18.10.17

शरद ऋतु (Winter Season) में खान पान आहार विहार

   वर्षा ऋतु के तुरंत बाद ही शरद ऋतु (Winter Season) शुरु हो जाती है. आश्विन और कार्तिक मास में शरद ऋतु का आगमन होता है. वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से पित्त दोष का संचय होता है
शरद ऋतु (Winter Season) दस्तक दे चुकी है. तो ऋतु बदलने के साथ साथ हमारा खान पान भी इसके अनुसार ही होना चाहिए. आज का हमारा लेख इसी पर आधारित है. इसमें हम बता रहे है कि शरद ऋतु (Winter Season) में हमारा भोजन कैसा होना चाहिए. जिससे हम स्वस्थ के साथ इस ऋतु का भरपूर मजा ले सकते है.
शरद ऋतु में कैसा हो खान पान
खीर का सेवन – शरद ऋतु (Winter Season) में सूर्य का ताप बहुत अधिक होता है. ताप के कारण पित्त दोष पैदा होता है. ऐसे में पित्त से पैदा होने वाले रोग पैदा होते है. पित्त की विकृति में चावल तथा दूध से बनी खीर का सेवन किया जाता है. शरद पूर्णिमा पर इसलिए खीर का विशेष सेवन किया जाता है.



पित्त को शांत करने वाले खाद्य पदार्थो का सेवन – शरद ऋतु (Winter Season) में पित्त शांत करने वाले पदार्थो का सेवन अति आवश्यक होता है. शरद ऋतु में लाल चावल, नये चावल तथा गेहूं का सेवन करना चाहिए. कडवे द्रव्यों से सिद्ध किये गये घी के सेवन से लाभ मिलता है. प्रसिद्ध महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत ने कहा है की शरद ऋतु में मधुर, कडवे तथा कैसले पदार्थो का सेवन करना चिहिए. दूध, गन्ने के रस से बने खाद्य, शहद, चावल तथा मुंग आदि का सेवन लाभदायक होता है. कुछ विशेष जंगली जानवरों का मास भी गुणकारी होता है.

नम्बू तथा शहद के जल का सेवन – 
शरद ऋतु (Winter Season) में चंद्रमा की किरणों में रखे गये भोजन को उत्तम माना गया है. सुबह के समय हल्के गर्म पानी में एक निम्बू का रस तथा शहद मिलाकर पीने से पित्त दोष का नाश होता है. शरद ऋतु में भोजन के बाद 1-2 केले खा सकते है. केला शरीर को पोषक तत्व तो देता ही है. साथ में पित्त दोष का दमन भी करता है. केला खाकर जल नहीं पीना चाहिए.
खुली छत पर ना सोयें – शरद ऋतु में दिन में तो गर्मी रहती है पर रात को ठण्ड होती है. ऐसे में रात को खुली छत पर नहीं सोना चाहिए. ओस पड़ने से सर्दी, जुकाम तथा खांसी हो सकती है.


हेमंत ऋतु में कैसा हो खान पान-

हेमंत ऋतु अथवा शीत ऋतु आगमन शरद ऋतु के समापन के साथ ही होने लगता है. शीतल हवा का प्रकोप बढ़ने लगता है. शीतल वायु के प्रकोप से शरीर की रुक्षता बढ़ने लगती है. शरीर में जठराग्नि बढ़ने से मेटाबोलिज्म प्रबल होने से भूख अधिक लगने लगती है. इससे सभी तरह के खाद्य पदार्थ आसानी से पाच जाते है.
शक्ति संचय की ऋतु– 
पाचन क्रिया तेज होने के कारण हेमंत ऋतु को शक्ति संचय की ऋतु भी कहा जाता है. इस ऋतु में खानपान पर नियन्त्रण रख कर शारीरिक व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाया जा सकता है. भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हेमंत ऋतु में अस्थमा या दमा, खांसी, संधिशुल, वातरक्त, आमवात, सर्दी जुकाम तथा गले के रोग तीव्र गति से पैदा होते है.
मधुर तथा लवण युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन – 
हेमंत ऋतु में सर्दी के प्रकोप से बचना चाहिए. मीठे तथा लवण रस वाले पदार्थो का सेवन करना चाहिए. जठराग्नि प्रबल होने से नया अनाज भी आसानी से पच जाता है. अधिक प्रोटिन वाले पदार्थ सेवन कर सकते है. उडद, राजमा, मुंग, मोठ सब कुछ आसानी से पच जाता है.शरद ऋतु में ऋतु में चावल, गेहूं, जो, मूंग की दाल,
शक्कर, शहद, परवल ,आंवला, अंगूर, दूध, गुड़, थोड़ी मात्रा में नमकीन पदार्थ, नदी का जल, कसैले पदार्थों का सेवन हितकर है|

इस ऋतु में चांदनी में रहना शरद कालीन फूलों की माला पहनना शरीर पर चंदन यकस का लेप करना तालाब के किनारे भ्रमण करना स्वच्छ हल के ऊनी वस्त्र पहनना तेल की मालिश करके गुनगुने पानी से नहाना स्वास्थ्य के लिए बहुत हितकर होता है
शरद ऋतु में अपथ्य-
 धूप तापमान औस पर नंगे पैर चलना वह गिरते समय खुले में रहना अत्यधिक व्यायाम, पुरवइया हवा में रहना, दही, खट्टे, कड़वे, तेल तले, गर्म चर्बीदार तथा क्षेत्रीय पदार्थों का सेवन लाल मिर्च का सेवन, दिन में सोना, भरपेट भोजन का त्याग करना चाहिए 
   इस ऋतु में जुलाब आदि द्वारा पेट की शुद्धि कर लेने से पित्तजन्य अनेक व्याधियों से बचाव होता है|



16.10.17

भगंदर को जड़ से खत्म करने के घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खे



भगन्दर क्या है ?
यह एक प्रकार का नाड़ी में होने वाला रोग है, जो गुदा और मलाशय के पास के भाग में होता है। भगन्दर में पीड़ाप्रद दानें गुदा के आस-पास निकलकर फूट जाते हैं। इस रोग में गुदा और वस्ति के चारो ओर योनि के समान त्वचा फैल जाती है, जिसे भगन्दर कहते हैं। `भग´ शब्द को वह अवयव समझा जाता है, जो गुदा और वस्ति के बीच में होता है। इस घाव (व्रण) का एक मुंख मलाशय के भीतर और दूसरा बाहर की ओर होता है। भगन्दर रोग अधिक पुराना होने पर हड्डी में सुराख बना देता है जिससे हडि्डयों से पीव निकलता रहता है और कभी-कभी खून भी आता है।
भगन्दर रोग अधिक कष्टकारी होता है। यह रोग जल्दी खत्म नहीं होता है। इस रोग के होने से रोगी में चिड़चिड़ापन हो जाता है। इस रोग को फिस्युला अथवा फिस्युला इन एनो भी कहते हैं।
विभिन्न भाषाओं में रोग का नाम : हिन्दी-भगन्दर। ,अंग्रेजी-फिस्चुला इन एनो। ,अरबी-नलिघा। ,बंगाली-भगन्दर। ,गुजराती-भगन्दर।
भगन्दर के प्रकार – 
भगन्दर आठ प्रकार का होता है-
1. वातदोष से शतपोनक
2. पित्तदोष से उष्ट्र-ग्रीव 
3. कफदोष से होने वाला
 4. वात-कफ से ऋजु 
5. वात-पित्त से परिक्षेपी 
6. कफ पित्त से अर्शोज 
7. शतादि से उन्मार्गी और
 8. तीनों दोषों से शंबुकार्त नामक भगन्दर की उत्पति होती है।
1. शतपोनक नामक भगन्दर :
शतपोनक नामक भगन्दर रोग कसैली और रुखी वस्तुओं को अधिक खाने से होता है। जिससे पेट में वायु (गैस) बनता है जो घाव पैदा करती है। चिकित्सा न करने पर यह पक जाते हैं, जिससे अधिक दर्द होता हैं। इस व्रण के पक कर फूटने पर इससे लाल रंग का झाग बहता है, जिससे अधिक घाव निकल आते हैं। इस प्रकार के घाव होने पर उससे मल मूत्र आदि निकलने लगता है।
2. पित्तजन्य उष्ट्रग्रीव भगन्दर : 
इस रोग में लाल रंग के दाने उत्पन्न हो कर पक जाते हैं, जिससे दुर्गन्ध से भरा हुआ पीव निकलने लगता है। दाने वाले जगह के आस पास खुजली होने के साथ हल्के दर्द के साथ गाढ़ी पीव निकलती रहती है।
3. वात-कफ से ऋजु : 
वात-कफ से ऋजु नामक भगन्दर होता है जिसमें दानों से पीव धीरे-धीरे निकलती रहती है।
4. परिक्षेपी नामक भगन्दर :
 इस रोग में वात-पित्त के मिश्रित लक्षण होते हैं।
5. ओर्शेज भगन्दर : 
इसमें बवासीर के मूल स्थान से वात-पित्त निकलता है जिससे सूजन, जलन, खाज-खुजली आदि उत्पन्न होती है।
4. शम्बुकावर्त नामक भगन्दर : 
इस तरह के भगन्दर से भगन्दर वाले स्थान पर गाय के थन जैसी फुंसी निकल आती है। यह पीले रंग के साथ अनेक रंगो की होती है तथा इसमें तीन दोषों के मिश्रित लक्षण पाये जाते हैं।


