बुखार के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार



  शरीर का एक सामान्य तापक्रम होता है, जिससे ताप बढ़े तो ज्वर का होना कहा जाता है।ज्वर के प्रभाव से शरीर बिना परिश्रम किए ही कमजोर हो जाता है। बेहोशी-सी छाई रहती है और भोजन में अरुचि हो जाती है।   बुखार संक्रमण के खिलाफ शरीर की एक सुरक्षात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है | सामान्यत: मानव शरीर का तापमान 37° सेल्सियस या 98.6° फारेनहाइट होता है | बुखार खुद कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक लक्षण है जो यह दर्शाती है कि शरीर किसी संक्रमण (infection) से ग्रस्त है | दूसरे शब्दों में यह रोग प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा किसी सक्रमण से लड़ने का लक्षण है | हालांकि बुखार खुद कोई बीमारी नहीं है लेकिन यदि तापमान 40° सेल्सियस या 104° फारेनहाइट से ज्यादा हो जाये तो यह काफी खतरनाक हो सकता है | 
   आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अधिकांश बुखार बैक्टीरियल या वायरल इन्फेक्शन्स यानी संक्रमण होने पर होते हैं, जैसे टायफाइड, टांसिलाइटिस, इन्फुएन्जा या मीजल्स आदि बुखार हैं। वैसे बिना संक्रमण के भी बुखार होता है, जैसे जलीयांश की कमी या थायरोटाक्सीकोसिस, मायोकार्डियल इन्फार्कशन और लिम्फोमा आदि।  

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बुखार ठीक  करने के कुछ घरेलू नुस्खे नीचे लिख देता हूँ-
ठन्डे पानी से स्नान करें:
 बुखार होने पर ठन्डे पानी का स्नान करने से काफी राहत मिलती है, और यह बुखार को ठीक करने बहुत मददगार होता है | स्नान करने के लिए बाल्टी, फब्बारा (शॉवर) या टब कोई भी तरीका बुखार में लाभकारी होता है |
ठन्डे पानी से स्नान करें: बुखार होने पर ठन्डे पानी का स्नान करने से काफी राहत मिलती है, और यह बुखार को ठीक करने बहुत मददगार होता है | स्नान करने के लिए बाल्टी, फब्बारा (शॉवर) या टब कोई भी तरीका बुखार में लाभकारी होता है |
भीगे कपड़े से पोछना: 
अगर बुखार में स्नान करना अच्छा नहीं लगता तो भीगे कपड़े से बदन को पोछा जा सकता है | इसके लिए किसी साफ़ कपड़े या तौलिया को लेकर उसे ठन्डे पानी से गीला करके निचोड़ लें फिर उससे बदन पोछें और ऐसा कई बार करें | ऐसा करने से शरीर का तापमान कम करने में काफी मदद मिलती है | भीगे कपड़े की पट्टी माथे पर रखना भी बुखार में फायदा पहुंचाता है 

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ठन्डे कमरे में रहे: 
बुखार से राहत पाने के लिए यह भी आवश्यक है कि आप जिस कमरे या घर में हों वो ठंडा हो | इसके लिए आप पंखा चला लें | घर ठंडा रखने से अच्छा महसूस होता है और इससे शरीर को भी ठंडा रखने में मदद मिलती है |
ज्यादा कपड़े न पहने: 
अक्सर ऐसा देखा गया है कि बुखार आने पर मोटे-मोटे कपडे पहन लिए जाते हैं जो बुखार में फायदे की जगह नुकसानदायक है | ऐसा करने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और बुखार जल्दी ठीक नहीं होता | इसलिए इस समय हल्के कपड़े पहने जिससे शरीर को ठंडक पहुंचे और बुखार जल्दी ठीक हो सके | यदि कभी ठण्ड या कंपकंपी लगे तो उस समय कम्बल या मोटी चादर ओढ़ लेना ठीक रहता है | जब ठण्ड या कंपकंपी न लगे तो कम्बल या मोटी चादर हटा दें, और सोते समय एक चादर ओढ़कर सोयें 

अपनी नाक साफ़ रखें: 
अगर नाक साफ़ न हो तो गले में भी खराश पैदा होने की संभावना बनी रहती है जो आपकी तकलीफ को और बढ़ा सकती है | इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें और अपने पास कुछ टिश्यू पेपर ज़रूर रखें

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ज्यादा कपड़े न पहने: 
अक्सर ऐसा देखा गया है कि बुखार आने पर मोटे-मोटे कपडे पहन लिए जाते हैं जो बुखार में फायदे की जगह नुकसानदायक है | ऐसा करने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और बुखार जल्दी ठीक नहीं होता | इसलिए इस समय हल्के कपड़े पहने जिससे शरीर को ठंडक पहुंचे और बुखार जल्दी ठीक हो सके | यदि कभी ठण्ड या कंपकंपी लगे तो उस समय कम्बल या मोटी चादर ओढ़ लेना ठीक रहता है | जब ठण्ड या कंपकंपी न लगे तो कम्बल या मोटी चादर हटा दें, और सोते समय एक चादर ओढ़कर सोयें 
भीगे कपड़े से पोछना: 
अगर बुखार में स्नान करना अच्छा नहीं लगता तो भीगे कपड़े से बदन को पोछा जा सकता है | इसके लिए किसी साफ़ कपड़े या तौलिया को लेकर उसे ठन्डे पानी से गीला करके निचोड़ लें फिर उससे बदन पोछें और ऐसा कई बार करें | ऐसा करने से शरीर का तापमान कम करने में काफी मदद मिलती है | भीगे कपड़े की पट्टी माथे पर रखना भी बुखार में फायदा पहुंचाता है |
तरल भोजन करें:
 फलों में एंटीऑक्सीडेन्ट्स अच्छी मात्रा में होते हैं इसलिए फलों का खूब सेवन करें | गरिष्ठ खाने से परहेज़ करें और हल्का-फुल्का खाएं जो आसानी से पच जाए | ऐसा करना बुखार से लड़ने में काफी मददगार साबित होता है

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शरीर को आराम दें: 
ध्यान रखें कि बुखार का मतलब है कि आप का शरीर किसी बीमारी से लड़ रहा है और ऐसे में आपके शरीर को काफी ऊर्जा की ज़रुरत होती है | इसलिए अपने शरीर को आराम दें और खूब सोयें | बेवज़ह इधर-उधर घूमना फिरना छोड़ कर और अगर आवश्यक हो तो छुट्टी लेकर आराम करें |
ठन्डे कमरे में रहे: 
बुखार से राहत पाने के लिए यह भी आवश्यक है कि आप जिस कमरे या घर में हों वो ठंडा हो | इसके लिए आप पंखा चला लें | घर ठंडा रखने से अच्छा महसूस होता है और इससे शरीर को भी ठंडा रखने में मदद मिलती
 है |
घर में रहें: 
घर के अन्दर का तापमान प्रायः स्थिर ही होता है जो शरीर को अपना तापमान स्थिर रखने में मदद करता है | इसलिए जहां तक हो सके घर में रहें और अगर बाहर जाना ही पड़े तो छाँव में रहें और शारीरिक गतिविधियाँ कम-से-कम रखें
खूब पानी पियें: 
बीमारी से लड़ने के लिए शरीर को आराम और हल्के-फुल्के खान-पान के साथ-साथ खूब पानी पीने की भी ज़रुरत होती है | इसलिए दिन में कई बार पानी, फलों का रस सूप या दाल का पानी (ख़ासतौर पर मूँग दाल का पानी) लेना फायदेमंद होता है |
ठंडक देने वाले पदार्थों का इस्तेमाल करें: अपने शरीर को बाहर से ठंडा करने के साथ-साथ उसे अन्दर से भी ठंडक पहुँचाना तापमान को कम कर बुखार में राहत देता है | दही, फल एवं फलों का रस बहुत लाभकारी होता है | कभी-कभी बर्फ की चुस्की भी फायदा पहुंचाती है |

