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Tuesday, May 24, 2016

श्वसन तंत्र के रोग के उपचार Treatment of respiratory disease












सांस फूलना या सांस ठीक से न लेने का अहसास होना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क से मिलने वाला संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देता है। फेफड़ों से संबंधित पूरी प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों की वजह से भी सांसों की समस्या आती है। फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य  विजातीय पदार्थों  की वजह से श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट के कारण भी सांस लेने में दिक्कत आती है। दिल की बीमारियों और खून में प्राणवायु  का स्तर कम होने से भी सांस फूलती है।इस वजह से 2  किस्म की बीमारियां आमतौर पर हो जाती है -
1..दमा
२. ब्रोंकाइटिस
दमा
जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं।
दमा रोग के  लक्षण:-
दमा रोग में रोगी को सांस लेने तथा छोड़ने में काफी जोर लगाना पड़ता है। जब फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती हैं) की छोटी-छोटी तन्तुओं (पेशियों) में अकड़न युक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़े वायु (श्वास) की पूरी खुराक को अन्दर पचा नहीं पाते हैं। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है। इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है। दमा रोग की स्थिति तब अधिक बिगड़ जाती है जब रोगी को श्वास लेने में बहुत दिक्कत आती है क्योंकि वह सांस के द्वारा जब वायु को अन्दर ले जाता है तो प्राय: प्रश्वास (सांस के अन्दर लेना) में कठिनाई होती है तथा नि:श्वास (सांस को बाहर छोड़ना) लम्बे समय के लिए होती है। दमा रोग से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेते समय हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।
जब दमा रोग से पीड़ित रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसे दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत आती है तथा व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है।
जब दमा रोग से पीड़ित रोगी को दौरा पड़ता है तो उसे सूखी खांसी होती है और ऐंठनदार खांसी होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है।मेरे विचार मे  दमा रोग प्राकृतिक चिकित्सा से पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
दमा रोग होने का कारण:-
*धूल के कण, खोपड़ी के खुरण्ड, कुछ पौधों के पुष्परज, अण्डे तथा ऐसे ही बहुत सारे प्रत्यूजनक पदार्थों का भोजन में अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।
*भूख से अधिक भोजन खाने से दमा रोग हो सकता है।
*मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य पदार्थों तथा गरिष्ठ भोजन करने से दमा रोग हो सकता है।
*फेफड़ों में कमजोरी, हृदय में कमजोरी, गुर्दों में कमजोरी, आंतों में कमजोरी तथा स्नायुमण्डल में कमजोरी हो जाने के कारण दमा रोग हो जाता है।
*मनुष्य की श्वास नलिका में धूल तथा ठंड लग जाने के कारण दमा रोग हो सकता है।
*मनुष्य के शरीर की पाचन नलियों में जलन उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से भी दमा रोग हो सकता है।
*मल-मूत्र के वेग को बार-बार रोकने से दमा रोग हो सकता है।
*औषधियों का अधिक प्रयोग करने के कारण कफ सूख जाने से दमा रोग हो जाता है।
*खान-पान के गलत तरीके से दमा रोग हो सकता है।
*मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय के कारण भी दमा रोग हो सकता है।
*खून में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न हो जाने के कारण भी दमा रोग हो सकता है।
*नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।
*खांसी, जुकाम तथा नजला रोग अधिक समय तक रहने से दमा रोग हो सकता है।

*नजला रोग होने के समय में संभोग क्रिया करने से दमा रोग हो सकता है।
*धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने या धूम्रपान करने से दमा रोग हो सकता है।



दमा रोग के लक्षण:-
दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक कठिनाई होती है।
सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक कठिनाई होती है।
सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं।


दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
*दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को नारियल पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी को भिगोकर खायें तथा इसके पानी में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिएं तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिलाकर पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं।
*1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी हैं जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभांति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तानमन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।





दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्रल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी के लिए कुछ सावधानियां:-
दमा रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में लेसदार पदार्थ तथा मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को धूल तथा धुंए भरे वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है।
रोगी व्यक्ति को मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ों से बचना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब, तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।

