कोलेस्ट्रॉल कितना चाहिए ,कैसे करें कंट्रोल?



शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने पर स्‍ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, हाई कोलेस्‍ट्रॉल से खून का गाढ़ा होना, आर्टरी ब्लॉकेज और हार्ट डिजीज की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे में कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी है। आज हम आपको कुछ ऐसे घरेलू तरीके बताएंगे, जिससे कोलेस्ट्रॉल लेवल कंट्रोल में रहेगा। तो चलिए जानते हैं शरीर में कितनी होनी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा और कैसे करें इसे कंट्रोल?
शरीर में कितना होना चाहिए कोलेस्ट्रॉल लेवल?
शरीर में दो तरह के कोलेस्ट्रॉल होते हैं, गुड़ कोलेस्ट्रॉल (HDL) और बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL)। यह दोनों ही प्रकार के कोलेस्ट्रॉल हाई और लो डेनसिटी प्रोटीन से बनते हैं और इनकी निश्चित मात्रा ही शरीर के लिए अच्छी है। शरीर में नार्मल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा (200 mg/dL या इससे कम) होनी चाहिए। बॉर्डर लाइन कोलेस्ट्रॉल (200 से 239 mg/dL) के बीच और हाई कोलेस्ट्रॉल (240mg/dL) होना चाहिए।


कब बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल?

शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 20 साल की उम्र के बाद बढ़नी शुरू हो जाती है। 60-65 की उम्र तक महिलाओं और पुरुषों में इसकी मात्रा सामान रूप से बढ़ती है। मासिक धर्म शुरू होने से पहले महिलाओं में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम रहता है। मगर इसके बाद पुरूषों की तुलना में महिलाओं में कोलेस्ट्रॉल अधिक बढ़ता है इसलिए पुरूषों के मुकाबले महिलाओं में हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। इसके अलावा डायबिटीज, हाइपरटेंशन, किडनी डिजीज, लीवर डिजीज और हाइपर थाइरॉयडिज्म से पीड़ित लोगों में भी इसका स्तर अधिक पाया जाता है।
ऐसे करें कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल
1. हल्की
हल्दी बहुत अच्छी कुदरती एंटीऑक्सीडेंट हैं इसलिए इसका सेवन कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करता है। इसके अलावा इससे गठिया रोग की समस्या भी दूर रहती है। खाने में इस्तेमाल करने के साथ आप इसे दूध में मिलाकर भी पी सकते हैं।
2. ग्रीन टी
ग्रीन टी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल रखने का काम करती है। इसमें मौजूद तत्व शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल को 5-6 अंक तक कम करती हैं।
3. मेथी के दानें
मेथी के दानें सेहत के लिए बहुत लाभकारी होते है। मेथी के दानें कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स लेवल को कम करने में मदद करते हैं, जिससे आप दिल के साथ कई बीमारियों से बचे रहते हैं।


4. इसबगोल की पत्तियां

घुलनशील फाइबर होने के कारण इसबगोल की पत्तियों का सेवन भी कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करने में मदद करती हैै। कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने के साथ ही यह गुड़ कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता भी है।
5. साचा इनची (Sacha Inchi)
साचा इनची मूंगफली की तरह दिखने वाले बीच हैं। इसमें हाई प्रोटीन के साथ ओमेगा एसिड (3, 6, 9) भरपूर मात्रा में होता है, जिससे शरीर में कोलेस्ट्रॉल लेवल कंट्रोल में रहता है।
6. लहसुन
लहसुन में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जोकि शरीर के एलडीएल यानि खराब कोलेस्ट्रोल के स्तर को कम करते हैं। सुबह खाली पेट इसकी 1-2 कलियों का सेवन करें।
7. सिंहपर्णी की जड़
सिंहपर्णी की जड़ भी कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करके आपको लीवर और दिल की बीमारियों से बचाती है। आप चाहे तो इसकी चाय बनाकर भी पी सकते हैं।


एलर्जी के कारण ,लक्षण ,आयुर्वेदिक उपचार

                                


आमतौर पर जब कोई नाक, त्वचा, फेफड़ों एवं पेट का रोग पुराना हो जाता है। और उसका इलाज नहीं होता तो अकसर लोग उसे एलर्जी कह देते हैं। बहुत सारे ऐसे रोगी जीवा में उपचार के लिए आते हैं और यह बताते हैं कि उन्हें एलर्जी है, लेकिन क्या है यह एलर्जी इसका ज्ञान हमें अकसर नहीं होता। यदि रोग के बारे में ज्ञान नहीं है तो उसका उपचार कैसे होगा।

क्या है एलर्जी?

एलर्जी हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति की कुछ बाहरी तत्वों, जैसे पराग कण, धूल, भोजन इत्यादि के प्रति अस्वाभाविक प्रतिक्रिया का नाम है। पूरे विश्व में यह रोग तेजी से फैल रहा है। आजकल युवा अवस्था एवं बाल्यावस्था में भी एलर्जी रोग देखने में आता है। एलर्जी प्रतिक्रिया करने वाले तत्वों को एलरजेन कहा जाता है। ये एलरजेन या एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वास्तव में कोई हानिकारक कीटाणु या विषाणु नहीं बल्कि अहानिकर तत्व होते हैं, जैसे गेहूं, बादाम, दूध, पराग कण या वातावरण में मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व। यही कारण है कि सभी लोगों को ये हानि नहीं पहुंचाते। एक ही घर में, एक ही प्रकार के वातावरण से एक व्यक्ति को एलर्जी होती है तो दूसरे को नहीं। आखिर क्या कारण होता है एलर्जी का? क्यों किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति हानिकारक प्रतिक्रिया करती है?

