अतिबला (खिरैटी) के रोग नाशक अद्भुत गुण







   अतिबला जिसे खिरैटी भी कहते हैं, यह जड़ी-बूटी वाजीकारक एवं पौष्टिक गुण के साथ ही अन्य गुण एवं प्रभाव भी रखती है अतः यौन दौर्बल्य, धातु क्षीणता, नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी क्षमता रखती है।अतिबला (खरैटी) को विभिन्न भाषाओं निम्न नामो से जाना जाता हैं :
संस्कृत : वला, वाट्यालिका, वाट्या, वाट्यालक
हिंदी : खरैटी, वरयारी, वरियार 

तेलगू : मुपिढी 
लैटिन : सिडकार्सि फोलिया
अंग्रेजी : हॉर्नडिएमव्ड सिडा।
बंगाली : श्वेतवेडेला
मराठी : लघुचिकणा, खिरहंटी
गुजराती : खपाट बलदाना 



अतिबला का सामान्य परिचय :

    अतिबला जिसे  खिरैटी भी कहा जाता है , पौष्टिक गुणों से भरपूर है |यह  आयुर्वेद में बाजीकरण के रूप में भी प्रयुक्त की जाती है धातु सम्बंधित रोग में इसका प्रयोग कारगर है ,यौन दौर्बल्य-धातु क्षीणता- नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी औषीधी है।

कालमेघ के उपयोग ,फायदे

इसकी और भी कई जातियां हैं पर बला, अतिबला, नागबला और महाबला ये चार जातियां ही ज्यादा प्रचलित हैं बला चार प्रकार की होती है चारों प्रकार की बला शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त, बलकारक, कान्ति, वर्द्धक, वात रक्त पित्त, रक्त विकार और व्रण को दूर करने वाली होती है इसके जड़ और बीज को उपयोग में लिया जाता है।

अतिबला (खरैटी) से होने वाले अद्भुत फायदे :


मसूढ़ों की सूजन : 

अतिबला (कंघी) के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन 3 से 4 बार कुल्ला करें। रोजाना प्रयोग करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।

*. नपुंसकता (नामर्दी)

अतिबला के बीज 4 से 8 ग्राम सुबह-शाम मिश्री मिले गर्म दूध के साथ खाने से नामर्दी में पूरा लाभ होता है।

* दस्त : 

अतिबला (कंघी) के पत्तों को देशी घी में मिलाकर दिन में 2 बार पीने से पित्त के उत्पन्न दस्त में लाभ होता है।

सुहागा के गुण,प्रयोग,उपचार 

* पेशाब के साथ खून आना : 

अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।

* बवासीर : 

अतिबला (कंघी) के पत्तों को पानी में उबालकर उसे अच्छी तरह से मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में उचित मात्रा में ताड़ का गुड़ मिलाकर पीयें। इससे बवासीर में लाभ होता है।

*. रक्तप्रदर :

       खिरैंटी और कुशा की जड़ के चूर्ण को चावलों के साथ पीने से रक्तप्रदर में फायदा होता है।
* खिरेंटी के जड़ का मिश्रण (कल्क) बनाकर उसे दूध में डालकर गर्म करके पीने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।
* रक्तप्रदर में अतिबला (कंघी) की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम से 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चीनी और शहद के साथ देने से लाभ मिलता है।1. पेशाब का बार-बार आना : खरैटी की जड़ की छाल का चूर्ण यदि चीनी के साथ सेवन करें तो पेशाब के बार-बार आने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।

* प्रमेह (वीर्य प्रमेह) : 

अतिबला के बारीक चूर्ण को यदि दूध और मिश्री के साथ सेवन किया जाए तो यह प्रमेह को नष्ट करती है। महावला मूत्रकृच्छू को नष्ट करती है।

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

* गीली खांसी : 

अतिबला, कंटकारी, बृहती, वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। इसे 14 से 28 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
* अतिबला की जड़ का चूर्ण 1-3 ग्राम, 100-250 मिलीलीटर दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में लाभ मिलता है।


*श्वेतप्रदर : 

अतिबला की जड़ को पीसकर चूर्ण बनाकर शहद के साथ 3 ग्राम की मात्रा में दूध में मिलाकर सेवन करने से श्वेतप्रदर में लाभ प्राप्त होता है।

* खिरैटी की जड़ की राख दूध के साथ देने से प्रदर में आराम मिलता है।”
* दर्द व सूजन में : दर्द भरे स्थानों पर अतिबला से सेंकना फायदेमंद होता है।


* पित्त ज्वर : 

खिरेटी की जड़ का शर्बत बनाकर पीने से बुखार की गर्मी और घबराहट दूर हो जाती है।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) रोग के कारगर उपचार 

* महिला को श्वेत प्रदर( Leukorrhea ) रोग हो तो बला के बीजों का बारीक पिसा और छना चूर्ण एक एक चम्मच सुबह-शाम शहद में मिलाकर कर दे और फिर ऊपर से मीठा दूध हल्का गर्म पी लें।
* शरीरिक कमजोरी के लिए आधा चम्मच की मात्रा में इसकी जड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण सुबह-शाम मीठे हल्के गर्म दूध के साथ लेने और भोजन में दूध-चावल की खीर शामिल कर खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है शरीर सुडौल बनता है सातों धातुएं पुष्ट व बलवान होती हैं तथा बल वीर्य तथा ओज बढ़ता है।
* खरैटी के बीज और छाल समान मात्रा में लेकर कूट-पीस-छानकर महीन चूर्ण कर लें तथा एक चम्मच चूर्ण घी-शकर के साथ सुबह-शाम लेने से वस्ति और मूत्रनलिका की उग्रता दूर होती है और मूत्रातिसार होना बंद हो जाता है।
* बवासीर के रोगी को मल के साथ रक्त भी गिरे तो इसे रक्तार्श यानी खूनी बवासीर कहते हैं बवासीर रोग का मुख्य कारण खानपान की बदपरहेजी के कारण कब्ज बना रहना होता है बला के पंचांग को मोटा-मोटा कूटकर डिब्बे में भरकर रख लें और प्रतिदिन सुबह एक गिलास पानी में दो चम्मच यानी कि लगभग 10 ग्राम यह जौकुट चूर्ण डालकर उबालें और जब चौथाई भाग पानी बचे तब उतारकर छान लें फिर ठण्डा करके एक कप दूध मिलाकर पी पाएं- इस उपाय से बवासीर का खून गिरना बंद हो जाता है।
* अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।
* अतिबला के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन तीन से चार बार कुल्ला करें ये प्रयोग रोजाना करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।


हस्त  मेथुन जनित यौन दुर्बलता के उपचार 

* जिनको मासिक धर्म रुक जाता है या अनियमित आता है उनको खिरैटी+ चीनी+मुलहठी+ बड़ के अंकुर+ नागकेसर+ पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल लेकर इनको दूध में पीसकर घी और शहद में मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिक स्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
* अतिबला+कंटकारी+बृहती+वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं फिर इसे 15 से 30 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
* अतिबला (खिरैटी) के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान के बाद दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।


* रुका हुआ मासिक-धर्म : 

खिरैटी, चीनी, मुलहठी, बड़ के अंकुर, नागकेसर, पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल इनको दूध में पीसकर घी और शहद मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिकस्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।

* पेट दर्द 

 खिरैंटी, पृश्नपर्णी, कटेरी, लाख और सोंठ को मिलाकर दूध के साथ पीने से `पित्तोदर´ यानी पित्त के कारण होने वाले पेट के दर्द में लाभ होगा।

* मूत्ररोग : 

अतिबला के पत्तों या जड़ का काढ़ा लेने से मूत्रकृच्छ (सुजाक) रोग दूर होता है। सुबह-शाम 40 मिलीलीटर लें। इसके बीज अगर 4 से 8 ग्राम रोज लें तो लाभ होता है।
* खिरैटी के पत्ते घोटकर छान लें, इसमें मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब खुलकर आता है।
* खिरैटी के बीजों के चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ लेने से मूत्रकृच्छ मिट जाती है।”


दिव्य औषधि कस्तुरी के अनुपम प्रयोग 

* फोड़ा (सिर का फोड़ा) : 


अतिबला या कंघी के फूलों और पत्तों का लेप फोड़ों पर करने से लाभ मिलता है।

* शरीर को शक्तिशाली बनाना : :

शरीर में कम ताकत होने पर खिरैंटी के बीजों को पकाकर खाने से शरीर में ताकत बढ़ जाती है।
* खिरैंटी की जड़ की छाल को पीसकर दूध में उबालें। इसमें घी मिलाकर पीने से शरीर में शक्ति का विकास होता है।

* शुक्रमेह:

के लिए खरैटी की ताजी जड़ का एक छोटा टुकड़ा लगभग 5-6 ग्राम एक कप पानी के साथ कूट-पीस और घोंट-छानकर सुबह खाली पेट पीने से कुछ दिनों में शुक्र धातु गाढ़ी हो जाती है और शुक्रमेह होना बंद हो जाता है।

