15.2.18

सेब का सिरका (एपल विनेगर) के फायदे // Benefits of apple vinegar (Apple vinegar)

    


सेब का सिरका(ए.सी.वी) वज़न घटाने, हृद्य रोग, त्वचा रोग, बदहज़मी, लिवर डीटॉक्स जैसे अन्य रोगों में अपने अनगिनत फायदों के लिए काफी मांग में रहता है। आइए देखतें है एसीवी का इस्तेमाल और ज़िंदगी को स्वस्थ बनाते हैं|
    सेब का सिरका या ए.सी.वी स्वास्थ्य पर होने वाले फायदों के लिए काफी मांग में रहने वाला स्वास्थ्य उत्पाद है। इस पहले हम सेब के सिरके के फायदों के बारे में जाने, ये समझ लेते हैं कि सेब का सिरका होता क्या है।
सेब का सिरका एक तरीके का सिरका है जिसमें साइडर मुख्य हिस्सा है। ये उस लिक्विड से बनता है जो सेब को निचोड़ने से मिलता है। फर्मेंटेशन के बाद जो सिरका बचता है उसे हम सेब का सिरका या ए.सी.वी कहते हैं। अपने ऑर्गेनिक और पैश्चराइज्ड रूप में इसे एप्पल साइडर विनेगर विद मदर कहा जाता है। आप बोतल के निचले भाग में एक मकड़ी के जाले जैसा तैरता हुआ ढांचा देखकर इसकी पहचान कर सकते हैं।
सेब के सिरके के अलग अलग प्रकार बाज़ार में उपलब्ध हैं। जैसे कि मदर के साथ सेब का सिरका, शहद वाला सेब का सिरका, अदरक और नींबू के स्वाद के साथ सेब का सिरका आदि।


सेब के सिरके के फायदे-

स्वास्थ्य और खूबसूरती के सेगमेंट में ये सबसे ज़्यादा फायदेमंद उत्पादों में से एक है। जब ऐसा सवाल आए कि सेब का सिरका किस किस चीज़ के लिए फायदमंद है, तो इसका उत्तर जानने के बाद हैरान हो जाएंगे और यही कहेंगे कि किस चीज़ के लिए ये फायदेमंद नही है। सेब के सिरके के अनगिनत फायदे इसे बहुत लोकप्रिय बनाते हैं। फिर चाहे वो आम स्वास्थ्य हो, स्वाद, खूबसूरती, फिटनेस या फिर कोई भी अन्य घरेलू लाभ, सेब के सिरके के फायदे और इसे प्रयोग करने के तरीके अनगिनत हैं।
एक आसान तरीके से इसके फायदे समझने के लिए, मानव शरीर के हिसाब से उपर से नीचे चलते हैं और सेब के सिरके के स्वास्थ्य, खूबसूरती और फिटनेस पर होने वाले फायदों के बारे में समझते हैं।
चहरे की त्वचा-
एक फेस क्लिएंज़र के तौर पर सेब का सिरका काफी मददगार हो सकता है अगर इसे पानी के साथ मिलाकर रुई की मदद से चेहरे पर लगाया जाए। ये आपके चहरे को अच्छी रंगत भी देता है। एक बढ़िया डिटॉक्स टॉनिक होने के कारण सेब का सिरका चहरे के दानों से छुटकारा पाने में भी मदद करता है।
बाल-
खूबसूरत और कोमल बाल चाहते हैं? सेब के सिरका आपकी मदद कर सकता है। सेब के सिरके से बाल धोना आपके बालों की खो चुकी चमक वापस लाने में आपकी मदद करता है। बालों को शैम्पू करने के बाद एसीवी और पानी के मिश्रण से धोएं।
गला-
एक सुखदायक प्रभाव देने से लेकर खराश वाले गले और खाँसी से लड़ने के लिए एसीवी जादुई साबित होता है। आप शहद के साथ सेब का सिरका ले सकते हैं या फिर गुनगुने पानी के साथ मिलाकर गरारे कर सकते हैं। एसीवी का एसेटिक एसिड इसमें काफी मदद करता है।
नाक-
क्या आपका साइनस आपको परेशान कर रहा है? क्या आप आम सर्दी के कारण बहती हुई अपनी नाक से परेशान हो गए हैं? तो ये सेब का सिरका आपकी मदद कर सकता है। 1 चम्मच शहद और 2 चम्मच एसीवी गुनगुने पानी के साथ लेने से साइनस इन्फेक्शन और बंद नाक से छुटकारा पाने में मदद मिलती है।
मुंह-
एसीवी दांतो को सफेद करने और मुंह की दुर्गंध से छुटकारा पाने में काफी लाभदायक है। इसे पानी के साथ मिलाकर पतला करने के बाद कुल्ला करें। इस मिश्रण के गरारे करना भी मददगार है।



टांगे और जोड़

हमारे पूरे शरीर का संतुलन टांगों और जोड़ों की शक्ति पर टिका है। लगातार हो रही ऐंठन और जोड़ों का दर्द रोज़मर्रा के कामों में शरीर के लिए बाधा बन सकता है। सेब का सिरका पोटेशियम का अच्छा स्त्रोत है जो आपकी टांगों को दर्दनाक ऐंठन से आराम दिलाएगा। साथ ही, एसीवी में मैगनीशियम जैसे बेहद मिनेरल और अलग अलग एंटी-ऑक्सिडेंट होते हैं जो आपके जोड़ों को दर्द-मुक्त और लचीला बनाते हैं।
हाथ और पैर-
पैरों से दुर्गंध आना एक ऐसी समस्या है जिसका सामना कोई नहीं करना चाहता। लेकिन अगर आपके पास सेब का सिरका है तो फिर परेशान क्यूं होना। एक टब या बालटी में गरम पानी के साथ एसीवी (1/2 कप) का मिश्रण बनाएं। अब कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ और पैर इसके अंदर डालें। इसके बाद जब आप अपने हाथ पैर धोयेंगे, तो आप जान पाएंगे कि एसीवी दुर्गंध और मरे हुए सैल्स से छुटकारा पाने में मदद करता है। ये आपको एक तनाव मुक्त और आराम का एहसास भी कराता है।
हृदय
सेब का सिरका खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है और रक्तचाप पर काबू में रखता है। इससे आपके हृदय के स्वास्थ्य और कल्याण को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।


लिवर और गुर्दे

हमारे शरीर में लिवर और गुर्दो का काम बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए ये बहुत ज़रूरी है कि ये दोनो अच्छे ढंग से काम करें। और लिवर और गुर्दों का स्वस्थ और अच्छी तरह से काम करने के लिए डिटॉक्सिफेकेशन एक तरीका है। एक चम्मच बिना छना हुआ एसीवी मदर को 300 मि.ली गरम पानी के साथ खाना खाने से पहले दिन में दो बार लें। ये लिवर की सूजन, लिवर डिटॉक्सिफिकेशन और लिवर का फैट घटाने में मदद करता है।
गुर्दों का डिटॉक्सिफिकेशन ना केवल शरीर को सुचारू रूप से चलाने का काम करता है बल्कि सेब के सिरके के एसिडिक स्वभाव के कारण गुर्दों की पथरियों को भी खत्म कर देता है।
किस तरह करें सेब के सिरके का इस्तेमाल-
जब हम सिरके के बारे में सोचते हैं तो हमारे दिमाग में पहली छवी बनती है किसी ऐसिडिक चीज़ की या खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फ्लेवर की। लेकिन ये केवल सेब के सिरके का ऊपरी फायदा है। एक शानदार पोषण मात्रा के साथ एसीवी स्वास्थ्य का भंडार है। इसमें वीटामिन ए,सी और ई, पोटेशियम, केल्शियम, मेग्निशियम, ऐसिटिक ऐसिड, एंटी-ऑक्सिडेंट, एंज़ाइम और अमीनो एसिड हैं।
सेब के सिरके को इस्तेमाल करने के ऐसे बहुत से तरीके हैं जिनसे स्वादिष्ट, सुंदर और स्वस्थ खाना बनाने में मदद मिलती है।
सेब के सिरके को इस्तेमाल करने के तरीके-
सेब का सिरके का प्रयोग चटनी में करें।
एसीवी को अपनी स्मूदी में डालें।
हाज़मे के लिए अदरक के साथ सेब के सिरके का प्रयोग करें।
एक कप पानी में एसीवी डालें और मुंह की दुर्गंध से छुटकारे पाने लिया गरारे करें।
थोड़ा सा एसीवी पानी के साथ मिलाकर उसे रुई से अपने चहरे पर लगाएं और फेस क्लिएंज़र की तरह प्रयोग करें।
एसीवी को गुनगुने पानी के साथ मिलाकर 15 मिनट तक पैर भिगोकर रखें। ये दुर्गंध फैला रहे बेक्टीरिया से छटकारा दिलाएगा




28.1.18

कष्टार्तव(मासिक धर्म की पीड़ा) के घरेलू उपचार //Home remedies for dysmenorrhoea (menstrual trauma)