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हर्बल चाय बना कर पियें: 
आपके रसोई या बागीचे में उपलब्ध जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल न सिर्फ खाना बनाने बल्कि आपके बुखार को कम करने में भी होता है जैसे पुदीना, अदरक, शहद, निम्बू, तुलसी, बड़ी का फूल, मीठी पत्ती, दालचीनी, मुलेठी और ऐसी कई और | इनमे से कोई एक या अगर आप चाहें तो कुछेक को मिलाकर किसी बर्तन में उबाल लेवें और उसके बाद उसमे शहद मिला दें | ठंडा होने के बाद दिन में कई बार पियें
किशमिश का जूस भी बना सकते हैं:
 इसको बनाने का तरीका थोडा अलग है | इसे बनाने के लिए तीन चौथाई कप (115 ग्राम) किशमिश को साढ़े सात कप (1.75 लीटर) पानी में मिलकर उबाल लेवें फिर ठंडा होने दें के बाद छान लेवें | इस जूस को दिन में 5-6 बार पियें
सेब का पानी बनाकर पियें: एक मध्यम आकार के सेब को डेढ़ कप पानी (350 मि.ली.) में तब तक उबालें जब तक सेब मुलायम न हो जाये | इसके बाद घोल को छान ले और स्वादानुसार शहद मिलाकर पियें |
तुलसी की चाय पियें | 
इसे बनाने के लिए एक छोटा चम्मच तुलसी और 3-4 दाने काली मिर्च का पाउडर डेढ़ कप पानी में मिलाकर पांच मिनट तक उबालें | इसके बाद घोल को एक कप में छानकर पियें

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बुखार कम करने के लिए दवा लें: 

ऐसी कई दवाएं है जो बुखार में राहत पहुंचाती हैं जैसे: पैरासिटामॅाल, आइबुप्रोफेन, एस्पिरिन इत्यादि | ये दवाएं किसी भी मेडिकल स्टोर पर आसानी से उपलब्ध होती हैं और बुखार कम करने में मददगार होती हैं
अदरक, तुलसी का काढ़ा पिए: 
इसे बनाने के लिए अदरक का एक चम्मच कुटी हुई अदरक, एक चम्मच तुलसी, 3-4 काली मिर्च के दाने और स्वादानुसार शहद या चीनी को डेढ़ कप पानी में मिलाकर कुछ देर उबालें फिर उसे छान लेवें | इसे गरम रहते ही धीरे-धीरे पिए | इस काढ़े से बंद नाक और गले की खराश के साथ-साथ बुखार में भी आराम मिलेगा
लहसुन का पानी पियें:
 इसे बनाने के लिए एक कच्चे लहसुन को एक कप पानी (225 मि.ली.) में मिलाकर उबाल लेवें फिर उसे छानकर धीरे-धीरे पियें | यह बुखार दुबारा होने से बचाता है और बुखार के लक्षणों से भी आराम दिलाता हैसूती कपडा या तौलिया भिगोकर माथे पर रखे और आराम करें |
*कुछ रोगी डरतें हैं कि कहीं बुखार से दिमाग पर असर न हो | यदि तापमान 106° फारेनहाइट या 41° सेल्सियस से नीचे रखा जाए तो सामान्यतौर पर दिमाग पर असर नहीं होता | वैसे अगर बुखार 104° फारेनहाइट या 40° सेल्सियस से ज्यादा है तो खतरनाक माना जाता है 


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परामर्श-
*यदि आपको बुखार है तो कसरत न करें |
*अगर बुखार 104° फारेनहाइट या 40° सेल्सियस से ज्यादा है तो डॉक्टर से सलाह लें |
अपनी नाक साफ़ रखें |
*यदि तापमान 106° फारेनहाइट या 41° सेल्सियस से ऊपर है तो दिमाग पर असर हो सकता है |
पथ्य : मूँग की दाल और दाल का पानी, परवल, लौकी, अनार, मौसम्बी का रस, दूध, पपीता आदि हल्के पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
अपथ्य : भारी अन्न, तेज मिर्च-मसालेदार, तले हुए पदार्थ, खटाई, अधिक परिश्रम, ठण्डे
पानी से स्नान, मैथुन, ठण्डा कच्चा पानी पीना, हवा में घूमना और क्रोध करना यह सब वर्जित है।
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बेहोश होने के कारण और उपचार




मनुष्य की समस्त शारीरिक और मानसिक गतिविधियाँ उसकी चैतन्यता के कारण होती हैं। यदि व्यक्ति अचेत हो जाए तो उसकी सारी गतिविधियाँ ठप हो जाती हैं। मनुष्य की चैतन्यता के तार उसके दिमाग से जुड़े होते हैं। जब उसका मस्तिष्क निष्क्रिय हो जाता है तो व्यक्ति बेहोश हो जाता है। आखिर यह स्थिति क्यों बनती है और क्या है इसका उपचार, आइए देखते हैं-
लक्षण पहचानें
इससे पहले की आपको पूरी तरह चक्कर आए, आपको ऐसा महसूस होगा जैसे रोशनी कम हो रही है, शरीर हल्का हो रहा है और आस पास की ध्वनियां कम और ज्यादा महसूस होना शुरू हो जाती हैं। अगर आप इनमें से कोई भी लक्षण महसूस करते हैं तो जितने जल्दी हो सके नीचे बैठ जायें जिससे आप अपने आप को चोटिल होने से बचा सकें।
*कुछ लोगों को चक्कर आने से पहले आँखों के आगे अँधेरा छा जाता है, रंग धुंधले दिखने लगते हैं, और मितली जैसा अनुभव होने लगता है । कुछ लोगों को अपनी नज़र एवं सुनने की क्षमता मैं अंतर भी समझ मैं आता है ।

तुरंत लेट जाएँ: बेहोश होने पर सबसे ज्यादा डर गिरने पर चोटिल होने का रहता है, सामान्यतः यह ज्यादा गंभीर नहीं होता बशर्ते यह किसी बड़ी घटना के कारण न हो । । बेहोशी जैसी लगने पर अपने पैर थोड़े ऊपर (तकिये का इस्तेमाल कर सकते हैं) की ओर करके लेटें जिससे आपके पैर, हृदय की तुलना में थोड़े ऊपर हों । यह पोजीशन आपके हृदय और दिमाग की तरफ रक्त संचार बढाती है जिसकी आपको उस वक़्त जरूरत है ।
याद रखें की लेटी हुई अवस्था में भी आप बेहोश हो सकते हैं, और इस अवस्था में आप चोटिल होने से बच सकते हैं ।


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*अगर किसी वजह से लेटना संभव न हो पाए तो अपना सिर घुटनों के बीच में करें जिससे दिमाग में रक्त संचार बड़ सके । ऐसा करने से आपको कुछ वक़्त मिल सकता है जिसमें आप अपनी मदद के लिए अपने आसपास के लोगों को बुला सकते हैं और खुली हवादार जगह पर ले जाने के लिए कह सकते हैं ।
अगर संभव हो तो किसी से कहिये की आप बेहोश होने वाले हैं : अचानक से बेहोश हो जाना कभी कभी सचमुच खतरनाक हो सकता है, इसलिए बेहतर यही है कि ऐसा होने से पहले किसी की मदद ले लें । जैसे ही थोड़े बहुत लक्षण महसूस होना शुरू हों, उन्हें समझें और अपने आसपास के लोगों को मदद के लिए कहैं फिर चाहे वो कोई अज़नबी ही क्यों न हो ।
*भीड़ भरे एरिया मैं अपने आप को सम्हालना थोड़ा मुश्किल हो जाता है । इस स्थिति में सबसे पहले उस क्षेत्र से बाहर निकलें । लेकिन ज्यादा दूर नहीं जाएँ क्योंकि आपको किसी की मदद की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन दूसरी तरफ, आप नहीं चाहेंगे कि जब आप बेहोश हों या नीचे गिरें तो चारों तरफ लोग आपको घेरकर खड़े हों जायें । अगर संभव हो तो चक्कर जैसा महसूस होने पर लोगों को थोड़ा दूर होने को कहें, ऐसा करने पर वे न केवल आपको जगह देंगे बल्कि आपको चक्कर आने पर संभाल भी सकते हैं जिससे आप आगे होने वाली चोट को टाल सकते हैं ।
*अगर बेहोश होने की स्थिति को टाल नहीं सकते तो दीवाल का सहारा लें: अगर ऐसी स्थिति बनती है जहाँ आपको कोई सँभालने वाला न हो और आपको लगने लगा हो कि आप खड़े खड़े बेहोश हो जाएंगे तो दीवाल का सहारा ढूंढने की कोशिश करें । ऐसा करने से कम से कम आप अपने आप को घायल होने से बचा पाएंगे ।
या, फिर कुछ मुलायम चीज़ अपने आस पास देखें जिससे गिरने पर चोट न लगे ।
अगर आप सीढ़ियों पर बीच मैं है तो अंदर की तरफ से रेलिंग पकड़ने की कोशिश करें: ऐसा करने से आप अपना बैलेंस बना पाएंगे और उसे पकड़कर धीरे धीरे ऊपर या नीचे भी जा सकते हैं ।
लेकिन, आप जहाँ कहीं भी हैं (सीढ़ी पर या कहीं और ), जल्द से जल्द सतह पर आने की कोशिश करें ।