*सीने में घाव (उर:क्षत) :

 बलामूल का चूर्ण, अश्वगंधा, शतावरी, पुनर्नवा और गंभारी का फल समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार लेते हैं। इसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से उर:क्षत नष्ट हो जाता है।

* मलाशय का गिरना : 

अतिबला (खिरेंटी) की पत्तियों को एरंडी के तेल में भूनकर मलाशय पर रखकर पट्टी बांध दें।

* बांझपन दूर करना : 

अतिबला के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान (मासिक-धर्म) के बाद, दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।







कत्था ( खदिर, खैर ) के गुण,लाभ,उपयोग



    


परिचय :  इसे खदिर (संस्कृत), खैर (हिन्दी), खयेर (बंगाली), काथ (मराठी), खेर (गुजराती) कचुकट्टि (तमिल), पोडलमानु (तेलुगु) तथा एकेशिया कटेचू (लैटिन) कहते हैं।
खैर सूखे वायुमण्डल में अधिक होता है। हिमालय में 5 हजार फुट की ऊँचाई तक, पश्चिमोत्तर प्रदेश, बम्बई आदि प्रान्तों में पाया जाता है।
    अगर आप पान खाने के शौकीन हैं तो कत्‍थे के बारे में भी जरुर जानते होंगे। कत्‍थई रंग के दिखने वाले इस कत्‍थे के बिना, पान कभी स्‍वाद नहीं दे सकता। पान में लगाए जाने वाले लाल रंग के कत्थे से तो आप भलीभांति परिचि‍त होंगे। यही कत्था पान खाते वक्त आपके होंठो को लाल करता है। लेकिन इसके अलावा कत्थे की एक और प्रजाति‍ होती है जिसे सफेद कत्थे के रूप में जाना जाता है। इसे औषधि‍ के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसके औषधीय उपयोग के बारे मे बताते हैं-


किडनी फेल (गुर्दे खराब) रोग के कारगर उपचार 

कत्‍था, खैर के वृक्ष की लकड़ी से निकाला जाता है। आयुर्वेद के अनुसार कत्‍था, ठंडा, कडुवा, तीखा व कसैला होता है। यह कुष्‍ठ रोग, मुख रोग, मोटापा, खांसी, चोट, घाव, रक्‍त पित्‍त आदि को दूर करता है।

खैर के वृक्ष की छाल से ‘खदिर-सार’ तैयार किया जाता है। यह काले कत्थई रंग का जमाया हुआ पदार्थ ही कत्था है।


रासायनिक संघटन :
 इसमें खदिरसार (कत्था) 35 प्रतिशत तथा टैनिन द्रव्य 57 प्रतिशत मिलता है। इसमें कैटेचीन नामक सत्व मिलता है।
कत्था के गुण :
यह स्वाद में कडुआ, कसैला, पचने पर कटु, हल्का तथा सूक्ष्म है। इसका मुख्य प्रभाव त्वचा-ज्ञानेन्द्रिय पर कुष्ठध्न (कुष्ठ आदि चर्मरोगों का नाश करनेवाला) रूप में पड़ता है। यह रक्त का स्तम्भक, वर्धक, शोधक, दन्त्य (दाँत) तथा मुखरोगहर), रंग को ठीक करनेवाला, व्रण-शोधक (घाव-शोधक), स्तम्भक (दस्त बन्द करनेवाला) मेदशोषक, गर्भाशय-शिथिलताहर तथा शुक्रशोधक है।मगर हां, कत्‍थे का अधिक सेवन करने से नपुंसकता भी हो सकती है। इसके अलावा कत्‍थे के अधिक सेवन से किड़नी स्‍टोन भी बनता है। इसलिये कत्‍थे का चूर्ण 1 से 3 ग्राम तक ही प्रयोग करें। 

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मलेरिया -
 मलेरिया बुखार होने पर कत्था एक बेहतर औषधि के रूप में काम करता है। जी हां, समय-समय पर इसकी समान मात्रा में गोली बनाकर चूसने से मलेरिया से बचाव किया जा सकता है। 
दस्त - 
पेट खराब होने या दस्त लगने की समस्या में कत्थे का इस्तेमाल करना फायदेमं होता है। कत्थे को पकाकर या पानी में उबालकर लेने से दस्त में राहत मिलती है। इसके अलावा पाचन संबंधी समस्याओं में भी कत्था लाभप्रद है|
दांत की समस्या -
 दांत संबंधी किसी भी प्रकार की समस्या में कत्थे के चूर्ण को मंजन में मिलाकर प्रयोग करने से लाभ होता है। इस के अलावा कत्थे के चूर्ण को सरसों के तेल के साथ मिलाकर मंजन करने से भी बहुत लाभ होता है|
खांसी -
 अगर आप लगातार खांसी से परेशान हैं, तो कत्थे को हल्दी और मिश्री के साथ एक-एक ग्राम की मात्रा में मिलाकर गोलियां बना लें। अब इन गोलियों को चूसते रहें। इस प्रयोग को करने से खांसी दूर हो जाती है।

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गले की खराश - 
गले में खराश होने पर 300 मिलीग्राम कत्‍थे को पीसकर चूर्ण बना लें और इसे समय-समयपर मुंह में रखकर चूसते रहें। दिनभर में 5 से 6 बार इस प्रयोग को करने से गला बैठना, खराश और छाले होने की समस्या खत्म हो जाती है।
    सफेद कत्‍था औषधि और लाल कत्‍था पान में प्रयोग किया जाता है। पान में लगाया जाने वाला कत्‍था बीमारियों को दूर करने के लिये पय्रोग ना करें।
प्रदर रोग :
 कत्थे और बांस के पत्तों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और इसमें 6 ग्राम शहद की मात्रा लेकर पेस्ट बनाकर खाएं। इस प्रयोग को करने से लाभ मिलता है।
दमा रोग : 
सांस संबंधी समस्याओं के लिए भी कत्था बहुत अच्छी औषधि है। इसे हल्दी और शहद के साथ मिलाकर दिन में दो से चार बार एक चम्मच की मात्रा में लेने से काफी लाभ होता है।
दांतों की बीमारी :
 कत्थे को मंजन में मिला कर दांतों व मसूढ़ों पर रोज सुबह शाम मलने से दांत के सारे रोग दूर होते हैं।
दांतों के कीड़े-
कत्‍थे को सरसों के तेल में घोल कर रोजाना 3 से 3 बार मसूढ़ों पर मलें। इससे खून आना तथा बदबू आनी दूर हो जाएगी।




खट्टी डकार :
 300 से 700 मिली ग्राम कत्था का सुबह शाम सेवन करने से खट्टी डकार बंद हो जाती है।
कान दर्द :
 सफेद कत्थे को पीस कर गुनगुने पानी में मिला कर कानों में डालने से कान दर्द दूर होता है।
कुष्ठ रोग : 
कत्थे के काढ़े को पानी में मिलाकर प्रति दिन नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
योनि की जलन और खुजली :
 5 ग्राम की मात्रा में कत्था, विण्डग और हल्दी ले कर पानी के साथ पीस कर योनि पर लगाएं। इससे खुजली और जलन दोनों ठीक हो जाएगी।
घाव - 
किस प्रकार की चोट लगने पर घाव हो जाए, तो उसमें कत्थे को बारीक पीसकर इस चूर्ण को डाल दें। लगातार ऐसा करने पर घाव जल्दी भर जाता है और खून का निकलन भी बंद हो जाता है।  
बवासीर-
सफेद कत्‍था, बड़ी सुपारी और नीलाथोथा बराबर मात्रा में लें। पहले सुपारी व नीलाथोथा को आग पर भून लें और फिर इस में कत्‍थे को मिला कर पीस कर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को मक्‍खन में मिला कर पेस्‍ट बनाएं। इस पेस्‍ट को रोज सुबह-शाम शौच के बाद 8 से 10 दिन तक मस्‍सों प लगाने से मस्‍से सूख जाते हैं।


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सावधान रहें-
गर्भवती स्त्रियों को कत्थे का सेवन नहीं करना चाहिए, और पुरुषों में इसका अत्यधिक सेवन नपुंसकता का कारण बन सकता है। इसके अलावा कत्‍थे के अधिक सेवन से किडनी स्टोन भी हो सकता है। इसलिये कत्‍थे का चूर्ण1 से 3 ग्राम तक ही प्रयोग करें।
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स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के नुस्खे



   


    पूरे शरीर को नियंत्रित और निर्देशित करने वाला तंत्रिका-तंत्र या नर्वस सिस्टम यूं तो बेहद सफाई से बना होता है और अपना काम करता है, फिर भी कभी-कभी गड़बड़ियां हो जाती हैं. हमारे डीएनए की कुछ विकृतियां इन गड़बड़ियों या कहें तो बीमारियों के लिए जिम्मेदार होती है. इनमें से कुछ को दवाओं से ठीक किया जा सकता है लेकिन कुछ पर दवाएं बेअसर होती हैं. यदि कोई गड़बड़ी न्यूरॉन (विशेष रूप से दिमाग में पाई जानेवाली वे कोशिकाएं जो इलेक्ट्रिक सिग्नल के जरिए संकेत प्राप्त करके या भेजकर शरीर को नियंत्रित करती हैं) से संबंधित है तब ज्यादा संभावना होती है कि दवाएं कम असर करें.

