7.3.17

इसबगोल के औषधीय उपयोग,प्रयोग,लाभ // Medicinal Uses, Benefits of Isabgol


    विश्व की लगभग हर प्रकार की चिकित्सा पद्धति में 'ईसबगोल' का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। अरबी और फारसी चिकित्सकों द्वारा इसके इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। दसवीं सदी के फारस के मशहूर हकीम अलहेरवी और अरबी हकीम अविसेन्ना ने 'ईसबगोल' द्वारा चिकित्सा के संबंध में व्यापक प्रयोग व अनुसंधान किए। 'ईसबगोल' मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- 'पेट ठंडा करनेवाला पदार्थ', गुजराती में 'उठनुंजीरू' कहा जाता है। लेटिन भाषा में यह 'प्लेंटेगो ओवेटा' नाम से जाना जाता है। इसका वनस्पति शास्त्रीय नाम 'प्लेटेगा इंडिका' है तथा यह 'प्लेटो जिनेली' समूह का पौधा है।
ईसबगोल प्लेनटेगो आवेटा तथा प्लेंटेगो सिलियम नामक पौधे के लाल भूरे एवं काले बीजो से इसबगोल प्राप्त होता हैं। यह एक झाड़ी के रूप में उगता है, जिसकी अधिकतम ऊँचाई ढाई से तीन फुट तक होती है। इसके पत्ते महीन होते हैं तथा इसकी टहनियों पर गेहूँ की तरह बालियाँ लगने का बाद फूल आते हैं। फूलों में नाव के आकार के बीज होते हैं। इसके बीजों पर पतली सफ़ेद झिल्ली होती है। यह झिल्ली ही ‘ईसबगोल की भूसी’ कहलाती है।
डाइबिटीज - ईसबगोल का पानी के साथ सेवन, रक्त में बढ़ी हुई शर्करा को कम करने में मदद करता है।
पाचन तंत्र - यदि आपको पाचन संबंधित समस्या बनी रहती है, तो ईसबगोल आपको इस समस्या से निजात दिलाता है। प्रतिदिन भोजन के पहले गर्म दूध के साथ ईसबगोल का सेवन पाचन तंत्र को दुरूस्त करता है।
सांस की दुर्गन्ध - ईसबगोल के प्रयोग से सांस की दुर्गन्ध से बचाता है, इसके अलावा खाने में गलती से कांच या कोई और चीज पेट में चली जाए, तो ईसबगोल सकी मदद से वह बाहर निकलने में आसानी होती है।
स्वप्नदोष:
ईसबगोल और मिश्री मिलाकर एक-एक चम्मच एक कप दूध के साथ सोने से 1 घंटा पहले लें और सोने से पहले पेशाब करके सोयें
'ईसबगोल' की भूसी तथा इसके बीज दोनों ही विभिन्न रोगों में एक प्रभावी औषधि का कार्य करते हैं। इसके बीजों को शीतल जल में भिगोकर उसके अवलेह को छानकर पीने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। नाक से खून बहने की स्थिति में 'ईसबगोल' के बीजों को सिरके के साथ पीसकर कनपटी पर लेप करना चाहिए।
कब्ज़ के अतिरिक्त दस्त, आँव, पेट दर्द आदि में भी 'ईसबगोल की भूसी' लेना लाभप्रद रहता है। अत्यधिक कफ होने की स्थिति में ईसबगोल के बीजों का काढ़ा बनाकर रोगी को दिया जाता है। आँव और मरोड़ होने पर एक चम्मच ईसबगोल की भूसी दो घंटे पानी में भिगोकर रोज़ाना दिन में चार बार लेने तथा उसके बाद से दही या छाछ पीने से लाभ देखा गया है।
ईसबगोलल की भूसी को सीधे भी दूध या पानी के साथ लिया जा सकता है या एक कप पानी में एक या दो छोटी चम्मच भूसी और कुछ शक्कर डालकर जेली तैयार कर लें तथा इसका नियमित सेवन करें।
