6.12.17

हस्त मैथुन से उत्पन्न यौन दुर्बलता के उपचार //Treatment of sexual impairment caused by hand practice


    हस्तु मैथुन से धातु वीर्य दोष हो जाता है और धातु पतली हो जाती है. ऐसे में युवाओं की जिंदगी नरक बन जाती है. युवाओं से अनुरोध है के इस बुरी आदत को छोड़ दें. और हुए नुक्सान की भरपाई के लिए निम्न घरेलु नुस्खे अपनाने चाहिए.
दुर्बलता को दूर करने के उपाय.
आंवला तथा हल्दी – 
आंवला तथा हल्दी समान मात्रा में पीसकर घी डालकर सेंक लीजिये, और भून लीजिये, सिकने के बाद दोनों की बराबर मात्रा में पीसी मिश्री मिला लीजिये. (जैसे 100-100 ग्राम आंवला और हल्दी है तो मिश्री २०० ग्राम) अभी इसको सुबह शाम एक एक चम्मच गर्म दूध के साथ फंकी लीजिये.
असगंध (अश्वगंधा) –
 आधा चम्मच असगंध की फंकी नित्य सुबह शाम गर्म दूध से लेने से ठीक हो जाती है. मर्दाना शक्ति भी बढती है और आंवले के प्रयोग को भी निरंतर करे.
कच्ची हल्दी और शहद – 
कच्ची हल्दी का रस दो चम्मच, समान भाग शहद में मिलाकर एक बार रोजाना पियें. या पीसी हुयी हल्दी 250 ग्राम गाय या भैंस के घी में सेंक कर इसमें पीसी हुयी 250 ग्राम मिश्री मिला लें. नित्य रात को गर्म दूध से फंकी लें.


लंबे और घने बालों के लिए अपनाएं ये उपाय


    

      आम लोग अब मार्केट में मौजूद उत्पादों पर कम भरोसा करते हैं क्योंकि इनमें होते हैं हानिकारक रसायन और दूसरे कठोर उत्पाद। अब वे प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले आयुर्वेदिक उपचारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं। कई तरह की सामान्य समस्याओं के लिए भी अब प्राकृतिक उत्पादों को अपनाया जाता है।
   आयुर्वेदिक उपचारों की मदद से आप अपने बालों को शानदार और लंबे बना सकते हैं। छोटे बालों वाली महिलाएँ अपने लंबे बालों की ख्वाहिश अच्छे देखभाल की कमी की वजह से पूरा नहीं कर पातीं। बालों के बढ़ने के लिए आयुर्वेदिक उपचार हमेशा से मौजूद थे लेकिन उन्हें अपनाया नहीं गया। लेकिन आज इनके इस्तेमाल से ज्यादा से ज्यादा लोग फायदा उठा रहे हैं।  कुछ आयुर्वेदिक सुझावों की तरफ ध्यान देते हैं। बाल लम्बे कैसे करे :-
लंबे बालों के लिए सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक नुस्खे 
खुशबूदार जटामांसी-
    बाल बढ़ाने के उपाय, जटमानसी आमतौर पर पाया जाने वाला एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है जो कि बालों को बढ़ने में मददगार है। यह खून में से अशुद्धियों को दूर करता है और बढ़ती रंगत देता है। यह बालों की कई तरह से बढ़ने में मदद करता है। आप इसे दवा के रूप में ले सकती हैं या बालों पर सीधे भी लगा सकते हैं। याद रखें कि दवा की तरह इस्तेमाल करते वक्त कैप्सूल 6mg से ज्यादा न  हो।
भ्रंगराज -
   भ्रंगराज नाम है जड़ी बूटियों के राजा का जिसमें बालों की लंबाई बढ़ाने का बेहतरीन गुण है। लंबे बाल के उपाय, इसके पत्तों को धो कर पेस्ट बना लें। जिन्हें यह पत्तियाँ न मिलें वे आयुर्वेदिक दुकानों से इसका पाउडर ले सकते हैं। इसकी 5-6 चम्मच पाउडर को गर्म पानी में डालकर पेस्ट बना लें और फिर बालों में लगाकर 20 मिनट तक रखें।



लंबे बालों के लिए आँवला -

    आमला के नाम से भारतीय में लोकप्रिय इस आयुर्वेदिक जड़ी को शरीर में अपच की हालत का इलाज करने के लिए प्रयोग किया जाता है । यह वास्तव में बाल गिरने को नियंत्रित करने में बहुत प्रभावी है। आज भी महिलाओं के बालों में हिना के साथ आंवला पाउडर इस्तेमाल करतीं हैं। इस प्राकृतिक उत्पाद में विटामिन सी भरपूर होता है।
लंबे बालों के लिए मेथी -
कुछ चम्मच मेथी के बीजों को गर्म पानी में मिलाएँ और ठंडा करने के बाद बालों पर लगाएँ और फिर धोएँ।
एलोवेरा -
रोज दो चम्मच एलोवेरा का सत्व खाने में लें इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और इसे बालों में लगाने से बाल शानदार तरीके से बढ़ते हैं।
लंबे बालों के लिए अश्वगंधा -
यह एक प्रमुख आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है। उम्र बढ़ने से रोकने के साथ ही यह पित्त दोष भी दूर करता है। जिसे दूर करने से बालों का झड़ना भी बंद हो जाएगा।
बाल लंबे करने के तरीके – बालों की आयुर्वेदिक मालिश -
  लोग शायद ही कभी गर्म तेल से मालिश करते हैं जो कि बालों के पोषण के लिए बहुत जरूरी है। आप अब कई तरह के आयुर्वेदिक तेलों से बालों और जड़ों की मालिश कर सकते हैं। इसके लिए आप ब्राह्मी या नारियल का तेल इस्तेमाल कर सकते हैं। यह बालों की जड़ों को पुनर्जीवित करने के साथ ही इनका झड़ना भी कम करते हैं और सिर्फ 6 महीनों के छोटे से समय में ही आप पाएंगें बेहतरीन लंबे बाल।


5.12.17

छोटा बेर होता है बड़ी दवा जानें इसके फायदे



    बेर एक मौसमी फल है. हल्के हरे रंग का यह फल पक जाने केबाद लाल-भूरे रंग का हो जाता है. बेर को चीनी खजूर के नाम से भी जाना जाता है. चीन में इसका इस्तेमाल कई प्रकार की दवाइयों को बनाने में किया जाता है
सेहत के लिए किस तरह फायदेमंद है बेर?
*इसमे कई तरह के अमीनो एसिड पाये जाते है जो की शरीर के लिए बहुत अच्छे होते है। अगर हमारे शरीर में यह अमीनो एसिड सही मात्रा में हो तो हमारे शरीर का 50 परसेंट पोषण पूरा हो जाता है। इसके साथ-साथ जिन लोगों को अनिंद्रा की प्रॉब्लम है वह भी ठीक हो जाती है।
*यह कैंसर होने से रोकता है। इस में पाए जाने वाले न्यूट्रिशन हमें कैंसर होने से बचाता है।
अगर आप वजन कम करना चाहते है तो बेर आपके लिए बहुत ही बढ़िया फल है। क्योंकि बेर में बहुत ही कम फैट होता है जो कि आपके वजन कम करने में मदद करता है। बेर खाने से आपका पेट भरा भरा रहता है जिसकी वजह से आप ओवर इटिंग से बच सकते हैं अगर आप जरूरत से ज्यादा खाना नहीं खाएंगे तो आपका वजन जल्दी कम होने लगेगा।



*यह पाचन तंत्र को ठीक करने मे मदद करता है और इसके साथ साथ यह कब्ज ठीक करने मे भी मदद करता है। अगर आपका पाचन तंत्र सही रहता है तो आपके पेट में अफारा नहीं रहेगा और आपका खाना आसानी से पच जाएगा।
*इसमे मौजूद कैल्सियम और विटामिन हड्डियों को मजबूत करने मे मदद करते है। अगर आपकी हड्डियों में दर्द रहता है तो आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
यह बालो के लिए बहुत बढ़िया होता है। इसमे मौजूद पोषक तत्व बालो को घना और हेल्दी बनाए रखने मे मदद करता है।
*लस्सी के साथ बेर खाने से पेट दर्द दूर हो जाता है।
*जिन लोगो को फोड़ा फुंसी होती है उनको इसका सेवन करना चाहिए।
*यह कोलेस्ट्रॉल लेवेल को कम करना है जो की दिल के लिए बहुत फायदेमंद है।
*खांसी होने पर बेर का जूस पीने पर से फायदा मिलता है।
*बेर में बहुत से ऐसे मिनरल्स पाए जाते हैं जो कि हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाते हैं जिससे हमें बीमारियों के खिलाफ लड़ने में काफी मदद मिलती है अगर हमारा प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होता है तो हमें जल्दी बीमारियां लग जाती है और बार-बार हम बीमार पडते रहते हैं इसलिए अगर आप बेर का रेगुलर इस्तेमाल करते हैं तो आप कई तरह की बीमारियों से बच सकते हैं।
*अगर आपको चोट लग गई है तो आप बेर को पीसकर और इसमें तेल मिलाकर इसका लेप बना लीजिए और अपने जख्म वाले स्थान पर लगाकर ऊपर से पट्टी कर लीजिए इससे आपका जख्म जल्दी ठीक हो जाएगा और कोई इंफेक्शन भी नहीं होगा।

 *रसीले बेर में कैंसर कोशिकाओं को पनपने से रोकने का गुण पाया जाता है.
*अगर आप वजन कम करने के उपाय खोज रहे हैं तो बेर आपके लिए एक अच्छा विकल्प है. इसमें कैलोरी न के बराबर होती है.
*बेर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी, विटामिन ए और पोटैशियम पाया जाता है. ये रोग प्रतिरक्षा तंत्र को बेहतर बनाने का काम करता है.
* बेर एंटी-ऑक्सीडेंट्स का खजाना है. लीवर से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए भी यह एक फायदेमंद विकल्प है.
*बेर खाने से त्वचा की चमक लंबे समय तक बरकरार रहती है. इसमें एंटी-एजिंग एजेंट भी पाया जाता है.
*अगर आप कब्ज की समस्या से जूझ रहे हैं तो बेर खाना आपको फायदा पहुंचा सकता है. यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है.
*बेर में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम और फाॅस्फोरस पाया जाता है. यह दांतों और हड्ड‍ियों को मजबूत बनाता है.


