20180909

घुटने के दर्द ,सूजन से मुक्ति के उपाय

                                              


    घुटना हमारे शरीर का सबसे बड़ा और सबसे जटिल जोड़ है. ऐसा प्रायः देखा गया है की बढती हुई उम्र के साथ अक्सर लोग घुटने के दर्द से ग्रस्त हो जाते है. कभी कभी घुटने में दर्द के साथ सूजन भी रहती है. जब यह दर्द अधिक हो जाये तो छोटे मोटे रोज मर्रा के काम भी मुश्किल हो सकते हैं, जैसे की हल्का वजन उठाना, सीडियां चड़ना, या थोड़े दूर पैदल चलना. हो सकता है  कि    पहले आपको सिर्फ एक ही पैर में दर्द हो, परन्तु थोड़े समय के बाद दोनों घुटनों में दर्द होने लगे.

पुराने जमाने में घुटने में दर्द होने की समस्या केवल बूढ़े लोगों में ही देखने को मिलती थी। घुटनों में होने वाले दर्द को आमतौर पर बुढ़ापे की बीमारी समझा जाता था। मगर आजकल यह समस्या बच्चों और नौजवानों में भी देखने को मिल रही है। गलत-खान पान, शरीर में यूरिक एसिड के बढ़ने से भी घुटनो और जोड़ों में दर्द होने लगता है। इसके अलावा इस समस्या के होने पर जोड़ों में सूजन भी होती है और रोगी को चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है। दर्द से छुटकारा पाने के लिए लोग बिना इसका कारण जाने ही दवा खाने लगते हैं। किसी भी चीज का इलाज तब ही होता है जब उसके पीछे का कारण ढूंढा जाएं। आज हम आपको उम्र से पहले शरीर में होने वाले दर्द का कारण बताएंगे तो आइए जानते है उनके बारे में।
1. मोटापा-
समय से पहले घुटनों में दर्द होने का एक कारण मोटापा भी है। शरीर का वजन बढ़ने का सबसे ज्यादा असर घुटनों पर ही पड़ता है। जब जरूरत से ज्याजा वजन घुटनों पर पड़ने लगता है तो जोड़ों में दर्द होने लगता है। इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि अपनी उम्र के हिसाब से वजन रखा जाए।
2. मांसपेशियों में बदलाव-
कई बार मांसपेशियों में बदलाव होने के कारण भी उम्र से पहले ही जोड़ों में दर्द होने की समस्या बढ़ सकती है। 20 से 60 साल की आयु के बीच में मांसपेशियां तकरीबन 40 फीसदी तक सिकुड जाती है। उनमें शक्ति कम होने लगती हैं। जब हम चलते है या फिर शारीरिक क्रियाएं करते हैं तो कुल्हों और टांगों की मांसपेशियां शरीर का भार उठाते हैं। मगर उम्र के साथ मांसपेशियों में बदलाव होने लगता है। उनकी क्षमता कम होती जाती है। इसके कारण टांगों पर अधिक दबाव पड़ता है। यही वजह है कि हमारे घुटनों में दर्द होने लगता है।
3. ऑस्टियोपो‍रोसिस-
ये बीमारी आजकल 20 से 30 वर्ष की आयु के करीब 14 प्रतिशत लोगों में आम देखने को मिल रही है। इसमें बीमारी में शरीर की हड्डियों की रक्षा करने वाले कार्टिलेज टूट जाते हैं। जब हड्डियों को मजबूत करने वाले तत्व टूट जाते हैं तो उनमें दर्द होना शुरू हो जाता है।
4. अर्थराइटिस-
पुराने जमाने में अर्थराइटिस की समस्या केवल बड़े लोगों में ही देखने को मिलती थी। मगर आजकल छोटे बच्चे भी इस बीमारी के शिकार है। अर्थराइटिस होने का खतरा सबसे ज्यादा महिलाओं को होता है। अर्थराइटिस होने पर भी उम्र से पहले ही शरीर में दर्द होने लगता है।
4. बर्साइटिस-
घुटने में चोट लगाने, भाग-दौड़ करने के कारण भी जोड़ों के आस-पास सुजन होने लगती है। ये समस्या सबसे ज्यादा खिलाड़ियों और जिम जाने वाले लोगों को होती है। इसके अलावा जिन लोगों का वजन जरूरत से ज्यादा है उनको भी घुटनों, कंधा, कोहनी, कूल्हा और घुटनों में दर्द होने लगता है।
5. टेन्टीनाइटिस-
आपके घुटने में सामने की ओर दर्द जो सीढ़ियों अथवा चढ़ते और उतरते समय बढ़ जाता है। टेन्टीनाइटिस धावकों,स्कॉयर और साइकिल चलाने वाले लोगों को ज्यादा होता है।
दर्द से तात्कालिक आराम के लिए कुछ सरल उपाय-
अगर आप ये जाना चाहते हैं की क्या आपका घुटने का दर्द अपने आप ही ठीक हो सकता है, तो चिकित्सक को दिखने से पहले आप ये कुछ उपाय घर में ही प्रयोग कर सकते हैं.
१. घुटने को आराम दें और कोई भी ऐसा कार्य न करें जिससे घुटने पर दवाब बड़े.
२. अगर आपके घुटने में सूजन हो तो, हर 2-3 घंटे में 15 मिनट के लिए अपने घुटने पर बर्फ की पट्टी लगायें.
३. सूजन को कम करने के लिए आप एक पट्टी से अपने घुटने को बाँध सकते हैं.
४. सोते समय अपने घुटने के नीचे एक तकिया रखें जिससे आपके घुटने को आराम मिले.
५. दर्द और सूजन को कम करने के लिए चिकित्सक के परामर्श से साधारण (NSAID) या दर्द निवारक दवा ले सकते हैं.
जोड़ों के दर्द का घरेलू उपाय : 
सर्दियों में जोड़ों के दर्द की समस्या आम सुनने को मिलती हैं। खासकर बढ़ती उम्र के लोगों में यह परेशानी ज्यादा सुनने को मिलती है। जोड़ों का दर्द शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। यह दर्द घुटनों, कोहनियों, गर्दन, बाजूओं और कूल्हों पर हो सकता है। लंबे समय तक किसी एक जगह पर ही बैठे रहने, सफर करने से घुटनें अकड़ जाते हैं और दर्द करने लगते हैं। इसी को जोड़ों का दर्द कहते हैं। अगर सही समय पर इसका इलाज ना किया जाए तो यह गठिया का रूप भी ले सकता है। जोड़ दर्द होने की वजह गलत खान पान ही है। हड्डियों में मिनरल्स की कमी और बढ़ती उम्र भी इसकी एक वजह से हो सकती है।
जोड़ दर्द होने के लक्षण-
खड़े होने, चलने और हिलने जुलने समय दर्द
सूजन और अकड़न
चलते समय जोड़ों पर अटकन लगना
सुबह के समय जोड़ों का अकड़ाव होना
जोड़ों का दर्द का इलाज-
जोड़ों के दर्द को ठीक करने के लिए आपको बहुत सारे मसाजर, तेल आदि मार्कीट में मिल जाएंगे लेकिन पैसे की खूब बर्बादी करने के बाद भी जोड़ों के दर्द से राहत नहीं मिलती। इसकी जगह पर अगर आप कुछ घरेलू नुस्खे अपनाएंगे तो इस दर्द से आपको जल्द राहत मिलेंगी। 
सामग्रीः
10ग्राम- काली उड़द दाल
4 ग्राम -अदरक (पिसा हुआ)
2 ग्राम -कपूर (पिसा हुआ)
50 मि.ली.- सरसों का तेल
विधिः काली साबुत उड़द दाल, अदरक, कपूर को सरसों के तेल में 5 मिनट तक गर्म करें फिर तीनों चीजों को छानकर तेल से बाहर निकाल लें। इस गुनगुने तेल से जोड़ों की मसाज करें। जल्द ही जोड़ों के दर्द से राहत मिलेगी। ऐसा दिन में 2 से 3 बार करें।
इसके अलावा आप इन नुस्खों को भी अपना सकते हैं।
अमरूद की 4-5 कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाएं। इससे दर्द से राहत मिलेगी।
काली मिर्च को तिल के तेल में जलने तक गर्म करें और ठंडा होने पर उसी तेल से जोड़ों की मालिश करें।
गाजर को पीसकर इसमें थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर रोजाना सेवन करें।
दर्द वाले स्थान पर अरंडी का तेल लगाकर, उबाले हुए बेल के पत्तों को गर्म गर्म बांधे इससे भी तुरंत राहत मिलेगी।
2 चम्मच बड़े शहद और 1 छोटा चम्मच दालचीनी पाऊडर सुबह शाम एक गिलास गुनगुने पानी से लें।
सुबह के समय सूर्य नमस्कार और प्राणायाम करने से भी जोड़ों के दर्द से छुटकारा मिलता है।
1 चम्मच मेथी के बीच रातभर पानी में भिगोकर रखें। सुबह पानी निकाल दें और मेथी के बीजों को अच्छे से चबाकर खाएं।
गठिए के रोगी 4-6 लीटर पानी पीने की आदत डाल लें। इससे मूत्रद्धार के जरिए यूरिक एसिड बाहर निकलता रहेंगा।