मासिक धर्म स्त्री में होने वाली एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है। मगर कई बार ये बहुत ही कष्टदायक हो जाती हैं। आइये जानते हैं इस से बचने के लिए घरेलु उपाय।
1.मेथी:
रजोनिवृति के रोग में मेथी को खाने से लाभ मिलता है।
2. गुड़हल:
6-12 ग्राम गुड़हल के फलों का चूर्ण कांजी के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से मासिक-धर्म की परेशानी दूर हो जाती है।
3. केसर:
लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग केसर को दूध में मिलाकर दिन में 2 से 3 बार पीने से मासिक-धर्म के समय दर्द में आराम मिलता है।
4.कालीमिर्च:
कालीमिर्च एक ग्राम, रीठे का चूर्ण 3 ग्राम दोनों को कूटकर जल के साथ सेवन करने से आर्तव (माहवारी) की पीड़ा (दर्द) नष्ट हो जाती है।
5. अजवायन:
अजवायन, पोदीना, इलायची व सौंफ इन चारों का रस समान मात्रा में लेकर लगभग 50 ग्राम की मात्रा में मासिकस्राव के समय पीने से आर्तव (माहवारी) की पीड़ा नष्ट हो जाती है।
6. रीठा:
मासिकस्राव के बाद वायु का प्रकोप होने से स्त्रियों का मस्तिष्क शून्य हो जाता है। आंखों के आगे अंधकार छा जाता है। दांतों की बत्तीसी भिड़ जाती है। इस समय रीठे को पानी में घिसकर झाग (फेन) बनाकर आंखों में अंजन लगाने से तुरन्त वायु का असर दूर होकर स्त्री स्वस्थ हो जाती है।



7. मूली:

जब मासिक-धर्म खुलकर न आए तब ऐसी दशा में मूली के बीजों का चूर्ण 4-4 ग्राम की मात्रा में सुबह, दोपहर और शाम सेवन करें। यदि मासिक धर्म बंद हो गया हो, कई महीनों से नहीं आया हो तो मूली, सोया, मेथी और गाजर के बीजों को समान मात्रा में लेकर 4-4 ग्राम की मात्रा में खाकर ऊपर से ताजा पानी पीने से बंद मासिक धर्म खुलकर आता है। मासिक धर्म की कमी के कारण यदि मुंहासे निकलते हों तो प्रात:समय पत्तों सहित एक मूली रोजाना खाएं।
मूली रज (मासिक-धर्म) और वीर्य पुष्ट करती है। श्वेत प्रदर के रोग को दूर करने में भी यह सहायक है।
8. अदरक:
मासिक-धर्म के कष्ट में सोंठ और पुराने गुड़ का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाना लाभकारी होता है। ध्यान रहे कि ठण्डे पानी और खट्टी चीजों से परहेज रखें।
9. तारपीन:
कमर तक गुनगुने पानी में बैठे और पेडू (नाभि) पर सेक करने के बाद तारपीन के तेल की मालिश करने से मासिक-धर्म की पीड़ा नष्ट हो जाती है।
10. बबूल:
लगभग 250 ग्राम बबूल की छाल को जौकूट यानी पीसकर 2 लीटर पानी में पकाकर काढ़ा बना लें। जब यह 500 मिलीलीटर की मात्रा में रह जाए तो योनि में पिचकारी देने से मासिक-धर्म जारी हो जाता है और उसकी पीड़ा भी शान्त हो जाती है।



26.1.18

सिर्फ एंजियोप्लास्टी नहीं ,हृदय रोग का यह भी है अचूक उपचार



     


    वैसे तो अर्जुन की छाल अनेकों बिमारियों जैसे कि रक्त की शुद्धि, रक्त के थक्के बनने से रोकना, कोलेस्ट्रॉल कम करने में आदि में प्रयोग की जाती है लेकिन हृदय रोगियों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है. यह किसी भी तरह के हृदय रोग जैसेकि हृदय की शिथिलता, तेज़ धड़कन, सूजन या हृदय बढ़ जाने पर, हृदय की पीड़ा, घबराहट होना आदि में अत्यंत लाभकारी है. इसलिए अगर आपको हृदय सम्बन्धी कोई भी दिक्कत है तो इसका प्रयोग जरूर करें. हृदय रोग के लिए अर्जुन की छाल का प्रयोग कैसे करें 
     *सबसे पहले ताजा अर्जुन की छाल को छाया में सुखाकर उसका चूरण बना लें. अब देसी गाय का दूध लगभग 300 ग्राम लेकर इसमें 300 ग्राम पानी डालें. अब इसमें एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूरण डालकर गैस पर उबाल लें. आप इसमें थोड़ी सी मिश्री भी डाल सकते हैं और यह मिक्सचर आधा रह जाने पर इसे उतारकर छान लें और थोडा ठंडा होने पर पि जाएँ. ऐसा करने से सम्पूर्ण ह्रदय रोग नष्ट होगें और हार्ट अटैक से बचाव होगा. ऐसा आपको हर रोज सुबह शौच जाने के बाद खाली पेट करना है. और शुरु में यह लगातार एक महीने तक पीना है. एक महीने के बाद हर महीने शुरु के 3-5 दिनों तक पियें ताकि आगे कभी कोई दिक्कत ना आये. 



अर्जुन की छाल के लाभ -
    अर्जुन की छाल से नसें मजबूत बनती हैं और रक्त का प्रवाह अच्छा बनता है. अर्जुन की छाल का नियमित रूप से प्रयोग करने पर खून के थक्के नहीं जमते. अर्जुन की छाल में मिश्री मिलाकर  लेने से , घबराहट और अनियमित धड़कन से छुटकारा मिलता है. अगर हार्ट-अटैक आ गया हो तो अर्जुन की छाल को गाय के दूध में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम सेवन करें. अर्जुन की छाल का चूरण बनाकर रख लें और जब भी दिल की धड़कन बढ़ने लगे तो इस चूरण को मुह में डालकर चूसने से दिल की धड़कन तुरंत ही सामान्य हो जाएगी. अर्जुन की छल के चूरण, गाय के घी और पीसी हुई मिश्री का मिक्सचर रेगुलर लेने से दिल मजबूत बनता है और हार्ट-अटैक का खतरा नहीं रहता.
    *हृदय की सभी समस्याओ के लिए एक वरदान । क्या आपकी धमनियों में खून के धक्के जमे हुए हैं या इनमे प्लाक जमा हुआ हैं। ब्लड प्रेशर बढ़ा रहता है, बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ रहता है या किन्ही कारणवश डॉक्टर ने आपको ANGIOPLASTY के लिए कह दिया हैं। या कैसी भी गंभीर समस्या हैं। तो एक बार ये ज़रूर आज़माये।
   *  अर्जुन की छाल 100 ग्राम ले कर 500 मिली पानी में पकाये 200 मिली रहने पर उतार ले और हर रोज़ सुबह शाम 10-10 मिली ले। इस से खून में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रोल कम हो जायेगा, खून के थक्के साफ़ हो जायेंगे, ब्लड प्रेशर सही हो जायेगा और ANGIOPLASTY की नौबत नहीं आएगी। अर्जुन के सेवन से अलसर में भी आशातीत लाभ होता हैं।
    *इस काढ़े को और असरदार बनाने के लिए इसमें 10 ग्राम दालचीनी मिला मिला कर काढ़ा बनायें।
अर्जुन की चाय भी बना कर पी जा सकती हैं। साधारण चाय की जगह अर्जुन की कुटी हुई छाल डालिये। और चाय की तरह बना कर पीजिये। अगर आपको अर्जुन के पेड़ न मिले तो अर्जुन छाल आपको रामदेव की दुकानो से मिल जाएगी ये 100 ग्राम करीब 15 रुपये की आती है|
   *अनेको हृदय रोगियों को इस से राहत मिली हैं।  अर्जुन 
लकवा के मरीजों को भी देते हैं जिस से उनको बहुत लाभ होता हैं।
*Varicose veins में भी ये बहुत उपयोगी हैं, अलसर के रोगियों के लिए भी ये बहुत लाभदायक हैं।


19.1.18

छोटे वक्ष को उन्नत और सूडोल बनाएँ//Make Small Tits Larger and beautiful


    

सुडौल व उन्नत वक्ष आपके सौन्दर्य में चार-चाँद लगा सकते है. इस बात में कोई दो राय नहीं है  कि सुन्दर एवम् सुडौल वक्ष प्रकृति की देन है परन्तु फिर भी उनकी उचित देखभाल से इन्हें सुडौल व गठित बनाया जा सकता है. इससे आपके व्यक्तित्व में भी निखार आ जाता है. अधिकतर महिलाये अपने छोटे ब्रैस्ट को विकसित करना चाहती है उनके लिए दिए गये घरेलु नुस्खे काफी कारगर सिद्ध होंगे. अविकसित वक्ष न तो स्त्री को ही पसंद होते है न ही उनके पुरुष साथी को.
    वक्षों का आकार सही न रहने के पीछे अनेक कारण हो सकते है. किसी लम्बी बीमारी से ग्रसित होने के कारण भी वक्ष बेडौल हो सकते है, इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान तथा प्रसव के बाद भी स्तनों का बेडौल हो जाना एक आम बात है. ऐसी अवस्था में स्त्रियों के लिए उचित मात्रा में पौष्टिक व संतुलित आहार लेना अति आवश्यक हो जाता है. उनके भोजन में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, विटामिन्स, मिनरल्स तथा लौह तत्व भरपूर मात्रा में होने चाहिए. इसके साथ साथ ऐसी स्त्रियों को अपने स्तनों पर जैतुन का लगाकर मालिश करनी चाहिये. ऐसा करने से स्तनों में कसाव आ जाता है. मालिश करने की दिशा निचे से उपर की ओर होने चाहिए.
    मालिश करने के बाद ठन्डे व ताज़े पानी से नहाना उचित रहेगा. ऐसा करने से न केवल वक्ष विकसित व सुडौल होने लगेंगे इसके अलावा आपके रक्त संचार की गति में भी तीव्रता आयगी.
वक्ष सौन्दर्य के लिए कुछ सरल उपाय व व्यायाम:-