3.12.17

सर्दी के मौसम मे सेहत बनाने वाले गोंद के लड्डू// Benefits of gum ki laddu in the winter season




    सर्दी का मौसम सेहत बनाने वाला मौसम होता है| इसलिए इस मौसम में हमें अपना अच्छे से ख्याल रखना चाहिए| यदि सेहत बनाने की बात चल रही हो तो ड्राई फ्रूट्स का नाम सबसे पहले आता है| जैसा की हम सभी जानते है ड्राई फ्रूट्स हमें ताकत देते है और हमारा स्वास्थ भी सुधारते है|
ठंड के समय पाचन शक्ति अच्छी रहती है और भूख भी खुलकर लगती है| इसलिए इस वक्त हैवी खाना भी आसानी से हजम हो जाता है| इसलिए शीत ऋतु में हमें सूखे मेवो से बने पौष्टिक आहार एवं व्यायाम, आदि के द्वारा पर्याप्त शक्ति अर्जित कर लेनी चाहिए, ताकि पुरे साल हम स्वस्थ रह सकें|
सूखे मेवे के लड्डू कई तरह से बनाये जा सकते है, लेकिन इसके लड्डू को गोंद के साथ बनाए जाएं और खाए जाएं, तो आपको केवल ताकत ही नहीं बल्कि स्वाद भी डबल मिलेगा| गोंद के लड्डू खासतौर पर राजस्‍थान में बनाये जाते है। इसके सेवन से शरीर को ताकत मिलती है और सर्दी भी नहीं लगती| तो आइये आज हम आपको बताते है  गोंद के लड्डू को बनाने के तरीके और इससे मिलने वाले फायदों के बारे में|
 गोंद के लड्डू खाने के लाभ और बनाने के तरीके
ठंडी के दिनों में शरीर को ऊर्जा देने के लिए गोंद से बने लड्डू से ताकत मिलती है| रोजाना सुबह नाश्ते में 1 या 2 लड्डू गोंद के खाकर आप खुद को सर्दियों में स्वस्थ रख सकते है| इससे शरीर को गर्मी मिलती है और सर्दी नहीं लगती| इसलिए बच्चो के लिए तो यह बहुत ही अच्छे होते है|
इन् गोंद के लड्डू को आप 1 महीने तक इस्तेमाल कर सकते है। गोंद के लड्डू में ड्राई फ्रूट्स के अलावा गोंद के साथ मूंग दाल का आटा और सोयाबीन का आटा और भी डाला जाता है। ये सभी शरीर को प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व देते हैं| इसलिए बच्चे को जनम देने के बाद यदि यह माँ को खिलाया जाये तो वो जल्दी ठीक हो सकती है।
सामग्री:-
गोंद - 1 कप (100 ग्राम)
घी- 500 ग्राम
गुड़- 600 ग्राम
किशमिश, मखाने - 100 ग्राम
बादाम, काजू, खारिक - 200 ग्राम





बनाने की विधि:-
सारे सूखे मेवे को मिक्सर में चलाकर बारीक़ कर ले या छोटे-छोटे टुकड़ो में काट लें|
अब गोंद को ओखली में छोटा-छोटा करके तोड़ ले|
कढ़ाई में घी डाल कर गर्म करले|
अब गर्म घी में गोंद के टुकड़े डालकर उसे हल्का ब्राउन होने तक सेक लें|
फिर ठंडा करने के लिए प्लेट में निकाल ले|
   अब कढ़ाई में थोड़ा और घी डाल कर गर्म करें| गुड़ को तोड़ कर टुकड़े कर लें, और घी में डालकर पिघला लें|
गुड़ की गाढ़ी चाशनी बनने तक रुके|
   अब गुड़ की चाशनी में पीसी गोंद, सारे मेवे अच्छी तरह मिलाकर लड्डू का मिक्सचर तैयार कर लें|
अब इस मिश्रण को हाथ में लेकर हाथों से गोल-गोल लड्डू बनाकर तैयार करें|
आप अपने अनुसार छोटे या बड़े लड्डू बना सकते है|
     इन् लड्डू को सुबह 5 बजे उठकर खाया जाये और फिर थोड़ी देर सो लिया जाये तो इसका अधिक फायदा मिलता है| इसमें मौजूद काजू- बादाम और घी के कारण चेहरे पर चमक आती है|
इसके अलावा आप यदि इसमें मेथी दाने का इस्तेमाल करेंगे तो सर्दियों में होने वाले कमर या जोडों के दर्द से राहत मिलती है| एक बात का ख्याल रहे की 2 से ज्यादा लड्डू ना खाए|




19.11.17

मोतियाबिंद का आपरेशन के बाद जरूरी सावधानियाँ



Image result for मोतियाबिंद का आपरेशन के बाद जरूरी सावधानियाँ

आंखों में मोतियाबिंद का उतरना एक आम प्रक्रिया है जो कई बार कम उम्र में भी लोगों को शिकार बना लेती है। आज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उन्न्ति हो चुकी है कि मोतियाबिंद की सर्जरी बहुत कम समय में और कम पीड़ा के साथ आसानी से हो जाती है। जरूरत है तो बस ऑपरेशन के बाद कुछ खास बातों को ध्यान में रखने की।
अतीत रखता है मायने
जाहिर है कि किसी भी तरह की सर्जरी के बाद रिकवर होने यानी स्वस्थ होने में लगने वाला समय आपकी शारीरिक अवस्था पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। यानी जितना आप अपने शरीर का ध्यान रखेंगे, आपको सर्जरी के परिणाम उतने ही अच्छे मिलेंगे। शोध कहते हैं कि जो लोग हमेशा अपनी फिटनेस और हाइजीन का ध्यान रखते हैं वे बाकि लोगों की तुलना में जल्दी ठीक होते हैं और उन्हें सर्जरी के परिणाम भी ज्यादा अच्छे मिलने की सम्भावना होती है।
इतना ही नहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सर्जरी के करीब एक महीने पहले से भी मरीज पोषक खाने और हल्के-फुलके व्यायाम करने के साथ ही अच्छी नींद सोने का रूटीन बनाता है तो इससे सर्जरी के परिणामों पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही यदि डॉक्टर ने आपको मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए कहा है तो फिर इसमें देर न करें वरना यह आंखों को और भी नुकसान पहुंचा सकता है।
सर्जरी के बाद ये जरूर करें





कम से कम आधे घंटे का आराम हॉस्पिटल में ही।
यदि आपके डॉक्टर ने इससे ज्यादा देर आराम करने का निर्देश दिया हो तो वैसा ही करें
अकेले घर जाने या गाड़ी चलाने के बारे में बिलकुल न सोचें। यदि इसमें कोई समस्या है भी तो किसी विश्वासपात्र को साथ जरूर रखें
डॉक्टर के निर्देशों को ध्यान से सुनें और उनपर पूरी तरह अमल करें। यदि याद न रख सकते हों तो कहीं लिख लें
आंखों की सर्जरी के बाद
आमतौर पर सर्जरी के बाद थोड़े बहुत दर्द के लिए दर्दनिवारक दवा दी जाती है लेकिन यदि दर्द इससे भी कंट्रोल न हो तो तुरंत अपने डॉक्टर से सम्पर्क करें। इसके अलावा अगर आंखों में जलन, तेज खुजली या किसी प्रकार का बहाव हो तो भी तुरंत डॉक्टर को बताएं। यूं थोड़ी खुजली, रोशनी से परेशानी और आंखों में थोड़ी दिक्कत ऑपरेशन के बाद आम बात है लेकिन यदि यह ज्यादा बढ़े तो नजरअंदाज न करें :
ऑपरेशन के बाद दौड़भाग वाले खेल, ड्राइविंग, जॉगिंग आदि से कुछ समय दूर रहें।
ऑपरेशन के बाद दिए गए काले रंग के चश्मे आंखों को तेज लाइट के अलावा धूल से बचाने के भी काम में आते हैं। इसका उपयोग जब तक डॉक्टर कहें दिन में पूरे समय करें।
चश्मे के अलावा एक शील्ड भी ऑपरेशन के बाद प्रयोग में लाने के लिए दी जाती है। इसे रात को सोते समय कम से कम डेढ़ हफ्ते जरूर उपयोग में लाएं। इससे आंखों पर प्रेशर पड़ने से बचाया जा सकता है।
सर्जरी के पहले कुछ दिनों तक आपको देखने में तकलीफ आ सकती है इसलिए सावधानी रखें और आंखों पर बेवजह का दबाव डालने से बचें, सर्जरी के कुछ समय बाद तक नीचे झुकने या भारी सामान उठाने से बचें।
आंखों को धोने, नहाने आदि के बारे में डॉक्टर की सलाह लें और चेहरे पर सीधे पानी डालने से बचें। स्वीमिंग, बहुत देर कंप्यूटर या मोबाइल पर समय बिताने जैसी एक्टिविटीज से भी कुछ समय दूर रहें।
डॉक्टर द्वारा दी गई आईड्रॉप्स नियमित और सावधानी से डालें और आंखों की सफाई के बारे में डॉक्टर से पूछ कर कदम बढ़ाएं।
धूल, धुएं, आई मेकअप आदि से बचें।
ज्यादातर मामलों में इस सर्जरी के बाद खाने पर कोई प्रतिबन्ध या किसी तरह का परहेज नहीं होता लेकिन यदि डॉक्टर ने किसी कारण से किसी विशेष पदार्थ को खाने पर प्रतिबन्ध लगाया है तो उसे बिलकुल न खाएं।