मनोवैज्ञानिक कारण
मनुष्य में किसी चीज का डर भी बेहोशी का कारण हो सकता है, जैसे अपने सामने कोई भयानक दुर्घटना होते देखना उसकी बेहोशी का कारण बन सकता है। कई बार किसी डरावनी चीज को देखकर भी व्यक्ति बेहोशी की स्थिति में पहुँच जाता है। किसी दुखद समाचार या सदमे की वजह से भी बेहोशी हो सकती है। ऐसा प्रायः तब होता है, जब किसी प्रियजन की आकस्मिक मौत हो जाए है यदि यह दुर्घटना नजरों के सामने हुई हो तो व्यक्ति अपने होश खो देता है। ये सभी मनोवैज्ञानिक कारण हैं।

*भोजन मनुष्य की मूल आवश्यकता है। इससे शरीर क्रियाशील रहता है। लेकिन जो लोग लंबे व्रत उपवास करते हैं या समय पर भोजन नहीं लेते, वे भी बेहोशी का शिकार बन सकते हैं। मधुमेह के रोगी यदि अधिक समय तक भूखे रहें तो उनकी रक्त शर्करा का स्तर काफी गिर जाता है और वे बेहोश हो सकते हैं। तेज धूप में अधिक देर तक खड़े रहने से भी व्यक्ति बेहोश हो सकता है। यह बेहोशी स्कूली बच्चों में अधिक देखी गई है, जबकि किसी रैली या नेता के भाषण की वजह से उन्हें तेज धूप में घंटों खड़ा रहना पड़ता है, वहीं सिर पर लगी चोट बेहोशी का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा जब किसी भी वजह से मस्तिष्क में रक्त पहुँचने में बाधा आ जाती है तो वह काम करना बंद देता है, जिससे व्यक्ति चेतना खो देता है। मस्तिष्क के अंदर रक्त का अभाव होना ही बेहोशी का मूल कारण है।
शारीरिक कारण
चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से व्यक्ति के बेहोश होने के कारण कुछ भिन्न हैं। इसके अनुसार जब किसी वजह से शरीर में निर्जलीकरण की स्थिति हो जाए, जिसे डिहाइड्रेशन कहते हैं तो व्यक्ति बेहोश हो सकता है। इसमें उल्टी-दस्त होना या लू लगना भी शामिल है। जब शरीर में पानी और खनिज लवणों का क्षरण गंभीर रूप से हो जाता है तो व्यक्ति बेहोशी की हालत में आ जाता है। साथ ही शुद्ध वायु का न मिलना भी बेहोशी का एक कारण हो सकता है, क्योंकि इससे व्यक्ति का दम घुट सकता है। ऐसा प्रायः बंद कमरे में रहने की वजह से होता है, जहाँ खिड़कियाँ, रोशनदान, दरवाजे सभी पूरी तरह से बंदहों। फिर अत्यधिक थकान की वजह से भी व्यक्ति बेहोश हो सकता है।
    कुछ लोग हिस्टीरिया की बीमारी से ग्रस्त रहते हैं। कभी भी उन्हें दौरा पड़ जाता है जिससे वे अपना होश खो बैठते हैं। मिरगी के दौरे की वजह से भी व्यक्ति कुछ समय तक बेहोशी की स्थिति में पहुँच जाता है। हालाँकि यह बेहोशी अल्पकाल की होती है। कई बार ब्रेन ट्यूमर की वजह से भी व्यक्ति को बेहोशी का सामना करना पड़ता है। दिमाग में आई सूजन भी बेहोशी का कारण बन सकती है। इसके अलावा मस्तिष्क में आई किसी तरह की अन्य विकृति भी इसका कारण बन सकती है। जब किसी व्यक्ति का रक्तचाप तेजी से गिर जाए और वह खतरनाक स्तर पर आ जाए तो भी व्यक्ति बेहोश हो जाता है।
बेहोशी की स्थिति से कैसे बचें
यदि आपको लगता है कि आप बेहोश होने वाले हैं तो खड़े रहने की बजाय तुरंत जमीन पर लेट जाएँ। अपने सिर को नीचा करके टाँगों को थोड़ा ऊपर उठाएँ। इससे मस्तिष्क की ओर रक्त प्रवाह बढ़ जाएगा तथा बेहोशी रुक जाएगी। यदि फिर भी बेहोशी आ गई तो जमीन पर लेटे रहने से आप चोट लगने से बच जाएँगे।
बेहोशी का प्राथमिक उपचार
यदि कोई व्यक्ति बेहोश हो गया है तो सबसे पहले उसके कपड़े ढीले कर दें ताकि उसके फेफड़ों को ऑक्सीजन लेने की पर्याप्त जगह मिल सके। उसे साँस लेने में परेशानी हो रही हो तो उसे सीधा लिटाकर उसके दोनों ओर घुटने रखकर झुक जाएँ। रोगी की नाभि पर अपना एक हाथ रखें तथा अपना दूसरा हाथ उसके हाथ पर रखें। हथेली के निचले भाग से व्यक्ति की नाभि के ऊपर की ओर तीन से पाँच बार जोर लगाएँ। यदि इससे भी कोई लाभ न हो तो रोगी को करवट दिलाकर उसके कंधों के बीच कई बार हल्के से हाथ मारें। यदि कोई व्यक्ति लू की चपेट में आकर बेहोश हो गया है तो उसे तुरंत ठंडे स्थान पर ले जाएँ तथा संभव हो तो कूलर या एसी चला दें तथा अतिरिक्त कपड़े उतार दें। उसकी साँस गति एवं नब्ज जाँचें। जरूरी हो तो कृत्रिम साँस दें।
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सांस फूलने के प्रभावी घरेलू उपचार



    

अक्‍सर ऐसा होता है कि बिना किसी बीमारी के भी काम करते हुए सांस फूलने लगती है या सीढ़ियां चढ़ने से सांस फूल जाती है। कई लोग सोचते हैं कि मोटे लोगों की सांस जल्दी फूलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार पतले लोगों की सांस भी थोड़ा चलने पर ही फूलने लगती है। दिल्ली जैसे शहर में जहां हर तरह का प्रदूषण है, सांस फूलने की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।फेफड़ों से संबंधित प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों के कारण भी सांस की समस्या होती है। वहीं फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण होते हैं।
सांस फूलना या सांस ठीक से न ले पाना
सांस फूलना या सांस ठीक से न ले पाना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। अकसर सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क के संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देते हैं। फेफड़ों से संबंधित प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों के कारण भी सांस की समस्या होती है। वहीं फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण होते हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य टॉक्सिंस के कारण श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट की वजह से भी सांस लेने में दिक्कत पैदा हो सकती है। वहीं दिल की बीमारियों या खून में ऑक्सीजन का स्तर कम होने के कारण भी सांस फूलती है।
तुलसी का रस
बेहद गुणकारी तुलसी सांस फूलने की समस्या में भी बेहद लाभदायक होती है। तुलसी का रस और शहद चाटने से अस्‍थमा रोगियों को व सांस फूलने की समस्या वाले लोगों को आराम मिलता है। इससे सांस की बंद नलियां तुरंत ही खुल जाती हैं।
शहद
शहद एक बेहद आम घरेलू उपचार है, जो अस्‍थमा के इलाज के लिये भी प्रयोग किया जाता है। अस्‍थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से पर जल्द ही समस्या से राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्‍लास पानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी भ ी आराम मिलता है। शहद बलगम को भी ठीक करता है, जो अस्‍थमा व सांस की परेशानी पैदा करता है।