20180901

वायु गोला के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

                                   


गुल्म (वायु गोला) 
लक्षण व निदान -
नाभि के ऊपर एक गोल स्थान है जहां वायु का गोला रुक जाता है या पेट में गांठ की तरह उभार आता है।
इस तरह पेट में एक जगह वायु के एकत्रित होने को गुल्म या वायु का गोला कहते हैं। वायु का गोला वात, पित्त, कफ, त्रिदोष और खून दोष के कारण उत्पन्न होता है।
यह गुल्म रोग 5 प्रकार का होता है और यह शरीर के विभिन्न स्थानों पर उत्पन्न होता है- दाईं कोख,
बाईं कोख, हृदय , नाभि और पेडू या मूत्राशय ।
वायु गोला होने के कारण :
मल-मूत्र का वेग रोकने, चोट लगने, भारी खाना खाने, रूखा- सूखा भोजन करने, दु:खी रहने और दूषित भोजन करने के कारण वायु दूषित होकर हृदय से मूत्राशय तक के भाग में गांठ की तरह बन जाता
है जिसे गुल्म या वायु का गोला कहते हैं।
लक्षण
वायु का गोला बनने पर दस्त बंद हो जाता है, कब्ज व गैस बनने लगती है, मुंह सूख जाता है, भोजन करने का मन नहीं करता है, भूख नहीं लगती, पेट में दर्द रहता है, अधिक डकारें आती है, दस्त साफ नहीं आता है, पेट फूल जाता है, आंतों में गुड़गुड़ाहट होती रहती है और शरीर का रंग काला पड़ जाता है।
स्त्रियों को गुल्म (वायु का गोला बनना) गर्भ गिरने, गलत खान-पान करने, प्रांरभिक अवस्था में खूनी वायु का ठहरना, गोलेमें जलन और पीड़ा होना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।
भोजन और परहेज :-
बकरी का दूध , गाय का दूध , छोटी मूली , बथुआ , सहजना , लहसुन, जमीकन्द, परवल , बैंगन, करेला , केले का फूल, सफेद कद्दु, कसेरू , दाख , नारियल , बिजौरा नींबू , फालसे , खजूर , अनार , आंवला, पका
पपीता , कच्चे नारियल का पानी, एक साल पुराना चावल , लाल चावल आदि का सेवन करना लाभकारी होता है। रात के समय हलवा खाना, रोटी, पूरी और दूध आदि वायु के गोले से पीड़ित रोगी के लिए अच्छा होता है।
बादी करने वाले अनाज, तासीर के विपरीत पदार्थो का
सेवन, सूखा मांस, सूखी साग, मछली आदि का सेवन न करें। गुड़गुड़ाहट करने वाले पदार्थ, स्त्री प्रसंग ( संभोग ), रात को जागना,अधिक मेहनत करना, धूप , आलू , मूली, मीठे फल आदि का प्रयोग करना भी गुल्म रोगी के लिए हानिकारक होता है। मल- मूत्र के वेग को रोकने से भी वायु का गोला बनता है।
विभिन्न औषधियों से आयुर्वेदिक उपचार :
1. पुराना गुड़ : गुड़, भांरगी और छोटी पीपल बराबर मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। यह 2 से 4 ग्राम चूर्ण काले तिल के काढ़े में मिलाकर सेवन करने से खूनी गुल्म रोग ठीक होता है।
2. गोरखमुण्डी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर सेवन करने से रक्त गुल्म की बीमारी दूर होती है।
3. बच : बच, हरड़, हींग, अम्लवेत, सेंधानमक, अजवायन और जवाखार को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीस लें। यह 3 से 6 ग्राम चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करने से कुछ दिनों में ही पेट में गैस का गोला बनने और दर्द समाप्त होता है।
4. हरड़ : हरड़ का चूर्ण गुड़ में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से पित्त के कारण होने वाली गुल्म रोग ठीक होता है।
बड़ी हरड़ का चूर्ण और अरण्ड का तेल गाय के दूध में मिलाकर पीने से पेट में गैस का गोला बनना ठीक होता है।
5. सज्जीखार : सज्जीखार, जवाक्षार, केवड़ा को पीसकर चूर्ण बनाकर अरण्ड के तेल में मिलाकर सेवन करने से गैस का गोला बनना ठीक होता है। सज्जीखार का रस गुड़ में मिलाकर सेवन करने से पेट में गैस का गोला बनने से उत्पन्न दर्द ठीक होता है।
6. साठी : साठी की जड़ और कालीमिर्च को पीसकर घी में मिलाकर पीने से गुल्म रोग से पीड़ित रोगी को दर्द से आराम मिलता है।
7. शूलग्रंथि : शूलग्रंथि (बबूल के पेड़ के कांटों को एकत्रित करके पेड़ पर ही कीड़ा गांठ बनाया जाता है) चिलम में रखकर धूम्रपान करने से वायु का गोला समाप्त होता है।
8. अपामार्ग : अपामार्ग की जड़ और कालीमिर्च को पीसकर घी के साथ प्रयोग करने से वायु का गोला व दर्द में आराम मिलता है।
9. सोंठ : सोंठ 40 ग्राम, सफेद तिल 160 ग्राम और पुराना गुड़ 80 ग्राम को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 6 से 10 ग्राम।खाकर ऊपर से गर्म दूध पीने से पेट की कब्ज, वायु का गोला और दर्द समाप्त होता है।
10. मुलहठी : मुलेहठी, चंदन और दाख को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण दूध के साथ सेवन करने से पित्त के कारण उत्पन्न गुल्म।रोग दूर होता है ।
11. द्राक्षा (मुनक्का) : पित्त के कारण उत्पन्न गुल्म रोग से पीड़ित रोगी को द्राक्षा (मुनक्का) और हरड़ का 1-2 चम्मच रस गुड़ मिलाकर पीना चाहिए ।
12. अजवायन : अजवायन का चूर्ण और थोड़ा-सा संचर नमक छाछ में मिलाकर पीने से कफ से उत्पन्न गुल्म में लाभ मिलता है।
13. हींग : हींग, पीपल की जड़, धनिया, जीरा, बच, कालीमिर्च, चीता, पाढ़, चव्य, कचूर, कालानमक, सेंधानमक, बिरिया संचर नमक, विषांबिल, छोटी पीपल, सोंठ, जवाखार, सज्जीखार, हरड़, अनार
दाना, अम्लवेत, पोहकरमूल, हाऊबेर और काला जीरा आदि को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर लें। फिर इसमें एक बिजौरा नींबू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिला लें और छाया में सुखाकर बोतल में भरकर रख लें। यह चूर्ण 3 से 4 ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ
प्रतिदिन सेवन करने से गुल्म, अफारा, दस्त की रुकावट, पेट का रोग, कोख का दर्द, स्तन और पसलियों में वायु व कफ के दोषों से उत्पन्न दर्द आदि समाप्त होते हैं।
बच 20 ग्राम, हरड़ 30 ग्राम, बायविडंग 60 ग्राम, सोंठ 40 ग्राम, हींग 10 ग्राम, पीपल 80 ग्राम,चीता 50 ग्राम और अजवायन 70 ग्राम को एक साथ कूटकर चूर्ण बना लें। यह 2 से 4 ग्राम चूर्ण गर्म पानी या शराब के साथ सेवन करने से गुल्म रोग समाप्त होता है।
14. आक : आक के फूलों की कलियां 20 ग्राम और अजवायन 20 ग्राम को बारीक पीसकर इसमें 50 ग्राम चीनी मिलाकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम खाने से गुल्म रोग दूर होता है।
15. शरपुंखा : शरपुंखा का रस और हरड़ का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 4 ग्राम की मात्रा में खाना खाने के बाद खाने से गुल्म के कारण उत्पन्न दर्द ठीक होता है और दस्त की रुकावट दूर होती है।
16. नींबू : 6 मिलीलीटर नींबू के रस को आधे गिलास गर्म पानी में मिलाकर सेवन करने से वायु का गोला समाप्त होता है।
17. लता करंज :
लता करंज के पत्तों को चावल के पानी में उबाल कर
पीने से वायु गोला ठीक होता है। इसके सेवन से दर्द
कम होता है, पाचनशक्ति मजबूत होती है और
वातशूल ठीक होता है।
लता करंज के बीज, कालानमक, सोंठ और हींग
बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण आधे से
एक ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ खाने से
पेट में गैस बनने के कारण उत्पन्न दर्द ठीक होता है।
गैस का गोला बनने से यदि कमर में दर्द हो तो करंज
के बीजों की मींगी और एक चौथाई ग्राम शुद्ध
नीलाथोथा मिलाकर पीस लें और सरसों तेल में
मिलाकर 12 गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली
प्रतिदिन खाने से गैस का गोला बनने से उत्पन्न दर्द
ठीक होता है।10 से 20 ग्राम करंज के कोमल पत्ते को तिल के तेल में भूनकर खाने से गुल्म रोग ठीक होता है।
18. एरण्ड : 2 चम्मच एरण्ड के तेल को गर्म दूध में मिलाकर पीने से वायु का गोला समाप्त होता है।
19. अरबी : अरबी के पत्ते डण्डी के समेत लेकर इसका पानी निकालकर घी में मिलाकर 3 दिनों तक सेवन से गुल्म रोग ठीक होता है।
20. द्राक्षा (मुनक्का) : पित्त के कारण उत्पन्न गुल्म रोग से पीड़ित रोगी को द्राक्षा (मुनक्का) और हरड़ का 1-2 चम्मच रस गुड़ मिलाकर पीना चाहिए ।
21. अजवायन : अजवायन का चूर्ण और थोड़ा-सा संचर नमक छाछ में मिलाकर पीने से कफ से उत्पन्न गुल्म में लाभ मिलता है।
22. हींग : हींग, पीपल की जड़, धनिया, जीरा, बच, कालीमिर्च, चीता, पाढ़, चव्य, कचूर, कालानमक, सेंधानमक, बिरिया संचर नमक, विषांबिल, छोटी पीपल, सोंठ, जवाखार, सज्जीखार, हरड़, अनार
दाना, अम्लवेत, पोहकरमूल, हाऊबेर और काला जीरा आदि को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर लें। फिर इसमें एक बिजौरा नींबू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिला लें और छाया में सुखाकर बोतल में भरकर रख लें। यह चूर्ण 3 से 4 ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ
प्रतिदिन सेवन करने से गुल्म, अफारा, दस्त की रुकावट, पेट का रोग, कोख का दर्द, स्तन और पसलियों में वायु व कफ के दोषों से उत्पन्न दर्द आदि समाप्त होते हैं।
23. बैंगन : पेट में गैस बनने तथा पानी पीने के बाद पेट फूलने पर बैंगन के मौसम में लम्बे बैंगन की सब्जी बनाकर खाने से गैस की बीमारी दूर होती है, लीवर और तिल्ली का बढ़ना भी ठीक होता है। हाथ की हथेलियों व पैरों के तलवों में पसीना आने पर बैंगन का रस लगाने लाभ होता है।
24. त्रिफला : त्रिफला के 3 से 5 ग्राम चूर्ण को चीनी मेंमिलाकर दिन में 3 बार खाने से गुल्म में लाभ मिलता है।



