बच्चों के हाजमा ,अफ़ारा,वमन मे उपयोगी नुस्खे





१. चूने के स्वच्छ पानी को १/२ या १ चम्मच दूध पिलाने के पूर्व देने से बालकों की उल्टी, दस्त बन्द हो जाते है। वैल्सीयम कमी की पूर्ति होती है। बालक स्वथ्य रहता है।
२. अफारा (पेट) फूलने पर पानी में थोड़ा सा पापरी सोड़ा/ अथवा नीबू का रस डालकर पिलाने या तुलसी
का रस डालकर पिलाने या तुलसी का रस देने से शीघ्र लाभ होता है।
३. पेट पर थोड़ी धीमी—धीमी थपकी लगाने से छोटी आँत की क्षमता बढ़ती है। वायु पास हो जाती है।





यह रोग विटामिन सी और विटामिन बी की कमी से होता है। अत: खट्ठे फलों का जूस नियमित देना चाहिए।
१. हरी गिलोय (
गुरुचि )के रस में बालक  का कुर्ता रंगकर सुखा लें यही पहनाए रखें शीघ्र लाभ होगा।


२. खूबकला— ३०  ग्राम  बकरी  के  दूध मे औंटाकर छाया में सुखाये दूध फैक दें इस प्रकार ३ बार दूध में औटाए दूध फैकते जाएँ सुखाकर चूर्ण बना लें फिर २—४ ग्राम की खुराक गाय के दूध से पिलाएँ।

३. भैंस का ताजा गोबर प्रात: बच्चे की कमर और जाँघों पर ५ मिनट तक अच्छी तरह मलें। फिर हल्के गर्म -जल से धोए, धोने पर कमर पर काले काले रंग के छोटे—छोटे काँटे दिखाई देंगे इन काँटों को जल्दी—जल्दी चुन लें। कुछ दिन में बच्चा स्वस्थ हो जाएगा।

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गोमूत्र और हल्दी से केन्सर का इलाज




   कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं (सेल्स) असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और एक ही स्थान पर इकट्ठी होती रहती हैं। दरअसल हमारे शरीर की एक प्राकर्तिक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर की पुरानी कोशिकाएं एक निश्चित समय के बाद खुद-ब-खुद खत्म होती रहती हैं और उनकी जगह नयी कोशिकाएँ बनती रहती हैं। यदि किसी व्यक्ति को शरीर के किसी हिस्से में, कैंसर हो जाता है, तो उस जगह नयी कोशिकाएं तो बनती ही हैं, साथ ही पुरानी कोशिकाएं मरती नहीं और वह वहीँ इकट्ठी होती रहती हैं। यह कोशिकाएं इकट्ठी होकर वहीँ फैलती रहती है|
हालाँकि सभी कोशिकाएं कैंसर सेल्स नहीं होती। कुछ सेल्स महज ट्यूमर के रूप में इकट्ठी हो जाती है। लेकिन वह कोशिकाएं, जो आस-पास फैलती रहें और वहां के ऊत्तकों और अन्य स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगें, वह कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाएं कहलाती हैं। मेडिकल में कैंसर का उपचार उन कोशिकाओं को केमिकल्स के द्वारा खत्म कर के किया जाता है। लेकिन साथ ही मेडिकल ट्रीटमेंट से जुड़ी एक और सच्चाई यह भी है कि इस ट्रीटमेंट के दौरान, जिन दवाओं (केमिकल्स) का प्रयोग किया जाता है, उनसे भले ही कैंसर की कोशिकाएं खत्म हो जाती हों, लेकिन शरीर की अन्य कोशिकाओं पर भी उनका बुरा असर पड़ता है। कहने का मतलब यह है कि कैंसर के लिए दिया जाने वाला ट्रीटमेंट भी शरीर को बहुत नुक्सान पहुँचाता है।

   वहीं दूसरी और आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञानियों का यह कहना है कि कैंसर का उपचार बिना कीमोथेरेपी और रेडियो थेरेपी के बिना भी किया जा सकता है। कुछ आयुर्वेदिक अस्पताल और विशेषज्ञ यह दावा भी करते हैं कई कैंसर के उपचार के लिए, यानी यदि इसे जड़ से खत्म करने के लिए कोई दवाई उपलब्ध है, तो वह है गोमूत्र और हल्दी। सिर्फ इन दोनों में कैंसर की कोशिकाओं को खत्म वाले तत्व मौजूद हैं। हल्दी और गोमूत्र में एक प्राकृतिक  केमिकल करक्यूमिन पाया जाता है और यही करक्यूमिन केमिकल कैंसर की कोशिकाओं को खत्म कर सकता है।हल्दी कैंसर ठीक करने की ताकत रखती है ! कैसे ताकत रखती है वो जान लीजिये हल्दी में एक केमिकल है उसका नाम है कर्कुमिन (Carcumin) और ये ही कैंसर cells को मार सकता है बाकि कोई केमिकल बना नही दुनिया में और ये भी आदमी ने नही भगवान ने बनाया है ।
   

हल्दी जैसा ही कर्कुमिन और एक चीज में है वो है देशी गाय के मूत्र में । गोमूत्र माने देशी गाय के शारीर से निकला हुआ सीधा-सीधा मूत्र जिसे सूती के आठ परत की कपड़ो से छान कर लिया गया हो । तो देशी गाय का मूत्र अगर आपको मिल जाये और हल्दी आपके पास हो तो आप कैंसर का इलाज आसानी से कर पायेंगे ।
     अब देशी गाय का मूत्र आधा कप और आधा चम्मच हल्दी दोनों मिलाकर  गरम करना जिससे उबाल आ जाये फिर उसको ठंडा कर लेना । Room Temperature में आने के बाद रोगी को चाय की तरह पिलाना है |चुस्किया ले ले के सिप सिप कर  । एक और आयुर्वेदिक दवा है पुनर्नवा जिसको अगर आधा चम्मच इसमें मिलायेंगे तो और अच्छा result आयेगा । ये आयुर्वेद के दुकान में पाउडर या छोटे छोटे पीसेस में मिलती है ।
   याद रखें इस दवा में सिर्फ देशी गाय का मूत्र ही काम में आता है विदेशी जर्सी का मूत्र कुछ काम नही आता । और जो देशी गाय काले रंग की हो उसका मूत्र सबसे अच्छा परिणाम देता है इन सब में । इस दवा को (देशी गाय की मूत्र, हल्दी, पुनर्नवा ) सही अनुपात में मिलाके उबालकर ठंडा करके कांच की पात्र में स्टोर करके रखिये पर बोतल को कभी फ्रिज में मत रखिये, धुप में मत रखिये । ये दवा कैंसर के सेकंड स्टेज में और कभी कभी थर्ड स्टेज में भी बहुत अच्छे परिणाम देती है
      जब स्टेज थर्ड क्रोस करके फोर्थ में पहुँच गया हो तब रिजल्ट में प्रॉब्लम आती है । और अगर अपने किसी रोगी को Chemotherapy बैगेरा दे दिया तो फिर इसका कोई असर नही आता ! कितना भी पिलादो कोई रिजल्ट नही आता, रोगी मरता ही है । आप अगर किसी रोगी को ये दवा दे रहे है तो उसे पूछ लीजिये जान लीजिये कहीं Chemotherapy शुरू तो नही हो गयी ? अगर शुरू हो गयी है तो आप उसमे हाथ मत डालिए, जैसा डॉक्टर करता है करने दीजिये, आप भगवान से प्रार्थना कीजिये उसके लिए इतना ही करे । 