१. सबसे पहले घुटनों के बल बैठ जाए और दोनों हाथों को सामने लाकर हथेलियों को आपस में मिलाकर पुरे बल से आपस में दबाएँ जिससे स्तनों की मांसपेशियों में खिंचाव होगा. फिर इसके बाद धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए अपनी हथेलियों को ढीला कर दें. इस प्रक्रिया को नियमित रूप से १० से १५ बार करे. ( वक्षों को नहीं दबाना है )

२. इसके अलावा दोनों हाथों को सामने की ओर फैलाते हुए हथेलियों को दिवार से सटाकर पांच मिनट तक दीवारे पर दबाव डालें. ऐसा करने से वक्ष की मांसपेशियों में खिचांव होगा, जिससे वक्ष पुष्ट हो जायंगे.
३. घुटनों के बल चौपाया बन जाए, फिर दोनों कोहनियों को थोडा-सा मोड़ते हुए शारीर के उपरी भाग को निचे की ओर झुकाएं.
अपने शरीर का पूरा भार निचे की ओर डाले. तथा पुनः प्रथम अवस्था में आ जाए. इस व्यायाम को ६ से ८ बार दोहराएँ.
४. आप व्यायाम के अलावा एक नुस्खे को अपनाकर भी ढीले पड़े स्तनों में कसावट लाई जा सकती है. इसके लिए अनार के छिलकों को छाया में सुखा लें. फिर इन सूखे हुए छिलको का महीन (बारीक़) चूर्ण बना लें, अब इस चूर्ण को नीम के तेल में मिलाकर कुछ देर के लिए पका लें. फिर इसे कुछ देर ठंडा होने के लिए छोड़ दें, ठंडा हो जाने के बाद दिन में एक बार इस लेप को वक्षों पर लगायें और तकरीबन एक से दो घंटा लगे रहने के बाद इस लेप को सादे पानी से साफ़ कर लें. इसके नियमित उपयोग से कुछ दी दिनों में आपको लाभ अवश्य दिखने लगेगा.
     जो स्त्रियाँ बच्चों को स्तनपान कराती है उन स्त्रियों को अपने वक्षों को देख-रेख की ओर और अधिक ध्यान देने की आवश्कता होती है. बच्चों को स्तनपान कराने से स्तनों में ढीलापन आ जाता है. इसके अलावा उनके लिए कुछ बातों की और ध्यान देना भी जरूरी होता है. उन्हें कभी भी बच्चों को लेटकर स्तनपान नहीं कराना चाहिए, हमेशा बैठकर ही बच्चों को दूध पिलाना चाहिए. साथ ही इस बात का भी विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि स्तनपान कर॰ने के लिए दोनों स्तनों का बारी-बारी से उपयोग करना चाहिए. ऐसा न करने से वक्षों के आकार में भिन्नता आ जाती है. जिससे आपके सम्पूर्ण सौन्दर्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.



14.1.18

ग्लूकोमा यानी काला मोतिया की जानकारी , सावधानियाँ और उपचार




     भारत में अंधेपन के प्रमुख कारणों में से एक कारण काला मोतिया या ग्लूकोमा है। इस बीमारी के कारणों को देखने के पहले हमें आँख की रचना समझना होगी। आँख में स्थित कॉर्निया के पीछे आँखों को सही आकार और पोषण देने वाला तरल पदार्थ होता है, जिसे एक्वेस ह्यूमर कहते हैं।
    लेंस के चारों ओर स्थित सीलियरी टिश्यू इस तरल पदार्थ को लगातार बनाते रहते हैं। और यह द्रव पुतलियों के द्वारा आँखों के भीतरी हिस्से में जाता है। इस तरह से आँखों में एक्वेस ह्यूमर का बनना और बहना लगातार होता रहता है, स्वस्थ आँखों के लिए यह जरूरी है।
   आँखों के भीतरी हिस्से में कितना दबाव रहे यह तरल पदार्थ की मात्रा पर निर्भर रहता है। जब ग्लूकोमा होता है तब हमारी आँखों में इस तरल पदार्थ का दबाव बहुत बढ़ जाता है। कभी-कभी आँखों की बहाव नलिकाओं का मार्ग रुक जाता है, लेकिन सीलियरी ऊतक इसे लगातार बनाते ही जाते हैं।
    ऐसे में जब आँखों में ऑप्टिक नर्व के ऊपर पानी का दबाव अचानक बढ़ जाता है तो ग्लूकोमा हो जाता है। अगर आँखों में पानी का इतना ही दबाव लंबे समय तक बना रहता है तो इससे आँखों की ऑप्टिक नर्व नष्ट हो सकती है। समय रहते यदि इस बीमारी का इलाज नहीं कराया जाता तो इससे दृष्टि पूरी तरह जा सकती है।
ग्लूकोमा के प्रकार -
ओपन एंगल ग्लूकोमा- 
    अधिकांश रुप से यही ग्लूकोमा होता है। इसमें तरल पदार्थ मुख्यतः आँखों की पुतलियों से होकर आँखों के दूसरे भागों में बहता है और द्रव वहाँ नहीं पहुँचता जहाँ इसे छाना जाता है। जिससे आँखों में इस द्रव का दबाव बढ़ जाता है कि दृष्टि कमजोर हो जाती है।
लो टेंशन या नॉर्मल एंगल ग्लूकोमा - 
इसमें आँखों की तंत्रिका नष्ट हो जाती है और देखने की क्षमता में कमी आ जाती है।
एंगल क्लोजर ग्लूकोमा -
इस प्रकार के ग्लूकोमा में आँखों के द्रव का दबाव अचानक ही बहुत बढ़ जाता है, और दबाव को कम करने के लिए तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है।
कन्जनाइटल ग्लूकोमा -
 इसमें जन्म से बच्चे को ग्लूकोमा के लक्षण पाए जाते हैं।


क्या होते हैं लक्षण- 

   अधिकांश लोगों को ग्लूकोमा के बारे में कम ही जानकारी है इसलिए इसके लक्षणों को तब तक पहचाना नहीं जाता जब तक कि उन्हें आँखों से कम नहीं दिखाई देने लगता। इस बीमारी के शुरुआती दौर में जब आँखों की तंत्रिकाओं की कोशिकाएँ मामूली रूप से टूटने लगती हैं तो आँखों के सामने छोटे-छोटे बिंदु और रंगीन धब्बे दिखाई देते हैं। पहले-पहल लोग इन लक्षणों को गंभीरता से नहीं लेते परिणामस्वरुप उन्हें हमेशा के लिए अपनी आँखों की रोशनी खोनी पड़ती है।
   ग्लूकोमा के जितने भी प्रकार हैं उनमें से एक्यूट एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा के लक्षणों की पहचान पहले से की जा सकती है क्योंकि यह बीमारी धीरे-धीरे आती है। इसके प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं लेकिन अलग-अलग लोगों में ये अलग हो सकते हैं- आँखों के आगे इंद्रधनुष जैसी रंगीन रोशनी का घेरा दिखाई देना, सिर में चक्कर और मितली आना, आँखों में तेज दर्द होना आदि।
   हालाँकि एक्यूट एंगल ग्लूकोमा के ये लक्षण आँखों की दूसरी समस्याओं में भी देखे जा सकते हैं। उपरोक्त लक्षणों में से अगर आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को किसी भी लक्षण का आभास हो तो आप तत्काल नेत्र रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।
इन बातों से रहें सावधान-
ग्लूकोमा के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि सामान्य रुप से पहले इसके कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते, जिनके आधार पर बीमारी को पहचाना जा सके। फिर भी इस संबंध में कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए-
अगर परिवार में माता-पिता को ग्लूकोमा है तो बच्चों को भी यह बीमारी हो सकती है।
अगर आप चश्मा पहनती हैं तो आप अपनी आँखों की नियमित जाँच जरूर करवाएँ।
डायबिटीज से पीड़ित लोगों को ग्लूकोमा का खतरा बना रहता है।
   ब्लड प्रेशर बहुत अधिक या कम होने पर भी ग्लूकोमा हो सकता है। इसलिए अगर आपका ब्लडप्रेशर बहुत ज्यादा या कम रहता हो तो आपको नियमित रूप से आँखों की जाँच करवानी चाहिए।
*हृदय रोग भी इस बीमारी का एक कारण है।
*अगर आप हैं 40 वर्ष से अधिक के हैं तो वर्ष में एक बार आँखों की जाँच जरूर कराएँ।
रोग अवधि-
*रोग के प्रकार, और ली गई चिकित्सा के आधार पर, ठीक होने का समय बदलता है।
*यदि पारम्परिक शल्यक्रिया हो तो एक सप्ताह से अधिक का समय लगता है।
*यदि लेज़र द्वारा शल्यक्रिया हुई हो, तो रोगी अपनी सामान्य गतिविधियों को शल्यक्रिया के अगले दिन से ही कर सकता है।
*जाँच और परीक्षण
*आँख के भीतरी दबाव को मापना (टोनोमेट्री)।
*दृष्टि क्षेत्र का परीक्षण।
*पेचिमेट्री (कॉर्निया की मोटाई को नापना)।
*गोनियोस्कोपी
*ओफ्थाल्मोस्कोपी
रोकथाम (बचाव)-
भावनात्मक तनाव से बचें और शांतिपूर्ण जीवन शैली अपनाएँ।
अत्यधिक टीवी और फिल्में देखने तथा अत्यधिक पढ़ने से बचें, क्योंकि ऐसी आदतें आँखों पर लम्बा जोर डालती हैं।
रोग का शीघ्र निर्धारण और चिकित्सा।
उन एलर्जन से बचें जो ग्लूकोमा को उत्प्रेरित करते हैं।
आँखों की सुरक्षा हेतु चश्मा/लेंस पहनें।
आँखों की नियमित देख-भाल करें।