2.ब्रोंकाइटिस

तेज ब्रोंकाइटिस-
इस रोग के कारण रोगी को सर्दियों में अधिक खांसी और गर्मियों में कम खांसी होती रहती है लेकिन जब यह पुरानी हो जाती है तो खांसी गर्मी हो या सर्दी दोनों ही मौसमों में एक सी बनी रहती है।
तेज ब्रोंकाइटिस के लक्षण:-
तेज ब्रोंकाइटिस रोग में रोगी की सांस फूल जाती है और उसे खांसी बराबर बनी रहती है तथा बुखार जैसे लक्षण भी बन जाते हैं। रोगी व्यक्ति को बैचेनी सी होने लगती है तथा भूख कम लगने लगती है।
तेज ब्रोंकाइटिस के कारण:-
जब फेफड़ों में से होकर जाने वाली सांस नली के अन्दर से वायरस (संक्रमण) फैलता है तो वहां की सतह फूल जाती है, सांस की नली जिसके कारण पतली हो जाती है। फिर गले में श्लेष्मा जमा होकर खांसी बढ़ने लगती है और यह रोग हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस-
पुराना ब्रोंकाइटिस रोग रोगी को बार-बार उभरता रहता है तथा यह रोग रोगी के फेफड़ों को धीरे-धीरे गला देता है और तेज ब्रोंकाइटिस में रोगी को तेज दर्द उठ सकता है। इसमें सांस की नली में संक्रमण के कारण मोटी सी दीवार बन जाती हैं जो हवा को रोक देती है। इससे फ्लू होने का भी खतरा होता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस का लक्षण:-
इस रोग के लक्षणों में सुबह उठने पर तेज खांसी के साथ बलगम का आना शुरू हो जाता है। शुरू में तो यह सामान्य ही लगता है। पर जब रोगी की सांस उखडने लगती है तो यह गंभीर हो जाती है जिसमें एम्फाइसीमम का भी खतरा हो सकता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण रोगी के चेहरे का रंग नीला हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस होने का कारण:-
ब्रोंकाइटिस रोग होने का सबसे प्रमुख कारण धूम्रपान को माना जाता है। धूम्रपान के कारण वह खुद तो रोगी होता ही है साथ जो आस-पास में व्यक्ति होते हैं उनको भी यह रोग होने का खतरा होता है।
तेज ब्रोंकाइटिस तथा पुराना ब्रोंकाइटिस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:–
जब किसी व्यक्ति को तेज ब्रोंकाइटिस रोग हो जाता है तो उसे 1-2 दिनों तक उपवास रखना चाहिए तथा फिर फलों का रस पीना चाहिए तथा इसके साथ में दिन में 2 बार एनिमा तथा छाती पर गर्म गीली पट्टी लगानी चाहिए। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
गहरी कांच की नीली बोतल का सूर्यतप्त जल 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन 6 बार सेवन करने तथा गहरी कांच की नीली बोतल के सूर्यतप्त जल में कपड़े को भिगोकर पट्टी गले पर लपेटने से तेज ब्रोंकाइटिस रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस रोग कभी-कभी बहुत जल्दी ठीक नहीं होता है लेकिन इस रोग को ठीक करने के लिए नमकीन तथा खारीय आहार का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए तथा शारीरिक शक्ति के अनुसार उचित व्यायाम करना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
पुराने ब्रोंकाइटिस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को 2-3 दिनों तक फलों के रस पर रहना चाहिए और अपने पेट को साफ करने के लिए एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके बाद सादा भोजन करना चाहिए। इस प्रकार से रोगी व्यक्ति यदि नियमित रूप से प्रतिदिन उपचार करता है तो उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के क्षारधर्मी आहार (नमकीन, खारा, तीखा तथा चरपरा) है जिनका सेवन करने से ब्रोंकाइटिस रोग ठीक हो जाता है। क्षारधर्मी आहार (नमकीन, खारा, तीखा तथा चरपरा) इस प्रकार हैं-आलू, साग-सब्जी, सूखे मेवे, चोकर समेत आटे की रोटी, खट्ठा मट्ठा और सलाद आदि।
पुराने ब्रोंकाइटिस रोग से पीड़ित रोगी को गर्म पानी पिलाकर तथा उसके सिर पर ठण्डे पानी से भीगी तौलिया रखकर उसके पैरों को गर्म पानी से धोना चाहिए। उसके बाद रोगी को उदरस्नान कराना चाहिए और उसके शरीर पर गीली चादर लपेटनी चाहिए। इसके बाद रोगी के शरीर में गर्मी लाने के लिए कम्बल ओढ़कर रोगी को पूर्ण रूप से आराम कराना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया कम से कम 2 बार करनी चाहिए।
जब इस रोग की अवस्था गंभीर हो जाए तो रोगी की छाती पर भापस्नान देना चाहिए और इसके बाद रोगी के दोनों कंधों पर कपड़े भी डालने चाहिए।
इस रोग के साथ में रोगी को सूखी खांसी हो तो उसे दिन में कई बार गर्म पानी पीना चाहिए और गरम पानी की भाप को नाक तथा मुंह द्वारा खींचना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी का यह रोग ठीक हो जाता है।
नींबू के रस को पानी में मिलाकर अधिक मात्रा में पीना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को खुली हवा में टहलना चाहिए और सप्ताह में कम से कम 2 बार एप्सम साल्टबाथ (पानी में नमक मिलाकर उस पानी से स्नान करना) लेना चाहिए। इसके फलस्वरूप पुराना ब्रोंकाइटिस रोग ठीक हो जाता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी पर मालिश करनी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर सिंकाई करनी चाहिए इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक आराम मिलता है और उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
रोगी को प्रतिदिन अपनी छाती पर गर्म पट्टी लगाने से बहुत आराम मिलता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में प्राणायाम क्रिया करनी चाहिए। इससे श्वसन-तंत्र के ऊपरी भाग को बल मिलता है और ये साफ रहते हैं। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।