और अगर Chemotherapy स्टार्ट नही हुई है और उसने कोई  एलोपैथी  treatment शुरू नही किया तो आप देखेंगे इसके Miraculous (चमत्कारिक रिजल्ट आते है । ये सारी दवाई काम करती है बॉडी के resistance पर, हमारी जो vitality है उसको improve करता है, हल्दी को छोड़ कर गोमूत्र और पुनर्नवा शारीर के vitality को improve करती है और vitality improve होने के बाद कैंसर cells को control करते है ।
     तो कैंसर के लिए आप अपने जीवन में इस तरह से काम कर सकते है; इसके इलावा भी बहुत सारी मेडिसिन्स है जो थोड़ी complicated है वो कोई बहुत अच्छा डॉक्टर या वैद्य उसको हंडल करे तभी होगा आपसे अपने घर में नही होगा । इसमें एक सावधानी रखनी है के गाय के मूत्र लेते समय वो गर्भवती नही होनी चाहिए। गाय की जो बछड़ी है जो माँ नही बनी है उसका मूत्र आप कभी भी use कर सकते है।
ये तो बात हुई कैंसर के चिकित्सा की, पर जिन्दगी में कैंसर हो ही न ये और भी अच्छा है जानना । तो जिन्दगी में आपको कभी कैंसर न हो उसके लिए एक चीज याद रखिये के, हमेशा जो खाना खाए उसमे डालडा घी (refine oil ) तो नही है ? उसमे refined oil तो नही है ? हमेशा शुद्ध तेल खाये अर्थात सरसों ,नारियल ,मूँगफली का तेल खाने मे प्रयोग करें ! और घी अगर खाना है तो देशी गाय का घी खाएं ! गाय का देश घी नहीं !
ये देख लीजिये, दूसरा जो भी खाना खा रहे है उसमे रेशेदार हिस्सा जादा होना चाहिए जैसे छिल्केवाली डाले, छिल्केवाली सब्जिया खा रहे है , चावल भी छिल्केवाली खा रहे है तो बिलकुल निश्चिन्त रहिये कैंसर होने का कोई चान्स नही है ।
और कैंसर के सबसे बड़े कारणों में से दो तीन कारण है, एक तो कारण है तम्बाकू, दूसरा है बीड़ी और सिगरेट और गुटका ये चार चीजो को तो कभी भी हाथ मत लगाइए क्योंकि कैंसर के maximum cases इन्ही के कारन है पुरे देश में ।
कैंसर के बारे में सारी दुनिया एक ही बात कहती है चाहे वो डॉक्टर हो, experts हो, Scientist हो के इससे बचाव ही इसका उपाय है ।
महिलाओं को आजकल बहुत कैंसर है uterus में गर्भाशय में, स्तनों में और ये काफी तेजी से बड़ रहा है .. Tumour होता है फिर कैंसर में convert हो जाता है । तो माताओं को बहनों को क्या करना चाहिए जिससे जिन्दगी में कभी Tumour न आये ? आपके लिए सबसे अच्छा prevention है की जैसे ही आपको आपके शारीर के किसी भी हिस्से में unwanted growth (रसोली, गांठ) का पता चले तो जल्द ही आप सावधान हो जाइये । हलाकि सभी गांठ और सभी रसोली कैंसर नही होती है 2-3% ही कैंसर में convert होती है
   लेकिन आपको सावधान होना तो पड़ेगा । माताओं को अगर कहीं भी गांठ या रसोली हो गयी जो non-cancerous है तो जल्दी से जल्दी इसे गलाना और घोल देने का दुनिया में सबसे अछि दावा है " चुना " । चुना ;जो पान में खाया जाता है, जो पोताई में इस्तेमाल होता है ; पानवाले की दुकान से चुना ले आइये उस चुने को कनक के दाने के बराबर रोज खाइये; इसको खाने का तरीका है पानी में घोल के पानी पी लीजिये, दही में घोल के दही पी लीजिये, लस्सी में घोल के लस्सी पी लीजिये, डाल में मिलाके दाल खा लीजिये, सब्जी में डाल के सब्जी खा लीजिये । पर ध्यान रहे पथरी के रोगी के लिए चुना बर्जित है ।
 

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कमर दर्द जड़ से खत्म करने के उपचार



     

    कमर का दर्द अब एक सामान्य सी बीमारी बन गई है। पहले जहाँ कमर दर्द बुज़ुर्गो को ही हुआ करता था अब हर छोटे-बड़े इससे परेशान है।
    हांलाकि कमर दर्द होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते है। खास कर हमारी जीवनशैली की कुछ ख़राब आदते। जैसे की देर तक बिना आराम किये काम करते रहना या बैठने-उठने में बिना वजह उतावलापन तथा गलत तरीका।
कमर दर्द को जड़ से मिटाने के कई असरकारक और बेजोड़ घरेलु नुस्खें आयुर्वेद में दिए गए है। 
लेकिन इससे पहले कमर दर्द के बारे में कुछ सामान्य जानकारी जानते है। अगर आप खुद कमर दर्द से पीड़ित नहीं है तो यकीनन आपके लिए यह जानकारी उपयोगी होगी।

क्या न करें :


कमर दर्द का सीधा संबंध वायु से है. मतलब अगर शरीर में वायु प्रकोप होगा तो कमर दर्द के साथ-साथ जोड़ों के अन्य दर्द भी होने की संभावना है. इससे बचाव के लिए आपको वैसे खुराक से दुरी रखनी चाहिए जिससे पेट भारी रहे या कब्ज की शिकायत रहे. सामान्य कुदरती प्रक्रियाएं जैसे छींक, मलत्याग, मूत्रत्याग को रोकने का प्रयत्न न करें. चिंता, भय, और गुस्सा करने से बचने की कोशिश करें. शरीर को पर्याप्त आराम दें. रात को बिना-वजह जागने की आदत न बनाएं.

क्या खाएं ? 

    जैसा की आपने पढ़ा कमर दर्द का सीधा संबंध वायु से है. इसलिए कमर दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चाहिए की वो भारी खुराक के बजाय हल्का, सुपाच्य ताजा खुराक खाएं. खुराक में लहसुन, हींग, मेथी, अजवाइन, ताजा हरी-हरी प्राकृतिक सब्जियों का प्रयोग करें.

क्या न खाएं ? : 

    कमर दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चने, लोबिया के बीज, जौ, मटर, भिन्डी, बैंगन, ग्वार के बीज, इमली, दहीं, छाछ जैसे पदार्थ लेने से परहेज करना चाहिए. साथ ही अधिक तेल से तले हुए खाने और मसालेदार खाना खाने से भी बचना चाहिए.
     अगर आप कमर-दर्द से पीड़ित नही है तो ऊपर दी गई जानकारी से आपको इस दर्द से दुरी रखने में सहायक होगी. परंतु आप कमर-दर्द से पीड़ित है तो इसके लिए क्या इलाज और घरेलु नुस्खें है आइए अब वो जानते है

 1.मेथी को थोड़े से घी में सेंक कर पीस लें. फिर उसमे गुड और घी मिलाकर छोटे छोटे लड्डू बना लें. 8-10 दिनों तक इसका लगातार सेवन करने से कमर दर्द और गठिया जड़ से मिटता है. 
2.कच्चे आलू को बिना छिले टुकड़े कर तुरंत उसका रस निकाल लें. इस रस को पीने से गठिया (Arthritis) के रोग में बड़ा फायदा मिलता है. 3. सौंठ का काढा बनाकर पिने से जोड़ों के अक्सर दर्द में राहत मिलती है.
4.सौंठ, लहसुन, अजवाइन और सरसों के कुछ दानो (Mustard) को तेल में गरम कर लीजिए. ठंडा होने पर उस मिश्रण से मालिश करने से कमर के दर्द में आराम मिलता है.
 5. सौंठ के चूर्ण या पावडर का पानी के साथ सेवन करने से कमर का दर्द मिटता है.
6.सौंठ पावडर और हींग को तेल में गरम कर ठंडा होने पर मालिश करने से भी कमर दर्द में राहत मिलती है.
7.सरसों के तेल के साथ प्याज के रस को मिलाकर मालिश करने से कमर दर्द और गठिया मिटता है.
8.अदरक के रस में चुटकी भर सामान्य नमक (Salt) डाल दें. फिर उससे दर्द वाले हिस्से पर मालिश करें फायदा मिलेगा. 

9.अजवाइन और गुळ बराबर मात्रा में सुबह-शाम लेने से कमर का दर्द नहीं रहता. 
10.ताजा खजूर की पांच पेशियाँ लें और पानी में उसका काढा बनाएं. फिर उसमे दो चम्मच मेथी डालकर वो पेय पिएँ. इससे कमर दर्द में राहत मिलती है. 
11.जायफल को सरसों के तेल में भिगोकर कमर के दर्द वाले हिस्से पर हलके हाथों से मालिश करें. इससे कमर का दर्द तो दूर होगा पर अगर गठिया भी हुआ तो वह भी मिट जाएगा. 
12.लौंग का तेल घिसने से गठिया का रोग मिटता है.
13.चुटकी भर मेथी रोज खाने की आदत वायु के अधिकतर रोगों को दूर रखती है. और कमर दर्द तथा जोड़ों के दर्द का मुख्य कारण वायु ही होता है.




विशिष्ट परामर्श-  

संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| रोगी के व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर  निर्मित औषधि से बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| 
औषधि के लिए वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं| 












बायोकेमिक चिकित्सा पद्धति की जानकारी




*बायोकेमिक चिकित्सा शरीर के कोशों में होने वाली चयापचयिक(मेटाबोलिक)प्रक्रियाओं को खनिज लवणों के माध्यम से मानव शरीर के क्रियाकलापों की सहायता करने के लिए अपरिहार्य होती है। 
*योरोपीय भौतिक विज्ञानियों द्वारा यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया कि शरीर के कोषों और तंतुओं के वास्तविक घटक स्वास्थ्य के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रभावकारी होते हैं। बर्लिन के रूडोल्फ वरशु (1821-1902) ने अपनी अनुपम पुस्तक 'सैल्यूलर पैथोलॉजी" में इंगित किया है कि "अंततः प्रत्येक प्रकार का कष्ट (रोग) केवल कोषों में एक प्रकार की विकृति पर आधारित होता है। केवल कोष बीमार हो सकता है-कोष जो मानव शरीर की सबसे चोटी क्रियाकारी इकाई होता है। "
*जर्मन बायोकेमिस्ट और भौतिक विज्ञानी डॉ विल्हेम हेनरिक शुसलर (1821-1898) ने जैविक राख़ का विश्लेषण किया और इसमें 12 प्रमुख टिशु (खनिज) लवणों की पहचान की जो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान रहते हैं। ये टिशु  (खनिज) लवण कोषों, तंतुओं और अंगों के अकार्बनिक घटक होते हैं और शरीर की कार्य प्रणाली तथा चयापचयी क्रियाओं के लिए महात्व्पोर्ण होते हैं। डॉ शुसलर ने इन्हें फंक्शनल साल्ट या टिशु लवण" नाम दिया। 
*ये टिशु लवण शिलाओं और मिट्टी में आम पाये जाते हैं। ये लवण न केवल शरीर में खनिजों की कमी को पूरा करते हैं बल्कि भोजन में से इन लवणों के स्वांगीकरण को भी बढ़ाते हैं। 
*डॉ शुसलर ने आगे प्रतिपादित किया जीवित तंतुओं में  इन लवणों की कोषों में आवश्यक मात्रा में कमी से कोषों में मालिक्यूलर गति में जो अव्यवस्था उत्पन्न होती है उसको ही रोग कहते हैं। कमी वाले टिशु (खनिज ) लवण की सूक्ष्म मात्रा में आपूर्ती करने (खिलाने ) से अव्यवस्था को दुरुस्त करके स्वास्थ्य पुनर्स्थापित किया जा सकता है। 

