20200712

संधि बुखार (रुमैटिक फीवर) के आयुर्वेदिक उपचार



रुमैटिक फीवर (आमवातिक ज्वर)के लिए स्ट्रेप्टोकोकस नामक बैक्टीरिया को जि़म्मेदार माना जाता है। शुरुआती दौर में इसकी वजह से होने वाले संक्रमण को स्कारलेट फीवर कहा जाता है। जब सही समय पर इसका उपचार नहीं किया जाता तो रुमैटिक फीवर होने की आशंका बढ़ जाती है। इसकी वजह से शरीर का इम्यून सिस्टम असंतुलित हो जाता है और वह अपने स्वस्थ टिश्यूज़ को नष्ट करने लगता है। स्कूली बच्चों मेंरुमैटिक फीवर होने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि उनका इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता लेकिन बाहरी वातावरण से उनका संपर्क बहुत ज्य़ादा होता है। ऐसे में बैक्टीरिया उनके कमज़ोर शरीर पर हमला कर देता है और बच्चों का इम्यून सिस्टम उससे लडऩे में सक्षम नहीं होता। आनुवंशिक कारणों की वजह से बच्चों को यह समस्या हो सकती है। अगर घर में सफाई का ध्यान न रखा जाए, तब भी बच्चों को यह फीवर हो सकता है।

मुख लक्षण

गले में खराश, जोड़ों में दर्द, सूजन, छाती और पेट में दर्द, नॉजि़या, वोमिटिंग, सांस फूलना, ध्यान केंद्रित न कर पाना, त्वचा पर लाल रैशेज़, शारीरिक गतिविधियों में असंतुलन, हाथ-पैरों में कंपन और कंधे में झटके लगना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं।
बुखार के साथ नाक से पानी गिरने की स्थिति में उसके साथ नुकसानदेह बैक्टीरिया भी शरीर से बाहर निकल जाते हैं, जिससे व्यक्ति शीघ्र स्वस्थ हो जाता है। इसलिए अगर बुखार के साथ बच्चे को रनिंग नोज़ की समस्या न हो तो ऐसी स्थिति ज्य़ादा चिंताजनक मानी जाती है।

सेहत पर असर

रुमैटिक फीवर के कारण कई बार हार्ट के मसल्स और वॉल्व डैमेज हो जाते हैं, जिसे रुमैटिक हार्ट डिज़ीज़ कहा जाता है। दिल के वॉल्व वन-वे डोर के रूप में कार्य करते हैं। इसी वजह से हृदय द्वारा पंप किए जाने वाले रक्त का प्रवाह एक ही दिशा में होता है। वॉल्व के क्षतिग्रस्त होने पर इनसे ब्लड लीक हो सकता है। यह ज़रूरी नहीं है कि ऐसे बुखार के कारण हृदय को हमेशा नुकसान पहुंचे लेकिन उपचार में देर होने पर हार्ट के डैमेज होने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में हार्ट के आसपास पानी जमा होने लगता है। इससे उसके हार्ट के वॉल्व बहुत ढीले या टाइट हो जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में वह सही ढंग से काम नहीं कर पाता। कुछ मामलों में रुमैटिक फीवर के लक्षण महीनों तक दिखाई देते हैं, जिससे बच्चों में रुमैटिक हार्ट डिज़ीज़ की आशंका बढ़ जाती है और उसके साथ ही स्वास्थ्य संबंधी कुछ और भी जटिलताएं हो सकती हैं, जो इस प्रकार हैं :

वॉल्व स्टेनोसिस : वॉल्व का संकरा होना

वॉल्व रिगर्गिटेशन (valveregurgitation) : 

इस स्थिति में वॉल्व से लीकेज होता है, जिस कारण रक्त का गलत दिशा में प्रवाह होने लगता है।

हार्ट मसल्स में डैमेज : 

सूजन के कारण हृदय की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे वह ब्लड को सही ढंग से पंप नहीं कर पाता।

उपचार एवं बचाव

- अगर बच्चे के गले में संक्रमण या दो-तीन दिनों तक 101 डिग्री से ज्य़ादा बुखार हो तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।
- अगर घर में किसी एक बच्चे को ऐसा संक्रमण है तो उसे दूसरे बच्चों से दूर रखें, अन्यथा उसे भी ऐसी समस्या हो सकती है।
- आमतौर पर कुछ सप्ताह से लेकर महीने भर में यह समस्या दूर हो जाती है लेकिन यह ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि इसकी वजह से बच्चे के हार्ट को कोई नुकसान न पहुंचे क्योंकि उसकी क्षतिपूर्ति असंभव है।
- इसके उपचार के लिए डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाएं देते हैं पर अपने मन से बच्चे को ऐसी दवा देने की कोशिश न करें।
- अगर स्थिति ज्य़ादा गंभीर हो तो डॉक्टर स्टेरॉयड देने की भी सलाह देते हैं।
- बच्चे के लिए एक टेंपरेचर चार्ट बनाएं। हर दो घंटे के बाद थर्मामीटर से उसके शरीर का तापमान जांच कर उसे चार्ट में दर्ज करें।
- उपचार को बीच में अधूरा न छोड़ें। बच्चे को सभी दवाएं निश्चित समय पर दें। अगर स्थिति गंभीर हो तो बच्चे को महीनों तक दवाएं देने की ज़रूरत होती है।

Rheumatic fever में उपयोग की जाने वाली medicines

Antibiotic medication — Penicilline
Erythromycin — ये उन मरीजों को दी जाती है ,जिन मरीजों को penicilline से allergy हो
Antiinflammatory medicines — Aspirin ( inflammation को control करने के लिए )
Diazepam — यह medicine chorea को treat करने के लिए उपयोग की जाती है ।
Anti pyretic medication — Paracetamol , fever के उपचार के लिए

Rheumatic fever के मरीज के लिए diet

हमें ऐसे मरीजों को Nutritious diet ( पोषण डाइट )देनी चाहिए ।
ऐसे मरीजों को spicy diet ( मिर्च मसाले ) वाला खाना नही खाना चाहिए।
ऐसे मरीजों को दलिया या soft food खाने के लिए देना चाहिए , क्योंकि इसे उन्हें निगलने में problem नही होगी ।
ऐसे मरीजों को Fruit के juice पिलाने चाहिए

उपचार या management

ऐसे मरीज को जितना हो सके आराम करना चाहिए
Regular अपने vitals ( blood pressure , temprature , ) चेक कराने चाहिए
Infected joinds ( जिसमे pain हो रहा हो ) उसे ज्यादा न चलाये या movement न करें
गर्म सिकाई swelling और pain को सही करती है इसलिए इसका उपयोग करना चाहिए ।
डॉक्टर से परामर्श लेकर ही दवाइयों का उपयोग करना चाहिए
समय समय पर डॉक्टर से परामर्श लेते रहें
ऐसे patients को emotional support की आवश्यकता होती है ,इसलिए उन्हें tension या stress नही लेना चाहिए
पैरो या affected joints को हल्के हाथों से मालिश करें
ऐसे मरीजों के आस पास और उनकी खुद की साफ सफाई का ध्यान रखना चाहिए
जब तक doctor बताये तब तक regular treatment जारी रखें
धुले हुए और साफ कपड़ो का उपयोग करें।