खाने के नियम,तरीके

                                                               

जब तक भूख न हो, कुछ न खाएं। भूख लगने पर ही खाना खाएं लेकिन पेट भर के खाना खाने की बजाए जितनी भूख हो, उससे 20 से 30 फीसदी कम खाएं। हालांकि शुगर के मरीजों पर यह नियम लागू नहीं होता। उन्हें हर दो घंटे में कुछ हेल्थी खाना चाहिए।
खाना खाने से आधे घंटे पहले पानी पी लें लेकिन ज्यादा पानी न पिएं वरना पेट भरा हुआ महसूस होगा। खाना खाने के आधे घंटे बाद तक पानी बिल्कुल न पिएं। यह हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। खाने के दौरान जरूरत लगने पर एक-दो घूंट पानी पी सकते हैं लेकिन बेहतर है कि यह पानी गुनगुना हो।
खाने के साथ सलाद जरूर खाएं। इसमें अच्छी मात्रा में फाइबर होता है, जो पाचन में मदद करता है।
आराम से बैठकर खाएं। अगर शरीर और मन, दोनों आराम की मुद्रा में होगा तभी शरीर का मेटाबॉलिज्म अच्छा होगा। जब खा रहे हैं तो सिर्फ खाने पर ध्यान केंद्रित करें। टीवी देखते हुए या कुछ पढ़ते हुए न खाएं, न ही इस दौरान ज्यादा बातचीत करें। सारा ध्यान खाने पर होना चाहिए, तभी आपको उसका सही फायदा मिलेगा।
बिस्किट, नमकीन जैसे सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले स्नैक्स न खाएं। इनसे शरीर में बेवजह की कैलरी बनती है और इनमें ट्रांस-फैट भी होता है जो सेहत को नुकसान पहुंचाता है।
सर्दी हो या गर्मी, हमेशा गुनगुना पानी ही पिएं। इससे मेटाबॉलिक रेट बढ़ता है। फ्रिज का पानी पीना बंद कर दें। यह काफी नुकसान पहुंचाता है। इससे पेट की जठराग्नि धीमी हो जाती है और खाना सही से पचता नहीं है। मटके का पानी पी सकते हैं।
   खीर के साथ खिचड़ी, दूध के साथ नमक ऐसी चीजें खाने से बचें। इस तरह के कॉम्बो पाचन के लिए अच्छे नहीं होते। खाने के दौरान फलों के जूस या फिर बेहद ठंडे ड्रिंक्स न पिएं। गर्म खाने के साथ ठंडा पीना सही नहीं है।
दूध और दूध से बनी चीजों के साथ फल या सब्जियां न खाएं। ऐसा करेंगे तो पेट में जाकर खाना पचने की बजाय सड़ जाएगा। इससे उसका असली फायदा शरीर को नहीं मिल पाएगा। पिज्जा इसी कैटिगरी में आता है क्योंकि उसमें चीज, टमाटर, सॉस आदि चीजें मिली होती हैं।
   रात का खाना 8 बजे से पहले खा लें। डिनर हल्का होना चाहिए, लंच उससे भारी और नाश्ता सबसे भारी क्योंकि जब सूरज ऐक्टिव होता है तो हमारा मेटाबॉलिक रेट ज्यादा होता है, जबकि चंद्रमा की मौजूदगी में यह कम हो जाता है। लोग रात में खाना देर से खाते और खाते ही तुरंत सो जाते हैं। इसी से मोटापा बढ़ता है।
    खाने में नमक का इस्तेमाल कम करें क्योंकि एक चम्मच नमक शरीर में 3-4 लीटर पानी को रोकता है। इससे ब्लड प्रेशर भी बढ़ता है।