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स्नायु संस्थान जिसे अंग्रेजी भाषा में (Nervous System) भी कहा जाता है। स्नायु संस्थान की कमज़ोरी का कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इसकी कमज़ोरी से चक्कर, उल्टी, और शरीर शिथिल हो जाता है। स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के कारण व्यक्ति ठीक तरह से खड़ा नहीं हो पता और न ही कोई काम कर सकता है।



इससे ग्रसित व्यक्ति को बिस्तर पर लंबे समय तक आराम करना पड़ता है। इसलिए हम स्नायु संस्थान  की कमज़ोरी से ग्रसित व्यक्ति के लिए लाये है आयुर्वेद की गोद से पक्का, आसान और पूरी तरह से प्राकृतिक तरीका जिससे स्नायु संस्थान की कमज़ोरी दूर हो जाएगी।

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स्नायु संस्थान की कमज़ोरी का प्राकृतिक इलाज़ –

बनारसी ऑवले का मुरब्बा एक नग अथवा नीचे लिखी विधि से बनाया गया बारह ग्राम (बच्चों के लिए आधी मात्रा) लें। प्रातः खाली पेट खूब चबा-चबाकर खाने और उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न लेने से मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं को बल मिलता है और स्नायु संस्थान शक्तिशाली बनता है।

विशेष-

गर्मियों के मौसम में इसका सेवन अधिक लाभकारी है। इस मुरब्बे को यदि चाँदी के बर्क में लपेटकर खाया जाय तो दाह, कमजोरी तथा चक्कर आने की शिकायत दूर होती है। वैसे भी ऑवला का मुरब्बा शीतल और तर होता है और नेत्रों के लिए हितकारी, रक्तशोधक, दाहशामक तथा हृदय, मस्तिष्क, यकृत, आंतें, आमाशय को शक्ति प्रदान करने वाला होता है। इसके सेवन से स्मरणशक्ति तेज होती है। मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।

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    मानसिक दुर्बलता के कारण चक्कर आने की शिकायत दूर होती है। सवेरे उठते ही सिरदर्द चालू हो जाता है और चक्कर भी आते हो तो भी इससे लाभ होता है। आजकल शुद्ध चाँदी के वर्क आसानी से नहीं मिलते अतः नकली चाँदी के वर्क का इस्तेमाल न करना ही अच्छा है। चाय-बिस्कुट की जगह इसका नाश्ता लेने से न केवल पेट ही साफ रहेगा बल्कि शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति एवं कान्ति में भी वृद्धि होगी। निम्न विधि से निर्मित आँवला मुरब्बा को यदि गर्भवती स्त्री सेवन करे तो स्वयं भी स्वस्थ रहेगी और उसकी संतान भी स्वस्थ होगी।



   आंवले के मुरब्बे के सेवन से रंग भी निखरता है। 

निषेध-मधुमेह को रोगी इसे न लें।

एलर्जी (चर्म रोग) की आयुर्वेदिक  चिकित्सा


आंवला मुरब्बा बनाने की सर्वोत्तम विधि- 

500 ग्राम स्वच्छ हरे आँवला कडूकस करके उनका गूदा किसी काँच के मर्तबान में डाल दें और गुठली निकाल कर फेंक दें। अब इस गूदे पर इतना शहद डालें कि गूदा शहद में तर हो जाये। तत्पश्चात् उस काँच के पात्र को ढक्कन से ढ़क कर उसे दस दिन तक रोजाना चार-पाँच घंटे धूप में रखे। इस प्रकार प्राकृतिक तरीके से मुरब्बा बन जायेगा।
 बस, दो दिन बाद इसे खाने के काम में लाया जा सकता है। इस विधि से तैयार किया गया मुरब्बा स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रेष्ठ है क्योंकि आग की बजाय सूर्य की किरणों द्वारा निर्मित होने के कारण इसके गुण-धर्म नष्ट नहीं होते और शहद में रखने से इसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। 

सेवन विधि–

प्रतिदिनं प्रातः खाली पेट 10 ग्राम (दो चम्मच भर) मुरब्बा लगातार तीन-चार सप्ताह तक नाश्ते के रूप में लें, विशेषकर गर्मियों में। चाहें तो इसके लेने के पन्द्रह मिनट बाद गुनगुना दूध भी पिया जा सकता है। चेत्र या क्वार मास में इसका सेवन करना विशेष लाभप्रद है।

कब्ज (कांस्टीपेशन)  के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार

 ऐसा मुरब्बा विद्यार्थियों और दिमागी काम करने वालों की मस्तिष्क की शक्ति और कार्यक्षमता बढ़ाने और चिड़चिड़ापन दूर करने के लिए अमृत तुल्य है। इसमें विटामिन सी’, ‘ए’, कैलशियम, लोहा का अनूठा संगम है। 100 ग्राम ऑवले के गूदे में 720 मिलीग्राम विटामिन ‘सी’, 15 आइ.यू.विटामिन ‘ए’, 50 ग्राम कैलशियम, 1.2 ग्राम लोहा पाया जाता है।आंवला ही एक ऐसा फल है जिसे पकाने या सुखाने पर भी इसके विटामिन नष्ट नहीं होते।
   यदि उपरोक्त विधि से मुरब्बा बनाना सम्भव न हो तो केवल हरे ऑवले के बारीक टुकड़े करके या कडूकस करके शहद के साथ सेवन करना भी लाभप्रद है। इससे पुराने कब्ज व पेट के रोगों में भी अभूतपूर्व लाभ होता है।




    स्नायु संस्थान का काम शरीर से जु़डी हुई सभी संवेदनाओं को इकटा कर मस्तिष्क तक पहुंचाना होता है। जिस वक्त हमारा स्नायु संस्थान काम करना बंद कर देता है या उसमें कोई दोष आता है तो लकवा आदि बीमारियों से व्यक्ति ग्रसित हो जाता है।

संधिवात (आर्थराईटिज)  के घरेलू,आयुर्वेदिक उपाय

    यदि इस तंत्र में दुर्बलता आती है, व्यक्ति में निम्न लक्षण देखने को मिलते हैं - वह जल्दी थकता है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करता है, चक्कर आते हैं, दिल की ध़ाडकन बढ़ती है और अपने शरीर की शक्ति से अधिक शारीरिक श्रम करना और अधिक मानसिक श्रम करने से यह रोग हो जाता है। ऎसे में व्यक्ति की याददाश्त भी बहुत कम हो जाती है।
    इसके ईलाज के लिए काली मिर्च, अदरक, पिस्ता, बादाम, किशमिश और अदरक को बराबर मात्रा में मिलाकर इसका एक पेस्ट बना लें। जिसे सुबह-शाम खाने से इस रोग में कमी आती है। 

   अदरक को छाँव में सुखाकर उसकी सोंठ बना लें। इस सोंठ में थो़डा जीरा और शहद मिलाकर सुबह-शाम चाट लें। त्रिफला और अदरक का रस दोनों को शहद में मिलाकर पीने से स्नायु दुर्बलता में आराम आता है

     



स्त्रियों के प्रमुख योन रोग, कारण,लक्षण,और उपचार



अधिकांश महिला व पुरुष ऐसे होते हैं, जो संक्रमण के कारण इन रोगों की चपेट में आते हैं। सर्दियों की शुरुआत से ही ऐसे मरीजों की संख्या अचानक से बढ़ जाती है। सर्दियों में लोग शरीर की सफाई ठीक से नहीं रखते। कपड़े कई दिनों तक नहीं बदले जाते हैं। लोग नहाने से परहेज करते हैं। नहाने से परहेज करने और कपड़ों के लगातार न बदलने के कारण संक्रमण से फैलने वाले गुप्त रोगों की संभावना बढ़ जाती है।सर्दियों में शरीर की सफाई न रखने और नहाने से परहेज करने के कारण लोगों में गुप्त रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।
सफेद कपड़ा, लाल कपड़ा प्रतिमास दो-चार बार होना, पेट में तकलीफ होना तथा कमर में दर्द बढ़ जाना आदि के उपचार में कच्चा पुदीना एक कट्टा लेकर दो गिलास पानी में उबालकर एक कप जूस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह (निराहार) एक बार और रात में सोते समय दूसरी बार पी लेना चाहिए। इस प्रकार 40 दिनों तक करते रहें। पथ्य में अचार, बैंगन, मुर्गी, अंडे तथा मछली आदि का प्रयोग न करें।