5. उन्मार्गी भगन्दर : 
उन्मर्गी भगन्दर गुदा के पास कील-कांटे या नख लग जाने से होता है, जिससे गुदा में छोटे-छोटे कृमि उत्पन्न होकर अनेक छिद्र बना देते हैं। इस रोग का किसी भी दोष या उपसर्ग में शंका होने पर इसका जल्द इलाज करवाना चाहिए अन्यथा यह रोग धीरे-धीरे अधिक कष्टकारी हो जाता है।
भगन्दर के लक्षण – 
भगन्दर रोग उत्पंन होने के पहले गुदा के निकट खुजली, हडि्डयों में सुई जैसी चुभन, दर्द, दाह (जलन) तथा सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। भगन्दर के पूर्ण रुप से निकलने पर तीव्र वेदना (दर्द), नाड़ियों से लाल रंग का झाग तथा पीव आदि निकलना इसके मुख्य लक्षण हैं।
भोजन और परहेज :
आहार-विहार के असंयम से ही रोगों की उत्पत्ति होती है। इस तरह के रोगों में खाने-पीने का संयम न रखने पर यह बढ़ जाता है। अत: इस रोग में खास तौर पर आहार-विहार पर सावधानी बरतनी चाहिए। इस प्रकार के रोगों में सर्व प्रथम रोग की उत्पति के कारणों को दूर करना चाहिए क्योंकि उसके कारण को दूर किये बिना चिकित्सा में सफलता नहीं मिलती है। इस रोग में रोगी और चिकित्सक दोनों को सावधानी बरतनी चाहिए।
: गुदाभ्रंश के सरल 25 आयुर्वेदिक घरेलु उपचार 
1. सांप की केंचुली : 
सांप द्वारा उतारे गये केंचुली का भस्म (राख) बनाकर इसमें तम्बाकू के गुल को मिलाकर सरसों के तेल के साथ लेप करने से नाड़ी व्रण नष्ट होते हैं तथा रोग में लाभ होता है।
2. कालीमिर्च :
 लगभग 10 कालीमिर्च और खादिर (कत्था) 5 ग्राम मिलाकर पीसकर इसके मिश्रण को भगन्दर पर लगाने से पीड़ा खत्म होती है।
3. आंवला : 
आंवले का रस, हल्दी और दन्ती की जड़ 5-5 ग्राम की मात्रा में लें। और इसको अच्छी तरह से पीसकर इसे भगन्दर पर लगाने से घाव नष्ट होता है।
4. आक :
★ आक का 10 मिलीलीटर दूध और दारुहल्दी का दो ग्राम महीन चूर्ण, दोनों को एक साथ खरलकर बत्ती बनाकर भगन्दर के घावों में रखने से शीघ्र लाभ होता है।
★ आक के दूध में कपास की रूई भिगोकर छाया में सुखा कर बत्ती बनाकर, सरसों के तेल में भिगोकर घावों पर लगाने से लाभ होता है।
5. पुनर्नवा :
★ पुनर्नवा, हल्दी, सोंठ, हरड़, दारुहल्दी, गिलोय, चित्रक मूल, देवदार और भारंगी के मिश्रण को काढ़ा बनाकर पीने से सूजनयुक्त भगन्दर में अधिक लाभकारी होता है। पुनर्नवा शोथ-शमन कारी गुणों से युक्त होता है।
★ पुनर्नवा के मूल को वरुण (वरनद्ध की छाल के साथ काढ़ा बनाकर पीने से आंतरिक सूजन दूर होती है। इससे भगन्दर के नाड़ी-व्रण को बाहर-भीतर से भरने में सहायता मिलती है।
6. खैर :
★ खैर, हरड़, बहेड़ा और आंवला का काढ़ा बनाकर इसमें भैंस का घी और वायविण्डग का चूर्ण मिलाकर पीने से किसी भी प्रकार का भगन्दर ठीक होता है।
★ खैर की छाल और त्रिफले का काढ़ा बनाकर उसमें भैस का घी और वायविडंग का चूर्ण मिलाकर देने से लाभ होता है।
★ खैरसार, 
बायबिडंग, हरड़, बहेड़ा एवं आंवला 10 ग्राम तथा पीपल 20 ग्राम इन सब को कूट पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में शहद और मीठा तेल (धुला तिल का तेल) मिलाकर चाटने से भगन्दर, नाड़ी व्रण आदि ठीक होता है।
7. गूलर : 
गूलर के दूध में रूई का फोहा भिगोंकर, नासूर और भगन्दर के अन्दर रखने और उसको प्रतिदिन बदलते रहने से नासूर और भगन्दर ठीक हो जाता है।
8. भांगरा : 
भांगरा की पुल्टिश बनाकर कुछ दिनों तक लगातार बांधने से थोड़े ही दिनों में भगन्दर शुद्ध होकर भ
9. सहजना (शोभांजनाद) : 
सहजने का काढ़ा बनाकर उस में हींग और सेंधानमक डालकर पीने से लाभ होता है। सहजना (शोभांजनाद) वृक्ष की छाल का काढ़ा भी पीना अधिक लाभकारी होता है।
10. नारियल :
एक नारियल का ऊपरी खोपरा उतारकर फेंक दे और उसका गोला लेकर उस में एक छेद कर दें। उस नारियल को वट वृक्ष के दूध से भरकर उसके छेद दो अंगुल मोटी मिट्टी के लेप से बन्द कर उपले के आग पर पका लें। पक जाने पर लेप हटाकर उसका रस निकालकर उस में 5-6 ग्राम त्रिफला का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से भगन्दर का रोग ठीक हो जाता है।
11.. सुहागा : 
4 ग्राम सुहागा को 60 मिलीलीटर जल के साथ घोलकर पीने से खुजली नष्ट होती है। नासूर में लाभ होता है।
12. सैंधानमक : 
सैंधानमक और शहद की बत्ती बनाकर नासूर में रखने से दर्द में आराम मिलता है।
13. बड़ी माई : 
बड़ी माई का कपड़छन चूर्ण 8 ग्राम, अफीम 2 ग्राम और सफेद वैसलीन 20 ग्राम मिलाकर प्रतिदिन दो से तीन बार गुदा के घाव पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।



14. बरगद : 
बरगद के पत्तें, सोठ, पुरानी ईंट के पाउडर, गिलोय तथा पुनर्नवा मूल का चूर्ण सहभाग लेकर पानी के साथ पीसकर लेप करने से फायदा होता है।
15. त्रिफला : त्रिफला को जल में उबालकर उस जल को छानकर उससे भगन्दर को धोने से जीवाणु नष्ट होते हैं।
16. नीम :
★ नीम की पत्तियां, घी और तिल 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर उसमें 20 ग्राम जौ के आटे को मिलाकर जल से लेप बनाएं। इस लेप को वस्त्र के टुकड़े पर फैलाकर भगन्दर पर बांधने से लाभ होता है।
★ नीम की पत्तियों को पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर की विकृति नष्ट होती है।
★ नीम के पत्ते, तिल और मुलैठी गाढ़ी छाछ में पीसकर दर्द वाले तथा खूनी भगन्दर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।
★ बराबर मात्रा में नीम और तिल का तेल मिलाकर प्रतिदिन दो या तीन बार भगन्दर के घाव पर लगाने से आराम मिलता है।
17. तिल : 
नीम का तेल और तिल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर नासूर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।
18. अंकोल : 
अंकोल का तेल 100 मिलीलीटर और मोम 25 ग्राम लेकर उसे आग पर गर्म करें और उसमें 3 ग्राम तूतिया (नीला थोथा) मिलाकर लेप करने से नाड़ी में उत्पन्न दाने नष्ट हो जाते हैं।
19. अनार :
★ मुट्ठी भर अनार के ताजे पत्ते को दो गिलास पानी में मिलाकर गर्म करें। आधे पानी शेष रहने पर इसे छान लें। इसे उबले हुए मिश्रण को पानी में हल्के गर्मकर सुबह शाम गुदा को सेंके और धोयें। इससे भगन्दर ठीक होता है।
★ अनार की पेड़ की छाल 10 ग्राम लेकर उसे 200 मिलीलीटर जल के साथ आग पर उबाल लें। उबले हुए जल को किसी वस्त्र से छानकर भगन्दर को धोने से घाव नष्ट होते हैं।
20. तिल : तिल, एरण्ड की जड़ और मुलहठी को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर थोड़े-से दूध के साथ पीसकर भगन्दर पर उसका लेप करने से रोग में आराम मिलता है।
21. दारुहल्दी : 
दारुहल्दी का चूर्ण बनाकर उसे आक के दूध के साथ अच्छी तरह से मिलाकर हल्का गर्म कर उसका वर्तिका (बत्ती) बनाकर घावों पर लगाना अधिक लाभकारी होता है।
22. डिटोल : 
डिटोल मिले जल से भगन्दर को अच्छी तरह से साफ करें। इसके बाद उस पर नीम की निबौली लगाने से भगन्दर का घाव नष्ट होता है।
23. फिटकरी :
 भुनी फिटकरी 1-1 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम पानी के साथ पीना चाहिए। कच्ची फिटकरी को पानी में पीसकर इसे रूई की बत्ती में लगाकर भगन्दर के छेद में भर दें। इससे रोग में अधिक लाभ होता है।
24 रस सिंदूर : 
रस सिंदूर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, त्रिफला पिसा 1 ग्राम और एक बायबिण्डग के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम खाना चाहिए।
25. धुआंसा : 
घर का धुआंसा, हल्दी, दारुहल्दी, लोध्र, बच, तिल, नीम के पत्ते और हरड़-इन सबको बराबर मात्रा में लें, और उसे पानी के साथ महीन पीसकर लेप करने से भगन्दर का घाव शुद्ध होकर भर जाता है।
26. अडूसा : 
अडूसे के पत्ते को पीसकर टिकिया बनाकर तथा उस पर सेंधा नमक बुरक कर बांधने से भगन्दर ठीक होता है।
27. गुड़ :
 पुराना गुड़, नीलाथोथा, गन्दा बिरोजा तथा सिरस इन सबको बराबर मात्रा लेकर थोड़े से पानी में घोंटकर मलहम बना लें तथा उसे कपड़े पर लगाकर भगन्दर के घाव पर रखने से कुछ दिनों में ही यह रोग ठीक हो जाता है।
28. हरड़ : 
हरड़, बहेड़ा, आंवला, शुद्ध भैंसा गुग्गुल तथा बायबिडंग इन सब का काढ़ा बनाकर पीने से तथा प्यास लगने पर खैर का रस मिला हुआ पानी पीने से भगन्दर नष्ट होता है।
29 निशोथ :
 निशोथ, तिल, जमालगोटा, मजीठ, और सेंधानमक इनको पीसकर घी तथा शहद में मिलाकर लेप करने से भगन्दर ठीक हो जाता है।
30. सांठी : 
सांठी की जड़, गिलोय, सोंठ, मुलहठी तथा बेरी के कोमल पत्ते, इनको महीन पीसकर इसे हल्का गर्म कर लेप करने से भगन्दर में लाभ होता है।
31. रसौत :
 रसौत, दोनों हल्दी, मजीठ, नीम के पत्ते, निशोथ, तेजबल-इनको महीन पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर ठीक हो जाता है।
32 बिलाई की हाड़ : 