20180807

व्याधि,रोग,बीमारी के निवारण मे धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व



    काय चिकित्सा की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, ऐलोपैथी, वायोकैमी, क्रोमोपैथी, नैचरोपैथी, प्राण चिकित्सा, विद्युत चिकित्सा, झाड़-फूँक आदि कितने ही प्रकार के उपचार रोग निवारण के लिए काम आते हैं। पर मनोरोगों का न तो महत्व समझा जाता है और न उनके उपचार का कोई प्रबन्ध है। जबकि उनसे हानियाँ शारीरिक रोगों से भी कहीं अधिक होती हैं। शरीर वाहन है और मन सवार। शरीर औजार और मन कारीगर। वाहन और औजार की तुलना में उसके प्रयोक्ता का महत्व अधिक है। शरीर के रुग्ण होने से जितनी क्षति होती है उसकी तुलना में मन के अस्वस्थ होने पर कहीं अधिक हानि उठानी पड़ती है। अस्तु मानसिक स्वास्थ्य की ओर शरीर स्वास्थ्य से भी अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है जबकि उस ओर प्रायः उपेक्षा ही दिखाई जाती है।
     मानसिक संतुलन खो बैठने पर उन्मादग्रस्तों को पागलखाने में भर्ती किया जाता है। इससे कम की मानसिक रुग्णता की ओर ध्यान नहीं जाता जबकि व्यक्तित्व को गया-गुजरा बनाने, पिछड़ापन लादे रहने और प्रगति पथ में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न करने में वे ही प्रधान कारण होते हैं। बुरी आदतों से ग्रसित, बात-बात में आपे से बाहर हो जाने वाले, दुराग्रही, उद्धत स्वभाव, कल्पना लोक में उड़ते रहने वाले, अशिष्ट, सनकी प्रकृति के लोग भी मनोरोग सही चिन्तन न कर सकने वाले - अविकसित मस्तिष्क वाले भी रोगी ही माने गये हैं। किन्तु सर्वसाधारण की दृष्टि में यह स्वभाव दोष भर है और इनका समझाने बुझाने एवं स्वयं सुधरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। तथ्य इससे भिन्न है। बुरी आदतें भी बीमारियाँ ही हैं और उनका भी कार्य रोगों की तरह उपचार हो सकता है।
साइकोमैट्री जैसे आधारों पर सामान्य मानसिक रोगों की - सनकों की - चिकित्सा बहुत दिनों से चल रही है। उससे रोगी को अपने मन की बातें जी खोलकर कहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। सोचा जाता है कि जैसे पथरी से पेशाब रुक जाता है उसी प्रकार किन्हीं मानसिक दबावों की गाँठें बन जाने से चिन्तन स्वाभाविक प्रवाह में अवरोध आता है। उसी से विक्षिप्तता आती मानी जाती है। समझा जाता है कि यदि स्वच्छन्द कथन में वे बातें मुँह से निकल जायें जो मन पर दबाव डालती थीं तो उससे वह दिमागी पथरी निकल सकती है जिन्हें मानसिक ग्रन्थियाँ कहा जाता है और मनोरोगों का कारण माना जाता है। इस स्वच्छन्द कथन के अतिरिक्त रोगी को कुछ सुझाव भी दिये जाते हैं। उसके चित्त में से कुछ मान्यताएँ उखाड़ने और कुछ जमाने के लिए स्नेह युक्त हलका- फुलका वार्तालाप किया जाता है। प्रायः इसी स्तर की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति बहुत दिनों से चल रही है। उसके कभी उत्साहवर्धक, कभी निराशाजनक परिणाम भी सामने आते रहते हैं।
विचारणीय यह है कि क्या मनःशास्त्रियों की यह मान्यता सही है कि कभी कोई मानसिक दबाव पड़ जाने से ही मनोरोग उत्पन्न होते हैं? यदि ऐसा ही है तो जिन्हें जीवन भर भारी प्रतिकूलताओं, खिन्नताओं और विपन्नताओं के बीच निर्वाह करना पड़ता है। वे क्यों विक्षिप्त नहीं हो जाते? प्रतिकूलताओं की उत्तेजना से प्रखरता उभरती है, इस सिद्धान्त को फिर किस प्रकार मान्यता मिलेगी? तब सदा अनुकूलता ही ढूँढ़नी पड़ेगी, भले ही वह किसी भी कीमत पर क्यों न मिले? अन्यथा तनिक-सी भी प्रतिकूलता का दबाव पड़ने पर मनोरोग उत्पन्न होने का भय रहेगा। इसके अतिरिक्त एक बात और भी है कि यह कह देने भर से मानसिक गाँठें खुल जाती हैं तो जो दुखियारे अपनी व्यथा और कठिनाई आये दिन हर किसी से कहते ही रहते हैं उनका समाधान क्यों नहीं होता? गम्भीर प्रकृति के लोग अपनी और दूसरों की महत्वपूर्ण बातें प्रायः छिपाये ही रहते हैं। राजनीतिज्ञ, सेनाध्यक्ष, षड्यन्त्रकारी, अपराधी जैसे लोगों की सफलता तो इसी पर निर्भर रहती है कि अपने मन की बातें छिपाये रहें, उसकी गन्ध भी किसी को नहीं लगने देते। ऐसी दशा में छिपाने, न कहने से उन्हें मनोरोग क्यों नहीं होते? लगता है मनोवैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित यह प्रक्रिया उतनी सारगर्भित नहीं है कि मानसिक दबावों से ही विक्षिप्तता आती है और जी खोलकर कह देने भर से मनोरोगों का निराकरण हो जाता है। इन सन्देहों के बावजूद यदि इसे उपयोगी एवं आवश्यक मान लिया जाय तो भी इतना तो निश्चित है कि इतना भर पर्याप्त नहीं है। इतने भर उपाय से अनेक मानसिक रोगों का निराकरण पूरी तरह नहीं हो सकता। इससे आगे भी करने के लिए बहुत कुछ शेष रह जाता है, यह मानकर चलना होगा।
कायिक रोग प्रकृति द्वारा शरीर यात्रा के लिए निर्धारित नियमों के उल्लंघन का परिणाम हैं। इसी प्रकार मनोरोगों का कारण चिन्तन के लिए निर्धारित नीति मर्यादा का व्यतिक्रम करता है। व्यक्तिगत जीवन में हर मनुष्य को चरित्र-निष्ठ रहना चाहिए और सम्पर्क क्षेत्र में समाजनिष्ठ सद्व्यवहार का पालन करना चाहिए। अरोग्य शास्त्र की नियम मर्यादा इसलिए है कि आहार-विहार का ठीक तरह पालन किया जाय। समाज शास्त्र के अन्तर्गत शासकीय कानून और शिष्टाचार सहित नागरिक कर्तव्यों का निर्वाह आवश्यक है। वैयक्तिक और सामाजिक आचार संहिता का अनुशासन मानने वाले सज्जन कहलाते हैं। उनकी प्रशंसा होती है, जन सहयोग मिलता है और उनका अस्तित्व सुखद वातावरण का निर्माण करता है। इसके साथ-साथ सबसे बड़ा और पूर्ण प्रत्यक्ष लाभ यह है कि चित्त हलका रहने से उन अन्तर्द्वन्द्वों का उद्भव नहीं होता जो मानसिक रोगों के प्रधान कारण हैं।