20200709

टीबी,तपेदिक,क्षय रोग के आयुर्वेदिक नुस्खे



टीबी का घरेलू उपचार : 

टीबी एक ऐसी बीमारी है जो मायकोइक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के कारण फैलती है। यह ज्यादातर फेफ़डों में होती है और इससे रोगी को खांसी, कफ और बुखार हो जाता है। यह एक तरह का छूत का रोग है जिसका अगर शुरूआत में ही इलाज न किया गया तो यह रोगी के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। वैसे तो टीबी कोई आनुवांशिक रोग नहीं है और यह किसी को भी हो सकती है लेकिन जब परिवार में किसी एक सदस्य को टीबी हो जाए तो बाकि लोगों को काफी परहेज रखना पड़ता है क्योंकि रोगी के खांसने और छिकनें से जीवाणु फैल जाते हैं जिससे दूसरे सदस्य को भी यह समस्या हो सकती है। इस बीमारी का इलाज काफी धीमा है। रोगी को ठीक होने में काफी समय लग जाता है। ऐसे में डॉक्टरों की दवाओं के साथ टी बी का घरेलू इलाज भी कर सकते हैं जिससे टीबी के रोगी को फायदा होगा। आइए जानिए इसके कारण, लक्षण और घरेलू नुस्खों के बारे में


टीबी के कारण

अधिक धूम्रपान
शराब का सेवन
साफ-सफाई न रखना
प्रदूषित हवा में सांस लेना
टीबी के लक्षण
भूख न लगना
वजन कम हो जाना
बुखार
लगातार खांसी आना और इसके साथ बलगम व खून निकलना
गर्दन की ग्रंथियों में सूजन या फोड़ा होना
सीने में दर्द
सांस तेज होना
थकान, कमजोरी

टीबी के घरेलू उपाय

1. लहसुन


इसमें काफी मात्रा में सल्फयूरिक एसिड पाया जाता है जो टीबी के कीटाणुओं को खत्म करने में मदद करता है। इसके लिए आधा चम्मच लहसुन, 1 कप दूध और 4 कप पानी को एक साथ उबालें। जब यह मिश्रण 1 चौथाई रह जाए तो इसे दिन में 3 बार पीने से टीबी रोग में फायदा होता है। इसके अलावा गर्म दूध में लहसुन मिलाकर भी पीया जा सकता है। इसके लिए दूध में लहसुन की कलियां उबालें और फिर इसका सेवन करें।


2. केला

इसके लिए 1 पके हुए केले को मसलकर नारियल पानी में मिलाएं और इसके बाद इसमें शहद और दही मिलाएं। इसे दिन में दो बार खाने से रोगी को फायदा होता है। इसके अलावा कच्चे केले का जूस बनाकर भी रोजाना पी सकते हैं।

3. आंवला

कच्चे आंवले को पीसकर इसका जूस बना लें और इसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर रोजाना सुबह पीने से फायदा होता है। 

4. संतरा

इसके लिए ताजा संतरे के जूस में नमक और शहद मिलाकर रोजाना सुबह-शाम पीएं। इसके अलावा संतरा खाने से भी टी बी के रोगी को फायदा होता है।

5. काली मिर्च

फेफड़ों में जमा कफ और खांसी को दूर करने में काली मिर्च काफी फायदेमंद होती है। इसके लिए थोड़े से मक्खन में 8-10 काली मिर्च फ्राई करें और इसमें 1 चुटकी हींग मिलाकर पीस लें। इस मिश्रण को तीन बराबर भागों में बांटकर दिन में 7-8 बार लें।

6. अखरोट

इसको पीस कर पाउडर बना लें और इसमें कुछ पीसी हुए लहसुन की कलियां मिलाएं। अब इसमें घर में बना हुआ ताजा मक्खन मिलाकर खाएं। 

20200702

शिवलिंगी के बीज के औषधीय उपयोग



    शिवलिंगी बीज एक आयुर्वेदिक औषधि हैं जिसका घटक सिर्फ एक बीज ही हैं और वो हैं ब्रयोनोप्सिस लेसिनियोसा का बीज जिसे समान्यतया शिवलिंगी कहा जाता हैं। शिवलिंगी बीज का प्रयोग पुरे देश में प्रजनन क्षमता बढ़ाने और स्त्रियों के रोग विकारो को दूर करने के लिए किया जाता हैं,इसका प्रयोग स्वस्थ बच्चे के जन्म के लिए भी किया जाता हैं। इसके अलावा शिवलिंगी बीज लिवर, श्वसन, पाचन तंत्र, गठिया, चयापचय विकारों और संक्रामक रोगों के लिए भी लाभदायक हैं,साथ में इसके सेवन से इम्युनिटी भी बढ़ती हैं। महिलायो में बाँझपन की समस्या मुख्यता हार्मोन्स के असन्तुलन की वजह से होती हैं पर शिवलिंगी बीज हार्मोन्स का संतुलन बनाये रखने में असरदार हैं,जिसकी वजह से महिलायो में बाँझपन की समस्या नही होती।
शिवलिंगी बीज के लाभ एवं उपयोग

  महिलाओं के यौन स्वास्थ्य में सुधार के लिए -


     शिवलिंगी बीज महिलाओं के रोगों की रोकथाम के लिए अत्यंत लाभदायक हैं जैसे महिलाओं की प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए इससे बेहतर और बिना दुष्प्रभावो के और कोई उत्पाद नही हैं इसके अलावा यह हार्मोन्स को संतुलित करता हैं जिससे महिलायो को मासिक धर्म अनियमितताओं से छुटकारा मिलता हैं।

गर्भधारण के लिए-

जैसा की पहले भी बताया गया हैं की यह औषधि हार्मोन्स को संतुलित करती हैं,जिसके परिणामस्वरूप महिलायो को सुरक्षित गर्भधारण करने में शिवलिंगी बीज मदद करती हैं और जो महिलाये बार बार हो रहे गर्भपात की समस्या से जूझ रही हो, उनके लिए भी यह लाभदायक हैं।

बाँझपन के लिए-

बाँझपन को दूर करने के लिए शिवलिंगी बीज एक उपयोगी औषधि हैं।
अन्य रोगों में भी लाभदायक
स्त्री रोगों के अलावा शिवलिंगी बीज इम्युनिटी बढ़ाने के लिए भी एक अच्छी औषधि हैं और गठिया, जोड़ो के दर्द, दमा और पाचन सम्बन्धी रोगों की रोकथाम करने में भी यह सहायक हैं।

