23.12.16

आयुर्वेद के त्रिदोष सिद्धान्त के अनुकूल आहार विहार

    

 शरीर की रचना, खानपान की पसंद और प्रकृति के मामले में हर इंसान अपने आप में अलग है। एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों में ऐसी विविधताएं अक्सर नजर आती हैं। उदाहरण के लिए एक ही घर में कोई मोटा होता है तो कोई दुबला। किसी को ठंड से परेशानी होती है तो किसी को गर्मी से। कोई काफी फुर्तीला होता है तो कोई एकदम आलसी। यह होता है उनकी प्रकृति के अलग होने के कारण। कठिनाई की बात यह है कि शरीर की प्रकृति और खान-पान संबंधी जरूरत अलग-अलग होने के बावजूद घर में सबके लिए हमेशा एक जैसा खाना ही बनता है।
दरअसल, आज के दौर में अपने शरीर को स्वस्थ रखना सबसे बड़ी चुनौती है। चिकित्सा विज्ञान की विभिन्न शाखाएं इस बात पर जोर देती हैं कि हमारा आहार शरीर की बुनियादी संरचना के मुताबिक होना चाहिए। इस बात को तार्किक रूप से स्पष्ट करता है आयुर्वेद में मौजूद त्रिदोष सिद्धांत। आयुर्वेद के इस आधारभूत दर्शन के मुताबिक वात, पित्त, कफ त्रिदोष हैं। आयुर्वेद में त्रिदोष का मतलब क्षति या हानि नहीं है। वात का अर्थ है गति, पित्त का अर्थ है गर्म करना तथा यह शरीर का मेटाबोलिज्म बताता है और कफ का अर्थ है जो जल से विकास पाता है या जल से लाभ प्राप्त करता हो।आकाश, वायु, अग्रि, जल और पृथ्वी, यह पंच महाभूत सारे ब्रह्माण्डको तो बनाते ही हैं हमारे शरीर की भी रचना करते हैं। इनके अलग-अलग संयोजन हमारे शरीर में वात पित्त और कफ के रूप में रहते हैं। जैसे आकाश और वायु के संयोजन को वात कहा जाता है, तो पृथ्वी व जल के योग को कफ कहा जाएगा। उसी प्रकार अग्रि की उपस्थिति को पित्त कहा जाता है।
शरीर को स्वस्थ रखने वाले घटकों के रूप में इनका प्रयोग किया गया है। दोष वे द्रव्य हैं जो शरीर के घटक हैं। सुश्रुत के अनुसार त्रिदोष मानव शरीर की उत्पत्ति के कारक भी हैं। त्रिदोष की दो दशाएं होती हैं- शरीर संबंधी धातुरूप और रोग संबंधी रोग रूप।
दोष जब संतुलित अवस्था में रहते हैं तब वे अच्छी सेहत का आधार बनते हैं। यदि उसका क्रम बिगड़े यानी शरीर में उनकी मात्रा में असंतुलन हो तो शरीर रोगग्रस्त हो जाएगा।
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार तीन प्रकृतियाँ बताई गई हैं— १. वात प्रकृति, २. पित्त प्रकृति, ३. कफ प्रकृति,
* वात प्रकृति के लक्षण—
(१) बहुत जागने वाला
(२) सर पर कम बाल ,
(३) हाथ पैरों में फटापन,
(४) शीघ्रगामी,
(५) अधिक बोलने रूप प्रवृत्ति एवं स्वप्न में आकाश में चलने वाला व्यक्ति होता है।