ध्यान देने की बातें-

आंख में दर्द
धुन्धला दिखाई देना
मतली और उल्टी
डॉक्टर को कब दिखाएँअपने डॉक्टर से संपर्क करें यदि आपको
आँखों में लालिमा
दृष्टि की हानि
धुंधला या सुरंग के मुहाने जैसा दिखाई देता है।
परहेज और आहार
लेने योग्य आहार-
विटामिन-ए, बी, सी, और ई (मुख्यतः सी)।
गिरियाँ, मेवे और अनाज।
फल और सब्जियाँ।
खट्टे फल, पत्तेदार हरी सब्जियाँ, अंडे, गाजर, दूध, लीन मीट, समुद्री भोजन, ब्लूबेरिस, चेरी, टमाटर ये सभी ग्लूकोमा के लिए अच्छे हैं।
इनसे परहेज करें-
चाय और कॉफ़ी
शीतल पेय
शराब और तम्बाकू
शक्कर
मसाले और अचार
माँस के आहार
योग और व्यायाम
नियमित व्यायाम ओपन-एंगल ग्लूकोमा के रोगियों की आँख के दबाव को धीमे-धीमे कम करता है। क्लोज्ड-एंगल ग्लूकोमा पर व्यायाम का कोई प्रभाव नहीं होता।
आँखों के व्यायाम — YouTube
आँखों के विश्रामदायक व्यायाम
योग — YouTube
घरेलू उपाय (उपचार)-
आँखों में तेजी से ठन्डे पानी के छींटे मारें। यह आँखों के रक्त संचार को उत्तेजित करता है और दबाव को हटाता है।
डॉक्टर द्वारा आम सवालों के जवाब-
प्रश्न-. मुझे उच्च रक्चाप पता चला है; क्या इससे मेरी आंख का दबाव प्रभावित होगा? 
   यदि आपका रक्तचाप ढ़ता है तो आपकी आंख का भीतरी दबाव तुरंत बढ़ सकता है। तब आपकी आँख इसके लिए प्रयत्न करके स्वयम पर के दबाव को उसके सामान्य स्तर तक लाएगी। हालाँकि, लम्बे समय तक बढ़ा हुआ रक्तचाप आपकी आँख में प्रवाह को घटा सकता है जो कि ग्लूकोमा के लिए हानिकारक होता है।
प्रश्न-.
 ग्लूकोमा में दृष्टिक्षेत्र की हानि क्यों होती है? 
   ऑप्टिक नर्व की महीन शिराओं का बढ़ता हुआ नुकसान धीरे-धीरे दृष्टि क्षेत्र के नुक्सान और आखिरकार दृष्टि के नुकसान अर्थात दृष्टिहीनता में बदल जाता है। हालाँकि, ग्लूकोमा के अधिकतर रूपों में रोग के काफी बढ़ जाने तक रोगी को लक्षणों का पता नहीं चलता। रोगी को परिधीय दृष्टि की शुरुआती हानि समझ में नहीं आती, और धीरे बढ़ने के कारण इसको समझ पाना बगैर खास जाँचों के लगभग नामुमकिन है। ग्लूकोमा में नाक के परिधीय दृष्टि क्षेत्र की हानि सबसे पहले होती है। बढ़ते हुए परिवर्तनों और दृष्टि क्षेत्र के दोषों के सन्दर्भ में इनको संभालना ग्लूकोमा के रोगी के मामले में सबसे कठिन कार्य है।
प्रश्न-. क्या उपचार के बाद मेरी दृष्टि वापस आ जाएगी?
     दुर्भाग्यवश, ग्लूकोमा के कारण हुआ दृष्टि का कोई भी नुकसान स्थाई होता है और वापस नहीं आ सकता। यदि शुरुआती चरण में ही पता चल जाये तो ग्लूकोमा को नियंत्रित किया जा सकता है और आगे का नुकसान थोड़ा या बिलकुल ना के बराबर हो सकता है। यदि बिना उपचार छोड़ दिया जाये तो पहले परिधीय दृष्टि, बाद में केंद्र की दृष्टि प्रभावित होगी और दृष्टिहीनता हो सकती है। इसलिए आँखों की नियमित सुरक्षात्मक जाँच आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न- यदि मेरी आँख का दबाव ज्यादा है तो क्या मुझे ग्लूकोमा हो सकता है? 
   ये आवश्यक नहीं है। आँख के बढ़े दबाव वाले हर व्यक्ति को ग्लूकोमा नहीं होता। कुछ लोग आँख के बढ़े दबाव को अन्य लोगों से बेहतर सहन कर सकते हैं। साथ ही, दबाव का कोई स्तर किसी व्यक्ति के लिए अधिक हो सकता है जबकि अन्य लोगों के लिये वह सामान्य होता है।
प्रश्न-क्या आँख में बढ़ते दबाव के साथ मुझे ग्लूकोमा उत्पन्न हो सकता है? 
   जी हाँ। ग्लूकोमा बिना आँख के दबाव के बढ़े हुए भी उत्पन्न हो सकता है। ग्लूकोमा के इस रूप को कम-दबाव या सामान्य-दबाव वाला ग्लूकोमा कहते हैं। यह ओपन-एंगल ग्लूकोमा जितना आम नहीं है।
ग्लूकोमा का इलाज अब सिर्फ एक इंजेक्शन से

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नए तरीके से 1 महीने में ही आराम
अभी 3 माह में मिलता है आराम
ब्रिटेन में अंधेपन के इलाज की नई तकनीक के टेस्ट सफल, भारत में सवा करोड़ लोगों को ग्लूकोमा
{ अभी ट्रैबेक्यूलेक्टॉमी प्रोसिजर से ग्लूकोमा का इलाज होता है। आंखों में चीरा लगा ट्यूब के जरिये आंख में जमा पानी निकाला जाता है। फिर टांके लगते हैं। ठीक होने में दो से तीन महीने लगते हैं। ग्लूकोमा के मरीज को अगर डायबिटीज भी है तो इलाज में ज्यादा दिक्कतें आती हैं।
{ यह जेन जैल स्टेंट तकनीक है। इसमें एक इंजेक्शन के जरिए महज 6 एमएम की लचीली ड्रेनेज ट्यूब या स्टेंट को आंखों में डाला जाता है। यह आंखों के कोन (छिद्र) में फिट हो जाती है। कोन वह जगह है जहां से आंखों में मौजूद लिक्विड बाहर निकलता है। कोन में ब्लॉकेज होेने पर जैल जैसा लिक्विड बाहर निकलने के बजाए आई लैंस में जमा होने लगता है। फिर ऑप्टिक नर्व पर दबाव डालकर उसे नुकसान पहुंचाता है। इससे आखिर में दृष्टि चली जाती है। ट्यूब इसी ब्लॉकेज को खोलेगी। मरीज को एक महीने में आराम मिलने लगेगा।
एजेंसी| लंदन
भारतसहित दुनियाभर में अंधेपन के लिए जिम्मेदार सबसे बड़ी बीमारी ग्लूकोमा या काला मोतिया का आसान इलाज मिल गया है। ब्रिटेन के डॉक्टरों ने इसके इलाज की ज्यादा आसान तकनीक ईजाद की है।
नई तकनीक में सिर्फ एक बार ही ग्लूकोमा प्रभावित आंख में इंजेक्शन दिया जाएगा। फिर आंखों में मौजूद ग्लूकोमा की वजह बनने वाला लिक्विड खुद ही बाहर आता रहेगा। इलाज के लिए चीरा देने की जरूरत नहीं होगी। लंदन के रॉयल फ्री हॉस्पिटल के आई सर्जन विक शर्मा के मुताबिक यह इलाज का बहुत ही सुरक्षित और जल्द राहत देने वाला तरीका है। ब्रिटेन में इसके टेस्ट सफल रहे हैं। भारत में भी जल्द इसका उपयोग होने लगेगा। भारत में सवा करोड़ लोग जबकि दुनियाभर में सात करोड़ से ज्यादा लोग ग्लूकोमा से पीड़ित है।
नई तकनीक दूसरी या तीसरी स्टेज तक पहुंच चुके ग्लूकोमा मरीजों के लिए भी कारगर है। डायबिटीज, हाई बीपी और हार्ट की बीमारियों की वजह से भी ग्लूकोमा हो सकता है। बार-बार चश्मे के नंबर बदलना, रोशनी में रंगीन छल्ला दिखना,अक्सर धुंधला दिखाई पड़ना और कम रोशनी में चीजों पर फोकस नहीं कर पाना, इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं।