*डॉ शुसलर ने शरीर में विद्यमान प्रत्येक टिशु (खनिज ) लवण के कार्य  और क्रियाकलाप का अन्वेषण किया और इनके आधार पर लक्षणों के अनुसार परीक्षणों द्वारा शानदार परिणाम पाये। 
*डॉ शुसलर का 30 मार्च 1898 को, 77 वर्ष की आयु में देहांत हुआ, लेकिन उनका शोध-कार्य सम्पूर्ण यूरोप तथा विश्व में आज भी जारी है। प्रथम बायोकेमिक परिषद ओलड़नबरी में 1885 में स्थापित हुआ। आज यह 96 शाखाओं में विभक्त है। 
डॉ शुसलर के सिद्धान्त :


*मनुष्य के शरीर में बारह विभिन्न टिशु (खनिज ) लवण विद्यमान होते हैं, अच्छे स्वस्थ्य और कोषों की सामान्य प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए इंका समुचित संतुलन बनाए रखना ज़रूरी होता है। 
*इस संतुलन में कोई भी कमी होने पर जो स्थिति उत्पन्न होती है उसे रोग कहा जाता है। 
*रोग की दशा में शरीर में कमी वाले 'लवणों' को पोटेन टाइज़ रूप में खिलाने से ये टिशु (खनिज ) लवण खून के प्रवाह के साथ तेजी से कोषों में पहुँच कर स्वास्थ्य का सामान्य संतुलन पुनर्स्थापित कर देते हैं। 
*डॉ शुसलर द्वारा आविष्कार की गई यह चिकित्सा विधि बायोकेमिक पद्धति कहलाई। 
*बायोकेमिक दवाएं होम्योपेथिक पद्धति के समान घर्षण करके तैयार की जाती हैं। 
*बायोकेमिक चिकित्सा पद्धति टिशु (खनिज ) लवणों की कमी के आधार पर की जाती है,अतः होम्योपेथिक पद्धति के विपरीत इस पद्धति में एक से अधिक दवा मिश्रित करके उपयोग की जा सकती है। 
*बायोकेमिक दवाएं सूक्ष्म मात्रा में निम्न पोटेनसी में यथा-1 x, 3 x, 6 x, 12 x, 30 x, 200 x में उपयोग की जाती हैं। ये दवाएं बच्चों, गर्भिणी महिलाओं,वृद्ध व्यक्तियों को भी सुरक्षित रोप से खिलाई जा सकती हैं। 


पिपली के गुण प्रयोग लाभ 

हस्त मैथुन से उत्पन्न यौन दुर्बलता के उपचार




    हस्तु मैथुन से धातु वीर्य दोष हो जाता है और धातु पतली हो जाती है. ऐसे में युवाओं की जिंदगी नरक बन जाती है. युवाओं से अनुरोध है के इस बुरी आदत को छोड़ दें. और हुए नुक्सान की भरपाई के लिए निम्न घरेलु नुस्खे अपनाने चाहिए.
दुर्बलता को दूर करने के उपाय.

आंवला तथा हल्दी – 


आंवला तथा हल्दी समान मात्रा में पीसकर घी डालकर सेंक लीजिये, और भून लीजिये, सिकने के बाद दोनों की बराबर मात्रा में पीसी मिश्री मिला लीजिये. (जैसे 100-100 ग्राम आंवला और हल्दी है तो मिश्री २०० ग्राम) अभी इसको सुबह शाम एक एक चम्मच गर्म दूध के साथ फंकी लीजिये.

असगंध (अश्वगंधा) –

 आधा चम्मच असगंध की फंकी नित्य सुबह शाम गर्म दूध से लेने से ठीक हो जाती है. मर्दाना शक्ति भी बढती है और आंवले के प्रयोग को भी निरंतर करे.

कच्ची हल्दी और शहद – 

कच्ची हल्दी का रस दो चम्मच, समान भाग शहद में मिलाकर एक बार रोजाना पियें. या पीसी हुयी हल्दी 250 ग्राम गाय या भैंस के घी में सेंक कर इसमें पीसी हुयी 250 ग्राम मिश्री मिला लें. नित्य रात को गर्म दूध से फंकी लें.

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लंबे और घने बालों के लिए अपनाएं ये उपाय



    

      आम लोग अब मार्केट में मौजूद उत्पादों पर कम भरोसा करते हैं क्योंकि इनमें होते हैं हानिकारक रसायन और दूसरे कठोर उत्पाद। अब वे प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले आयुर्वेदिक उपचारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं। कई तरह की सामान्य समस्याओं के लिए भी अब प्राकृतिक उत्पादों को अपनाया जाता है।
   

आयुर्वेदिक उपचारों की मदद से आप अपने बालों को शानदार और लंबे बना सकते हैं। छोटे बालों वाली महिलाएँ अपने लंबे बालों की ख्वाहिश अच्छे देखभाल की कमी की वजह से पूरा नहीं कर पातीं। बालों के बढ़ने के लिए आयुर्वेदिक उपचार हमेशा से मौजूद थे लेकिन उन्हें अपनाया नहीं गया। लेकिन आज इनके इस्तेमाल से ज्यादा से ज्यादा लोग फायदा उठा रहे हैं।  कुछ आयुर्वेदिक सुझावों की तरफ ध्यान देते हैं। बाल लम्बे कैसे करे :-

लंबे बालों के लिए सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक नुस्खे 
खुशबूदार जटामांसी-
    बाल बढ़ाने के उपाय, जटमानसी आमतौर पर पाया जाने वाला एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है जो कि बालों को बढ़ने में मददगार है। यह खून में से अशुद्धियों को दूर करता है और बढ़ती रंगत देता है। यह बालों की कई तरह से बढ़ने में मदद करता है। आप इसे दवा के रूप में ले सकती हैं या बालों पर सीधे भी लगा सकते हैं। याद रखें कि दवा की तरह इस्तेमाल करते वक्त कैप्सूल 6mg से ज्यादा न  हो।
भ्रंगराज -
   भ्रंगराज नाम है जड़ी बूटियों के राजा का जिसमें बालों की लंबाई बढ़ाने का बेहतरीन गुण है। लंबे बाल के उपाय, इसके पत्तों को धो कर पेस्ट बना लें। जिन्हें यह पत्तियाँ न मिलें वे आयुर्वेदिक दुकानों से इसका पाउडर ले सकते हैं। इसकी 5-6 चम्मच पाउडर को गर्म पानी में डालकर पेस्ट बना लें और फिर बालों में लगाकर 20 मिनट तक रखें

लंबे बालों के लिए आँवला -
   
आमला के नाम से भारतीय में लोकप्रिय इस आयुर्वेदिक जड़ी को शरीर में अपच की हालत का इलाज करने के लिए प्रयोग किया जाता है । यह वास्तव में बाल गिरने को नियंत्रित करने में बहुत प्रभावी है। आज भी महिलाओं के बालों में हिना के साथ आंवला पाउडर इस्तेमाल करतीं हैं। इस प्राकृतिक उत्पाद में विटामिन सी भरपूर होता है।


लंबे बालों के लिए मेथी -

कुछ चम्मच मेथी के बीजों को गर्म पानी में मिलाएँ और ठंडा करने के बाद बालों पर लगाएँ और फिर धोएँ।

एलोवेरा -

रोज दो चम्मच एलोवेरा का सत्व खाने में लें इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और इसे बालों में लगाने से बाल शानदार तरीके से बढ़ते हैं।

लंबे बालों के लिए अश्वगंधा -

यह एक प्रमुख आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है। उम्र बढ़ने से रोकने के साथ ही यह पित्त दोष भी दूर करता है। जिसे दूर करने से बालों का झड़ना भी बंद हो जाएगा।

बाल लंबे करने के तरीके – बालों की आयुर्वेदिक मालिश -

 लोग शायद ही कभी गर्म तेल से मालिश करते हैं जो कि बालों के पोषण के लिए बहुत जरूरी है। आप अब कई तरह के आयुर्वेदिक तेलों से बालों और जड़ों की मालिश कर सकते हैं। इसके लिए आप ब्राह्मी या नारियल का तेल इस्तेमाल कर सकते हैं। यह बालों की जड़ों को पुनर्जीवित करने के साथ ही इनका झड़ना भी कम करते हैं और सिर्फ 6 महीनों के छोटे से समय में ही आप पाएंगें बेहतरीन लंबे बाल।




आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा


किडनी फेल (गुर्दे खराब) रोग की अनुपम औषधि 








छोटा बेर होता है बड़ी दवा जानें इसके फायदे



    बेर एक मौसमी फल है. हल्के हरे रंग का यह फल पक जाने केबाद लाल-भूरे रंग का हो जाता है. बेर को चीनी खजूर के नाम से भी जाना जाता है. चीन में इसका इस्तेमाल कई प्रकार की दवाइयों को बनाने में किया जाता है
सेहत के लिए किस तरह फायदेमंद है बेर?
*इसमे कई तरह के अमीनो एसिड पाये जाते है जो की शरीर के लिए बहुत अच्छे होते है। अगर हमारे शरीर में यह अमीनो एसिड सही मात्रा में हो तो हमारे शरीर का 50 परसेंट पोषण पूरा हो जाता है। इसके साथ-साथ जिन लोगों को अनिंद्रा की प्रॉब्लम है वह भी ठीक हो जाती है।


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 



*यह कैंसर होने से रोकता है। इस में पाए जाने वाले न्यूट्रिशन हमें कैंसर होने से बचाता है।
अगर आप वजन कम करना चाहते है तो बेर आपके लिए बहुत ही बढ़िया फल है। क्योंकि बेर में बहुत ही कम फैट होता है जो कि आपके वजन कम करने में मदद करता है। बेर खाने से आपका पेट भरा भरा रहता है जिसकी वजह से आप ओवर इटिंग से बच सकते हैं अगर आप जरूरत से ज्यादा खाना नहीं खाएंगे तो आपका वजन जल्दी कम होने लगेगा।
*यह पाचन तंत्र को ठीक करने मे मदद करता है और इसके साथ साथ यह कब्ज ठीक करने मे भी मदद करता है। अगर आपका पाचन तंत्र सही रहता है तो आपके पेट में अफारा नहीं रहेगा और आपका खाना आसानी से पच जाएगा।


प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 

*इसमे मौजूद कैल्सियम और विटामिन हड्डियों को मजबूत करने मे मदद करते है। अगर आपकी हड्डियों में दर्द रहता है तो आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
यह बालो के लिए बहुत बढ़िया होता है। इसमे मौजूद पोषक तत्व बालो को घना और हेल्दी बनाए रखने मे मदद करता है।
*लस्सी के साथ बेर खाने से पेट दर्द दूर हो जाता है।
*जिन लोगो को फोड़ा फुंसी होती है उनको इसका सेवन करना चाहिए।
*यह कोलेस्ट्रॉल लेवेल को कम करना है जो की दिल के लिए बहुत फायदेमंद है।
*खांसी होने पर बेर का जूस पीने पर से फायदा मिलता है।


पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

*बेर में बहुत से ऐसे मिनरल्स पाए जाते हैं जो कि हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाते हैं जिससे हमें बीमारियों के खिलाफ लड़ने में काफी मदद मिलती है अगर हमारा प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होता है तो हमें जल्दी बीमारियां लग जाती है और बार-बार हम बीमार पडते रहते हैं इसलिए अगर आप बेर का रेगुलर इस्तेमाल करते हैं तो आप कई तरह की बीमारियों से बच सकते हैं।
*अगर आपको चोट लग गई है तो आप बेर को पीसकर और इसमें तेल मिलाकर इसका लेप बना लीजिए और अपने जख्म वाले स्थान पर लगाकर ऊपर से पट्टी कर लीजिए इससे आपका जख्म जल्दी ठीक हो जाएगा और कोई इंफेक्शन भी नहीं होगा।

 *रसीले बेर में कैंसर कोशिकाओं को पनपने से रोकने का गुण पाया जाता है.
*अगर आप वजन कम करने के उपाय खोज रहे हैं तो बेर आपके लिए एक अच्छा विकल्प है. इसमें कैलोरी न के बराबर होती है.
*बेर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी, विटामिन ए और पोटैशियम पाया जाता है. ये रोग प्रतिरक्षा तंत्र को बेहतर बनाने का काम करता है.


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* बेर एंटी-ऑक्सीडेंट्स का खजाना है. लीवर से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए भी यह एक फायदेमंद विकल्प है.
*बेर खाने से त्वचा की चमक लंबे समय तक बरकरार रहती है. इसमें एंटी-एजिंग एजेंट भी पाया जाता है.
*अगर आप कब्ज की समस्या से जूझ रहे हैं तो बेर खाना आपको फायदा पहुंचा सकता है. यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है.
*बेर में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम और फाॅस्फोरस पाया जाता है. यह दांतों और हड्ड‍ियों को मजबूत बनाता है.
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सर्दी के मौसम मे सेहत बनाने वाले गोंद के लड्डू





    सर्दी का मौसम सेहत बनाने वाला मौसम होता है| इसलिए इस मौसम में हमें अपना अच्छे से ख्याल रखना चाहिए| यदि सेहत बनाने की बात चल रही हो तो ड्राई फ्रूट्स का नाम सबसे पहले आता है| जैसा की हम सभी जानते है ड्राई फ्रूट्स हमें ताकत देते है और हमारा स्वास्थ भी सुधारते है|
ठंड के समय पाचन शक्ति अच्छी रहती है और भूख भी खुलकर लगती है| इसलिए इस वक्त हैवी खाना भी आसानी से हजम हो जाता है| इसलिए शीत ऋतु में हमें सूखे मेवो से बने पौष्टिक आहार एवं व्यायाम, आदि के द्वारा पर्याप्त शक्ति अर्जित कर लेनी चाहिए, ताकि पुरे साल हम स्वस्थ रह सकें|

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सूखे मेवे के लड्डू कई तरह से बनाये जा सकते है, लेकिन इसके लड्डू को गोंद के साथ बनाए जाएं और खाए जाएं, तो आपको केवल ताकत ही नहीं बल्कि स्वाद भी डबल मिलेगा| गोंद के लड्डू खासतौर पर राजस्‍थान में बनाये जाते है। इसके सेवन से शरीर को ताकत मिलती है और सर्दी भी नहीं लगती| तो आइये आज हम आपको बताते है  गोंद के लड्डू को बनाने के तरीके और इससे मिलने वाले फायदों के बारे में|

 गोंद के लड्डू खाने के लाभ और बनाने के तरीके
ठंडी के दिनों में शरीर को ऊर्जा देने के लिए गोंद से बने लड्डू से ताकत मिलती है| रोजाना सुबह नाश्ते में 1 या 2 लड्डू गोंद के खाकर आप खुद को सर्दियों में स्वस्थ रख सकते है| इससे शरीर को गर्मी मिलती है और सर्दी नहीं लगती| इसलिए बच्चो के लिए तो यह बहुत ही अच्छे होते है|


सामग्री:-

इन् गोंद के लड्डू को आप 1 महीने तक इस्तेमाल कर सकते है। गोंद के लड्डू में ड्राई फ्रूट्स के अलावा गोंद के साथ मूंग दाल का आटा और सोयाबीन का आटा और भी डाला जाता है। ये सभी शरीर को प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व देते हैं| इसलिए बच्चे को जन्म देने के बाद यदि यह माँ को खिलाया जाये तो वो जल्दी ठीक हो सकती है।

गोंद - 1 कप (100 ग्राम)
घी- 500 ग्राम
गुड़- 600 ग्राम
किशमिश, मखाने - 100 ग्राम
बादाम, काजू, खारिक - 200 ग्राम
बनाने की विधि:-



सारे सूखे मेवे को मिक्सर में चलाकर बारीक़ कर ले या छोटे-छोटे टुकड़ो में काट लें|
अब गोंद को ओखली में छोटा-छोटा करके तोड़ ले|
कढ़ाई में घी डाल कर गर्म करले|
अब गर्म घी में गोंद के टुकड़े डालकर उसे हल्का ब्राउन होने तक सेक लें|
फिर ठंडा करने के लिए प्लेट में निकाल ले|
   अब कढ़ाई में थोड़ा और घी डाल कर गर्म करें| गुड़ को तोड़ कर टुकड़े कर लें, और घी में डालकर पिघला लें|
गुड़ की गाढ़ी चाशनी बनने तक रुके|
   अब गुड़ की चाशनी में पीसी गोंद, सारे मेवे अच्छी तरह मिलाकर लड्डू का मिक्सचर तैयार कर लें|
अब इस मिश्रण को हाथ में लेकर हाथों से गोल-गोल लड्डू बनाकर तैयार करें|
आप अपने अनुसार छोटे या बड़े लड्डू बना सकते है|
     इन् लड्डू को सुबह 5 बजे उठकर खाया जाये और फिर थोड़ी देर सो लिया जाये तो इसका अधिक फायदा मिलता है| इसमें मौजूद काजू- बादाम और घी के कारण चेहरे पर चमक आती है|
इसके अलावा आप यदि इसमें मेथी दाने का इस्तेमाल करेंगे तो सर्दियों में होने वाले कमर या जोडों के दर्द से राहत मिलती है| एक बात का ख्याल रहे की 2 से ज्यादा लड्डू ना खाए|

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नई और पुरानी खांसी के रामबाण नुस्खे