एलर्जी के कारण

आयुर्वेद के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति में धातुओं और दोषों की साम्यावस्था होती है। इसी कारण उनकी रोग प्रतिरोध शक्ति किसी एलरजेन के सम्पर्क में आकर भी प्रतिक्रिया (एलर्जी पैदा नहीं करती) धातु और दोष जब साम्य रहते हैं तो हमारे शरीर की ओज शाक्ति उत्तम होती है। उत्तम ओज, यानि उत्तम रोग प्रतिरोधक शक्ति हमारे शरीर से नियमित रूप से हानिकारक तत्वों को निष्कासित करती है और उसमें किसी प्रकार की प्रतिक्रिया भी नहीं होती।


आयुर्वेद के अनुसार एलर्जी का मूल कारण है असामान्य पाचक अग्नि, कमजोर ओज शक्ति, और दोषों एवं धातुओं की विषमता। इसमें भी अधिक महत्व पाचक अग्नि का माना गया है। जब पाचक अग्नि भोजन का सही रूप से पाक नहीं कर पाती है तो भोजन अपक्व रहता है। इस अपक्व भोजन से एक चिकना विषैला पदार्थ पैदा होता है जिसे ‘आम’ कहते हैं। यह आम ही एलर्जी का मूल कारण होता है। यदि समय रहते इस आम का उपचार नहीं किया जाए तो यह आतों में जमा होने लगता है और पूरे शरीर में भ्रमण करता है। जहां कहीं इसको कमजोर स्थान मिलता है वहां जाकर जमा हो जाता है और पुराना होने पर आमविष कहलाता है। आमविष हमारी ओज शक्ति को दूषित कर देता है। इसके कारण, जब कभी उस स्थान या अवयव का सम्पर्क एलरजेन से होता है तो वहां एलर्जी प्रतिक्रिया होती है।

यदि आमविष त्वचा में है तो एलरजन के सम्पर्क में आने से वहां पर खुजली, जलन, आदि लक्षण होते है, यदि आमविष श्वसन संस्थान में है तो श्वास कष्ट, छीकें आना, नाक से पानी गिरना, खांसी इत्यादि और यदि पाचन संस्थान में है तो अतिसार, पेट दर्द, अर्जीण आदि लक्षण होते हैं।
स्किन एलर्जी के घरेलू उपचार

1. एलोवेरा
एलोवेरा जेल और कच्चे आम के पल्प को मिक्स करके त्वचा पर लगाएं। इस लेप को लगाने से स्किन एलर्जी की जलन, खुजली और सूजन से राहत मिलती है।

2. अधिक पानी पीना

स्किन एलर्जी होने पर अपने शरीर को अधिक से अधिक हाइड्रेट रखें। इसके लिए एक दिन में कम से कम 10 ग्लास पानी जरूर पीएं। अधिक पानी का सेवन आपको सनबर्न और फ्लू से बचाएगा।


3. कपूर और नारियल तेल

कपूर को पीसकर उसमें नारियल का तेल मिक्स करें। इसके बाद इसे खुजली वाली जगहें पर लगाएं। दिन में कम से कम 2 बार इस मिक्चर को लगाने से आपकी एलर्जी की समस्या दूर हो जाएगी।




4. फिटकरी

एलर्जी वाली जगहें को फिटकरी के पानी से धोएं। उसके बाद इसपर कपूर और सरसों का तेल मिक्स करके लगाएं। आप चाहें तो इसकी जगहें फिटकरी और नारियल का तेल मिक्स करके भी लगा सकते हैं।


5. नीम

एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर नीम एलर्जी की समस्या को दूर करने का रामबाण इलाज है। इसके लिए नीम के पत्तों को रात के समय पानी में भिगो दें और सुबह इसका पेस्ट बनाकर लगाएं। इससे आपकी स्किन एलर्जी मिनटों में गायब हो जाएगी।


एलर्जी होने पर बरतें ये सावधानियां

1. ज्यादा से ज्यादा खुली हवा में रहें।
2. अगर आपको किसी फूड से एलर्जी है तो उससे दूर रहें।
3. अपने साबुन को बदलकर किसी एंटीबैक्टीरियल साबुन का इस्तेमाल करें।
4. स्किन एलर्जी होने पर त्वचा में बार-बार खुजली न करें।
नाक की एलर्जी का इलाज करने के लिए तीन तरीके हैं:
1 सबसे अच्छा तरीका है बचाव। जिन वजहों से आपको एलर्जी के लक्षण बढ़ते हैं, उनसे आपको दूर रहना चाहिए।
2 दवा जिनका उपयोग आप लक्षणों को रोकने और इलाज के लिए करते हैं।
3 इम्यूनोथेरपी- इसमें मरीज को इंजेक्शन दिए जाते हैं, जिनसे एलर्जी करने वाले तत्वों के प्रति उसकी संवेदनशीलता में कमी आ जाती है।
नाक की एलर्जी को आपको नजरंदाज नहीं करना चाहिए। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो इससे साइनस, गला, कान और पेट की समस्याएं हो सकती हैं।
ऐसी स्थितियों के लिए इलाज की मुख्य पद्धति के अलावा वैकल्पिक तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं। जहां तक योग की बात है, तो सदगुरु कहते हैं कि कपालभाति का रोजाना अभ्यास करने से एलर्जी के मरीजों को काफी फायदा होता है।



एलर्जी में रामबाण है कपालभाति

"मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन्होंने अपने साइनस का इलाज करने की कोशिश में अपने पूरे सिस्टम को बिगाड़ दिया है। इसके लिए आपको बस एक या दो महीने तक लगातार कपालभाति का अभ्यास करना है, आपका साइनस पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। अगर आप इसे सही तरीके से करते हैं, तो कपालभाति से सर्दी-जुकाम से संबंधित हर रोग में आराम मिलेगा।

जिन लोगों को एलर्जी की समस्या है, उन्हें लगातार कपालभाति का अभ्यास करना चाहिए और इसकी अवधि को जितना हो सके, उतना बढ़ाना चाहिए। तीन से चार महीने का अभ्यास आपको एलर्जी से मुक्ति दिला सकता है। कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को इससे फायदा ही हुआ है।



धन्‍वंतरि मंत्र का असर जब दवाई हो बेअसर



              

समुद्र मंथन के दौरान सभी रोगों को दूर करने के लिये धन्वन्तरि भगवान ही औषधियों का कलश लेकर प्रकट हुए थे। हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन्वन्तरि भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है। चिकित्‍सा के भगवान धन्‍वंतरि को भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है। धन्‍वंतरि मंत्र का जप करने से आरोग्‍य की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस मंत्र जप से सभी तरह की बीमारी, रोगों से छुटकारा मिल सकता है।


समुद्र मंथन के दौरान सभी रोगों को दूर करने के लिये धन्वन्तरि भगवान ही औषधियों का कलश लेकर प्रकट हुए थे। हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन्वन्तरि भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है। चिकित्‍सा के भगवान धन्‍वंतरि को भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है। धन्‍वंतरि मंत्र का जप करने से आरोग्‍य की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस मंत्र जप से सभी तरह की बीमारी, रोगों से छुटकारा मिल सकता है।