स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा
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मासिक धर्म का रुक जाना-
:तीन-तीन महीने तक मासिक धर्म का न होना तथा पेट में पीड़ा होना आदि के लिए एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह निराहार पेट रात में भोजनोपरांत सोते समय पी लेना चाहिए। इस प्रकार सेवन एक महीने तक करते रहें। आलू तथा बैंगन वर्जित हैं।
पेशाब में जलन-
मूत्र नलियों में रक्त संचार सुचारू रूप से न होना और पेशाब से रक्त का जाना आदि में एक कप मौसम्मी का जूस लेकर उसमें आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर उसका सेवन करें। सुबह एक बार और दूसरी बार रात में सोने से पूर्व। दस दिन तक इस इलाज को जारी रखिए। खाने में गर्मी पैदा करने वाली वस्तुएं, मिर्च और खट्टी वस्तुओं का उपयोग कम करना चाहिए।
बवासीर का मस्सा-
एक चम्मच सिरके में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में दो बार मस्से की जगह पर लगाएं।
*तेल चुपड़ी रोटी शनिवार को कुत्ते को खिलाएं।
*एक कटोरी केसर पानी में घोलकर मरीज के कमरे में रख दें।
क्या सावधानी रखें गुप्त रोग होने पर-
* नहाने से परहेज न करें।



*प्रतिदिन अंत: वस्त्र व अन्य कपड़ों को बदलें।

*शौच के बाद शरीर के अंदरुनी अंगों को ठीक से साफ करें।
*पूर्व में संक्रमण से पीड़ित या एलर्जी वाले लोगों को अधिक सतर्क होने की है जरूरत।
*किसी भी प्रकार की समस्या होने पर उसे छुपाने की बजाय चिकित्सक से संपर्क करें।
खुजली के लिए आयुर्वेदिक उपचार-
जब त्वचा की सतह पर जलन का एहसास होता है और त्वचा को खरोंचने का मन करता है तो उस बोध को खुजली कहते हैं। खुजली के कई कारण होते हैं जैसे कि तनाव और चिंता, शुष्क त्वचा, अधिक समय तक धूप में रहना, औषधि की विपरीत प्रतिक्रिया, मच्छर या किसी और जंतु का दंश, फंफुदीय संक्रमण, अवैध यौन संबंध के कारण, संक्रमित रोग की वजह से, या त्वचा पर फुंसियाँ, सिर या शरीर के अन्य हिस्सों में जुओं की मौजूदगी इत्यादि से।
*खुजली वाली जगह पर चन्दन का तेल लगाने से काफी राहत मिलती है।
*दशांग लेप, जो आयुर्वेद की 10 जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है, खुजली से काफी हद तक आराम दिलाता है।
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डेंगू बुखार से न घबराएँ, करें ये उपाय



  डेंगू बुखार मच्छरों द्वारा फैलाई जाने वाली बीमारी है. एडीज मच्छर (प्रजाति) के काटने से डेंगू वायरस फैलता है. बुखार के दौरान प्लेटलेट्स कम होना इसका मुख्य लक्षण हैं. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता. बुखार के साथ सबसे सामान्य लक्षण है सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और त्वचा का खराब हो जाना|
1)बुखार होने पर रोगी को लगातार पानी पिलाते रहें|,अगर सादा पानी ना पीया जाए तो नारियल पानी,शिकंजी,शरबत आदि पीते रहे,सबसे अधिक प्रयास बुखार उतारने का करें |पानी की पट्टियां बदते रहें|
2)अगर डेंगू का टेस्ट पोसिटिव भी आया है तो घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है |अगर लगातार पानी पीया जा रहा है और रोगी दो तीन घंटे में पेशाब कर रहा है तो तनिक भी घबराने की आवश्यकता नहीं है| बिना दवा के भी ,,डेंगू और अन्य वाइरल बुखार एक से डेढ़ हफ्ते में ठीक हो जाते है बशर्ते रोगी लगातार पानी पीता रहे |
3) डेंगू में आम तौर पर खतरनाक स्थिति तब नहीं बनती जब तक रोगी को बुखार रहता है| असली ख़तरा बुखार उतरने के बाद बढ़ता है जब रोगी लापरवाही से शारीरिक श्रम करने लगता है|सावधानी रखें ,पूर्ण विश्राम करें और पानी लगातार पीते रहे अगर बुखार के बाद रोगी उठने तक में असमर्थ अनुभव कर रहा है जोड़ों में भयानक दर्द अनुभव कर रहा है तो फिर तुरंत चिकित्सक से सलाह लें |



4)अगर उच्च और निम्न रक्तचाप में 40 से अधिक का अंतर आये ,लगातार पेट में दर्द बना रहे ,शरीर पर लाल चकत्ते बन रहे हो तब चिकित्सक से अवश्य परामर्श करें,लेकिन उस अवस्था में भी अगर रोगी लगातार पानी पी रहा है और घंटे दो घंटे में पेशाब करने जा रहा है तो घबराने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है|

5) गिलोय का आयुर्वेद में बहुत महत्व है. यह मेटाबॉलिक रेट बढ़ाने, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने और बॉडी को इंफेक्शन से बचाने में मदद करती है. गिलोय की बेल का लगभग 8 इंच का टुकडा एक गिलास पानी में उबाले ,आधा रहने पर रोगी को पिलायें अगर पीने में असुविधा हो रही हो तो उसे शरबत में मिला कर पिला दें इसमें तुलसी के पत्ते भी डाले जा सकते हैं|,लाभ अवश्य होगा|
6)एक बात जान लें कि डेंगू की कोई वेक्सीन नहीं बनी है इसलिए किसी लालची डॉ के पास धन और समय की बर्बादी ना करें |अगर बुखार उतारने के लिए कोई अंगरेजी दवा लेनी ही हो तो केवल पेरासीटामोल ही लें ,अन्य कोई भी दवा किसी भी हालत में ना लें|
7)यदि किसी को डेगूँ या साधारण बुखार के कारण प्लेटलेट्स कम हो गयी है तो एक होम्योपैथिक दवा है-
यूपेटर पर्फ़ 3x
   इस दवा की डायलुशन की 3 या 4 बूँदें प्रत्येक 2-2 घँटें में साधारण पानी में ड़ाल कर मात्र 2 दिन पिलायें । प्लेटलेट्स कम नहीं होगीं।
      
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सफेद दाग का होमियोपैथिक इलाज


सफेद दाग के कारण

यह रोग त्वचा द्वार ‘मिलेनिन’ नामक पदार्थ (जो कि त्वचा का रंग निर्धारित करता है) का बनना बंद हो जाने के कारण होता है, लेकिन त्वचा ग्रंथियों एवं कोशिकाओं में ऐसी कौन-सी खराबी आ जाती है कि मिलेनिन का बनना रुक जाता है, यह अभी तक अबूझ पहेली ही है। यह अण्डाकार अथवा छितरे हए धब्बों के रूप में शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इसमें किसी प्रकार की खुजली अथवा अन्य कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। अब    वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि संभवतया मानसिक दबाव के साथ-साथ थायराइड ग्रंथि से संबंधित बीमारियों में शरीर के ऊतकों में किसी वजह से कठोरता एवं सिकुड़ाव आ जाने के कारण,गंजापन होने के कारण एवं खून की कमी होने पर सफेद दाग के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। सिफिलिस रोग की वजह से भी सफेद दाग बन सकता है|