कॉफी है लाभदायक 
अगर आपको अस्थमा का अटैक आया है तो आप तुरंत गरम कॉफी पी सकते हैं। यह श्वांस नलिकाओं में रूकी हुई हवा को तुरंत ही खोल देगी। अगर कॉफी नहीं पी सकते तो कॉफी की महक सूंघने से भी लाभ होता है।
गरम जगह में जाएं
ठंडी जगह में सांस फूले तो गरम जगह पर चले जाएं, जहां पर ऐसी या कूलर न हो। इसके अलावा अगर गरम शॉवर ले सकते हैं तो भी आपको राहत मिलती है। साथ ही जब भी आपकी सांस फूलने लगे तो भींड भाड़ और धूल भरी जगह छोड़ दें और किसी खुली जगह पर चले जाएं।
यूकेलिप्‍टस तेल
यदि सांस फूलने की समस्या है को घर में यूकेलिप्‍टस का तेल जरूर रखें। जब कभी सांस फूले तो यूकेलिप्‍टस का तेल सूंघ लें, इसको सूंघने से आपको तुरंत फायदा होगा और समस्या धीरे-धीरे ठीक होने लगेगी। अम्ल बनाने वाले पदार्थ न लें
सांस फूलने की समस्या होने पर आहार में कार्बोहाइड्रेट चिकनाई एवं प्रोटीन जैसे एसिड बनाने वाले पदार्थ सीमित मात्रा में लें और ताज़े फल, हरी सब्जियां तथा अंकुरित चने जैसे क्षारीय खाद्य पदार्थों का भरपूर मात्रा में सेवन करें।
दमा होता है बड़ा कारण
श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर व बाहर करती हैं। दमा होने पर इन नलिकाओं के अंदर की दीवार में सूजन हो जाती है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी संवेदनशील चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है और सांस फूलने लगती है।
बदलता मौसम भी है कारण
एलर्जी से होने वाले अस्थमा (दमा) की वजह से भी सांस फूल जाती है। यह स्थिति जीवन के लिए खतरा भी बन सकती है। बदलता मौसम इसे और बढ़ाता है। फरीदाबाद के सर्वोदय अस्पताल और रिसर्च सेंटर के रेस्पिरेट्री के विभागाध्यक्ष डॉ. दानिश जमाल के अनुसार, ‘वसंत की गुनगुनी धूप की जगह गर्म हवाएं चलने लगी हैं। अधिकांश मरीज मौसमी दमे के शिकार हो जाते हैं। जो इसके मरीज हैं उन्हें इसके अटैक पड़ने लगते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में तनाव भी इसकी बड़ी वजह है।’
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हृदय की धड़कन बढ़ने का आयुर्वेदिक उपचार





वास्तव में दिल की धड़कन कोई रोग नहीं है| किन्तु जब दिल तेजी से धड़कने लगता है तो मनुष्य के शरीर में कमजोरी आ जाती है, माथे पर हल्का पसीना उभर आता है तथा पैर लड़खड़ाने लगते हैं|धड़कन बढ़ने के कारण
हृदय में एक निश्चित लय के साथ धड़कन होती है। यही धड़कन यदि किसी कारणवश बढ़ जाती है, तो यह दिल धड़कने की बीमारी बन जाती है। इसके कारण बड़ी बेचैनी रहने लगती है। दिल धड़कने की बीमारी, मानसिक उत्तेजना, स्नायु में किसी प्रकार की बीमारी, उत्तेजित पदार्थों को खाने, डर, बहुत ज्यादा परिश्रम, शोक, हस्त मैथुन, स्त्री से अधिक संभोग आदि के कारण हो जाती है।
प्रत्येक स्त्री, पुरुष और बच्चे का दिल एक निश्चित गति में धड़कता रहता है| यह धड़कन मनुष्य के स्वस्थ तथा जीवित होने का लक्षण है| लेकिन किसी आशंका, भय या चिन्ता के कारण दिल की धड़कन बढ़ जाती है| यदि यह बार-बार होने लगे तो समझना चाहिए कि यह दिल की धड़कन का रोग है| यह रोग प्राय: उन लोगों को बहुत जल्दी होता है जो शरीर तथा हृदय दोनों से दुर्बल होते हैं| वैसे अधिक मानसिक उत्तेजना, दुःख, कष्ट, संकट, क्षुब्धता, स्नायुमंडल का कोई रोग, उत्तेजित पदार्थों का सेवन, भय, अधिक परिश्रम, दौड़ - धूप, हस्तमैथुन, स्त्री-प्रसंग आदि कारणों से यह रोग बड़ी जल्दी हो जाता है|

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दिल की कमजोरी के लक्षण

इस रोग में दिल बड़ी तेजी से धड़कने लगता है। इसके कारण शरीर में रूखापन, प्यास अधिक लगना, अजीर्ण, भूख की कमी, दिल जैसे बैठा जा रहा हो आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं। हाथ-पांव ठंडे से हो जाते हैं तथा श्वास लेने में परेशानी होती है।
हृदय की धड़कन बढ़ने का घरेलू उपचार 

*पके हुए बेल का गूदा लगभग 100 ग्राम प्रतिदिन सुबह के समय मलाई के साथ खाना चाहिए।
*बेल-पत्र का 10 ग्राम रस लेकर गाय या भैंस के शुद्ध घी में मिलाकर सेवन करें।
*आंवले का चूर्ण आधा चम्मच लेकर उसमें थोड़ी-सी मिसरी का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें।
*पपीते का गूदा लेकर उसे मथ लें। 100 ग्राम गूदे में दो लौंगों का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
*गाजर का रस आधा कप नित्य सुबह के समय सेवन करें।
*यदि दिल की धड़कन तेज मालूम पड़े और घबराहट बढ़ जाए, तो सूखा धनिया एक चम्मच और मिसरी एक चम्मच । दोनों को मिलाकर सेवन करें। इसके सेवन से धड़कन सामान्य हो जाएगी।
*सेब के मुरब्बे पर चांदी का वर्क लगाकर खाने से हृदय को बल मिलता है।
*यदि धड़कन बढ़ने की वजह से कुछ बेचैनी-सी अनुभव होती हो, तो एक गिलास पानी में नीबू निचोड़ कर पी जाएं।
*टमाटर का सूप बीज निकालकर 250 ग्राम लें और अर्जुन के पेड़ की छाल का चूर्ण 2 ग्राम लेकर दोनों को अच्छी तरह मिलाकर सुबह के समय सेवन करें।
*100 ग्राम सेब के रस में 10 ग्राम शहद मिलाकर पी जाएं।
*सफेद इलायची का 3 ग्राम चूर्ण लेकर गाय के दूध के साथ सेवन करें।
*यदि दिल तेजी से धड़कता हुआ मालूम पड़े, तो थोड़ा-सा कपूर सेवन करें।
*आंवले का मुरब्बा या शरबत दिल की तेज धड़कन को सामान्य बनाता है।
*एक गुलाब के फूल को बासी मुंह चबाकर खा जाएं।
*अनार के चार-पांच पत्तों को धोकर पीस लें। फिर इसकी चटनी बनाकर थोड़ा-सा काला नमक डालकर सेवन करें।
नित्य 25 ग्राम अंगूर का रस पिएं।
एक चम्मच प्याज के रस में जरा-सा नमक डालकर सेवन करें।
पिस्ते की लौज लगभग 30 दिन तक खाने से हृदय की धड़कन का रोग कम हो जाता है।
*50 ग्राम किशमिश गर्म पानी में मथकर या उबालकर सेवन करें। किशमिश हृदय को बल देती है।
हृदय की धड़कन बढ़ने का आयुर्वेदिक उपचार 

*बहेड़े के पेड़ की छाल का चूर्ण दो चुटकी प्रतिदिन घी या गाय के दूध के साथ सेवन करें।
*हरड़ की छाल, खुरासानी बच, रास्ना, पीपल, सोंठ, कचूर, पुष्कर मूल। सभी दवाओं को लेकर बारीक-बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 10 माशे की मात्रा में रोज ताजे पानी से सेवन करें।
गंगरेन की छाल, काहू के पेड़ का बकला, खरैटी तथा मुलेठी बराबर की मात्रा में लेकर महीन-महीन पीस लें। उसमें से दो चुटकी चूर्ण नित्य शहद के साथ सेवन करें।
*हरड़ की छाल, बच, रास्ना, पीपल, सोंठ, कचूर तथा पुष्कर। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण नित्य पानी के साथ सेवन करें। हृदय रोग तथा दिल की तेज धड़कन के लिए यह रामबाण दवा है। यह प्रसिद्ध आयुर्वेदिक कंपनी की दवा है, जो हरीतक्यादि के नाम से मिलती है।
*भुनी हुई हींग, बच, कूट, जवाखार, सौंफ, पीपल, हरड़ की छाल, चिमक, जवाखार, पुष्करमूल तथा काला नमक। सब बराबर की मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। फिर उसमें से दो चुटकी चूर्ण शहद के साथ सुबह के समय सेवन करें।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा







अण्डकोष की सूजन के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार




   अंडकोष को अँग्रेजी  में Scrotum कहा जाता है जो की एक पतली थैली के रूप में आदमी के लिंग के नीचे स्थित होती है| इस थैली में दो बहुत ही जरुरी अंग पाए जाते हैं जिन्हें हम testicles कहते हैं और जिनमें वीर्य का उत्पादन होता है| वैसे तो अंडकोष मोटी और मजबूत त्वचा का बना होता है लेकिन फिर भी कई प्रकार के रोग या बीमारी इसे ग्रसित कर सकते हैं और उनमें से सबसे ज्यादा पुरुषों को अंडकोष में दर्द और सूजन का सामना करना पड़ता है| अंडकोष में दर्द और सूजन दायें या बाएँ  अथवा दोनों और हो सकता है| पुरुष को अपने जीवन की किसी भी अवस्था में इस दर्द और सुजन का सामना करना पड़ सकता है|>अंडकोष का दर्द धीरे और लम्बे समय तक भी हो सकता है और कई लोगों में ये दर्द बहुत जयादा तेज भी हो सकता है| सही समय पर इस समस्या का निदान न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं| इसलिए यदि आपके अंडकोष में तेज दर्द और सूजन है तो आपको तुरंत किसी अच्छे urologist से मिलकर उसका इलाज करवा लेना चाहिए| लेकिन यदि आपकी प्रॉब्लम जयादा सीरियस नहीं है तो आप कुछ घरेलु नुस्खे अपनाकर pain और सूजन  को कम कर सकते हैं| लेकिन सबसे पहले अंडकोष में दर्द और सूजन करने वाले कारणों के बारे में थोड़ी जानकारी बढ़ा ली जाये|
 वो कारण जो अंडकोष में दर्द और सुजन के लिए जिम्मेदार होते हैं-
अंडकोष में दर्द और सूजन के कुछ प्रचलित कारणों में से कुछ नीचे दिए गये हैं | जरुरी नहीं की आपकी बीमारी के लिए ये ही कारण जिमेदार हों| इसलिए सही कारण का पता लगाने के लिए डॉक्टर से मिलना अनिवार्य हैं|
Inguinal hernia – इसे groin hernia भी कहते हैं| इसमें छोटी आंत या fatty tissue का कुछ भाग आपके अंडकोष में आकर दर्द और सूजन पैदा करता है| यह हर्निया अकसर भारी बोझ उठाने के कारण होता है| अकसर लोग gym में सीधे ही भारी भरकम बोझ उठा लेते हैं और हर्निया का शिकार हो जाते हैं|


मर्दानगी(सेक्स पावर) बढ़ाने के अचूक नुस्खे


*Torsion – इस कंडीशन में आपकी स्पेर्मटिक कोर्ड मुड जाती है या ट्विस्ट हो जाती है और जिसके कारण आपके testes की और जाने वाला रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है| इसमें रोगी को बहुत तेज दर्द होता है| समय रहते इसका इलाज न हो तो permanent damageभी हो सकता है| यह एक आपातकालीन स्तिथि होती है|
Epididymitis – इसमें आपकी epididymis में inflammation या सोअज हो जाती है| Epididymis एक तुबे जैसी संरचना होती है जो की आपके दोनों testes के पीछे की और स्थित होती है| Epididymitis में रोगी को अंडकोष में असहनीय दर्द होता है| epididymis में inflammation होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे चोट लग जाना, बैक्टीरिया द्वारा संक्रमण. sexually transmitted disease जैसे chlamydia and gonorrhea आदि| *Epididymitis ज्यादातर 18 से 36 वर्ष के लोगों में ज्यादा देखने को मिलता है|
*Orchitis – इस रोग में आपके testes में inflammation हो जाता है जो की बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण के कारण होता है| ये inflammation एक ओर या दोनों ओर हो सकता है| इसमें अंडकोष में सुजन और दर्द रहने लगता है| यह ज्यादातर 45 या उससे बड़ी उम्र के पुरषों में अधिक देखने को मिलता है|
*इनके अलावा अंडकोष में सूजन, दर्द और irritation के कई और कारन होते हैं जैसे अंडकोष में पानी भरना, हर्निया सर्जरी के बाद भी दर्द कुछ महीनों तक रहता है| इनके अलावा prostatitis, गांठ का होना, पथरी और मम्प्स होना भी दर्द और सूजन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं|
अंडकोष में सूजन और दर्द का इलाज / निदान
* यह पुरषों की बहुत ही sensitive स्थान होता है| यदि आपको लगता है की आपकी प्रॉब्लम सीरियस नहीं है और बस हल्का फुल्का दर्द महसूस हो रहा है तो आपको कुछ घेरलू नुस्खे और सावधानियाँ अपनाकर उस दर्द से मुक्ति पा सकते हैं| नीचे कुछ जरुरी बातें बताई गयी हैं|अंडकोष में दर्द और सुजन से ग्रसित लोगों को डॉक्टर सबसे पहले आराम लेने की सलाह जरूर देता हैं| आपको सभी कार्य छोड़कर कुछ दिन bed rest लेना चाहिए| कोई ऐसा काम न करें जिससे आपके अंडकोष पर दवाब पड़े|
सामान्य दर्द और सुजन को आप बर्फ की सहायता से ख़तम कर सकते हैं| आपको बर्फ का टुकड़ा रुमाल या तौलिए में लपेटना है और दर्द वाली जगह पर कुछ मिनट्स के लिए लगाना है| ऐसा आपको हर 2 घंटे के अन्तराल में करना है|
   डॉक्टर या किसी जानकार की सलाह के अनुसार सही नाप का supporter या लंगोट का इस्तेमाल करें| इससे आपके अंडकोष को  सहारा मिलेगा और दर्द में राहत|
कभी भी भारी भरकम बोझ न उठाएं और यदि जरुरी हो तो अपने फॅमिली members की मदद लें|
खेलों में चोट से बचने के लिए protective कप और supporter जरुर पहने|
*Epididymitis, पथरी, और संक्रमण की स्तिथि में अपने डॉक्टर से जरुरी दर्द निवारक दवा जैसे brufen, aspirin, paracetamol आदि और एंटीबायोटिक्स लिखवाकर नियमित रूप से लें|
*कम कोलेस्ट्रॉल वाला खाना खाइए और दिन भर में ढेर सारा पानी पीजिये|
*STD से बचने के लिए संभोग से पहले जरुरी सावधानियाँ बरतें|
*हल्दी का लेप अंडकोष के बढ़ने यानि सूजन को कम करने में आपकी मदद कर सकता है|
*अदरक के रस में शहद मिलकर पिने से लाभ मिलता है इसी प्रकार टमाटर, सेंधा नामक और अदरक का सलाद के रूप में सेवन करने से भी फायदा होता है|


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अंडकोष प्रदाह मे होम्योपैथी




   चोट लग जाने, सूजाक आदि के कारण अण्डकोष की थैली की त्वचा फूल जाती है और उनमें दर्द, जलन, सूजन आदि लक्षण रहते हैं । इसी स्थिति को अण्डकोष-प्रदाह कहते हैं । यहाँ पर हाइड्रोसिल का भ्रम नहीं होना चाहिये

*एपिस मेल 30-

दर्द, जलन, सूजन, लालिमा, डंक मारने जैसा दर्द इन लक्षणों में लाभ करती है ।


*क्रोटन टिग 30- 

अण्डकोष-प्रदाह के साथ-साथ उन पर एक्जिमा जैसे दाने निकल आयें, खारिश हो, खुजलाने की इच्छा हो पर खुजलाने से कष्ट बढ़े, दर्द से नींद न आती हो- इन लक्षणों में दें ।

*ग्रेफाइटिस 30-

खाजयुक्त तर दाने निकल आयें जिनसे गाढ़ा मवाद भी आता हो तो लाभ करती है ।


*आर्सेनिक एल्ब 30–

दर्द में सेंकने से आराम मिले, रोगी व्याकुल हो, प्यास लगे- इन लक्षणों में देनी चाहिये ।