औषधीय मात्रा निर्धारण एवं व्यवस्था-

शिवलिंगी बीजो को कूट कर पीस और छान लें, इसके बाद इसका पाउडर बना के रख लें। अच्छे परिणामो के लिए पुत्रजीवक बीजो के चूर्ण और शिवलिंगी पाउडर को मिक्स कर लें इसके बाद इस मिश्रण का एक चम्मच दिन में दो बार लें एक बार सुबह नाश्ते से एक घंटे पहले और शाम के भोजन के एक घंटे पहले और इसके सेवन से सम्बंधित सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह दिया जाता हैं की इस औषधि का सेवन गाय के दूध के साथ करना चाहिए और वो भी उस गाय के दूध के साथ जिसका बछड़ा हो।

20200628

लकवा की चमत्कारी आयुर्वेदिक औषधि वृहत वात चिंतामणि रस



पुरादेवऽसुरायुद्धेहताश्चशतशोसुराः।
हेन्यामान्यास्ततो देवाः शतशोऽथसहस्त्रशः।

जीवन मे चाहे धन, एश्वर्य, मान, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ हो, परंतु शरीर मे बीमारी है तो सब कुछ बेकार है ओर जीवन भी नीरस है। ऐसी ही एक बीमारी है पक्षाघात, जिससे पीड़ित व्यक्ति जीवनभर सारे परिवार पर बोझ बन जाता है। पक्षाघात पीड़ित व्यक्तियों के किए आज की ये पोस्ट एक नयी सुबह साबित होगी ये हमारा दावा है। पक्षाघात (लकवा) या अँग्रेजी मे पेरालाइसिस का एकदम प्रमाणिक ओर राम-बाण इलाज़।

पक्षाघात की पहचान :-

जैसे किसी का मुह टेढ़ा हो जाना, आँख का टेढ़ा हो जाना, हाथ या पैर का टेढ़ा हो जाना, या शरीर किसी एक साइड से बिलकुल काम करना बंद कर दे, ये सामान्यतया पक्षाघात की पहचान है।
अगर मेरा कोई भाई बहिन पक्षाघात से पीड़ित है तो कहीं जाने की जरूरत नहीं है। अगर शरीर का कोई अंग या शरीर दायीं तरफ से लकवाग्रस्त है तो उसके लिए व्रहतवातचिंतामणि रस ले ले। उसमे छोटी-छोटी गोली (बाजरे के दाने से थोड़ी सी बड़ी) मिलेंगी। उसमे से एक गोली सुबह ओर एक गोली साँय को शुद्ध शहद से लेवें। अगर कोई भाई बहिन बायीं तरफ से लकवाग्रस्त है उसको वीर-योगेन्द्र रस सुबह साँय एक एक गोली शहद के साथ लेनी है।
अब गोली को शहद से कैसे ले?
उसके लिए गोली को एक चम्मच मे रखकर दूसरे चम्मच से पीस ले, उसके बाद उसमे शहद मिलकर चाट लें। ये दवा निरंतर लेते रहना है, जब तक पीड़ित स्वस्थ न हो जाए। पीड़ित व्यक्ति को मिस्सी रोटी (चने का आटा) और शुद्ध घी (मक्खन नहीं) का प्रयोग प्रचुर मात्र मे करना है। शहद का प्रयोग भी ज्यादा से ज्यादा अच्छा रहेगा।*लाल मिर्च, गुड़-शक्कर, कोई भी अचार, दही, छाछ, कोई भी सिरका, उड़द की दाल पूर्णतया वर्जित है। 


*फल मे सिर्फ चीकू ओर पपीता ही लेना है, अन्य सभी फल वर्जित हैं।
* शरुआती दिनों मे किसी भी मालिश से परहेज रखें। तब तक कोई मालश न करें जब तक पीड़ित कम से कम 60% तक स्वस्थ न हो जाए।
   यह नुस्खा लाखों पीड़ित व्यक्तियों के लिए रामबाण की तरह अचूक असर रहा है। जो आज स्वस्थ जीवन जी रहे है। स्वास्थ्य वह मूल तत्व है जो जीवन की सारी खुशियों को जीवंत बनाता है और स्वास्थ्य के बिना वे सभी नष्ट और नीरस होती हैं। 

20200627

खांसी मे तुरंत राहत के आयुर्वेदिक नुस्खे


    मौसम बदलते ही, हर घर में सर्दी या जुकाम का होना एक आम बात हो जाती है। वातावरण में मौजूद वायरस, बदलते मौसम में काफी सक्रिय हो जाता है, जिसके कारण जुकाम या सांस की अन्य बीमारियां होती हैं. सामान्य ज़ुकाम के लिए कोई इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों का इलाज किया जा सकता है। यह, मनुष्यों में सबसे अधिक होने वाला संक्रामक रोग है। औसत वयस्क को प्रतिवर्ष दो से तीन बार ज़ुकाम होता है। औसत बच्चे को प्रतिवर्ष छह से लेकर बारह बार ज़ुकाम होता है। लेकिन शुरुआत में ही अगर कुछ घरेलू उपाय कर लिए जाएं तो इस पर आसानी से काबू पाया जा सकता है। तो आइये जानते है कुछ घरेलु और आसान उपाय। 


*अदरक -

अदरक को १ ग्लास पानीमे १/२ रहने तक उबाल ले और उसमे १ चम्मच शहद मिलाकर पिये। 
अदरक के छोटे छोटे टुकड़े करके  उसे दिनभर चूसते रहे आराम मिलेगा। 


*लहसुन -

१ कप पानी में ३-४ लहसुन की कलियों को उबाल ले और ठंडा होने पर इसमें १ चम्मच शहद मिलाकर ले। 


 प्याज -

१/२ चम्मच प्याज का रस और १/२ चम्मच शहद मिलाकर लेने से खांसी में आराम मिलता है।


*चाय -

चाय में १/२ चम्मच हल्दी , १/२ चम्मच काली मिर्च पाउडर , तुलसी की कुछ पत्तियाँ और अदरक मिलाकर पिने से काफी हदतक आराम मिलता है। 




* गाजर -


१ कप गाजर के ज्यूस में १ चम्मच शहद मिलाकर दिन में ३-४ बार ले। 


*बादाम -

४-५ बादाम को रात में पानी में भिगोंकर सुबह इसका पेस्ट बनाये और १ चम्मच बटर में मिलाकर रोज सुबह -शाम जब तक आपको आराम न हो तबतक लेते रहे। 


 तुलसी -


तुलसी के रस में अदरक का रस और शहद मिलाकर लेने से भी खांसी में राहत मिलती है। 


* काली मिर्च -

काली मिर्च कफ में बहुत  आराम देती है। इसे पीसकर १ चम्मच घी में १/४ मिलाकर लेने से बहुत जल्दी आराम मिलता है।
कुनकुने दूध में भी इसे मिलाकर पिने से खांसी में राहत मिलती है।