13.1.18

कॉस्टिकम होम्योपैथिक औषधि के लक्षण,उपयोग


 एक-एक अंग में लकवा – 
लकवा इस औषधि का चरित्रगत लक्षण है। शरीर के किसी एक अंग पर इस रोग का आक्रमण होता है। उदाहरणार्थ, अगर ठंडी, खुश्क हवा में लम्बा सफर करने निकलें और हवा के झोंके आते जायें, तो किसी एक अंग पर इस हवा का असर पड़ जाता है और वह अंग सुन्न हो जाता है, काम नहीं करता। ठंड से चेहरा टेढ़ा हो जायगा, आवाज़ बैठ जायेगी, भोजन निगलने की मांस-पेशियां काम नहीं करेंगी, जीभ लड़खड़ाने लगेगी, आंख की पलक झपकना बन्द कर देगी, पेशाब नहीं उतरेगा, शरीर भारी हो जायगा। इन सब लक्षणों पर कॉस्टिकम से अनेक रोगी झट-से ठीक होते देखे जाते हैं।
बेहद कमजोरी –
गला, चीभ, चेहरा, आंख, मलाशय, मूत्राशय, जरायु, हाथ-पैर आदि का लकवा – कॉस्टिकम औषधि की स्पाइनल कौर्ड (मेरु-दण्ड) पर विशेष क्रिया है, और क्योंकि वहीं से ज्ञान-तंतु भिन्न-भिन्न अंगों में जाते हैं इसलिये मेरु-दंड के ज्ञान-तंतुओं पर ठंड आदि के कारण, अथवा चिरस्थायी दु:ख, शोक, भय, प्रसन्नता, क्रोध, खिजलाहट आदि के कारण जिन्हें रोगी सह नहीं सकता उसके भिन्न-भिन्न अंगों में से किसी भी अंग में लकवा हो जाता है। लकवा किसी एक अंग का होता है। ठंड लगने या भय आदि से जब शुरू-शुरू में किसी अंग में यह रोग होता है तब एकोनाइट से ठीक हो जाता है, परन्तु जब एकोनाइट काम नहीं करता, तब कॉस्टिकम देने की जरूरत पड़ जाती है। कॉस्टिकम में रोग का प्रारंभ बेहद कमजोरी से शुरू होता है। हाथ-पैर या शरीर के अंग कांपने लगते हैं, रोगी मानो बलहीनता में डूबता जाता है जेलसीमियम में भी पक्षाघात में यह कांपना पाया जाता है। रोगी धीमी चाल से आता है, मांस-पेशियों की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है, गले में लकवा, भोजन-प्रणालिका में लकवा, डिफ्थीरिया के बाद इन अंगों में लकवा, आंख की पलक का लकवा, मलाशय, मूत्राशय, जरायु का लकवा, हाथ-पैर का शक्तिहीन हो जाना, बेहद सुस्ती, थकान, अंगों का भारीपन – ये सब लकवा की तरफ धीरे-धीरे बढ़ने के लक्षण हैं जिनमें कॉस्टिकम का प्रयोग लाभप्रद है। कॉस्टिकम का लकवा प्राय: दाई तरफ होता है। बाई तरफ के लकवा में लैकेसिस की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
मलाशय से अपने-आप मल निकल जाना या कब्ज हो जाना तथा गुदा-भ्रंश –
मलाशय पर लकवा का असर दो तरह का हो सकता है। क्योंकि मलाशय काम नहीं करता इसलिये या तो एलो की तरह मल अपने-आप बाहर निकल पड़ेगा, या मल निकलेगा ही नहीं, कब्ज हो जायगी। दोनों अवस्थाएं पक्षाघात का परिणाम है। मलाशय के पक्षाघात में कॉस्टिकम औषधि का विशेष-लक्षण यह है कि रोगी खड़े होकर ही टट्टी कर सकता है। गुदा के लकवा के कारण गुदा-भ्रंश भी हो जाता है।
मूत्राशय से अपने-आप मूत्र निकल जाना या पेशाब बन्द हो जाना –
इसी प्रकार मूत्राशय के लकवा का यह स्वाभाविक परिणाम है कि या तो मूत्र अपने-आप बहा करता है या निकल जाता है क्योंकि उसे रोकने वाली पेशियां काम नहीं करतीं, या कोशिश करने पर भी पेशाब नहीं होता। ये दोनों अवस्थाएं भी पक्षाघात का ही परिणाम हैं।


बच्चों का पहली नींद में पेशाब निकल जाना –
 
प्राय: बच्चे सोने में पेशाब कर दिया करते हैं, या जागते हुए भी अनजाने पेशाब हो जाता है। बच्चा इस प्रकार पेशाब पहली नींद में ही कर दे, तो कॉस्टिकम से ठीक हो जायगा। प्राय: देखा जाता है कि बच्चे को पता ही नहीं चलता कि उसने पेशाब कर दिया है। जब वह हाथ लगाकर देखता है कि उसका कच्छा भींग गया है तब वह समझता है कि पेशाब अपने-आप निकल गया।
 सायंकाल मानसिक-लक्षणों का बढ़ जाना और घबराहट के साथ चेहरा लाल तथा बार-बार पाखाने की हाजत होना
कॉस्टिकम औषधि में रोगी हर समय उदास रहता है। चित्त की यह अवस्था उस समय बहुत बढ़ जाती है जब दिन का उजाला सिमटने लगता है, सांयकाल की अंधेरी उमड़ कर आने लगती है। रोगी उस समय डरा हआ, घबराया हुआ रहता है। उसके मन की एकरसता में बाधा पड़ जाती है और उसे कहीं शान्ति नहीं दिखती। उसे ऐसा लगता है कि कोई संकट टूट पड़ने वाला है। उसकी आत्मा से आवाज निकलती है कि उसने कोई अपराध किया है। इस घबराहट में उसे बार-बार पाखाने की हाजत होती है। घबराहट में चेहरा लाल हो जाना और उस समय बार-बार पाखाने की हाजत होना कॉस्टिकम का विशेष लक्षण है। रोगी का मिजाज चिड़चिड़ा हो जाता है और स्वभाव संदेहशील तथा दूसरों के दोष ढूंढनेवाला हो जाता है। चिड़चिड़ा होना और दूसरों के प्रति सहानुभूति प्रकट करना एक अद्भुत-लक्षण है।
दुःख, शोक, भय, रात्रि-जागरण आदि से उत्पन्न रोग –
कॉस्टिकम विशेषकर उन मानसिक रोगों के लिए अत्यंत उपयोग है जो दीर्घकालीन दु:ख, शोक आदि से उत्पन्न होते हैं। कई दिनों तक रात्रि-जागरण से जो रोग हो जाते हैं उनके लिये भी यह लाभप्रद है। इस दृष्टि से इसकी तुलना ऑरम मेट, इग्नेशिया, कौक्युलस, लैकेसिस, ऐसिड फॉस तथा स्टैफिसैग्रिया से की जा सकती है। इन रोगों की उत्पत्ति भी तो जीवनी-शक्ति के निम्न स्तर पर पहुंच जाने के कारण मानसिक-पक्षघात की सी ही समझनी चाहिये। इन रोगों पर जब रोगी सोचने लगता है तब उसकी तबीयत और बिगड़ जाती है।
भय या त्वचा-रोग दब जाने से मिर्गी, तांडव, ऐंठन होना –
कभी-कभी मिर्गी, तांडव तथा अकड़न का रोग व्यक्ति के भीतर किसी भय के बैठ जाने से पैदा हो जाता है। भय के कारण इस प्रकार के रोगों को कॉस्टिकम दूर कर देता है। भय के अतिरिक्त किसी त्वचा के रोग को लेप आदि से दबा देने से भी इस प्रकार के मानसिक-लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। यौवन-काल में किसी लड़की को मासिक-धर्म की गड़बड़ी से भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं। भय के मन में गुप्त-रूप से बैठ जाने, दानों के दब जाने या मासिक के अनियमित होने से अगर मिर्गी, तांडव या अकड़न हो, और रोगी अनजाने अपने हाथ-पैर हिलाता रहे, या सोते हुए हाथों या पैरों को झटके देता रहे, तो यह औषधि उपयोगी है।
 गठिये में पुट्ठों और नसों का छोटा पड़ जाना और ठंडी हवा में आराम – 
गठिये के इलाज में रोगी प्राय: मालिश आदि कराते हैं, नाना प्रकार के तेलों का इस्तेमाल करते हैं, डाक्टरी इलाज में छाले आदि डलवाते हैं। इन सबके कारण जोड़ और अंग विकृत हो जाते हैं, पुट्ठे और नसें छोटी पड़ जाती हैं। बांह या पैर सीधा नहीं किया जा सकता, सीधा करने से वे अकड़ जाते हैं ये कष्ट सर्दी से बढ़ जाते हैं, रोगी का मन घबराया रहता है, उसे भय सताने लगता है कि कोई असह्य-कष्ट आने वाला है। रोग का मुख्यतौर पर आक्रमण जबड़े पर होता है। गठिये में कॉस्टिकम का विशेष-लक्षण यह है कि रोगी ठंड या नम हवा में ठीक रहता है। जब-जब भी नम या सर्द मौसम आती है गठिया (Arthritis) गायब हो जाता है। साधारण तौर पर गठिये का रोग ठंड से या नम हवा से बढ़ना चाहिये, परन्तु कॉस्टिकम में उल्टा पाया जाता है। लीडम में तो गठिये का रोगी पैर को या गठिया-ग्रस्त अंग को बर्फ के पानी में रखता है, तब उसे चैन पड़ती है।
मस्तिष्क के लकवा के कारण पागलपन – प्रचंड पागलपन के लिये तो बेलाडोना आदि दवाएं हैं, परन्तु जब रोग पुराना पड़ जाता है और मस्तिष्क के पक्षाघात के कारण रोग ठीक होने में नहीं आता, रोगी सदा चुपचाप बैठा रहता है, किसी से बात नहीं करता, अपने दिल में निराश रहता है, तब पक्षाघात के कारण उत्पन्न यह पागलपन इस दवा से ठीक हो जाता है।
स्पर्श न सहन सकना – 
स्पर्शासहिष्णुता इसका चरित्रगत-लक्षण है। जैसे कच्चे फोड़े को छुआ जाय तो दर्द होता है, वैसा दर्द इस औषधि में भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाया जाता है। खांसते हुए छाती में फोड़े का-सा दर्द होता है, गले में फोड़े का-सा दर्द, पेट की शोथ में फोड़े का-सा दर्द, दस्त आते हों तो धोती या साड़ी के स्पर्श को भी आते नहीं सक सकतीं, इन्हें ढीला करना पड़ता है, मलद्वार में भी लाली दिखाई देती है जहां छूने से दर्द होती है – स्पर्श के प्रति इस तरह की असहिष्णुता कॉस्टिकम का व्यापक-लक्षण है। यह स्पर्श को दर्द के कारण सह न सकना आर्निका की तरह का नहीं है। आर्निका में कुचले जाने का-सा दर्द होता है, वह दर्द मांस-पेशियों (Muscles) में होता है। यह दर्द रस टॉक्स के दर्द के समान भी नहीं है। रस टॉक्स का दर्द मोच खाये दर्द के समान होता है, और मांस-पेशियों के ‘बन्धनों’ तथा मांस-पेशियों के ‘आवरणों’ (Sheaths) में होता है। कॉस्टिकम का स्पर्श न सह सकने का दर्द ‘श्लैष्मिक-स्तरों’ (Mucous surfaces) में होता है, मानो वहां अध-पके फोड़े का-सा दर्द ही रहता हो|
 मोतियाबिन्द की दवा –
कॉस्टिकम में व्यक्ति रोशनी को सह नहीं सकता। आंख के आगे काले भुगने से उड़ते दीखते हैं। मोतियाबिंद की यह उत्तम औषधि है। देखने में ऐसे गलता है कि रोगी धुंध में से देख रहा हो, आंख के सामने एक पर्दा-सा आ जाता है। एक स्त्री जिसे मोतियाबिंद था, और बायीं आंख में तो बहुत बढ़ चुका था, कॉस्टिकम से बिल्कुल ठीक हो गई। पहले उन्होंने उसे 1000 शक्ति की एक ही दिन में चार मात्राएं दीं। चार मास के बाद देखने से पता चला कि दृष्टि में बहुत सुधार हुआ। तब उन्होंने 40000 शक्ति की एक ही दिन में चार मात्राएं दीं। साल भर बाद दायीं आंख बिल्कुल ठीक हो गई, बायीं आंख में रोग का कुछ अवशेष बचा रहा। तब उन्होंने रोगिणी को 1 लाख की एक मात्रा दी और कुछ मास में बायीं आंख का मोतियाबिंद भी जाता रहा।
 मस्सों का होम्योपैथिक दवा –