खांसी बच्चे बूढ़े, जवान, स्त्री या पुरुष सभी को कभी भी हो सकती है। इतना साधारण-सा लगने वाला यह रोग किसी-न-किसी उम्र में सबको तंग कर चुका होता है। वास्तव में देखा जाए तो खांसी स्वयं कोई रोग नहीं, बल्कि दूसरे रोगों का लक्षण होता है। यह सर्दी-जुकाम, वाइरल इंफेक्शन, जीवाणु के संक्रमण, प्रदूषण, निमोनिया, तपेदिक, दमा, प्लूरिसी, फेफड़ो की खराबी आदि रोगों में हुआ करती है। मुख्य रूप से यह सूखी, तर, बलगम वाली खांसी और दौरे के रूप में उठने वाली खांसी (व्हूपिंग कफ़) होती है। इस पोस्ट में हम आपको खांसी की अचूक दवा ओं को बतायेंगे जो बिलकुल सुरक्षित हैं | आप इन घरेलु और आयुर्वेदिक नुस्खो को अपनाकर खांसी की समस्या से आसानी से छुटकारा पा सकते है |

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खांसी के कारण :
खांसी होने के प्रमुख कारणों में गले और फेफड़े के भीतरी भाग में सूजन होना, फेफड़ों की छोटी-छोटी नलिकाओं में उत्तेजना पैदा होने से, कीटाणुओं का संक्रमण, धूल या धुएं के कणों से एलर्जी होना आदि होते हैं।


खांसी के लक्षण :
इस रोग में सीने में जकड़न महसूस होना, सूखी खांसी और तर खांसी में बलगम निकलना आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

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खांसी के घरेलू उपचार
तुलसी और हल्दी से खांसी की अचूक दवा
तुलसी के सूखे पत्ते और अजवायन 20-20 ग्राम तथा सैंधा नमक 10 ग्राम मिलाकर पाउडर बना लें। इस पाउडर को 3 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से खांसी, जुकाम दूर हो जाता है।
तुलसी के रस में अदरक व पान के पत्तो का रस, कालीमिर्च, काला नमक और शहद मिलाकर लेने से भी खांसी छुटकारा मिल जाता है। अह भी खांसी की अचूक दवा है |
सुबह खाली पेट 4-5 तुलसी की पत्तियों को साफ पानी से धोकर खाते रहने से खांसी ,कफ, जुकाम आदि अनेक रोगों से बचाव रहता है |

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*खांसी से तुरंत राहत पाने के लिए 1 ग्राम भुनी हुई हल्दी की गांठ मुंह में रखें |
अदरक का रस और शहद समान मात्रा में लेकर (1-1 चम्मच की मात्रा में) इनको मिलाकर मामूली-सा गर्म करके दिन में 3-4 बार लेने से बलगमी खांसी ठीक हो जाती है। बच्चों की खांसी में इस मिश्रण की 1-2 ऊँगली में जितना मिश्रण आ जाए, उतना ही दिन में 2-3 बार लेना ही काफी है। सिर्फ 2-3 दिन में लाभ हो जाएगा। साथ ही नजला, जुकाम भी ठीक हो जायेगा | (नोट शहद को ज्यादा गर्म नही करना चाहिए )

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*आंवला, अलसी, खस-खस, और सुहागा से खांसी की अचूक दवा बनाने के उपाय
छोटी पीपल, छोटी इलायची के बीज और सौंठ इन सबको 4-4 ग्राम लेकर पीस लें। इसमें 100 ग्राम गुड मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियां बना लें। प्रतिदिन रात में 2 गोली गर्म पानी के साथ लें |
आंवले का पाउडर और मिश्री मिलाकर पानी के साथ लेने से पुरानी खांसी ठीक हो जाती है।
सुहागा (Borax) फुलाकर तथा बारीक पीसकर इसकी 1-1 ग्राम मात्रा को दिन में 3 बार शहद में मिलाकर अथवा गुनगुने पानी में डालकर सेवन करें। इससे खांसी पहले दिन ही ठीक हो जाती है। यह खांसी का रामबाण इलाज है |
*अलसी के बीज भुने हुए पीसकर शहद में मिलाकर लेने से भी खांसी मिटती है।
खस-खस के दाने भूनकर पीस लें और उसमें थोड़ा सैंधा नमक व कालीमिर्च मिलाकर एक चम्मच दिन में 2-3 बार सेवन करने से खांसी मिट जाती है।

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*अदरक और काली मिर्च युक्त तुलसी की चाय के सेवन से खांसी , कफ आदि दूर हो जाते है | इस चाय को बनाने की विधि – तुलसी की चाय बनाने के लिए तुलसी की ताजा 7 हरी पत्तियां या छाया में सुखाई हुई तुलसी की पत्तियों का पाउडर चौथाई चम्मच भर, कालीमिर्च के दाने 7 (थोड़े कुटे हुए) सूखी सौंठ का पाउडर चौथाई चम्मच अथवा ताजा अदरक 2 ग्राम लेकर इन सभी को 1 कप उबलते पानी में डालकर 4-5 उबाल आने दें। इसके बाद बर्तन को नीचे उतारकर 2 मिनट तक ढककर रख दें। उसके बाद छानकर इसमें उबाला हुआ दूध 100 मि.ली और 1-2 चम्मच शक्कर या चीनी मिलाकर गरम-गरम पी लें और कपड़ा ओढ़कर 5-10 मिनट के लिए सो जाएं। इस प्रयोग से खांसी, सर्दी का सिरदर्द, जुकाम, और गले के रोगों से छुटकारा मिल जाता है। साथ ही यह कफ से होने वाली खांसी की अचूक दवा है |

एक्ज़ीमा के घरेलु उपचार

*पुरानी खांसी का आयुर्वेदिक इलाज
जवाखार 1 ग्राम, कालीमिर्च 2 ग्राम, पीपल 4 ग्राम और अनार का छिलका, काकडासिंगी, वंशलोचन, सतमुलहठी तथा सौंठ प्रत्येक को 8-8 ग्राम लेकर बारीक पीसकर छान लें | उसके बाद इस पाउडर में शहद डालकर गोली बना लें। यह दिनभर में 4 गोलियां लेने से पुरानी बलगम वाली खांसी भी ठीक हो जाती है।
बबूल का गोंद, कत्था और मुलहठी प्रत्येक 10–10 ग्राम लेकर तीनों को बारीक पीसकर छान लें | फिर इस पाउडर को अदरक के रस में घोटकर गोलियां बनाकर किसी शीशे की बोतल में रख लें। यह 1-1 गोली लें यह खांसी का रामबाण इलाज है।
    जैसा की हम आपको हमेशा प्रेरित करते है की रोगों से बचाव ही उनका सबसे बेहतर इलाज होता है | सही खानपान और दिनचर्या का ध्यान रखकर रोगों के कुचक्र से बच सकते है | इसलिए नीचे खांसी में खानपान और परहेज सम्बंधित टिप्स दिए गये है जिनका पालन आपको जरुर करना चाहिए
*अतीस का पाउडर 3 ग्राम की मात्रा में शहद में मिलाकर चाटने से खांसी ठीक हो जाती है।

भगंदर को जड़ से खत्म करने के घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खे

*अदरक, तुलसी के पत्तों का रस और शहद इन सबको 6-6 ग्राम मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से सूखी खांसी दूर हो जाती है। यह सूखी खांसी का बढ़ियां घरेलू उपचार है |
*हरड, बहेड़ा, आंवला, सौंठ, कालीमिर्च और पीपल सभी को समान मात्रा में लेकर पीसकर पाउडर बना लें। यह पाउडर प्रतिदिन 3-3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ लेने से सभी प्रकार की खांसी का तुरंत इलाज होता है।
*अदरक के रस में इलायची का पाउडर और शहद मिलाकर हल्का गर्म करके लेने से खांसी से आराम मिलता है |
एक चौथाई चम्मच दालचीनी और शहद आधा चम्मच को मिलाकर गुनगुने पानी के साथ सुबह शाम लेने से भी कफ वाली खांसी का इलाज हो जाता है |
काली मिर्च और सौंठ से खांसी की अचूक दवा
*काली मिर्च और मिश्री समान मात्रा में लेकर तथा पीसकर इसमें इतनी मात्रा में देशी घी मिलाएं कि गोली-सी बन जाए यह 1-1 गोली दिन में 4 बार टॉफी की तरह चूसने से खांसी के अलावा ब्रोंकाइटिस, गले की खराश तथा गला बैठना आदि रोगों में भी फायदेमंद है।
*एक चम्मच काली मिर्च के पाउडर में 4 गुना गुड मिलाकर आधा-आधा ग्राम दिन में 3-4 बार लेने से भी खांसी ठीक हो जाती है।
*बीजरहित मुनक्का में कालीमिर्च रखकर चबाएं इसके सिर्फ 5-7 दिन के प्रयोग से खांसी दूर हो जाएगी। यह भी खांसी की अचूक दवा की तरह काम करता है |
*कालीमिर्च कूट-पीसकर, छानकर सुरक्षित रख लें। इसे 2 से 4 ग्रेन तक दिन में 2 बार शहद के साथ लेने से खांसी में जरुर आराम होगा | काली मिर्च का पाउडर ताज़ा घर में ही बनाये तो बेहतर होगा | रेडिमेड डब्बाबंद पाउडर में मसालों की खुशबू समय बीतने के साथ-साथ कम होती जाती है |