शास्‍त्रों के अनुसार, धन्वन्तरि भगवान से सभी रोगों को ठीक करने की प्रार्थना की जाती है। भगवान धन्वंतरि के श्रद्धापूर्वक पूजन से दीर्घ जीवन एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है। विभिन्न औषधियों से अमृत निकालने की विधि उस युग में केवल धन्वंतरि को ही आती थी। अत: धन्वंतरि ने एक विशिष्ट प्रक्रिया से देवों और असुरों के श्रम का सहारा लेकर अमृत निकाला।
मंत्र जप शुरू करने से पहले यह जरूरी है कि मन मस्तिष्‍क में उठ रहे सभी तरह के विचारों को विराम दें। मंत्र नीचे दिए गए हैं:-
ॐ नमो भगवते
महा सुदर्शनाया वासुदेवाय धन्वन्तरये
अमृत कलश हस्ताय
सर्व भय विनाशाय
सर्व रोग निवारणाय
त्रैलोक्य पतये
त्रैलोक्य निधये
श्री महा विष्णु स्वरूप
श्री धन्वंतरि स्वरुप
श्री श्री श्री औषध चक्र नारायणाय स्वाहा ।।
अर्थात् परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरि कहते हैं, जो अमृत कलश लिए हैं, सर्व भयनाशक हैं, सर्व रोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरि को सादर नमन है।
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हर्बल चिकित्सा के अनमोल रत्न

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 



घुटने के दर्द ,सूजन से मुक्ति के उपाय



                                              


    घुटना हमारे शरीर का सबसे बड़ा और सबसे जटिल जोड़ है. ऐसा प्रायः देखा गया है की बढती हुई उम्र के साथ अक्सर लोग घुटने के दर्द से ग्रस्त हो जाते है. कभी कभी घुटने में दर्द के साथ सूजन भी रहती है. जब यह दर्द अधिक हो जाये तो छोटे मोटे रोज मर्रा के काम भी मुश्किल हो सकते हैं, जैसे की हल्का वजन उठाना, सीडियां चड़ना, या थोड़े दूर पैदल चलना. हो सकता है  कि    पहले आपको सिर्फ एक ही पैर में दर्द हो, परन्तु थोड़े समय के बाद दोनों घुटनों में दर्द होने लगे.

पुराने जमाने में घुटने में दर्द होने की समस्या केवल बूढ़े लोगों में ही देखने को मिलती थी। घुटनों में होने वाले दर्द को आमतौर पर बुढ़ापे की बीमारी समझा जाता था। मगर आजकल यह समस्या बच्चों और नौजवानों में भी देखने को मिल रही है। गलत-खान पान, शरीर में यूरिक एसिड के बढ़ने से भी घुटनो और जोड़ों में दर्द होने लगता है। इसके अलावा इस समस्या के होने पर जोड़ों में सूजन भी होती है और रोगी को चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है। दर्द से छुटकारा पाने के लिए लोग बिना इसका कारण जाने ही दवा खाने लगते हैं। किसी भी चीज का इलाज तब ही होता है जब उसके पीछे का कारण ढूंढा जाएं। आज हम आपको उम्र से पहले शरीर में होने वाले दर्द का कारण बताएंगे तो आइए जानते है उनके बारे में।
1. मोटापा-
समय से पहले घुटनों में दर्द होने का एक कारण मोटापा भी है। शरीर का वजन बढ़ने का सबसे ज्यादा असर घुटनों पर ही पड़ता है। जब जरूरत से ज्याजा वजन घुटनों पर पड़ने लगता है तो जोड़ों में दर्द होने लगता है। इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि अपनी उम्र के हिसाब से वजन रखा जाए।
2. मांसपेशियों में बदलाव-
कई बार मांसपेशियों में बदलाव होने के कारण भी उम्र से पहले ही जोड़ों में दर्द होने की समस्या बढ़ सकती है। 20 से 60 साल की आयु के बीच में मांसपेशियां तकरीबन 40 फीसदी तक सिकुड जाती है। उनमें शक्ति कम होने लगती हैं। जब हम चलते है या फिर शारीरिक क्रियाएं करते हैं तो कुल्हों और टांगों की मांसपेशियां शरीर का भार उठाते हैं। मगर उम्र के साथ मांसपेशियों में बदलाव होने लगता है। उनकी क्षमता कम होती जाती है। इसके कारण टांगों पर अधिक दबाव पड़ता है। यही वजह है कि हमारे घुटनों में दर्द होने लगता है।




3. ऑस्टियोपो‍रोसिस-
ये बीमारी आजकल 20 से 30 वर्ष की आयु के करीब 14 प्रतिशत लोगों में आम देखने को मिल रही है। इसमें बीमारी में शरीर की हड्डियों की रक्षा करने वाले कार्टिलेज टूट जाते हैं। जब हड्डियों को मजबूत करने वाले तत्व टूट जाते हैं तो उनमें दर्द होना शुरू हो जाता है।
4. अर्थराइटिस-
पुराने जमाने में अर्थराइटिस की समस्या केवल बड़े लोगों में ही देखने को मिलती थी। मगर आजकल छोटे बच्चे भी इस बीमारी के शिकार है। अर्थराइटिस होने का खतरा सबसे ज्यादा महिलाओं को होता है। अर्थराइटिस होने पर भी उम्र से पहले ही शरीर में दर्द होने लगता है।
4. बर्साइटिस-
घुटने में चोट लगाने, भाग-दौड़ करने के कारण भी जोड़ों के आस-पास सुजन होने लगती है। ये समस्या सबसे ज्यादा खिलाड़ियों और जिम जाने वाले लोगों को होती है। इसके अलावा जिन लोगों का वजन जरूरत से ज्यादा है उनको भी घुटनों, कंधा, कोहनी, कूल्हा और घुटनों में दर्द होने लगता है।
5. टेन्टीनाइटिस-
आपके घुटने में सामने की ओर दर्द जो सीढ़ियों अथवा चढ़ते और उतरते समय बढ़ जाता है। टेन्टीनाइटिस धावकों,स्कॉयर और साइकिल चलाने वाले लोगों को ज्यादा होता है।
दर्द से तात्कालिक आराम के लिए कुछ सरल उपाय-
अगर आप ये जाना चाहते हैं की क्या आपका घुटने का दर्द अपने आप ही ठीक हो सकता है, तो चिकित्सक को दिखने से पहले आप ये कुछ उपाय घर में ही प्रयोग कर सकते हैं.
१. घुटने को आराम दें और कोई भी ऐसा कार्य न करें जिससे घुटने पर दवाब बड़े.
२. अगर आपके घुटने में सूजन हो तो, हर 2-3 घंटे में 15 मिनट के लिए अपने घुटने पर बर्फ की पट्टी लगायें.
३. सूजन को कम करने के लिए आप एक पट्टी से अपने घुटने को बाँध सकते हैं.
४. सोते समय अपने घुटने के नीचे एक तकिया रखें जिससे आपके घुटने को आराम मिले.
५. दर्द और सूजन को कम करने के लिए चिकित्सक के परामर्श से साधारण (NSAID) या दर्द निवारक दवा ले सकते हैं.
जोड़ों के दर्द का घरेलू उपाय : 
सर्दियों में जोड़ों के दर्द की समस्या आम सुनने को मिलती हैं। खासकर बढ़ती उम्र के लोगों में यह परेशानी ज्यादा सुनने को मिलती है। जोड़ों का दर्द शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। यह दर्द घुटनों, कोहनियों, गर्दन, बाजूओं और कूल्हों पर हो सकता है। लंबे समय तक किसी एक जगह पर ही बैठे रहने, सफर करने से घुटनें अकड़ जाते हैं और दर्द करने लगते हैं। इसी को जोड़ों का दर्द कहते हैं। अगर सही समय पर इसका इलाज ना किया जाए तो यह गठिया का रूप भी ले सकता है। जोड़ दर्द होने की वजह गलत खान पान ही है। हड्डियों में मिनरल्स की कमी और बढ़ती उम्र भी इसकी एक वजह से हो सकती है।
जोड़ दर्द होने के लक्षण-
खड़े होने, चलने और हिलने जुलने समय दर्द
सूजन और अकड़न
चलते समय जोड़ों पर अटकन लगना
सुबह के समय जोड़ों का अकड़ाव होना