नस पर नस चढ़ना के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार


 नस पर नस चढ़ना (Muscle Note, Neuro Muscular Disease) एक आम समस्या बन चुकी हैं. क्या आप जानते है कि इस बीमारी के क्या नुक्सान हो सकते हैं. कई बार रात को सोते समय टांगों में एंठन की समस्या होती है. ये नस पर नस चढ़ने के कारण ही होता है. इस रोग में टांगों तथा पिंडलियों में हल्का दर्द महसूस होता है. इसमें पैरों में दर्द, जलन, पैर सुन्न होना, झनझनाहट तथा सुई चुभने जैसा महसूस होता है.
हमारे शरीर में जिन जिन जगहों पर रक्त प्रवाह हो रहा है. उसके साथ साथ बिजली भी प्रवाहित की जा रही है. इसे हम बायो इलेक्ट्रिसिटी कहते हैं. रक्त हमारी धमनियों तथा शिराओं (arteries and veins) में बहता है. जबकि करंट तंत्रिकाओं (nerves) में चलता रहता है. शरीर के जिस हिस्से में रक्त नहीं पहुंच पाता शरीर का वह हिस्सा सुन्न हो जाता है. तथा उन मांसपेशियों पर नियंत्रण (loss of muscle control) नहीं रहता है. उस स्थान पर हाथ रखने पर ठंडा लगता है.
    इसी प्रकार शरीर के जिस हिस्से में बायो इलेक्ट्रिसिटी (bio-electricity) नहीं पहुंच रही है. शरीर के उस हिस्से में दर्द पैदा हो जाता है. उस जगह हाथ रखने पर गर्म लगता है. यह दर्द कार्बोनिक एसिड (H2CO3 Carbonic Acid) के कारण होता है. जो बायो इलेक्ट्रिसिटी की कमी के कारण उस मांसपेशी में अपने आप उत्पन्न होता है. उस मसल में जितनी अधिक बायोइलेक्ट्रिसिटी की कमी होगी. उतना ज्यादा ही कार्बोनिक एसिड पैदा होता है. तथा उतना अधिक दर्द भी पैदा होता है. जब उस प्रभावित मांसपेशी में बायो इलेक्ट्रिसिटी जाने लगती है तो वहां से कार्बन घुलकर रक्त मे मिल जाता है. दर्द बंद हो जाता है. रक्त मे घुले इस कार्बोनिक एसिड को शरीर की रक्त शोधक प्रणाली पसीने और पेशाब से बाहर निकाल देती है.

    पहले लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए और मशीनी-करण के ना होने के कारण शारीरिक मेहनत ज्यादा करते थे! जैसे वाहनों के अभाव में मीलों पैदल चलना, पेड़ों पर चढ़ना, लकड़ियां काटना, उन्हें जलाने योग बनाने के लिए उनके टुकड़े करना (फाड़ना), खेतों में काम करते हुए फावड़ा, खुरपा, दरांती आदि का इस्तेमाल करना जिनसे उनके हाथो व पैरों के नेचुरल रिफ्लेक्स पॉइंट्स अपने आप दबते रहते थे और उनका उपचार स्वयं प्रकृति करती रहती थी! इसलिए वे सदा तंदरुस्त रहते थे! मैं शरीर को स्वस्थ रखने में प्रकृति की सहायता करता हूँ उसके खिलाफ नहीं इसलिए मेरे उपचार के कोई दुष्प्रभाव नहीं हैं!    नस पर नस चढ़ना  है तो एक बीमारी पर कब कहाँ कौन सी नस चढ़ जाये कोई नहीं कह सकता. हमारे शरीर में 650 के करीब मांसपेशियां हैं!. जिनमे से 200 में मस्कुलर स्पासम या मसल नोट का दर्द हो सकता हैं. मस्कुलर स्पाजम या मसल नोट के कारण होने वाले कुछ दर्द निचे बताये गये है.शरीर में कहीं भी, किसी भी मांसपेशी में दर्द हो तो उसका इलाज किसी भी थेरेपी में पेन किलर के अलावा और कुछ नही है! यह आप सब अच्छी तरह जानते हैं और आप यह भी जानते हैं कि पेन किलर कोई इलाज नहीं है! यह एक नशे की तरह है जितनी देर इसका असर रहता है उतनी देर ब्रेन को दर्द का एहसास नहीं होता! और आपको पेन किलर के दुष्प्रभाव (साइड एफेक्ट) के बारे मे भी अच्छी तरहं पता है! जिसे आप चाह कर भी नकार नहीं सकते हैं! इन सभी की मुख्य वजेह होती है गलत तरीके से बैठना – उठना, सोफे या बेड पर अर्ध लेटी अवस्था में ज्यादा देर तक रहना, उलटे सोना, दो – दो सिरहाने रख कर सोना, बेड पर बैठ कर ज्यादा देर तक लैपटॉप या मोबाइल का इस्तेमाल करना या ज्यादा सफर करना या जायदा टाइम तक खड़े रहना या जायदा देर तक एक ही अवस्था में बैठे रहना आदि!
    शरीर में किसी भी रोग के आने से पहले हमारी रोग प्रतिरोधी क्षमता कमजोर पड़ जाती है या मांसपेशियों पर नियंत्रण का नुक्सान और किसी बड़े रोग के आने से कम से कम दो – तीन साल पहले हमारी अंत: स्त्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) की कार्यप्रणाली सुस्त व् अव्यवस्थित हो जाती है! कुछ ग्रंथियां अपना काम कम करने लग जाती हैं और कुछ ग्रंथियां ज्यादा, जिसके कारण धीरे-धीरे शरीर में रोग पनपने लगते हैं!जिनका हमे या तो पता ही नहीं चलता या फिर हम उन्हें कमजोरी, काम का बोझ, उम्र का तकाजा (बुढ़ापा), खाने में विटामिन्स – प्रोटीन्स की कमी, थकान, व्यायाम की कमी आदि समझकर टाल देते हैं या फिर दवाइयां खाते रहते हैं! जिनसे ग्रंथियां (endocrine glands) कभी ठीक नहीं होती बल्कि उनकी (malfunctioning) अव्यवस्थित कार्यप्रणाली चलती रहती है जिस का नतीजा कम से कम दो-तीन साल या कभी – कभी इससे भी ज्यादा समय के बाद अचानक सामने आता है किसी बड़े रोग के रुप में, वह कोई भी हो सकता है! जैसे शुगर उच्च – रक्तचाप (high blood pressure) थायराइड , दिल की बीमारी, चर्म रोग, किडनी संबंधी रोग, नाड़ी तंत्र संबंधी रोग या कोई और हजारों हैं! लेकिन मेरे उपचार द्वारा सभी अंत: स्त्रावी ग्रंथियां व्यवस्थित (सुचारु) तरीके से काम करने लग जाती हैं! या ये कहे की मांसपेशियों पर नियंत्रण का नुक्सान ( loss of muscle control) कम हो जाता है और रोग प्रतिरोधी क्षमता इम्युनिटी मजबूत हो जाती है! तो किसी प्रकार के रोग शरीर में आने की कोई संभावना ही नहीं रहती, यही कारण है लगभग दो पीढ़ियां पहले आजकल पाए जाने वाले रोग नहीं होते थे! इसीलिए आजकल कुछ रोगों को (lifestyle diseases) रहन सहन के रोग माना जाता है!
     नस पर नस चढ़ना तो एक बीमारी पता है लेकिन कहाँ कहाँ की नस कब चढ़ जाये कोई नहीं कह सकता कुछ दर्द यहाँ लिख रहा हूँ जो इस तरह हैं मस्कुलर स्पाजम, मसल नोट के कारण होने वाली सभी दर्दें जैसे कमरदर्द, कंधे की दर्द, गर्दन और कंधे में दर्द, छाती में दर्द, कोहनी में दर्द, बाजू में दर्द, ऊँगली या अंगूठे में दर्द, पूरी टांग में दर्द, घुटने में दर्द, घुटने से नीचे दर्द, घुटने के पीछे दर्द, टांग के अगले हिस्से में दर्द, एडी में दर्द, पंजे में दर्द, नितंब (हिप) में दर्द, दोनो कंधो में दर्द, जबड़े में और कान के आस पास दर्द, आधे सिर में दर्द, पैर के अंगूठे में दर्द आदि सिर से पांव तक शरीर में बहुत सारे दर्द होते हैं ! हमारे शरीर में लगभग 650 मांसपेशियां होती हैं! जिनमे से 200 के करीब मुस्कुलर स्पासम या मसल नोट से प्रभावित होती हैं!

