गुहेरी ,अंजनहारी के सरल उपचार

                                                         

आँखों की दोनों पलकों के किनारों पर बालों (बरौनियों) की जड़ों में जो छोटी-छोटी फुंसियां निकलती हैं,उसे ही अंजनहारी,गुहेरी या नरसराय भी कहा जाता है | कभी-कभी तो यह मवाद के रूप में बहकर निकल जाती है पर कभी-कभी बहुत ज़्यादा दर्द देती है और एक के बाद एक निकलती रहती हैं | चिकित्सकों के मत मे विटामिन A और D की कमी से अंजनहारी निकलती है | कभी-कभी कब्ज से पीड़ित रहने कारण भी अंजनहारी निकल सकती हैं |

 अंजनहारी के कारण-


डॉक्टर अंजनहारी का कारण विटामिन A और D की कमी मानते हैं।
अंजनहारी का कारण, आम तौर पर एक स्टाफीलोकोकस बैक्टीरिया (staphylococcus bacteria) के कारण होने वाला संक्रमण भी माना जाता है।
पाचन क्रिया में खराबी भी अंजनहारी का कारण है।
अंजनहारी का एक कारण, लगातार रहने वाली कब्ज भी मानी जाती है।
धूल और धुंए समेत अन्य हानिकारक कणों का आँखों में जाना।
बिना हाथ धोए आँखों को छूना।
संक्रमण होना।


बिना आपरेशन प्रोस्टेट वृद्धि की अचूक औषधि


आँखों की सफाई पर ध्यान न देना। निरंतर रूप से पानी से न धोना।
वैसे अंजनहारी होने के सटीक कारणों की जानकारी नहीं है, लेकिन ये कुछ कारण हैं जिनकी वजह से यह दिक्क्त आती है।


अंजनहारी के घरेलू उपचार -


१. लौंग को जल के साथ किसी सिल पर घिसकर अंजनहारी पर दिन में दो तीन लेप करने से शीघ्र ही अंजनहारी नष्ट हो जाती है।
२. बोर के ताजे कोमल पत्तों को कूट पीसकर, किसी कपड़े में बांधकर रस निकालें। इस रस को अंजनहारी पर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।

३. इमली के बीजों को सिल पर घिसकर उनका छिलका अलग कर दें। अब इमली के सफेद बीज को जल के साथ सिल पर घिस कर दिन में कई बार अंजनहारी (फुसी) पर लगाएं । इसके लगाने से अंजनहारी शीघ्र नष्ट होता है।



. १० ग्राम त्रिफला के चूर्ण को ३०० ग्राम जल में डालकर रखें। सुबह बिस्तर से उठने पर त्रिफला के उस जल को कपड़े से छानकर नेत्रों को साफ करने से गुहेरी की विकृति नष्ट होती है। त्रिफला के जल से नेत्रों की सब गंदगी निकल जाती है। प्रतिदिन त्रिफला का ३ ग्राम चूर्ण जल के साथ सुबह शाम सेवन करने से गुहरी की विकृति से राहत मिलती है।


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५. काली मिर्च को जल के साथ पीसकर या जल के साथ घिसकर अंजनहारी पर लेप करने से प्रारंभ में थोड़ी सी जलन होती है, लेकिन जल्दी ही गुहेरी का निवारण हो जाता है।
६. ग्रीष्म ऋतु में पसीने के कारण अंजनहारी की विकृति बहुत होती है। प्रतिदिन सुबह और रात्रि को नेत्रों में गुलाब जल की कुछ बूंदे डालने से बहुत लाभ होता है।
७. त्रिफला चूर्ण ३ ग्राम मात्रा में उबले हुए दूध के साथ सेवन करने से अंजनहारी से सुरक्षा होती है।
८. लौंग को चंदन और केशर के साथ जल के छींटे डालकर, घिसकर अंजनहारी का लेप करने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
९. सहजन के ताजे व कोमल पत्तों को कूट पीसकर कपड़े में बांधकर रस निकालें। इस रस को दिन में कई बार अंजनहारी पर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।
१०. नीम के ताजे व कोमल पत्तों का रस मकोय का रस बराबर मात्रा में कपड़े से छानकर नेत्रों में लगाने से अंजनहारी के कारण शोथ व नेत्रों की लालिमा शीघ्र नष्ट होती है।
११. अंजनहारी में शोथ के कारण तीव्र जलन व पीड़ा हो तो चंदन के जल के साथ घिसकर दिन में कई बार लेप करने से तुरंत लाभ होता है।


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१२) छुहारे के बीज को पानी के साथ घिस लें | इसे दिन में २-३ बार अंजनहारी पर लगाने से लाभ होता है |
१३) तुलसी के रस में लौंग घिस लें | अंजनहारी पर यह लेप लगाने से आराम मिलता है |
१४) हरड़ को पानी में घिसकर अंजनहारी पर लेप करने से लाभ होता है |
१५) आम के पत्तों को डाली से तोड़ने पर जो रस निकलता है,उस रस को गुहेरी पर लगाने से गुहेरी जल्दी समाप्त हो जाती है |