जोड़ों का दर्द का इलाज-

जोड़ों के दर्द को ठीक करने के लिए आपको बहुत सारे मसाजर, तेल आदि मार्कीट में मिल जाएंगे लेकिन पैसे की खूब बर्बादी करने के बाद भी जोड़ों के दर्द से राहत नहीं मिलती। इसकी जगह पर अगर आप कुछ घरेलू नुस्खे अपनाएंगे तो इस दर्द से आपको जल्द राहत मिलेंगी। 
सामग्रीः
10ग्राम- काली उड़द दाल
4 ग्राम -अदरक (पिसा हुआ)
2 ग्राम -कपूर (पिसा हुआ)
50 मि.ली.- सरसों का तेल
विधिः काली साबुत उड़द दाल, अदरक, कपूर को सरसों के तेल में 5 मिनट तक गर्म करें फिर तीनों चीजों को छानकर तेल से बाहर निकाल लें। इस गुनगुने तेल से जोड़ों की मसाज करें। जल्द ही जोड़ों के दर्द से राहत मिलेगी। ऐसा दिन में 2 से 3 बार करें।
इसके अलावा आप इन नुस्खों को भी अपना सकते हैं।
अमरूद की 4-5 कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाएं। इससे दर्द से राहत मिलेगी।
काली मिर्च को तिल के तेल में जलने तक गर्म करें और ठंडा होने पर उसी तेल से जोड़ों की मालिश करें।
गाजर को पीसकर इसमें थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर रोजाना सेवन करें।
दर्द वाले स्थान पर अरंडी का तेल लगाकर, उबाले हुए बेल के पत्तों को गर्म गर्म बांधे इससे भी तुरंत राहत मिलेगी।
2 चम्मच बड़े शहद और 1 छोटा चम्मच दालचीनी पाऊडर सुबह शाम एक गिलास गुनगुने पानी से लें।
सुबह के समय सूर्य नमस्कार और प्राणायाम करने से भी जोड़ों के दर्द से छुटकारा मिलता है।
1 चम्मच मेथी के बीच रातभर पानी में भिगोकर रखें। सुबह पानी निकाल दें और मेथी के बीजों को अच्छे से चबाकर खाएं।
गठिए के रोगी 4-6 लीटर पानी पीने की आदत डाल लें। इससे मूत्रद्धार के जरिए यूरिक एसिड बाहर निकलता रहेंगा।
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हर्बल चिकित्सा के अनमोल रत्न

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 



वायु गोला के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार



                                   


गुल्म (वायु गोला) 
लक्षण व निदान -
नाभि के ऊपर एक गोल स्थान है जहां वायु का गोला रुक जाता है या पेट में गांठ की तरह उभार आता है।
इस तरह पेट में एक जगह वायु के एकत्रित होने को गुल्म या वायु का गोला कहते हैं। वायु का गोला वात, पित्त, कफ, त्रिदोष और खून दोष के कारण उत्पन्न होता है।
यह गुल्म रोग 5 प्रकार का होता है और यह शरीर के विभिन्न स्थानों पर उत्पन्न होता है- दाईं कोख,
बाईं कोख, हृदय , नाभि और पेडू या मूत्राशय ।
वायु गोला होने के कारण :
मल-मूत्र का वेग रोकने, चोट लगने, भारी खाना खाने, रूखा- सूखा भोजन करने, दु:खी रहने और दूषित भोजन करने के कारण वायु दूषित होकर हृदय से मूत्राशय तक के भाग में गांठ की तरह बन जाता
है जिसे गुल्म या वायु का गोला कहते हैं।
लक्षण
वायु का गोला बनने पर दस्त बंद हो जाता है, कब्ज व गैस बनने लगती है, मुंह सूख जाता है, भोजन करने का मन नहीं करता है, भूख नहीं लगती, पेट में दर्द रहता है, अधिक डकारें आती है, दस्त साफ नहीं आता है, पेट फूल जाता है, आंतों में गुड़गुड़ाहट होती रहती है और शरीर का रंग काला पड़ जाता है।
स्त्रियों को गुल्म (वायु का गोला बनना) गर्भ गिरने, गलत खान-पान करने, प्रांरभिक अवस्था में खूनी वायु का ठहरना, गोलेमें जलन और पीड़ा होना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।
भोजन और परहेज :-
बकरी का दूध , गाय का दूध , छोटी मूली , बथुआ , सहजना , लहसुन, जमीकन्द, परवल , बैंगन, करेला , केले का फूल, सफेद कद्दु, कसेरू , दाख , नारियल , बिजौरा नींबू , फालसे , खजूर , अनार , आंवला, पका
पपीता , कच्चे नारियल का पानी, एक साल पुराना चावल , लाल चावल आदि का सेवन करना लाभकारी होता है। रात के समय हलवा खाना, रोटी, पूरी और दूध आदि वायु के गोले से पीड़ित रोगी के लिए अच्छा होता है।
बादी करने वाले अनाज, तासीर के विपरीत पदार्थो का
सेवन, सूखा मांस, सूखी साग, मछली आदि का सेवन न करें। गुड़गुड़ाहट करने वाले पदार्थ, स्त्री प्रसंग ( संभोग ), रात को जागना,अधिक मेहनत करना, धूप , आलू , मूली, मीठे फल आदि का प्रयोग करना भी गुल्म रोगी के लिए हानिकारक होता है। मल- मूत्र के वेग को रोकने से भी वायु का गोला बनता है।