मुस्कुलर स्पासम (Muskulr Spasm) या मसल नोट (Muscle Note ) या नस पर नस चढ़ना :

    हमारे शरीर में जहां जहां पर भी रक्त जा रहा है! ठीक उसके बराबर वहां वहां पर बिजली भी जा रही है! जिसे बायो इलेक्ट्रिसिटी कहते हैं रक्त जो है वह धमनियों और शिराओं (arteries and veins) में चलता है! और करंट जो है वह तंत्रिकाओं (nerves) में चलता है! शरीर के किसी भी हिस्से में अगर रक्त नहीं पहुंच रहा हो तो वह हिस्सा सुन्न हो जाता है या मांसपेशियों पर नियंत्रण नहीं रहता (loss of muscle control) और उस स्थान पर हाथ लगाने पर ठंडा महसूस होता है और शरीर के जिस हिस्से में बायो इलेक्ट्रिसिटी (bio-electricity) नहीं पहुंच रही, वहां पर उस हिस्से में दर्द हो जाता है और वहां हाथ लगाने पर गर्म महसूस होता है! इस दर्द का साइंटिफिक कारण होता है कार्बोनिक एसिड (h2co3 carbonic acid) जो बायोइलेक्ट्रिसिटी की कमी के कारण उस मांसपेशी में प्रकृतिक तौर पर हो रही सव्चालित क्रिया से उत्पन्न होता है! उस प्रभावित मसल में जितनी ज्यादा बायोइलेक्ट्रिसिटी की कमी होती है, उतना अधिक कार्बोनिक एसिड उत्पन्न होता है और उतनी ही अधिक दर्द भी होती है! जैसे ही उस मांसपेशी में बायोइलेक्ट्रिसिटी जाने लगती है वहां से कार्बन घुलकर रक्त मे मिल जाता है, और दर्द ठीक हो जाता है! रक्त मे घुले कार्बोनिक एसिड को शरीर की रक्त शोधक प्रणाली पसीने और पेशाब के द्वारा बाहर निकाल देती है!

नस पर नस चढ़ना बीमारी होने के कारण -
1.पैर की धमनियोंकी अंदरूनी सतह में कोलेस्ट्रॉल जमा होने से, इनके संकरे होने (एथ्रीयो स्कोरोसिस) के कारण रक्त प्रवाह कम होने पर,
2.पैरों की स्नायुओं के मधुमेह ग्रस्त होने


3. अत्यधिक सिगरेट, तंबाकू, शराब का सेवन करने, पोष्क तत्वों की कमी, संक्रमण से।

4. अनियंत्रित मधुमेह (रक्त में शक्कर का स्तर)
5. शरीर में जल, रक्तमें सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम स्तर कम होने
6. पेशाब ज्यादा होने वाली डाययूरेटिक दवाओं जैसे लेसिक्स सेवन करने के कारण शरीर में जल, खनिज लवण की मात्रा कम होने
7. मधुमेह, अधिक शराब पीने से, किसी बिमारी के कारण कमजोरी, कम भोजन या पौष्टिक भोजन ना लेने से,  या नसों की कमजोरी।
8. कुछ हृदय रोगी के लिये दवायें जो कि ‘Beta-blockers’ कहलाती हैं, वो भी कई बार इसका कारण होती हैं।
9. कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा सेवन करने से.
10. अत्यधिक कठोर व्यायाम करने, खेलने, कठोर श्रम करने से.
11. एक ही स्थिति में लंबे समय तक पैर मोड़े रखने के कारण और पेशियों की थकान के कारण हो सकता है।
नस पर नस चढ़ना बीमारी होने के लक्षण -
1. आधुनिक जीवन शैली –
जिसमें व्यक्ति आराम परक जीवन जीना चाहता है, सभी काम मशीनों के द्वारा करता है, खाओ पीओ और मौज करो की इच्छा रखता है, इस प्रकार के जटिल रोगों को जन्म दे रही हैं।
2. गर्दन के आस-पास के हिस्सों में ताकत की कमी महसूस देना।
3. गर्दन को आगे-पीछे, दाॅंयी-बाॅंयी ओर घुमाने में दर्द होना।
4. शरीर के दाॅंये अथवा बाॅंये हिस्से में दर्द के वेग आना।
5. याददाश्त का कम होते चले जाना।
6. चलने का सन्तुलन बिगड़ना।
7. . हाथ-पैरों में कम्पन्न रहना। (शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन के लक्षण कारण और उपचार)
8. माॅंसपेशियों में ऐठन विशेषकर जाॅंघ (Thigh)व घुटनों के नीचे (Calf) में Muscle Cramp होना।
9. शरीर में लेटते हुए साॅंय-साॅंय अथवा धक-धक की आवाज रहना।
10. कोई भी कार्य करते हुए आत्मविश्वास का अभाव अथवा भय की उत्पत्ति होना। इनको (Psychoromatic Disease) भी कहा जाता है।
11. अनावश्यक हृदय की धड़कन बढ़ी हुई रहना।
12. हाथ पैरों में सुन्नपन्न (Numbness) होना, सोते समय यदि हाथ अथवा पैर सोने लगे, सोते हुए हाथ थोड़ा दबते ही सुन्न होने लगते हैं, कई बार एक हाथ सुन्न होता है, दूसरे हाथ से उसको उठाकर करवट बदलनी पड़ती है।
13. हाथों की पकड़ ढीली होना, अथवा पैरों से सीढ़ी चढ़ते हुए घुटने से नीचेके हिस्सों में खिचांव आना।
14. शरीर में सुईंया सी चुभती प्रतीत होना।
15. शरीर के कभी किसी भाग में कभी किसी भाग में जैसे आॅंख, जबड़े,कान आदि में कच्चापन अथवा Paralytic Symptoms उत्पन्न होना।
16. रात को सोते समय पैरों में नस पर नस चढ़ना अर्थात् अचानक कुछ मिनटों के लिए तेज दर्द से आहत होना।
17. शरीर गिरा गिरा सा रहना, मानसिक दृढ़ता का अभाव प्रतीत होना।
18. शरीर में पैरों के तलवों में जलन रहना या हाथ-पैर ठण्डे रहना।
19. सर्दी अथवा गर्मी का शरीर पर अधिक असर होना अर्थात सहन करने में कठिनाई प्रतीत होना।
20. एक बार यदि शरीर आराम की अवस्था में आ जाए तो कोई भी कार्य करने की इच्छा न होना अर्थात् उठने चलने में कष्ट प्रतीत होना।
21. कार्य करते समय सामान्य रहकर उत्तेजना (Anxiety)चिड़चिड़ापन (Irritation) अथवा निराशा (Depression) वाली स्थिति बने रहना।
22. रात्रि में बैचेनी बने रहना, छः-सात घण्टे की पर्याप्त निद्रा न ले पाना।
23. कार्य करते हुए शीघ्र ही थकान का अनुभव होना। पसीना अधिक आने की प्रवृत्ति होना।
24.. किसी भी अंग में फड़फड़ाहट होते रहना।
25. मानसिक कार्य करते ही दिमाग पर एक प्रकार का बोझ प्रतीत होना,मानसिक क्षमता का हृास होना।