ब्रोंकाइटिस रोग से पीड़ित रोगी के लिए कुछ सावधानियां:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ध्रूमपान करने से इस रोग की अवस्था और गंभीर हो सकती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को लेसदार पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इनसे बलगम बनता है।
जीर्ण जुकाम को ब्रोंकाइटिस भी कहते हैं। इस रोग के कारण रोगी की श्वास नली में जलन होने लगती है तथा कभी-कभी तेज बुखार भी हो जाता है जो 104 डिग्री तक हो जाता है। यह रोग संक्रमण के कारण होता है जो फेफड़ों में जाने वाली सांस की नली में होता है। यह पुराना ब्रोंकाइटिस और तेज ब्रोंकाइटिस 2 प्रकार का होता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को सूखी खांसी, स्वरभंग, श्वास कष्ट, छाती के बगल में दर्द, गाढ़ा-गाढ़ा कफ निकलना और गले में घर्र-घर्र करने की आवाज आती है।

Sunday, May 15, 2016

गर्मी से बचाव के उपाय How to protect against heat





मई का महीना आ गया है और सूरज अपनी प्रखर किरणों की तीव्रता से प्रकृति के जलियांश (स्नेह )को सुखा कर वायु में रूखापन और ताप बढ़ा कर मनुष्यों के शरीर के ताप की भी वृद्धि कर रहा है!
गर्मी में होने वाले आम रोग –गर्मी में लापरवाही के कारण सरीर में निर्जलीकरण (dehydration),लू लगना, चक्कर आना ,घबराहट होना ,नकसीर आना, उलटी-दस्त, sun-burn,घमोरिया जैसी कई diseases हो जाती हैं
    इन बीमारियों के होने में प्रमुख कारण- गर्मी के मोसम में खुले शरीर ,नंगे सर ,नंगे पाँव धुप में चलना , तेज गर्मी में घर से खाली पेट या प्यासा बाहर जाना,
  1. कूलर या AC से निकल कर तुरंत धुप में जाना ,
    बाहर धुप से आकर तुरंत ठंडा पानी पीना ,सीधे कूलर या AC में बेठना ,
    तेज मिर्च-मसाले,बहुत गर्म खाना ,चाय ,शराब इत्यादि का सेवन ज्यादा करना ,
    सूती और ढीले कपड़ो की जगह सिंथेटिक और कसे हुए कपडे पहनना
    इत्यादि कारण गर्मी से होने वाले रोगों को पैदा कर सकते हैं
    हम कुछ छोटी-छोटी किन्तु महत्त्वपूर्ण बातो का ध्यान रख कर ,इन सबसे बचे रह कर ,गर्मी का आनंद ले सकते हैं!
  2. उपचार से बचाव बेहतर होता है-
 वचाव के तरीके बताते हैं –

*गर्मी में सूती और हलके रंग के कपडे पहनने चाहिये
*चेहरा और सर रुमाल या साफी से ढक कर निकलना चाहिये




*प्याज का सेवन तथा जेब में प्याज रखना चाहिये
*बाजारू ठंडी चीजे नहीं बल्कि घर की बनी ठंडी चीजो का सेवन करना चाहिये
*ठंडा मतलब आम(केरी) का पना, खस,चन्दन गुलाब फालसा संतरा का सरबत ,ठंडाई सत्तू, दही की लस्सी,मट्ठा,गुलकंद का सेवन करना चाहिये
*इनके अलावा लोकी ,ककड़ी ,खीरा, तोरे,पालक,पुदीना ,नीबू ,तरबूज आदि का सेवन अधिक करना चाहिये
शीतल पानी का सेवन ,2 से 3 लीटर रोजाना
*गर्मी में सूरज अपनी प्रखर किरणों से जगत के स्नेह को पीता रहता है,इसलिए गर्मी में मधुर(मीठा) ,शीतल(ठंडा) ,द्रव (liquid)तथा इस्निग्धा खान-पान हितकर होता है!
*गर्मी में जब भी घर से निकले ,कुछ खा कर और पानी पी कर ही निकले ,खाली पेट नहीं
*गर्मी में ज्यादा भारी (garistha),बासी  भोजन नहीं करे,क्योंकि गर्मी में सरीर की जठराग्नि मंद रहती है ,इसलिए वह भारी खाना पूरी तरह पचा नहीं पाती और जरुरत से ज्यादा खाने या भारी खाना खाने से उलटी-दस्त की शिकायत हो सकती है
*अगर आप योग के जानकार हैं ,तो सीत्कारी ,शीतली तथा चन्द्र भेदन प्राणायाम एवं शवासन का अभ्यास कीजिये ये शारीर में शीतलता का संचार करते हैं

