27.1.17

स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के नुस्खे:Easy Tips to weakness of Nervous System

   


    पूरे शरीर को नियंत्रित और निर्देशित करने वाला तंत्रिका-तंत्र या नर्वस सिस्टम यूं तो बेहद सफाई से बना होता है और अपना काम करता है, फिर भी कभी-कभी गड़बड़ियां हो जाती हैं. हमारे डीएनए की कुछ विकृतियां इन गड़बड़ियों या कहें तो बीमारियों के लिए जिम्मेदार होती है. इनमें से कुछ को दवाओं से ठीक किया जा सकता है लेकिन कुछ पर दवाएं बेअसर होती हैं. यदि कोई गड़बड़ी न्यूरॉन (विशेष रूप से दिमाग में पाई जानेवाली वे कोशिकाएं जो इलेक्ट्रिक सिग्नल के जरिए संकेत प्राप्त करके या भेजकर शरीर को नियंत्रित करती हैं) से संबंधित है तब ज्यादा संभावना होती है कि दवाएं कम असर करें.
स्नायु संस्थान जिसे अंग्रेजी भाषा में (Nervous System) भी कहा जाता है। स्नायु संस्थान की कमज़ोरी का कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इसकी कमज़ोरी से चक्कर, उल्टी, और शरीर शिथिल हो जाता है। स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के कारण व्यक्ति ठीक तरह से खड़ा नहीं हो पता और न ही कोई काम कर सकता है।



इससे ग्रसित व्यक्ति को बिस्तर पर लंबे समय तक आराम करना पड़ता है। इसलिए हम स्नायु संतान की कमज़ोरी से ग्रसित व्यक्ति के लिए लाये है आयुर्वेद की गोद से पक्का, आसान और पूरी तरह से प्राकृतिक तरीका जिससे स्नायु संस्थान की कमज़ोरी दूर हो जाएगी।
स्नायु संस्थान (Nervous System) की कमज़ोरी का प्राकृतिक इलाज़ –
बनारसी ऑवले का मुरब्बा एक नग अथवा नीचे लिखी विधि से बनाया गया बारह ग्राम (बच्चों के लिए आधी मात्रा) लें। प्रातः खाली पेट खूब चबा-चबाकर खाने और उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न लेने से मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं को बल मिलता है और स्नायु संस्थान (Nervous System) शक्तिशाली बनता है।
विशेष- गर्मियों के मौसम में इसका सेवन अधिक लाभकारी है। इस मुरब्बे को यदि चाँदी के बर्क में लपेटकर खाया जाय तो दाह, कमजोरी तथा चक्कर आने की शिकायत दूर होती है। वैसे भी ऑवला का मुरब्बा शीतल और तर होता है और नेत्रों के लिए हितकारी, रक्तशोधक, दाहशामक तथा हृदय, मस्तिष्क, यकृत, आंतें, आमाशय को शक्ति प्रदान करने वाला होता है। इसके सेवन से स्मरणशक्ति तेज होती है। मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
    मानसिक दुर्बलता के कारण चक्कर आने की शिकायत दूर होती है। सवेरे उठते ही सिरदर्द चालू हो जाता है और चक्कर भी आते हो तो भी इससे लाभ होता है। आजकल शुद्ध चाँदी के वर्क आसानी से नहीं मिलते अतः नकली चाँदी के वर्क का इस्तेमाल न करना ही अच्छा है। चाय-बिस्कुट की जगह इसका नाश्ता लेने से न केवल पेट ही साफ रहेगा बल्कि शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति एवं कान्ति में भी वृद्धि होगी। निम्न विधि से निर्मित आँवला मुरब्बा को यदि गर्भवती स्त्री सेवन करे तो स्वयं भी स्वस्थ रहेगी और उसकी संतान भी स्वस्थ होगी।