डेंगू ज्वर :कारण और निवारण के उपाय 

*सुबह नहाने के लिए शरीर पर पानी डालने से पहले कुछ दिन सरसों के तेल की कुछ बूंदें हथेली पर रखकर ऊँगली की सहायता से 1 नाक के दोनों नथुनों (nose nasals) से सूंघने से खुश्की से होने वाले सिरदर्द और सूखी खांसी में लाभ प्राप्त होता है।
*10 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम देशी खांड इन दोनों को बारीक पीसकर व मिलाकर 14 मात्राएं बना लें। सूखी खांसी (ड्राई कफ) और बलगमी खांसी में 125 मि.ली. गर्म दूध के साथ रोजाना सोते समय 1 डोज का सेवन करें। यह बिल्कुल हानिरहित और सफल खांसी का देसी इलाज है।
खांसी में क्या खाना चाहिए
*सर्दियों में चाय, कॉफी, या गर्म पानी में ग्लूकोस मिलाकर पिएं।
*बथुआ, मकोय, मूली, मेथी, मिस्री, लोंग, हलदी, शहद, माल्टा, दालचीनी, पालक का सेवन करें।
*भोजन में चोकर सहित आटे की रोटियां सेवन करें।

स्मरण शक्ति बढाने के सरल उपचार

*फलों में मीठा संतरा, मौसमी, पपीता, चीकू खरबूजा, अमरूद, खजूर, अंजीर सेवन करने से फेफड़ों में तरावट पहुंचती है और बलगम आसानी से निकल जाता है। 

*जब-जब प्यास लगे गर्म पानी का सेवन करें। दिन भर में 2 से 3 लीटर गुनगुना गर्म जल ही पिएं।
*मुलहठी, दालचीनी, लौंग, हलदी, मिस्री, छोटी इलायची चूसते रहें।
खांसी में क्या न खाए ?

रात में सोते समय गुनगुना पानी शहद मिलाकर घूट-घूट कर पिएं।

तेल, घी या चिकनाहट से बने खाने के व्यंजनों के खाने के बाद कुछ देर तक पानी न पियें |
स्मोकिंग ना करें और करने वालो से भी दूर रहें |
भीड़-भाड़ तथा गंदे, धुएं युक्त वातावरण में न जाएं। अचानक गर्म से सर्द या सर्द से गर्म वातावरण में न जाएं।
प्रदूषण तथा धुंए से बचने के लिए मास्क या रूमाल मुंह पर लगायें |
चावल खाना बिल्कुल बंद कर दें। ज्यादा मिठाई से परहेज करें।
घी या तेल में तले अधिक मिर्च-मसालेदार, खट्टे, तीखे, चटपटे खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें।
बर्फ युक्त ठंडे पेय, आइस क्रीम, शर्बत, लस्सी आदि का सेवन न करें।
फ्रिज , कूलर का ठंडा पानी न पिएं। जुकाम, खांसी के कष्ट में दही, केला, ठंडे तथा तले-भुने खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें।
कई बार खांसी किसी चीज से एलर्जी होने पर भी हो जाती है जैसे धूल मिटटी , फूलो का पराग , आदि | ऐसी स्थिति  में आपको उस चीज से दूर रहना चाहिए, यही उसका आखरी इलाज है |






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शरद ऋतु (Winter Season) में खान पान आहार विहार



   वर्षा ऋतु के तुरंत बाद ही शरद ऋतु (Winter Season) शुरु हो जाती है. आश्विन और कार्तिक मास में शरद ऋतु का आगमन होता है. वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से पित्त दोष का संचय होता है
शरद ऋतु (Winter Season) दस्तक दे चुकी है. तो ऋतु बदलने के साथ साथ हमारा खान पान भी इसके अनुसार ही होना चाहिए. आज का हमारा लेख इसी पर आधारित है. इसमें हम बता रहे है कि शरद ऋतु (Winter Season) में हमारा भोजन कैसा होना चाहिए. जिससे हम स्वस्थ के साथ इस ऋतु का भरपूर मजा ले सकते है.


शरद ऋतु में कैसा हो खान पान

खीर का सेवन – शरद ऋतु (Winter Season) में सूर्य का ताप बहुत अधिक होता है. ताप के कारण पित्त दोष पैदा होता है. ऐसे में पित्त से पैदा होने वाले रोग पैदा होते है. पित्त की विकृति में चावल तथा दूध से बनी खीर का सेवन किया जाता है. शरद पूर्णिमा पर इसलिए खीर का विशेष सेवन किया जाता है.
पित्त को शांत करने वाले खाद्य पदार्थो का सेवन – शरद ऋतु में पित्त शांत करने वाले पदार्थो का सेवन अति आवश्यक होता है. शरद ऋतु में लाल चावल, नये चावल तथा गेहूं का सेवन करना चाहिए. कडवे द्रव्यों से सिद्ध किये गये घी के सेवन से लाभ मिलता है. प्रसिद्ध महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत ने कहा है की शरद ऋतु में मधुर, कडवे तथा कैसले पदार्थो का सेवन करना चिहिए. दूध, गन्ने के रस से बने खाद्य, शहद, चावल तथा मुंग आदि का सेवन लाभदायक होता है. कुछ विशेष जंगली जानवरों का मास भी गुणकारी होता है.

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नीम्बू तथा शहद के जल का सेवन – 


शरद ऋतु (Winter Season) में चंद्रमा की किरणों में रखे गये भोजन को उत्तम माना गया है. सुबह के समय हल्के गर्म पानी में एक निम्बू का रस तथा शहद मिलाकर पीने से पित्त दोष का नाश होता है. शरद ऋतु में भोजन के बाद 1-2 केले खा सकते है. केला शरीर को पोषक तत्व तो देता ही है. साथ में पित्त दोष का दमन भी करता है. केला खाकर जल नहीं पीना चाहिए.
खुली छत पर ना सोयें – शरद ऋतु में दिन में तो गर्मी रहती है पर रात को ठण्ड होती है. ऐसे में रात को खुली छत पर नहीं सोना चाहिए. ओस पड़ने से सर्दी, जुकाम तथा खांसी हो सकती है.
हेमंत ऋतु में कैसा हो खान पान-
हेमंत ऋतु अथवा शीत ऋतु आगमन शरद ऋतु के समापन के साथ ही होने लगता है. शीतल हवा का प्रकोप बढ़ने लगता है. शीतल वायु के प्रकोप से शरीर की रुक्षता बढ़ने लगती है. शरीर में जठराग्नि बढ़ने से मेटाबोलिज्म प्रबल होने से भूख अधिक लगने लगती है. इससे सभी तरह के खाद्य पदार्थ आसानी से पाच जाते है.

शक्ति संचय की ऋतु– 


पाचन क्रिया तेज होने के कारण हेमंत ऋतु को शक्ति संचय की ऋतु भी कहा जाता है. इस ऋतु में खानपान पर नियन्त्रण रख कर शारीरिक व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाया जा सकता है. भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हेमंत ऋतु में अस्थमा या दमा, खांसी, संधिशुल, वातरक्त, आमवात, सर्दी जुकाम तथा गले के रोग तीव्र गति से पैदा होते है.

मधुर तथा लवण युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन – 

हेमंत ऋतु में सर्दी के प्रकोप से बचना चाहिए. मीठे तथा लवण रस वाले पदार्थो का सेवन करना चाहिए. जठराग्नि प्रबल होने से नया अनाज भी आसानी से पच जाता है. अधिक प्रोटिन वाले पदार्थ सेवन कर सकते है. उडद, राजमा, मुंग, मोठ सब कुछ आसानी से पच जाता है.शरद ऋतु में ऋतु में चावल, गेहूं, जो, मूंग की दाल,
शक्कर, शहद, परवल ,आंवला, अंगूर, दूध, गुड़, थोड़ी मात्रा में नमकीन पदार्थ, नदी का जल, कसैले पदार्थों का सेवन हितकर है|

इस ऋतु में चांदनी में रहना शरद कालीन फूलों की माला पहनना शरीर पर चंदन यकस का लेप करना तालाब के किनारे भ्रमण करना स्वच्छ हल के ऊनी वस्त्र पहनना तेल की मालिश करके गुनगुने पानी से नहाना स्वास्थ्य के लिए बहुत हितकर होता है|

शरद ऋतु में अपथ्य-

 धूप तापमान औस पर नंगे पैर चलना वह गिरते समय खुले में रहना अत्यधिक व्यायाम, पुरवइया हवा में रहना, दही, खट्टे, कड़वे, तेल तले, गर्म चर्बीदार तथा क्षेत्रीय पदार्थों का सेवन लाल मिर्च का सेवन, दिन में सोना, भरपेट भोजन का त्याग करना चाहिए 
   इस ऋतु में जुलाब आदि द्वारा पेट की शुद्धि कर लेने से पित्तजन्य अनेक व्याधियों से बचाव होता है|

संधिवात (आर्थराईटिज) की आयुर्वेदिक घरेलू चिकित्सा

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भगंदर को जड़ से खत्म करने के घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खे





भगन्दर क्या है ?