सफेद दाग का होमियोपैथिक इलाज


वैसे, व्यक्ति के हाव-भाव, आचार-विचार, पूर्व इतिहास, खान-पान आदि को देखते हुए समान लक्षणों के आधार पर कोई भी दवा दी जा सकती है, किन्तु निम्न दवाएं उपयोगी हैं-
‘एल्युमिना’,
‘आर्सेनिक एल्बम’,
‘नेट्रमम्यूर’,
‘सीपिया’,
‘साइलेशिया’,
‘सल्फर’,
‘कैल्केरिया कार्ब’,
‘काबोंएनीमेलिस’,
‘मरक्यूरियस’,
‘एसिडफास’,
‘माइका’,
‘हाइड्रोकोटाइल’,
‘क्यूप्रम आर्स’,
‘कालमेघ
‘चेलीडोनियम’।
सम्पूर्ण बातें रोगी से जानने के बाद एक व्यवस्थित मानसिक एवं शारीरिक आधार पर खोजी गई दवा अत्यन्त उपयोगी है, जिसे होमियोपैथी की भाषा में कान्सटीट्यूशनल रेमेडी कहते हैं। फिर बीमारी के कारणों के आधार पर दवा देते हैं,
जैसे किसी रोग में ताम्र धातु का अभाव परिलक्षित होने पर ‘क्यूप्रम आर्स’ 3 × दवा, यकृत संबंधी परेशानियों के साथ सफेद दाग होने पर ‘कालमेघ’, ‘चेलीडोनियम’ दवाओं का अर्क,
पेट की गड़बड़ी के साथ सफेद दाग होने पर ‘वेरवोनिया’ दवा का अर्क एवं ‘क्यूप्रम आक्स नाइग्रम’ दवा,
सिफिलिस रोग होने पर ‘सिफिलाइनम’ नामक दवा दी जा सकती है।
त्वचा मोटी एवं पपड़ीदार होने पर ‘हाइड्रोकोटाइल’ दवा का अर्क अत्यंत कारगर है। बेचैनी, रात में डर, ठंड लगना, जाड़े में अधिकतर परेशानियों का बढ़ना, जल्दी-जल्दी ठंड का असर पड़ना, खुली हवा में घूमने से परेशानी बढ़ना, बहुत कमजोरी एवं हर वक्त लेटे रहने की इच्छा, सीधी करवट लेटने पर अन्य सभी परेशानियों का बढ़ जाना, जलन, सूखी त्वचा खुजलाने पर जलन बढ़ जाना, घुटने में पीड़ा, छाती में सुइयों की चुभन एवं सांस लेन में तकलीफ होने पर ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × अत्यधिक कारगर पाई गई है।
लगभग 6 माह से लेकर तीन वर्ष तक लगातार दवा के सेवन से यह रोग पूर्णरूपेण ठीक हो जाता है।
रात में परेशानियों का बढ़ जाना एवं शरीर में जगह-जगह घाव होने पर ‘सिफिलाइनम’ भी दी जा सकती है।‘माइक-30′ नामक दवा भी सफेद दाग के रोगियों में अत्यंत कारगर पाई गई है।




आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी ‘अभ्रक’ के नाम से इस दवा के अनेकानेक गुण ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रंथ में वर्णित हैं, किन्तु इसके साथ भी ‘ट्यूबरकुलाइनम’, ‘सोराइनम’, ‘बेसिलाइनम’ अथवा ‘सिफिलाइनम’ जैसी कान्सटीट्यूशनल दवाएं दिया जाना आवश्यक है।

चिकित्सावधि में खट्टी वस्तुएं, खट्टे फल, विटामिन सी (एस्कार्विक एसिड), मैदा आदि पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में ही होना चाहिए। कुछ समय के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खाना बंद कर दें, तो ज्यादा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।

सफेद दाग ठीक हो सकता है
कुछ रोगी, जिनका शरीर 30 प्रतिशत से अधिक सफेद हो गया है या उनके होंठ, उंगलियों के पोर, हथेली, जननेन्द्रिय आदि से प्रभावित रोगियों का विशेष रक्त-परीक्षण करवाया गया है, जिसमें लोहा, तांबा, रांगा का प्रतिशत जरूरत से ज्यादा या कम पाया गया। रक्त की सफेद कोशिकाओं, जिसे ‘लिम्फोसाइट’ कहा जाता है, में टी और बी का प्रतिशत कम पाया गया।
• यदि स्त्रियों में रोने की प्रवृत्ति हो, तो ‘नेट्रमम्यूर’ दवा 1000 शक्ति की एक खुराक देकर अगले दिन से ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × में खिलानी चाहिए। पंद्रह दिन बाद ‘नेट्रमम्यूर’ की एक खुराक और ले लें इसके पंद्रह दिन बाद’बेसीलाइनम’ 1000 की एक खुराक लें।

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हर्बल चिकित्सा के अनुपम आलेख-

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पिलपिले टमाटरों को फिर से ताजा करें


    टमाटर हर सब्जी की शान होते है, ये हर सब्जी के स्वाद को बढाने के काम आता है|इस सादा, जूस, सलाद, सब्जी में और अन्य तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है. यही नहीं इसमें अनेक ऐसे तत्व भी होते है जिनके कारण इसका आयुर्वेद में भी अहम स्थान है.|गुणों की खान कही जाने वाली इस सब्जी की इतनी सारी खासियत है कि आप सोच भी नहीं पाओगे. जिस तरह इसका रंग लाल है वैसा ही रंग इसका इस्तेमाल करने वालों का हो जाता है|कहने का तात्पर्य है कि ये शरीर में खून बनाता है और चेहरे पर लाली लाता है|


लो ब्लड प्रेशर होने पर तुरंत करें ये पाँच उपाय 

   टमाटर हर मौसम में उपलब्ध होता है किन्तु गर्मियाँ हर सब्जी पर अपना प्रभाव डालती है और सब्जियों को सडाना आरम्भ कर देती है|इसीलिए आपने देखा भी होगा कि सर्दियों में तो हम सब्जियों को कही भी रख देते है फिर भी वे कई दिनों तक वैसी ही ताज़ी बनी रहती है|किन्तु गर्मियों में अगर किसी सब्जी को कुछ घंटों के लिए भी बाहर सामान्य तापमान पर रख दिया जाए तो वे गलने लगती है|टमाटर तो इतने पिलपिले हो जाते है कि आप उन्हें छूना तक पसंद ना करें|इसीलिए गर्मियों में फ्रीज का इस्तेमाल अधिक किया जाता है ताकि फल सब्जियां उसमें ताज़ी बनी रहें|
   लेकिन अगर कभी आप अपने टमाटरों को फ्रीज में रखना भूल गयी हो और वे पिलपिले हो गए हो तो उन्हें बाहर फेंकने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योकि आज हम आपको एक ऐसे घरेलू नुस्खे से अवगत कराने जा रहे है जिनकी मदद से आप पिलपिले हुए टमाटरों को फिर से ताजा कर सकते हो. ये तरीका बहुत आसान और सरल है तो आओ इस नुस्खे के बारे में जानते है|


*किडनी में क्रिएटिनिन और यूरिया की समस्या के घरेलू उपचार* 

सामग्री ( Material Required ) :
* 1 बर्तन
*ठंडा पानी
* 1 चम्मच नमक
· विधि :
   सबसे पहले तो आपको एक बर्तन ( कटोरा ) लेना है, अब उसमें आप ठंडा पानी भर दें. साथ ही इसमें 1 चम्मच नमक भी डाल दें. अब इसमें पिलपिले हुए सारे टमाटर डालें और फिर करीब 3 – 4 घंटों के लिए भीगने के लिए छोड़ दें|कुछ समय बाद आप देखोगे कि उन पिलपिले टमाटरों की ताजगी फिर से लौट आई है|वे फिर से गोल मटोल हो गये है और पहले की तरह लाल लाल दिख रहे है.\    लाल टमाटर बड़ा ही स्वादिष्ट होता है इसे लोग बड़े चाव से खाते है. इसके बारे में बहुत से लोग अलग अलग राय देते है| कुछ लोग इसे फल बताते है तो कुछ लोग इसे सब्जी भी कहते है| चाहे जो भी हो इसके स्वाद ने सभी को दीवाना बना रखा है. इसके अनेको गुणों के कारण इसके प्रति लोगो की दीवानगी और भी बढती है|


प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मूत्र समस्या का बिना आपरेशन 100% समाधान

एक अध्ययन के अनुसार जोकि यूरोप में हुआ था उससे पता चला है जो व्यक्ति भोजन करते समय भोजन में लाइकोपीन की मात्रा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है वे ह्रदय घात के खतरे से बचे रहते है| उनको हृदयघात आने की सम्भावना कम हो जाती है.|यह सिर्फ टमाटर खाने से ही हो सकता है क्योकि टमाटर में ही लाइकोपीन नामक तत्व पाया जाता है| वह अध्ययन जिन लोगो पर किया गया था उन लोगो में ज्यादातर प्रोढ़ावस्था के थे| और उनमे से जिन लोगो को दिल का दौरा पड़ चूका था उनकी संख्या थी 662. अध्ययन में शरीर में इस तत्व की, जो कि टमाटर में होता है| उपस्थिति की मात्रा की भी जांच की गयी थी. यह अध्ययन 1379 लोगो पर किया गया थ||
उदाहरण के लिए हम आपको बताते है कि एक प्रकार का पदार्थ जिसे हम कोलेस्ट्रोलिमोआ कहते है वो हमारी धमनियों में जम जाता है और इससे  हमें एक आघात होने का खतरा बना रहता है. इसके बाद ये जेनेटिक परिवर्तन करते है और कैंसर को उत्पन्न कर सकते है| फ्री रेडिक्ल से हमें ऐसा कैंसर हो सकता है जो सूर्य के प्रकाश के कारण होता है अथवा ऐसी बीमारियाँ हो सकती है जैसे कि ओजोन के प्रदुषण में सांस लेने से हो सकती है|