   अॉवले के मुरब्बे के सेवन से रंग भी निखरता है। निषेध-मधुमेह को रोगी इसे न लें।
अाँवला मुरब्बा बनाने की सर्वोत्तम विधि- 500 ग्राम स्वच्छ हरे आँवला कडूकस करके उनका गूदा किसी काँच के मर्तबान में डाल दें और गुठली निकाल कर फेंक दें। अब इस गूदे पर इतना शहद डालें कि गूदा शहद में तर हो जाये। तत्पश्चात् उस काँच के पात्र को ढक्कन से ढ़क कर उसे दस दिन तक रोजाना चार-पाँच घंटे धूप में रखे। इस प्रकार प्राकृतिक तरीके से मुरब्बा बन जायेगा।
   बस, दो दिन बाद इसे खाने के काम में लाया जा सकता है। इस विधि से तैयार किया गया मुरब्बा स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रेष्ठ है क्योंकि आग की बजाय सूर्य की किरणों द्वारा निर्मित होने के कारण इसके गुण-धर्म नष्ट नहीं होते और शहद में रखने से इसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। सेवन विधि–प्रतिदिनं प्रातः खाली पेट 10 ग्राम (दो चम्मच भर) मुरब्बा लगातार तीन-चार सप्ताह तक नाश्ते के रूप में लें, विशेषकर गर्मियों में। चाहें तो
इसके लेने के पन्द्रह मिनट बाद गुनगुना दूध भी पिया जा सकता है। चेत्र या क्वार मास में इसका सेवन करना विशेष लाभप्रद है।
    ऐसा मुरब्बा विद्यार्थियों और दिमागी काम करने वालों की मस्तिष्क की शक्ति और कार्यक्षमता बढ़ाने और चिड़चिड़ापन दूर करने के लिए अमृत तुल्य है। इसमें विटामिन सी’, ‘ए’, कैलशियम, लोहा का अनूठा संगम है। 100 ग्राम ऑवले के गूदे में 720 मिलीग्राम विटामिन ‘सी’, 15 आइ.यू.विटामिन ‘ए’, 50 ग्राम कैलशियम, 1.2 ग्राम लोहा पाया जाता है। अॉवला ही एक ऐसा फल है जिसे पकाने या सुखाने पर भी इसके विटामिन नष्ट नहीं होते।
   यदि उपरोक्त विधि से मुरब्बा बनाना सम्भव न हो तो केवल हरे ऑवले के बारीक टुकड़े करके या कडूकस करके शहद के साथ सेवन करना भी लाभप्रद है। इससे पुराने कब्ज व पेट के रोगों में भी अभूतपूर्व लाभ होता है।




    स्नायु संस्थान का काम शरीर से जु़डी हुई सभी संवेदनाओं को इकटा कर मस्तिष्क तक पहुंचाना होता है। जिस वक्त हमारा स्नायु संस्थान काम करना बंद कर देता है या उसमें कोई दोष आता है तो लकवा आदि बीमारियों से व्यक्ति ग्रसित हो जाता है।
    यदि इस तंत्र में दुर्बलता आती है, व्यक्ति में निम्न लक्षण देखने को मिलते हैं - वह जल्दी थकता है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करता है, चक्कर आते हैं, दिल की ध़ाडकन बढ़ती है और अपने शरीर की शक्ति से अधिक शारीरिक श्रम करना और अधिक मानसिक श्रम करने से यह रोग हो जाता है। ऎसे में व्यक्ति की याददाश्त भी बहुत कम हो जाती है।
    इसके ईलाज के लिए काली मिर्च, अदरक, पिस्ता, बादाम, किशमिश और अदरक को बराबर मात्रा में मिलाकर इसका एक पेस्ट बना लें। जिसे सुबह-शाम खाने से इस रोग में कमी आती है।
   अदरक को छाँव में सुखाकर उसकी सोंठ बना लें। इस सोंठ में थो़डा जीरा और शहद मिलाकर सुबह-शाम चाट लें। त्रिफला और अदरक का रस दोनों को शहद में मिलाकर पीने से स्नायु दुर्बलता में आराम आता है

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