Thursday, May 12, 2016

डीटॉक्स आहार से गर्मियों मे स्वस्थ रहें




गर्मियों में तुरंत ऊर्जा चाहते हैं? तो इसके लिए आप डीटॉक्स आहार अपना सकते हैं यानी ऐसे आहार जो आपके शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में आपकी मदद करें। गर्मियों में तरबूज, खीरे और नींबू को अपने आहार में शामिल करें।
*ऑरिफ्लेम इंडिया की आहार विशेषज्ञ सोनिया नारंग ने कुछ डीटॉक्स टिप्स दिए हैं, जो हमारे शरीर की सफाई करने और हमें स्वस्थ, हल्का और तरोताजा महसूस करने में मदद करेंगे।
*तरबूज : तरबूज गर्मियों में डीटॉक्स के लिए एक बेहतरीन आहार है। तरबूज शरीर में क्षार का निर्माण करता है और इसमें उच्च मात्रा में सिट्रुलाइन (citrulline) होता है। यह आर्गिनिन (arginine) के उत्पादन में मदद करता है, जो हमारे शरीर से अमोनिया और अन्य विषैले पदार्थ को निकालने में मदद करता है। इसी के साथ तरबूज पोटैशियम का एक बेहतरीन स्रेत है, जो हमारे आहार में सोडियम की मात्रा को संतुलित करता है जो गुर्दों की मदद करता है और शरीर की भीतरी सफाई के लिए बेहतरीन है।
*खीरा : खीरे शरीर से विषैले पदार्थों को निकालने में मदद करते हैं। खीरे में मौजूद पानी की उच्च मात्रा मूत्र प्रणाली को दुरुस्त रखती है। आधा कप कटे हुए खीरे में केवल आठ कैलोरीज होती हैं।
*नींबू : नींबू यकृत के लिए बेहद फायदेमंद है। यह यूरिक ऐसिड और अन्य विषैले पदार्थों को घोलता है और यकृत की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
*भाप में पकाना : सब्जियों को भाप में पकाना एक अच्छा तरीका है क्योंकि इससे इनका पोषण नष्ट नहीं होता
*व्यायाम : शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने के लिए थोड़ा व्यायाम करें। डीटॉक्स के दौरान कैफीन और शराब से दूर रहना जरूरी है।

    Sunday, May 8, 2016

    लू से बचने के सरल उपाय Tips to avoid heat stroke




    गर्मी के मौसम में गर्म हवा और बढ़े हुए तापमान से लू लगने का खतरा बढ़ जाता है. चिलचिलाती गर्मी में लू से बचने के लिए घरेलू उपाय काफी कारगर साबित होते हैं-
    जानिए लू से बचने के घरेलू उपाय -
    *तेज धूप से आते ही और ज्यादा पसीना आने पर फौरन ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए.
    * गर्मी के दिनों में बार-बार पानी पीते रहना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो.
    *पानी में नींबू और नमक मिलाकर दिन में दो-तीन बार पीते रहने से लू लगने का खतरा कम रहता है.
    *धूप में बाहर जाते वक्त खाली पेट नहीं जाना चाहिए.



    *सब्जियों के सूप का सेवन करने से भी लू से बचा जा सकता है.
    *धूप में निकलते वक्त छाते का इस्तेमाल करना चाहिए. सिर ढक कर धूप में निकलने से भी लू से बचा जा सकता है.
    *घर से पानी या कोई ठंडा शरबत पीकर बाहर निकलें. जैसे आम पना, शिकंजी, खस का शर्बत ज्यादा फायदेमंद है.
    *गर्मी के दिनों में हल्का भोजन करना चाहिए. भोजन में दही को शामिल करना चाहिए.
    नहाने से पहले जौ के आटे को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाकर बॉडी पर लगाकर कुछ देर बाद ठंडे पानी से नहाने से लू का असर कम होता है.
    *धूप से आने के बाद थोड़ा सा प्याज का रस शहद में मिलाकर चाटने से लू लगने का खतरा कम होता है.
    *गर्मी के मौसम में खाने के बाद गुड़ खाने से भी लू लगने का डर कम होता है.




    *टमाटर की चटनी, नारियल और पेठा खाने से भी लू नही लगती.
    *लू से बचने के लिए कच्चे आम का लेप बनाकर पैरों के तलवों पर मालिश करनी चाहिए. लू लगने और ज्यादा *गर्मी में शरीर पर घमौरियां हो जाती हैं. बेसन को पानी में घोलकर घमौरियों पर लगाने से फायदा होता है.
    *लू लगने पर जौ के आटे और प्याज को पीसकर पेस्ट बनाएं और उसे शरीर पर लगाएं. जरूर राहत मिलेगी.
    *धूप में निकलने से पहले नाखून पर प्याज घिसकर लगाने से लू नहीं लगती. यही नहीं धूप में बाहर निकलते वक्‍त अगर अाप छिला हुआ प्‍याज लेकर साथ चलेंगे तो भी आपको लू नहीं लगेगी.