*एसिड फॉस 30–

कमजोरी, अत्यधिक विलासिता का इतिहास हो, प्रदाह भी हो- इन लक्षणों में लाभप्रद रहती है

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज 

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होम्योपैथी मे दर्द के उपचार



  

 पुराना दर्द का आमतौर पर अच्छे तरिके से पारंपरिक दवा से उपचार नहीं हो सकता और इफेक्टिव पारंपरिक दवाओं का प्रयोग करके कई तरह से गंभीर साइड इफेक्ट से बचा जा सकता है। एलोपैथिक दवाओं के बजाय उपचार के कई तौर तरीके खोजे गए हैं। पुराने दर्द वाले लोगों का होम्योपैथी इलाज ढूढने का आम कारण है लगातार दर्द होना। पारंपरिक दवाओं के साइड इफेक्ट के बारे में जानकारी और अधिक प्राकृतिक की इच्छा करना जो कि शरीर की क्षमता को बढ़ा देता है ।दर्द के कुछ आम कारणों के इलाज नीचे दिए गए हैं।
ऑस्टियोआर्थराइटिस के उपचार का मुख्य उद्देश्य दर्द से आराम दिलाना और बिमारियों को नियंत्रण करना। वैसे होम्योपैथी उपचार ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए इफेक्टिव पांरपरिक उपचार है। होम्योपैथी जॅल जिसमें कोमफ्रे(सेमफीटूम ऑफिसिनल), पोइजन आईवी(रुस टोक्कॉडेनड्रॉन) और मार्श टी( लेडूम पालूस्टर) होता है। आर टॉक्सीकॉडेनड्रॉन, अर्निका मोनटाना(अर्निका) सोलानुम डुलकैमरा( कलाइम्बिंग नाइट शेड), संगगुऊनारा केनेडेनसिस( ब्लड रूट) और सल्फऱ का मिश्रित तरल पदार्थ। होम्योपैथी तरल फोर्मूला जिसमें आर टोक्सीकॉडेनड्रॉन, कॉस्टीकुम( पोटेशियम हाइड्रेट) और लाक वेकीनम( गाय का दूध) होता है।

   केवल अर्निका क्रीम या केलनडुला ऑफिसिनसीड, हेममेलीज विरजीनियना, अकोनीटुम नपेलुस और बेलाडोना असुविधा को कम करने में सहायता करता है। यह क्रीम दिन में 3 से 6 बार प्रयोग करना चाहिए। रोगियों को गंभीर चोट में अर्निका क्रीम को प्रयोग करना चाहिए। ब्रीयोनिया दर्द में प्रयोग की जाती है जब दर्द धीरे धीरे ज्यादा बढ़ता है। साइटोलका, आर टोक्सीकॉडेनड्रॉन अन्य होम्योपैथिक उपचार है जो कि दर्द को कम करने में सहायता करता है।
होम्योपैथी दवाएं कानों में दर्द के लिए बहुत ही इफेक्टिव होती हैं। अगर आपको कान में दर्द है विशेषकर जब यह कुछ ज्यादा गंभीर हो तो किसी प्रोफेशेनल होम्योपैथी से सलाह लें। जो कान के दर्द में इफैक्टिव दवाएं पुलसाटिला( वाइनफ्लोवर), अकोनीटुम(मोनकशूड), बेलडोन्ना(डेडली नाइटशेड) हैं। बेलडोन्ना नाक के दर्द में इफैक्टिव है जो कि अचानक विशेष धड़कन के साथ शुरू होता है।
होम्योपैथी दवा जो कि सर दर्द को ठीक करती वे हैं ब्रोनिया, इयूफ्रेसिया, हाइपेरीकुम, काली बिच, काली फोस, लाइकोपोडियम, नटमुर, नुक्सवोम, पुलसटील्ला, सिलीसिया और थुजा। गठिया के उपचार में प्रयोग होने वाली दवाएं एपिस मेल, अर्निका, ब्रयोनिया, कोस्टिकम, पलसेटिला, रस टॉक्स, रुटा ग्रेव हैं। चोट के बाद होने वाले दर्द के उपचार के लिए अर्निका, ब्रयोनिया, रस टॉक्स, रुटा ग्रेव जैसे होम्योपैथ दवाओं का प्रयोग किया जाता है। कुछ होम्योपैथिक दवाएं दांतों के इलाज के इफेक्टिव होती हैं जैसे अर्निका, एकोनाइट, कोफिया, मर्कसोल

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ब्रायोनिया (Bryonia) होम्योपैथिक दवा के लाभ उपयोग




व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग प्रकृति
लक्षणों में कमी
जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति, धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की जोरों से और एकाएक होती है।
दर्द वाली जगह को दबाने से रोग में कमी होना
हरकत से रोग की वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी
ठडी हवा से आराम
जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी में)
आराम से रोग में कमी
श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना
गठिये में सूजन पर गर्म सेक से और हरकत से रोगी को आराम मिलना
रजोधर्म बन्द होने पर नाक या मुँह से खून गिरना या ऐसा होने से सिर-दर्द होना


भटकटैया (कंटकारी)के गुण,लाभ,उपचार


लक्षणों में वृद्धि
सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना सूर्यास्त के साथ बन्द हो
(1) जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की तेज, जोरों की, और एकाएक होती है – प्राय: लोग जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दे देते है, और समझते हैं कि उन्होंने ठीक दवा दी। परन्तु चिकित्सक को समझना चाहिये कि जैसे रोग के आने और जाने की गति होती है, वैसे ही औषधि के लक्षणों में भी रोग के आने और जाने की गति होती है। इस गति को ध्यान में रखकर ही औषधि का निर्वाचन करना चाहिये, अन्यथा कुछ लक्षण दूर हो सकते हैं, रोग दूर नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, एकोनाइट का रोगी हिष्ट-पुष्ट होता है, ठंड में जाने से उसे बड़ी जोर का जुकाम, खांसी या बुखार चढ़ जाता है। शाम को सैर को निकला और आधी रात को ही तेज बुखार चढ़ गया। बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता है, परन्तु उसमें सिर-दर्द आदि मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं। ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता। रोगी ठंड खा गया, तो उसके लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होंगे। पहले दिन कुछ छींके आयेंगी, दूसरे दिन नाक बहने लगेगा, तीसरे दिन बुखार चढ़ जायगा। बुखार, जैसे धीरे-धीरे आय वैसे धीरे-धीरे ही जायेगा। इसीलिये टाइफॉयड में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दिया जाता, उसके लक्षण ब्रायोनिया से मिलते हैं। औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझ लेना जरूरी है।


अनचाहा गर्भ गिराने के सही तरीके और उपाय


 रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी है, तभी औषधि लाभ करेगी। रोग दो तरह के हो सकते हैं-स्थायी तथा अस्थायी। स्थायी-रोग में स्थायी-प्रकृति की औषधि ही लाभ करेगी, अस्थायी-रोग में अस्थायी-प्रकृति की औषधि लाभ करेगी। एकोनाइट और बेलाडोना के रोग तेजी से और एकाएक आते हैं, और एकाएक ही चले जाते हैं। ऐसे रोगों में ही ये दवायें लाभप्रद हैं। ब्रायोनिया, पल्सेटिला के रोग शनै: शनै: आते हैं, और कुछ दिन टिकते हैं। इसलिये शनै: शनै: आनेवाले और कुछ दिन टिकने वाले रोगों में इन दवाओं की तरफ ध्यान जाना चाहिये। थूजा, साइलीशिया, सल्फर आदि के रोग स्थायी-प्रकृति के होते हैं, अत: चिर-स्थायी रोगों के इलाज के लिये इन औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये जब रोग बार-बार अच्छा हो-हो कर लौटता है तब समझना चाहिये कि यह स्थायी-रोग है, तब एकोनाइट से लाभ नहीं होगा, तब सल्फर आदि देना होगा क्योंकि एकोनाइट की प्रकृति ‘अस्थायी’ (Acute) है, और सल्फर की प्रकृति ‘स्थायी’ (Chronic) है |
हरकत से रोग बढ़ जाना
क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग
खाने के बाद रोग में वृद्धि
गठिये में गर्मी और हरकत से आराम
क्रोध से वृद्धि
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    होम्योपैथी मे बेलाडोना के गुण फायदे उपयोग



    बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती है। कौन-कौन सी बीमारियों में बेलाडोना फायदा करता है
    किसी भी तरह का दर्द
    शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है।
    बुखार
    यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है।
    जीभ की सूजन
    जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें।
    मासिक धर्म
    महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें।

    यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी।
    सिर व गर्दन दर्द
    यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है।
    सूखी खांसी
    सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी।
    गले की सूजन
    यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है।
    कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।
    सलाह- इस दवा का उपयोग  किसी होम्योपथिक चिकित्सक  के मार्गदर्शन मे करें|
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    आयुर्वेदिक भस्म व पिष्टी :गुण ,कर्म



    अकीक भस्म : हृदय की निर्बलता, नेत्र विकार, रक्त पित्त, रक्त प्रदर आदि रोग दूर करती है। (नाक-मुंह से खून आना) मात्र 1 से 3 रत्ती।
    अकीक पिष्टी : हृदय और मस्तिष्क को बल देने वाली तथा वात, पित्त नाशक, बल वर्धक
    और सौम्य है।
    अभ्रक भस्म (साधारण) : हृदय, फेफड़े, यकृत, स्नायु और मंदाग्नि से उत्पन्न रोगों की सुप्रसिद्ध दवा है। श्वास, खांसी, पुराना बुखार, क्षय, अम्लपित्त, संग्रहणी, पांडू, खून की कमी, धातु दौर्बल्य, कफ रोग, मानसिक दुर्बलता, कमजोरी आदि में लाभकारी है। मात्रा 3 से 6 रत्ती शहद, अदरक या दूध से।
    अभ्रक भस्म (शतपुटी पुटी) (100 पुटी) : इसमें उपर्युक्त गुण विशेष मात्रा है। मात्रा 1 से 2 रत्ती।
    अभ्रक भस्म (सहस्त्र पुटी) (1000 पुटी) : इसमें साधारण भस्म की अपेक्षा अत्यधिक गुण मौजूद रहते हैं। मात्रा 1/4 से 1 रत्ती।
    कपर्दक (कौड़ी, वराटिका, चराचर) भस्म : पेट का दर्द, शूूल रोग, परिणाम शूल अम्लपित्त, अग्निमांद्य व फेफड़ों के जख्मों में लाभकारी। मात्रा 2 रत्ती शहद अदरक के साथ सुबह व शाम को। 

    कसीस भस्म : रक्ताल्पता में अत्यधिक कमी, पांडू, तिल्ली, जिगर का बढ़ जाना, आम विकार, गुल्म आदि रोगों में भी लाभकारी। मात्रा 2 से 8 रत्ती।
    कहरवा पिष्टी (तृणकांतमणि) : पित्त विकार, रक्त पित्त, सिर दर्द, हृदय रोग, मानसिक विकार, चक्कर आना व सब प्रकार के रक्त स्राव आदि में उपयोगी। मात्रा 2 रत्ती मक्खन के साथ।
    कांतिसार (कांत लौह फौलाद भस्म) : खून को बढ़ाकर सभी धातुओं को बढ़ाना इसका मुख्य गुण है। खांसी, दमा, कामला, लीवर, प्लीहा, पांडू, उदर रोग, मंदाग्नि, धातुक्षय, चक्कर, कृमिरोग, शोथ रोगों में लाभकारी तथा शक्ति वर्द्धक। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती।
    गोदन्ती हरताल (तालक) भस्म : ज्वर, सर्दी, खांसी, जुकाम, सिर दर्द, मलेरिया, बुखार आदि में विशेष लाभकारी। मात्रा 1 से 4 रत्ती सुबह व शाम को शहद व तुलसी के रस में।
    जहर मोहरा खताई भस्म : शारीरिक एवं मानसिक बल को बढ़ाती है तथा विषनाशक है। अजीर्ण, कै, उल्टी, अतिसार, यकृत विकार, घबराहट, जीर्ण ज्वर, बालकों के हरे-पीले दस्त एवं सूखा रोग में लाभकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद में।
    जहर खताई पिष्टी : गुण, जहर मोहरा खताई भस्म के समान, किंतु अधिक शीतल, घबराहट व जी मिचलाने में विशेष उपयोगी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शर्बत अनार से।
    टंकण (सुहागा) भस्म : सर्दी, खांसी में कफ को बाहर लाती है। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से।
    ताम्र (तांबा) भस्म : पांडू रोग, यकृत, उदर रोग, शूल रोग, मंदाग्नि, शोथ कुष्ट, रक्त विकार, गुर्दे के रोगों को नष्ट करती है तथा त्रिदोष नाशक है। मात्रा 1/2 रत्ती शहद व पीपल के साथ।
    प्रवाल (मूंगा) भस्म : पित्त की अधिकता (गर्मी) से होने वाले रोग, पुराना बुखार, क्षय, रक्तपित्त, कास, श्वास, प्रमेह, हृदय की कमजोरी आदि रोगों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद अथवा शर्बत अनार के साथ।
    प्रवाल पिष्टी : भस्म की अपेक्षा सौम्य होने के कारण यह अधिक पित्त शामक है। पित्तयुक्त, कास, रक्त, रक्त स्राव, दाह, रक्त प्रदर, मूत्र विकार, अम्लपित्त, आंखों की जलन, मनोविकार और वमन आदि में विशेष 
    लाभकारी है। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद अथवा शर्बत अनार से।
    शंख (कंबू) भस्म : कोष्ठ शूल, संग्रहणी, उदर विकार, पेट दर्द आदि रोगों में विशेष उपयोगी है। मात्रा 1 से 2 रत्ती प्रातः व सायं शहद से।
    पन्ना पिष्टी : रक्त संचार की गति को सीमित करके विषदोष को नष्ट करने में उपयोगी है। ओज वर्द्धक है तथा अग्निप्रदीप्त कर भूख बढ़ाती है। शारीरिक क्षीणता, पुराना बुखार, खांसी, श्वास और दिमागी कमजोरी में गुणकारी है। मात्रा 1/2 रत्ती शहद से।

    मुक्ता (मोती) भस्म : शारीरिक और मानसिक पुष्टि प्रदान करने वाली प्रसिद्ध दवा है। चित्त भ्रम, घबराहट, धड़कन, स्मृति भंग, अनिद्रा, दिल-दिमाग में कमजोरी, रक्त पित्त, अम्ल पित्त, राजयक्षमा, जीर्ण ज्वर,उरुःक्षत, हिचकी आदि की श्रेष्ठ औषधि। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती
    तक।  
    मुक्ता (मोती) पिष्टी : मुक्ता भस्म के समान गुण वाली तथा शीतल मात्रा। 1/2 से 1 रत्ती शहद या अनार के साथ।  
    मुक्ता शुक्ति पिष्टी : मुक्ता शुक्ति भस्म के समान गुणकारी तथा प्रदर पर लाभकारी।  
    वंग भस्म : धातु विकार, प्रमेह, स्वप्न दोष, कास, श्वास, क्षय, अग्निमांद्य आदि पर बल वीर्य बढ़ाती है। अग्निप्रदीप्त कर भूख बढ़ाती है तथा मूत्राशय की दुर्बलता को नष्ट करती है। मात्रा 1 से 2 रत्ती सुबह व शाम शहद या मक्खन से। 

    मण्डूर भस्म :
     

    जिगर, तिल्ली, शोथ, पीलिया, मंदाग्नि व रक्ताल्पता की उत्तम औषधि। मात्रा 2 रत्ती शहद से। मयूर चन्द्रिका भस्म : हिचकी और श्वास (दमा) में अत्यंत गुणकारी है। वमन (उल्टी) व चक्कर आदि में लाभकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से। 

    माणिक्य पिष्टी : 


    समस्त शारीरिक और मानसिक विकारों को नष्ट कर शरीर की सब धातुओं को पुष्ट करती है और बुद्धि को बढ़ाती है। मात्रा 1/2 रत्ती से 2 रत्ती तक।

    स्वर्ण माक्षिक भस्म : 


    पित्त, कफ नाशक, नेत्रविकार, प्रदर, पांडू, मानसिक व दिमागी कमजोरी, सिर दर्द, नींद न आना, मूत्रविकार तथा खून की कमी में लाभदायक। मात्रा 1 से 2 रत्ती प्रातः व सायं शहद से।  