बिलाई की हड्डी (हाड़) को त्रिफला के रस में घिसकर भगन्दर रोग में लगाने से भगन्दर रोग ठीक होता है।
33. गेहूं : 
गेहूं के छोटे-छोटे पौधों के रस को पीने से भगन्दर ठीक होता है।
34 चमेली : 
चमेली के पत्ते, बरगद के पत्ते, गिलोय और सोंठ तथा सेंधानमक को गाढ़ी छाछ में पीसकर भगन्दर पर लगाने से भगन्दर नष्ट होता है।
35. दारुहरिद्रा :
 दारुहरिद्रा का चूर्ण आक (मदार) के दूध के साथ मिलाकर बत्ती बना लें। बत्ती को भगन्दर तथा नाड़ी व्रण पर लगाने से भगन्दर में आराम रहता है।
36. सहोरा (सिहोरा) : 
सहोरा (सिहोरा) के मूल (जड़) को पीसकर भगन्दर में लगाने से रोग ठीक होता है।
37. थूहर : 
थूहर का दूध, आक का दूध और हल्दी मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से रोग ठीक होता है।
38. शहद :
 शहद और सेंधानमक को मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से भगन्दर रोग में आराम मिलता है।
39. मुर्दासंख :
 मुर्दासंख को पीसकर भगन्दर के सूजन पर लगाने से सूजन खत्म होती है।
40  पिठवन :
★ पिठवन के 8-10 पत्तों को पीसकर लेप करने से भगन्दर के रोग में बहुत लाभ होता है।
★ लगभग 10 मिलीलीटर पिठवन के पत्तों के रस को नियमित कुछ दिनों तक सेवन करने से भगन्दर रोग नष्ट हो जाता है।
★ पिठवन में थोड़ा सा कत्था मिलाकर पीसकर लेप करने से या कत्था तथा कालीमिर्च को बराबर मात्रा में मिलाकर पीसकर रोगी को पिलाने से भगन्दर के रोग में लाभ मिलता होता है।
41. लता करंज :
★ लगभग आधा ग्राम से 2 ग्राम करंज के जड़ की छाल का दूधिया रस की पिचकारी भगन्दर में देने से भगन्दर जल्दी भर जाता है।
दूषित कीडे़ से भरे भगन्दर के घावों पर करंज के पत्तों की पुल्टिस बनाकर बांधें अथवा कोमल पत्तों का रस 10-42 ग्राम की मात्रा में निर्गुण्डी या नीम के पत्तों के रस में मिलाकर कपास के फोहे से भगन्दर के व्रण (घाव) पर बांधें या नीम के पत्ते का रस में कपास का फोहा तर कर घाव पर लगाने से रोग में आराम मिलता है।
★ करंज के पत्ते और निर्गुण्डी या नीम के पत्ते को पीसकर पट्टी बनाकर भगन्दर पर बांधने से या पत्तों को कांजी में पीसकर गर्म लेप बनाकर लेप करने से रोग में आराम मिलता है।
★ भगन्दर पर करंज के पत्तों को बांधने से भगन्दर रोग में लाभ होता है।
★ करंज के मूल (जड़) का रस प्रतिदिन दो से तीन बार लगाने से भगन्दर का पुराना जख्म ठीक होता है।
43 गुग्गुल :
★ गुग्गुल और त्रिफला का चूर्ण 10-10 ग्राम को जल के साथ पीसकर हल्का गर्म करें। इस लेप को भगन्दर पर लगाने से लाभ होता है।
★ शुद्ध गुग्गल 50 ग्राम, त्रिफला पिसा 30 ग्राम और पीपल 15 ग्राम लेकर इसे कूट-छानकर इसे पानी के साथ मिलाकर, इसके चने के बराबर गोलियां बना लें। इन गोलियों को छाया में सूखाकर लगातार 15-20 दिन तक इसकी 1-1 गोलियां सुबह-शाम खायें। इससे भगन्दर ठीक होता है।
44. छोटी अरणी : छोटी अरणी के पत्तों को जल द्वारा घुले मक्खन के साथ मिलाकर पीसकर इसका मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण को रोग पर लेप करने से अधिक लाभ होता है।
45. अग्निमथ (छोटी अरणी) : अग्निमथ की जड़ को जल में उबालकर काढ़ा बनाकर इसके 15 ग्राम काढ़े में 5 ग्राम शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से भगन्दर नष्ट होता है।




15.10.17

अगर करेंगे ये उपाय तो सारी रात संबंध बनाना चाहेंगे


*कई बार लोगो के मन में संकोच और दुविधा के चलते वे बेहतर संबंध का आनंद नहीं उठा पाते और उनके हाथ निराशा लगती है। जिससे वे परेशान हो जाते है। इसी कड़ी में हम आपको पांच ऐसे तरीके बता रहे है जिससे आप चरम संबंध का आनंद उठा सकते है।
*बिस्‍तर पर महिला साथी के साथ आंखों में आंखें डालकर प्‍यार जताना, होठों को संवेदनशील अंगों पर फिराना, नाजुक अंगों का स्‍पर्श भी महिलाओं का मन मचलने के लिए काफी होता है। संबंध के दौरान अगर आप तकिये का प्रयोग करते हैं तो इससे आपकी महिला साथी को बेहद आनंद आएगा वह भी तब जब संभोग के दौरान आप तकिये को नीचे रख कर करें।
*बिना जल्दबाजी किये कम से कम एक मिनट एक दूसरे की आंखों में एकटक देखने की कोशिश करें। साथ ही एक दूसरे के लिए प्यार को महसूस करें। उसके बाद आंखों ही आंखों में इशारा करके अगली स्टेप के लिए तैयार हो जाएं।
*संबंध के समय एक दूसरे को करीब से थामे जिससे वह पूरी तरह उत्तेजित हो सके।एक दूसरे के शरीर इतने ने करीब लाएं कि दोनों को ही गर्मी का अहसास होने लगे। ताकि बाद में किसी तरह की समस्या ना खड़ी हो सके।
*संबंध के दौरान आपकी महिला साथी उम्मीद करती हैं की आप उनके शरीर के बेहद कोमल अंगों को शुरुआती दौर में जीभ व उंगलियों का इस्‍तेमाल करके जरूरी उत्तेजना पैदा करें।