ईसबगोल रक्तातिसार, अतिसार और आम रक्तातिसार में भी फ़ायदेमंद है। खूनी बवासीर में भी इसका इस्तेमाल लाभ पहुँचाएगा। पेशाब में जलन की शिकायत होने पर तीन चम्मच ईसबगोल की भूसी एक गिलास ठंडे पानी में भिगोकर उसमें आवश्यकतानुसार बूरा डालकर पीने से यह शिकायत दूर हो सकती है। इसी प्रकार कंकर अथवा काँच खाने में आ जाए, तो दो चम्मच ईसबगोल की भूसी गरम दूध के साथ तीन-चार बार लेने पर आराम मिलता है।
 सि‍रदर्द  - 
 ईसबगोल का सेवन सि‍रदर्द के लिए भी उपयोगी है। नीलगिरी के पत्तों के साथ इसका लेप दर्द से राहत देता है, साथ ही प्याज के रस के साथ इसके उपयोग से कान का दर्द भी ठीक होता है।
जोड़ों में दर्द - 
जोड़ों में दर्द होने पर ईसबगोल का सेवन राहत देता है। इसके अलावा दांत दर्द में भी यह उपयोगी है। वि‍नेगर के साथ इसे दांत पर लगाने से दर्द ठीक हो जाता है।
वजन कम करे - वजन कम करने के लिए भी फाइबर युक्त ईसबगोल उपयोगी है। इसके अलावा यह हृदय को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है।
कफ - 
कफ जमा होने एवं तकलीफ होने पर ईसबगोल का काढ़ा बनाकर पिएं। इससे कफ निकलने में आसानी होती है।
नकसीर - नाक में से खून आने पर ईसबगोल और सिरके का सर पर लेप करना, फायदेमंद होता है।
बवासीर - 
 खूनी बवासीर में अत्यंत लाभकारी ईसबगोल का प्रतिदिन सेवन आपकी इस समस्या को पूरी तरह से खत्म कर सकता है। पानी में भि‍गोकर इसका सेवन करना लाभदायक है।
अतिसार - पेट दर्द, आंव, दस्त व खूनी अतिसार में भी ईसबगोल बहुत जल्दी असर करता है, और आपकी तकलीफ को कम कर देता है।
हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति मूलतः प्राकृतिक पदार्थों और जड़ी-बूटियों पर आधारित थी। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति मेंसाध्य-असाध्य रोगों का इलाज हम प्रकृति प्रदत्त वनस्पतियों के माध्यम से सफलतापूर्वक करते थे। समय की धुंध के साथ हम कई प्राकृतिक औषधियों को भुला बैठे। 'ईसबगोल' जैसी चमत्कारिक प्राकृतिक औषधि भी उन्हीं में से एक है। हमारे वैदिक साहित्य और प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
विश्व की लगभग हर प्रकार की चिकित्सा पद्धति में 'ईसबगोल' का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। अरबी और फारसी चिकित्सकों द्वारा इसके इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। दसवीं सदी के फारस के मशहूर हकीम अलहेरवी और अरबी हकीम अविसेन्ना ने 'ईसबगोल' द्वारा चिकित्सा के संबंध में व्यापक प्रयोग व अनुसंधान किए। 'ईसबगोल' मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- 'पेट ठंडा करनेवाला पदार्थ', गुजराती में 'उठनुंजीरू' कहा जाता है। लेटिन भाषा में यह 'प्लेंटेगो ओवेटा' नाम से जाना जाता है। इसका वनस्पति शास्त्रीय नाम 'प्लेटेगा इंडिका' है तथा यह 'प्लेटो जिनेली' समूह का पौधा है।