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हर्निया ,आंत उतरने के उपचार //Home remedies for hernia





आम तौर पर हर्निया होने का कारण पेट की दीवार का कमजोर होना है |पेट और जांघों के बीच वाले हिस्से मे जहां पेट की दीवार कमजोर पड़ जाती है वहाँ आंत का एक गुच्छा उसमे छेद बना कर बाहर निकल आता है | उस स्थान पर दर्द होने लगता है | इसी को आंत्र उतरना,आंत्रवृद्धि या हर्निया कहते हैं|
एबडॉमिनल वॉल के कमजोर भाग के अंदर का कोई भाग जब बाहर की ओर निकल आता है तो इसे हर्निया कहते हैं। हर्निया में जांघ के विशेष हिस्से की मांसपेशियों के कमजोर होने के कारण पेट के हिस्से बाहर निकल आते हैं। हर्निया की समस्या जन्मजात भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में इसे कॉनजेनाइटल हर्निया कहते हैं। हर्निया एक वक्त के बाद किसी को भी हो सकता है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि हर्निया का एकमात्र इलाज सर्जरी है जिसकी वजह से वे डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है हर्निया बिना सर्जरी के भी ठीक हो सकता है। 

जब किसी व्यक्ति की आंत अपने जगह से उतर जाती है तो उस व्यक्ति के अण्डकोष की सन्धि में गांठे जैसी सूजन पैदा हो जाती है जिसे यदि दबाकर देखा जाए तो उसमें से कों-कों शब्द की आवाज सुनाई देती हैं। आंत उतरने का रोग अण्डकोष के एक तरफ पेड़ू और जांघ के जोड़ में अथवा दोनों तरफ हो सकता है। जब कभी यह रोग व्यक्ति के अण्डकोषों के दोनों तरफ होता है तो उस रोग को हार्निया रोग के नाम से जाना जाता है। वैसे इस रोग की पहचान अण्डकोष का फूल जाना, पेड़ू में भारीपन महसूस होना, पेड़ू का स्थान फूल जाना आदि। जब कभी किसी व्यक्ति की आंत उतर जाती है तो रोगी व्यक्ति को पेड़ू के आस-पास दर्द होता है, बेचैनी सी होती है तथा कभी-कभी दर्द बहुत तेज होता है और इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। कभी-कभी तो रोगी को दर्द भी नहीं होता है तथा वह धीरे से अपनी आंत को दुबारा चढ़ा लेता है। आंत उतरने की बीमारी कभी-कभी धीरे-धीरे बढ़ती है तथा कभी अचानक रोगी को परेशान कर देती है।
प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार देखा जाए तो आंत निम्नलिखित कारणों से उतर जाती है-
1. कठिन व्यायाम करने के कारण आंत उतरने का रोग हो जाता है।
2. पेट में कब्ज होने पर मल का दबाव पड़ने के कारण आंत उतरने का रोग हो जाता है।
3. भोजन सम्बन्धी गड़बड़ियों तथा शराब पीने के कारण भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
4. मल-मूत्र के वेग को रोकने के कारण भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
5. खांसी, छींक, जोर की हंसी, कूदने-फांदने तथा मलत्याग के समय जोर लगाने के कारण आंत अपनी जगह से उतर जाती है।6. पेट में वायु का प्रकोप अधिक होने से आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
7. अधिक पैदल चलने से भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है|
8. भारी बोझ उठाने के कारण भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
9. शरीर को अपने हिसाब से अधिक टेढ़ा-मेढ़ा करने के कारण आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
जिस हर्निया में आंत उलझ कर गाँठ लग गयी हो और मरीज को काफी तकलीफ हो रही हो, ऐसे बिगड़े केस में तत्काल ऑपरेशन जरुरी है. बाकी सभी मामलों में हार्निया बिना आपरेशन के ही ठीक हो सकता है.

हर्निया की प्रारम्भिक स्थिति मे  पेट की दीवार मे कुछ उभार सा  प्रतीत होता है| इस आगे बढ़ी हुई आंत को पीछे भी धकेला जा सकता है लेकिन ज्यादा ज़ोर लगाना उचित नहीं है| 

*अगर  आगे बढ़ी आंत को आराम से पीछे  धकेलकर  अपने स्थान पर पहुंचा दिया जाए तो  उसे उसी स्थिति मे रखने के लिए कस कर बांध  देना चाहिए| यह तरीका असफल हो जाये तो फिर आपरेशन की सलाह  देना उचित है| 
*पेट की तोंद ज्यादा निकली हुई हो तो उसे भी घटाने के उपचार जरूरी होते हैं| 
*अरंडी का तेल दूध मे मिलाकर  पीने से हर्निया ठीक हो  जाता है |इसे एक माह तक करें| 

