Sunday, January 15, 2017

एक्ज़ीमा का होम्योपैथिक इलाज



    एक्जिमा के लक्षणों में त्वचा में खुजली, लालिमा और छोटे उभार या फफोले शामिल हैं। अगर इन लक्षणों का इलाज नहीं किया जाए, तो त्वचा मोटी, खुरदुरी, और शुष्क हो सकती है। जिसके साथ कुछ ऐसे क्षेत्र उत्पन्न हो सकते हैं जहाँ के बाल झड़ जाते हैं और रंग में परिवर्तन आ जाता है। लंबी अवधि के एक्जिमा से प्रभावित त्वचा, बैक्टीरिया जनित अग्रिम संक्रमण के लिए आमतौर पर अधिक संवेदनशील हो जाती है।
एक्जिमा कई प्रकार का होता है, लेकिन एक्जिमा के लक्षणों को सामान्‍य करके देखा जा सकता है। चाहे कारण कुछ भी हों, कम या ज्‍यादा एक्जिमा के लक्षण आमतौर पर इस प्रकार के होते हैं-संक्रमित त्‍वचा में खुजली और लालिमा
शुष्‍क और पपड़ीदार त्‍वचा। और खुजली करने पर त्‍वचा के उस हिस्‍से का मोटा हो जाता।
प्रभावित क्षेत्र में गांठ पड़ जाना
छाले नमी भरी त्‍वचा
एक्जीमा त्वचा का दीर्घजीवी रोग हैं। होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार  यह रोग सोरा दोष के कारण होते हैं। यदि मनुष्य की प्रकृति में ‘सोरा’ दोष के तत्त्व नहीं होंगे, तो एक्जीमा होगा ही नहीं। वास्तव में ‘सोरा’ हमारी भौतिकवादी प्रवृत्ति एवं मानसिक और वैचारिक विषाक्तता का ही परिणाम है। वैसे भी ‘सोरा’ शब्द का उदभव ‘सोरेट’ से हुआ है जिसका हिंदी रूपान्तर ‘खुजली’ होता है।
एक्जीमा : इसे हिन्दी में अकौता, छाजन और पामा भी  कहते हैं। यह रोग ज्यादातर पैर के टखनों के पास या पिण्डलियों में, जोड़ों में, कान के पीछे गर्दन पर, हाथों में और जननांग प्रदेश में होता पाया जाता है। वैसे, यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इस रोग में तीव्र खुजली होती है। जननांग प्रदेश में इस रोग का होना सबसे ज्यादा कष्टदायक होता है।
एक्जिमा के कारण
यह रोग अनुचित आहार-विहार करने, अजीर्ण बने रहने, मांसाहार करने, डायबिटीज रोग होने और त्वचा को ज्यादा रगड़ लगने आदि कारणों से भी होता है।
होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार ‘सोरा’ दोष का होना आवश्यक है।
• जीवाणुओं, फफूंद एवं परजीवी (जैसे साटकोप्ट्स-स्केबियाई) आदि सूक्षम जीवों द्वारा भी यह रोग होता है।
एक्जिमा के लक्षण एवं उपचार
सूखा एक्जीमा – सूखा एक्जीमा होने पर निम्नलिखित औषधियों में से,जिस औषधि के सर्वाधिक लक्षण रोगी में पाए जाएं, उस औषधि का सेवन रोगी को करना चाहिए।
एलुमिना : त्वचा का बेहद खुश्क, रूखा, सूखा और सख्त हो जाना, दरारें पड़ जाना और बेहद तेज खुजली होना और खुजाने पर फुसियां उठ आना विशेष लक्षण है। कब्ज रहना, बिस्तर में पहुंचकर गरमाई मिलने के बाद अत्यधिक खुजलाहट, सुबह उठने पर और गर्मी से परेशानी बढ़ना और खुली हवा में एवं ठंडे पानी से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर उक्त दवा 30 एवं 200 शक्ति में अत्यंत कारगर है।