विभिन्न औषधियों से आयुर्वेदिक उपचार :

1. पुराना गुड़ : गुड़, भांरगी और छोटी पीपल बराबर मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। यह 2 से 4 ग्राम चूर्ण काले तिल के काढ़े में मिलाकर सेवन करने से खूनी गुल्म रोग ठीक होता है।
2. गोरखमुण्डी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर सेवन करने से रक्त गुल्म की बीमारी दूर होती है।
3. बच : बच, हरड़, हींग, अम्लवेत, सेंधानमक, अजवायन और जवाखार को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीस लें। यह 3 से 6 ग्राम चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करने से कुछ दिनों में ही पेट में गैस का गोला बनने और दर्द समाप्त होता है।
4. हरड़ : हरड़ का चूर्ण गुड़ में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से पित्त के कारण होने वाली गुल्म रोग ठीक होता है।
बड़ी हरड़ का चूर्ण और अरण्ड का तेल गाय के दूध में मिलाकर पीने से पेट में गैस का गोला बनना ठीक होता है।
5. सज्जीखार : सज्जीखार, जवाक्षार, केवड़ा को पीसकर चूर्ण बनाकर अरण्ड के तेल में मिलाकर सेवन करने से गैस का गोला बनना ठीक होता है। सज्जीखार का रस गुड़ में मिलाकर सेवन करने से पेट में गैस का गोला बनने से उत्पन्न दर्द ठीक होता है।
6. साठी : साठी की जड़ और कालीमिर्च को पीसकर घी में मिलाकर पीने से गुल्म रोग से पीड़ित रोगी को दर्द से आराम मिलता है।
7. शूलग्रंथि :
शूलग्रंथि (बबूल के पेड़ के कांटों को एकत्रित करके पेड़ पर ही कीड़ा गांठ बनाया जाता है) चिलम में रखकर धूम्रपान करने से वायु का गोला समाप्त होता है।
8. अपामार्ग :
अपामार्ग की जड़ और कालीमिर्च को पीसकर घी के साथ प्रयोग करने से वायु का गोला व दर्द में आराम मिलता है।
9. सोंठ :
सोंठ 40 ग्राम, सफेद तिल 160 ग्राम और पुराना गुड़ 80 ग्राम को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 6 से 10 ग्राम।खाकर ऊपर से गर्म दूध पीने से पेट की कब्ज, वायु का गोला और दर्द समाप्त होता है।
10. मुलहठी :
मुलेहठी, चंदन और दाख को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण दूध के साथ सेवन करने से पित्त के कारण उत्पन्न गुल्म।रोग दूर होता है ।
11. द्राक्षा (मुनक्का) :
पित्त के कारण उत्पन्न गुल्म रोग से पीड़ित रोगी को द्राक्षा (मुनक्का) और हरड़ का 1-2 चम्मच रस गुड़ मिलाकर पीना चाहिए ।
12. अजवायन :
अजवायन का चूर्ण और थोड़ा-सा संचर नमक छाछ में मिलाकर पीने से कफ से उत्पन्न गुल्म में लाभ मिलता है।


13. हींग :
हींग, पीपल की जड़, धनिया, जीरा, बच, कालीमिर्च, चीता, पाढ़, चव्य, कचूर, कालानमक, सेंधानमक, बिरिया संचर नमक, विषांबिल, छोटी पीपल, सोंठ, जवाखार, सज्जीखार, हरड़, अनार
दाना, अम्लवेत, पोहकरमूल, हाऊबेर और काला जीरा आदि को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर लें। फिर इसमें एक बिजौरा नींबू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिला लें और छाया में सुखाकर बोतल में भरकर रख लें। यह चूर्ण 3 से 4 ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ
प्रतिदिन सेवन करने से गुल्म, अफारा, दस्त की रुकावट, पेट का रोग, कोख का दर्द, स्तन और पसलियों में वायु व कफ के दोषों से उत्पन्न दर्द आदि समाप्त होते हैं।
बच 20 ग्राम, हरड़ 30 ग्राम, बायविडंग 60 ग्राम, सोंठ 40 ग्राम, हींग 10 ग्राम, पीपल 80 ग्राम,चीता 50 ग्राम और अजवायन 70 ग्राम को एक साथ कूटकर चूर्ण बना लें। यह 2 से 4 ग्राम चूर्ण गर्म पानी या शराब के साथ सेवन करने से गुल्म रोग समाप्त होता है।
14. आक :
आक के फूलों की कलियां 20 ग्राम और अजवायन 20 ग्राम को बारीक पीसकर इसमें 50 ग्राम चीनी मिलाकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम खाने से गुल्म रोग दूर होता है।
15. शरपुंखा : शरपुंखा का रस और हरड़ का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 4 ग्राम की मात्रा में खाना खाने के बाद खाने से गुल्म के कारण उत्पन्न दर्द ठीक होता है और दस्त की रुकावट दूर होती है।
16. नींबू :
6 मिलीलीटर नींबू के रस को आधे गिलास गर्म पानी में मिलाकर सेवन करने से वायु का गोला समाप्त होता है।


17. लता करंज :

लता करंज के पत्तों को चावल के पानी में उबाल कर पीने से वायु गोला ठीक होता है। इसके सेवन से दर्द

कम होता है, पाचनशक्ति मजबूत होती है और वातशूल ठीक होता है।
लता करंज के बीज, कालानमक, सोंठ और हींग बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण आधे से 
एक ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ खाने से पेट में गैस बनने के कारण उत्पन्न दर्द ठीक होता है।गैस का गोला बनने से यदि कमर में दर्द हो तो करंज के बीजों की मींगी और एक चौथाई ग्राम शुद्ध नीलाथोथा मिलाकर पीस लें और सरसों तेल में मिलाकर 12 गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली प्रतिदिन खाने से गैस का गोला बनने से उत्पन्न दर्द ठीक होता है।10 से 20 ग्राम करंज के कोमल पत्ते को तिल के तेल में भूनकर खाने से गुल्म रोग ठीक होता है।
18. एरण्ड : 2 चम्मच एरण्ड के तेल को गर्म दूध में मिलाकर पीने से वायु का गोला समाप्त होता है।
19. अरबी : अरबी के पत्ते डण्डी के समेत लेकर इसका पानी निकालकर घी में मिलाकर 3 दिनों तक सेवन से गुल्म रोग ठीक होता है।