*काफी पीने से भी बढ़ी हुई आंत के रोग मे फायदा होता है|
हार्निया या आंत उतरने का मूल कारण पुराना कब्ज है। कब्ज के कारण बडी आंत मल भार से अपने स्थान से खिसककर नीचे लटकने लगती है। मल से भरी नीचे लटकी आंत गांठ की तरह लगती है। इसी को हार्निया या आंत उतरना कहते हैं।
*कुन कुना पानी पीकर 5 मिनिट तक कौआ चाल (योग क्रिया) करके फिर पांच या अधिक से अधिक दस बार तक सूर्य नमस्कार और साथ ही 200 से 500 बार तक कपाल-भांति करने से फूली हुई आंत वापस ऊपर अपने स्थान पर चली जाती है। भविष्य में कभी भी आपको हार्निया और पाइल्स होने की सम्भावना नही होगी।
हर्निया के होम्योपैथिक उपचार -
*सुबह उठते ही सबसे पहले आप सल्फर 200  7 बजे,  दोपहर को आर्निका 200 और रात्रि को खाने के एक से दो घंटे बाद या नौ बजे नक्स वोम 200 की पांच-पांच बूँद आधा कप पानी से एक हफ्ते तक ले, फिर हर तीन से छह माह में तीन दिन तक लें.

*केल्केरिया कार्ब 200 की पांच बूँद आधा कप पानी से पांच दिन तक लें.

*जब भी अचानक जलन, दर्द, सूजन होना, घबराहट, ठंडा पसीना और मृत्यु भय हो, तो एकोनाइट 30 की पांच बूँद आधा कप पानी से हर घंटे में लें.

*जब दाहिने भाग में हार्निया हो, तो लाइकोपोडियम 30 की पांच बूँद आधा कप पानी से दिन में तीन बार लें.

आंत उतरने से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
1. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार जब किसी व्यक्ति की आंत उतर जाती है तो रोगी व्यक्ति को तुरन्त ही शीर्षासन कराना चाहिए या उसे पेट के बल लिटाना चाहिए। इसके बाद उसके नितम्बों को थोड़ा ऊंचा उठाकर उस भाग को उंगुलियों से सहलाना और दबाना चाहिए। जहां पर रोगी को दर्द हो रहा हो उस भाग पर दबाव हल्का तथा सावधानी से देना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया करने से रोगी व्यक्ति की आंत अपने स्थान पर आ जाती है। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने के बाद रोगी को स्पाइनल बाथ देना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोगी व्यक्ति की पेट की मांसपेशियों की शक्ति बढ़ जाती है तथा अण्डकोष संकुचित हो जाते हैं।
2. रोगी की आंत को सही स्थिति में लाने के लिए उसके शुक्र-ग्रंथियों पर बर्फ के टुकड़े रखने चाहिए जिसके फलस्वरूप उतरी हुई आंत अपने स्थान पर आ जाती है।
3. यदि किसी समय आंत को अपने स्थान पर लाने की क्रिया से आंत अपने स्थान पर नहीं आती है तो रोगी को उसी समय उपवास रखना चाहिए। यदि रोगी के पेट में कब्ज हो रही हो तो एनिमा क्रिया के द्वारा थोड़ा पानी उसकी बड़ी आंत में चढ़ाकर, उसमें स्थित मल को बाहर निकालना चाहिए इसके फलस्वरूप आंत अपने मूल स्थान पर वापस चली जाती है।
4. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इस रोग का उपचार करने के लिए हार्निया की पट्टी का प्रयोग करना चाहिए। इस पट्टी को सुबह के समय से लेकर रात को सोने के समय तक रोगी के पेट पर लगानी चाहिए। यह पट्टी तलपेट के ऊपर के भाग को नीचे की ओर दबाव डालकर रोके रखती है जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से उसकी मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। ठीक रूप से लाभ के लिए रूग्णस्थल (रोग वाले भाग) पर प्रतिदिन सुबह और शाम को चित्त लेटकर नियमपूर्वक मालिश करनी चाहिए। मालिश का समय 5 मिनट से आरम्भ करके धीरे-धीरे बढ़ाकर 10 मिनट तक ले जाना चाहिए। रोगी के शरीर पर मालिश के बाद उस स्थान पर तथा पेड़ू पर मिट्टी की गीली पट्टी का प्रयोग लगभग आधे घण्टे तक करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
5. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी व्यक्ति के पेट पर मालिश और मिट्टी लगाने तथा रोगग्रस्त भाग पर भाप देने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
6. इस रोग का इलाज करने के लिए पोस्ता के डोण्डों को पुरवे में पानी के साथ पकाएं तथा जब पानी उबलने लगे तो उसी से रोगी के पेट पर भाप देनी चाहिए और जब पानी थोड़ा ठंडा हो जाए तो उससे पेट को धोना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
निम्नलिखित व्यायामों के द्वारा आंत उतरने के रोग को ठीक किया जा सकता है-
1. यदि आंत उतर गई हो तो उसका उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी के पैरों को किसी से पकड़वा लें या फिर पट्टी से चौकी के साथ बांध दें और हाथ कमर पर रखें। फिर इसके बाद रोगी के सिर और कन्धों को चौकी से 6 इंच ऊपर उठाकर शरीर को पहले बायीं ओर और फिर पहले वाली ही स्थिति में लाएं और शरीर को उठाकर दाहिनी ओर मोड़े। फिर हाथों को सिर के ऊपर ले जाएं और शरीर को उठाने का प्रयत्न करें। यह कसरत कुछ कठोर है इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि अधिक जोर न पड़े। सबसे पहले इतनी ही कोशिश करें जिससे पेशियों पर तनाव आए, फिर धीरे-धीरे बढ़ाकर इसे पूरा करें। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।

