आंख पर भी गठिये का दर्द आक्रमण कर देता है। आंख से दर्द भिन्न-भिन्न दिशाओं को जाता है। जैसा हम पहले लिख चुके हैं बर्बेरिस के दर्द की यह विशेषता है कि यह दर्द किसी एक दिशा की तरफ नहीं जाता, चारों तरफ फैलता है।



मुख्य प्रयोग- यह औषधि मुख्य
 रूप से मूत्र-तंत्र पर प्रभावी है । रोगलक्षणों का बदलना, रोग का स्थान बदलना, कभी प्यास-कभी बिल्कुल प्यास न हो- इस प्रकार अदल-बदलकर लक्षण उत्पन्न होते हैं। कभी भूख-कभी भूख का अभाव, पेडू में रक्त-संचय और बवासीर का रोग । गुर्दे के समीप दर्द अधिक हो । इससे पथरी रोग और मूत्राशय की जुकामी दशा में लाभ होता है । मूत्र का लक्षण ही इसका प्रमुख लक्षण है । मूत्र-त्याग के बाद मूत्र की कुछ बूंदें रह जाने का अनुभव होना, मूत्र में जलन, गाढ़ा-श्लेष्मायुक्त मूत्र होना, लाल रंग की मैदा की तली का मूत्र में नीचे जमना, गुर्दे में दर्द, मूत्र त्यागते समय कमर में और जाँघों में दर्द, बार-बार मूत्र का वेग होना। पेशाब न करते समय भी मूत्र-नली में जलन होना आदि लक्षणों में इस दवा के प्रयोग से बहुत लाभ होता है । यकृत और मूत्रतन्त्र के विकार में पंजरे के नीचे दर्द होना, यकृत में दर्द होना तथा पित्त-पथरी के साथ उदर-शूल के लक्षणों में मूल अर्क को 4-5 बूंद की मात्रा में गुनगुने पानी में मिलाकर प्रतिदिन 3-4 बार दें । के प्रयोग से उसमें कोई लाभ न हो तब बर्बोरिस Q की 4-5 बूंदें हर 1520 मिनट बाद दें- इस प्रकार कुछ मात्रायें देने से दर्द तुरन्त शान्त हो जायेगा। यकृत में रक्तसंचय के साथ मूत्रनली, जाँघ, कमर और पुट्ठे में दर्द होने की दशा में यह दवा लाभप्रद है । पित्त-पथरी के कारण होने वाले हरितपाण्डु रोग में इसके मदरटिंक्चर की 5-5 बूंद प्रतिदिन 3 बार देना लाभकारी है ।
मूत्रनली से पथरी निकलते वक्त तीव्र पीड़ा में कमर और तलपेट पर गरम जल की सेंक करनी चाहिये और वर्वेरिस Q की 5 बूंद 15-15 मिनट के अन्तर से देनी चाहिये। 8-10 मात्रायें लेने पर भी यदि लाभ न हो तो इसी औषधि की 6 शक्ति का व्यवहार करना चाहिये- इससे शीघ्र ही लाभ हो जायेगा । मूत्रनली में दर्द और मूत्र में पहले सफेद और वाद में लाल मांड़ की तरह तली जमने पर इसके मूल अर्क को 1-1 घंटे के अंतर से देना चाहियेइस प्रकार देने से शीघ्र ही लाभ हो जायेगा ।
सदृश औषधियाँ- पथरी रोग में-लाइकोपोडियम, कैम्फर, सासपैिरिला और मैन्था पिपरिटा ।
सोराइसिस में-बबंरिस एक्विफोलियम ।
क्रिनाशक औषधियाँ- बेलाडोना, कैम्फर ।

शक्ति – मूल-अर्क , 3, 6, 30
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