तनारहित पौधा

'ईसबगोल' पश्चिम एशियाई मूल का पौधा है। यह एक झाड़ी के रूप में उगता है, जिसकी अधिकतम ऊँचाई ढाई से तीन फुट तक होती है। इसके पत्ते महीन होते हैं तथा इसकी टहनियों पर गेहूँ की तरह बालियाँ लगने का बाद फूल आते हैं। फूलों में नाव के आकार के बीज होते हैं। इसके बीजों पर पतली सफ़ेद झिल्ली होती है। यह झिल्ली ही 'ईसबगोल की भूसी' कहलाती है। बीजों से भूसी निकालने का कार्य हाथ से चलाई जानेवाली चक्कियों और मशीनों से किया जाता है। ईसबगोल भूसी के रूप में ही उपयोग में आता है तथा इस भूसी का सर्वाधिक औषधीय महत्व है। 'ईसबगोल' की बुआई शीत ऋतु के प्रारंभ में की जाती है। इसकी बुआई के वास्ते नमीवाली ज़मीन होना आवश्यक है। आमतौर पर यह क्यारियाँ बनाकर बोया जाता है। बीज के अंकुरित होने में करीब सात से दस दिन लगते हैं। 'ईसबगोल' के पौधों की बढ़त बहुत ही मंद गति से होती है।
औषधीय महत्व
यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसके बीजों को शीतल, शांतिदायक, मलावरोध को दूर करनेवाला तथा अतिसार, पेचिश और आंत के ज़ख्म आदि रोगों में उपयोगी बताया गया है। प्रसिद्ध चिकित्सक मुजर्रवात अकबरी के अनुसार नियमित रूप से 'ईसबगोल' का सेवन करने से श्वसन रोगों तथा दमे में भी राहत मिलती है। अठारवीं शताब्दी के प्रतिभाशाली चिकित्सा विज्ञानी पलेमिंग और रॉक्सवर्ग ने भी अतिसार रोग के उपचार के लिए 'ईसबगोल' को रामबाण औषधि बताया। रासायनिक संरचना के अनुसार, 'ईसबगोल' के बीजों और भूसी में तीस प्रतिशत तक 'क्यूसिलेज' नामक तत्व पाया जाता है। इसकी प्रचुर मात्रा के कारण इसमें बीस गुना पानी मिलाने पर यह स्वादरहित जैली के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसके अतिरिक्त 'ईसबगोल' में १४.७ प्रतिशत एक प्रकार का अम्लीय तेल होता है, जिसमें खून के कोलस्ट्रोल को घटाने की अद्भुत क्षमता होती है।
आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में भी इन दिनों 'ईसबगोल' का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। पाचन तंत्र से संबंधित रोगों की औषधियों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। अतिसार, पेचिश जैसे उदर रोगों में 'ईसबगोल' की भूसी का इस्तेमाल न केवल लाभप्रद है, बल्कि यह पाश्चात्य दवाओं दुष्प्रभावों से भी सर्वथा मुक्त है। भोजन में रेशेदार पदार्थों के अभाव के कारण 'कब्ज़' हो जाना आजकल सामान्य बात है और अधिकांश लोग इससे पीड़ित हैं। आहार में रेशेदार पदार्थों की कमी को नियमित रूप से ईसबगोल की भूसी का सेवन कर दूर किया जा सकता है। यह पेट में पानी सोखकर फूलती है और आँतों में उपस्थित पदार्थों का आकार बढ़ाती है। इससे आँतें अधिक सक्रिय होकर कार्य करने लगती है और पचे हुए पदार्थों को आगे बढ़ाती है। यह भूसी शरीर के विष पदार्थ (टाक्सिंस) और बैक्टीरिया को भी सोखकर शरीर से बाहर निकाल देती है। इसके लसीलेपन का गुण मरोड़ और पेचिश रोगों को दूर करने में सहायक होता है।
यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसके बीजों को शीतल, शांतिदायक, मलावरोध को दूर करनेवाला तथा अतिसार, पेचिश और आंत के ज़ख्म आदि रोगों में उपयोगी बताया गया है। प्रसिद्ध चिकित्सक मुजर्रवात अकबरी के अनुसार नियमित रूप से 'ईसबगोल' का सेवन करने से श्वसन रोगों तथा दमे में भी राहत मिलती है। अठारवीं शताब्दी के प्रतिभाशाली चिकित्सा विज्ञानी पलेमिंग और रॉक्सवर्ग ने भी अतिसार रोग के उपचार के लिए 'ईसबगोल' को रामबाण औषधि बताया। रासायनिक संरचना के अनुसार, 'ईसबगोल' के बीजों और भूसी में तीस प्रतिशत तक 'क्यूसिलेज' नामक तत्व पाया जाता है। इसकी प्रचुर मात्रा के कारण इसमें बीस गुना पानी मिलाने पर यह स्वादरहित जैली के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसके अतिरिक्त 'ईसबगोल' में १४.७ प्रतिशत एक प्रकार का अम्लीय तेल होता है, जिसमें खून के कोलस्ट्रोल को घटाने की अद्भुत क्षमता होती है।
इसबगोल पाचन संस्थानों के विकारो के लिए महान औषिधि हैं। यह बवासीर में होने वाले दर्द को कम करती हैं। इसकी तासीर ठंडी होने के कारण यह शरीर में होने वाली जलन को भी शांत कर देती हैं। यह कब्ज को दूर करती हैं, गाल ब्लैडर की पत्थरी बनने से रोकती हैं। इसबगोल में जो चिकनाई पायी जाती हैं, उसके कारण ये अन्न नलिका की रुक्षता दूर करती हैं।
इसमें पाये जाने वाले लुआब के कारण यह आंतो की गति को बढाकर, मल को बाहर निकालने में सहायक होती हैं। इसके अलावा यह जीवाणुओ की वृद्धि को रोकती हैं, जीवाणुओ से पैदा हुए विषो का अवशोषण करती हैं।
अल्सर में लाभदायक :
 आंतो में जब अल्सर पैदा हो जाते हैं तो उस अवस्था में जब इसका सेवन किया जाता हैं तो यह अल्सर के ऊपर एक आवरण बना देती हैं, जिसके कारण अल्सर पर सेवन किये गए मिर्च मसालों का बुरा असर नहीं पड़ पाता।
इसबगोल का भुना बीज दस्तो को रोकता हैं।



एल डी एल कोलेस्ट्रोल को कंट्रोल :
 
इसबगोल फाइबर का सस्ता स्त्रोत हैं। इसके नियमित सेवन से कोलेस्ट्रोल कम हो जाता हैं। इसबगोल पाचन संस्थान में कोलेस्ट्रोल बहुल बाइल अर्थात पित्त को काफी हद तक सोखने की क्षमता रखता हैं। अर्थात एल डी एल कोलेस्ट्रोल को भी कंट्रोल करता हैं।
वजन नियंत्रण में : 
यह वजन नियंत्रण करने का भी कार्य करता हैं। जब यह पेट में पहुँचता हैं तो जल का अवशोषण करते हुए पेट को भर देती हैं, जिससे व्यक्ति को भूख ना लगने का सुखद अहसास होता हैं। एक ब्रिटिश अनुसंधान के अनुसार भोजन के तीन घंटो पूर्व जिन महिलाओ ने इसबगोल का सेवन किया उनके शरीर ने आहार से वसा का कम अवशोषण किया।
डाईवेर्टिकुलर डिसीज़,