Neuromuscular disease :

1. Neuralgia – इसमें व्यक्ति को शरीर के किसी भाग में तेज अथवा हलके दर्द का अनुभव होता है|जैसे जब चेहरे का तान्त्रिक तन्त्र (Facial Nervous) रुग्ण हो जाता है तो इस रोग को triglminal neuralgia कहते है| इसमें व्यक्ति के चेहरे में किसी एक और अथवा पुरे चेहरे जैसे जबड़े, बाल, आंखे के आस-पास एल प्रकार का खिंचाव महसूस होता है| कुछ मनोवैज्ञानिक को ने पाया कि यह रोग उनको अधिक होता है जो दुसरो की ख़ुशी से परेशान होते है| इस रोग का व्यक्ति यदि हसना भी चाहता है तो भी पीड़ा से कराह उड़ता है| अर्थात प्रकृति दुसरो की ख़ुशी छिनने वालो की ख़ुशी छिन  लेती  है| अंग्रेजी चिकित्सक इसको Nervous व muscular को relax करने वाली दवाएं जैसे Pregabalin,Migorill, Gabapentin इत्यादि देते है|
2. Nervousness- व्यक्ति अपने भीतर घबराहट, बैचेनी, बार-बार प्यास का अनुभव करता है| किसी interview को देने, अपरिचित व्यक्तियों से मिलने, भाषण देने आदि में थोडा ह्रदय की धड़कन बढती हा नींद ठीक प्रकार से नहीं आती व रक्तचाप असामन्य रहता है| इसके लिए व्यक्ति के ह्रदय व मस्तिष्क को बल देने वाले पोषक पदार्थ (nervine tonic) का सेवन करना चाहिए तथा अपने भीतर अद्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास करना चाहिए| सम भाव, समर्पण का विकास कर व्यक्तिगत अंह से बचना चाहिए| उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति मंच पर भाषण देता है तो यह भाव न लाए कि वह कितना अच्छा बोल सकता है अपितु इस भाव से प्रवचन करे कि भगवान उसके माध्यम से kids को क्या संदेश देना चाहते है? भविष्य के प्रति भय, महत्वाकांक्षा इत्यादि व्यक्ति में यह रोग पैदा करते है|
3. Alzheimer- इसमें व्यक्ति की यादगार (Memory)कम होती चली जाती है| न्यूरो मस्कुलर रोगों की चपेट में बहुत बड़े-बड़े व्यक्ति भी आए है| इस युग के जाने-माने भौतिक शास्त्र के वैज्ञानिक प्रो. स्टीफन हाकिन्स इसी से सम्बन्धित एक भयानक रोग से युवावस्था में ही पीड़ित हो गए व उनका सारा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था| परन्तु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी व कठोर संघर्ष के द्वारा अपनी शोधों (Researches) को जारी रखा आज भी वो 65 वर्ष की उम्र में अपनी जीवन रक्षा के साथ-साथ विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे है| उनकी उपलब्धियों के आधार पर उनको न्यूटन व आइंस्टाइन जैसे महान वैज्ञानिकों की श्रेणी में माना जाता है|
4. Parkinson(कम्पवात) – इसमें व्यक्ति के हाथ पैरों में कम्पन होता है| जब व्यक्ति आराम करता है तो हाथ पैर हिलाने लगता है| जब काम में लग जाता है तब ऐसी कठिनाई कम आती है| इसके L-dopa दिया जाता है| कृत्रिम विधि से तैयार किया हुआ यह chennal कम ही लोगो के शरीर स्वीकार करता है| आयुर्वैदिक जड़ी कोंच के बीजों (कपिकच्छु) में यह रसायन मिलता है| अंत: यह औषधि इस रोग में लाभकारी है| इसके लिए कोंच के बीजों को गर्म पानी में मंद आंच पर थोड़ी देर पकायें फिर छिलका उतार कर प्रति व्यक्ति 5 से 10 बीजों को दूध में खीर बना ले| साथ में दलिया अथवा अंकुरित गेंहू भी पकाया जा सकता है| खीर में थोडा गाय का घी अवश्य मिलाएं अन्यथा चूर्ण की अवस्था अथवा कोंच पाक भी लाभदायक है| यह समस्त तान्त्रिक तन्त्र व मासपेशियों के लिए बलदायक है|