यह एक प्रकार का नाड़ी में होने वाला रोग है, जो गुदा और मलाशय के पास के भाग में होता है। भगन्दर में पीड़ाप्रद दानें गुदा के आस-पास निकलकर फूट जाते हैं। इस रोग में गुदा और वस्ति के चारो ओर योनि के समान त्वचा फैल जाती है, जिसे भगन्दर कहते हैं। `भग´ शब्द को वह अवयव समझा जाता है, जो गुदा और वस्ति के बीच में होता है। इस घाव (व्रण) का एक मुंख मलाशय के भीतर और दूसरा बाहर की ओर होता है। भगन्दर रोग अधिक पुराना होने पर हड्डी में सुराख बना देता है जिससे हडि्डयों से पीव निकलता रहता है और कभी-कभी खून भी आता है।
भगन्दर रोग अधिक कष्टकारी होता है। यह रोग जल्दी खत्म नहीं होता है। इस रोग के होने से रोगी में चिड़चिड़ापन हो जाता है। इस रोग को फिस्चुला अथवा फिस्चुला इन एनो भी कहते हैं।
विभिन्न भाषाओं में रोग का नाम : हिन्दी-भगन्दर। ,अंग्रेजी-फिस्चुला इन एनो। ,अरबी-नलिघा। ,बंगाली-भगन्दर। ,गुजराती-भगन्दर।

भगन्दर के प्रकार – 

भगन्दर आठ प्रकार का होता है-
1. वातदोष से शतपोनक
2. पित्तदोष से उष्ट्र-ग्रीव 
3. कफदोष से होने वाला
 4. वात-कफ से ऋजु 
5. वात-पित्त से परिक्षेपी 
6. कफ पित्त से अर्शोज 
7. शतादि से उन्मार्गी और
 8. तीनों दोषों से शंबुकार्त नामक भगन्दर की उत्पति होती है।
1. शतपोनक नामक भगन्दर :
शतपोनक नामक भगन्दर रोग कसैली और रुखी वस्तुओं को अधिक खाने से होता है। जिससे पेट में वायु (गैस) बनता है जो घाव पैदा करती है। चिकित्सा न करने पर यह पक जाते हैं, जिससे अधिक दर्द होता हैं। इस व्रण के पक कर फूटने पर इससे लाल रंग का झाग बहता है, जिससे अधिक घाव निकल आते हैं। इस प्रकार के घाव होने पर उससे मल मूत्र आदि निकलने लगता है।
2. पित्तजन्य उष्ट्रग्रीव भगन्दर : 
इस रोग में लाल रंग के दाने उत्पन्न हो कर पक जाते हैं, जिससे दुर्गन्ध से भरा हुआ पीव निकलने लगता है। दाने वाले जगह के आस पास खुजली होने के साथ हल्के दर्द के साथ गाढ़ी पीव निकलती रहती है।
3. वात-कफ से ऋजु : 
वात-कफ से ऋजु नामक भगन्दर होता है जिसमें दानों से पीव धीरे-धीरे निकलती रहती है।
4. परिक्षेपी नामक भगन्दर :
 इस रोग में वात-पित्त के मिश्रित लक्षण होते हैं।
5. ओर्शेज भगन्दर : 
इसमें बवासीर के मूल स्थान से वात-पित्त निकलता है जिससे सूजन, जलन, खाज-खुजली आदि उत्पन्न होती है।
4. शम्बुकावर्त नामक भगन्दर : 
इस तरह के भगन्दर से भगन्दर वाले स्थान पर गाय के थन जैसी फुंसी निकल आती है। यह पीले रंग के साथ अनेक रंगो की होती है तथा इसमें तीन दोषों के मिश्रित लक्षण पाये जाते हैं।

मर्दानगी(सेक्स पावर) बढ़ाने के नुस्खे 

5. उन्मार्गी भगन्दर : 
उन्मर्गी भगन्दर गुदा के पास कील-कांटे या नख लग जाने से होता है, जिससे गुदा में छोटे-छोटे कृमि उत्पन्न होकर अनेक छिद्र बना देते हैं। इस रोग का किसी भी दोष या उपसर्ग में शंका होने पर इसका जल्द इलाज करवाना चाहिए अन्यथा यह रोग धीरे-धीरे अधिक कष्टकारी हो जाता है।

भगन्दर के लक्षण – 

भगन्दर रोग उत्पंन होने के पहले गुदा के निकट खुजली, हडि्डयों में सुई जैसी चुभन, दर्द, दाह (जलन) तथा सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। भगन्दर के पूर्ण रुप से निकलने पर तीव्र वेदना (दर्द), नाड़ियों से लाल रंग का झाग तथा पीव आदि निकलना इसके मुख्य लक्षण हैं।

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भोजन और परहेज :
आहार-विहार के असंयम से ही रोगों की उत्पत्ति होती है। इस तरह के रोगों में खाने-पीने का संयम न रखने पर यह बढ़ जाता है। अत: इस रोग में खास तौर पर आहार-विहार पर सावधानी बरतनी चाहिए। इस प्रकार के रोगों में सर्व प्रथम रोग की उत्पति के कारणों को दूर करना चाहिए क्योंकि उसके कारण को दूर किये बिना चिकित्सा में सफलता नहीं मिलती है। इस रोग में रोगी और चिकित्सक दोनों को सावधानी बरतनी चाहिए।


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1. सांप की केंचुली : 

सांप द्वारा उतारे गये केंचुली का भस्म (राख) बनाकर इसमें तम्बाकू के गुल को मिलाकर सरसों के तेल के साथ लेप करने से नाड़ी व्रण नष्ट होते हैं तथा रोग में लाभ होता है।

2. कालीमिर्च :

 लगभग 10 कालीमिर्च और खादिर (कत्था) 5 ग्राम मिलाकर पीसकर इसके मिश्रण को भगन्दर पर लगाने से पीड़ा खत्म होती है।

3. आंवला : 

आंवले का रस, हल्दी और दन्ती की जड़ 5-5 ग्राम की मात्रा में लें। और इसको अच्छी तरह से पीसकर इसे भगन्दर पर लगाने से घाव नष्ट होता है।

4. आक :

★ आक का 10 मिलीलीटर दूध और दारुहल्दी का दो ग्राम महीन चूर्ण, दोनों को एक साथ खरलकर बत्ती बनाकर भगन्दर के घावों में रखने से शीघ्र लाभ होता है।
★ आक के दूध में कपास की रूई भिगोकर छाया में सुखा कर बत्ती बनाकर, सरसों के तेल में भिगोकर घावों पर लगाने से लाभ होता है।

5. पुनर्न
वा :

★ पुनर्नवा, हल्दी, सोंठ, हरड़, दारुहल्दी, गिलोय, चित्रक मूल, देवदार और भारंगी के मिश्रण को काढ़ा बनाकर पीने से सूजनयुक्त भगन्दर में अधिक लाभकारी होता है। पुनर्नवा शोथ-शमन कारी गुणों से युक्त होता है।

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★ पुनर्नवा के मूल को वरुण (वरनद्ध की छाल के साथ काढ़ा बनाकर पीने से आंतरिक सूजन दूर होती है। इससे भगन्दर के नाड़ी-व्रण को बाहर-भीतर से भरने में सहायता मिलती है।


6. खैर :

★ खैर, हरड़, बहेड़ा और आंवला का काढ़ा बनाकर इसमें भैंस का घी और वायविण्डग का चूर्ण मिलाकर पीने से किसी भी प्रकार का भगन्दर ठीक होता है।
★ खैर की छाल और त्रिफले का काढ़ा बनाकर उसमें भैस का घी और वायविडंग का चूर्ण मिलाकर देने से लाभ होता है।


★ खैरसार, 


बायबिडंग, हरड़, बहेड़ा एवं आंवला 10 ग्राम तथा पीपल 20 ग्राम इन सब को कूट पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में शहद और मीठा तेल (धुला तिल का तेल) मिलाकर चाटने से भगन्दर, नाड़ी व्रण आदि ठीक होता है।

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7. गूलर : 


गूलर के दूध में रूई का फोहा भिगोंकर, नासूर और भगन्दर के अन्दर रखने और उसको प्रतिदिन बदलते रहने से नासूर और भगन्दर ठीक हो जाता है।

8. भांगरा : 


भांगरा की पुल्टिश बनाकर कुछ दिनों तक लगातार बांधने से थोड़े ही दिनों में भगन्दर शुद्ध होकर भ


9. सहजना (शोभांजनाद) : 

सहजने का काढ़ा बनाकर उस में हींग और सेंधानमक डालकर पीने से लाभ होता है। सहजना (शोभांजनाद) वृक्ष की छाल का काढ़ा भी पीना अधिक लाभकारी होता है।


10. नारियल :

एक नारियल का ऊपरी खोपरा उतारकर फेंक दे और उसका गोला लेकर उस में एक छेद कर दें। उस नारियल को वट वृक्ष के दूध से भरकर उसके छेद दो अंगुल मोटी मिट्टी के लेप से बन्द कर उपले के आग पर पका लें। पक जाने पर लेप हटाकर उसका रस निकालकर उस में 5-6 ग्राम त्रिफला का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से भगन्दर का रोग ठीक हो जाता है।


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11.. सुहागा : 

4 ग्राम सुहागा को 60 मिलीलीटर जल के साथ घोलकर पीने से खुजली नष्ट होती है। नासूर में लाभ होता है।

12. सैंधानमक : 

सैंधानमक और शहद की बत्ती बनाकर नासूर में रखने से दर्द में आराम मिलता है।

13. बड़ी माई : 

बड़ी माई का कपड़छन चूर्ण 8 ग्राम, अफीम 2 ग्राम और सफेद वैसलीन 20 ग्राम मिलाकर प्रतिदिन दो से तीन बार गुदा के घाव पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।

14. बरगद : 

बरगद के पत्तें, सोठ, पुरानी ईंट के पाउडर, गिलोय तथा पुनर्नवा मूल का चूर्ण सहभाग लेकर पानी के साथ पीसकर लेप करने से फायदा होता है।