    व्यक्तिगत जीवन की उत्कृष्टता बनाये रहने की आवश्यकता पूरी करने वाले तत्वदर्शन का नाम अध्यात्म है। इसी को व्यवहार में मानवी संस्कृति कहते हैं। आत्मपरिष्कार इसका उद्देश्य है। व्यावहारिक जीवन की गतिविधियों की मर्यादा क्या हो इसका निर्धारण धर्म धारणा के अन्तर्गत किया गया है। धर्म को ही सभ्यता भी कहते हैं। धर्म प्रवृत्ति का जीवित रखने के लिए पुण्य परमार्थ के लिए की गई विविध-विधि तपश्चर्याओं का अभ्यास किया जाता है, उनमें पिछली भूलों के लिए पश्चाताप प्रायश्चित का भाव है और आगे के लिए सतर्कतापूर्वक श्रेष्ठ जीवन बिताने का संकल्प। धर्म धारणा के समस्त क्रिया-कलाप इसी उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं। अध्यात्म के अन्तर्गत कितने ही प्रकार की योग साधनाएँ आती हैं उनमें आत्मनिरीक्षण और अन्तर परिशोधन के लिए कई तरह के अभ्यास कराये जाते हैं। इनके द्वारा अन्तः श्रद्धा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा उठाया जाता है। ‘अहम्’ को संकीर्ण सीमाबन्धन से आगे बढ़कर सुविस्तृत क्षेत्र में आत्मभाव विस्तृत करने वाले स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन के अभ्यास योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोक व्यवहार का मर्यादा पालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है। आत्मोत्कर्ष का दार्शनिक पक्ष योग में और क्रियापक्ष तप में गिना जाता है। योग को संस्कृति और तप को सभ्यता कह सकते हैं। इन्हीं के दर्शन अध्यात्म और धर्म के नाम से जाने जाते हैं।
योग और तप के माध्यम से कितनी ही लौकिक और अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का आकर्षक वर्णन साधना विज्ञान के अन्तर्गत किया गया है। इनमें अत्यन्त स्पष्ट सिद्धियाँ शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण की हैं। धर्म पालन से शरीर निरोग बनता है और अध्यात्म का अवलम्बन करने से मनोविकारों की जड़ें कटती हैं। प्रस्तुत सन्दर्भ में अन्यान्य लाभों की चर्चा न करते हुए इतना भी सोचा जा सकता है कि जीवन के सुविधा और प्रगति के उभयपक्षीय उद्देश्य पूरे करने वाले आरोग्य की रक्षा में धर्म और अध्यात्म का क्या योगदान हो सकता है और उस योगदान को किस प्रकार व्यवहार में उतारा जा सकता है?
    इस सन्दर्भ में शरीर-शास्त्र, मनःशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र के मूर्धन्य विशेषज्ञों का मत यह है कि जीवन-क्रम में यदि धर्म और अध्यात्म के वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश किया जा सके तो उसकी आस्थाएँ, प्रवृत्तियाँ, आकांक्षाएँ, विचारणाएँ एवं गतिविधियाँ ऐसी मोड़ ले सकती हैं जिनमें आदर्शों को अपनाने की दिशा में प्रगति क्रम चल पड़े। इससे स्वास्थ्य रक्षा पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ेगा। पिछले रोगों को मिटाने और भविष्य में हंसती-हंसाती हलकी-फुलकी जिन्दगी जीने का सहज अवसर प्राप्त होगा।
प्राचीन काल में जब धार्मिकता का वातावरण था तब पुष्टाई और चिकित्सा की उतनी सुविधा न होते हुए भी जन-स्वास्थ्य की स्थिति बहुत सन्तोषजनक थी। जब से लोग निरुद्देश्य जीवन जीने लगे हैं - उच्चस्तरीय आस्थाओं की अवहेलना करने लगे हैं - विलासी, बनावटी और अहंकारी गतिविधियाँ अपनाने लगे हैं तब से आन्तरिक तनावों और अन्तर्द्वन्द्वों में भारी वृद्धि हुई है। फलतः जनस्वास्थ्य को भारी आघात लगा है। तथ्य को यदि ध्यान में रखा जा सके तो स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी धार्मिक मनोवृत्ति को वापिस लौटाने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता अनुभव होगी।
    पाश्चात्य देशों में धार्मिकता को स्वास्थ्य संरक्षण एवं रोग निवारण के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है और उस परीक्षण के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। विंग्स आफ हीलिंग, मार्च आफ फेथ, क्रिश्चियन साइन्स, यूनिटी जैसी संस्थाएँ धार्मिकता के उपचारों के सहारे शारीरिक और मानसिक रोगों के निराकरण का प्रयोग कर रही हैं और उसमें उन्हें आशातीत सफलता मिल रही है। इन प्रयोग परीक्षणों में अमेरिका के नार्थ केरोलिना प्रान्त के ब्लूरिज पर्वत श्रेणियों के मध्य बना हुआ हेव्रान आश्रम बहुत ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसके संस्थापक डॉ0 डिलाई आरोग्य लाभ के लिए आने वाले रोगियों के लिए एक ही उपचार बताते हैं कि वे जब तक यहाँ रहें अपने आपको धर्म चिन्तन में प्रभु प्रार्थना में निरत रखें। आगन्तुकों को तत्काल शान्ति मिलती है और वे अपना कष्ट भार हलका हुआ अनुभव करने लगते हैं।
    आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में जहाँ रोगों की औषधि उपचार पद्धति के वर्णन हैं वहाँ उनके मूलकारण की ओर संकेत करते हुए यह भी बताया गया है कि धर्मानुष्ठानों के माध्यम से जीवन क्रम को अधिक पवित्र बनाने का उपक्रम भी रोग निवारण के लिए आवश्यक है। चरक संहिता के एक प्रसंग में छात्र अग्निवेश आचार्य चरक से पूछता है - भगवन्, संसार में पाये जाने वाले अनेक रोगों का मूल कारण क्या है? आचार्य उत्तर देते हैं- ‘लोगों के दुष्कर्म जिस स्तर के होते हैं उसी के अनुरूप उन्हें पापों का प्रतिफल शारीरिक और मानसिक व्याधियों के रूप में प्राप्त होता है।’
    जिस प्रकार शरीर में भरे विष द्रव्य का निष्कासन एवं मारण रोग निवारण के लिए आवश्यक है उतना ही आवश्यक यह भी है कि कुकर्मों के प्रायश्चित और कुसंस्कारों के निष्कासन के लिए धर्मानुष्ठानों की प्रक्रिया का आश्रय लिया जाय।

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20180729

शोथ(सूजन) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार // Home Ayurvedic treatment of inflammation (swelling)

                                                         