26.10.17

नई और पुरानी खांसी के रामबाण नुस्खे// New and old cough suppressant tips




खांसी बच्चे बूढ़े, जवान, स्त्री या पुरुष सभी को कभी भी हो सकती है। इतना साधारण-सा लगने वाला यह रोग किसी-न-किसी उम्र में सबको तंग कर चुका होता है। वास्तव में देखा जाए तो खांसी स्वयं कोई रोग नहीं, बल्कि दूसरे रोगों का लक्षण होता है। यह सर्दी-जुकाम, वाइरल इंफेक्शन, जीवाणु के संक्रमण, प्रदूषण, निमोनिया, तपेदिक, दमा, प्लूरिसी, फेफड़ो की खराबी आदि रोगों में हुआ करती है। मुख्य रूप से यह सूखी, तर, बलगम वाली खांसी और दौरे के रूप में उठने वाली खांसी (व्हूपिंग कफ़) होती है। इस पोस्ट में हम आपको खांसी की अचूक दवा ओं को बतायेंगे जो बिलकुल सुरक्षित हैं | आप इन घरेलु और आयुर्वेदिक नुस्खो को अपनाकर खांसी की समस्या से आसानी से छुटकारा पा सकते है |
खांसी के कारण :
खांसी होने के प्रमुख कारणों में गले और फेफड़े के भीतरी भाग में सूजन होना, फेफड़ों की छोटी-छोटी नलिकाओं में उत्तेजना पैदा होने से, कीटाणुओं का संक्रमण, धूल या धुएं के कणों से एलर्जी होना आदि होते हैं।
खांसी के लक्षण :
इस रोग में सीने में जकड़न महसूस होना, सूखी खांसी और तर खांसी में बलगम निकलना आदि लक्षण दिखाई देते हैं।
खांसी के घरेलू उपचार
तुलसी और हल्दी से खांसी की अचूक दवा
तुलसी के सूखे पत्ते और अजवायन 20-20 ग्राम तथा सैंधा नमक 10 ग्राम मिलाकर पाउडर बना लें। इस पाउडर को 3 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से खांसी, जुकाम दूर हो जाता है।


तुलसी के रस में अदरक व पान के पत्तो का रस, कालीमिर्च, काला नमक और शहद मिलाकर लेने से भी खांसी छुटकारा मिल जाता है। अह भी खांसी की अचूक दवा है |

सुबह खाली पेट 4-5 तुलसी की पत्तियों को साफ पानी से धोकर खाते रहने से खांसी ,कफ, जुकाम आदि अनेक रोगों से बचाव रहता है |
*खांसी से तुरंत राहत पाने के लिए 1 ग्राम भुनी हुई हल्दी की गांठ मुंह में रखें |
अदरक का रस और शहद समान मात्रा में लेकर (1-1 चम्मच की मात्रा में) इनको मिलाकर मामूली-सा गर्म करके दिन में 3-4 बार लेने से बलगमी खांसी ठीक हो जाती है। बच्चों की खांसी में इस मिश्रण की 1-2 ऊँगली में जितना मिश्रण आ जाए, उतना ही दिन में 2-3 बार लेना ही काफी है। सिर्फ 2-3 दिन में लाभ हो जाएगा। साथ ही नजला, जुकाम भी ठीक हो जायेगा | (नोट शहद को ज्यादा गर्म नही करना चाहिए )
*आंवला, अलसी, खस-खस, और सुहागा से खांसी की अचूक दवा बनाने के उपाय
छोटी पीपल, छोटी इलायची के बीज और सौंठ इन सबको 4-4 ग्राम लेकर पीस लें। इसमें 100 ग्राम गुड मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियां बना लें। प्रतिदिन रात में 2 गोली गर्म पानी के साथ लें |
आंवले का पाउडर और मिश्री मिलाकर पानी के साथ लेने से पुरानी खांसी ठीक हो जाती है।
सुहागा (Borax) फुलाकर तथा बारीक पीसकर इसकी 1-1 ग्राम मात्रा को दिन में 3 बार शहद में मिलाकर अथवा गुनगुने पानी में डालकर सेवन करें। इससे खांसी पहले दिन ही ठीक हो जाती है। यह खांसी का रामबाण इलाज है |
*अलसी के बीज भुने हुए पीसकर शहद में मिलाकर लेने से भी खांसी मिटती है।
खस-खस के दाने भूनकर पीस लें और उसमें थोड़ा सैंधा नमक व कालीमिर्च मिलाकर एक चम्मच दिन में 2-3 बार सेवन करने से खांसी मिट जाती है।
*अदरक और काली मिर्च युक्त तुलसी की चाय के सेवन से खांसी , कफ आदि दूर हो जाते है | इस चाय को बनाने की विधि – तुलसी की चाय बनाने के लिए तुलसी की ताजा 7 हरी पत्तियां या छाया में सुखाई हुई तुलसी की पत्तियों का पाउडर चौथाई चम्मच भर, कालीमिर्च के दाने 7 (थोड़े कुटे हुए) सूखी सौंठ का पाउडर चौथाई चम्मच अथवा ताजा अदरक 2 ग्राम लेकर इन सभी को 1 कप उबलते पानी में डालकर 4-5 उबाल आने दें। इसके बाद बर्तन को नीचे उतारकर 2 मिनट तक ढककर रख दें। उसके बाद छानकर इसमें उबाला हुआ दूध 100 मि.ली और 1-2 चम्मच शक्कर या चीनी मिलाकर गरम-गरम पी लें और कपड़ा ओढ़कर 5-10 मिनट के लिए सो जाएं। इस प्रयोग से खांसी, सर्दी का सिरदर्द, जुकाम, और गले के रोगों से छुटकारा मिल जाता है। साथ ही यह कफ से होने वाली खांसी की अचूक दवा है |


*पुरानी खांसी का आयुर्वेदिक इलाज

जवाखार 1 ग्राम, कालीमिर्च 2 ग्राम, पीपल 4 ग्राम और अनार का छिलका, काकडासिंगी, वंशलोचन, सतमुलहठी तथा सौंठ प्रत्येक को 8-8 ग्राम लेकर बारीक पीसकर छान लें | उसके बाद इस पाउडर में शहद डालकर गोली बना लें। यह दिनभर में 4 गोलियां लेने से पुरानी बलगम वाली खांसी भी ठीक हो जाती है।
बबूल का गोंद, कत्था और मुलहठी प्रत्येक 10–10 ग्राम लेकर तीनों को बारीक पीसकर छान लें | फिर इस पाउडर को अदरक के रस में घोटकर गोलियां बनाकर किसी शीशे की बोतल में रख लें। यह 1-1 गोली लें यह खांसी का रामबाण इलाज है।
    जैसा की हम आपको हमेशा प्रेरित करते है की रोगों से बचाव ही उनका सबसे बेहतर इलाज होता है | सही खानपान और दिनचर्या का ध्यान रखकर रोगों के कुचक्र से बच सकते है | इसलिए नीचे खांसी में खानपान और परहेज सम्बंधित टिप्स दिए गये है जिनका पालन आपको जरुर करना चाहिए
*अतीस का पाउडर 3 ग्राम की मात्रा में शहद में मिलाकर चाटने से खांसी ठीक हो जाती है।
*अदरक, तुलसी के पत्तों का रस और शहद इन सबको 6-6 ग्राम मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से सूखी खांसी दूर हो जाती है। यह सूखी खांसी का बढ़ियां घरेलू उपचार है |
*हरड, बहेड़ा, आंवला, सौंठ, कालीमिर्च और पीपल सभी को समान मात्रा में लेकर पीसकर पाउडर बना लें। यह पाउडर प्रतिदिन 3-3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ लेने से सभी प्रकार की खांसी का तुरंत इलाज होता है।
*अदरक के रस में इलायची का पाउडर और शहद मिलाकर हल्का गर्म करके लेने से खांसी से आराम मिलता है |
एक चौथाई चम्मच दालचीनी और शहद आधा चम्मच को मिलाकर गुनगुने पानी के साथ सुबह शाम लेने से भी कफ वाली खांसी का इलाज हो जाता है |
काली मिर्च और सौंठ से खांसी की अचूक दवा
*काली मिर्च और मिश्री समान मात्रा में लेकर तथा पीसकर इसमें इतनी मात्रा में देशी घी मिलाएं कि गोली-सी बन जाए यह 1-1 गोली दिन में 4 बार टॉफी की तरह चूसने से खांसी के अलावा ब्रोंकाइटिस, गले की खराश तथा गला बैठना आदि रोगों में भी फायदेमंद है।
*एक चम्मच काली मिर्च के पाउडर में 4 गुना गुड मिलाकर आधा-आधा ग्राम दिन में 3-4 बार लेने से भी खांसी ठीक हो जाती है।
*बीजरहित मुनक्का में कालीमिर्च रखकर चबाएं इसके सिर्फ 5-7 दिन के प्रयोग से खांसी दूर हो जाएगी। यह भी खांसी की अचूक दवा की तरह काम करता है |
*कालीमिर्च कूट-पीसकर, छानकर सुरक्षित रख लें। इसे 2 से 4 ग्रेन तक दिन में 2 बार शहद के साथ लेने से खांसी में जरुर आराम होगा | काली मिर्च का पाउडर ताज़ा घर में ही बनाये तो बेहतर होगा | रेडिमेड डब्बाबंद पाउडर में मसालों की खुशबू समय बीतने के साथ-साथ कम होती जाती है |
*सुबह नहाने के लिए शरीर पर पानी डालने से पहले कुछ दिन सरसों के तेल की कुछ बूंदें हथेली पर रखकर ऊँगली की सहायता से 1 नाक के दोनों नथुनों (nose nasals) से सूंघने से खुश्की से होने वाले सिरदर्द और सूखी खांसी में लाभ प्राप्त होता है।
*10 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम देशी खांड इन दोनों को बारीक पीसकर व मिलाकर 14 मात्राएं बना लें। सूखी खांसी (ड्राई कफ) और बलगमी खांसी में 125 मि.ली. गर्म दूध के साथ रोजाना सोते समय 1 डोज का सेवन करें। यह बिल्कुल हानिरहित और सफल खांसी का देसी इलाज है।
खांसी में क्या खाना चाहिए



*सर्दियों में चाय, कॉफी, या गर्म पानी में ग्लूकोस मिलाकर पिएं।

*बथुआ, मकोय, मूली, मेथी, मिस्री, लोंग, हलदी, शहद, माल्टा, दालचीनी, पालक का सेवन करें।
*भोजन में चोकर सहित आटे की रोटियां सेवन करें।
*फलों में मीठा संतरा, मौसमी, पपीता, चीकू खरबूजा, अमरूद, खजूर, अंजीर सेवन करने से फेफड़ों में तरावट पहुंचती है और बलगम आसानी से निकल जाता है। 

*जब-जब प्यास लगे गर्म पानी का सेवन करें। दिन भर में 2 से 3 लीटर गुनगुना गर्म जल ही पिएं।
*मुलहठी, दालचीनी, लौंग, हलदी, मिस्री, छोटी इलायची चूसते रहें।
खांसी में क्या न खाए ?