 कब्ज, दस्त, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, पाइल्स: डाईवेर्टिकुलर डिसीज़, जिसमे आंतो में बनी हुयी छोटी छोटी पॉकेट्स में मल इकट्ठा होता रहता हैं, फल स्वरुप संक्रमण होने की आशंकाए पैदा हो जाती हैं, ऐसी विकट परिस्थिति में इसबगोल आंतो से मल को बाहर कर देता हैं। विविध मल त्याग सम्बन्धी विकार जैसे कब्ज, दस्त, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, पाइल्स के लिए तो यह रामबाण औषिधि हैं। इन परिस्थितियों में तो सबसे पहले यह जल का अवशोषण करती हैं। मल को बांधती हैं तथा सुगमता पूर्वक मल त्याग कराती हैं। ढीले मल से जलीयांश को अवशोषित करने की विशिष्ट क्षमता के कारण ही ये दस्तो के उपचार में प्रभावी हैं।
पुरानी कब्ज, आंव, आंतों की सूजन :
पुरानी आंव या आंतों की सूजन में 100-100 ग्राम बेल का गूदा, सौंफ, ईसबगोल की भूसी और छोटी इलायची को एक साथ पीसकर पाउडर बना लेते हैं। अब इसमें 300 ग्राम देशी खांड या बूरा मिलाकर कांच की शीशी में भरकर रख देते हैं।
इस चूर्ण की 2 चम्मच मात्रा सुबह नाश्ता करने के पहले ताजे पानी के साथ लेते हैं और 2 चम्मच शाम को खाना खाने के बाद गुनगुने पानी या गर्म दूध के साथ 7 दिनों तक सेवन करने से लाभ मिल जाता है। लगभग 45 दिन तक यह प्रयोग करने के बाद बंद कर देते हैं। इससे कब्ज, पुरानी आंव और आंतों की सूजन के रोग दूर हो जाते हैं।
श्वास या दमा:
1 वर्ष या 6 महीने तक लगातार रोजाना सुबह-शाम 2 चम्मच ईसबगोल की भूसी गर्म पानी से सेवन करते रहने से सभी प्रकार के श्वांस (सांस) रोग दूर हो जाते हैं। 6 महीने से लेकर 2 साल तक सेवन करते रहने से 20 से 22 साल तक का पुराना दमा रोग भी इस प्रयोग से चला जाता है। 1-1 चम्मच ईसबगोल की भूसी को दूध के साथ लगातार सुबह और शाम कुछ महीनों तक सेवन करने से दमा के रोग में लाभ मिलता है।
कान का दर्द:
ईसबगोल के लुवाब में प्याज का रस मिलाकर, हल्का सा गर्म करके कान में बूंद-बूंद करके डालने से कान के दर्द में लाभ मिलता है।
मुंह के छाले:
ईसबगोल को पानी में डालकर रख दें। लगभग 2 घंटे के बाद उस पानी को कपड़े से छानकर कुल्ले करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
3 ग्राम ईसबगोल की भूसी को मिश्री में मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ सेवन करें। इससे मुंह के छाले और दाने ठीक हो जाते हैं। ईसबगोल से कब्ज व छाले नष्ट होते हैं। ईसबगोल को गर्म पानी में घोलकर दिन में 2 बार कुल्ला करने से मुंह के छालों में आराम होगा।
आंतों की जलन- संग्रहणी
आंतों की जलन- संग्रहणी की दाहजन्य पीड़ा में ईसबगोल को दूध में पकाकर मिसरी मिलाकर दूध ठंडा होने के बाद पिलाने से आंतों की जलन कम होती है। यह औषधि भूख बढ़ाती है, मल को बांधती हैं।
पित्तजन्य सिरदर्द में
पित्त विकार के कारण सिरदर्द एवं आंखों का दर्द हो तो ईसबगोल के बीज की 10 ग्राम मात्रा लेकर पानी में भिगो दें तथा 3-4 घंटे बाद मसलकर छानकर मिसरी मिलाकर ठंडे पानी या ठंडे दूध के साथ पीने से लाभ मिलता है।