वृक्क शोथ के आयुर्वेदिक घरेलू उपाय


तीव्र वृक्क शोथ होने का कारण क्या है
जीवाणु संक्रमण या कभी-कभी स्वतः ही शरीर में उत्पन्न एलर्जी के कारण वृक्कों के धमनी गुच्छो में सृजन आ जाती है, जिससे मूत्र का निस्पंदन (छानने की क्रिया) कम हो जाती है। इस रोग में मूत्र कम निकलता है तथा एलब्यूमिन के साथ- साथ रक्तकण व धमनी गुच्छो के बहिस्तर की कोशिकाएं (इपीथीलियल सैल) भी मूत्र के साथ बाहर निकलने लगती हैं। इस रोग में वृक्कों की मूत्रस्राविणी नलिकाओं तथा रक्तवाहिनियों में प्रायः कोई विकृति नहीं होती । यह 10 वर्ष की आयु में अधिक होता है और लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में अधिक होता है। बच्चों में लंबे समय तक गला खराब होने के बाद इस रोग की संभावना बढ़ जाती है।



तीव्र वृक्क शोथ के लक्षण क्या है-

रोगी के शरीर विशेष कर चेहरे व पांवों पर सूजन होती है। पहले चार-पांच दिन 100° फारेनहाइट तक हलका बुखार रहता है। पेट में दर्द, उलटी, जी मिचलाना, सांस लेने में कष्ट होना आदि लक्षण मिल सकते हैं।
तीव्र वृक्क शोथ का घरेलू चिकित्सा-
* उपवास इस रोग की चिकित्सा का प्रमुख सिद्धांत है। भोजन न करने से वृक्कों पर कार्य का भार घट जाता है जिससे आराम जल्दी मिलता है। यदि पूर्णतः उपवास सम्भव न हो तो पहले 3 दिन में दो-तीन बार आधा-आधा गिलास पानी, नीबू, ग्लूकोज आदि डालकर ले सकते हैं। जैसे-जैसे पेशाब की मात्रा बढ़ाते जाए, पेय पदार्थों की मात्रा बढ़ाते जाएं। ठोस आहार स्वास्थ्य में पर्याप्त सुधार के बाद ही शुरू करें। इसके अलावा निम्नलिखित उपचार दे सकते हैं
*मक्के के भुट्टे के 20 ग्राम बाल पाव भर पानी में उबालें, आधा रह जाने पर उतार कर गुनगुना पी लें। सुबह-शाम यह एक-एक की मात्रा में लें।
*आक के पत्तों को सुखाकर व जलाकर राख कर लें। आधा चम्मच यह राख थोड़ा-सा नमक मिलाकर एक गिलास छाछ में मिलाकर सुबह-शाम लें।
तीव्र वृक्क शोथ का आयुर्वेदिक औषधियां द्वारा इलाज-
बंग भस्म, पुनर्नवा मंडूर, स्वर्ण वसन्त मालती रस, चन्दनासव, देवदार्वाद्यारिष्ट, चन्द्रप्रभा वटी आदि आयुर्वेदिक दवाएं इस रोग में ली जा सकती हैं।



14.10.17

फ्रीज में रखा आटा भूत-प्रेत को बुलाता है?



    फ्रीज में रखा आटा भूत-प्रेत को बुलाता है| अगर आप फ्रीज में आटा रखते हैं तो मृतात्मा आपके घर आ सकती है फ्रीज में गूंथा आटा आपका समय तो बचा सकता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह आपके
घर में गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की वृत्ति बन जाती है तब भूत इस पिंड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो मृत्यु के बाद पिंड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और प्रेत फ्रीज में रखे इस पिंड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते हैं।
जिन परिवारों में भी इस प्रकार की आदत है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में रोग और परेशानियों से घिरा रहता है।


ऐसी अन्धविश्वास वाली बाते हमारे भारत में ही प्रचलित है
वैसे हमे लगता है अक्सर गृहणियों की आदात होती है कि वह आटा बच जाने पर उसे फ्रिज में रख देती है ताकि बाद में उपयोग कर सके. कभी कभी तो आटा गलती से बच जाता है लेकिन कुछ लोग तो इतने आलसी होते है कि दिन में दो बार आटा ना गूंथना पड़े तो ढेर सार आटा गूंथ कर फ्रिज में पटक देते है. लेकिन क्या एस करना सेहत मंद होता है?
विशेषज्ञों कि माने तो आटा भिगोते ही तुरंत इस्तेमाल करना चाहिए वरना उसमे ऐसे रासायनिक बदलाव आते है जो सेहत के लिए बहुत हानिकारक हो सकते है. ऐसा आयुर्वेद में भी स्पष्ट कहा गया है . इसलिए फ्रिज का इस्तेमाल आटा रखने के लिए ना करे. कुछ ही दिन में ऐसी आदत बन जायेगी की जितनी रोटियाँ लगती है उतना ही आटा भिगोया जाए और इसमें ज़्यादा समय भी नहीं लगता. ताज़े आटे की रोटियाँ ज़्यादा स्वादिष्ट और पौष्टिक होती है और आपकी सेहत पर भी कोई बुरा असर नहीं पड़ता. अगर आटा खमीरा हो जाए ओर जयादा पुराना हो तो उसे न खाए|




12.10.17

हड्डियों को फौलाद की तरह ताकतवर बनाने का नुस्खा // Bone recipe





हड्डियों की कमजोरी दूर कर शरीर को मजबूत बनाता है यह विशेष प्रयोग
हड्डियॉ शरीर की मजबूती का आधार होती हैं जो शरीर का धारण करती हैं । किंतु यदि हड्डियॉ ही कमजोर हो तो शरीर के मजबूत होने की कल्पना भी नही की जा सकती है । प्रस्तुत है हड्डियों को फौलाद की तरह ताकतवर बनाने का नुस्खा -
जरूरी सामग्री :-
1 :- अश्वगंधा चूर्ण 100 ग्राम
2 :- शतावरी चूर्ण 100 ग्राम
3 :- पुराना गुड़ 300 ग्राम
4 :- हल्दी चूर्ण 100 ग्राम
5 :- शुद्ध शहद 100 ग्राम
बनाने की विधि :-
ऊपर लिखी गयी सभी सामग्री में से शहद को छोड़कर बाकि सभी सामान को इमामदस्ते में हल्के हल्के एक साथ कूट लें । लगभग 10 मिनट कूटने के बाद आपको एक गाढ़ा पेस्ट जैसा प्राप्त होगा । अब इसमें शहद को मिलाकर एक चमचे से बहुत अच्छी तरह से मिला दें । ध्यान दें यह बहुत महत्तवपूर्ण स्टेप है । शहद सम्पूर्ण मिश्रण में एक समान घुल जाना चाहिये । ऐसा करने से अन्त में एक चटनी जैसी आपके पास बचेगी, बस यही आपका नुस्खा है । इसको साफ काँच की चौड़ी मुँह वाली शीशी या मर्तबान आदि में भर लें ।
सेवन विधी :-.
ऊपर दी गयी मात्रा में सामान लेकर बनाने पर एक बड़े इन्सान के लिये यह महीने भर का नुस्खा तैयार होता है । इसका सेवन एक एक चम्मच रोज सुबह और शाम को करना है । इसके साथ चाहे तो गाय के दूध को गुनगुना गरम करके पिया जा सकता है । छोटे बच्चों को उम्र के हिसाब से आधा अथवा चौथाई चम्मच सेवन करवाया जा सकता है । प्रसूता स्त्री के लिये प्रसव के 2 सप्ताह बाद से यह बहुत उत्तम सेवनीय है ।
विशेष -
अश्वगंधा और शतावरी का चूर्ण आपको अपने आसपास किसी जड़ी-बूटी वाले के पास अथवा आयुर्वेदिक दवाओं की दुकान पर आसानी से मिल जायेगा । इस नुस्खे को हर महीने केवल एक महीने के लिये तैयार करना उचित रहता है । इक्ट्ठा बना कर नही रखना चाहिये । इस प्रयोग को लागातार चार से छः महिने सेवन करने से यह बहुत अच्छे लाभ देता है ।



11.10.17

स्तनों का दूध बढ़ाने के उपाय //How to increase breast milk?





