Saturday, January 28, 2017

कत्था ( खदिर, खैर ) के गुण,लाभ,उपयोग: Benefits of Catechu (Khadir)



    


परिचय :  इसे खदिर (संस्कृत), खैर (हिन्दी), खयेर (बंगाली), काथ (मराठी), खेर (गुजराती) कचुकट्टि (तमिल), पोडलमानु (तेलुगु) तथा एकेशिया कटेचू (लैटिन) कहते हैं।
खैर सूखे वायुमण्डल में अधिक होता है। हिमालय में 5 हजार फुट की ऊँचाई तक, पश्चिमोत्तर प्रदेश, बम्बई आदि प्रान्तों में पाया जाता है।
    अगर आप पान खाने के शौकीन हैं तो कत्‍थे के बारे में भी जरुर जानते होंगे। कत्‍थई रंग के दिखने वाले इस कत्‍थे के बिना, पान कभी स्‍वाद नहीं दे सकता। पान में लगाए जाने वाले लाल रंग के कत्थे से तो आप भलीभांति परिचि‍त होंगे। यही कत्था पान खाते वक्त आपके होंठो को लाल करता है। लेकिन इसके अलावा कत्थे की एक और प्रजाति‍ होती है जिसे सफेद कत्थे के रूप में जाना जाता है। इसे औषधि‍ के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसके औषधीय उपयोग के बारे मे बताते हैं-
कत्‍था, खैर के वृक्ष की लकड़ी से निकाला जाता है। आयुर्वेद के अनुसार कत्‍था, ठंडा, कडुवा, तीखा व कसैला होता है। यह कुष्‍ठ रोग, मुख रोग, मोटापा, खांसी, चोट, घाव, रक्‍त पित्‍त आदि को दूर करता है।

खैर के वृक्ष की छाल से ‘खदिर-सार’ तैयार किया जाता है। यह काले कत्थई रंग का जमाया हुआ पदार्थ ही कत्था है।
रासायनिक संघटन :
 इसमें खदिरसार (कत्था) 35 प्रतिशत तथा टैनिन द्रव्य 57 प्रतिशत मिलता है। इसमें कैटेचीन नामक सत्व मिलता है।
कत्था के गुण :




 यह स्वाद में कडुआ, कसैला, पचने पर कटु, हल्का तथा सूक्ष्म है। इसका मुख्य प्रभाव त्वचा-ज्ञानेन्द्रिय पर कुष्ठध्न (कुष्ठ आदि चर्मरोगों का नाश करनेवाला) रूप में पड़ता है। यह रक्त का स्तम्भक, वर्धक, शोधक, दन्त्य (दाँत) तथा मुखरोगहर), रंग को ठीक करनेवाला, व्रण-शोधक (घाव-शोधक), स्तम्भक (दस्त बन्द करनेवाला) मेदशोषक, गर्भाशय-शिथिलताहर तथा शुक्रशोधक है।मगर हां, कत्‍थे का अधिक सेवन करने से नपुंसकता भी हो सकती है। इसके अलावा कत्‍थे के अधिक सेवन से किड़नी स्‍टोन भी बनता है। इसलिये कत्‍थे का चूर्ण 1 से 3 ग्राम तक ही प्रयोग करें। 
मलेरिया -
 मलेरिया बुखार होने पर कत्था एक बेहतर औषधि के रूप में काम करता है। जी हां, समय-समय पर इसकी समान मात्रा में गोली बनाकर चूसने से मलेरिया से बचाव किया जा सकता है। 
दस्त - 
पेट खराब होने या दस्त लगने की समस्या में कत्थे का इस्तेमाल करना फायदेमं होता है। कत्थे को पकाकर या पानी में उबालकर लेने से दस्त में राहत मिलती है। इसके अलावा पाचन संबंधी समस्याओं में भी कत्था लाभप्रद है|
दांत की समस्या -
 दांत संबंधी किसी भी प्रकार की समस्या में कत्थे के चूर्ण को मंजन में मिलाकर प्रयोग करने से लाभ होता है। इस के अलावा कत्थे के चूर्ण को सरसों के तेल के साथ मिलाकर मंजन करने से भी बहुत लाभ होता है|
खांसी -
 अगर आप लगातार खांसी से परेशान हैं, तो कत्थे को हल्दी और मिश्री के साथ एक-एक ग्राम की मात्रा में मिलाकर गोलियां बना लें। अब इन गोलियों को चूसते रहें। इस प्रयोग को करने से खांसी दूर हो जाती है।
गले की खराश - 