    Tuesday, May 3, 2016

    मखाना के फायदे Advantages of Makhana





    मखाना एक ऐसा हर्ब है जो बड़ा स्वादिष्ट इलाज है पुरुषों की सेक्स समस्याओं का |मखाने में प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेड, फैट, मिनरल और फॉस्फोरस के अलावा भी कई पौष्टिक तत्व होते हैं जो कामोत्तेजना को बढ़ाने का काम करते हैं।



    1.  मखाने की शर्करा रहित खीर बनाकर उसमें मिश्री का चूर्ण डालकर खिलाने से प्रमेह में लाभ होता है।    मखानों को घी में भूनकर खाने से दस्त में बहुत लाभ होता है।
    2. आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा की बात करें, तो पति-पत्नी के संबंधों को भी मजबूती प्रदान करता है मखाना। निजी पलों को मजबूत बनाने में कारगर है।
    3.   एक से तीन ग्राम मखानों को गर्म पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से पेशाब के रोग दूर हो जाते हैं। 
    4. मसल्स को फिट रखना है, तो मखाना खाएं। इसमें प्रोटीन होता है।
    5. तनाव रहता हो या फिर नींद कम आती हो, तो रात को सोने से पहले मखाने का सेवन करें। सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। 
    6. लंबे समय तक जवां दिखना है, तो एंटीऑक्सीडेंट़्स से भरपूर मखाने खाएं। दरअसल ये एंटी एजिंग डाइट है। कैल्शियम से भरपूर मखाना जोड़ों के दर्द में लाभकारी है। गठिया में भी इसे खाने आराम मिलता है।
    7.  मखानों को दूध में मिलाकर खाने से दाह (जलन) में आराम मिलता है।  
    8.  मखानों के सेवन से दुर्बलता मिटती है तथा शरीर पुष्ट होता है। 
    9.  कच्चे कमल बीज को पीसकर लगाने से आमवात तथा संधिवात में लाभ होता है। 
    10. . इसमें ढेर सारा एंटीऑक्‍सीडेंट होता है जिससे झुर्रियों का असर कम हो जाता है। 
    11.  इससे ब्लड प्रेशर पर भी निंयत्रण पाया जा सकता है। यह शरीर के अंग सुन्‍न होने से बचाता है तथा घुटनों और कमर में दर्द पैदा होने से रोकता है।
    12.  . प्रेगनेंट महिलाओं और प्रेगनेंसी के बाद कमजोरी महसूस करने वाली महिलाओं को मखाना खाना चाहिये। 
    13. . मखानों का सेवन करने से शरीर के किसी भी अंग में हो रही दर्द से राहत मिलती है। कमर दर्द और घुटने में हो रही दर्द से छुटकारा पाया जा सकता है।


        Thursday, April 14, 2016

        ज्यादा पसीने के सरल उपचार Simple treatment of the sweat






        गर्मी के मौसम में पसीना आना शरीर के लिए अच्छा होता है. पसीना आने से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है. लेकिन ज्यादा पसीना आना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता.

        पसीना लगातार आए तो शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह की असहजता पैदा हो सकती है। अत्यधिक पसीने से जब हाथ, पैर और बगलें (कांख) तर हो जाती हैं तो इस स्थिति को प्राइमरी या फोकल हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है। प्राइमरी हाइपरहाइड्रोसिस से 2-3 प्रतिशत आबादी प्रभावित है, लेकिन इससे पीड़ित 40 प्रतिशत से भी कम व्यक्ति ही डॉक्टरी सलाह लेते हैं। इसके ज्यादातर मामलों में किसी कारण का पता नहीं चल पाता। हो सकता है कि यह समस्या परिवार में पहले से चली आ रही हो। यदि अत्यधिक पसीने की शिकायत किसी डॉक्टरी स्थिति के कारण होती है तो इसे सेकेंडरी हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है। पसीना पूरे शरीर से भी निकल सकता है या फिर यह किसी खास स्थान से भी आ सकता है। दरअसल, हाइपरहाइड्रोसिस से पीड़ित व्यक्तियों को मौसम ठंडा रहने या उनके आराम करने के दौरान भी पसीना आ सकता है।
        गर्मियों में ज्यादा पसीना आने की वजह से लोग बेहाल हो जाते हैं. कुछ लोगों के पसीने में ज्यादा बदबू होती है जिसकी वजह से पब्लिक प्लेस और दोस्तों के बीच शर्मिंदा होना पड़ता है.
        कुछ आसान तरीकों को अपनाकर इस परेशानी से निजात पाया जा सकता है.
        * कुछ लोग ज्यादा पसीना आने के डर से कम पानी पीते हैं जिसकी वजह से पसीने में ज्यादा बदबू आती है. पसीनेकी बदबू से निजात पाने के लिए अधिक पानी पीना चाहिए.
        * पसीने वाली जगहों के लगातार गीला रहने से बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जिसकी वजह से बदबू आने लगती है. इसलिए साफ-सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए.
        * रोज दिन में एक बार टमाटर का जूस पीने से ज्यादा पसीने से राहत मिलती है.
        * पैरों के तलवों में पसीना आने पर पानी में फिटकरी पाउडर डालकर थोड़ी देर उसमें पैर डालकर बैठने से पसीना कम आता है.
        * साबुत मूंग को हल्का भूनकर उसमें एक चम्मच बिना उबला दूध मिलाकर पेस्ट बनाकर फेस पर लगाने से पसीना नहीं आता. मूंग फेस की नमी को सोखती है, जिससे पसीना निकलना बंद हो जाता है.
        * गर्मी में बाहर जाने से पहले पसीना आने वाली जगहों पर बर्फ रगड़ने से पसीना कम आता है.
        * शरीर के जिस हिस्से पर ज्यादा पसीना आता है उस पर आलू के पीस काटकर मलने से पसीना आना कम हो जाता है.
        * चेहरे पर ज्यादा पसीना आने पर खीरे के रस को चेहरे पर लगाने से पसीने से राहत मिलती है.
        * जिन लोगों को ज्यादा पसीना आता है उन्हें खाने में नमक की मात्रा कम कर देनी चाहिए.