जब आप अपने शिशु को स्तनपान कराना शुरु करती हैं, तो दूध की आपूर्ति को लेकर चिंतित होना एक सामान्य बात है।
यह चिंता करने वाली आप अकेली नहीं हैं। और भी बहुत सी ऐसी माएं हैं, जिन्हें अपने दूध की मात्रा के साथ-साथ इस बात कि चिंता रहती है कि बढ़ती जरुरतों की पूर्ति के लिए शिशु को पर्याप्त दूध मिल पा रहा है या नहीं।
शिशु का वजन बढ़ना और अपनी उम्र के अनुसार उसका सही विकास, इस बात का सर्वोत्तम संकेत है कि आप पर्याप्त दूध का उत्पादन कर रही हैं। शुरुआत के कुछेक दिनों में नवजात का वजन घटना सामान्य है, लेकिन जन्म के तीन से पांच दिन बाद फिर से उसका वजन बढ़ने लगता है। आमतौर पर, जब शिशु 14 दिन का हो जाता है, तो उसका वजन फिर से उतना ही हो जाता है, जितना कि जन्म के समय था।
नीचे कुछ और संकेत भी दिए गए हैं, जिनसे पता चल सकता है कि शिशु मिलने वाली दूध की मात्रा से संतुष्ट है। जैसे:
स्तनपान कराना आरामदायक है और इस दौरान आपको कोई दर्द महसूस नही होता
आपका नवजात दिन में छह से आठ बार स्तनपान कर रहा है और स्तनपान के बाद वह संतुष्ट दिखता है
स्तनपान कराने के बाद आपके स्तन खाली और मुलायम लगते हैं
स्तनपान करते हुए आप शिशु को दूध निगलते हुए देख व सुन सकती हैं
आपका शिशु स्तनपान समाप्त करने के बाद स्वयं ही स्तन से हट जाता है
आपका शिशु 24 घंटे में कम से कम सात बार पेशाब कर रहा है। उसका मल पीला और ढेलेदार है, जो कि फटे हुए दूध के समान दिखता है। हो सकता है कि अनन्य स्तनपान करने वाले शिशु एक दिन में बहुत बार या फिर पांच दिन में एक बार मल त्याग करें। दोनों ही स्थितियां एकदम सामान्य हैं।
कम स्तन दूध आपूर्ति की आशंका वाले ज्यादातर मामलों में असली समस्या यह नहीं होती कि आप कितने दूध का उत्पादन कर पा रही हैं। बल्कि समस्या यह होती है कि आपका शिशु कितना दूध पीने में सक्षम है। सुनिश्चित करें कि शिशु स्तन को सही ढंग से मुंह में ले, ताकि आपके पास जितना दूध है, उसे वह कुशलतापूर्वक निकाल सके।
स्तन दूध की ज्यादा आपूर्ति बनाने और उसे जारी रखने के लिए शिशु को बार-बार और जब वह चाहे तब स्तनपान कराना महत्वपूर्ण है। अगर, आपका नवजात काफी अधिक सोता है, तो हो सकता है आपको उसे नींद से जगाकर ज्यादा बार स्तनपान करने के लिए सौम्यता से प्रोत्साहित करना पड़े। यह आपके स्तनों को और अधिक दूध उत्पादित करने के लिए उत्प्रेरित करेगा।
आपका शरीर मांग के अनुसार आपने दूध के उत्पादन में बदलाव करता रहता है। इसलिए, यदि आप शिशु को स्तन दूध की बजाय डिब्बाबंद दूध या अन्य अनुपूरक (सप्लीमेंट) देना शुरु करती हैं, तो आपके दूध की आपूर्ति कम हो जाएगी। आप शिशु को जितना अधिक स्तनपान कराएंगी, आपका शरीर उतना ज्यादा दूध का उत्पादन करेगा।
अगर, आपको लगता है कि आप पर्याप्त स्तनदूध नहीं बना पा रहीं हैं या फिर आप शिशु के वजन को लेकर चिंतित हैं, तो इस बारे में डॉक्टर से बात करना सर्वोत्तम है। वह ही आपको जरुरी सलाह या उपचार दे पाएंगी।
यह एक आम धारणा है कि कुछ विशेष खाद्य पदार्थ स्तन दूध का उत्पादन बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। मगर, सच्चाई यह है कि इस बारे में बहुत कम अनुसंधान उपलब्ध है और जो थोड़े-बहुत शोध उपलब्ध हैं भी, वे इतने विश्वसनीय नहीं है कि उनके आधार पर कोई निर्णय लिया जा सके। यहां कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों के बारे में बताया गया है, जिन्हें आमतौर पर स्तन दूध उत्पादन बढ़ाने में सहायक माना जाता है। इनकी प्रभावशीलता के बारे में हमारें पास जो जानकारी उपलब्ध है, वह नीचे दी गई है।


कौन से भोजन स्तनदूध आपूर्ति बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं?

हालांकि, इस बारे में बहुत सीमित शोध उपलब्ध है और कुछ मामलों में तो इन पदार्थों की प्रभावशीलता प्रमाणित करने के लिए कोई वैज्ञानिक शोध भी उपलब्ध नहीं है। मगर, ये खाद्य पदार्थ कई पीढ़ियों से स्तनपान कराने वाली माताओं को दिए जाते रहे हैं और बहुत सी माताएं यह मानती भी हैं कि इन खाद्य पदार्थों से उन्हें मदद मिली है।
याद रखें कि इन सभी खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में संतुलित आहार के हिस्से के तौर पर किया जाना चाहिए। कोई भी जड़ी-बूटी (हर्बल) वाला या प्राकृतिक अनुपूरक (सप्लीमेंट) डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लें।
मेथी के बीज
दूध की आपूर्ति बढ़ाने के लिए मेथी के बीजों का इस्तेमाल विश्व भर में कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। इस प्राचीन धारणा के समर्थन के लिए कुछ शोध उपलब्ध है, मगर ये इसकी प्रभावशीलता प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
मेथी के बीजों में ओमेगा-3 वसा जैसे स्वस्थ विटामिन होते हैं, जो स्तनपान कराने वाली माँ के लिए अच्छे रहते हैं। ओमेगा-3 वसा शिशु के मस्तिष्क विकास के लिए महत्वपूर्ण है। मेथी के साग में बीटाकैरोटीन, बी विटामिन, आयरन और कैल्श्यिम भरपूर मात्रा में होते है।
मेथी की चाय नई मांओं को दिया जाने वाला एक लोकप्रिय पेय है। मेथी वैसे भी कई व्यंजनों में डाली जा सकती है, विशेषकर सब्जियों और मांस के व्यंजनों में। इसे आटे में मिलाकर परांठे, पूरी या भरवां रोटी भी बनाई जा सकती है।
मेथी, पौधों के उसी वर्ग से संबंध रखती है, जिसमें मूंगफली, छोले और सोयाबीन के पौधे भी शामिल हैं। इसलिए, अगर आपको इनमें से किसी के भी प्रति एलर्जी है, तो आपको मेथी से भी एलर्जी हो सकती है।
सौंफ
सौंफ भी स्तन दूध की आपूर्ति बढ़ाने का एक अन्य पारंपरिक उपाय है। शिशु को गैस और पेट दर्द की परेशानी से बचाने के लिए भी नई माँ को सौंफ दी जाती है। इसके पीछे तर्क यह है कि पेट में गड़बड़ या पाचन में सहायता के लिए वयस्क लोग सौंफ का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए स्तनदूध के जरिये सौंफ के फायदे शिशु तक पहुंचाने के लिए यह नई माँ को दी जाती है। हालांकि, इन दोनों धारणाओं के समर्थन के लिए कोई शोध उपलब्ध नहीं है, मगर बहुत सी माताएं मानती हैं कि सौंफ से उन्हें या उनके शिशु को फायदा मिला है।
सौंफ का पानी और सौंफ की चाय प्रसव के बाद एकांतवास के पारंपरिक पेय हैं।
लहसुन
लहसुन में बहुत से रोगनिवारक गुण पाए जाते हैं। यह प्रतिरक्षण प्रणाली को फायदा पहुंचाता है और दिल की बीमारियों से बचाता है। इसके साथ-साथ लहसुन स्तन दूध आपूर्ति को बढ़ाने में भी सहायक माना गया है। हालांकि, इस बात की प्रमाणिकता के लिए कोई ज्यादा शोध उपलब्ध नहीं है।
अगर, आप बहुत ज्यादा लहसुन खाती हैं, तो यह आपके स्तनदूध के स्वाद और गंध को प्रभावित कर सकता है। एक छोटे अध्ययन में पाया गया कि जिन माताओं ने लहसुन खाया था, उनके शिशुओं ने ज्यादा लंबे समय तक स्तनपान किया। यानि कि हो सकता है शिशुओं को स्तन दूध में मौजूद लहसुन का स्वाद पसंद आए। हालांकि, यह अध्ययन काफी छोटे स्तर पर था और इससे कोई सार्थक परिणाम नहीं निकाले जा सकते। वहीं, कुछ माएं यह भी कहती हैं कि अगर वे ज्यादा लहसुन का सेवन करती हैं, तो उनके शिशुओं में पेट दर्द हो जाता है।
लहसुन का दूध प्रसव के बाद स्तनपान कराने वाली मांओं को दिया जाने वाला एक लोकप्रिय पारंपरिक पेय है।
हरी पत्तेदार सब्जियां
हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी, सरसों का साग और बथुआ आदि आयरन, कैल्श्यिम और फोलेट जैस खनिजों का बेहतरीन स्त्रोत हैं। इनमें बीटाकैरोटीन (विटामिन ए) का एक रूप और राइबोफ्लेविन जैसे विटामिन भी भरपूर मात्रा में होते हैं। इन्हें भी स्तन दूध बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
स्तनपान कराने वाली मांओं को प्रतिदिन एक या दो हिस्से हरी पत्तेदार सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है। आप इन सब्जियों को मसालों के साथ पका सकती हैं या फिर थेपला, विभिन्न सब्जियां डालकर पोहा या इडली जैसे नाश्ते भी बना सकती हैं।
जीरा
दूध की आपूर्ति बढ़ाने के साथ-साथ माना जाता है कि जीरा पाचन क्रिया में सुधार और कब्ज, अम्लता (एसिडिटी) और पेट में फुलाव से राहत देता है। जीरा बहुत से भारतीय व्यंजनों का अभिन्न अंग है और यह कैल्शियम और राइबोफ्लेविन (एक बी विटामिन) का स्त्रोत है।
आप जीरे को भूनकर उसे स्नैक्स, रायते और चटनी में डाल सकते हैं। आप इसे जीरे के पानी के रूप में भी पी सकती हैं।