2. प्राकृतिक चिकित्सा से इस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को सीधे लिटाकर उसके घुटनों को मोड़ते हुए पेट से सटाएं और तब तक पूरी लम्बाई में उन्हें फैलाएं जब तक उसकी गति पूरी न हो जाए और चौकी से सट न जाए। इस प्रकार से रोगी का इलाज करने से रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
3. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी व्यक्ति का इलाज करने के लिए रोगी के दोनों हाथों को फैलाकर चौकी के किनारों को पकड़ाएं और उसके पैरों को जहां तक फैला सकें उतना फैलाएं। इसके बाद रोगी के सिर को ऊपर की ओर फैलाएं। इससे रोगी का यह रोग ठीक हो जाता है।
4. रोगी व्यक्ति का इलाज करने के लिए रोगी व्यक्ति को हाथों से चौकी को पकड़वाना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी अपने पैरों को ऊपर उठाते हुए सिर के ऊपर लाएं और चौकी की ओर वापस ले जाते हुए पैरों को लम्बे रूप में ऊपर की ओर ले जाएं। इसके बाद अपने पैरों को पहले बायीं ओर और फिर दाहिनी ओर जहां तक नीचे ले जा सकें ले जाएं। इस क्रिया को करने में ध्यान इस बात पर अधिक देना चाहिए कि जिस पार्श्व से पैर मुड़ेंगे उस भाग पर अधिक जोर न पड़े। यदि रोगी की आन्त्रवृद्धि दाहिनी तरफ है तो उस ओर के पैरों को मोड़ने की क्रिया बायीं ओर से अधिक बार होनी चाहिए। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से रोगी की आंत अपनी जगह पर आ जाती है।
5. कई प्रकार के आसनों को करने से भी आंत अपनी जगह पर वापस आ जाती है जो इस प्रकार हैं- अर्द्धसर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, शीर्षासन और शलभासन आदि।
6. आंत को अपनी जगह पर वापस लाने के लिए सबसे पहले रोगी को पहले दिन उपवास रखना चाहिए। इसके बाद रोग को ठीक करने के लिए केवल फल, सब्जियां, मट्ठा तथा कभी-कभी दूध पर ही रहना चाहिए। यदि रोगी को कब्ज हो तो सबसे पहले उसे कब्ज का इलाज कराना चाहिए। फिर सप्ताह में 1 दिन नियमपूर्वक उपवास रखकर एनिमा लेना चाहिए। इसके बाद सुबह के समय में कम से कम 1 बार ठंडे जल का एनिमा लेना चाहिए और रोगी व्यक्ति को सुबह के समय में पहले गर्म जल से स्नान करना चाहिए तथा इसके बाद फिर ठंडे जल से। फिर सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर वाष्पस्नान भी लेना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को तख्त पर सोना चाहिए तथा सोते समय सिर के नीचे तकिया रखना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को अपनी कमर पर गीली पट्टी बांधनी चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
7. इस रोग से पीड़ित रोगी को गहरी नीली बोतल के सूर्यतप्त जल को लगभग 50 मिलीलीटर की मात्रा में रोजाना लगभग 6 बार लेने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

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त्वचा की झुर्रियां मिटाने के उपचार






प्रदूषण, धूल-मिट्‌टी, तनाव, धूप और दौड़भाग न जाने कितनी चीजों का सामना हमारी त्वचा को प्रतिदिन करना पड़ता है। ऐसे में समय रहते उचित देखभाल न करने से उम्र के पहले ही चेहरे पर झुर्रियों पड़ जाती हैं। चिरयुवा बने रहने तथा सौंदर्य कायम रखने में सबसे बड़ी बाधा हैं झुर्रियों की समस्या। बढ़ती उम्र के निशान सबसे पहले चहरे पर ही नजर आते हैं। यदि त्वचा की उचित तरीके से देखभाल की जाए तो वर्षो तक चेहरा स्निग्ध व कमनीय बना रहेगा।
नैसर्गिक रूप से महिलायें अपने सौंदर्य के प्रति सचेत रहती हैं, कभी-कभी असमय ही झाईयां-झुरियां होने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। आमतौर पर झुर्रियां बढ़ती उम्र की निशानी मानी जाती है लेकिन जिस तरह से हमारे खानपान व जीवनशैली में बदलाव आया है,कम उम्र में ही चेहरे पर झुर्रियां नजर आने लगी है। झुर्रियां अक्सर शरीर के उन भागों में होती हैं जो अक्सर खुला, नाजुक और कोमल रहता है।