बवासीर एवं दस्त रोगों में (ईसबगोल का विशिष्ट योग)-
ईसबगोल 50 ग्राम, छोटी इलायची 25 ग्राम और धनिया के बीज 25 ग्राम लेकर सबको मिलाकर चूर्ण बना लें तथा नित्य 5 ग्राम की मात्रा में नित्य प्रात: एवं शाम को पानी या दूध के साथ सेवन करने से बवासीर, रक्तस्राव, मूत्रकृच्छ, प्रमेह, कब्ज, वर में दस्त, पुराना दस्त रोग, नकसीर एवं पित्तविकार के कारण दस्त में लाभ होता है। दस्त रोगों में चूर्ण को जल के साथ ही लेना उचित रहता है। ईसबगोल बवासीर एवं कब्ज तथा दस्त रोगों की रामबाण औषधि मानी गई है।



    जिस ईसबगोल को आप अपने पेट को ठीक रखने के लिए खाते हैं, वही ईसबगोल आपको नुकसान भी पहुंचा सकता है। जी हां, ईसबगोल के फायदे ही नहीं, कुछ साइड इफेट्स भी होते हैं। इसलिए उसके इस्तेमाल से पहले आपको उनकी जानकारी होनी चाहिए। आइये जानें इसको खाने से आपको कौन से तीन नुकसान होने का डर होता है।

2) दवाओं का असर कम करे
ईसबगोल की वजह से शरीर में दवाओं का अवशोषण भी बाधित हो सकता है। दरअसल, ईसबगोल दवाओं की सिर्फ ऊपरी सतह को अवशोषित करने देता है जिससे कि वो रक्त में मिल नहीं पाती। इसकी वजह से दवा का पूरा असर नहीं होता। ऐसा ऐस्प्रिन के लिए दावा किया जाता है लेकिन ऐसा माना जाता है कि ईसबगोल की वजह से दूसरी दवाओं के असर में भी कमी आती है। हालांकि इस बात का फिलहाल कोई पुख्ता सुबूत नहीं है।
1) मिनरल्स के अवशोषण में दिक्कत पैदा करे
एक अध्ययन में ये पाया गया कि 25 ग्राम ईसबगोल भूसी खाने से जिंक, कॉपर और मैग्नीज़ जैसे मिनरल्स का शरीर में अवशोषण मुश्किल हो जाता है। इसकी वजह से शरीर में मिनरल्स का स्तर घट जाता है। ज़िंक इम्यूनिटी के लिए, मैग्नीज़ हड्डियों के लिए और कॉपर लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण होता है।
3) पेट में मरोड़ उठना
ईसबगोल में फाइबर काफी मात्रा में होता है इसलिए इसे उन लोगों को खाने की सलाह दी जाती है जिन्हें कब्ज़ की शिकायत होती है। लेकिन बहुत अधिक फाइबर खा लेने से गैस का रास्ता प्रभावित होता है, जिससे कि मरोड़ उठने लगते हैं और पेट में दर्द होता है।
सेवन विधि
इसबगोल के बीजो अथवा भूसी को साफ़ कर एक कप पानी में घोलकर, इसे खूब घोल कर पीना चाहिए। बीजो अथवा भूसी को एक कप पानी में डालकर लगभग 2-3 घंटे के लिए छोड़ दे। जब पूरा लुआब बन जाए तब देशी चीनी अथवा मिश्री मिला कर खाए। एक या दो चम्मच दिन भर में दो तीन बार सेवन करे। एक दिन में 30 ग्राम से अधिक नहीं।
इसबगोल का अधिक सेवन करने से कब्ज हो जाता हैं। जठराग्नि का मंद होना भी संभव हैं, इसलिए इसके तयशुदा सेवन के समय प्रचुर मात्रा में पेय पदार्थो का सेवन करे। इसके साथ दाक्षसव का सेवन करने से भी इसके अहित प्रभावों से बचा जा सकता हैं। गर्भवती स्त्रियां इसका सेवन सावधानी पूर्वक करे।




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