20. द्राक्षा (मुनक्का) : पित्त के कारण उत्पन्न गुल्म रोग से पीड़ित रोगी को द्राक्षा (मुनक्का) और हरड़ का 1-2 चम्मच रस गुड़ मिलाकर पीना चाहिए ।
21. अजवायन : अजवायन का चूर्ण और थोड़ा-सा संचर नमक छाछ में मिलाकर पीने से कफ से उत्पन्न गुल्म में लाभ मिलता है।
22. हींग : हींग, पीपल की जड़, धनिया, जीरा, बच, कालीमिर्च, चीता, पाढ़, चव्य, कचूर, कालानमक, सेंधानमक, बिरिया संचर नमक, विषांबिल, छोटी पीपल, सोंठ, जवाखार, सज्जीखार, हरड़, अनार
दाना, अम्लवेत, पोहकरमूल, हाऊबेर और काला जीरा आदि को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर लें। फिर इसमें एक बिजौरा नींबू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिला लें और छाया में सुखाकर बोतल में भरकर रख लें। यह चूर्ण 3 से 4 ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ
प्रतिदिन सेवन करने से गुल्म, अफारा, दस्त की रुकावट, पेट का रोग, कोख का दर्द, स्तन और पसलियों में वायु व कफ के दोषों से उत्पन्न दर्द आदि समाप्त होते हैं।
23. बैंगन :
पेट में गैस बनने तथा पानी पीने के बाद पेट फूलने पर बैंगन के मौसम में लम्बे बैंगन की सब्जी बनाकर खाने से गैस की बीमारी दूर होती है, लीवर और तिल्ली का बढ़ना भी ठीक होता है। हाथ की हथेलियों व पैरों के तलवों में पसीना आने पर बैंगन का रस लगाने लाभ होता है।
24. त्रिफला :
त्रिफला के 3 से 5 ग्राम चूर्ण को चीनी मेंमिलाकर दिन में 3 बार खाने से गुल्म में लाभ मिलता है।
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खाने के नियम,तरीके



                                                               

जब तक भूख न हो, कुछ न खाएं। भूख लगने पर ही खाना खाएं लेकिन पेट भर के खाना खाने की बजाए जितनी भूख हो, उससे 20 से 30 फीसदी कम खाएं। हालांकि शुगर के मरीजों पर यह नियम लागू नहीं होता। उन्हें हर दो घंटे में कुछ हेल्थी खाना चाहिए।
खाना खाने से आधे घंटे पहले पानी पी लें लेकिन ज्यादा पानी न पिएं वरना पेट भरा हुआ महसूस होगा। खाना खाने के आधे घंटे बाद तक पानी बिल्कुल न पिएं। यह हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। खाने के दौरान जरूरत लगने पर एक-दो घूंट पानी पी सकते हैं लेकिन बेहतर है कि यह पानी गुनगुना हो।
खाने के साथ सलाद जरूर खाएं। इसमें अच्छी मात्रा में फाइबर होता है, जो पाचन में मदद करता है।
आराम से बैठकर खाएं। अगर शरीर और मन, दोनों आराम की मुद्रा में होगा तभी शरीर का मेटाबॉलिज्म अच्छा होगा। जब खा रहे हैं तो सिर्फ खाने पर ध्यान केंद्रित करें। टीवी देखते हुए या कुछ पढ़ते हुए न खाएं, न ही इस दौरान ज्यादा बातचीत करें। सारा ध्यान खाने पर होना चाहिए, तभी आपको उसका सही फायदा मिलेगा।
बिस्किट, नमकीन जैसे सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले स्नैक्स न खाएं। इनसे शरीर में बेवजह की कैलरी बनती है और इनमें ट्रांस-फैट भी होता है जो सेहत को नुकसान पहुंचाता है।
सर्दी हो या गर्मी, हमेशा गुनगुना पानी ही पिएं। इससे मेटाबॉलिक रेट बढ़ता है। फ्रिज का पानी पीना बंद कर दें। यह काफी नुकसान पहुंचाता है। इससे पेट की जठराग्नि धीमी हो जाती है और खाना सही से पचता नहीं है। मटके का पानी पी सकते हैं।
   खीर के साथ खिचड़ी, दूध के साथ नमक ऐसी चीजें खाने से बचें। इस तरह के कॉम्बो पाचन के लिए अच्छे नहीं होते। खाने के दौरान फलों के जूस या फिर बेहद ठंडे ड्रिंक्स न पिएं। गर्म खाने के साथ ठंडा पीना सही नहीं है।
दूध और दूध से बनी चीजों के साथ फल या सब्जियां न खाएं। ऐसा करेंगे तो पेट में जाकर खाना पचने की बजाय सड़ जाएगा। इससे उसका असली फायदा शरीर को नहीं मिल पाएगा। पिज्जा इसी कैटिगरी में आता है क्योंकि उसमें चीज, टमाटर, सॉस आदि चीजें मिली होती हैं।
   रात का खाना 8 बजे से पहले खा लें। डिनर हल्का होना चाहिए, लंच उससे भारी और नाश्ता सबसे भारी क्योंकि जब सूरज ऐक्टिव होता है तो हमारा मेटाबॉलिक रेट ज्यादा होता है, जबकि चंद्रमा की मौजूदगी में यह कम हो जाता है। लोग रात में खाना देर से खाते और खाते ही तुरंत सो जाते हैं। इसी से मोटापा बढ़ता है।
    खाने में नमक का इस्तेमाल कम करें क्योंकि एक चम्मच नमक शरीर में 3-4 लीटर पानी को रोकता है। इससे ब्लड प्रेशर भी बढ़ता है।

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व्याधि,रोग,बीमारी के निवारण मे धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व