रात में सोते समय गुनगुना पानी शहद मिलाकर घूट-घूट कर पिएं।

तेल, घी या चिकनाहट से बने खाने के व्यंजनों के खाने के बाद कुछ देर तक पानी न पियें |
स्मोकिंग ना करें और करने वालो से भी दूर रहें |
भीड़-भाड़ तथा गंदे, धुएं युक्त वातावरण में न जाएं। अचानक गर्म से सर्द या सर्द से गर्म वातावरण में न जाएं।
प्रदूषण तथा धुंए से बचने के लिए मास्क या रूमाल मुंह पर लगायें |
चावल खाना बिल्कुल बंद कर दें। ज्यादा मिठाई से परहेज करें।
घी या तेल में तले अधिक मिर्च-मसालेदार, खट्टे, तीखे, चटपटे खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें।
बर्फ युक्त ठंडे पेय, आइस क्रीम, शर्बत, लस्सी आदि का सेवन न करें।
फ्रिज , कूलर का ठंडा पानी न पिएं। जुकाम, खांसी के कष्ट में दही, केला, ठंडे तथा तले-भुने खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें।
कई बार खांसी किसी चीज से एलर्जी होने पर भी हो जाती है जैसे धूल मिटटी , फूलो का पराग , आदि | ऐसी सिथ्ती में आपको उस चीज से दूर रहना चाहिए, यही उसका आखरी इलाज है |



21.10.17

बांझपन को दूर करने के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार // Home Ayurvedic treatment to remove infertility



     संतानोत्त्पत्ति क्षमता न होने या गर्भ न ठहर पाने की स्थिति को बन्ध्यापन (बांझपन) कहते हैं। पुरुषों के शुक्र दोष और स्त्रियों के रजोदोष के कारण ही ऐसा होता है। अत: बंध्यापन चिकित्सा में पुरुषों के वीर्य में वीर्य कीटों को स्वस्थ करने, वीर्य को शुद्ध करने की व्यवस्था करें और स्त्रियों को रजोदोष से मुक्ति करें। इससे संतान की प्राप्ति होगी।
बंध्या दोष दो प्रकार का होता है। पहला प्राकृतिक जो जन्म से ही होता है। दूसरा जो किन्ही कारणों से हो जाता है। इसमें पहले प्रकार के बांझपन की औषधि नहीं है। दूसरे प्रकार के बांझपन की औषधियां हैं। जिनके सेवन से बांझपन दूर हो जाता है।
किसी भी प्रकार का योनि रोग, मासिक-धर्म का बंद हो जाना, प्रदर, गर्भाशय में हवा का भर जाना, गर्भाशय पर मांस का बढ़ जाना, गर्भाशय में कीड़े पड़ जाना, गर्भाशय का वायु वेग से ठंडा हो जाना, गर्भाशय का उलट जाना अथवा जल जाना आदि कारणों से स्त्रियों में गर्भ नहीं ठहरता है। इन दोषों के अतिरिक्त कुछ स्त्रियां जन्मजात वन्ध्या (बांझ) भी होती है। जिन स्त्रियों के बच्चे होकर मर जाते हैं। उन्हें “मृतवत्सा वन्ध्या“ तथा जिनके केवल एक ही संतान होकर फिर नहीं होती है तो उन्हें `काक वन्ध्या` कहते हैं।
बांझपन का लक्षण गर्भ का धारण नहीं करना होता है।
१. पीपल-
* पीपल वृक्ष की जटा का चूर्ण 5 ग्राम मासिकस्राव (मासिक-धर्म) के चौथे, पांचवे, छठे और सातवे दिन सुबह स्नानकर बछड़े वाली गाय के दूध के साथ सेवन किया जाए तो बन्ध्यापन मिटकर गर्भवती होने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
*पीपल की डोडी कच्ची 250 ग्राम, शक्कर 250 ग्राम की मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार कर लें। मासिक-धर्म के बाद 10 ग्राम चूर्ण मिश्री और दूध के साथ सुबह-शाम देना चाहिए। इसे 10 दिनों तक लगातार सेवन करने से लाभ मिलता है।
*पीपल के सूखे फलों का चूर्ण कच्चे दूध के साथ आधा चम्मच की मात्रा में, मासिक-धर्म शुरू होने के 5 दिन से 2 हफ्ते तक सुबह-शाम रोजाना सेवन करने से बांझपन दूर होगा। यदि लाभ न हो तो आप अगले महीने भी यह प्रयोग जारी कर सकते हैं।
* लगभग 250 ग्राम पीपल के पेड़ की सूखी पिसी हुई जड़ों में 250 ग्राम बूरा मिलाकर पति व पत्त्नी दोनों, जिस दिन से पत्त्नी का मासिकधर्म आरम्भ हो, 4-4 चम्मच गर्म दूध में रोजाना 11 दिन तक फंकी लें। जिस दिन यह मिश्रण समाप्त हो, उसी रात से 12 बजे के बाद रोजाना संभोग (स्त्री प्रंसग) करने से बांझपन की स्थिति में भी गर्भधारण की संम्भावना बढ़ जाती है।
* पीपल के सूखे फलों के 1-2 ग्राम चूर्ण की फंकी कच्चे दूध के साथ मासिक-धर्म के शुद्ध होने बाद 14 दिन तक देने से औरत का बांझपन मिट जाता है।
२.मैनफल-
मैनफल बीजों का चूर्ण 6 ग्राम केशर के साथ शक्कर मिले दूध के साथ सेवन करने से बन्ध्यापन अवश्य दूर होता है। साथ ही मैनफल के बीजों का चूर्ण 8 से 10 रत्ती गुड़ में मिलाकर बत्ती बनाकर योनि में धारण करना चाहिए। दोनों प्रकार की औषधियों के प्रयोग से गर्भाशय की सूजन, मासिक-धर्म का कष्ट के साथ आना, अनियमित स्राव आदि विकार नष्ट हो जाते हैं।
३. गुग्गुल: गुग्गुल एक ग्राम और रसौत को मक्खन के साथ मिलाकर प्रतिदिन तीन खुराक सेवन करने से श्वेतप्रदर के कारण जो बन्ध्यापन होता है। वह दूर हो जाता है। अर्थात श्वेतप्रदर दूर होकर बन्ध्यापन (बांझपन) नष्ट हो जाता है।
४. तेजपात-
* गर्भाशय की शिथिलता (ढीलापन) के चलते यदि गर्भाधान न हो रहा तो तेजपात (तेजपत्ता का चूर्ण) 1 से 4 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से गर्भाशय की शिथिलता दूर हो जाती है तथा स्त्री गर्भधारण के योग्य बन जाती है।
* कभी-कभी किसी स्त्री को गर्भाधान ही नहीं होता है बांझपन की समस्या का सामना करना पड़ता है। किसी को गर्भ रुकने के बाद गर्भस्राव हो जाता है। तेजपात दोनों ही समस्याओं को खत्म करता है। तेजपात का पाउडर चौथाई चम्मच की मात्रा में तीन बार पानी से नियमित लेना चाहिए। कुछ महीने तेजपात की फंकी लेने से गर्भाशय की शिथिलता दूर होकर गर्भाधान हो जाता है जिन स्त्रियों को गर्भस्राव होता है, उन्हें गर्भवती होने के बाद कुछ महीने तेजपत्ते के पाउडर की फंकी लेनी चाहिए। इस तरह तेजपत्ते से गर्भ सम्बन्धी दोष नष्ट हो जाते हैं और स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।
५. तुलसी -
यदि किसी स्त्री को मासिक-धर्म नियमित रूप से सही मात्रा में होता होता हो, परन्तु गर्भ नहीं ठहरता हो तो उन स्त्रियों को मासिक-धर्म के दिनों में तुलसी के बीज चबाने से या पानी में पीसकर लेने अथवा काढ़ा बनाकर सेवन करने से गर्भधारण हो जाता है। यदि गर्भ स्थापित न हो तो इस प्रयोग को 1 वर्ष तक लगातार करें। इस प्रयोग से गर्भाशय निरोग, सबल बनकर गर्भधारण के योग्य बनता है।
6. नागकेसर-
नागकेसर (पीला नागकेशर) का चूर्ण 1 ग्राम गाय (बछड़े वाली) के दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करें, और यदि अन्य कोई प्रदर रोगों सम्बन्धी रोगों की शिकायत नहीं है तो निश्चित रूप से गर्भस्थापन होगा। गर्भाधान होने तक इसका नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। इसमें गर्भधारण में अवश्य ही सफलता मिलती है।
७. कंटकारी-
कंटकारी, भटकटैया और रेंगनीकाट आदि नामों से इसे जाना जाता है। इसके फल आधे से एक इंच व्यास के चिकने, गोल और पीले तथा कभी-कभी सफेद रंग के होते हैं। ये सभी हरे रंग के और धारी युक्त होते हैं। फूलों की दृष्टि से ये दो प्रकार के होते हैं। एक गहरे नीले रंग की तथा दूसरा सफेद रंग की। सफेद रंग वाली को श्वेत कंटकारी कहते हैं। श्वेत कंटकारी की ताजी जड़ को दूध में पीसकर मासिकस्राव के चौथे दिन से प्रतिदिन दो ग्राम पिलाने से गर्भधारण होता है।