पित्त प्रकृति के लक्षण—
(१) बिना समय के श्वेतबाल होना,
(२) गौर वर्ण,
(३) बहुत पसीना आने वाला,
(४) क्रोधी स्वभाव,
(५) बहुत भोजन करने वाला,
(६) बुद्धिमान
(७) स्वप्नोें में भी तेजों को देखने वाला व्यक्ति होता है।
३. कफ प्रकृति के लक्षण —
(१) श्याम केशों वाला,
(२) अति वीर्यमान,
(३) क्षमा करने वाला,
(४) बलिष्ठ और स्वप्न में जलाशयों को देखने वाला व्यक्ति होता है।
शरीर में इनका अनुपात कम-ज्यादा होने पर रोग उत्पन्न होते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हमारे शरीर का पोषण उसकी वात, पित्त या कफ प्रकृति को ध्यान में रख कर किया जाए, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं। यानी जो खाना हमारे शरीर के विकास में सहायक होता है, वही खाना हमारी बीमारियों का भी प्रमुख कारण बन सकता है। जिसमें दो दोषों के लक्षण हों वह संसर्ग और तीन दोषों के लक्षण हों उसे त्रिदोष जन्य जानना चाहिए।
त्रिदोष असंतुलन की स्थिति में वात बढऩे से 80, पित्त से 40 और कफ से 20 किस्म की बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए शरीर की बनावट और उसकी भिन्नता के अनुसार खाना खाया जाए तो न केवल शरीर स्वस्थ रहेगा, बल्कि भविष्य में बीमारियों से लडऩे की ताकत भी मिलेगी। इसीलिए आधुनिक जीवन शैली में हमें अपने आप को पहचानना बहुत जरूरी है।
त्रिदोष सिद्धान्त:
आयुर्वेद की हमारे रोजमर्रा के जीवन, खान-पान तथा रहन-सहन पर आज भी गहरी छाप दिखाई देती है । आयुर्वेद की अद्भूत खोज है - ‘त्रिदोष सिद्धान्त’ जो कि एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धान्त है और जिसका सहारा लिए बिना कोई भी चिकित्सा पूर्ण नहीं हो सकती । इसके द्वारा रोग का शीघ्र निदान और उपचार के अलावा रोगी की प्रकृति को समझने में भी सहायता मिलती है ।
आयुर्वेद का मूलाधार है- ‘त्रिदोष सिद्धान्त’ और ये तीन दोष है- वात, पित्त और कफ ।
त्रिदोष अर्थात् वात, पित्त, कफ की दो अवस्थाएं होती है -
1. समावस्था (न कम, न अधिक, न प्रकुपित, यानि संतुलित, स्वाभाविक, प्राकृत)
2. विषमावस्था (हीन, अति, प्रकुपित, यानि दुषित, बिगड़ी हुर्इ, असंतुलित, विकृत) ।
वास्तव में वात, पित्त, कफ, (समावस्था) में दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है तभी ये दोष कहलाती है । इस प्रकार रोगों का कारण वात, पित्त, कफ का असंतुलन या दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती है । जब यही धातुएं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती है, तभी ये दोष कहलाती है । इस प्रकार रोगों का कारण वात, पित्त, कफ का असंतुलन या दोषों की विषमता या प्रकुपित होना ‘रोगस्तु दोष वैषम्यम्’ । अत: रोग हो जाने पर अस्वस्थ शरीर को पुन: स्वस्थ बनाने के लिए त्रिदोष का संतुलन अथवा समावस्था में लाना पड़ता है ।
प्रकृति के लक्षण-
प्रत्येक प्रकृति के अपने लक्षण होते हैं। मनुष्य में तीनों प्रकार के दोष होते हैं किन्तु दो प्रधान दोषों के आधार पर उन्हें द्विंदज मान लिया जाता है। यह दो दोष कफ-पित्त, पित्त-वात, कफ-वात, पित्त-कफ, वात-पित्त और वात-कफ हैं। इन दो दोषों के लक्षण मनुष्य में पाए जाते हैं और इसी के आधार पर उसे सावधानी रखनी चाहिए।