    काय चिकित्सा की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, ऐलोपैथी, वायोकैमी, क्रोमोपैथी, नैचरोपैथी, प्राण चिकित्सा, विद्युत चिकित्सा, झाड़-फूँक आदि कितने ही प्रकार के उपचार रोग निवारण के लिए काम आते हैं। पर मनोरोगों का न तो महत्व समझा जाता है और न उनके उपचार का कोई प्रबन्ध है। जबकि उनसे हानियाँ शारीरिक रोगों से भी कहीं अधिक होती हैं। शरीर वाहन है और मन सवार। शरीर औजार और मन कारीगर। वाहन और औजार की तुलना में उसके प्रयोक्ता का महत्व अधिक है। शरीर के रुग्ण होने से जितनी क्षति होती है उसकी तुलना में मन के अस्वस्थ होने पर कहीं अधिक हानि उठानी पड़ती है। अस्तु मानसिक स्वास्थ्य की ओर शरीर स्वास्थ्य से भी अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है जबकि उस ओर प्रायः उपेक्षा ही दिखाई जाती है।
     मानसिक संतुलन खो बैठने पर उन्मादग्रस्तों को पागलखाने में भर्ती किया जाता है। इससे कम की मानसिक रुग्णता की ओर ध्यान नहीं जाता जबकि व्यक्तित्व को गया-गुजरा बनाने, पिछड़ापन लादे रहने और प्रगति पथ में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न करने में वे ही प्रधान कारण होते हैं। बुरी आदतों से ग्रसित, बात-बात में आपे से बाहर हो जाने वाले, दुराग्रही, उद्धत स्वभाव, कल्पना लोक में उड़ते रहने वाले, अशिष्ट, सनकी प्रकृति के लोग भी मनोरोग सही चिन्तन न कर सकने वाले - अविकसित मस्तिष्क वाले भी रोगी ही माने गये हैं। किन्तु सर्वसाधारण की दृष्टि में यह स्वभाव दोष भर है और इनका समझाने बुझाने एवं स्वयं सुधरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। तथ्य इससे भिन्न है। बुरी आदतें भी बीमारियाँ ही हैं और उनका भी कार्य रोगों की तरह उपचार हो सकता है।



साइकोमैट्री जैसे आधारों पर सामान्य मानसिक रोगों की - सनकों की - चिकित्सा बहुत दिनों से चल रही है। उससे रोगी को अपने मन की बातें जी खोलकर कहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। सोचा जाता है कि जैसे पथरी से पेशाब रुक जाता है उसी प्रकार किन्हीं मानसिक दबावों की गाँठें बन जाने से चिन्तन स्वाभाविक प्रवाह में अवरोध आता है। उसी से विक्षिप्तता आती मानी जाती है। समझा जाता है कि यदि स्वच्छन्द कथन में वे बातें मुँह से निकल जायें जो मन पर दबाव डालती थीं तो उससे वह दिमागी पथरी निकल सकती है जिन्हें मानसिक ग्रन्थियाँ कहा जाता है और मनोरोगों का कारण माना जाता है। इस स्वच्छन्द कथन के अतिरिक्त रोगी को कुछ सुझाव भी दिये जाते हैं। उसके चित्त में से कुछ मान्यताएँ उखाड़ने और कुछ जमाने के लिए स्नेह युक्त हलका- फुलका वार्तालाप किया जाता है। प्रायः इसी स्तर की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति बहुत दिनों से चल रही है। उसके कभी उत्साहवर्धक, कभी निराशाजनक परिणाम भी सामने आते रहते हैं।
विचारणीय यह है कि क्या मनःशास्त्रियों की यह मान्यता सही है कि कभी कोई मानसिक दबाव पड़ जाने से ही मनोरोग उत्पन्न होते हैं? यदि ऐसा ही है तो जिन्हें जीवन भर भारी प्रतिकूलताओं, खिन्नताओं और विपन्नताओं के बीच निर्वाह करना पड़ता है। वे क्यों विक्षिप्त नहीं हो जाते? प्रतिकूलताओं की उत्तेजना से प्रखरता उभरती है, इस सिद्धान्त को फिर किस प्रकार मान्यता मिलेगी? तब सदा अनुकूलता ही ढूँढ़नी पड़ेगी, भले ही वह किसी भी कीमत पर क्यों न मिले? अन्यथा तनिक-सी भी प्रतिकूलता का दबाव पड़ने पर मनोरोग उत्पन्न होने का भय रहेगा। इसके अतिरिक्त एक बात और भी है कि यह कह देने भर से मानसिक गाँठें खुल जाती हैं तो जो दुखियारे अपनी व्यथा और कठिनाई आये दिन हर किसी से कहते ही रहते हैं उनका समाधान क्यों नहीं होता? गम्भीर प्रकृति के लोग अपनी और दूसरों की महत्वपूर्ण बातें प्रायः छिपाये ही रहते हैं। राजनीतिज्ञ, सेनाध्यक्ष, षड्यन्त्रकारी, अपराधी जैसे लोगों की सफलता तो इसी पर निर्भर रहती है कि अपने मन की बातें छिपाये रहें, उसकी गन्ध भी किसी को नहीं लगने देते। ऐसी दशा में छिपाने, न कहने से उन्हें मनोरोग क्यों नहीं होते? लगता है मनोवैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित यह प्रक्रिया उतनी सारगर्भित नहीं है कि मानसिक दबावों से ही विक्षिप्तता आती है और जी खोलकर कह देने भर से मनोरोगों का निराकरण हो जाता है। इन सन्देहों के बावजूद यदि इसे उपयोगी एवं आवश्यक मान लिया जाय तो भी इतना तो निश्चित है कि इतना भर पर्याप्त नहीं है। इतने भर उपाय से अनेक मानसिक रोगों का निराकरण पूरी तरह नहीं हो सकता। इससे आगे भी करने के लिए बहुत कुछ शेष रह जाता है, यह मानकर चलना होगा।


कायिक रोग प्रकृति द्वारा शरीर यात्रा के लिए निर्धारित नियमों के उल्लंघन का परिणाम हैं। इसी प्रकार मनोरोगों का कारण चिन्तन के लिए निर्धारित नीति मर्यादा का व्यतिक्रम करता है। व्यक्तिगत जीवन में हर मनुष्य को चरित्र-निष्ठ रहना चाहिए और सम्पर्क क्षेत्र में समाजनिष्ठ सद्व्यवहार का पालन करना चाहिए। अरोग्य शास्त्र की नियम मर्यादा इसलिए है कि आहार-विहार का ठीक तरह पालन किया जाय। समाज शास्त्र के अन्तर्गत शासकीय कानून और शिष्टाचार सहित नागरिक कर्तव्यों का निर्वाह आवश्यक है। वैयक्तिक और सामाजिक आचार संहिता का अनुशासन मानने वाले सज्जन कहलाते हैं। उनकी प्रशंसा होती है, जन सहयोग मिलता है और उनका अस्तित्व सुखद वातावरण का निर्माण करता है। इसके साथ-साथ सबसे बड़ा और पूर्ण प्रत्यक्ष लाभ यह है कि चित्त हलका रहने से उन अन्तर्द्वन्द्वों का उद्भव नहीं होता जो मानसिक रोगों के प्रधान कारण हैं।