        Thursday, April 7, 2016

        दांतों को सेहतमंद रखने के उपाय / Measures to keep teeth healthy






        दांतों की कुछ समस्याएं जो पहले 40 की उम्र के बाद सुनने को मिलती थीं, वे कम उम्र में ही सामने आ रही हैं। तमाम जागरूकता के बावजूद आज भी हम दांतों पर उतना ध्यान नहीं देते जितना जरूरी है। यही वजह है कि युवाओं में दांतों में सड़न, सूजन व दर्द के मामले बढ़ रहे हैं। आज युवाओं में दांत से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। युवा भी सांसों में बदबू, मसूढ़ो में सूजन, दांत में सड़न जैसे रोगों से जूझ रहे हैं। जबकि ऐसे शोधों की कमी नहीं, जिनके निष्कर्ष बताते हैं कि दांतों की बीमारी हमारे दिल तक को प्रभावित करती है। बदलते वक्त के साथ हमारी जीवनशैली बदली है। मगर नहीं बदला, तो दांतों की उपेक्षा करना।
        दांतों में बढ़ती सड़न





        हमारा मुंह अनेक कीटाणुओं का घर है। ये सभी कीटाणु दांत, मसूढ़े, जीभ जैसे हिस्सों पर चिपके रहते हैं। इनमें से कुछ हमारे लिए काफी फायदेमंद भी होते हैं। मगर कई हमारे लिए मुसीबतें खड़ी करते हैं। हमें नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे ही कीटाणु दांतों में सड़न की वजह बनते हैं। दांत मूल रूप से तीन परतों से बनता है- इनामेल, डेंटिन और पल्प। इनामेल ऊपरी ठोस परत है, जबकि डेंटिन मध्य का हिस्सा है और पल्प बीच का। सड़न का हमला सबसे पहले इनामेल पर होता है और फिर धीरे-धीरे वह रिसते हुए पल्प तक पहुंचता है। चिकित्सकीय परिभाषा में कहें, तो सड़न तब बढ़ती है, जब कुछ खास तरह के कीटाणु ऐसे अम्ल पैदा करते हैं, जो दांत के इनामेल और डेंटिन को नुकसान पहुंचाते हैं। और ये बैक्टीरिया कहीं बाहर से नहीं आते, बल्कि हमारी आदतों से ही पनपते हैं।
        आदतों से मजबूर हम
        अत्याधुनिक जीवनशैली ने सहूलियतें जरूर दी हैं, मगर इसने कई बुरी आदतों की सौगात भी हमें दी है। रात को देर से सोना और नींद भगाने के लिए मीठे पेय पदार्थों का सेवन बढ़ा है। कंप्यूटर पर भी काम करते वक्त टेबल पर चाय, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक के गिलास हमने रखने शुरू कर दिए हैं। ये तमाम मीठे पेय पदार्थ एसिडिक ड्रिंक हैं। यानी ये एसिड (अम्ल) पैदा करते हैं, जो दांतों के लिए नुकसानदेह है। आज किसी भी ऑफिस में वातानुकूलन की वजह से सदैव  एक नियत तापमान बना रहता है। इस वजह से हम पहले की तुलना में पानी कम पीने लगे हैं। पानी कम पीने की वजह से थूक या लार अपेक्षाकृत कम बनता है। चूंकि ये भी प्राकृतिक एंटीबायोटिक हैं, इसलिए इसकी कमी हमें कई रोगों का शिकार बनाती है।
        सड़न की एक बड़ी वजह नशे का सेवन भी है। पान, गुटका, सिगरेट, अल्कोहल की तरफ युवाओं का रुझान बढ़ा है। वे पौष्टिक भोजन से बचने लगे हैं और उनका रुझान पिज्जा, बर्गर, नूडल्स जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेड पदार्थों की तरफ बढ़ा है। ये खाद्य वस्तुएं दांतों से चिपक जाती हैं, जो सड़न की वजह बनती हैं। रही सही कसर व्यायाम से दूर रहने की मानसिकता ने पूरी कर दी है। दांत चिकित्सकों का मत है कि इन तमाम आदतों से उम्र से पहले दांतों के गिरने की समस्या बढ़ी है।