8. गोखरू-

* छोटा गोखरू और तिल को समान मात्रा में लेकर, चूर्ण बनाकर रख लें। इसे 4 से 8 ग्राम सुबह-शाम बकरी के दूध में सेवन करने से गर्भाशय शुद्ध होकर बंधत्व (बांझपन) नष्ट हो जाता है। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि गोखरू दो प्रकार का होता है। एक छोटा और दूसरा बड़ा। यहां छोटे गोखरू के बारे में लिखा गया है। बड़े वाले गोखरू में यह क्षमता नहीं होती है।
* लगभग 10-20 ग्राम गोखरू के फल के चूर्ण की फंकी देने से स्त्रियों में बांझपन (Banjhpan)का रोग मिट जाता है।
9. अमरबेल-
अमरबेल या आकाशबेल (जो बेर के समान वृक्षों पर पीले धागे के समान फैले होते हैं) को छाया में सुखाकर रख लें। इसे चूर्ण बनाकर मासिक-धर्म के चौथे दिन से पवित्र होकर प्रतिदिन स्नान के बाद 3 ग्राम चूर्ण 3 ग्राम जल के साथ सेवन करना चाहिए। इसे नियमित रूप से नौ दिनों तक सेवन करना चाहिए। सम्भवत: प्रथम आवृत्ति में ही गर्भाधान हो जाएगा। यदि ऐसा न हो सके तो योग पर अविश्वास न कर अगले आवृत्ति में भी प्रयोग करें, इसे घाछखेल के नाम से भी जाना जाता है। इसकी कच्चे धागे के क्वाथ (काढ़ा) से गर्भपात होता है
10. विष्णुकान्ता-
पति-पत्नी दोनों को विष्णुकान्ता (नीलशंखपुष्पी) के पत्तों का रस लगभग 20 से 40 ग्राम की मात्रा में या 40 से 80 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए। इससे पति की पूयमेह, शुक्रमेह, मूत्रकृच्छ और धातु की दुर्बलता दूर होती है। पत्नी की गर्भाशय के दुर्बलता के कारण गर्भाधान न होने की शिकायत भी दूर हो जाएगी।
11. गम्भारीफल-
 यदि किसी स्त्री का गर्भाशय छोटा होने के कारण या सूख जाने की वजह से बंध्यापन (बांझपन) हो तो गम्भारीफल की मज्जा और मुलहठी (मुलेठी) को 250 ग्राम की मात्रा में गर्म दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से गर्भाशय पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाता है और बांझपन दूर हो जाता है।
12. बिजौरा नींबू-
: बिजौरा नींबू के बीजों को दूध में पकाकर, एक चम्मच घी मिलाकर मासिकस्राव के चौथे दिन से प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से गर्भ की स्थापना निश्चित रूप से होती है। पन्द्रह दिनों तक क्रम नियमित रूप से जारी रखना चाहिए। यदि पहले महीने में गर्भधारण न हो तो अगले मासिकस्राव के चौथे दिन से इसे पुन: जारी करना चाहिए। यह प्रयोग व्यर्थ नहीं जाता है। इससे गर्भधारण अवश्य ही होता है।


१३. दालचीनी-

* वह पुरुष जो बच्चा पैदा करने में असमर्थ होता है, यदि प्रतिदिन तक सोते समय दो बड़े चम्मच दालचीनी ले तो वीर्य में वृद्धि होती है और उसकी यह समस्या दूर हो जाएगी।
*जिस स्त्री के गर्भाधान ही नहीं होता, वह चुटकी भर दालचीनी पावडर एक चम्मच शहद में मिलाकर अपने मसूढ़ों में दिन में कई बार लगायें। थूंके नहीं। इससे यह लार में मिलकर शरीर में चला जाएगा। एक दम्पत्ति को 14 वर्ष से संतान नहीं हुई थी, महिला ने इस विधि से मसूढ़ों पर दालचीनी, शहद लगाया, वह कुछ ही महीनों में गर्भवती हो गई और उसने पूर्ण विकसित दो सुन्दर जुड़वा बच्चों का जन्म दिया।
१४.. गाजर -
बांझ स्त्री (जिस औरत के बच्चा नहीं होता) को गाजर के बीजों की धूनी इस प्रकार दें कि उसका धुंआं रोगिणी की बच्चेदानी तक चला जाए। इसके लिए जलते हुए कोयले पर गाजर के बीज डालें। इससे धुंआ होगा। इसी धूनी को रोगिणी को दें तथा रोजाना उसे गाजर का रस पिलायें। इससे बांझपन दूर हो जाएगा।
१५.. अजवायन -
मासिकधर्मोंपरान्त आठवे दिन से नित्य अजवाइन और मिश्री 25-25 ग्राम लेकर 125 मिलीलीटर पानी में रात्रि के समय एक मिट्टी के बर्तन में भिगों दे तथा प्रात:काल के समय ठंडाई की भांति घोट-पीसकर सेवन करें। भोजन में मूंग की दाल और रोटी बिना नमक की लें। इस प्रयोग से गर्भ धारण होगा।
१६॰ हींग-
 यदि गर्भाशय में वायु (गैस) भर गई हो तो थोड़ी-सी कालीहींग को कालीतिलों के तेल में पीसकर तथा उसमें रूई का फोहा भिगोकर तीन दिन तक योनि में रखे। इससे बांझपन (Banjhpan)का दोष नष्ट हो जाएगा। प्रतिदिन दवा को ताजा ही पीसना चाहिए।
१७.हरड़ -


यदि गर्भाशय में कीडे़ पड़ गये हों तो हरड़, बहेड़ा, और कायफल, तीनों को साबुन के पानी के साथ सिल पर महीन पीस लें, फिर उसमें रूई का फोहा भिगोकर तीन दिनों तक योनि में रखना चाहिए। इस प्रयोग से गर्भाशय के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

१८. कस्तूरी-
यदि गर्भाशय उलट गया हो तो कस्तूरी और केसर को समान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर गोली बना लें। इस गोली को ऋतु (माहवारी होने के पहले) भग (योनि) में रखें। इसी प्रकार तीन दिनों तक गोली रखने से गर्भाशय ठीक हो जाता है।
१९. समुन्दरफल-
समुन्दरफल, कालानमक और थोड़ा सा लहसुन पीसकर, रूई के फाहे में लपेटकर योनि में रखने से जला हुआ गर्भाशय ठीक हो जाता है। यदि इससे जलन होने लगे तो फाहे को निकालकर फेंक देना चाहिए तथा दिन में एक बार इसे पुन: रखना चाहिए। इसे ऋतुकाल (माहवारी) के पहले दिन से लेकर तीसरे दिन तक योनि में रखना चाहिए।
२०. जीरा -
काला जीरा, हाथी का नख तथा एरण्ड (अरण्डी) का तेल को महीन करके पीस लें। फिर उसमें रूई का फोहा तर करके तीन दिन तक योनि में रखें। इससे गर्भाशय का बढ़ा हुआ मांस ठीक हो जाता है।
२१. ढाक- 
ढाक (छिउल) के बीजों की भस्म राख बना लें, इसे माहवारी खत्म होने के बाद स्त्री को 3 ग्राम की मात्रा में मिश्री मिले दूध के साथ खिलाना चाहिए। इससे बांझपन (Banjhpan)दूर हो जाता है।
२२. शिवलिंगी-
 शिवलिंगी के बीज नौ दाने, सूर्योदय के समय सूर्यदर्शन करके स्नान करके पति के हाथ से लेकर दूध के साथ खाएं। माहवारी खत्म होने के बाद सूर्य का व्रत भी करें। इसी दिन व्रत में ही धूप दीप से सूर्य की पूजा करें। कुछ भोजन न करें। केवल दूध का ही सेवन करें। रात्रि में संभोग करें। इससे अवश्य ही गर्भधारण हो जाएगा। इसे एक सप्ताह तक अवश्य प्रयोग करें।


२३ नौसादर-
20-20 ग्राम की मात्रा में नौसादर और बीजा बेल को पीसकर चार गोली 10-10 ग्राम की बनाकर रख लें। एक गोली रजस्वला के साथ खाएं। दूध का सेवन करे। गर्भ शुद्ध होने पर संभोग करना चाहिए। यदि पांचवें, सातवें, नौवे, ग्यारहवें, तेरहवें दिन संभोग करें तो पुत्र की प्राप्ति होगी।
२४. फिटकरी: मासिक-धर्म ठीक होने पर भी यदि संतान न होती हो तो रूई के फाये में फिटकरी लपेटकर पानी में भिगोकर रात को सोते समय योनि में रखें। सुबह निकालने पर रूई में दूध की खुर्चन सी जमा होगी। फोया तब तक रखें, जब तक खुर्चन आता रहे। जब खुर्चन आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि बांझपन रोग समाप्त हो गया है।
२५. बच-
यदि गर्भाशय शीतल (ठंडा) हो गया तो बच, काला जीरा , और असगंध इन तीनों को सुहागे के पानी में पीसकर उसमें रूई का फाहा भिगोकर तीन दिनों तक योनि में रखने से उसकी शीतलता दूर हो जाती है। इस प्रयोग के चौथे दिन मैथुन करने से गर्भ ठहर जाता है।
२६. कायफल-
 कायफल को कूट-छानकर चूर्ण बना लें, फिर उसमें बराबर मात्रा में शक्कर मिलाकर रख लें। ऋतु स्नान के तीन दिनों तक इस चूर्ण को एक मुट्ठी भर सेवन करते हैं। पथ्य में केवल दूध और चावल का सेवन करना चाहिए। इसके चौथे दिन संसार- व्यवहार (स्त्री-प्रसंग) करने से गर्भ ठहर जाता है।
२७. असगंध-
<> असंगध, नागकेसर और गोरोचन इन तीनों को समान मात्रा में बराबर मात्रा में लेकर पीस-छान लें। इसे शीतल जल के साथ सेवन करें तो गर्भ ठहर जाता है।
* असगंध का चूर्ण 50 ग्राम की मात्रा में लेकर कूटकर कपड़छन कर लें। जब रजस्वला स्त्री स्नान करके शुद्ध हो जाए तो 10 ग्राम इसका सेवन घी के साथ करें। उसके बाद पुरुष के साथ रमण (मैथुन) करें तो इससे बांझपन दूर होकर महिला गर्भवती हो जाएगी।
२८. खिरेंटी- 

२९. छोटी पीपल-
छोटी पीपल, सोंठ, कालीमिर्च तथा नागकेसर तीनों को समान मात्रा में पीसकर रख लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम की मात्रा में गाय के घी में मिलाकर मासिक-स्राव के चौथे दिन स्त्री को सेवन करायें तथा रात को सहवास करें तो उसे पुत्र की प्राप्ति होती है।
३०. बरियारी-
 बरियारी, गंगेरन, मुलहठी, काकड़ासिंगी, नागकेसर मिश्री इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर पीस-छानकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को लगभग 10 ग्राम लेकर घी, दूध तथा शहद में मिलाकर पीने से बांझ स्त्री को भी मातृत्व सुख मिलता है।
३१. अतिबला- 
अतिबला के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान के बाद, दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।
३२. बबूल (कीकर)-
 कीकर (बबूल) के वृक्ष में चार-पांच गज की दूरी पर एक फोड़ा सा निकलता है। जिसे कीकर का बान्दा कहा जाता है। इसे लेकर कूटकर छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को तीन ग्राम की मात्रा में माहवारी के समाप्ति के अगले दिन से तीन दिनों तक सेवन करें। फिर पति के साथ संभोग करे इससे गर्भ अवश्य ही धारण होगा।
३३. आक -
सफेद आक की छाया में सूखी जड़ को महीन पीसकर, एक-दो ग्राम की मात्रा में 250 मिलीलीटर गाय के दूध के साथ सेवन स्त्री को करायें। शीतल पदार्थो का पथ्य देवें। इससे बंद ट्यूब व नाड़ियां खुलती हैं, व मासिक-धर्म व गर्भाशय की गांठों में भी लाभ होता है।
३४. लहसुन-
सुबह के समय 5 कली लहसुन की चबाकर ऊपर से दूध पीयें। यह प्रयोग पूरी सर्दी के मौसम में रोज करने से स्त्रियों का बांझपन दूर हो जाता है।