तिल के बीज

तिल के बीज कैल्शियम का एक गैर डेयरी स्त्रोत है। स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए कैल्शियम एक जरुरी पोषक तत्व है। यह आपके शिशु के विकास के साथ-साथ आपके स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। शायद इसलिए ही यह स्तनपान कराने वाली माताओं के आहार में शामिल की जाने वाली सदियों पुरानी सामग्री है।
आप तिल के लड्डू खा सकती हैं या फिर काले तिल को पूरी, खिचड़ी, बिरयानी और दाल के व्यंजनों में डाल सकती हैं। कुछ माएं गज्जक व रेवड़ी में सफेद तिल इस्तेमाल करना पसंद करती हैं।
तुलसी
तुलसी की चाय स्तनपान कराने वाली मांओं का एक पारंपरिक पेय है। किसी शोध में यह नहीं बताया गया कि तुलसी स्तन दूध उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, मगर माना जाता है कि इसका एक शांतिदायक प्रभाव होता है। यह मल प्रक्रिया को सुधारती है और स्वस्थ खाने की इच्छा को बढ़ावा देती है।
मगर, अन्य जड़ी-बूटियों की तरह ही तुलसी का सेवन भी सीमित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।
सुवा
सुवा के पत्ते आयरन, मैग्निशियम और कैल्श्यिम का अच्छा स्त्रोत हैं। माना जाता है कि सुवा स्तन दूध आपूर्ति में सुधार, पाचन क्रिया व वात में आराम और नींद में सुधार करता है। सुवा हल्का मूत्रवर्धक भी होता है, इसलिए इसका सीमित सेवन किया जाना चाहिए।
आप सुवा के बीज साबुत या उन्हें पीस कर अचार, सलाद, चीज़ स्प्रेड और तरी या सालन में डाल सकती हैं। सुवा की चाय प्रसव के बाद दिया जाने वाला एक लोकप्रिय पेय है।
लौकी व तोरी जैसी सब्जियां
पारंपरिक तौर पर माना जाता है कि लौकी, टिंडा और तोरी जैसी एक ही वर्ग की सब्जियां स्तन दूध की आपूर्ति सुधारने में मदद करती हैं। ये सभी सब्जियां न केवल पौष्टिक एवं कम कैलोरी वाली हैं, बल्कि ये आसानी से पच भी जाती हैं।
दालें व दलहनें
दालें, विशेषकर कि मसूर दाल, न केवल स्तन दूध की आपूर्ति बढ़ाने में सहायक मानी जाती हैं, बल्कि ये प्रोटीन का भी अच्छा स्त्रोत होती हैं। इनमें आयरन और फाइबर भी उच्च मात्रा में होता है।
मेवे
माना जाता है कि बादाम और काजू स्तन दूध के उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। इनमें भरपूर मात्रा में कैलोरी, विटामिन और खनिज होते हैं, जिससे ये नई माँ को ऊर्जा व पोषक तत्व प्रदान करते हैं। इन्हें स्नैक्स के तौर पर भी खाया जा सकता है और ये हर जगह आसानी से उपलब्ध होते हैं।
आप इन्हें दूध में मिलाकर स्वादिष्ट बादाम दूध या काजू दूध बना सकती हैं। स्तनपान कराने वाली माँ के लिए पंजीरी, लड्डू और हलवे जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ बनाने में मेवों का इस्तेमाल किया जाता है।



जई और दलिया

जई आयरन, कैल्शियम, फाइबर और बी विटामिन का बेहतरीन स्त्रोत होता है और स्तनपान कराने वाली मांओं के बीच ये काफी लोकप्रिय है। पारंपरिक तौर पर जई को चिंता व अवसाद कम करने में सहायक माना जाता है।
इन्हें आमतौर पर दलिये की तरह ही खाया जाता है। इसका पौष्टिक मूल्य बढ़ाने के लिए आप इसमें मेवे, दूध, मसाले या फल भी डालकर खा सकती हैं।
क्या मुझे पर्याप्त स्तनदूध बनाने के लिए अधिक खाने-पीने की जरुरत है?
यह दो बातों पर निर्भर करता है। एक तो यह कि गर्भवती होने से पहले आपका बीएमआई सामान्य था या नहीं और दूसरी यह कि गर्भावस्था के दौरान आपका वजन कितना बढ़ा।
अगर, गर्भवती होने से पहले आपका वजन कम या सामान्य था, तो स्तनपान के दौरान कैलोरी की जरुरत पूरा करने के लिए आपको थोड़ा अधिक भोजन खाने की सलाह दी जा सकती है। वहीं दूसरी तरफ, यदि आपका वजन गर्भावस्था से पहले ज्यादा था और गर्भावस्था के दौरान भी आपका अपेक्षित वजन बढ़ा है, तो हो सकता है आपको कैलोरी की बिल्कुल भी आवश्यकता न हो। आपको अतिरिक्त कैलोरी की जरुरत है या नहीं, इस बारे में आपकी डॉक्टर ही बेहतर बता सकेंगी।
सामान्य सिफारिश यही है, कि आप अपनी भूख के अनुसार चलें और जब भी भूख लगे, खाना खाएं। आपका शरीर दूध का उत्पादन करने में काफी कुशल होता है। हो सकता है गर्भावस्था के दौरान शरीर ने वसा संग्रहित करके रखी हो, जिसका इस्तेमाल स्तन दूध के उत्पादन में किया जा सकता है।
स्तनपान के दौरान आपको पानी केवल अपनी प्यास बुझाने के लिए ही पीने की जरुरत है। अत्याधिक पानी पीने या प्यासे रहने से आपके दूध की आपूर्ति पर असर नहीं पड़ता है। आपका शरीर जरुरी तत्वों का नियमित संग्रहण करने में काफी सक्षम होता है, ताकि वह आपकी दूध की आपूर्ति को बनाए रख सके।
हालांकि, इस बात पर ध्यान दें कि स्तनपान के दौरान आपका शरीर ऑक्सीटोसिन हार्मोन निकालता है, जिसकी वजह से आपको अधिक प्यास लगती है। इसलिए, स्तनपान कराते समय पानी का गिलास अपन साथ ही रखें।
आपने गर्भावस्था के दौरान जिस स्वस्थ आहार योजना का पालन किया था, उस स्वस्थ और विभिन्न किस्म के आहार का सेवन आपको अब भी जारी रखना चाहिए। इससे आपको अपनी और शिशु की जरुरत के सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल जाएंगे। हालांकि, स्तनपान कराने वाली माँ को रोजाना आयरन, फॉलिक एसिड, विटामिन बी और कैल्शियम के अनुपूरक (सप्लीमेंट) लेने की सलाह दी जाती है। आपके आहार के बारे में जानने के बाद डॉक्टर आपके लिए उचित अनुपूरक की सलाह देंगी और बताएंगी कि आपको इनकी कितनी खुराक लेनी चाहिए।
क्या स्तनों की मालिश से दूध के उत्पादन में मदद मिलती है?
स्तनों की मालिश करने से दूध के उत्पादन की मात्रा नहीं बढ़ती है। मगर, इससे अवरुद्ध नलिकाओं को खोलने, नसों के गुच्छे या गांठों और सख्त हिस्सों को ढीला करने में मदद मिल सकती है। साथ ही इससे स्तनों की सूजन का खतरा भी कम रहता है।
हालांकि, स्तनों की मालिश हल्के हाथों से की जानी चाहिए। स्तनों पर बलपूर्वक मालिश करने से नलिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे स्तनों से दूध बाहर निकल सकता है। बेहतर है कि स्तनों की मालिश आप अपने आप ही करें, क्योंकि इन पर कितना दबाव डालना है, यह आपसे बेहतर कोई नहीं बता सकता।




वात रोग ,गठिया,संधिवात के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार // Ayurvedic Remedies of Vat diseases,gout ,Arthritis




वात, पित्त और कफ तीनों में से वात सबसे प्रमुख होता है क्योंकि पित्त और कफ भी वात के साथ सक्रिय होते हैं। शरीर में वायु का प्रमुख स्थान पक्वाशय में होता है और वायु का शरीर में फैल जाना ही वात रोग कहलाता है। हमारे शरीर में वात रोग 5 भागों में हो सकता है जो 5 नामों से जाना जाता है।
वात के पांच भाग निम्नलिखित हैं-
1 उदान वायु - यह कण्ठ में होती है।
2 अपान वायु - यह बड़ी आंत से मलाशय तक होती है।
3 प्राण वायु - यह हृदय या इससे ऊपरी भाग में होती है।
4 व्यान वायु - यह पूरे शरीर में होती है।
5 मान वायु - यह आमाशय और बड़ी आंत में होती है।
वात रोग के प्रकार :-
आमवात के रोग में रोगी को बुखार होना शुरू हो जाता है तथा इसके साथ-साथ उसके जोड़ों में दर्द तथा सूजन भी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगियों की हडि्डयों के जोड़ों में पानी भर जाता है। जब रोगी व्यक्ति सुबह के समय में उठता है तो उसके हाथ-पैरों में अकड़न महसूस होती है और जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है। जोड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने से रोगी के शरीर के अंगों की आकृति बिगड़ जाती है।