     शरीर के किसी भी अंग में शोथ (सूजन) होने से बहुत पीड़ा होती है। शरीर के किसी अंग में अचानक शोथ होने पर रोगी बुरी तरह परेशान हो उठता है। शीत ऋतु में संधिवात के कारण शोथ की अधिक विकृति होती है।
उत्पत्ति : रक्त दूषित होने पर शोथ की अधिक विकृति होती है। सीढ़ियों से फिसलकर गिरने व बस से उतरते-चढ़ते समय चोट लगने से भी शोथ की उत्पत्ति होती है। वृक्कों में विकृति होने पर शरीर के विभिन्न अंगों में शोथ होती है।
    गर्भावस्था में रक्त की अधिक कमी होने पर गर्भवती स्त्री के पांवों में, चेहरे पर शोथ के लक्षण दिखाई देते हैं। छोटे बच्चे जब मिट्टी खाते हैं तो उनके पेट पर शोथ दिखाई देती है। रक्ताल्पता में भी रोगी के हाथ-पांव व चेहरे पर शोथ के लक्षण दिखाई देते हैं।
लक्षण : विभिन्न संक्रामक रोगों के चलते शोथ की विकृति दिखाई देती है। मलेरिया व आंत्रिक ज्वर में शोथ की विकृति होती है। शोथ के कारण अधिक पीड़ा होती है। कई बार शोथ की पीड़ा असहनीय हो जाती है। उदर में शोथ होने पर वमन विकृति भी हो सकती है। गर्भावस्था में हाथ-पांव व चेहरे पर शोथ होने से गर्भस्थ शिशु को अधिक हानि पहुंच सकती है। वृक्कों की विकृति के कारण उत्पन्न शोथ में मूत्र के साथ रक्त भी आ सकता है।
सूजन होने  पर  सेवनीय
5 ग्राम गाजर के बीजों को 300 ग्राम जल में उबालकर, क्वाथ बनाकर छानकर पिएं। अधिक मूत्र आने से शोथ नष्ट होती है।
2 ग्राम हल्दी (पिसी हुई) 1 ग्राम मिसरी गर्म दूध में मिलाकर पीने से कुछ दिनों में शोथ नष्ट हो जाती है।
अदरक का रस 10 ग्राम मात्रा में लेकर 20 ग्राम गुड के साथ प्रातः और सायं सेवन करें। कुछ दिनों में शोथ नष्ट हो जाती है।
अनन्नास का 150 ग्राम रस कुछ दिनों तक पीने से यकृत शोथ में बहुत लाभ होता है।
इंद्रायण की जड को सिरके के साथ पीसकर शोथ पर लेप करें।
अमलतास के ताजे फूल 10 ग्राम और भुना हुआ सुहागा 3 ग्राम पीसकर सुबह-शाम गर्म जल के साथ सेवन करें। शोथ नष्ट होती है।
हरड़ का क्वाथ बनाकर, छानकर 50 ग्राम की मात्रा में 5 ग्राम गुग्गुल मिलाकर सेवन करने से शोथ नष्ट होती है।
पुनर्नवा, देवदारु, सोंठ और गुग्गुल सभी चीजें 10-10 ग्राम लेकर 400 ग्राम जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। 50 ग्राम क्वाथ पीने से शोथ नष्ट होती है।
मूली 100 ग्राम और तिल 10 ग्राम चबाकर खाने से त्वचा के नीचे एकत्र जल से उत्पन्न शोथ नष्ट होती है।
केला खाने से अनेक प्रकार की. शोथ नष्ट होती हैं।
सोंठ का 10 ग्राम चूर्ण गुड के साथ खाने से शोथ नष्ट होती है।
काली मिर्च पीसकर मक्खन के साथ मिलाकर चटाने से छोटी आयु के बच्चों की शोथ नष्ट होती है।
खजूर का कुछ दिनों तक सेवन करने से शोथ विकृति नष्ट होती है। (मधुमेह रोगी खजूर न खाएं)।
सूजन होने पर न  खाएं
शोथ  में घी, तेल से बने पकवानों का सेवन न करें।
उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
आम, इमली, कमरख व दूसरे खट्टे फलों का सेवन न करें।
अचार, कांजी व सिरके से बने चटपटे व्यंजन सेवन न करें।
चाइनीज व फास्ट फूड का सेवन न करें।
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20180724

कष्टसाध्य रोगों का आयुर्वेदिक समाधान// Ayurvedic solution of various diseases


                                               

     खाना खाने से 1 घंटे बाद पानी पिए और हमेशा स्वस्थ रहे ,कभी भी खाना खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए !
अब ये भी जानना बहुत जरुरी है ...हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद क्या कारण है |
सबसे पहले आप हमेशा ये बात याद रखें कि शरीर मे सारी बीमारियाँ वात-पित्त और कफ के बिगड़ने से ही होती हैं !
अब आप पूछेंगे ये वात-पित्त और कफ क्या होता है ???
बहुत ज्यादा गहराई मे जाने की जरूरत नहीं आप ऐसे समझे की सिर से लेकर छाती के बीच तक जितने रोग होते हैं वो सब कफ बिगड़ने के कारण होते हैं
छाती के बीच से लेकर पेट और कमर के अंत तक जितने रोग होते हैं वो पित्त बिगड़ने के कारण होते हैं !
और कमर से लेकर घुटने और पैरों के अंत तक जितने रोग होते हैं वो सब वात बिगड़ने के कारण होते हैं !
हमारे हाथ की कलाई मे ये वात-पित्त और कफ की तीन नाड़ियाँ होती हैं !

भारत मे ऐसे ऐसे नाड़ी विशेषज्ञ रहे हैं जो आपकी नाड़ी पकड़ कर ये बता दिया करते थे कि आपने एक सप्ताह पहले क्या खाया एक दिन पहले क्या खाया -दो पहले क्या खाया !!
और नाड़ी पकड़ कर ही बता देते थे कि आपको क्या रोग है ! आजकल ऐसी बहुत ही कम मिलते हैं !
शायद आपके मन मे सवाल आए ये वात -पित्त कफ दिखने मे कैसे होते हैं ???
तो फिलहाल आप इतना जान लीजिये ! कफ और पित्त लगभग एक जैसे होते हैं !
आम भाषा मे नाक से निकलने वाली बलगम को कफ कहते हैं ! कफ थोड़ा गाढ़ा और चिपचिपा होता है !
मुंह मे से निकलने वाली बलगम को पित्त कहते हैं ! ये कम चिपचिपा और द्रव्य जैसा होता है !!
और शरीर से निकले वाली वायु को वात कहते हैं !! ये अदृश्य होती है !
कई बार पेट मे गैस बनने के कारण सिर दर्द होता है तो इसे आप कफ का रोग नहीं कहेंगे इसे पित्त का रोग कहेंगे !!
क्यूंकि पित्त बिगड़ने से गैस हो रही है और सिर दर्द हो रहा है !

ये ज्ञान बहुत गहरा है खैर आप इतना याद रखें कि इस वात -पित्त और कफ के संतुलन के बिगड़ने से ही सभी रोग आते हैं !
और ये तीनों ही मनुष्य की आयु के साथ अलग अलग ढंग से बढ़ते हैं ! बच्चे के पैदा होने से 14 वर्ष की आयु तक कफ के रोग ज्यादा होते है ! बार बार खांसी ,सर्दी ,छींके आना आदि होगा !
14 वर्ष से 60 साल तक पित्त के रोग सबसे ज्यादा होते हैं बार बार पेट दर्द करना ,गैस बनना ,खट्टी खट्टी डकारे आना आदि !!
और उसके बाद बुढ़ापे मे वात के रोग सबसे ज्यादा होते हैं घुटने दुखना ,जोड़ो का दर्द आदि
कभी भी खाना खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना !!
अब आप कहेंगे हम तो हमेशा यही करते हैं ! 99% लोग ऐसे होते है जो पानी लिए बिना खाना नहीं खाते है |पानी पहले होता है खाना बाद मे होता है |बहुत सारे लोग तो खाना खाने से ज्यादा पानी पीते है दो-चार रोटी के टुकडो को खाया फिर पानी पिया,फिर खाया-फिर पानी पिया !
ये जानना बहुत जरुरी है ...हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद क्या कारण है |