18.10.17

शरद ऋतु (Winter Season) में खान पान आहार विहार



   वर्षा ऋतु के तुरंत बाद ही शरद ऋतु (Winter Season) शुरु हो जाती है. आश्विन और कार्तिक मास में शरद ऋतु का आगमन होता है. वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से पित्त दोष का संचय होता है
शरद ऋतु (Winter Season) दस्तक दे चुकी है. तो ऋतु बदलने के साथ साथ हमारा खान पान भी इसके अनुसार ही होना चाहिए. आज का हमारा लेख इसी पर आधारित है. इसमें हम बता रहे है कि शरद ऋतु (Winter Season) में हमारा भोजन कैसा होना चाहिए. जिससे हम स्वस्थ के साथ इस ऋतु का भरपूर मजा ले सकते है.
शरद ऋतु में कैसा हो खान पान
खीर का सेवन – शरद ऋतु (Winter Season) में सूर्य का ताप बहुत अधिक होता है. ताप के कारण पित्त दोष पैदा होता है. ऐसे में पित्त से पैदा होने वाले रोग पैदा होते है. पित्त की विकृति में चावल तथा दूध से बनी खीर का सेवन किया जाता है. शरद पूर्णिमा पर इसलिए खीर का विशेष सेवन किया जाता है.



पित्त को शांत करने वाले खाद्य पदार्थो का सेवन – शरद ऋतु (Winter Season) में पित्त शांत करने वाले पदार्थो का सेवन अति आवश्यक होता है. शरद ऋतु में लाल चावल, नये चावल तथा गेहूं का सेवन करना चाहिए. कडवे द्रव्यों से सिद्ध किये गये घी के सेवन से लाभ मिलता है. प्रसिद्ध महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत ने कहा है की शरद ऋतु में मधुर, कडवे तथा कैसले पदार्थो का सेवन करना चिहिए. दूध, गन्ने के रस से बने खाद्य, शहद, चावल तथा मुंग आदि का सेवन लाभदायक होता है. कुछ विशेष जंगली जानवरों का मास भी गुणकारी होता है.

नीम्बू तथा शहद के जल का सेवन – 
शरद ऋतु (Winter Season) में चंद्रमा की किरणों में रखे गये भोजन को उत्तम माना गया है. सुबह के समय हल्के गर्म पानी में एक निम्बू का रस तथा शहद मिलाकर पीने से पित्त दोष का नाश होता है. शरद ऋतु में भोजन के बाद 1-2 केले खा सकते है. केला शरीर को पोषक तत्व तो देता ही है. साथ में पित्त दोष का दमन भी करता है. केला खाकर जल नहीं पीना चाहिए.
खुली छत पर ना सोयें – शरद ऋतु में दिन में तो गर्मी रहती है पर रात को ठण्ड होती है. ऐसे में रात को खुली छत पर नहीं सोना चाहिए. ओस पड़ने से सर्दी, जुकाम तथा खांसी हो सकती है.
हेमंत ऋतु में कैसा हो खान पान-

हेमंत ऋतु अथवा शीत ऋतु आगमन शरद ऋतु के समापन के साथ ही होने लगता है. शीतल हवा का प्रकोप बढ़ने लगता है. शीतल वायु के प्रकोप से शरीर की रुक्षता बढ़ने लगती है. शरीर में जठराग्नि बढ़ने से मेटाबोलिज्म प्रबल होने से भूख अधिक लगने लगती है. इससे सभी तरह के खाद्य पदार्थ आसानी से पाच जाते है.



शक्ति संचय की ऋतु– 
पाचन क्रिया तेज होने के कारण हेमंत ऋतु को शक्ति संचय की ऋतु भी कहा जाता है. इस ऋतु में खानपान पर नियन्त्रण रख कर शारीरिक व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाया जा सकता है. भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हेमंत ऋतु में अस्थमा या दमा, खांसी, संधिशुल, वातरक्त, आमवात, सर्दी जुकाम तथा गले के रोग तीव्र गति से पैदा होते है.
मधुर तथा लवण युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन – 
हेमंत ऋतु में सर्दी के प्रकोप से बचना चाहिए. मीठे तथा लवण रस वाले पदार्थो का सेवन करना चाहिए. जठराग्नि प्रबल होने से नया अनाज भी आसानी से पच जाता है. अधिक प्रोटिन वाले पदार्थ सेवन कर सकते है. उडद, राजमा, मुंग, मोठ सब कुछ आसानी से पच जाता है.शरद ऋतु में ऋतु में चावल, गेहूं, जो, मूंग की दाल,
शक्कर, शहद, परवल ,आंवला, अंगूर, दूध, गुड़, थोड़ी मात्रा में नमकीन पदार्थ, नदी का जल, कसैले पदार्थों का सेवन हितकर है|

इस ऋतु में चांदनी में रहना शरद कालीन फूलों की माला पहनना शरीर पर चंदन यकस का लेप करना तालाब के किनारे भ्रमण करना स्वच्छ हल के ऊनी वस्त्र पहनना तेल की मालिश करके गुनगुने पानी से नहाना स्वास्थ्य के लिए बहुत हितकर होता है
शरद ऋतु में अपथ्य-
 धूप तापमान औस पर नंगे पैर चलना वह गिरते समय खुले में रहना अत्यधिक व्यायाम, पुरवइया हवा में रहना, दही, खट्टे, कड़वे, तेल तले, गर्म चर्बीदार तथा क्षेत्रीय पदार्थों का सेवन लाल मिर्च का सेवन, दिन में सोना, भरपेट भोजन का त्याग करना चाहिए 
   इस ऋतु में जुलाब आदि द्वारा पेट की शुद्धि कर लेने से पित्तजन्य अनेक व्याधियों से बचाव होता है|



16.10.17

भगंदर को जड़ से खत्म करने के घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खे




भगन्दर क्या है ?
यह एक प्रकार का नाड़ी में होने वाला रोग है, जो गुदा और मलाशय के पास के भाग में होता है। भगन्दर में पीड़ाप्रद दानें गुदा के आस-पास निकलकर फूट जाते हैं। इस रोग में गुदा और वस्ति के चारो ओर योनि के समान त्वचा फैल जाती है, जिसे भगन्दर कहते हैं। `भग´ शब्द को वह अवयव समझा जाता है, जो गुदा और वस्ति के बीच में होता है। इस घाव (व्रण) का एक मुंख मलाशय के भीतर और दूसरा बाहर की ओर होता है। भगन्दर रोग अधिक पुराना होने पर हड्डी में सुराख बना देता है जिससे हडि्डयों से पीव निकलता रहता है और कभी-कभी खून भी आता है।
भगन्दर रोग अधिक कष्टकारी होता है। यह रोग जल्दी खत्म नहीं होता है। इस रोग के होने से रोगी में चिड़चिड़ापन हो जाता है। इस रोग को फिस्युला अथवा फिस्युला इन एनो भी कहते हैं।
विभिन्न भाषाओं में रोग का नाम : हिन्दी-भगन्दर। ,अंग्रेजी-फिस्चुला इन एनो। ,अरबी-नलिघा। ,बंगाली-भगन्दर। ,गुजराती-भगन्दर।
भगन्दर के प्रकार – 
भगन्दर आठ प्रकार का होता है-
1. वातदोष से शतपोनक
2. पित्तदोष से उष्ट्र-ग्रीव 
3. कफदोष से होने वाला
 4. वात-कफ से ऋजु 
5. वात-पित्त से परिक्षेपी 
6. कफ पित्त से अर्शोज 
7. शतादि से उन्मार्गी और
 8. तीनों दोषों से शंबुकार्त नामक भगन्दर की उत्पति होती है।
1. शतपोनक नामक भगन्दर :
शतपोनक नामक भगन्दर रोग कसैली और रुखी वस्तुओं को अधिक खाने से होता है। जिससे पेट में वायु (गैस) बनता है जो घाव पैदा करती है। चिकित्सा न करने पर यह पक जाते हैं, जिससे अधिक दर्द होता हैं। इस व्रण के पक कर फूटने पर इससे लाल रंग का झाग बहता है, जिससे अधिक घाव निकल आते हैं। इस प्रकार के घाव होने पर उससे मल मूत्र आदि निकलने लगता है।
2. पित्तजन्य उष्ट्रग्रीव भगन्दर : 
इस रोग में लाल रंग के दाने उत्पन्न हो कर पक जाते हैं, जिससे दुर्गन्ध से भरा हुआ पीव निकलने लगता है। दाने वाले जगह के आस पास खुजली होने के साथ हल्के दर्द के साथ गाढ़ी पीव निकलती रहती है।
3. वात-कफ से ऋजु : 
वात-कफ से ऋजु नामक भगन्दर होता है जिसमें दानों से पीव धीरे-धीरे निकलती रहती है।
4. परिक्षेपी नामक भगन्दर :
 इस रोग में वात-पित्त के मिश्रित लक्षण होते हैं।
5. ओर्शेज भगन्दर : 
इसमें बवासीर के मूल स्थान से वात-पित्त निकलता है जिससे सूजन, जलन, खाज-खुजली आदि उत्पन्न होती है।
4. शम्बुकावर्त नामक भगन्दर : 
इस तरह के भगन्दर से भगन्दर वाले स्थान पर गाय के थन जैसी फुंसी निकल आती है। यह पीले रंग के साथ अनेक रंगो की होती है तथा इसमें तीन दोषों के मिश्रित लक्षण पाये जाते हैं।