गले में खराश होने पर 300 मिलीग्राम कत्‍थे को पीसकर चूर्ण बना लें और इसे समय-समयपर मुंह में रखकर चूसते रहें। दिनभर में 5 से 6 बार इस प्रयोग को करने से गला बैठना, खराश और छाले होने की समस्या खत्म हो जाती है।
    सफेद कत्‍था औषधि और लाल कत्‍था पान में प्रयोग किया जाता है। पान में लगाया जाने वाला कत्‍था बीमारियों को दूर करने के लिये पय्रोग ना करें।
प्रदर रोग :
 कत्थे और बांस के पत्तों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और इसमें 6 ग्राम शहद की मात्रा लेकर पेस्ट बनाकर खाएं। इस प्रयोग को करने से लाभ मिलता है।
दमा रोग : 
सांस संबंधी समस्याओं के लिए भी कत्था बहुत अच्छी औषधि है। इसे हल्दी और शहद के साथ मिलाकर दिन में दो से चार बार एक चम्मच की मात्रा में लेने से काफी लाभ होता है।
दांतों की बीमारी :
 कत्थे को मंजन में मिला कर दांतों व मसूढ़ों पर रोज सुबह शाम मलने से दांत के सारे रोग दूर होते हैं।
दांतों के कीड़े-
कत्‍थे को सरसों के तेल में घोल कर रोजाना 3 से 3 बार मसूढ़ों पर मलें। इससे खून आना तथा बदबू आनी दूर हो जाएगी।
खट्टी डकार :
 300 से 700 मिली ग्राम कत्था का सुबह शाम सेवन करने से खट्टी डकार बंद हो जाती है।
कान दर्द :
 सफेद कत्थे को पीस कर गुनगुने पानी में मिला कर कानों में डालने से कान दर्द दूर होता है।
कुष्ठ रोग : 




कत्थे के काढ़े को पानी में मिलाकर प्रति दिन नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
योनि की जलन और खुजली :
 5 ग्राम की मात्रा में कत्था, विण्डग और हल्दी ले कर पानी के साथ पीस कर योनि पर लगाएं। इससे खुजली और जलन दोनों ठीक हो जाएगी।
घाव - 
किस प्रकार की चोट लगने पर घाव हो जाए, तो उसमें कत्थे को बारीक पीसकर इस चूर्ण को डाल दें। लगातार ऐसा करने पर घाव जल्दी भर जाता है और खून का निकलन भी बंद हो जाता है।  
बवासीर-
सफेद कत्‍था, बड़ी सुपारी और नीलाथोथा बराबर मात्रा में लें। पहले सुपारी व नीलाथोथा को आग पर भून लें और फिर इस में कत्‍थे को मिला कर पीस कर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को मक्‍खन में मिला कर पेस्‍ट बनाएं। इस पेस्‍ट को रोज सुबह-शाम शौच के बाद 8 से 10 दिन तक मस्‍सों प लगाने से मस्‍से सूख जाते हैं।
सावधान रहें-
गर्भवती स्त्रियों को कत्थे का सेवन नहीं करना चाहिए, और पुरुषों में इसका अत्यधिक सेवन नपुंसकता का कारण बन सकता है। इसके अलावा कत्‍थे के अधिक सेवन से किडनी स्टोन भी हो सकता है। इसलिये कत्‍थे का चूर्ण1 से 3 ग्राम तक ही प्रयोग करें।
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