बात ऐसी है की हमारा जो शरीर है शरीर का पूरा केंद्र है हमारा पेट|ये पूरा शरीर चलता है पेट की ताकत से और पेट चलता है भोजन की ताकत से|जो कुछ भी हम खाते है वो ही हमारे पेट की ताकत है |हमने दाल खाई,हमने सब्जी खाई, हमने रोटी खाई, हमने दही खाया लस्सी पी कुछ भी दूध,दही छाझ लस्सी फल आदि|ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया ये सब कुछ हमको उर्जा देता है और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है |आप कुछ भी खाते है पेट उसके लिए उर्जा का आधार बनता है |अब हम खाते है तो पेट मे सब कुछ जाता है|पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहते है अमाशय|उसी स्थान का संस्कृत नाम है जठर|उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है epigastrium |ये एक थेली की तरह होता है और यह जठर हमारे शरीर मे सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है ये |बहुत छोटा सा स्थान हैं इसमें अधिक से अधिक 350GMS खाना आ सकता है |हम कुछ भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है|
अब अमाशय मे क्या होता है खाना जैसे ही पहुँचता है तो यह भगवान की बनाई हुई व्यवस्था है जो शरीर मे है की तुरंत इसमें आग(अग्नि) जल जाती है |आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते हे जठराग्नि|ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है |ये आग ऐसी ही होती है जेसे रसोई गेस की आग|आप की रसोई गेस की आग है ना की जेसे आपने स्विच ओन किया आग जल गयी|ऐसे ही पेट मे होता है जेसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी |यह ऑटोमेटिक है,जेसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई|ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना पचता है |आपने खाना खाया और अग्नि जल गयी अब अग्नि खाने को पचाती है |वो ऐसे ही पचाती है जेसे रसोई गेस|आपने रसोई गेस पर बरतन रखकर थोडा दूध डाल दिया और उसमे चावल डाल दिया तो जब तक अग्नि जलेगी तब तक खीर बनेगी|इसी तरह अपने पानी डाल दिया और चावल डाल दिए तो जब तक अग्नि जलेगी चावल पकेगा|

अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब ठंडा पानी पी लिया|और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है |अब होने वाला एक ही काम है जो आग(जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी|आग अगर बुझ गयी तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|अब हमेशा याद रखें खाना पचने पर हमारे पेट मे दो ही क्रिया होती है |एक क्रिया है जिसको हम कहते हे Digation और दूसरी है fermentation|फर्मेंटेशन का मतलब है सडना और डायजेशन का मतलब हे पचना|
आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना पचेगा तो उसका रस बनेगा|जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा|ये तभी होगा जब खाना पचेगा|
अब ध्यान से पढ़े इन् शब्दों को मांस की हमें जरुरत है हम सबको,मज्जा की जरुरत है ,रक्त की भी जरुरत है ,वीर्य की भी जरुरत है ,अस्थि भी चाहिए,मेद भी चाहिए|यह सब हमें चाहिए|जो नहीं चाहिए वो मल नहीं चाहिए और मूत्र नहीं चाहिए|मल और मूत्र बनेगा जरुर ! लेकिन वो हमें चाहिए नहीं तो शरीर हर दिन उसको छोड़ देगा|मल को भी छोड़ देगा और मूत्र को भी छोड़ देगा बाकि जो चाहिए शरीर उसको धारण कर लेगा|
ये तो हुई खाना पचने की बात अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..?
अगर आपने खाना खाने के तुरंत बाद पानी पी लिया तो जठराग्नि नहीं जलेगी,खाना नहीं पचेगा और वही खाना फिर सड़ेगा|और सड़ने के बाद उसमे जहर बनेंगे|
खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो हे यूरिक एसिड(uric acid )|कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है ,मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ,वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो|यह यूरिक एसिड विष (जहर ) है और यह इतना खतरनाक विष है की अगर अपने इसको कन्ट्रोल नहीं किया तो ये आपके शरीर को उस स्थिति मे ले जा सकता है की आप एक कदम भी चल ना सके|आपको बिस्तर मे ही पड़े रहना पड़े पेशाब भी बिस्तर मे करनी पड़े और संडास भी बिस्तर मे ही करनी पड़े यूरिक एसिड इतना खतरनाक है |इस लिए यह इतना खराब विष हे नहीं बनना चाहिए |

और एक दूसरा उदाहरण खाना जब सड़ता है तो यूरिक एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हे LDL (Low Density lipoprotive) माने खराब कोलेस्ट्रोल(cholesterol )|जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP )हाय बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ? तो वो कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है ? तो वो आपको कहेगा LDL बहुत है |
इससे भी ज्यादा खतरनाक विष हे वो है VLDL(Very Low Density lipoprotive)|ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है |अगर VLDL बहुत बढ़ गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता|
खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक ओर विष है जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides|जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका triglycerides बढ़ा हुआ हे तो समज लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है |
तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे,कोई LDL - VLDL के नाम से कहे समज लीजिए की ये विष हे और ऐसे विष 103 है |ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है |
मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है ,कोई कहता हे मेराtriglycerides बहुत बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा है |कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है |

क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता|खाना पचने पर जो बनता है वो है मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड,कोलेस्ट्रोल,LDL-VLDL| और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है !
पेट मे बनने वाला यही जहर जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है जिसे आप  हार्ट अटेक  कहते हैं !
तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है की जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए पेट मे ठीक से आग(जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए|क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं हे और खाना पकता भी नहीं है |रसोई मे आग नहीं हे आप कुछ नहीं पका सकते और पेट मे आग नहीं हे आप कुछ नहीं पचा सकते|
महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना है |आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्व नहीं हे कोई कहता हे मैंने 100 ग्राम खाया,कोई कहता है मैंने 200 ग्राम खाया,कोई कहता है मैंने 300 ग्राम खाया वो कुछ महत्व का नहीं है लेकिन आपने पचाया कितना वो महत्व है |आपने 100 ग्राम खाया और 100 ग्राम पचाया बहुत अच्छा है |और अगर आपने 200 ग्राम खाया और सिर्फ 100 ग्राम पचाया वो बहुत बेकार है |आपने 300 ग्राम खाया और उसमे से 100 ग्राम भी पचा नहीं सके वो बहुत खराब है !!
खाना पच नहीं रहा तो समझ लीजिये विष निर्माण हो रहा है शरीर में ! और यही सारी बीमारियो का कारण है ! तो खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया !!
भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है )
इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये !

अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं पीना ???
तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना ! अब आप कहेंगे इसका क्या calculation हैं ??
बात ऐसी है ! जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं है ! पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है ! उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है ! (बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है )
पेस्ट बनने के बाद शरीर मे रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है ! तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं तब आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !!
जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले ,रिक्शा खीचने वाले पत्थर तोड़ने वाले  उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने लगता है उनको एक घंटे बाद पानी पीना चाहिए !
अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं ?
तो खाना खाने के 45 मिनट पहले तक आप पानी पी सकते हैं ! 

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घुटने का दर्द कैसे करें ठीक : –
 घुटनों के दर्द की समस्या आजकल आम होती जा रही है कई बार ऐसा भी होता है कि किसी कारणवश चोट लग जाने से या बढ़ती हुई उम्र के कारण या फिर व्रद्धावस्था में हड्डियों के कमजोर हो जाने से अक्सर घुटनों में दर्द होने लगता है. इस पोस्ट में हम आपको घुटनों कादर्द से राहत दिलाने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे बता रहे हैं जिनका उपयोग करने पर लगभग 7 दिन में ही आपको घुटनों के दर्द से राहत मिल जाएगी.
अक्सर घुटनों में दर्द होना आम बात नही है. और यदि आप भी अपने घुटनों में होने वाले दर्द से परेशान है. आपको बैठने उठने में समस्या आती है. सीडियां चढ़ते-उतरते घुटनों में दर्द होता है तो परेशान न हो आपके लिए घुटनों का दर्द ख़त्म करने वाला इलाज है. घुटनों का दर्द का इलाज बेहद सरल और असरदार है. यदि आप इन उपायों को आजमतें है तो आपको घुटने के दर्द से राहत मिलेगी