15. त्रिफला :

 त्रिफला को जल में उबालकर उस जल को छानकर उससे भगन्दर को धोने से जीवाणु नष्ट होते हैं।


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16. नीम :

★ नीम की पत्तियां, घी और तिल 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर उसमें 20 ग्राम जौ के आटे को मिलाकर जल से लेप बनाएं। इस लेप को वस्त्र के टुकड़े पर फैलाकर भगन्दर पर बांधने से लाभ होता है।
★ नीम की पत्तियों को पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर की विकृति नष्ट होती है।
★ नीम के पत्ते, तिल और मुलैठी गाढ़ी छाछ में पीसकर दर्द वाले तथा खूनी भगन्दर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।
★ बराबर मात्रा में नीम और तिल का तेल मिलाकर प्रतिदिन दो या तीन बार भगन्दर के घाव पर लगाने से आराम मिलता है।


17. तिल : 

नीम का तेल और तिल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर नासूर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।


18. अंकोल : 

अंकोल का तेल 100 मिलीलीटर और मोम 25 ग्राम लेकर उसे आग पर गर्म करें और उसमें 3 ग्राम तूतिया (नीला थोथा) मिलाकर लेप करने से नाड़ी में उत्पन्न दाने नष्ट हो जाते हैं।

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19. अनार :

★ मुट्ठी भर अनार के ताजे पत्ते को दो गिलास पानी में मिलाकर गर्म करें। आधे पानी शेष रहने पर इसे छान लें। इसे उबले हुए मिश्रण को पानी में हल्के गर्मकर सुबह शाम गुदा को सेंके और धोयें। इससे भगन्दर ठीक होता है।
★ अनार की पेड़ की छाल 10 ग्राम लेकर उसे 200 मिलीलीटर जल के साथ आग पर उबाल लें। उबले हुए जल को किसी वस्त्र से छानकर भगन्दर को धोने से घाव नष्ट होते हैं।


20. तिल : 

तिल, एरण्ड की जड़ और मुलहठी को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर थोड़े-से दूध के साथ पीसकर भगन्दर पर उसका लेप करने से रोग में आराम मिलता है।


21. दारुहल्दी : 

दारुहल्दी का चूर्ण बनाकर उसे आक के दूध के साथ अच्छी तरह से मिलाकर हल्का गर्म कर उसका वर्तिका (बत्ती) बनाकर घावों पर लगाना अधिक लाभकारी होता है।

22. डिटोल : 


डिटोल मिले जल से भगन्दर को अच्छी तरह से साफ करें। इसके बाद उस पर नीम की निबौली लगाने से भगन्दर का घाव नष्ट होता है।




23. फिटकरी :


 भुनी फिटकरी 1-1 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम पानी के साथ पीना चाहिए। कच्ची फिटकरी को पानी में पीसकर इसे रूई की बत्ती में लगाकर भगन्दर के छेद में भर दें। इससे रोग में अधिक लाभ होता है।


24 रस सिंदूर : 

रस सिंदूर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, त्रिफला पिसा 1 ग्राम और एक बायबिण्डग के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम खाना चाहिए।

25. धुआंसा : 


घर का धुआंसा, हल्दी, दारुहल्दी, लोध्र, बच, तिल, नीम के पत्ते और हरड़-इन सबको बराबर मात्रा में लें, और उसे पानी के साथ महीन पीसकर लेप करने से भगन्दर का घाव शुद्ध होकर भर जाता है।


26. अडूसा : 

अडूसे के पत्ते को पीसकर टिकिया बनाकर तथा उस पर सेंधा नमक बुरक कर बांधने से भगन्दर ठीक होता है।


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27. गुड़ :

 पुराना गुड़, नीलाथोथा, गन्दा बिरोजा तथा सिरस इन सबको बराबर मात्रा लेकर थोड़े से पानी में घोंटकर मलहम बना लें तथा उसे कपड़े पर लगाकर भगन्दर के घाव पर रखने से कुछ दिनों में ही यह रोग ठीक हो जाता है।

28. हरड़ : 

हरड़, बहेड़ा, आंवला, शुद्ध भैंसा गुग्गुल तथा बायबिडंग इन सब का काढ़ा बनाकर पीने से तथा प्यास लगने पर खैर का रस मिला हुआ पानी पीने से भगन्दर नष्ट होता है।

29 निशोथ :


 निशोथ, तिल, जमालगोटा, मजीठ, और सेंधानमक इनको पीसकर घी तथा शहद में मिलाकर लेप करने से भगन्दर ठीक हो जाता है।

30. सांठी : 


सांठी की जड़, गिलोय, सोंठ, मुलहठी तथा बेरी के कोमल पत्ते, इनको महीन पीसकर इसे हल्का गर्म कर लेप करने से भगन्दर में लाभ होता है।

31. रसौत :

 रसौत, दोनों हल्दी, मजीठ, नीम के पत्ते, निशोथ, तेजबल-इनको महीन पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर ठीक हो जाता है।

32 बिलाई की हाड़ : 


बिलाई की हड्डी (हाड़) को त्रिफला के रस में घिसकर भगन्दर रोग में लगाने से भगन्दर रोग ठीक होता है।

33. गेहूं : 

गेहूं के छोटे-छोटे पौधों के रस को पीने से भगन्दर ठीक होता है।


34 चमेली : 

चमेली के पत्ते, बरगद के पत्ते, गिलोय और सोंठ तथा सेंधानमक को गाढ़ी छाछ में पीसकर भगन्दर पर लगाने से भगन्दर नष्ट होता है।

35. दारुहरिद्रा :

 दारुहरिद्रा का चूर्ण आक (मदार) के दूध के साथ मिलाकर बत्ती बना लें। बत्ती को भगन्दर तथा नाड़ी व्रण पर लगाने से भगन्दर में आराम रहता है।


36. सहोरा (सिहोरा) : 

सहोरा (सिहोरा) के मूल (जड़) को पीसकर भगन्दर में लगाने से रोग ठीक होता है।


37. थूहर : 

थूहर का दूध, आक का दूध और हल्दी मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से रोग ठीक होता है।


38. शहद :

 शहद और सेंधानमक को मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से भगन्दर रोग में आराम मिलता है।


39. मुर्दासंख :

 मुर्दासंख को पीसकर भगन्दर के सूजन पर लगाने से सूजन खत्म होती है।

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40  पिठवन :

★ पिठवन के 8-10 पत्तों को पीसकर लेप करने से भगन्दर के रोग में बहुत लाभ होता है।
★ लगभग 10 मिलीलीटर पिठवन के पत्तों के रस को नियमित कुछ दिनों तक सेवन करने से भगन्दर रोग नष्ट हो जाता है।
★ पिठवन में थोड़ा सा कत्था मिलाकर पीसकर लेप करने से या कत्था तथा कालीमिर्च को बराबर मात्रा में मिलाकर पीसकर रोगी को पिलाने से भगन्दर के रोग में लाभ मिलता होता है।


41. लता करंज :

★ लगभग आधा ग्राम से 2 ग्राम करंज के जड़ की छाल का दूधिया रस की पिचकारी भगन्दर में देने से भगन्दर जल्दी भर जाता है।
दूषित कीडे़ से भरे भगन्दर के घावों पर करंज के पत्तों की पुल्टिस बनाकर बांधें अथवा कोमल पत्तों का रस 10-42 ग्राम की मात्रा में निर्गुण्डी या नीम के पत्तों के रस में मिलाकर कपास के फोहे से भगन्दर के व्रण (घाव) पर बांधें या नीम के पत्ते का रस में कपास का फोहा तर कर घाव पर लगाने से रोग में आराम मिलता है।


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★ करंज के पत्ते और निर्गुण्डी या नीम के पत्ते को पीसकर पट्टी बनाकर भगन्दर पर बांधने से या पत्तों को कांजी में पीसकर गर्म लेप बनाकर लेप करने से रोग में आराम मिलता है।
★ भगन्दर पर करंज के पत्तों को बांधने से भगन्दर रोग में लाभ होता है।
★ करंज के मूल (जड़) का रस प्रतिदिन दो से तीन बार लगाने से भगन्दर का पुराना जख्म ठीक होता है।

43. गुग्गुल :

★ गुग्गुल और त्रिफला का चूर्ण 10-10 ग्राम को जल के साथ पीसकर हल्का गर्म करें। इस लेप को भगन्दर पर लगाने से लाभ होता है।
★ शुद्ध गुग्गल 50 ग्राम, त्रिफला पिसा 30 ग्राम और पीपल 15 ग्राम लेकर इसे कूट-छानकर इसे पानी के साथ मिलाकर, इसके चने के बराबर गोलियां बना लें। इन गोलियों को छाया में सूखाकर लगातार 15-20 दिन तक इसकी 1-1 गोलियां सुबह-शाम खायें। इससे भगन्दर ठीक होता है।

44. छोटी अरणी : 

छोटी अरणी के पत्तों को जल द्वारा घुले मक्खन के साथ मिलाकर पीसकर इसका मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण को रोग पर लेप करने से अधिक लाभ होता है।

45. अग्निमथ (छोटी अरणी) : 

अग्निमथ की जड़ को जल में उबालकर काढ़ा बनाकर इसके 15 ग्राम काढ़े में 5 ग्राम शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से भगन्दर नष्ट होता है।


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