नस पर नस चढ़ना के कुछ घरेलू उपचार -

१. ऎंठन वाली पेशियों की मालिश करें.२. पैरों में इलास्टिक पट्टी बांधे जिससे पैरों में खून जमा न हो पाए.३. मधुमेह या उच्च रक्तचाप (High BP) से ग्रसित हैं. तो परहेज, उपचार से नियंत्रण करें४. शराब, तंबाकू, सिगरेट, नशीले पदार्थो का सेवन न करें.
२. जिस पैर की नस चढ़ी है. उसी ओर के हाथ की बीच की ऊँगली के नाखून के नीचे के भाग को दबाए और छोड़ें. जब तक ठीक न हो जाए.
३. ये उपाय करें – लंबाई में शरीर को दो भागों में चिन्हित करें. अब जिस भाग में नस चढ़ी है.उस भाग के विपरीत भाग के कान के निचले जोड़ पर उंगली से दबाते हुए उंगली को हल्का सा ऊपर नीचे की तरफ करे. ऐसा 10 सेकेंड तक करते रहें. नस उतर जाएगी.
४. . पैरों के नीचे मोटा तकिया रखकर सोएं. आराम करें. पैरों को ऊंचाई पर रखें
५. प्रभावित जगह पर बर्फ की ठंडी सिकाई करे. दिन में 3-4 बार यह 15 मिनट करे४ आरामदायक तथा मुलायम जूते पहनें.अपना वजन कम करें. रोज सैर पर जाएं. इससे टांगों की नसें मजबूत होती हैं
.६. फाइबर युक्त भोजन करें जैसे चपाती, ब्राउन ब्रेड, सब्जियां व फल.
नस पर नस चढ़ना (Muscle Note) के रोगी के लिए भोजन-
भोजन में नीबू पानी, नारियल का पानी, फलों जैसे मौसमी, अनार, सेब, पपीता केला को शामिल करें. सब्जिओं में पालक, टमाटर, सलाद, फलियाँ, आलू, गाजर, चकुँदर का सेवन करें. हर रोज अखरोट, पिस्ता, बादाम, किशमिश खाएं.
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किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की   रामबाण   औषधि




20200626

सूर्य किरण से रोगों का इलाज



प्रकाश भी चिकित्सा की एक विधि है। सूर्य किरणों एवं अन्य अनुकूल रश्मियों के माध्यम से किया गया उपचार प्रकाश उपचार कहलाता है। इसे फोटोथेरेपी भी कहा जाता है। जो रोग प्राकृतिक जीवन के अभाव में कृत्रिमता के आँचल में पलते-बढ़ते हैं, ऐसे रोगों को ‘सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर ‘ कहते हैं। फोटोथेरेपी द्वारा इनकी सफल चिकित्सा की जाती हैं। यह चिकित्सा पद्धति व्यक्ति को सूर्य के प्रकाश अर्थात् प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने के लिए बल देती है। यही इसका मुख्य आधार है।
मेसाचुसेट्स के डॉ. एनी जेन के अनुसार जबसे मानव प्राकृतिक जीवन से विमुख होकर भौतिकता के कृत्रिम परिवेश में ढलने लगा है, तभी से उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आयी है। वह विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार होने लगा है क्योंकि आज का आधुनिक जीवन बहुमञ्जिली इमारतों, अल्ट्रा मॉडर्न दफ्तरों तथा वातानुकूलित कारों में सिमट कर रह गया है। आगे वह स्पष्ट करते हैं कि इसमें तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठ तो मिलती है परन्तु जीवन की सहजता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति प्रकृति से दूर चला जाता है, उससे कट जाता है। डॉ. जोसेफ ने इस कृत्रिम परिवेश को ‘सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर ‘ नामक रोग का मुख्य कारण माना है। लाइट थेरेपी इस रोग का सफल उपचार है। सूर्य विज्ञान के प्रणेता विशुद्धानन्द ने सूर्य को प्राणदाता कहा है। हमारा जीवन और पृथ्वी इसी के माध्यम से संचालित एवं नियंत्रित हो रहे हैं। सूर्य अपने प्रकाश के माध्यम से मानव शरीर का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से पोषण करता है। प्रकृति की यह अद्भुत व्यवस्था है, जो किसी अन्य माध्यम से पूर्ण नहीं हो पाती है। सूर्य प्रकाश में प्रकाश की इतनी ही मात्रा होती है जिसे शरीर ग्रहण कर सके। भरी दुपहरी में सूर्य के प्रकाश की तीव्रता 100,000 लक्स होती है। लक्स प्रकाश को मापने की एक इकाई है। जाड़े की दुपहरी में इसकी तीव्रता 10,000 लक्स प्रकाश होती है।

होलिस्टिक ऑन लाइन नामक वेबसाइट पर प्रकाशित ‘लाइट थेरेपी’ नामक एक लेख के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की उपयोगिता एवं उपादेयता अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। कृत्रिम प्रकाश में सारी विशेषताएँ नहीं होती हैं। इस शोध लेख के अनुसार घरों, दफ्तरों या अन्य किसी भी स्थान पर पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था करने में एक कठिनाई आ सकती है। क्योंकि जैसे-जैसे प्रकाश की तीव्रता बढ़ती है उसी अनुपात में अल्ट्रावायलेट किरणों के बढ़ने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। इन किरणों से आँखों में जलन, आँखों की अन्य बीमारी तथा त्वचा कैन्सर जैसे रोग पनपते हैं। अतः लाइट थेरेपी का मुख्य आधार भी सूर्य प्रकाश को माना जाता है। यही मुख्य एवं प्राकृतिक उपचार पद्धति है जो अत्यन्त प्राचीन एवं सफल है। हालाँकि कृत्रिम ब्राइट लाइट थैरेपी एवं अन्य प्रकाश थैरेपी का भी प्रयोग किया जाता है, परन्तु इनमें भी प्रकाश की तीव्रता 10,000 लक्स प्रकाश से आधिक नहीं होती।    जाड़े की सुबह के अलावा सूर्योदय होते ही हमें 10,000 लक्स प्रकाश मिलने लगता है। इतने ही प्रकाश को ब्राइट लाइट थेरेपी में प्रयोग किया जाता है जिससे तमाम तरह के रोगों को ठीक किया जा सके। अन्वेषणकर्त्ता जान बेस्ट के अनुसार व्यक्ति यदि प्रातःकाल उठकर सूर्य प्रकाश के संपर्क-सान्निध्य में आ सके तो उसे किसी प्रकार की लाइट थेरेपी की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। प्रातःकालीन सूर्य प्रकाश से वह इतनी ऊर्जा ग्रहण कर सकता है जितना कि उसे आवश्यकता है,और इस तरह शरीर की प्राकृतिक रूप से आवश्यकता की पूर्ति होती रहने से वह सदा निरोग एवं स्वस्थ रह सकता है।

एक दफ्तर को अच्छे से प्रकाशित करने के लिए 500 से 1000 लक्स प्रकाश की जरूरत पड़ती है। सामान्यतया घरों में 300 से 500 लक्स प्रकाश होता है। बेडरूम में 100 लक्स प्रकाश का होना ठीक माना जाता है। खिड़कियों के माध्यम से प्रकाश की व्यवस्था की जा सके तो घर के परिवेश को भी प्राकृतिक बनाया जा सकता है। इससे शरीर का जैविक चक्र (बॉडी क्लॉक) एवं मेलेटोनीन हार्मोन का नियंत्रण सामान्य एवं शरीर के अनुकूल बने रहता हैं। कृत्रिम प्रकाश से इसकी अनुकूलता समाप्त हो जाती है और शरीर में रोगों का आक्रमण होने लगता है। इसी कारण रात्रिकालीन ड्यूटी करने वाले धीमी रोशनी में रहने वाले व्यक्तियों में भय, थकान, उदासी, त्वचा सम्बन्धी रोग, अनिद्रा तथा प्रतिरोधी क्षमता में कमी आदि की समस्याएँ पायी जाती हैं। आर्कटिक क्षेत्र में प्रकाश का स्तर 50 लक्स होता है और वहाँ भी इसी तरह की परेशानी देखी गयी है।