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

   अगर हमें प्रदुषण भरे वातावरण से बचना है तो टमाटर का खूब इस्तेमाल करना होगा क्योंकि इसके इस्तेमाल से ही हम कोलेस्ट्राल जैसी बीमारी से बच सकते है और हृदय सम्बन्धी रोगों को भी अपने से दूर रख सकते है और स्वस्थ जीवन का भरपूर आनंद ले सकते है 
   तो अब हम कह सकते है टमाटर अपने इन्ही गुणों के कारण इतना महत्वपूर्ण हो गया है की असाधारण होते हुए भी कई रोगों से निजात दिलाने में सहायक है| और इसके इस्तेमाल पर खर्च भी ज्यादा नहीं होता. यह तो हमारे आस पास ही आसानी से और कम दामो पर उपलब्ध रहता है. तो अब आप टमाटर को खूब खाइए और अपने शरीर को रोगों से दूर बनाये रखिये|

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हर्बल चिकित्सा के अनुपम आलेख-

किडनी फेल (गुर्दे खराब) रोग के कारगर उपचार 

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बवासीर(मस्से) की अनुभूत चिकित्सा



    

 इस रोग में गुदा की भीतरी दीवार में मौजूद खून की नसें सूजने के कारण तनकर फूल जाती हैं। इससे उनमें कमजोरी आ जाती है और मल त्याग के वक्त जोर लगाने से या कड़े मल के रगड़ खाने से खून की नसों में दरार पड़ जाती हैं और उसमें से खून बहने लगता है। बवासीर दो तरह की होती है-भीतरी एवं बाहरी। भीतरी बवासीर की दशा में अंदरूनी रक्तपात होता है जिसमें दर्द नहीं होता। बाहरी बवासीर में इंसान को दर्द महसूस होता है क्योंकि इसमें गूदे में सूजन की वजह से काफी पीड़ा होती है। बवासीर के कई कारण हो सकते हैं जिनमें प्रमुख हैं वंशानुगत दशा,खानपान सही न होना, फाइबर की कमी गूदे की कैविटी में असामान्य वृद्धि ,लम्बे समय तक बैठे रहना और कब्ज़ की समस्या।इस बीमारी में गुदा द्वार पर मस्से हो जाते है। मलत्याग के समय इन मस्सो में असहनीय पीड़ा होती है। यह बहुत अधिक पीड़ादायक रोग है। अनियमित खान-पान और कब्ज की वजह से भी बवासीर हो सकती है। इस बीमारी को अर्श, पाइलस या मूलव्याधि के नाम से भी जाना जाता बवासीर को ठीक करने के लिए नीचे दिए गए घरेलू उपचारों में से किसी का भी सहारा लिया जा सकता है।
*एलोवेरा में काफी जलनरोधी गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह बवासीर की समस्या से छुटकारा दिलाने का काफी बेहतरीन तरीका साबित होता है। यह काफी आसान तरीकों से बवासीर के लक्षणों से आपको निजात दिलाता है। एलो वेरा की एक पत्ती लें तथा इसके सारे काँटों को तोड़कर फेंक दें। इसके बाद इसे फ्रिज (fridge) में रख दें। इसके बाद ठंडी सेंक का दोगुना प्रभाव प्राप्त करने के लिए इसका प्रयोग प्रभावित भाग पर करें। एलो वेरा जलन और सूजन को कम करने में आपकी मदद करता है। आप सूजी हुई धमनियों को ठीक करने के लिए एलो वेरा की पत्तियों से निकाले गए जेल (gel) का प्रयोग कर सकते हैं।
*सेब का सिरका बवासीर की समस्या को दूर करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक पात्र में थोड़ा सा सेब का सिरका लें और इसमें रुई का कपड़ा डुबोएं। इसे अपने बवासीर वाले भाग पर तुरंत आराम प्राप्त करने के लिए लगाएं। हालांकि सीधे इसे लगाने से आपको कुछ देर तक काफी जलन होगी। इस समय आप इसका प्रयोग करने से परहेज भी कर सकते हैं, पर यह खुजली और दर्द को तुरंत कम कर देता है। यह विधि सिर्फ बाहरी बवासीर के लिए ही है। अंदरूनी बवासीर के लिए एक चम्मच सेब के सिरके में थोड़ा सा पानी मिश्रित करके पियें। इसे दर्द और खून निकलने की समस्या से छुटकारा मिलता है।
    रक्त की मौजूदगी एक ऐसा लक्षण है, जो हमेशा बवासीर की स्थिति में दिखता है। अगर आपको अंदरूनी बवासीर है तो आपको टॉयलेट पेपर (toilet paper) पर खून दिख सकता है। पर अगर आपको बाहरी बवासीर है, तो आपके मलाशय के पास खून का थक्का या सूजन जमी देखी जा सकती है।ठंडी सेंक सिकुड़न में सहायता करती है। यह दर्द को कम करती है और खुजली से तुरंत आराम दिलाती है। ठंडी सेंक की मदद से सूजन काफी कम हो जाती है और इसके फलस्वरूप आपके लिए मलत्याग करना काफी आसान हो जाता है। अतः एक साफ़ कपड़े में बर्फ का टुकड़ा बांधें तथा इसका प्रयोग अपने बवासीर के ऊपर करें। इसका प्रयोग दिन में कई बार करें। इससे रक्त की धमनियां सिकुड़ जाती हैं, जिसके फलस्वरूप बवासीर से छुटकारा मिलता है।
*नींबू का रस एंटीऑक्सीडेंटस से युक्त होता है और बवासीर की समस्या से निपटने में आपकी काफी मदद करता है। इसका प्रयोग सीधे सूजन वाली प्रभावित जगह पर किया जा सकता है। आप नींबू के रस में अदरक और थोड़े से स्वाद के लिए शहद का मिश्रण करके इसका सेवन भी कर सकते हैं और इस फल के दर्द और जलन को कम करने के गुणों से अच्छी तरह वाकिफ हो सकते हैं।
गर्म पानी में डुबोकर रखें। पानी में खुद को डुबोये रखने से खुजली और दर्द से काफी छुटकारा प्राप्त होता है। इससे रक्त की धमनियों को सुकून मिलता है। 15 से 20 मिनट तक प्रभावित भागों को गर्म पानी में डुबोकर रखें। आप प्रभावित भाग को गीले तौलिये से भी पोंछ सकते हैं, क्योंकि इससे इसे सूखने में आसानी होती है। बेहतर परिणामों के लिए इस प्रक्रिया को बार बार दोहराएं।
*छाछ बवासीर के इलाज का एक बेहतरीन विकल्प है। अजवाइन का पाउडर और 1 ग्राम काला नमक 1 गिलास छाछ में मिश्रित करें। रोजाना दोपहर का खाना खाने के बाद एक गिलास छाछ का सेवन करें। इससे आपको बवासीर की समस्या से काफी आराम मिलेगा। छाछ आपको दर्द से बचाता है और शरीर में नमी का संचार करता है।
*खाना आसानी से हज़म करने और मलाशय का स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए फाइबर युक्त भोजन काफी फायदेमंद होता है। फाइबर के पोषक तत्व मल को नर्म करने में मदद करते हैं और आँतों की सारी प्रणाली को साफ़ सुथरा रखने में सहायता करते हैं। फाइबर युक्त भोजन के सेवन से कब्ज़ की समस्या से भी आराम प्राप्त होता है। फाइबर युक्त भोजनों में प्रमुख हैं पटसन के बीज, प्रून (prune), नाशपाती, सब्जियां और बीन्स (beans)।
*रोजाना कम से कम 8 गिलास पानी पिएं, क्योंकि इससे शरीर की अशुद्धियों को दूर करने में सहायता मिलती है। पानी आपके मलाशय को स्वस्थ बनाकर रखता है, जिससे ये नर्म और नमीयुक्त रहता है और आपका मल भी इससे नर्म होता है। अपनी अंदरूनी प्रणाली को साफ करने के लिए हमेशा पानी पियें। पानी आपके शरीर में नमी का संचार करता है और आपके मल को नर्म बनाता है। इसी तरह फाइबर युक्त भोजन भी मल नर्म करते हैं और मलत्याग की प्रक्रिया में होने वाले दर्द में काफी कमी करते हैं।
*दूध में बरगद का लैटेक्स मिलाने से भी फायदा होता है अगर रोज़ाना इसका प्रयोग किया जाए।
*बवासीर की समस्या को आसानी से दूर करने के लिए 1 कप दही लें और उसमें थोड़ा सरसों का पाउडर मिलाएं और इसे पीकर आराम करें। घर पर बनी दही का प्रयोग फायदेमंद है
*, बेर में जलन दूर करने के प्राकृतिक तत्व होते हैं। अच्छे परिणामों के लिए इनका रोज़ाना सेवन करें। आप काले जामुनों के अलावा अंगूरों का भी सेवन कर सकते हैं।
* अदरक,मीठे नींबू,पुदीने और शहद का मिश्रण तैयार करके उसका सेवन करने से भी बवासीर की दशा में काफी लाभ मिलता है।
* पके केलों को उबालें और उनका दिन में दो बार सेवन करें। यह बवासीर को प्राकृतिक रूप से ठीक करने की काफी कारगर विधि है क्योंकि यह लैक्सेटिव के लिए जाना जाता है।
*नसों में सूजन और जलन कम करने के लिए उस भाग में बेकिंग पाउडर लगाएं। आप गाजर या बीटरूट के रस का भी उपयोग कर सकते हैं। अगर सूजे हुए भाग में जलन है तो उसे दूर करने के लिए एलो वेरा का सेवन करें।


किडनी फेल (गुर्दे खराब) रोग के कारगर उपचार

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज

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पेट दर्द पेट मे गेस के घरेलू उपाय






पेट में संक्रमण की बहुत सी वजहें हो सकती हैं. अनहाइजीनिक खाना, पानी या फिर हाथों के माध्यम से शरीर में पहुंची गंदगी. जिसकी वजह से बार-बार मोशन होना, कमजोरी होना, उल्टी होना और कभी-कभी बुखार होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.