5. उन्मार्गी भगन्दर : 
उन्मर्गी भगन्दर गुदा के पास कील-कांटे या नख लग जाने से होता है, जिससे गुदा में छोटे-छोटे कृमि उत्पन्न होकर अनेक छिद्र बना देते हैं। इस रोग का किसी भी दोष या उपसर्ग में शंका होने पर इसका जल्द इलाज करवाना चाहिए अन्यथा यह रोग धीरे-धीरे अधिक कष्टकारी हो जाता है।
भगन्दर के लक्षण – 
भगन्दर रोग उत्पंन होने के पहले गुदा के निकट खुजली, हडि्डयों में सुई जैसी चुभन, दर्द, दाह (जलन) तथा सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। भगन्दर के पूर्ण रुप से निकलने पर तीव्र वेदना (दर्द), नाड़ियों से लाल रंग का झाग तथा पीव आदि निकलना इसके मुख्य लक्षण हैं।
भोजन और परहेज :
आहार-विहार के असंयम से ही रोगों की उत्पत्ति होती है। इस तरह के रोगों में खाने-पीने का संयम न रखने पर यह बढ़ जाता है। अत: इस रोग में खास तौर पर आहार-विहार पर सावधानी बरतनी चाहिए। इस प्रकार के रोगों में सर्व प्रथम रोग की उत्पति के कारणों को दूर करना चाहिए क्योंकि उसके कारण को दूर किये बिना चिकित्सा में सफलता नहीं मिलती है। इस रोग में रोगी और चिकित्सक दोनों को सावधानी बरतनी चाहिए।
: गुदाभ्रंश के सरल 25 आयुर्वेदिक घरेलु उपचार 
1. सांप की केंचुली : 
सांप द्वारा उतारे गये केंचुली का भस्म (राख) बनाकर इसमें तम्बाकू के गुल को मिलाकर सरसों के तेल के साथ लेप करने से नाड़ी व्रण नष्ट होते हैं तथा रोग में लाभ होता है।
2. कालीमिर्च :
 लगभग 10 कालीमिर्च और खादिर (कत्था) 5 ग्राम मिलाकर पीसकर इसके मिश्रण को भगन्दर पर लगाने से पीड़ा खत्म होती है।
3. आंवला : 
आंवले का रस, हल्दी और दन्ती की जड़ 5-5 ग्राम की मात्रा में लें। और इसको अच्छी तरह से पीसकर इसे भगन्दर पर लगाने से घाव नष्ट होता है।
4. आक :
★ आक का 10 मिलीलीटर दूध और दारुहल्दी का दो ग्राम महीन चूर्ण, दोनों को एक साथ खरलकर बत्ती बनाकर भगन्दर के घावों में रखने से शीघ्र लाभ होता है।
★ आक के दूध में कपास की रूई भिगोकर छाया में सुखा कर बत्ती बनाकर, सरसों के तेल में भिगोकर घावों पर लगाने से लाभ होता है।
5. पुनर्नवा :
★ पुनर्नवा, हल्दी, सोंठ, हरड़, दारुहल्दी, गिलोय, चित्रक मूल, देवदार और भारंगी के मिश्रण को काढ़ा बनाकर पीने से सूजनयुक्त भगन्दर में अधिक लाभकारी होता है। पुनर्नवा शोथ-शमन कारी गुणों से युक्त होता है।
★ पुनर्नवा के मूल को वरुण (वरनद्ध की छाल के साथ काढ़ा बनाकर पीने से आंतरिक सूजन दूर होती है। इससे भगन्दर के नाड़ी-व्रण को बाहर-भीतर से भरने में सहायता मिलती है।
6. खैर :
★ खैर, हरड़, बहेड़ा और आंवला का काढ़ा बनाकर इसमें भैंस का घी और वायविण्डग का चूर्ण मिलाकर पीने से किसी भी प्रकार का भगन्दर ठीक होता है।
★ खैर की छाल और त्रिफले का काढ़ा बनाकर उसमें भैस का घी और वायविडंग का चूर्ण मिलाकर देने से लाभ होता है।
★ खैरसार, 
बायबिडंग, हरड़, बहेड़ा एवं आंवला 10 ग्राम तथा पीपल 20 ग्राम इन सब को कूट पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में शहद और मीठा तेल (धुला तिल का तेल) मिलाकर चाटने से भगन्दर, नाड़ी व्रण आदि ठीक होता है।
7. गूलर : 
गूलर के दूध में रूई का फोहा भिगोंकर, नासूर और भगन्दर के अन्दर रखने और उसको प्रतिदिन बदलते रहने से नासूर और भगन्दर ठीक हो जाता है।
8. भांगरा : 
भांगरा की पुल्टिश बनाकर कुछ दिनों तक लगातार बांधने से थोड़े ही दिनों में भगन्दर शुद्ध होकर भ
9. सहजना (शोभांजनाद) : 
सहजने का काढ़ा बनाकर उस में हींग और सेंधानमक डालकर पीने से लाभ होता है। सहजना (शोभांजनाद) वृक्ष की छाल का काढ़ा भी पीना अधिक लाभकारी होता है।
10. नारियल :
एक नारियल का ऊपरी खोपरा उतारकर फेंक दे और उसका गोला लेकर उस में एक छेद कर दें। उस नारियल को वट वृक्ष के दूध से भरकर उसके छेद दो अंगुल मोटी मिट्टी के लेप से बन्द कर उपले के आग पर पका लें। पक जाने पर लेप हटाकर उसका रस निकालकर उस में 5-6 ग्राम त्रिफला का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से भगन्दर का रोग ठीक हो जाता है।
11.. सुहागा : 
4 ग्राम सुहागा को 60 मिलीलीटर जल के साथ घोलकर पीने से खुजली नष्ट होती है। नासूर में लाभ होता है।
12. सैंधानमक : 
सैंधानमक और शहद की बत्ती बनाकर नासूर में रखने से दर्द में आराम मिलता है।
13. बड़ी माई : 
बड़ी माई का कपड़छन चूर्ण 8 ग्राम, अफीम 2 ग्राम और सफेद वैसलीन 20 ग्राम मिलाकर प्रतिदिन दो से तीन बार गुदा के घाव पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।



14. बरगद : 
बरगद के पत्तें, सोठ, पुरानी ईंट के पाउडर, गिलोय तथा पुनर्नवा मूल का चूर्ण सहभाग लेकर पानी के साथ पीसकर लेप करने से फायदा होता है।
15. त्रिफला : त्रिफला को जल में उबालकर उस जल को छानकर उससे भगन्दर को धोने से जीवाणु नष्ट होते हैं।
16. नीम :
★ नीम की पत्तियां, घी और तिल 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर उसमें 20 ग्राम जौ के आटे को मिलाकर जल से लेप बनाएं। इस लेप को वस्त्र के टुकड़े पर फैलाकर भगन्दर पर बांधने से लाभ होता है।
★ नीम की पत्तियों को पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर की विकृति नष्ट होती है।
★ नीम के पत्ते, तिल और मुलैठी गाढ़ी छाछ में पीसकर दर्द वाले तथा खूनी भगन्दर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।
★ बराबर मात्रा में नीम और तिल का तेल मिलाकर प्रतिदिन दो या तीन बार भगन्दर के घाव पर लगाने से आराम मिलता है।
17. तिल : 
नीम का तेल और तिल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर नासूर में लगाने से भगन्दर ठीक होता है।
18. अंकोल : 
अंकोल का तेल 100 मिलीलीटर और मोम 25 ग्राम लेकर उसे आग पर गर्म करें और उसमें 3 ग्राम तूतिया (नीला थोथा) मिलाकर लेप करने से नाड़ी में उत्पन्न दाने नष्ट हो जाते हैं।
19. अनार :
★ मुट्ठी भर अनार के ताजे पत्ते को दो गिलास पानी में मिलाकर गर्म करें। आधे पानी शेष रहने पर इसे छान लें। इसे उबले हुए मिश्रण को पानी में हल्के गर्मकर सुबह शाम गुदा को सेंके और धोयें। इससे भगन्दर ठीक होता है।
★ अनार की पेड़ की छाल 10 ग्राम लेकर उसे 200 मिलीलीटर जल के साथ आग पर उबाल लें। उबले हुए जल को किसी वस्त्र से छानकर भगन्दर को धोने से घाव नष्ट होते हैं।
20. तिल : तिल, एरण्ड की जड़ और मुलहठी को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर थोड़े-से दूध के साथ पीसकर भगन्दर पर उसका लेप करने से रोग में आराम मिलता है।
21. दारुहल्दी : 
दारुहल्दी का चूर्ण बनाकर उसे आक के दूध के साथ अच्छी तरह से मिलाकर हल्का गर्म कर उसका वर्तिका (बत्ती) बनाकर घावों पर लगाना अधिक लाभकारी होता है।
22. डिटोल : 
डिटोल मिले जल से भगन्दर को अच्छी तरह से साफ करें। इसके बाद उस पर नीम की निबौली लगाने से भगन्दर का घाव नष्ट होता है।
23. फिटकरी :
 भुनी फिटकरी 1-1 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम पानी के साथ पीना चाहिए। कच्ची फिटकरी को पानी में पीसकर इसे रूई की बत्ती में लगाकर भगन्दर के छेद में भर दें। इससे रोग में अधिक लाभ होता है।
24 रस सिंदूर : 
रस सिंदूर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, त्रिफला पिसा 1 ग्राम और एक बायबिण्डग के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम खाना चाहिए।
25. धुआंसा : 
घर का धुआंसा, हल्दी, दारुहल्दी, लोध्र, बच, तिल, नीम के पत्ते और हरड़-इन सबको बराबर मात्रा में लें, और उसे पानी के साथ महीन पीसकर लेप करने से भगन्दर का घाव शुद्ध होकर भर जाता है।
26. अडूसा : 
अडूसे के पत्ते को पीसकर टिकिया बनाकर तथा उस पर सेंधा नमक बुरक कर बांधने से भगन्दर ठीक होता है।
27. गुड़ :
 पुराना गुड़, नीलाथोथा, गन्दा बिरोजा तथा सिरस इन सबको बराबर मात्रा लेकर थोड़े से पानी में घोंटकर मलहम बना लें तथा उसे कपड़े पर लगाकर भगन्दर के घाव पर रखने से कुछ दिनों में ही यह रोग ठीक हो जाता है।
28. हरड़ : 
हरड़, बहेड़ा, आंवला, शुद्ध भैंसा गुग्गुल तथा बायबिडंग इन सब का काढ़ा बनाकर पीने से तथा प्यास लगने पर खैर का रस मिला हुआ पानी पीने से भगन्दर नष्ट होता है।
29 निशोथ :
 निशोथ, तिल, जमालगोटा, मजीठ, और सेंधानमक इनको पीसकर घी तथा शहद में मिलाकर लेप करने से भगन्दर ठीक हो जाता है।
30. सांठी : 
सांठी की जड़, गिलोय, सोंठ, मुलहठी तथा बेरी के कोमल पत्ते, इनको महीन पीसकर इसे हल्का गर्म कर लेप करने से भगन्दर में लाभ होता है।
31. रसौत :
 रसौत, दोनों हल्दी, मजीठ, नीम के पत्ते, निशोथ, तेजबल-इनको महीन पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर ठीक हो जाता है।
32 बिलाई की हाड़ : 