सन्धिवात-
जब आंतों में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तो शरीर की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द तथा अकड़न होने लगती है।



गाउट :-

गाउट रोग बहुत अधिक कष्टदायक होता है। यह रोग रक्त के यूरिक एसिड में वृद्धि होकर जोड़ों में जमा होने के कारण होता है। शरीर में यूरिया प्रोटीन से उत्पन्न होता है, लेकिन किसी कारण से जब यूरिया शरीर के अंदर जल नहीं पाता है तो वह जोड़ों में जमा होने लगता है और बाद में यह पथरी रोग का कारण बन जाता है।

मांसपेशियों में दर्द-
मांस रोग के कारण रोगी की गर्दन, कमर, आंख के पास की मांस-पेशियां, हृदय, बगल तथा शरीर के अन्य भागों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण रोगी के शरीर के इन भागों में दर्द होने लगता है। जब इन भागों को दबाया जाता है तो इन भागों में तेज दर्द होने लगता है।

गठिया-
इस रोग के कारण हडि्डयों को जोड़ने वाली तथा जोड़ों को ढकने वाली लचीली हडि्डयां घिस जाती हैं तथा हडि्डयों के पास से ही एक नई हड्डी निकलनी शुरू हो जाती है। जांघों और घुटनों के जोड़ों पर इस रोग का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण इन भागों में बहुत तेज दर्द होता है।
वात रोग के लक्षण-
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में खुश्की तथा रूखापन होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की त्वचा का रंग मैला सा होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति को अपने शरीर में जकड़न तथा दर्द महसूस होता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के सिर में भारीपन होने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लगता है तथा उसका पेट भारी-भारी सा लगने लगता है।
• रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द रहता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के जोड़ों में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का मुंह सूखने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी को डकारें या हिचकी आने लगती है।
वात रोग होने का कारण -



1.जब अपच के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है और अजीर्ण के कारण कब्ज होता है तथा इन सबके कारण गैस बनती है तो वात रोग पैदा हो जाता है।

2.ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
3.पेट में गैस बनना वात रोग होने का कारण होता है।
4.भोजन करने के बाद भोजन के ठीक तरह से न पचने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
5॰जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।

6॰ जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।
7. वात रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पक्वाशय, आमाशय तथा मलाशय में वायु का भर जाना है। 
वात रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
1. वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को एक टब में गरम पानी लेकर उसमें आधा चम्मच नमक डाल लेना चाहिए। इसके बाद जब टब का पानी गुनगुना हो जाए तब रोगी को टब के पास एक कुर्सी लगाकर बैठ जाना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को अपने पैरों को गरम पानी के टब में डालना चाहिए और सिर पर एक तौलिये को पानी में गीला करके रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अपनी गर्दन के चारों ओर कंबल लपेटना चाहिए। इस प्रकार से इलाज करते समय रोगी व्यक्ति को बीच-बीच में पानी पीना चाहिए तथा सिर पर ठंडा पानी डालना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी को कम से कम 20 मिनट में ही शरीर से पसीना निकलने लगता है जिसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वात रोग ठीक होने लगता है।
2॰ वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए 2 बर्तन लें। एक बर्तन में ठंडा पानी लें तथा दूसरे में गरम पानी लें और दोनों में 1-1 तौलिया डाल दें। 5 मिनट बाद तौलिये को निचोड़कर गर्म सिंकाई करें। इसके बाद ठंडे तौलिये से सिंकाई करें। इस उपचार क्रिया को कम से कम रोजाना 3 बार दोहराने से यह रोग ठीक होने लगता है।



3. वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए। इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।

4. कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।
5. वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है। 
6॰ वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। फिर इसके बाद इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।
7. रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए। इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। 
8.कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।

9.वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए।
10.शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है।
11.रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है।
विशिष्ट परामर्श-  


संधिवात,,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द रहित सक्रियता  हासिल  करते  हैं |दुर्लभ जड़ी -बूटियों से निर्मित औषधि  के लिये  98267-95656 पर संपर्क करने की सलाह दी जाती है|



10.10.17

तकिया लेकर सोना भी हानिकारक है



रात की नींद
रात की नींद किसे प्यारी नहीं होती? एक आरामदायक बिस्तर, सॉफ्ट तकिया और कमरे में आंखों को परेशान करने वाली कोई रोशनी ना आ सके... बस कुछ ऐसा ही वातावरण जब हमें मिल जाता है तो हम चैन की नींद सोते हैं। बहुत से लोग हैं जिन्हें बगैर चादर ओढ़े नींद नहीं आती, फिर बेशक गर्मी का मौसम ही क्यों ना हो।
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कुछ भी हो जाए, किंतु बिना तकिये के सोते नहीं हैं। उन्हें एक तकिया तो सोने से पहले अपने सिर के नीचे चाहिए ही चाहिए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे सिर एवं गर्दन को आराम देने वाला यह तकिया हमें कई नुकसान भी देता है?
तकिया लेकर सोने के नुकसान
एक रिसर्च के मुताबिक सिर तले तकिया लेकर सोने से हमें कई शारीरिक एवं मानसिक दिक्कतें होती हैं। पहली बात तो यह कि कई बार तकिये की गलत पोज़ीशन या फिर गलत हाइट की वजह से गर्दन पर ज़ोर पड़ता है। इससे हम रात भर सोने के बाद सुबह उठने पर खुद को तरो-ताज़ा महसूस नहीं करते, जो हमारे मानसिक तनाव का कारण बनता है।
नुकसान
यह दो कारण तो शायद आप पहले से जानते भी हों, लेकिन इसके अलावा तकिया लेकर सोने की जिन हानियों के बारे में हम आगे बताने जा रहे हैं, वह आपने पहले कभी नहीं सुनी होंगी।
विशेषज्ञों के तर्क
विशेषज्ञों के मुताबिक तकिये पर सोने से चेहरे की डलनेस, रिंकल्स और हेयर फॉल हो सकता है। यहां तक की आपकी आईलैशेज तक के टूटने की वजह तकिया हो सकता है।
एलर्जी
इसके अलावा चेहरे पर एलर्जी हो जाना भी तकिये की वजह से संभव है। ऐसा इसलिए क्योंकि तकिये को बनाने के लिए भिन्न प्रकार के कपड़े, उस पर डिजाइन देने के लिए रंगों का प्रयोग, आदि होता है। अब यह जरूरी नहीं कि यह सभी चीज़ें हमारी त्वचा को ध्यान में रखकर बनाई गई हों।
मुंहासे
हो सकता है कि एलर्जी जैसी बात तकिये की वजह से शायद ही हो, लेकिन पिंपल होना आम बात है। कई बार तकिया साफ नहीं होता, उसमें मिट्टी के कण होते हैं जो रात में नींद के दौरान हमारे चेहरे पर लग जाते हैं। यही दूषित कण मुंहासों के बनने का कारण हैं। इसलिए या तो तकिया ना लें या फिर इसे अपने चेहरे से दूर ही रखें।
पोर्स बंद हो जाते हैं
क्योंकि इसके डायरेक्ट कॉंटेक्ट से ना केवल चेहरे पर पिंपल बन जाते हैं, साथ ही चेहरे की त्वचा के पोर्स भी बंद हो जाते हैं। क्योंकि तकिये की गंदगी ही इन पोर्स को बंद करने का कारण बनती है और यदि ये बंद हो जाएं तो चेहरे की त्वचा को सुचारू रूप से ऑसीजन नहीं मिलती। इसी वजह से चेहरा मुरझाने लगता है।
बालों के झड़ने का एक कारण
लेकिन साथ ही बालों के झड़ने का एक कारण आपका तकिया भी है। जो लोग काम करने से लेकर फिल्म देखने, इतना ही नहीं बातें करने तक के लिए भी पीठ और सर को तकिए के सहारे लगाकर बैठना पसंद करते हैं, उनके लिए इसके नुकसान दो गुना हो जाते हैं। क्योंकि इससे तकिये पर जमी गंदगी बालों से चिपक जाती है और इससे हेयरफॉल होता है।
आईलैशेज
चलिए बालों के गिरने को आप रोक सकते हैं, अच्छे तेल एवं शैम्पू के इस्तेमाल से इन्हें वापस अच्छी ग्रोथ दिला सकते हैं लेकिन अपने आईलैशेज का क्या करेंगे? हमारी आंखों की खूबसूरती को बढ़ाने वाली आईलैशेज भी तकिए के कारण टूटती हैं। रात में तकिए पर बार-बार चेहरे का लगना, आंखों के लगने से आईलैशेज पर गंदगी लग जाती है जिससे कि यह टूटना आरंभ हो जाती हैं।
हेयर फॉल
यह शायद एक बड़ी जनसंख्या की दिक्कत है और हम इसका जिम्मेवार केवल और केवल प्रदूषण को मानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, यह संभव है कि प्रदूषण में जाने से और समय से बाल साफ ना करने से एवं साथ ही हानिकारक कैमिकल वाले शैम्पू का इस्तेमाल करने से हेयर फॉल होता है।



8.10.17

ब्रा पहन कर सोने के क्या नुकसान है?