कैसे पड़ती है झुर्रियां -

झुर्रियों का प्रमुख कारण त्वचा की खुश्की है। त्वचा की प्राकृतिक चिकनाई होने लगती है। जिसके कारण त्वचा और आंखों के आसपास लकीरें होने लगती है। क्रोध, चिंता, शोध, झुंझलाहट, तनाव आदि का असर त्वचा पर पड़ता है। तनावयुक्त रहने पर हमारे माथे पर सलवटें पड़ती है जिससे वहां की त्वचा में ढीलापन आकर त्वचा लटक जाती है और झुर्रियां पड़ने लगती है।
अधिक धूप आंतरिक त्वचा के लिये नुकसानदायक है। तीव्र धूप त्वचा की स्कीन को सोखकर उसे सिकोड़ देती है जो अंखों के नीचे झुर्रियों का कारण होते हैं। ठंड के प्रकोप से भी त्वचा कठोर हो जाती है और झुर्रियां नजर आने लगती है।
साबुन में मौजूद कॉस्टिक सोडा त्वचा के रहे- सहे तेल को भी सोख लेता है। जिससे कम उम्र में ही हमारे चेहरे पर झुर्रियां नजर आने लगती हैं। कॉस्मेटिक का अधिक उपयोग भी त्वचा के लिए हानिकारक है।
कॉस्मेटिक्स त्वचा के भीतर जाकर उसके रोमछिद्रों को अवरूद्ध कर देते है। जिससे त्वचा की सही तरीके से सफाई नहीं हो पाती और धीरे-धीरे हमारे चेहरे पर झुर्रियां नजर आने लगती है।


कहां होती है झुर्रियां -

झुर्रियां अक्सर हमारे चेहरे और गर्दन पर होती है। चूँकि ये शरीर के वे भाग हैं, जो सबसे ज्यादा धूप व बाहरी वायु के सम्पर्क में होते है। आंखों के नीचे से शुरू होकर झुर्रियां गर्दन के आसपास भी होने लगती है।


झुर्रियों से बचाव तथा उपचार-


झुर्रियों से मुक्ति पाने का एकमात्र व सर्वश्रेष्ठ उपाय है, इससे बचाव। झुर्रियों से त्वचा को बचाने के लिए हमें अपने खानपान व जीवनशैली पर विशेष ध्यान देना होगा।
* प्रोटीन तथा तैलीय तत्वों से युक्त भोजन लें, किन्तु वह गरिष्ठ न हो इसका भी ध्यान रखें। बादाम, गाजर व आंवले का सेवन अत्यंत लाभप्रद है।
*. नियमित व्यायाम करें। योग अभ्यास से भी त्वचा कसावदार व कांतिपूर्ण होती है।
*त्वचा को रूखा न रहने दें मलाई या माइश्चराइजर का प्रयोग करें। चेहरे के लिए हमेशा ग्लिसरीनयुक्त साबुन का प्रयोग करें।
* नियमित रूप से चेहरे की मालिश झुर्रियां रोकने में सहायक है।

* तनाव चिंता से दूर रहें दैनिक व्यवहार में सौम्य व प्रसन्न रहें।
6. पानी भरपूर पिएं।




झुर्रियां समाप्त करने के नुस्खे: -


1. कच्चे दूध से चेहरा साफ करने तथा फेस पैक में शहद और संतरे का रस मिलाकर लगाने से त्वचा में निखार आता है।
*नीम, पुदीना, तुलसी की पत्ती का पाउडर और मेथी पाउडर एंटीसेप्टिक का काम करता है।
लाल चंदन शीतलता और चिकनाहट प्रदान करता है।
* टमाटर और नीबू का रस मिलाकर शरीर पर लगाएं। नहाते समय इस लेप को रगड़कर छुड़ा दें। कुछ सप्ताह तक ऐसा करने से त्वचा कोमल हो जाती है।
*शहद में मलाई और नीबू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिक्स कर चेहरे व आंखों के नीचे लगाएं। इससे आंखों के नीचे का कालापन दूर होकर झुर्रियां समाप्त होती है।
* मूली कसकर रस निकालें व समान मात्रा में मक्खन मिलाकर चेहरे व गर्दन पर लगाएं, एक घण्टे बाद कुनकुने पानी से धो लें।
* गरम पानी में संतरे के छिलके डाल दें, रात भर पड़ा रहने दें। सुबह इसी पानी से चेहरा धोएं । ऐसा करने से त्वचा में कसाव आता है।


आँखों  का चश्मा  हटाने का अचूक  घरेलू उपाय

* पपीते का गुदा मसलकर चेहरे पर लगाएं। कुछ देर बाद चेहरा साफ कर लें। कुछ दिन लगातार ऐसा करने से झुर्रियों से मुक्ति मिलती है।
*आधा चम्मच मलाई में नींबू की चार- पांच बूंदे मिलाकर सोने से पहले चेहरे पर अच्छी तरह मलें। दोनों हाथों से मलाई तब तक मलते रहें जब तक कि मलाई घुलकर त्वचा में एकसार न हो जाए।