1. वात प्रकोप के लक्षण
त्वचा का सूखा और खुरदुरा बनना, हमेशा थका हुआ महसूस करना, शरीर में दर्द व मांसपेशियों में जकडऩ, गहरी नींद न आना, पेट में गैस अधिक बनना, कब्ज रहना।
2. पित्त प्रकोप के लक्षण
शरीर में जलन महसूस होना, चक्कर आना व थकावट महसूस करना, मुंह का स्वाद कड़वा रहना व पेट में जलन महसूस होना, आंखों, मूत्र एवं त्वचा में पीलापन, ठंडे आहार की इच्छा बढऩा, सही या गलत में चुनाव न कर पाना, हमेशा चिड़चिड़ा रहना व किसी की बात न मानना, दूसरों से ईष्र्या रखना।
3. कफ प्रकोप के लक्षण
शरीर में भारीपन व जकडऩ रहना, शरीर भार का बढऩा, शरीर के अंगों में सूजन रहना, त्वचा व बालों का अधिक तैलीय रहना, मुंह में मीठापन बने रहना, कभी-कभी उल्टी आने जैसा होना, नींद का अधिक आना, हमेशा आलस्य में रहना, मुंह में कफ का उत्पादन अधिक खासकर सुबह के समय, श्वास विकारों की अधिक उत्पत्ति होना, सुबह के समय भारीपन व आलस्य प्रतीत होना।
कैसा हो आहार-विहार?
कफ, पित्त व वात के लिए आहार-विहार पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। अपनी प्रकृति के अनुसार आहार लेने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है और संभावित रोगों से बच सकता है।
वात प्रकृति के लिए आहार-विहार-
वात प्रकृति के लोग हर समय तनाव में रहते हैं और ज्यादा बोलते हैं। पाचन क्रिया कमजोर होने की वजह से इनके खाने की क्षमता भी कम होती है। ऐसे लोगों के लिए जरूरी है कि वे अपने खाने और सोने का समय निर्धारित करें और उसका कड़ाई से पालन करें। वात प्रकृति के लोगों को वात संबंधी रोगों से बचने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
*भोजन में चिकनाहट, भारीपन हो व हमेशा गरम ही खाएं।
*भोजन में मधुर, अम्ल (खट्टा) और लवण (नमक) प्रधान रस होने चाहिए।
*दूध और दूध से बने पदार्थ अच्छे विकल्प हैं।
*थोड़ा-थोड़ा भोजन समय-समय पर खाते रहें। एक साथ न बहुत सारा भोजन न करें और न ही बिल्कुल भूखे रहें।
*भोजन में कटु, तिक्त, कवाय रस का प्रयोग कम करें।
*प्याज, शलगम, गाजर, फली, सीताफल, नीबू पालक व कद्दू वात प्रकृति के लिए अनुकूल हैं।
सभी प्रकार के मीठे व खट्टे फलों- जैसे केला, स्ट्रॉबेरी, सेब, अनानास, पपीता, गन्ना, नारियल, आम व अनार का सेवन करें। 
पित्त प्रकृति के लिए आहार
इस प्रकृति वाले लोग आमतौर पर बहुत ही आकर्षक और तेज दिमाग वाले होते हैं। इस प्रकृति के लोगों के अंदर बहुत गर्मी होती है, इसलिए इन्हें गर्म चीजों को खाने से बचना चाहिए। इनके लिए ठंडी चीजें शरीर में सही संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। इन्हें सूर्य की सीधी किरणों से बचना चाहिए। ऐसे लोग रोज सुबह दौडऩे जाएं या जिम करें। दरअसल इस प्रकृति के लोगों में कॉम्पिटिशन की भावना बहुत अधिक होती है, जो कभी-कभी खतरनाक भी हो सकती है। पित्त प्रकृति के लोगों को निम्नलिखित आहार का सेवन करना चाहिए।
पैत्तिक पुरूष की अग्नि अत्याधिक बलवान व तीव्र होती है। अत: इसीलिए हर दो घंटे में आपको कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए किन्तु ऐसा आहार करना चाहिए जो आपकी प्रकृति के लिए हितकर हो।
गाजर, पालक, खीरा, पत्ता गोभी, हरी फली, मटर, घीया, तोरई, आलू, शकरकंदी, ब्रोकली जैसी सब्जियों का सेवन।
रसभरी व मीठे फलों का सेवन अधिक करें। शुष्क फलों का सेवन भी कर सकते हैं। खरबूजा, अंगूर, पपीता, केला, लीची, किशमिश, सेब, खजूर, पका हुआ आम, नारियल, गन्ना आदि का सेवन लाभकारी है।
इमली, जामुन, नींबू, संतरा व अनानास आदि का सेवन कम करें।




कफ प्रकृति के व्यक्तियों लिए आहार -
कफ प्रकृति के लोगों के लिए व्यायाम काफी महत्वपूर्ण है। कफ बढऩे के अनेक कारणों में एक कारण हमारा खानपान है। मिठाइयां, मक्खन, खजूर, नारियल, उड़द की दाल, केला, आदि का अधिक सेवन शरीर में कफ प्रवृत्ति को बढ़ाता है। दिन में सोने और फास्ट फूड के अधिक सेवन से भी शरीर में कफ बढ़ता है। इसके अलावा निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
*अत्यधिक ठण्डे, भारी व बांसी आहार का सेवन न करें।
*दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे दही, पनीर, मक्खन आदि कम ग्रहण करें।
*अपने आहार में फलों के रस, कोल्ड ड्रिंक, आइस क्रीम, मिठाई की मात्रा कम रखें।
*रात का खाना जल्दी खाएं व बार-बार खाने की आदत को त्याग दें।
*अदरक, लहसून, शलगम, मटर, पत्तागोभी, गाजर, फली, पालक, मेथी, तोरी, घीया आदि का सेवन करें।
*ऐसे फलों का सेवन करें जो अधिक जूस वाले व मीठे या खट्टे न हो।
*कफ प्रधान प्रकृति वाले व्यक्तियों का वसंत ऋतु, कफजन्य रोग होने पर और बाल्यावस्था में विशेष रूप से ख्याल रखा जाना चाहिए। कफ प्रधान वालों को प्रतिवर्ष वसंत ऋतु में पंचकर्म के माध्यम से शरीर की शुद्धि करनी चाहिए। ऐसा करने से पूरे वर्ष कफ की समस्या नहीं होती। यह सब उपचार किसी आयुर्वेदाचार्य के निर्देशन में करने चाहिए।
अत: अगर हम अपनी प्रकृति को समझें और उसके अनुसार अपने खान-पान और रहन-सहन को निर्धारित करें तो लंबी और सेहतमंद जीवन जी सकते हैं।
*मीठे, खट्टे, और नमकीन जितने पदार्थ हैं वे कफ को बढ़ाते हैं ।
*कफ-प्रकृति के व्यक्ति को मीठे, खट्टे, नमकीन चीजों को कम मात्रा में लेना चाहिए और कड़वी चरपरी और कसैली चीजों को अधिक मात्रा में खाना चाहिए ताकि कफ बढ़ने न पाए ।






Post a Comment