    यशद भस्म : 


    कफ पित्तनाशक है। पांडू, श्वास, खांसी, जीर्णज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, संग्रहणी आदि रोगों में लाभदायक। मात्रा 1 रत्ती शहद से।  

    रजत (रौप्य, चांदी) भस्म : 


    शारीरिक व मानसिक दुर्बलता में लाभदायक है। वात, पित्तनाशक, नसों की कमजोरी, नपुंसकता, प्रमेह, धातु दौर्बल्य, क्षय आदि नाशक तथा बल और आयु को बढ़ाने वाली है। मात्रा 1 रत्तीl प्रातः व सायं शहद या मक्खन से।    

    लौह भस्म : 


    खून को बढ़ाती है। पीलिया, मंदाग्नि, प्रदर, पित्तविकार, प्रमेह, उदर रोग, लीवर, प्लीहा, कृमि रोग आदि नाशक है। व शक्ति वर्द्धक है। मात्रा 1 रत्ती प्रातः व सायं शहद और मक्खन के साथ।   

    लौह भस्म (शतपुटी) : 


    यह साधारण भस्म से अधिक गुणकारी है।  

    संगेयशव पिष्टी : 


    दिल व मेदे को ताकत देती है। पागलपन नष्ट करती है तथा अंदरूनी जख्मों को भरती है। मात्रा 2 से 8 रत्ती शर्बत अनार के साथ।


    स्वर्ण भस्म : 

    इसके सेवन से रोगनाशक शक्ति का शरीर में संचार होता है। यह शारीरिक और मानसिक ताकत को बढ़ाकर पुराने से पुराने रोगों को नष्ट करता है। जीर्णज्वर, राजयक्षमा, कास, श्वास, मनोविकार, भ्रम , अनिद्रा, संग्रहणी व त्रिदोष नाशक है तथा वाजीकर व ओजवर्द्धक है। इसके सेवन से बूढ़ापा दूर होता है और शक्ति एवं स्फूर्ति बनी रहती है। मात्रा 1/8 से 1/2 रत्ती तक।

    हजरूल यहूद भस्म : 


    पथरी रोग की प्रारंभिक अवस्था में देने से पथरी को गलाकर बहा देती है। पेशाब साफ लाती है और मूत्र कृच्छ, पेशाब की जलन आदि को दूर करती है। मात्रा 1 से 4 रत्ती दूध की लस्सी अथवा शहद से।  
    हजरूल यहूद पिष्टी : अश्मीर (पथरी) में लाभकारी तथा मूत्रल।  
    त्रिवंग भस्म : प्रमेह, प्रदर व धातु विकारों पर। गदला गंदे द्रव्ययुक्त और अधिक मात्रा में बार-बार पेशाब होने पर इसका उपयोग विशेष लाभदायक है। धातुवर्द्धक तथा पौष्टिक है। मात्रा 1 से 3 रत्ती।  


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    वृहत् वात चिंतामणि रस के लाभ उपयोग

       
                                                      à¤µà¥ƒà¤¹à¤¤à¥ वात चिंतामणि रस के लिए इमेज परिणाम

    वात कुपित होने से शरीर में कई प्रकार के रोग और कष्ट पैदा होते हैं। वात कुपित होने के कई कारण होते हैं। कुछ कारण आगंतुक होते हैं और कुछ कारण निजी होते हैं।
    आयुर्वेद शास्त्र ने वात प्रकोप का शमन करने वाले एक से बढ़कर एक उत्तम योग प्रस्तुत किए हैं। उन्हीं योगों में से एक उत्तम योग है वृहत् वात चिंतामणि रस।

    घटक द्रव्य : 

    स्वर्ण भस्म 1 ग्राम, चाँदी भस्म 2 ग्राम, अभ्रम भस्म 2 ग्राम, मोती भस्म 3 ग्राम, प्रवाल भस्म 3 ग्राम, लोह भस्म 5 ग्राम, रस सिंदूर 7 ग्राम।


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    निर्माण विधि : 

    पहले रस सिंदूर को खूब अच्छी तरह.महीन पीस लें फिर सभी द्रव्य मिलाकर ग्वारपाठे के रस में घुटाई करके, 1-1 रत्ती की गोलियाँ बनाकर, सुखा लें और शीशी में भर लें।

    मात्रा और सेवन विधि

    1-1 गोली दिन में 3 या 4 बार आवश्यकता के अनुसार शहद के साथ लेना चाहिए।
    लाभ : यह योग वातप्रकोप का शमन कर वातजन्य कष्टों और व्याधियों को दूर करने के अलावा और भी लाभ करता है। यह.पित्त प्रधान वात विकार की उत्तम औषधि है, जो तत्काल असर दिखाती है।

       यह योग नए और पुराने, दोनों प्रकार के रोगों पर विशेष रूप से बराबर लाभ करता है। वात प्रकोप को शांत करने के अलावा यह शरीर में चुस्ती-फुर्ती और शक्ति पैदा करता है। वात रोगों को नष्ट करने की क्षमता होने के कारण आयुर्वेद ने इस योग की बहुत प्रशंसा की है।
     नींद न आना, हिस्टीरिया और मस्तिष्क की ज्ञानवाहिनी नाड़ियों के दोष से उत्पन्न होने वाली बीमारी में इसके सेवन से बड़ा लाभ होता है। जब वात प्रकोप के कारण हृदय में घबराहट, बचैनी, मस्तिष्क में गर्मी और मुंह. मे छाले हों, तब पित्तवर्द्धक ताम्र भस्म, मल्ल या कुचला प्रदान औषधि के सेवन से लाभ नहीं होता। ऐसी स्थिति में इस योग के सेवन से लाभ होता है। 


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       प्रसव के बाद आई कमजोरी को दूर करने और सूतिका रोग नष्ट करने में यह योग शीघ्र लाभ करता है। वृद्धावस्था में वात प्रकोप होने और शरीर के कमजोर होने पर इस योग के सेवन से स्त्री-पुरुषों को जादू की तरह लाभ होता है और शक्ति प्राप्त होती है। 

       वात जन्य व्याधियों के अलावा यह योग अन्य व्याधियों को भी दूर करता है। हृदय रोग में अर्जुन छाल का चूर्ण एक चम्मच और इस योग का सेवन करने से उत्तम लाभ होता है। कठिन वात रोग जैसे पक्षाघात (लकवा), अर्दित, धनुर्वात, अपतानक आदि में भी इस योग का सेवन, रसोन सिद्ध घृत के साथ, करने से विशेष लाभ होता है।

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    * रक्त की कमी (एनीमिया) होने तथा वात नाड़ी संस्थान में कमजोरी होने पर बार-बार चक्कर आना, मानसिक स्थिति बिगड़ना, स्मरणशक्ति कमजोर होना, प्रलाप करना, भूल जाने की आदत पड़ना आदि लक्षणों के पैदा होने पर इस योग का सेवन करने से थोड़े ही दिनों में लाभ हो जाता है।
    * शराब पीने के आदी लोगों के जीर्णवात रोग और जीर्ण पक्षाघात (पुराना लकवा) की स्तिति में अन्य औषधियों की अपेक्षा यह रोग और योगेन्द्र रस विशेष लाभप्रद सिद्ध होते हैं। इस योग में चांदी की भस्म होने से यह.योग वृक्क स्थान और मस्तिष्क पर विशेष रूप से शामक कार्य करता है, क्योंकि योगेन्द्र रस रक्त को शुद्ध करने तथा हृदय को बल देने की क्षमता का विशेष गुण रखता है। 



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    * मानसिक श्रम के बल पर आजीविका अर्जित करने वाले स्त्री-पुरुषों के लिए यह योग अमृत के समान है, क्योंकि इससे याददाश्त अच्छी हो जाती है। इस योग का सेवन 2 चम्मच सारस्वतारिष्ट के साथ लाभ न होने तक सुबह-शाम करना चाहिए।
       वृहत् वात चिंतामणि रस एक उत्तम और शरीर को कई प्रकारसे शक्ति देने वाला और वात प्रकोप को शांत कर समस्त वातजन्य विकारों को नष्ट कर शरीर और स्वास्थ्य कीरक्षा व वृद्धि करने वाला श्रेष्ठ आयुर्वेदिक योग है। यह योग इसी नाम से बना-बनाय आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता की दुकान पर मिलता है।


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