    व्यक्तिगत जीवन की उत्कृष्टता बनाये रहने की आवश्यकता पूरी करने वाले तत्वदर्शन का नाम अध्यात्म है। इसी को व्यवहार में मानवी संस्कृति कहते हैं। आत्मपरिष्कार इसका उद्देश्य है। व्यावहारिक जीवन की गतिविधियों की मर्यादा क्या हो इसका निर्धारण धर्म धारणा के अन्तर्गत किया गया है। धर्म को ही सभ्यता भी कहते हैं। धर्म प्रवृत्ति का जीवित रखने के लिए पुण्य परमार्थ के लिए की गई विविध-विधि तपश्चर्याओं का अभ्यास किया जाता है, उनमें पिछली भूलों के लिए पश्चाताप प्रायश्चित का भाव है और आगे के लिए सतर्कतापूर्वक श्रेष्ठ जीवन बिताने का संकल्प। धर्म धारणा के समस्त क्रिया-कलाप इसी उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं। अध्यात्म के अन्तर्गत कितने ही प्रकार की योग साधनाएँ आती हैं उनमें आत्मनिरीक्षण और अन्तर परिशोधन के लिए कई तरह के अभ्यास कराये जाते हैं। इनके द्वारा अन्तः श्रद्धा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा उठाया जाता है। ‘अहम्’ को संकीर्ण सीमाबन्धन से आगे बढ़कर सुविस्तृत क्षेत्र में आत्मभाव विस्तृत करने वाले स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन के अभ्यास योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोक व्यवहार का मर्यादा पालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है। आत्मोत्कर्ष का दार्शनिक पक्ष योग में और क्रियापक्ष तप में गिना जाता है। योग को संस्कृति और तप को सभ्यता कह सकते हैं। इन्हीं के दर्शन अध्यात्म और धर्म के नाम से जाने जाते हैं।


योग और तप के माध्यम से कितनी ही लौकिक और अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का आकर्षक वर्णन साधना विज्ञान के अन्तर्गत किया गया है। इनमें अत्यन्त स्पष्ट सिद्धियाँ शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण की हैं। धर्म पालन से शरीर निरोग बनता है और अध्यात्म का अवलम्बन करने से मनोविकारों की जड़ें कटती हैं। प्रस्तुत सन्दर्भ में अन्यान्य लाभों की चर्चा न करते हुए इतना भी सोचा जा सकता है कि जीवन के सुविधा और प्रगति के उभयपक्षीय उद्देश्य पूरे करने वाले आरोग्य की रक्षा में धर्म और अध्यात्म का क्या योगदान हो सकता है और उस योगदान को किस प्रकार व्यवहार में उतारा जा सकता है?
    इस सन्दर्भ में शरीर-शास्त्र, मनःशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र के मूर्धन्य विशेषज्ञों का मत यह है कि जीवन-क्रम में यदि धर्म और अध्यात्म के वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश किया जा सके तो उसकी आस्थाएँ, प्रवृत्तियाँ, आकांक्षाएँ, विचारणाएँ एवं गतिविधियाँ ऐसी मोड़ ले सकती हैं जिनमें आदर्शों को अपनाने की दिशा में प्रगति क्रम चल पड़े। इससे स्वास्थ्य रक्षा पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ेगा। पिछले रोगों को मिटाने और भविष्य में हंसती-हंसाती हलकी-फुलकी जिन्दगी जीने का सहज अवसर प्राप्त होगा।
प्राचीन काल में जब धार्मिकता का वातावरण था तब पुष्टाई और चिकित्सा की उतनी सुविधा न होते हुए भी जन-स्वास्थ्य की स्थिति बहुत सन्तोषजनक थी। जब से लोग निरुद्देश्य जीवन जीने लगे हैं - उच्चस्तरीय आस्थाओं की अवहेलना करने लगे हैं - विलासी, बनावटी और अहंकारी गतिविधियाँ अपनाने लगे हैं तब से आन्तरिक तनावों और अन्तर्द्वन्द्वों में भारी वृद्धि हुई है। फलतः जनस्वास्थ्य को भारी आघात लगा है। तथ्य को यदि ध्यान में रखा जा सके तो स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी धार्मिक मनोवृत्ति को वापिस लौटाने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता अनुभव होगी।
    पाश्चात्य देशों में धार्मिकता को स्वास्थ्य संरक्षण एवं रोग निवारण के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है और उस परीक्षण के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। विंग्स आफ हीलिंग, मार्च आफ फेथ, क्रिश्चियन साइन्स, यूनिटी जैसी संस्थाएँ धार्मिकता के उपचारों के सहारे शारीरिक और मानसिक रोगों के निराकरण का प्रयोग कर रही हैं और उसमें उन्हें आशातीत सफलता मिल रही है। इन प्रयोग परीक्षणों में अमेरिका के नार्थ केरोलिना प्रान्त के ब्लूरिज पर्वत श्रेणियों के मध्य बना हुआ हेव्रान आश्रम बहुत ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसके संस्थापक डॉ0 डिलाई आरोग्य लाभ के लिए आने वाले रोगियों के लिए एक ही उपचार बताते हैं कि वे जब तक यहाँ रहें अपने आपको धर्म चिन्तन में प्रभु प्रार्थना में निरत रखें। आगन्तुकों को तत्काल शान्ति मिलती है और वे अपना कष्ट भार हलका हुआ अनुभव करने लगते हैं।
    आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में जहाँ रोगों की औषधि उपचार पद्धति के वर्णन हैं वहाँ उनके मूलकारण की ओर संकेत करते हुए यह भी बताया गया है कि धर्मानुष्ठानों के माध्यम से जीवन क्रम को अधिक पवित्र बनाने का उपक्रम भी रोग निवारण के लिए आवश्यक है। चरक संहिता के एक प्रसंग में छात्र अग्निवेश आचार्य चरक से पूछता है - भगवन्, संसार में पाये जाने वाले अनेक रोगों का मूल कारण क्या है? आचार्य उत्तर देते हैं- ‘लोगों के दुष्कर्म जिस स्तर के होते हैं उसी के अनुरूप उन्हें पापों का प्रतिफल शारीरिक और मानसिक व्याधियों के रूप में प्राप्त होता है।’
    जिस प्रकार शरीर में भरे विष द्रव्य का निष्कासन एवं मारण रोग निवारण के लिए आवश्यक है उतना ही आवश्यक यह भी है कि कुकर्मों के प्रायश्चित और कुसंस्कारों के निष्कासन के लिए धर्मानुष्ठानों की प्रक्रिया का आश्रय लिया जाय।

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