   क्या महिलाओं को रात को सोते समय ब्रा पहननी चाहिए? यह सवाल समय के साथ उठता ही आ रहा है।
कभी कहा जाता है कि रात को ब्रा पहन कर जरूर सोना चाहिए कभी स्टडीज सामने आती है कि नहीं ब्रा पहन कर सोना खतरे की घंटी हो सकती है। ज्यादा भारी ब्रेस्ट वाली महिलाओं को अक्सर ब्रा पहन कर सोने की सलाह दी जाती है वहीं जिनके कम होते हैं उनके लिए यह जरूरी नहीं। लेकिन क्या आपको पता है ब्रा पहन कर सोने से आपको क्या नुकसान हो सकते हैं?

ब्रा पहन कर सोने के क्या नुकसान है-
1. रक्त संचार में असर-
 ब्रा इलास्टिक और पट्टियों की वजह से आपके सीने तक खून को नहीं पहुंचने देती। रात को इसका असर ज्यादा होता है। हर बार यह सलाह दी जाती है कि महिलाओं को ब्रांडेड और अच्छी ब्रा पहननी चाहिए ताकि पूरे शरीर में रक्त का संचार अच्छे से हो।
2. तंग पट्टियां- 
अक्सर ब्रा की पट्टियां काफी टाइट होती है जिससे रात को सोने में दिक्कत होती है। जितनी टाइट आपकी ब्रा होगी उतनी ही आपको दिक्कत होगी। अगर आप फिर भी रात को ब्रा पहन कर सोना चाहती हैं तो इसे ढीला कर लें। ताकि इसके टाइट होने से आपको कोई दिक्कत न हो।
3.स्तनों के आसपास पिगमेंटेशन- 
जो महिलाएं नियमित रूप से ब्रा पहनती हैं उनके स्तनों के आसपास निशान पड़ने लग जाते हैं उन्हें पिगमेंटेशन की दिक्कत होने लगती है। इससे बचने के लिए आपको रात में ब्रा पहनने से बचना होगा।
4. सूजन-
 ज्यादा समय तक ब्रा पहनने से फ्लूइड इकट्ठा होने लगता है और यह एक बड़ा कारण है कि महिलाएं आखिर क्यों ब्रा पहन कर नहीं सोतीं।
5. बेचैनी-
रात के समय ब्रा पहन कर सोने से बेचैनी बनी रहती है. और ठीक तरह से नींद भी नहीं आ पाती है. डॉक्टर्स भी रात के समय ढीले कपड़े पहन कर सोने की सलाह देते है.
6. त्वचा में खराश- 
कई महिलाओं को ब्रा पहन कर सोने में दिक्कत हो जाती है यही नहीं उनकी त्वचा पर निशान पड़ जाते हैं। अगर आपको भी ऐसी ही दिक्कत होती है तो आप भी रातो ब्रा पहन कर मत सोइए।
7॰एलर्जी 
दिनभर के बाद रात में भी ब्रा पहन कर सोने से पसीने और के चलते आपके स्तन एलर्जी का शिकार हो सकते है




4.10.17

बंद नाक खोलने और कफ़ निकालने के अनुपम नुस्खे //Unique tips for opening closed nose and coughing



    सर्दी का मौसम हो या बेमौसम सर्दी हो गई हो, नाक बंद होने की समस्या हर किसी के साथ होती है। लेकि‍न    असली समस्या तो तब होती है, जब आपकी नाक आसानी से नहीं खुलती और आपको बंद नाक की वजह से घुटन होने लगती है। इस समय नाक बंद होना सबसे गंभीर समस्या लगने लगती है। अगर आपके पास जरुरी सामग्री मौजूद है, तो बंद नाक से छुटकारा पाना बेहद आसान है। आपने सोचा होगा कि बंद नाक के पीछे कारण क्या है? ठण्ड लगना और मौसम के हिसाब से तालमेल न बिठा पाना इसके पीछे मुख्य कारण है। इस स्थिति में नाक के छिद्र उत्तेजित हो जाते है और उसमे जलन भी हो सकती है।
बंद नाक खोलने के कुछ आसान उपाय -
नारियल तेल -
नारियल तेल बंद नाक को खोलने का एक बेहतरीन उपाय है। जब भी कभी आपकी नाक बंद हो जाए, तो आप नारियल तेल अंगुली से नाक के अंदर तक लगाएं। या फिर नरियल तेल की कुछ बूंदे नाक में डालें और फिर गहरी सांस लें। कुछ ही देर में आपकी नाक खुल जाएगी। ध्यान रहे की नारियल तेल पिघला हुआ हो।
कपूर की महक भी बंद नाक को खोलने का अच्छा तरीका है। आप चाहें तो इसे नारियल तेल के साथ मिलाकर सूंघ सकते हैं, या फिर सादा कपूर सूंघना भी आपको फायदा देगा। इसके अलावा नाक को गर्माहट देकर भी बंद नाक को आसानी से खोल जा सकता है।


टमाटर सुप –

   यदि आप चटपटा खाने के शौकीन हैं, तो यह आपके लिए बंद नाक में बहुत ही फायदेमंद साबित होगा। चटपटी चीजें नाक बंद होने पर आपकी नाक को खोल देती हैं। घर पर गरम- गरम टमाटर सुप बनाकर पीने से भी बंद नाक में राहत मिलेगी। टमाटर सुप में लहसुन, नींबू रस और नमक मिलाकर पिएं, आराम मिलेगा।
बंद नाक खोलने का एक और आसान सा तरीका है एक छोटा सा व्यायाम। जी हां, इसके लिए आपको अपनी नाक बंद करके सिर को पीछे की तरह झुकाना है और कुछ समय के लिए सांस को रोककर रखना है। इसके बाद नाक खोलकर सांस लेने में आसानी होगी। इस तरीके को आप दोहरा सकते हैं।
    ठंड या सर्दी की वजह से ही नाक बंद होने की समस्या होती है। इसे ठीक करने के लिए हल्का गर्म या गुनगुना पानी भी आपकी बहुत मदद कर सकता है। अगर आप सहज हैं तो इसके लिए अपना सिर पीछे की ओर झुकाएं और किसी ड्रॉपर की मदद से हल्के गर्म या गुनगुने पानी की कुछ बूंदे नाक के छिद्रों में डालें। कुछ ही देर में वापस सिर आगे कर लें और इस पानी को निकाल दें।
कच्‍ची प्‍याज –
बंद नाक की समस्या के लिए प्‍याज भी फायदेमंद माना जाता है। क्योंकि, कच्‍ची प्‍याज खाने से बंद नाक खुल जाती है। और इसके अलावा अगर आप प्याज का रस किसी कपडे पर डालकर सूंघे तो भी बंद नाक खुल सकती है.
नसवार –
नसवार का अधिक उपयोग स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होता है. मगर बंद नाक होने पर इसकी चुटकी भर मात्रा सूंघने से बहुत वेग से छींके आती हैं. और दिमाग तक चढ़ा हुआ रेशा नाक के रस्ते बाहर निकल जाता है. और 5 मिनट के बाद पूरा सिर हल्का हो जाता है. पुराने लोग इसका इस्तेमाल किया करते थे. आज कल के लोगों को इसका ज्ञान कम होगा. नसवार किसी भी पंसारी के पास मिल जाएगी.
गुनगुने पानी से स्‍नान –
यदि आपको अक्सर नाक बंद रहने की समस्‍या रहती है, तो कोशिश करें कि गुनगुने पानी से स्‍नान करें। क्योंकि गुनगुने पानी से स्‍नान करने से आपको बंद नाक में आराम मिलेगा।


भाप लेना -

बंद नाक खोलने का यह तरीका काफी पुराना और प्रभावकारी है, जो तुरंत आपको राहत देता है। इसके लिए आपको बस पानी गर्म करके किसी बर्तन में निकलना है और उसमें खुशबूदार तेल की कुछ बूंदे डालनी हैं। आपको जो भी महक पसंद हो। इसके अलावा आप इसमें अयोडीन की कुछ बूंदें या फिर विक्स कैप्सूल भी डाल सकते हैं। अब इस बर्तन की ओर चेहरा करके भाप लें। यह नाक खोलने के साथ ही सर्दी में आराम देगा।
गरमा गरम चाय पिएं -
नाक खोलने के लिए आप गर्म चाय ट्राई कर सकते हैं। यदि आप ग्रीन टी, पिपरमिंट या फिर अदरक की चाय पीते हैं तो यह फायदेमंद होगी। दूध वाली चाय मत पियें.
अलसी का सेवन -
अगर कफ जम चुका है इस कारण से नाक बंद है तो आप सुबह शाम एक एक चम्मच अलसी के बीजों को उतने ही गुड के साथ रोजाना खाएं. कफ भी निकल आएगा और नाक भी बिलकुल साफ़ हो जायेगी. अलसी के सेवन से शरीर में जमा हुआ कफ़ बाहर निकल जाता है.