कॉस्टिकम औषधि में सारे शरीर पर मस्से पैदा करने की शक्ति है। शरीर पर, आंख की पलकों पर, चेहरे पर, नाक पर यह मस्से पैदा करती है, इसलिये मस्सों को यह दूर भी करती है। डॉ० टायलर मस्सों के विषय में अपना अनुभव लिखते हुए कहती हैं कि उनके फार्म में बछड़ों के मुख, नाक और कानों पर जब मस्से निकलने लगे, तब उनके पिता ने निम्न-शक्ति का कॉस्टिकम पानी में घोल कर उन्हें पिला दिया जिससे सबके मस्से झड़ गये। थूजा भी मस्सों की औषधि है, परन्तु थूजा के मस्से ज्यादातर गुदा-द्वार और जननांगों पर होते हैं।

खांसी में ठंडे पानी के घूंट से आराम तथा कुल्हे के जोड़ में दर्द – 
खांसी सूखी आती है, सारा शरीर हिल जाता है, रोगी कफ को बाहर निकालने की कोशिश करता है, निकाल नहीं पाता, वह इसे अन्दर ही निगल जाता है। खांसते हुए गले में, छाती में फोड़े के समान दर्द होता है। अगर इस खांसी में ठंडे पानी का घूंट पीने से आराम पड़े, तो कॉस्टिकम ही दवा है। इस कफ़ में लेटने से खांसी बढ़ती है, और अद्भुत-लक्षण ये है कि खांसते हुए कुल्हे के जोड़ में दर्द होता है। इस औषधि में अनेक रोग- ठंडे पानी से आराम- इस ‘विलक्षण-लक्षण’ के आधार पर ही ठीक हो जाते है।
 मासिक-धर्म दिन को ही होता है – 
मासिक-धर्म सिर्फ दिन को होता है, लेटने से बन्द हो जाता है, रात को नहीं होता – यह इसका विचित्र-लक्षण है। कैक्टस तथा लिलियम में भी ऐसा ही होता है। मैगनेशिया कार्ब, अमोनिया म्यूर और बोविस्टा में मासिक सिर्फ रात को लेटने से होता है, चलने-फिरने से बन्द हो जाता है, क्रियोजोट में भी चलने-फिरने से मासिक-धर्म बन्द हो जाता है।
कॉस्टिकम औषधि के अन्य–लक्षण
 मोतियाबिंद – 



मोतियाबिंद में कुछ दिन प्रतिदिन 30 शक्ति की एक मात्रा देने से लाभ हुआ है।

 अगर कोई दवा लाभ देना बन्द कर दे –
 अगर यह देखा जाय कि रोगी दवा देने से कुछ देर ठीक रहता है, फिर वही हालत हो जाती है, तो सोरिनम, तथा सल्फर की तरह कॉस्टिकम को भी ध्यान में रखना उचित है।
 रोगी आग से जलने के बाद ठीक नहीं हुआ हो –
 अगर रोगी कहे कि जब से वह आग से जला है तब से वह ठीक नहीं हुआ, तब इस दवा की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
 पुराना घाव बार-बार फूटे – 
अगर पुराना घाव ठीक हो होकर बार-बार फूटे तब यह लाभप्रद है।
 प्रात: गला बैठना – 
अगर प्रात:काल आवाज बन्द रहे तो कॉस्टिकम, अगर सायंकाल आवाज बन्द हो तो कार्बो वेज और फॉसफोरस को ध्यान में रखना चाहिए।
शक्ति तथा प्रकृति –
 शक्ति 3 से 30; पुराने रोगों में उच्च शक्ति सप्ताह में एक या दो बार। फॉसफोरस को कॉस्टिकम से पहले या बाद में नहीं दिया जाता। औषधि ‘सर्द’- प्रकृति के लिए है।





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8.1.18

सर्दी मे ठंड से बचने के उपाय



      सर्दियों के दिनों में अक्सर तापमान 0 डिग्री या फिर इससे भी कम हो जाता है। जिसके कारण हमें घर से बाहर निकलने में बहुत ही मुश्किल हो जाती है। ऐसे में जब हम कुछ उपाय करते हैं तो काफी हद तक हम ठंड से आसानी से बच सकते हैं।
ठंड से बचने के लिए हम अक्सर गर्म कपड़े पहनते हैं और आग जलते हैं। जिससे हम ठंड को दूर कर सकें। लेकिन हमें बाहर की ठंड के साथ अंदर की ठंड को भी दूर करना होता है। उसके लिए हमें अपने खाने में ऐसी चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए। जिससे हमारे शरीर में गर्मी पैदा हो सकें। जब हम अपने शरीर को मौसम के अनुसार ढाल लेते हैं तो हमें न तो अधिक गर्मी लगती है न ही अधिक सर्दी। इसके साथ हम कई तरह की बीमारियों और उनसे होने वाले इन्फेक्शन से भी बचे रहते हैं। आइये जानते हैं सर्दियों में ठंड से बचने के उपाय के बारे में।
सर्दियों में ठंड से बचने के उपाय-
खजूर का सेवन-
सर्दियों के दिनों में ठंड से बचने के लिए हमें खजूर का सेवन करना चाहिए। जब आप खजूर को गर्म दूध के साथ खाते हो तो आप को सर्दी से राहत मिलती है ।



अदरक का सेवन-

सर्दियों में अदरक के प्रयोग से हमारे शरीर को गर्मी मिलती है और यह ठंड से होने वाली बीमारियों से बचाता है। इसके साथ आप लौंग, काली मिर्च और अदरक से बनी हुई चाय का सेवन करके भी ठंड को दूर कर सकते हो।
सूप का सेवन-
सूप का सेवन करने से हमारे शरीर में गर्मी पैदा होती है और यह जुकाम में भी फायदेमंद होता है। आप बेज और नान बेज सूप का इस्तेमाल कर सकते हो। बस आप को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सूप ताज़ा हो।
मूंगफली का सेवन-
सर्दियों के दिनों में मूंगफली का सेवन बहुत ही लाभकारी होता है। क्योंकि मूंगफली में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हमारे शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं जैसे कि मिनरल्स , एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन आदि ।


शहद-

शहद को आयुर्वेद में अमृत के सामान माना जाता है। शहद का सेवन करने से हम कई तरह के रोगों से बच जाते हैं। शहद का सेवन करने से हमारी पाचन शक्ति तेज होती है। और जब भी हमें सर्दियों के दिनों में ठंड लग जाती हैं तो एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद डाल कर पीने से हमें राहत मिलती है।
तिल का तेल-
तिल के तेल से शरीर में मालिश करने से हम ठंड से बच सकते हैं।
ओमेगा-
सर्दियों के दिनों में ठंड से बचने के लिए ओमेगा 3 का सेवन करना चाहिए। यह मछलियों में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसके इलावा मछलियों में जिंक भी पाया जाता है जो हमारे शरीर में होने वाले कई रोगों से बचाता है।
बाजरे की रोटी का सेवन-
सर्दियों के दिनों में बाजरे की खाने से शरीर में गर्मी आती है। बाजरे में प्रोटीन, विटामिन बी, कैल्शियम, फाइबर पाया जाता है जो हमारे शरीर के लिए बहुत ही अच्छा होता है। बच्चो को ठंड से बचाने के लिए सर्दियों के दिनों बाजरे की रोटी जरुर खिलानी चाहिए।