खीरे को कद्दूकस कर चेहरे पर लगाने से त्वचा कांतिमय होती है।

*. त्वचा की झुर्रियां मिटाने के लिए गाजर, टमाटर और चुकंदर का रस नियमित पिएं।
* ई और ओ बोलते हुये एक बार चेहरे को फैलाएं और फिर सिकोड़ें। इससे गालों का अच्छा व्यायाम होता है। जिसमें गालों की पुष्टि होती है और झुर्रियों से बचाव।

 *  त्वचा पर बढ़ती झुर्रियां समय से पहले आपकी आयु बढ़ा देती हैं। इन्हें छिपाने के लिए लोग भांति भांति के कास्मेटिक्स प्रयोग करते हैं किन्तु मुख्य सफलता इन्हें छिपाने के बजाए हटाने में है। 



*हल्दी शहद पेस्टः 

हल्दी में शहद मिलाकर पेस्ट बना लें और उसे गले और चेहरे पर लगाएं। 10-15 मिनट बाद इसे पानी से धो लें।


गोखरू के औषधीय गुण और प्रयोग


* चावल के आटे का पेस्टः 


एक कप चावल के आटे में दूध और गुलाब जल मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाएं। इसे चेहरे, गले और माथे पर लगाएं और 20 मिनट तक छोड़ दें और फिर पानी से धो लें।
*चंदन पाउडरः छाछ पाउडर न केवल त्वचा से झुर्रियां हटाने में सहायक है बल्कि चेहरे से मुंहासो को भी दूर करता है। चंदन पाउडर में गुलाब जल डालकर चेहरे पर लगाएं और 7-10 मिनट बाद पानी से धो लें।



*दूध, टमाटर और हल्दी पेस्टः

 कच्चे दूध में टमाटर की प्योरी, चावल का आटा और हल्दी पाउडर मिलाकर पेस्ट बना लें और चेहरे पर लगाएं। थोड़ी देर प्रतीक्षा करें और सूखने के बाद नर्म हाथों से अच्छी तरह धोएं। इससे त्वचा टाइट रहती है।
*टमाटर और हल्दी पेस्ट में छाछ या गन्ने का रस मिलाकर लगाने से झुर्रिया तो कम होती ही हैं झाईं भी दूर होती हैं।


*अदरक शहदः 


प्रतिदिन नहार मुंह एक चमम्मच शहद में बारीक कटी अदरक डालकर खाएं। इससे आप लंबे समय तक झुर्रियों से दूर रहेंगे।

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

गठिया (संधिवात) रोग की अनुपम औषधि





गोखरू है किडनी रोगों की महोषधि



किड्नी के लिए राम बाण औषधि है गोखरू | बंद किड्नी को चालू करता है| किड्नी मे स्टोन को टुकड़े टुकड़े करके पेशाब के रास्ते बाहर निकल देता है| क्रिएटिन ,यूरिया को तेजी से नीचे लाता है ,पेशाब मे जलन हो पेशाब ना होती है ,इसके लिए भी यह काम करता है इसके बारे मे आयुर्वेद के जनक आचार्य श्रुशूत ने भी लिखा इसके अलावा कई विद्वानो ने इसके बारे मे लिखा है इसका प्रयोग हर्बल दवाओं मे भी होता है आयुर्वेद की दवाओं मे भी होता है यह स्त्रियो के बंध्यत्व मे तथा पुरुषों के नपुंसकता मे भी बहुत उपयोगी होता है इस दवा का सेवन कई लोगो ने किया है जिनका क्रिएटिन 10 पाईंट से भी अधिक था उन्हे भी 15 दिनो मे संतोषप्रद लाभ हुआ |आत: जिन लोगो को किडनी की प्राब्लम है वो इसका सेवन करे तो लाभ होना निश्चित है
गोखरू की दो जातियां होती हैं बड़ा गोखरू और छोटा गोखरू। औषधि के रूप में छोटा गोखरू प्रयोग होता है। औषधि के रूप में पौधे की जड़ और फल का प्रयोग होता है।

गोखरू के आयुर्वेदिक गुण

गोखरू के गुणकर्म संबंधी मत-
*आचार्य चरक ने गोक्षुर को मूत्र विरेचन द्रव्यों में प्रधान मानते हुए लिखा है-गोक्षुर को मूत्रकृच्छानिलहराणाम् अर्थात् यह मूत्र कृच्छ (डिसयूरिया) विसर्जन के समय होने वाले कष्ट में उपयोगी एक महत्त्वपूर्ण औषधि है । आचार्य सुश्रुत ने लघुपंचकमूल, कण्टक पंचमूल गणों में गोखरू का उल्लेख किया है । अश्मरी भेदन (पथरी को तोड़ना, मूत्र मार्ग से ही बाहर निकाल देना) हेतु भी इसे उपयोगी माना है ।
श्री भाव मिश्र गोक्षुर को मूत्राशय का शोधन करने वाला, अश्मरी भेदक बताते हैं व लिखते हैं कि पेट के समस्त रोगों की गोखरू सर्वश्रेष्ठ दवा है । वनौषधि चन्द्रोदय के विद्वान् लेखक के अनुसार गोक्षरू मूत्र पिण्ड को उत्तेजना देता है, वेदना नाशक और बलदायक है ।