बिलाई की हड्डी (हाड़) को त्रिफला के रस में घिसकर भगन्दर रोग में लगाने से भगन्दर रोग ठीक होता है।
33. गेहूं : 
गेहूं के छोटे-छोटे पौधों के रस को पीने से भगन्दर ठीक होता है।
34 चमेली : 
चमेली के पत्ते, बरगद के पत्ते, गिलोय और सोंठ तथा सेंधानमक को गाढ़ी छाछ में पीसकर भगन्दर पर लगाने से भगन्दर नष्ट होता है।
35. दारुहरिद्रा :
 दारुहरिद्रा का चूर्ण आक (मदार) के दूध के साथ मिलाकर बत्ती बना लें। बत्ती को भगन्दर तथा नाड़ी व्रण पर लगाने से भगन्दर में आराम रहता है।
36. सहोरा (सिहोरा) : 
सहोरा (सिहोरा) के मूल (जड़) को पीसकर भगन्दर में लगाने से रोग ठीक होता है।
37. थूहर : 
थूहर का दूध, आक का दूध और हल्दी मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से रोग ठीक होता है।
38. शहद :
 शहद और सेंधानमक को मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से भगन्दर रोग में आराम मिलता है।
39. मुर्दासंख :
 मुर्दासंख को पीसकर भगन्दर के सूजन पर लगाने से सूजन खत्म होती है।
40  पिठवन :
★ पिठवन के 8-10 पत्तों को पीसकर लेप करने से भगन्दर के रोग में बहुत लाभ होता है।
★ लगभग 10 मिलीलीटर पिठवन के पत्तों के रस को नियमित कुछ दिनों तक सेवन करने से भगन्दर रोग नष्ट हो जाता है।
★ पिठवन में थोड़ा सा कत्था मिलाकर पीसकर लेप करने से या कत्था तथा कालीमिर्च को बराबर मात्रा में मिलाकर पीसकर रोगी को पिलाने से भगन्दर के रोग में लाभ मिलता होता है।
41. लता करंज :
★ लगभग आधा ग्राम से 2 ग्राम करंज के जड़ की छाल का दूधिया रस की पिचकारी भगन्दर में देने से भगन्दर जल्दी भर जाता है।
दूषित कीडे़ से भरे भगन्दर के घावों पर करंज के पत्तों की पुल्टिस बनाकर बांधें अथवा कोमल पत्तों का रस 10-42 ग्राम की मात्रा में निर्गुण्डी या नीम के पत्तों के रस में मिलाकर कपास के फोहे से भगन्दर के व्रण (घाव) पर बांधें या नीम के पत्ते का रस में कपास का फोहा तर कर घाव पर लगाने से रोग में आराम मिलता है।
★ करंज के पत्ते और निर्गुण्डी या नीम के पत्ते को पीसकर पट्टी बनाकर भगन्दर पर बांधने से या पत्तों को कांजी में पीसकर गर्म लेप बनाकर लेप करने से रोग में आराम मिलता है।
★ भगन्दर पर करंज के पत्तों को बांधने से भगन्दर रोग में लाभ होता है।
★ करंज के मूल (जड़) का रस प्रतिदिन दो से तीन बार लगाने से भगन्दर का पुराना जख्म ठीक होता है।
43 गुग्गुल :
★ गुग्गुल और त्रिफला का चूर्ण 10-10 ग्राम को जल के साथ पीसकर हल्का गर्म करें। इस लेप को भगन्दर पर लगाने से लाभ होता है।
★ शुद्ध गुग्गल 50 ग्राम, त्रिफला पिसा 30 ग्राम और पीपल 15 ग्राम लेकर इसे कूट-छानकर इसे पानी के साथ मिलाकर, इसके चने के बराबर गोलियां बना लें। इन गोलियों को छाया में सूखाकर लगातार 15-20 दिन तक इसकी 1-1 गोलियां सुबह-शाम खायें। इससे भगन्दर ठीक होता है।
44. छोटी अरणी : छोटी अरणी के पत्तों को जल द्वारा घुले मक्खन के साथ मिलाकर पीसकर इसका मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण को रोग पर लेप करने से अधिक लाभ होता है।
45. अग्निमथ (छोटी अरणी) : अग्निमथ की जड़ को जल में उबालकर काढ़ा बनाकर इसके 15 ग्राम काढ़े में 5 ग्राम शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से भगन्दर नष्ट होता है।




15.10.17

अगर करेंगे ये उपाय तो सारी रात संबंध बनाना चाहेंगे



*कई बार लोगो के मन में संकोच और दुविधा के चलते वे बेहतर संबंध का आनंद नहीं उठा पाते और उनके हाथ निराशा लगती है। जिससे वे परेशान हो जाते है। इसी कड़ी में हम आपको पांच ऐसे तरीके बता रहे है जिससे आप चरम संबंध का आनंद उठा सकते है।
*बिस्‍तर पर महिला साथी के साथ आंखों में आंखें डालकर प्‍यार जताना, होठों को संवेदनशील अंगों पर फिराना, नाजुक अंगों का स्‍पर्श भी महिलाओं का मन मचलने के लिए काफी होता है। संबंध के दौरान अगर आप तकिये का प्रयोग करते हैं तो इससे आपकी महिला साथी को बेहद आनंद आएगा वह भी तब जब संभोग के दौरान आप तकिये को नीचे रख कर करें।



*बिना जल्दबाजी किये कम से कम एक मिनट एक दूसरे की आंखों में एकटक देखने की कोशिश करें। साथ ही एक दूसरे के लिए प्यार को महसूस करें। उसके बाद आंखों ही आंखों में इशारा करके अगली स्टेप के लिए तैयार हो जाएं।
*संबंध के समय एक दूसरे को करीब से थामे जिससे वह पूरी तरह उत्तेजित हो सके।एक दूसरे के शरीर इतने ने करीब लाएं कि दोनों को ही गर्मी का अहसास होने लगे। ताकि बाद में किसी तरह की समस्या ना खड़ी हो सके।
*संबंध के दौरान आपकी महिला साथी उम्मीद करती हैं की आप उनके शरीर के बेहद कोमल अंगों को शुरुआती दौर में जीभ व उंगलियों का इस्‍तेमाल करके जरूरी उत्तेजना पैदा करें।



वृक्क शोथ के आयुर्वेदिक घरेलू उपाय




तीव्र वृक्क शोथ होने का कारण क्या है
जीवाणु संक्रमण या कभी-कभी स्वतः ही शरीर में उत्पन्न एलर्जी के कारण वृक्कों के धमनी गुच्छो में सृजन आ जाती है, जिससे मूत्र का निस्पंदन (छानने की क्रिया) कम हो जाती है। इस रोग में मूत्र कम निकलता है तथा एलब्यूमिन के साथ- साथ रक्तकण व धमनी गुच्छो के बहिस्तर की कोशिकाएं (इपीथीलियल सैल) भी मूत्र के साथ बाहर निकलने लगती हैं। इस रोग में वृक्कों की मूत्रस्राविणी नलिकाओं तथा रक्तवाहिनियों में प्रायः कोई विकृति नहीं होती । यह 10 वर्ष की आयु में अधिक होता है और लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में अधिक होता है। बच्चों में लंबे समय तक गला खराब होने के बाद इस रोग की संभावना बढ़ जाती है।



तीव्र वृक्क शोथ के लक्षण क्या है-

रोगी के शरीर विशेष कर चेहरे व पांवों पर सूजन होती है। पहले चार-पांच दिन 100° फारेनहाइट तक हलका बुखार रहता है। पेट में दर्द, उलटी, जी मिचलाना, सांस लेने में कष्ट होना आदि लक्षण मिल सकते हैं।
तीव्र वृक्क शोथ का घरेलू चिकित्सा-
* उपवास इस रोग की चिकित्सा का प्रमुख सिद्धांत है। भोजन न करने से वृक्कों पर कार्य का भार घट जाता है जिससे आराम जल्दी मिलता है। यदि पूर्णतः उपवास सम्भव न हो तो पहले 3 दिन में दो-तीन बार आधा-आधा गिलास पानी, नीबू, ग्लूकोज आदि डालकर ले सकते हैं। जैसे-जैसे पेशाब की मात्रा बढ़ाते जाए, पेय पदार्थों की मात्रा बढ़ाते जाएं। ठोस आहार स्वास्थ्य में पर्याप्त सुधार के बाद ही शुरू करें। इसके अलावा निम्नलिखित उपचार दे सकते हैं
*मक्के के भुट्टे के 20 ग्राम बाल पाव भर पानी में उबालें, आधा रह जाने पर उतार कर गुनगुना पी लें। सुबह-शाम यह एक-एक की मात्रा में लें।
*आक के पत्तों को सुखाकर व जलाकर राख कर लें। आधा चम्मच यह राख थोड़ा-सा नमक मिलाकर एक गिलास छाछ में मिलाकर सुबह-शाम लें।
तीव्र वृक्क शोथ का आयुर्वेदिक औषधियां द्वारा इलाज-
बंग भस्म, पुनर्नवा मंडूर, स्वर्ण वसन्त मालती रस, चन्दनासव, देवदार्वाद्यारिष्ट, चन्द्रप्रभा वटी आदि आयुर्वेदिक दवाएं इस रोग में ली जा सकती हैं।