4.1.18

आँव रोग (पेचिश) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार




परिचय:-
जब आंव आने का रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इसका इलाज सही तरीके से करना चाहिए। इस रोग का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से किया जा सकता है।
आंव रोग होने का कारण:-
जब किसी व्यक्ति की पाचनशक्ति कमजोर पड़ जाती है तो उस व्यक्ति का पाचक अग्नि भी कमजोर हो जाती है जिसके कारण भोजन के रस का सार पककर लेस के रूप में मल के साथ बाहर निकलने लगता है और व्यक्ति को आंव का रोग हो जाता है।



आंव रोग होने का लक्षण:-

जब आंव आने का रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो इसके कारण व्यक्ति के मल के साथ एक प्रकार का गाढ़ा तेलीय पदार्थ निकलता है। आंव रोग से पीड़ित मनुष्य को भूख भी नहीं लगती है। रोगी को हर वक्त आलस्य, काम में मन न लगना, मन बुझा-बुझा रहना तथा अपने आप में साहस की कमी महसूस होती है।
आंव रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को कुछ दिनों तक रसाहार पोषक तत्वों (सफेद पेठे का पानी, खीरे का रस, लौकी का रस, नींबू का पानी, संतरा का रस, अनानास का रस, मठ्ठा तथा नारियल पानी) का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक अपने भोजन में फलों का सेवन करना चाहिए। इसके बाद कुछ दिनों तक फल, सलाद और अंकुरित पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इसके कुछ दिनों के बाद रोगी को सामान्य भोजन का सेवन करना चाहिए।
इसके अलावा इस रोग का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि उसका पेट साफ हो सके।
रोगी के पेट पर सप्ताह में 1 बार मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा सप्ताह में 1 बार उपवास भी रखना चाहिए।
आंव रोग से पीडि्त रोगी को घबराना नहीं चाहिए। रोगी को अपना उपचार करने के साथ-साथ गर्म पानी में दही एवं थोड़ा नमक डालकर सेवन करना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम को मट्ठा पीना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने से आंव रोग ठीक हो सकता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए ताकि शरीर में पानी का कमी न हों क्योंकि शरीर में पानी की कमी के कारण कमजोरी आ जाती है।
आंव रोग से पीड़ित रोगी को नारियल का पानी और चावल का पानी पिलाना काफी फायदेमंद होता है।




27.12.17

बच्चों के हाजमा ,अफ़ारा,वमन मे उपयोगी नुस्खे




१. चूने के स्वच्छ पानी को १/२ या १ चम्मच दूध पिलाने के पूर्व देने से बालकों की उल्टी, दस्त बन्द हो जाते है। वैल्सीयम कमी की पूर्ति होती है। बालक स्वथ्य रहता है।
२. अफारा (पेट) फूलने पर पानी में थोड़ा सा पापरी सोड़ा/ अथवा नीबू का रस डालकर पिलाने या तुलसी
का रस डालकर पिलाने या तुलसी का रस देने से शीघ्र लाभ होता है।
३. पेट पर थोड़ी धीमी—धीमी थपकी लगाने से छोटी आँत की क्षमता बढ़ती है। वायु पास हो जाती है।
यह रोग विटामिन सी और विटामिन बी की कमी से होता है। अत: खट्ठे फलों का जूस नियमित देना चाहिए।
१. हरी गिलोय (
गुरुचि )के रस में बालक  का कुर्ता रंगकर सुखा लें यही पहनाए रखें शीघ्र लाभ होगा।
२. खूबकला— ३०  ग्राम  बकरी  के  दूध मे औंटाकर छाया में सुखाये दूध फैक दें इस प्रकार ३ बार दूध में औटाए दूध फैकते जाएँ सुखाकर चूर्ण बना लें फिर २—४ ग्राम की खुराक गाय के दूध से पिलाएँ।
३. भैंस का ताजा गोबर प्रात: बच्चे की कमर और जाँघों पर ५ मिनट तक अच्छी तरह मलें। फिर हल्के गर्म -जल से धोए, धोने पर कमर पर काले काले रंग के छोटे—छोटे काँटे दिखाई देंगे इन काँटों को जल्दी—जल्दी चुन लें। कुछ दिन में बच्चा स्वस्थ हो जाएगा।



23.12.17

गोमूत्र और हल्दी से केन्सर का इलाज //Cure of cancer with cow urine and turmeric



   कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं (सेल्स) असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और एक ही स्थान पर इकट्ठी होती रहती हैं। दरअसल हमारे शरीर की एक प्राकर्तिक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर की पुरानी कोशिकाएं एक निश्चित समय के बाद खुद-ब-खुद खत्म होती रहती हैं और उनकी जगह नयी कोशिकाएँ बनती रहती हैं। यदि किसी व्यक्ति को शरीर के किसी हिस्से में, कैंसर हो जाता है, तो उस जगह नयी कोशिकाएं तो बनती ही हैं, साथ ही पुरानी कोशिकाएं मरती नहीं और वह वहीँ इकट्ठी होती रहती हैं। यह कोशिकाएं इकट्ठी होकर वहीँ फैलती रहती है|
हालाँकि सभी कोशिकाएं कैंसर सेल्स नहीं होती। कुछ सेल्स महज ट्यूमर के रूप में इकट्ठी हो जाती है। लेकिन वह कोशिकाएं, जो आस-पास फैलती रहें और वहां के ऊत्तकों और अन्य स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगें, वह कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाएं कहलाती हैं। मेडिकल में कैंसर का उपचार उन कोशिकाओं को केमिकल्स के द्वारा खत्म कर के किया जाता है। लेकिन साथ ही मेडिकल ट्रीटमेंट से जुड़ी एक और सच्चाई यह भी है कि इस ट्रीटमेंट के दौरान, जिन दवाओं (केमिकल्स) का प्रयोग किया जाता है, उनसे भले ही कैंसर की कोशिकाएं खत्म हो जाती हों, लेकिन शरीर की अन्य कोशिकाओं पर भी उनका बुरा असर पड़ता है। कहने का मतलब यह है कि कैंसर के लिए दिया जाने वाला ट्रीटमेंट भी शरीर को बहुत नुक्सान पहुँचाता है।
   वहीं दूसरी और आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञानियों का यह कहना है कि कैंसर का उपचार बिना कीमोथेरेपी और रेडियो थेरेपी के बिना भी किया जा सकता है। कुछ आयुर्वेदिक अस्पताल और विशेषज्ञ यह दावा भी करते हैं कई कैंसर के उपचार के लिए, यानी यदि इसे जड़ से खत्म करने के लिए कोई दवाई उपलब्ध है, तो वह है गोमूत्र और हल्दी। सिर्फ इन दोनों में कैंसर की कोशिकाओं को खत्म वाले तत्व मौजूद हैं। हल्दी और गोमूत्र में एक प्राकृतिक  केमिकल करक्यूमिन पाया जाता है और यही करक्यूमिन केमिकल कैंसर की कोशिकाओं को खत्म कर सकता है।
      हल्दी कैंसर ठीक करने की ताकत रखती है ! कैसे ताकत रखती है वो जान लीजिये हल्दी में एक केमिकल है उसका नाम है कर्कुमिन (Carcumin) और ये ही कैंसर cells को मार सकता है बाकि कोई केमिकल बना नही दुनिया में और ये भी आदमी ने नही भगवान ने बनाया है ।
   हल्दी जैसा ही कर्कुमिन और एक चीज में है वो है देशी गाय के मूत्र में । गोमूत्र माने देशी गाय के शारीर से निकला हुआ सीधा-सीधा मूत्र जिसे सूती के आठ परत की कपड़ो से छान कर लिया गया हो । तो देशी गाय का मूत्र अगर आपको मिल जाये और हल्दी आपके पास हो तो आप कैंसर का इलाज आसानी से कर पायेंगे ।
     अब देशी गाय का मूत्र आधा कप और आधा चम्मच हल्दी दोनों मिलाकर  गरम करना जिससे उबाल आ जाये फिर उसको ठंडा कर लेना । Room Temperature में आने के बाद रोगी को चाय की तरह पिलाना है |चुस्किया ले ले के सिप सिप कर  । एक और आयुर्वेदिक दवा है पुनर्नवा जिसको अगर आधा चम्मच इसमें मिलायेंगे तो और अच्छा result आयेगा । ये आयुर्वेद के दुकान में पाउडर या छोटे छोटे पीसेस में मिलती है ।
   याद रखें इस दवा में सिर्फ देशी गाय का मूत्र ही काम में आता है विदेशी जर्सी का मूत्र कुछ काम नही आता । और जो देशी गाय काले रंग की हो उसका मूत्र सबसे अच्छा परिणाम देता है इन सब में । इस दवा को (देशी गाय की मूत्र, हल्दी, पुनर्नवा ) सही अनुपात में मिलाके उबालकर ठंडा करके कांच की पात्र में स्टोर करके रखिये पर बोतल को कभी फ्रिज में मत रखिये, धुप में मत रखिये । ये दवा कैंसर के सेकंड स्टेज में और कभी कभी थर्ड स्टेज में भी बहुत अच्छे परिणाम देती है
      जब स्टेज थर्ड क्रोस करके फोर्थ में पहुँच गया हो तब रिजल्ट में प्रॉब्लम आती है । और अगर अपने किसी रोगी को Chemotherapy बैगेरा दे दिया तो फिर इसका कोई असर नही आता ! कितना भी पिलादो कोई रिजल्ट नही आता, रोगी मरता ही है । आप अगर किसी रोगी को ये दवा दे रहे है तो उसे पूछ लीजिये जान लीजिये कहीं Chemotherapy शुरू तो नही हो गयी ? अगर शुरू हो गयी है तो आप उसमे हाथ मत डालिए, जैसा डॉक्टर करता है करने दीजिये, आप भगवान से प्रार्थना कीजिये उसके लिए इतना ही करे ।
     