        अब दर्द नहीं देती आरसीटी-
        दांत की तकलीफ न बढ़े, इसके लिए तमाम तरह के उपाय किए जा सकते हैं। मगर यदि सड़न की वजह से दांतों के गिरने की नौबत आ रही है, तो एक ही उपाय है, आरसीटी। आरसीटी यानी रूट कैनल ट्रीटमेंट। यह एक ऐसी विधि है, जिसके जरिये दांतों से संक्रमित हो चुके प्राकृतिक पल्प को निकालकर उसकी जगह कृत्रिम पल्प लगाया जाता है  और दांतों में मौजूद नसों के संजाल की सफाई की जाती है। यह तकनीक दांतों को नया जीवन देती है। हालांकि आरसीटी किए दांत में खून का बहाव नहीं होता और वह संवेदनहीन हो जाता है। बावजूद इसके वह बखूबी अपना काम करता है। यह करीब 30-40 वर्ष पुरानी तकनीक है, जो पिछले 15 वर्षों में खूब प्रचलित हुई है। अब इसके लिए दांतों को निकालना नहीं पड़ता।
        हाल के वर्षों तक आरसीटी को दुखदायी इलाज माना जाता था। फाइल और रीमर जैसे औजार स्टेनलेस स्टील के होते थे और मैनुअल तरीके से दांतों के अंदर की नसों को साफ किया जाता था। तब इलाज के क्रम में चार-पांच बार डॉक्टरों के पास जाना जरूरी होता था। और अगर कीटाणु का प्रभाव बढ़ जाता, तो मरीज को दर्द निवारक दवाइयां और एंटीबायोटिक दिए जाते थे। यह तकनीक करीब दो दशकों तक प्रचलन में रही। साल 2000 के दशक की शुरुआत में निकल टाइटेनियम रोटरी फाइल का उपयोग शुरू हुआ। यानी जिन सुई का इस्तेमाल पहले मैनुअल तरीके से होता था, उसके लिए मशीन आ गई।  निकल टाइटेनियम अपेक्षाकृत लचीला होता है, इसलिए दांत की भीतरी जड़ों को साफ करना आसान हो गया। नतीजतन एक या दो विजिट में ही मरीजों का काम होने लगा। इससे सफलता की दर भी 65-70 फीसदी से बढ़कर 90 फीसदी तक पहुंच गई।
        नए सुधार भी हैं जारी





        हाल के वर्षों से आरसीटी में सेल्फ एडजस्टमेंट फाइल का प्रयोग हो रहा है। असल में दातों की नसें अंडाकार होती हैं और जो औजार इस्तेमाल किए जा रहे थे, वे गोल थे। कैपिंग भी दो-तीन वर्षों में विफल हो जाती थी। नई फाइल एक तरह की जाली है। नसों के तंत्र में यह खुद-ब-खुद उसी का आकार ग्रहण कर लेती है।  इस कारण अब आरसीटी के लिए सिर्फ एक ही बार डॉक्टर के पास जाने की जरूरत होती है। इसमें दर्द भी बहुत कम होता है। एंटीबायोटिक की जरूरत भी नहीं होती। दो-तीन दिन में सामान्य तरह से भोजन कर सकते हैं।
        फिलिंग है जरूरी-
        रूट कैनल के बाद फिलिंग जरूरी है, ताकि कीटाणु फिर से हमला न बोल दें। आमतौर पर इसके लिए रबड़ की तरह का मैटीरिअल, जिसे गट्टा-परचा कहा जाता है, इस्तेमाल होता है। यह थर्मोप्लास्टिक मैटीरियल होता है। पहले यह नियत आकार में आया करता था और नसों को साफ करने के बाद इसे फिट करने के लिए जगह बनानी होती थी। मगर अब मॉल्टन रबड़ की तरह का पदार्थ उपयोग में लाया जाने लगा है, जिसे जड़ से ऊपर तक भर दिया जाता है। यह उस जगह को हमेशा के लिए सील कर देता है। अब अगर आरसीटी के बाद दांतों पर उम्दा किस्म के क्राउन लगा दिए जाएं, तो दांत की आयु दस-पंद्रह वर्षों तक बढ़ जाती है।
        इलाज अपेक्षाकृत आसान होने के बावजूद बेहतर यही है कि दांतों की सड़न को शुरुआती दौर में ही रोक लिया जाए। इसके लिए कुछ आदतें हमें अपने जीवन में भी उतारनी होंगी। सबसे पहले सहीब्रश करने की  तकनीक को अपनाना चाहिए। दो दांतों के बीच की जगह को अच्छे से साफ करने के साथ ही कभी कभी  माउथ वॉश का इस्तेमाल जरूरी है। इसी तरह, रात में खाना खाने के बाद ब्रश करना चाहिए। बेहतर है कि हर भोजन के बाद ढंग से कुल्ला अवश्य करें। इससे दांतों पर चिपके भोजन साफ हो जाते हैं। जरूरत दांतों की कतार सीधी रखने की भी है। चूंकि जीभ एक तरह का कपड़ा है, जो दांतों को साफ रखता है, इसलिए यदि दांत सीधे होंगे, तो गाल व जीभ स्वाभाविक तौर पर उसकी सफाई करेंगे। अगर 13-14 वर्ष तक दांतों की कतार सीधी नहीं हुई हो, तो दांत चिकित्सक  से सलाह लें। 