अगर आपका पेट खराब हो गया है और आप दवाई खाने से बचना चाहते हैं तो इन घरेलू उपायों का अपनाकर आप राहत पा सकते हैं. ये उपाय पूरी तरह घरेलू हैं इसलिए इन पर भरोसा करने में कोई नुकसान भी नहीं है.
* अदरक
पेट अपसेट होने पर अदरक का इस्तेमाल काफी कारगर होता है. इसमें एंटीफंगल और एंटी-बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं, जो पेट दर्द में राहत देता है. एक चम्मच अदरक पाउडर को दूध में मिलाकर पीने से आराम मिलता है


.मर्दानगी(सेक्स पावर) बढ़ाने के अचूक नुस्खे

*जीरा
अगर आपको लगातार दस्त हो रहे हों तो एक चम्मच जीरा चबा लें. अमूमन सभी घरों में मिलने वाला ये मसाला दस्त में काफी फायदेमंद है. जीरा चबाकर पानी पी लेने से दस्त बहुत जल्दी रुक जाते हैं.
* सेब का सिरका
बात जब पेट दर्द में घरेलू उपाय की हो तो सेब के सिरके से बेहतर कुछ भी नहीं. सेब के सिरके में पेक्ट‍िन की पर्याप्त मात्रा होती है जिससे पेट दर्द और मरोड़ में राहत मिलती है. इसका अम्लीय गुण खराब पेट के संक्रमण को ठीक करने में भी कारगर है. एक चम्मच सिरके को एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से जल्दी आराम होता है.
* बेल का शरबत
कई जगहों पर इसे श्रीफल के नाम से भी जाना जाता है. बेल फाइबर से युक्त होता है और इससे बना शरबत भी काफी गाढ़ा और फाइबर युक्त होता है. फाइबर पेट को बांधने का काम करता है, जिससे दस्त जल्दी रुक जाते हैं.
*दही

पेट दर्द में दही का इस्तेमाल काफी फायदेमंद रहता है. दही में मौजूद बैक्टीरिया संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जिससे पेट जल्दी ठीक होता है. साथ ही ये पेट को ठंडा भी रखता है.

* केला
अगर आप बार-बार हो रहे मोशन से परेशान हो चुके हैं तो केले का इस्तेमाल आपको राहत देगा. इसमें मौजूद पेक्टिन पेट को बांधने का काम करता है. इसमें मौजूद पोटै‍शियम की उच्च मात्रा भी शरीर के लिए फायदेमंद होती है.
* पुदीना
पुदीना एक बेहद हेल्दी हर्ब है. सदियों से इसका इस्‍तेमाल पेट से जुड़ी समस्याओं के समाधान में किया जाता रहा है. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाचन क्रिया को सुधारने में भी सहायक होता है.
* ज्यादा से ज्यादा  पानी का सेवन करें
पेट खराब होने पर शरीर में पानी की कमी हो जाती है. ऐसे में कोशिश करें कि ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं. आप फलोें का जूस और सब्जियों का रस भी ले सकते हैं. बेहतर होगा अगर पानी में लवण मिला हो. आप चाहें तो नींबू पानी, नमक-चीनी का घोल या फिर नारियल पानी ले सकते हैं. गाजर का जूस भी ऐसे समय में काफी फायदेमंद होता है.

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हर्बल चिकित्सा के अनुपम आलेख-

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गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 



नेत्र रोगों मे हितकारी घरेलू उपचार




     हम त्वचा और बालों पर तो बहुत कुछ लगाते है , पर आँखों के लिए कुछ नहीं करते . आइये देखे हम आँखों में क्या क्या लगा सकते है ....
* तेजपात को पीसकर आँख में लगाने से आँख का जाला और धुंध मिट जाती है|
* बेर के बीज को घीस कर आँख में लगाने से आँखों का बहना बंद हो जाता है|
* पुनर्नवा की जड़ को कूटकर इसका रस घी के साथ आँखों में लगाने से लाभ होता है.
* चमेली के फूलों का लेप बंद आँखों पर करने से लाभ होता है|
* आँखों में अगर कुछ गिर गया है और नहीं निकल रहा तो दूध की तीन बूंदे डाले|

* वासा के तीन चार फूलों को गर्म कर आँखों पर रखने से गोलक की सूजन में आराम मिलता है.
* शीशम के पत्तों का रस शहद के साथ आँख में डालने से दर्द ठीक होता है|
* जिस आँख में दर्द हो उसकी उलटी तरफ के कान में नीम के पत्तों का रस डालने से आराम मिलता है. नीम के पत्तों का रस आँख में भी लगाया जा सकता है|
* तिल के फूलों पर पड़ी ओस आँख में डालने से सभी प्रकार के रोग दूर होते है.
* १ ग्राम. सेंधा नमक और 5 ग्राम सत गिलोय को पीस कर शहद के साथ सुबह शाम आँखों में लगाने से मोतियाबिंद ठीक होता है|
* एरंड तेल की एक बूँद डालने से पानी बहता है. इसे नेत्र विरेचन कहते है|

* राई के चूर्ण को घी के साथ लगाने से आँखों की फुंसी से राहत मिलती है|
*गाय के दूध से निकले मक्खन को आँखों में लगाने से जलन शांत होती है|
* रीठे के पानी से आँख धोने से सरल मोतियाबिंद में लाभ होता है|
* ताज़ी डूब को पीस कर चपटी गोलियां बना ले. इसे आँखों पर रखने से ठंडक मिलती है और दर्द दूर होता हँ.
*मेथी दाने को पीस कर आँखों के नीचे लगाने से काले घेरे दूर होते है|
* अनंतमूल की जड़ को घीस कर आँख में लगाने से आँख की फूली कट जाती है. इसकी पट्टी के दूध या इसके काढ़े को शहद के साथ आँखों में लगाने से भी नेत्र रोग ठीक होते है|
* पलाश के जड़ के रस की एक बूँद आँख में डालने से झाई , खील , फूली , मोतियाबिंद ,रतौंधी आदि रोग समाप्त होते है|
* त्रिफला के पानी से आँखें धोने पर आँखों के हर प्रकार के रोग समाप्त होते है|
* गुलाबजल से आँखों में छींटे मारे|
* देशी गाय का घी आँख में काजल की तरह लगाए|
* यदि दाई आँख में दर्द हो तो बाए पैर के नाख़ून और बाई आँख में दर्द हो तो दाए पैर के नाख़ून आक के दूध से भिगोये. आक के दूध को कभी भी आँख में ना डाले. इससे आँख की रौशनी हमेशा के लिए चली जाती है|
* जीरा और मेहँदी को कूटकर गुलाबजल में भिगोकर सुबह इसे छान ले. ज़रासी फिटकरी मिलाले. इससे आँख धोने पर आँखों की गर्मी दूर होती है और आँखें स्वस्थ रहती है|
* अनार के पत्तों का रस आँख में लगाने से खुजली , आँखों से पानी बहना , पलकों की खराबी , आदि रोग दूर होते है. पत्तों की लुगदी आँखों पर रखी जा सकती है|
* शिरीष के पत्तों का रस आँख में लगाने से रतौंधी , आँख के दर्द में रौशनी बढाने में लाभ होता है|

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पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

श्वास रोग (अस्थमा) का होम्योपैथिक ईलाज




श्वासतंत्र में किसी रुकावट की वजह से सांस फूलने लगती है इसी को दमा कहते हैं। फेफड़ों के कोष्ठों में श्लेष्मायुक्त पदार्थ (म्यूकस) जमने की वजह से, कोष्ठों में सिकुड़ाव एवं सूजन आने की वजह से अथवा इन सभी संयुक्त वजहों से दमा हो जाता है।
यह रोग मुख्यतः पौष्टिक भोजन का अभाव, शारीरिक परिश्रम बहुत ज्यादा करने, धूल-धुंये भरे वातावरण में रहने, सीलन एवं दुर्गन्ध भरे वातावरण में रहने, उपदंश आदि के कारण हो जाता है । इस रोग में जरा-से श्रम से ही रोगी का दम फूल जाता हैं और उसे खाँसी आने लगती है । साँस लेने में रोगी को बहुत कष्ट होता है, छाती में खिंचाव बना रहता है, खाँसी बार-बार तथा बड़ी तेज उठती है, गले से सॉय-सॉय की आवाज आती है। ठण्ड में यह रोग बहुत बढ़ जाता है ।