सूर्य प्रकाश पर अन्वेषण-अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक एस. फैरो के अनुसार ‘सन लाइट थेरेपी’ (सूर्य प्रकाश उपचार) अत्यन्त प्रभावशाली है। सूर्य रश्मियों की महत्ता को रेखाँकित करते हुए फैरो ने उल्लेख किया है कि इसमें सभी प्रकार की किरणें होती हैं। इसमें इन्फ्रारेड से लेकर अल्ट्रावायलेट किरणें होती हैं तथा आँखों व शरीर के अनुकूल प्रभाव डालती हैं। सूर्य प्रकाश की इस विशेषता को फैरो ने अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कहा है। इसी कारण सूर्य प्रकाश को ‘फुल-स्पेक्ट्रम ओरीजनल लाइट’ कहा जाता है।
लाइट थेरेपी में प्रकाश को आँखों के माध्यम से पीनियल ग्लैण्ड्स तक पहुँचाया जाता है, उसे सक्रिय एवं जागृत कराया जाता है। उसी ग्रंथि को थर्ड आई (तीसरा नेत्र) कहा जाता है जिसमें दूर दृष्टि की क्षमता होती है। सिग्रेटो के अनुसार इसे सक्रिय करने के लिए सूर्योदय की सुनहरी किरणों का प्रयोग किया जाता है। डॉ. नेन्सी ने गौघृत के दीपक को भी इसके लिए उपर्युक्त माना है। ये विधियाँ अत्यन्त सफल एवं सुगम हैं। इसके अलावा नाइट लाइट थेरेपी, आप्टिमम् थेरेपी आदि को भी प्रयोग में लाया जाता है।

लाइट थेरेपी से कई प्रकार के रोगों की चिकित्सा की जाती है। यह सेड (सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर) के लिए रामबाण का कार्य करता है। इससे अनिद्रा रोग को भी ठीक होता है। इसके लिए दक्षिण आस्ट्रेलिया में 9 लोगों पर अध्ययन किया गया। इन लोगों को नींद न आने की शिकायत थी। सोने के एक-दो घण्टे के पश्चात् इन्हें नींद नहीं आती थी। इन सभी व्यक्तियों को 2500 लक्स प्रकाश से उपचार किया गया। परिणाम बड़ा ही सुखद रहा। इन्हें अच्छी नींद आने लगी।
स्वस्थ जीवन के लिए 4 से 6 घण्टे की गहरी नींद की आवश्यकता पड़ती है। शराब तथा नींद की गोली लेने वाले व्यक्ति प्रायः ‘डिलेड स्लीप फेस सिण्ड्रोम’ से पीड़ित होते हैं एवं प्रातःकाल में एक-डेढ़ घण्टे ही सो पाते हैं। आमतौर पर यह बीमारी किशोरावस्था में पायी जाती है।
जरथुस्त्र बादशाह गुश्तास्य के दरबार में पहुँचे। उन्हें ईश्वरनिष्ठ जीवन जीने का संदेश दिया। राजा ने कहा, मैं तो सामान्य ज्ञान रखता हूँ, यदि आप हमारे दरबार के विद्वानों का समाधान कर दें, तो मैं आपके निर्देश पूरी तरह मानूँगा।
नेशनल कमीशन ऑफ स्लीप डिसआर्डर रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार इस रोग से पीड़ित पुलिस, अग्नि शामक कर्मचारी, ड्राइवर तथा पायलट अक्सर दुर्घटना के शिकार होते हैं और दुर्घटना का समय भी प्रातःकाल होता है। इन रोगियों के लिए ‘सन लाइट थैरेपी’ अत्यन्त कारगर सिद्ध हुई है। ब्राइट लाइट थैरेपी से भी इन्हें आराम मिला है।
प्रो. हैस्लाक के अनुसार युवाओं का बॉडी क्लॉक जल्दी प्रभावित हो जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक इस प्रभाव से मुक्ति देने के लिए मेलेटेनीन का डोज दिया गया। इससे ऐसे रुग्ण युवाओं को नींद तो आयी पर उनकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा। ठीक इसी प्रकार का सर्वेक्षण बेटास्कीवीन, अल्वर्टा तथा कनाडा के कुछ मैनेजमेंट एवं प्रोफेशनल कॉलेजों में किया गया। यहाँ के विद्यार्थियों का फुल स्पेक्ट्रम लाइट से उपचार किया गया। इसमें इनका अनिद्रा रोग ठीक नहीं हुआ, बल्कि इनकी कार्य कुशलता तथा शैक्षणिक उपलब्धियों का स्तर भी बढ़ गया।
किशोरवय की लड़कियों में प्रायः खानपान सम्बन्धी गड़बड़ी पैदा हो जाती है। हालाँकि यह कोई गम्भीर समस्या नहीं है परन्तु यथासमय इसको नहीं सुधारा जाय तो बाद में गम्भीर शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। इसके लिए सूर्य प्रकाश के संपर्क में आने तथा इसके उपचार का सुझाव दिया जाता है। इसमें सफलता भी मिली है।

महिलाओं में लुपस नामक बीमारी होती है। यह एक प्रकार का आटोइम्यून रोग है,जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर एवं दुर्बल हो जाती है और शरीर में अनेक रोग घर कर जाते हैं। इस रोग का लक्षण है थकान, उतावलापन, जोड़ों में दर्द और किडनी की खराबी। ऐसे रोगियों को सूर्य प्रकाश से परहेज करने का दिशा-निर्देश दिया जाता है। परन्तु आधुनिक शोधकर्त्ताओं ने इसे अस्वीकार कर दिया है। इन्होंने सूर्य प्रकाश से ही VA-1 नामक विशिष्ट अल्ट्रावायलेट किरण को खोज निकाला है, जिससे इस रोग को ठीक करने में अभूतपूर्व सफलता मिली है। महिलाओं की मासिक चक्र सम्बन्धी समस्याओं के लिए लाइट थेरेपी कारगर सिद्ध हुई है।
अमेरिका में प्रति वर्ष 10 से 15 लाख लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं। और इनमें से 30,000 लोग आत्म हत्या कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर सूर्य प्रकाश चिकित्सा अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध हुई है।


अतः स्वस्थ, सुखी एवं निरोगी जीवन के लिए हमें सूर्य प्रकाश याने प्रकृति की ओर फिर लौटना होगा। जितना जल्दी हो सके हमें अपनी इस कृत्रिम जीवन को त्यागकर प्रकृति के सुरम्य आँचल में पनाह लेने के लिए तत्पर होना चाहिए। इसी में समाधान है, यही समझदारी है।
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किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की   रामबाण   औषधि