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 


घुटनों के दर्द का इलाज – 

यदि आपके घुटनों में लगातार या थोड़ा-थोड़ा दर्द या तेज दर्द बना रहता है तो यहां दिए गए घरेलू नुस्खे आजमाएं और आपको 7 से लेकर 15 दिन के अंदर-अंदर इन घरेलू नुस्खों से पूरा पूरा आराम मिल जाएगा और फिर कभी आपके घुटने दर्द नहीं करेंगे. घुटनों के लिए दर्द निवारक दवा बनाने के लिए आप नीचे दिए गए कुछ नुस्खे आजमाएं.
माना जाता है कि बूढ़े होने पर हड्डियों में दर्द होना शुरू हो जाता है. लेकिन ऐसा नही है. घुटनों में दर्द होने के कई कारण है. जैसे
गलत तरीके ज्यादा वजन उठाना
अपने घुटनों को घंटों तक मोड़ कर बैठना
घुटने में पुरानी चोट को नज़रंदाज़
व्यायाम करने से पहले बॉडी को स्ट्रेच और बॉडी वार्मअप न करना
गलत खान-पान और रहन-सहन
ये सभी घुटनों में होने वाले दर्द का कारण बन सकता है. इसे कुछ बातों का ध्यान रखें. ज्यादातर शरीर में होने वालें दर्द का कारण उपरोक्त ही है. इसलिए इन्हें दोहराहे नही. ये आपके के लिए काफी खतरनाक हो सकता है.
सौठ से बनी दर्द निवारक दवा 

सौंठ भी एक बहुत अच्छा दर्द निवारक दवा के रूप में फायदेमंद साबित हो सकता है, सौंठ से दर्दनिवारक दवा बनाने के लिए एक आप एक छोटा चम्मच सौंठ का पाउडर व थोड़ा आवश्यकतानुसार तिल का तेल इन दोनों को मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट जैसा बना ले.
दर्द या मोच के स्थान पर या चोट के दर्द में आप इस दर्द निवारक सौंठ के पेस्ट को हल्के हल्के प्रभावित स्थान पर लगाएं और इसको 3 घंटे तक लगा रहने दें इसके बाद इसे पानी से धो लें. ऐसा करने से सप्ताह में आपको घुटने के दर्द में पूरा आराम मिल जाता है और अगर मांसपेशियों में भी खिंचाव महसूस होता है तो वह भी जाता रहता है.

दर्द निवारक हल्दी का पेस्ट

किसी चोट का दर्द हो या घुटने का दर्द आप इस दर्द निवारक हल्दी के पेस्ट को बनाकर अपनी चोट के स्थान पर या घुटनों के दर्द के स्थान पर लगाइए इससे बहुत जल्दी आराम मिलता है. दर्द निवारक हल्दी का पेस्ट कैसे बनाएं इसके लिए आप सबसे पहले एक छोटा चम्मच हल्दी पाउडर लें और एक चम्मच पिसी हुई चीनी और इसमें आप बूरा या शहद मिला लें, और एक चुटकी चूना मिला दें और थोड़ा सा पानी डाल कर इसका पेस्ट जैसा बना लें.

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

इस लेप को बनाने के बाद अपने चम्मच के स्थान पर यार जो घुटना का दर्द करता है उस स्थान पर स्लिप को लगा ले और ऊपर से किराए बैंडेज या कोई पुराना सूती कपड़ा बांध दें और इसको रातभर लगा रहने दें और सुबह सादा पानी से इसको धो ले इस तरह से लगभग 1 सप्ताह से लेकर 2 सप्ताह तक ऐसा करने से इसको लगाने से आपके घुटने की सूजन मांसपेशियों में खिंचाव अंदरुनी रूप से होने वाले दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलता है और यह पृष्ठ आप के दर्द को जड़ से खत्म कर देता है.
दर्द के आराम दिलाये सौंठ का लेप

खजूर से घुटने में दर्द का इलाज

सर्दियों के मौसम में रोजाना 5-6 खजूर खाना बहुत ही लाभदायक होता है, खजूर का सेवन आप इस तरह भी कर सकते हैं रात के समय 6-7 खजूर पानी में भिगो दें और सुबह खाली पेट इन खजूर को खा ले और साथ ही वह पानी भी पी ले जिनको जिसमें आपने रात में खजूर भिगोए थे. यह घुटनों के दर्द के अलावा आपके जोड़ों के दर्द में भी आराम दिलाता

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

आपके घर में मौजूद कुछ दवाओं के द्वारा भी आप अपने घुटने का दर्द को दूर कर सकते है. इसके आपको आधा कप सरसों का तेल लेना है फिर उसमे कुछ लहसुन की कच्ची कालिया छिल कर दाल देनी है. फिर इस सरसों के तेल को धीमी आंच पर गर्म करना है. और तब तक इसे गर्म करना जब तक की लहसुन की कालिया पक न जाये. फिर इस तेल के मिश्रण को ठंडा होने के लिए छोड़ दें. ठंडा होने पर इसे अपने घुटनों में हल्के हाथों से मालिश करें. इस उपाय को यदि आप 1 से लेकर २ दिन इसे करें आपका घुटने का दर्द पूरी तरह से गायब हो जायेगा.

नारियल का तेल है बेहतर

नारियल के तेल के बड़े फायदे है नारियल का तेल केवल आपके बालों को ही मजबूत नही बनाता बल्कि ये आपके शरीर के कई हिस्सों को मजबूत बनाने में मदद करता है. आप यदि नारियल के तेल से अपने शरीर की मशाज़ करते है तो आपको शरीर में होने अकडन से निजात मिलेगी. और आप नारियल के भीतर मौजूद गिरी को खाते है तो भी ये आपके लिए फायदेमंद ही है क्योंकि ये सीधे आपके पेट पर असर करती है. और ये आपके घुटने का दर्द दूर करने में मदद करेगा.



नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 


अखरोट के सेवन से आपको काफी फायेदा होगा. अखरोट जितना सख्त होता है उसे फायदे उठने ही मुलायम होते है. यदि आप रोजाना 2 से 3 अखरोट खाते है तो आपके लिए काफी फयदेमद रहेगा. अखरोट खाने का तरीका बेहद आसान है आपको रात में अखरोट को भिगो कर रखना है फिर सुबह खाली पेट सेवन करना है ताकि आपकी पचाने की शक्ति पर असर न पड़े. ऐसा करने से आपके घुटने का दर्द खत्म होगा साथ ही आपकी हड्डिया भी मजबूत हो जायेंगी.

हल्दी का मिश्रण घुटने का दर्द मिटाए

उम्र के साथ साथ शरीर की कार्यशक्ति कम हो जाती है. और बृद होने पर जोड़ो में दर्द होने लगता है. और कमर और घुटने में दर्द होना आम बात हो जाती है. लेकिन कभी कभी ये दर्द असहनीय हो जाता है. घुटने का दर्द मिटाना चाहते है तो हल्दी के आयुर्वेदिक लेप का इस्तेमाल करें इस लेप को बनाने के लिए आपको एक चम्मच हल्दी लीजिये. फिर इसमें शक्कर या शहद के घोल में इसे मिला दीजिये. और इस मिश्रण में चूना (जो पान में इस्तेमाल होता है) अपनी आवश्यकतानुसार मिला लें. और इस मिश्रण को अच्छी तरह से फेंटे. जब ये पेस्ट बनकर तैयार हो जाये तो इस पेस्ट या लेप को अपने घुटनों में लगायें. कुछ ही देर में आपको घुटने का दर्द छूमंतर हो जायगा.


गोखरू के औषधीय गुण और प्रयो


यदि आपका वजन बढ़ा हुआ है तो आपको चलने में तकलीफ होना या फिर घुटनों में दर्द होना स्वाभाविक है. इसलिए सबसे पहले अपने वजन को कम कीजिये ताकि आपकी बॉडी फिट रहे है आपको अन्य बीमारियाँ न लगे. अपने शरीर को मजबूत बनायें सही नियमों के साथ व्यायाम करें. स्पोर्ट एक्टिविटीज में हिस्सा है और कुछ न कुछ करते रहे इससे आपके शरीर का तनाव और खिचाव कम होगा. और घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा.

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