दमा के प्रकार

• एलर्जिक दमा – इस प्रकार के दमा में किसी वातावरणीय तत्त्व के प्रति प्रतिक्रियास्वरूप रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं और एक-दो घंटे में समाप्त हो जाते हैं। जैसे गर्त, धुआं इत्यादि । बुखार, एक्जीमा भी हो सकते हैं।
• नॉन एलर्जिक – इसमें फेफड़ों के अंदर ही रुकावट पैदा होने लगती है। जीवन के चौथे चरण में अधिकांशत: इस प्रकार का दमा प्रकट होता है। इस तरह के रोगियों में सांस की अन्य तकलीफें भी बहुतायत में होती है। टॉन्सिल, साइनस आदि की परेशानी साथ में हो सकती है।
• संयुक्त प्रकार का – कुछ प्रतिशत रोगियों में एलर्जिक एवं नॉन एलर्जिक प्रकार का दमा संयुक्त रूप में रह सकता है।
• वातावरणीय कारकों – जैसे तापमान, नमी, दबाव एवं शारीरिक परिश्रम आदि की वजह से भी दमा हो सकता है।
• मानसिक तनाव एवं हृदय रोग की वजह से भी दमा रोग हो सकता है
ब्लाटा ओरियेण्टेलिस Q, 30, 200, 3x- यह दमा-रोग की सर्वोत्तम दवा है । प्रायः सभी प्रकार का नया दमा इससे अवश्य ही आरोग्य हो जाता है । विशेष रूप से स्नायविक एवं ब्रॉकियल दमा में यह दवा अति उपयोगी है । जब कभी भी दमा का दौरा उठे तो इस दवा के मूलअर्क (Q) को पानी में मिलाकर देने से दौरा शीघ्र ही थम जाता है और शांति का अनुभव होता है । वैसे दवा की 30, 200 या 3x शक्ति का व्यवहार करने पर दमा का रोग मूल सहित नष्ट हो जाता है|

किडनी फेल (गुर्दे खराब) रोग के कारगर उपचार 

यह दवा तिलचट्टा (कॉकरोच) से बनाई जाती है । वैसे ये तिलचट्टा प्रजातियाँ अमेरिका से आई हुई (अमेरिकन) हैं । व्लाटा ओरियेण्टेलिस प्रजाति अब दुर्लभ है, यही कारण है कि अब ब्लाटा ओरियेण्टेलिस नाम से जो दवा मिलती हैं, वह वास्तव में व्लाटा अमेरिकन ही है । तिलचट्टे से दमा-रोग के इलाज की परंपरा बहुत पुरानी है । आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में इस प्रकार का वर्णन देखने को मिलता है। चीन के चितांग वान की पुस्तक में एक ऐसे चिकित्सक का उल्लेख है जो मात्र दमा के उपचार के लिये प्रसिद्ध थे, वे चिकित्सक तिलचट्टे की सूखी टॉग को मरीज के एक्युपंक्चर के किसी बिन्दु पर लगाते थे । भारत के पं० ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम दम रोग के उपचार के लिये बहुत प्रसिद्ध था और उनके इलाज की सफलता ने उनकी ख्याति बहुत दूर-दूर तक फैला रखी थी । वे भी दमा के मरीजों को तिलचट्टे से बनी दवा ही दिया करते थे । वास्तव में, यह दमा रोग की उत्तम दवा है । मुझे भी इस दवा ने कभी भी निराश नहीं किया है ।
कैनाबिस इण्डिका Q- यह भाँग से बनने वाली दवा है । इसे देने से दमा का तीव्र से तीव्र दौरा भी तुरन्त घटने लगता है । डॉ० घोष ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि पहले वे एकोनाइट देकर ही सन्तुष्ट हो जाया करते थे लेकिन जब उन्होंने कैनाबिस इण्डिका Q की 5 बूंद से 4 ऑस तक दवा पानी में मिलाकर उसका एक-एक चम्मच घण्टे-घण्टे के अन्तर से दिया तो 2-3 घण्टे में ही दमे का दौरा घटने लगा ।
बैसिलिनम 30, 200– डॉ० घोष ने लिखा है कि दमा की तरह के खिंचाव होने या फेफड़ों में कफ भरा होने पर इस दवा का सेवन करने से दमा के लक्षणों में लाभ होता है और कफ साफ हो जाता है ।
सैम्बुकस नाइग्रा 3x- श्वास लेने में कष्ट, रोग का दौरा रात में उठे, आधी रात को दम घोंटने वाली खाँसी, रोगी बेचैन हो तो लाभ करती है।
मकरध्वज 1x, 2x- कुछ चिकित्सकों के अनुसार इस दवा से भी दमारोग में लाभ होता है 
इपिकाक 30, 200– यह दवा दमा-रोग में बहुत लाभकर है | फेफड़ों में रक्त एकत्र हो जाने के कारण श्वास लेने में कष्ट, हिलने-डुलने में कष्ट, आधी रात के बाद दम फूलना, श्वास-प्रश्वास की तीव्रता आदि में लाभ पहुँचाती है । इसे आवश्यकतानुसार आधा-आधा घण्टे बाद तक दे सकते हैं । डॉ० सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार ने इस दवा को अत्यन्त उपयोगी बताया है ।
हाइड़ोसियानिकम एसिड 3x- दमा के नये रोग में लाभप्रद हैं ।
कैनाबिस सैटाइवा Q- यह गाँजे से बनने वाली दवा है । इसे लेने से रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगती है जिससे रोगी को साँस लेने में कूल सकती की जाती है और कुल के लक्ष लाभ होता है ।

दन्तशूल, दांत का दर्द toothache) के घरेलू उपचार

कैसिया सोफेरा Q- यह दवा कसौदी से बनती है। इसके सेवन से दमा की खाँसी और दम फूलने के लक्षणों में बहुत लाभ होता है ।
ओरेलिया रेसिमोसा : आधी रात के समय खांसी उठे, सोते समय शरीर से खूब पसीना निकले, लेटते ही खांसी उठे, नींद की झपकी लगते ही खांसी चले, गले में कुछ अटका-सा लगना, आधी रात को दमा उठना आदि लक्षणों पर इस दवा का मूल अर्क (मदरटिंचर) या 6 शक्ति वाला अर्क (टिंचर) प्रयोग करना चाहिए। आधे कप पानी में 5-6 बूंद दवा डालकर 1-1 चम्मच दवा 2-2 घण्टे पर दें।
एकोनाइट-30 : यह बहुत पेटेन्ट दवा है जो शीघ्र प्रभाव करती है। खुली हवा में आराम मालूम देना, खुश्क ठण्डी हवा या ठण्ड के प्रभाव से कष्ट उत्पन्न होना, रोगी को घबराहट और बेचैनी बहुत होना, प्यास ज्यादा लगती हो, भय व घबराहट से शरीर पसीने-पसीने हो रहा हो, जिस तरफ लेटे उसी तरफ के अंग से पसीना निकले, रोग का अचानक और प्रबल वेग से आक्रमण हो, तो यह लाभकारी है।

सिर्फ दो हफ्ते मे पेट की फेट गायब 

ग्रिण्डेलिया-Q : नींद आते ही श्वास कष्ट हो और नींद खुल जाए, ताकि सांस ली जा सके, गले से सांस निकलते समय सू-सू या सीटी बजने जैसी ध्वनि हो, रोगी लेट कर सांस न ले सके, तो उठ कर बैठ जाए, खांसने पर काफी मात्रा में कफ निकले, कफ निकल जाने पर आराम मालूम हो, श्वास धीरे-धीरे फूलती जाए और तेजी से फूलने लगे, तो इस दवा का मदरटिंचर चार बूंदें आधे कप पानी में डालकर 2-2 घण्टे पर 1-1 चम्मच पिलाना चाहिए। इसको 30 शक्ति में भी 2-2 घण्टे पर प्रयोग कर सकते हैं। दमा के पुराने रोगियों के लिए यह अच्छी गुणकारी दवा है।
ससुरिया लैप्पा Q- यह दवा कुटज से बनती है । यह कफ निकालने वाली और कफनाशक है अतः दमा में इसके प्रयोग से बहुत लाभ होता है । इसके सेवन से दमा का खिंचाव और बार-बार होने वाले कष्ट शीघ्र ही घट जाते हैं 
    
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हर्बल चिकित्सा के अनुपम आलेख-

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