गोखरू के औषधीय उपयोग-

*पथरी रोग :- 

पथरी रोग में गोक्षुर के फलों का चूर्ण शहद के साथ 3 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम दिया जाता है । महर्षि सुश्रुत के अनुसार सात दिन तक गौदुग्ध के साथ गोक्षुर पंचांग का सेवन कराने में पथरी टूट-टूट कर शरीर से बाहर चली जाती है । मूत्र के साथ यदि रक्त स्राव भी हो तो गोक्षुर चूर्ण को दूध में उबाल कर मिश्री के साथ पिलाते हैं ।पथरी की चिकित्सा में सबसे महत्वपूर्ण औषधी है गोखरू :- पथरी के रोगी को इसके बीजो का चूर्ण दिया जाता है तथा पत्तों का पानी बना के पिलाया जाता है | इसके पत्तों को पानी में कुछ देर के लिए भिगो देते है | उसके बाद पतो को १५ बीस बार उसी पानी में डुबोते है और निकालते है इस प्रक्रिया में पानी चिकना गाढा लार युक्त हो जाता है | यह पानी रोगी को पिलाया जाता है स्वाद हेतु इसमे चीनी या नमक थोड़ी मात्रा में मिलाया जा सकता है | यह पानी स्त्रीयों में श्वेत प्रदर ,रक्त प्रदर पेशाब में जलन आदि रोगों की राम बाण औषधी है | यह मूत्राशय में पडी हुयी पथरी को टुकड़ों में बाट कर पेशाब के रास्ते से बाहर निकाल देता है |

*सुजाक रोग :-

 सुजाक रोग (गनोरिया) में गोक्षुर को घंटे पानी में भिगोकर और उसे अच्छी तरह छानकर दिन में चार बार 5-5 ग्राम की मात्रा में देते हैं । किसी भी कारण से यदि पेशाब की जलन हो तो गोखरु के फल और पत्तों का रस 20 से 50 मिलीलीटर दिन में दो-तीन बार पिलाने से वह तुरंत मिटती है । प्रमेह शुक्रमेह में गोखरू चूर्ण को 5 से 6 ग्राम मिश्री के साथ दो बार देते हैं । तुरंत लाभ मिलता है ।

*प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने में :-

 मूत्र रोग संबंधी सभी शिकायतों यथा प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने से पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब का अपने आप निकलना (युरीनरी इनकाण्टीनेन्स), नपुंसकता, मूत्राशय की पुरानी सूजन आदि में गोखरू 10 ग्राम, जल 150 ग्राम, दूध 250 ग्राम को पकाकर आधा रह जाने पर छानकर नित्य पिलाने से मूत्र मार्ग की सारी विकृतियाँ दूर होती हैं ।

*प्रदर में, 

अतिरिक्त स्राव में, स्री जनन अंगों के सामान्य संक्रमणों में गोखरू एक प्रति संक्रामक का काम करता है । स्री रोगों के लिए 15 ग्राम चूर्ण नित्य घी व मिश्री के साथ देते हैं ।
गोक्षुर चूर्ण प्रोस्टेट बढ़ने से मूत्र मार्ग में आए अवरोध को मिटाता है, उस स्थान विशेष में रक्त संचय को रोकती तथा यूरेथ्रा के द्वारों को उत्तेजित कर मूत्र को निकाल बाहर करता है । बहुसंख्य व्यक्तियों में गोक्षुर के प्रयोग के बाद ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं रह जाती । इसे योग के रूप न देकर अकेले अनुपान भेद के माध्यम से ही दिया जाए, यही उचित है, ऐसा वैज्ञानिकों का व सारे अध्ययनों का अभिमत है ।

*नपुंसकता 

में, बराबर मात्रा में गोखरू के बीज का चूर्ण और तिल के बीज sesame seeds powder के चूर्ण, को बकरी के दूध और शहद के साथ दिया जाता है।
*धातु की कमजोरी में इसके ताजे फल का रस 7-14 मिलीलीटर या 14-28 मिलीलीटर सूखे फल के काढ़े, को दिन में दो बार दूध के साथ लें।

*मूत्रकृच्छ painful urination

 में 5g गोखरू चूर्ण को दूध में उबाल कर पीने से आराम मिलता है। यह मूत्र की मात्रा बढ़ाने में मदद करता है और सूजन कम करता है।
*मूत्रघात urinary retention में 3-6 ग्राम फल का पाउडर, पानी के साथ दिन में दो बार लें।
रक्तपित्त में गोखरू के फल को 100-200 मिलीलीटर दूध में उबाल कर दिन में दो बार लें।
*धातुस्राव, स्वप्नदोष nocturnal fall, प्रमेह, कमजोरी weakness, और यौन विकारों sexual disorders में 5 ग्राम गोखरू चूर्ण को बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करें।
*यौन शक्ति को बढ़ाने के लिए, गोखरू, शतावर, नागबला, खिरैटी, असगंध, को बराबर मात्रा में कूट कर, कपड़छन कर लें और रोज़ १ छोटा चम्मच दूध के साथ ले। इसको ४० दिन तक लगातार लें।
*अश्मरी urinary stones में 5 ग्राम गोखरू चूर्ण (फल का पाउडर) शहद के साथ दिन में दो बार, पीछे से गाय का दूध लें।
गोखरू का काढ़ा बनाने की विधि:

250 ग्राम गोखरू लेकर 4 लीटर पानी मे उबालिए जब पानी एक लीटर रह जाए तो पानी छानकर एक बोतल मे रख लीजिए|इस काढे को सुबह शाम हल्का सा गुनगुना करके 100 ग्राम के करीब पीजिए शाम को खाली पेट का मतलब है दोपहर के भोजन के 5, 6 घंटे के बाद काढ़ा पीने के एक घंटे के बाद ही कुछ खाइए और अपनी पहले की दवाई ख़ान पान का रूटीन पूर्ववत ही रखिए 15 दिन के अंदर यदि आपके अंदर अभूतपूर्व परिवर्तन हो जाए तो चिकित्सक की सलाह लेकर धीरे धीरे दवा बंद कर दीजिए| जैसे जैसे आपके अंदर सुधार होगा काढे की मात्रा कम कर सकते है या दो बार की बजाए एक बार भी कर सकते है |मेरा निवेदन है कि खराब किडनी रोगी को किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के पहिले यह औषधि जरूर सेवन करके चमत्कारिक परिणाम की उम्मीद करनी चाहिए|

विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी एक केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -







इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-


रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl






हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl

परिणाम- क्रेयटिनिन और यूरिया  नार्मल 








 केस रिपोर्ट-2

रोगी का नाम - Awdhesh 

निवासी - कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट







दिनांक - 26/4/2016

Urea- 55.14   mg/dl

creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -




creatinine 1.34 
mg/dl

urea 22  mg/dl 







Brief repertory of biochemic medicines




Repertory of biochemic medicines-
1.Absess-
ferrum phos+kali mure
2.Aneurism-
ferrum phos+cal flure
3.Angina-
ferrum phos +mag phos
4.Aphonia-
kali mure+kali sulp
5.Asthma-
a.kali mure+kali phos
b.natrum mure+kali phos
c.cal flure+kali phos
6.Albuminuria-
cal phos+kali sulp
7.Arthritis-kali mure+ferrum phos
8.Brain-
kali phos+kali mure
9.Bronchitis-
a.kali mure+ferrum phos
b.kali sulp+ferr phos
10.Burn and scalds-
a.ferrum phos+kali mure
b.cal sulp+natrum mure
11.Carboncle-
kali mure+ferrum phos
12.Chickenpox-
ferrum phos+kali sulp
13.Croup-
a.ferrum phos+kali mure
b.kali phos+kali mure
14.Conjunctivitis-
kali mure +kali sulp
15.Cardiac palpitation-
ferrum phos+kali phos
16.Circulatory disfunction-
kali mure +ferrum phos
17.Fever-
a.General-kali mure +ferrum phos
b.Nevous-kali phos+ferrum phos
c.Blood poisoning-kali sulp+ferrum phos
d.Hay fever-nat mure+ferrum phos
e.Pureperal fever-ferrum phod+kali phos
18.Dysentry-
ferrum phos+kali mure
19.Dysmenorrhoea-
kali phos+ferrum phos
20.Epilepsy-
natrum phos+kali mure
21.Enlargement of joint-
cal flure+natrum sulp
22.Gall stone-
natrum sulp+cal sulp
23.Gonorrhea-
a.ferrum phos+kali mure
b.natrum mure+cal phos
24.Gout-
natrum sulp+ferrum phos
25.Hemorrhoid-
kali mure / kalisulp/natrum sulp/kali phos+cal flure
26.Hip joint disease-
cal sulp+ferrum phos
27.Horseness-
kali mure +kali sulp
28.Hydrocele-
natrum sulp+natrum mure
29.Hysteria-
natrum mure+kali sulp
30.Influenza-
kali sulp+ferrum phos
31.Leuchorhea-
kali phos+natrum mure
32.Lambago-
ferrum phos=others
33.Meningitis-
ferrum phos+kali mure
34.Mumps-
kali mure+ferrum phos
35.Peritonitis-
kali mure+ferrum phos
36.Pneumonia-
kali mure/kali sulp+ferrum phos
37.Quick puls-
ferrum phos+kali sulph
38.Rheumatism-
cal phos+ferrum phos
39.Scrofulous-
cal floure+kali mure
40.Sciatica with gout-
natrum sulp+kali phos
41Sleeplessness-
ferrum phos+kali phos
42.T B-

natrum mur+ferrum phos
43.Thyphoid-
a.Feverile condition-

kali phos+ferrum phos
b.Costiveness-kali mure+kali phos
c.Sleeplessness-natrum mure+kali phos
44.thread worm-
kali mure=natrum phos
45.Uterine hypertrophy-
cal floure+kali mur