और अगर Chemotherapy स्टार्ट नही हुई है और उसने कोई  एलोपैथी  treatment शुरू नही किया तो आप देखेंगे इसके Miraculous (चमत्कारिक रिजल्ट आते है । ये सारी दवाई काम करती है बॉडी के resistance पर, हमारी जो vitality है उसको improve करता है, हल्दी को छोड़ कर गोमूत्र और पुनर्नवा शारीर के vitality को improve करती है और vitality improve होने के बाद कैंसर cells को control करते है ।
     तो कैंसर के लिए आप अपने जीवन में इस तरह से काम कर सकते है; इसके इलावा भी बहुत सारी मेडिसिन्स है जो थोड़ी complicated है वो कोई बहुत अच्छा डॉक्टर या वैद्य उसको हंडल करे तभी होगा आपसे अपने घर में नही होगा । इसमें एक सावधानी रखनी है के गाय के मूत्र लेते समय वो गर्भवती नही होनी चाहिए। गाय की जो बछड़ी है जो माँ नही बनी है उसका मूत्र आप कभी भी use कर सकते है।
ये तो बात हुई कैंसर के चिकित्सा की, पर जिन्दगी में कैंसर हो ही न ये और भी अच्छा है जानना । तो जिन्दगी में आपको कभी कैंसर न हो उसके लिए एक चीज याद रखिये के, हमेशा जो खाना खाए उसमे डालडा घी (refine oil ) तो नही है ? उसमे refined oil तो नही है ? हमेशा शुद्ध तेल खाये अर्थात सरसों ,नारियल ,मूँगफली का तेल खाने मे प्रयोग करें ! और घी अगर खाना है तो देशी गाय का घी खाएं ! गाय का देश घी नहीं !
ये देख लीजिये, दूसरा जो भी खाना खा रहे है उसमे रेशेदार हिस्सा जादा होना चाहिए जैसे छिल्केवाली डाले, छिल्केवाली सब्जिया खा रहे है , चावल भी छिल्केवाली खा रहे है तो बिलकुल निश्चिन्त रहिये कैंसर होने का कोई चान्स नही है ।
और कैंसर के सबसे बड़े कारणों में से दो तीन कारण है, एक तो कारण है तम्बाकू, दूसरा है बीड़ी और सिगरेट और गुटका ये चार चीजो को तो कभी भी हाथ मत लगाइए क्योंकि कैंसर के maximum cases इन्ही के कारन है पुरे देश में ।
कैंसर के बारे में सारी दुनिया एक ही बात कहती है चाहे वो डॉक्टर हो, experts हो, Scientist हो के इससे बचाव ही इसका उपाय है ।
महिलाओं को आजकल बहुत कैंसर है uterus में गर्भाशय में, स्तनों में और ये काफी तेजी से बड़ रहा है .. Tumour होता है फिर कैंसर में convert हो जाता है । तो माताओं को बहनों को क्या करना चाहिए जिससे जिन्दगी में कभी Tumour न आये ? आपके लिए सबसे अच्छा prevention है की जैसे ही आपको आपके शारीर के किसी भी हिस्से में unwanted growth (रसोली, गांठ) का पता चले तो जल्द ही आप सावधान हो जाइये । हलाकि सभी गांठ और सभी रसोली कैंसर नही होती है 2-3% ही कैंसर में convert होती है
   लेकिन आपको सावधान होना तो पड़ेगा । माताओं को अगर कहीं भी गांठ या रसोली हो गयी जो non-cancerous है तो जल्दी से जल्दी इसे गलाना और घोल देने का दुनिया में सबसे अछि दावा है " चुना " । चुना ;जो पान में खाया जाता है, जो पोताई में इस्तेमाल होता है ; पानवाले की दुकान से चुना ले आइये उस चुने को कनक के दाने के बराबर रोज खाइये; इसको खाने का तरीका है पानी में घोल के पानी पी लीजिये, दही में घोल के दही पी लीजिये, लस्सी में घोल के लस्सी पी लीजिये, डाल में मिलाके दाल खा लीजिये, सब्जी में डाल के सब्जी खा लीजिये । पर ध्यान रहे पथरी के रोगी के लिए चुना बर्जित है ।
 






कमर दर्द जड़ से खत्म करने के उपचार // Waist Pain Remedies


     

कमर का दर्द अब एक सामान्य सी बीमारी बन गई है। पहले जहाँ कमर दर्द बुज़ुर्गो को ही हुआ करता था अब हर छोटे-बड़े इससे परेशान है।
हांलाकि कमर दर्द होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते है। खास कर हमारी जीवनशैली की कुछ ख़राब आदते। जैसे की देर तक बिना आराम किये काम करते रहना या बैठने-उठने में बिना वजह उतावलापन तथा गलत तरीका।
कमर दर्द को जड़ से मिटाने के कई असरकारक और बेजोड़ घरेलु नुस्खें आयुर्वेद में दिए गए है। 
लेकिन इससे पहले कमर दर्द के बारे में कुछ सामान्य जानकारी जानते है। अगर आप खुद कमर दर्द से पीड़ित नहीं है तो यकीनन आपके लिए यह जानकारी उपयोगी होगी।
क्या न करें : 
कमर दर्द का सीधा संबंध वायु से है. मतलब अगर शरीर में वायु प्रकोप होगा तो कमर दर्द के साथ-साथ जोड़ों के अन्य दर्द भी होने की संभावना है. इससे बचाव के लिए आपको वैसे खुराक से दुरी रखनी चाहिए जिससे पेट भारी रहे या कब्ज की शिकायत रहे. सामान्य कुदरती प्रक्रियाएं जैसे छींक, मलत्याग, मूत्रत्याग को रोकने का प्रयत्न न करें. चिंता, भय, और गुस्सा करने से बचने की कोशिश करें. शरीर को पर्याप्त आराम दें. रात को बिना-वजह जागने की आदत न बनाएं.



क्या खाएं ? 
: जैसा की आपने पढ़ा कमर दर्द का सीधा संबंध वायु से है. इसलिए कमर दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चाहिए की वो भारी खुराक के बजाय हल्का, सुपाच्य ताजा खुराक खाएं. खुराक में लहसुन, हींग, मेथी, अजवाइन, ताजा हरी-हरी प्राकृतिक सब्जियों का प्रयोग करें.
क्या न खाएं ? : 
    कमर दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चने, लोबिया के बीज, जौ, मटर, भिन्डी, बैंगन, ग्वार के बीज, इमली, दहीं, छाछ जैसे पदार्थ लेने से परहेज करना चाहिए. साथ ही अधिक तेल से तले हुए खाने और मसालेदार खाना खाने से भी बचना चाहिए.
अगर आप कमर-दर्द से पीड़ित नही है तो ऊपर दी गई जानकारी से आपको इस दर्द से दुरी रखने में सहायक होगी. परंतु आप कमर-दर्द से पीड़ित है तो इसके लिए क्या इलाज और घरेलु नुस्खें है आइए अब वो जानते है.
1.मेथी को थोड़े से घी में सेंक कर पीस लें. फिर उसमे गुळ, और घी मिलाकर छोटे छोटे लड्डू बना लें. 8-10 दिनों तक इसका लगातार सेवन करने से कमर दर्द और गठिया जड़ से मिटता है. 
2.कच्चे आलू को बिना छिले टुकड़े कर तुरंत उसका रस निकाल लें. इस रस को पिने से गठिया (Arthritis) के रोग में बड़ा फायदा मिलता है. 


3. सौंठ का काढा बनाकर पिने से जोड़ों के अक्सर दर्द में राहत मिलती है.

4.सौंठ, लहसुन, अजवाइन और सरसों के कुछ दानो (Mustard) को तेल में गरम कर लीजिए. ठंडा होने पर उस मिश्रण से मालिश करने से कमर के दर्द में आराम मिलता है.
5. सौंठ के चूर्ण या पावडर का पानी के साथ सेवन करने से कमर का दर्द मिटता है.
6.सौंठ पावडर और हींग को तेल में गरम कर ठंडा होने पर मालिश करने से भी कमर दर्द में राहत मिलती है.
7.सरसों के तेल के साथ प्याज के रस को मिलाकर मालिश करने से कमर दर्द और गठिया मिटता है.
8.अदरक के रस में चुटकी भर सामान्य नमक (Salt) डाल दें. फिर उससे दर्द वाले हिस्से पर मालिश करें फायदा मिलेगा. 



9.अजवाइन और गुळ बराबर मात्रा में सुबह-शाम लेने से कमर का दर्द नहीं रहता. 

10.ताजा खजूर की पांच पेशियाँ लें और पानी में उसका काढा बनाएं. फिर उसमे दो चम्मच मेथी डालकर वो पेय पिएँ. इससे कमर दर्द में राहत मिलती है. 
11.जायफल को सरसों के तेल में भिगोकर कमर के दर्द वाले हिस्से पर हलके हाथों से मालिश करें. इससे कमर का दर्द तो दूर होगा पर अगर गठिया भी हुआ तो वह भी मिट जाएगा. 
12.लौंग का तेल घिसने से गठिया का रोग मिटता है.
13.चुटकीभर मेथी रोज खाने की आदत वायु के अधिकतर रोगों को दूर रखती है. और कमर दर्द तथा जोड़ों के दर्द का मुख्य कारण वायु ही होता है.