कैल्केरिया सल्फ : यह बच्चों के खुश्क एक्जीमा की उत्तम औषधिहै। सिर पर छोटी-छोटी पुंसियां हो जाएं, जिन्हें खुजाने पर खून निकलने लगे, मुख्य लक्षण हैं। 3 × से 12 x शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
सल्फर : रोगी मैला और गंदा हो, शरीर से दुर्गध आती हो, फिर भी अपने को राजा महसूस करें, रोगी शरीर में गर्मी का अनुभव करता हो, पैरों में जलन होती हो, मीठा खाने की प्रबल इच्छा, अत्यधिक खुजली, किन्तु खुजाने पर आराम मिलता है और अधिक खुजाने पर खून निकलने लगे, बिस्तर की गर्मी से परेशानी बढ़ना, खड़े रहना दुष्कर, सुबह के वक्त अधिक परेशानी, किन्तु सूखे एवं गर्म मौसम में बेहतर महसूस करें। इन लक्षणों के आधार पर ‘सल्फर’ की 30 एवं 200 शक्ति की दवा की एक-दो खुराक ही चमत्कारिक असर दिखाती हैं। इस दवा के रोगी की एक अन्य विशेषता यह है कि शरीर के सारे छिद्र-यथा नाक, कान, गुदा अत्यधिक लाल रहते हैं, अत्यधिक खुजली एवं जलन रहती है। साथ ही पहले कभी एक्जीमा वगैरह होने पर अंग्रेजी दवाओं के लेप से उन्हें ठीक कर लेना और उसके बाद कोई अंदरूनी परेशानी लगातार महसूस करते रहना इसका मुख्य लक्षण है।
रसवेनेनेटा : किसी भी प्रकार का खुश्क एक्जीमा, जिसमें त्वचा पर दाने की पुंसियां हों और तेज खुजली होती हो ,श्रेष्ठ दवा है। रात में अधिक खुजली, गर्म पानी से धोने पर आराम मिलना, त्वचा में लाली, त्वचा की ऊपरी सतह (एपिडर्मिस) में ‘वेसाइकिल’ बन जाना आदि लक्षणों के आधार पर 200 एवं 1000 शक्ति की दवा की दो-तीन खुराकें ही पर्याप्त होती हैं।

गीला एक्जीमा (वीपिंग एक्जीमा) –
ग्रेफाइटिस : गीले एक्जीमा को ठीक करने के लिए यह दवा बहुत कारगर रही है। अस्वस्थ त्वचा, जरा-से घाव से मवाद का स्राव, गाढ़ा, शहद जैसा मवाद, गर्मी में तथा रात के समय कष्ट बढ़ना, रगड़ने से दर्द होना, ग्रंथियों की सूजन, त्वचा अत्यंत खुश्क, खुश्की की वजह से स्तनों पर, हाथ-पैरों पर, गर्दन की त्वचा में दरारें पड़ जाना आदि लक्षणों के मिलने पर 30 शक्ति में एवं रोग अधिक पुराना हो, तो 200 शक्ति में अत्यंत लाभप्रद है।
स्थान विशेष का एक्जीमा
पेट्रोलियम : स्थान विशेष पर बार-बार एक्जीमा हो, गीला, जलन, रात में अधिक खुजली, जरा-सी खरोंच लगने के बाद मवाद पड़ जाना, लाली, माथे पर, कानों के पीछे, अण्डकोषों की त्वचा पर, गुदा पर, हाथ-पैरों पर इस प्रकार का एक्जीमा होना एवं मुख्य बात यह है कि एक्जीमा के लक्षण जाड़े के मौसम में ही प्रकट होते हैं। सिर्फ इसी लक्षण के आधार पर ‘पेट्रोलियम’ 200 शक्ति में दी जाए, तो मरीज दो-तीन खुराक खाने के बाद ही ठीक हो जाता है।
मेजेरियम : यह सिर के एक्जीमा की खास औषधि है। सिर पर, हाथों पर, पैरों पर पपड़ी जमे एवं उसके नीचे से बदबूदार मवाद निकले, जिसमें कृमि हों, सिर पर बालों के गुच्छे बन जाएं, ‘वेसाइकिल’ बन जाएं, हड्डियां भी प्रभावित हों, छूने से एवं रात्रि में अधिक दर्द एवं खुजली, जलन, खुली हवा में आराम मिलने पर उक्त दवा की 5-6 खुराक 30 अथवा 200 शक्ति में फायदेमंद रहती है।




एकजीमा रोगी के परहेज और आहार
लेने योग्य आहार
कच्चे फल जैसे कि सेब, नाशपाती, केले आदि।
ताज़ी सब्जियाँ।
तेल या घी बिना गर्म किया हुआ।
बच्चों के लिये स्तन दुग्ध।
इनसे परहेज करे
एसिड उत्पन्न करने वाले आहार जैसे कि माँस, चिकन, सूअर का माँस।
डेरी उत्पाद।
मक्के की चिप्स, पेस्ट्री, सफ़ेद चावल और मैदे का पास्ता (शक्कर की उच्च मात्रा)।
खमीर युक्त ब्रेड।
कृत्रिम मीठे तत्व।
सोया
अंडे
मेवे
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