        Sunday, March 20, 2016

        लोबिया फली (चवली की फली) के फायदे Benefits of Black Eye Peas










        लोबिया जिन्हे हिंदी में चवली (चवली की फली) के नाम से जाना जाता है ये एक प्रकार की फली है| ब्लैक आई पीज के नाम से जानी जानी वाली ये फलियां भारत के अधिकांश घरों में इस्तेमाल की जाती हैं|
        इनमें शानदार टेस्ट और फ्लेवर होने के साथ ही ये पोषक तत्वों से भरपूर हैं जो शरीर के लिए जरूरी हैं| 6 प्रमुख कारण जो लोबिया को टेस्ट और स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर बनाते हैं|आइये जानते हैं लोबिया को खाने से सेहत को होने वाले लाभ।

        दालें न्यूट्रीशन का प्रमुख स्त्रोत हैं. लोबिया की दाल (Lobhia Dal) में ये और भी अधिक होता है. बढ़ते बच्चों के लिये तो लोबिया की दाल (Black Eye Beans ) और भी अधिक लाभप्रद है

        लोबिया का सलाद आप खाने के समय या फिर सुबह नाश्‍ते के समय बना सकती हैं। लोबिया में बहुत सारा प्रोटीन और विटामिन होता है जो कि हर किसी के लिये फायदेमंद है। अगर आप डाइटिंग कर रहे हैं तो भी आपको ज्यादा इधर-उधर देखने की जरुरत नहीं है , लोबिया सलाद आपकी हर जरुरत को पूरा करेगा।





        एक डाईजेस्टीव के रूप में मददगार लोबिया में फाइबर और प्रोटीन की अधिकता होती है जो कि पेट पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और पाचन क्रिया में मदद करती है| फाइबर की उपस्थिति पेट से सम्बंधित बिमारियों को दूर रखती है, पेट को आराम प्रदान करती है और भोजन को बेहतर तरीके से पचाती है|

        ब्लैक आई पीज ब्लड कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करने के लिए जानी जाती हैं और कई प्रकार की दिल की बिमारियों को दूर रखती हैं| पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे फ्लेवोनॉयडस और लिग्निन (एक साइटोस्ट्रोजिन) की उपस्थिति लोबिया को हृदय से सम्बंधित बिमारियों को दूर करने में उपयोगी बनती है|

        संक्रमण से बचाव विटामिन ए जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स का खजाना होने के कारण ये फलियां कई प्रकार की बिमारियों को दूर रखती हैं| ये फलियां शरीर को स्वस्थ रखने में उपयोगी हैं क्योंकि ये शरीर से विभिन्न विषाक्त पदार्थों और हानिकारक ऑक्सीजन रहित तत्वों को बाहर करने में मदद करती हैं|

        स्वस्थ त्वचा के लिए उपयोगी स्किन को सुचारू रूप से रिपेयर करते हुए लोबिया त्वचा को हेल्दी रखती हैं| इन फलियों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट में विटामिन ए और सी की उपस्थिति होती है जो कि फ्री रेडिकल्स से स्किन को हुए नुकसान को दूर करती हैं|




        मधुमेह के रोगियों के लिए बेहतर लोबिया का ग्लायसेमिक इंडक्स अन्य सामान्य इस्तेमाल की जाने वाली फलियों और दालों के मुकाबले कम होता है| ऐसे खाद्य जिनका ग्लायसेमिक इंडक्स कम होता है, वे ब्लड शुगर को सामान्य रखते हैं इसलिए ये डाईबिटीज के पेशेंट्स के लिए अच्छा आहार है|

        वजन कम करने में मददगार इन ब्लैक आई पीज को खाने से कैलोरी कम होती है इसलिए ये वजन कम करने की दृष्टि से एक अच्छा आहार है| लोबिया डाइटरी फाइबर का एक अच्छा स्त्रोत है जिससे आपका पेट ज्यादा समय तक भरा रहता है|



        Saturday, March 19, 2016

        अनार खाने के फायदे Benefits of eating pomegranate




        एक अनार सौ बीमार.. ये मुहावरा काफी पुराना है और सही भी है। अनार एक ऎसा फल है जिससे सौ तरह की समस्याओं का समाधान हो सकता है। अनार के दाने या जूस दोनो ही फायदा करते हैं अपने टेस्ट के अनुसार कुछ भी ले सकते हैं।
        अनार के बहुत सारे स्वास्थ्य लाभ है। ये विटामिन्स का बहुत अच्छा स्त्रोत है, इसमें विटामीन ए, सी और ई के साथ-साथ फोलिक एसिड भी होता है। इसमें एंटी आक्सीडेंट, एंटी वाइरल की विशेषता पाई जाती है।
        इसको हम स्वास्थ्य का खजाना कह सकते हैं। नीचे इसके ऎसे ही चमत्कारी लाभ हम आपको बता रहे हैं।

        *चिकित्सा अध्ययनों ने ये साबित हुआ है कि अनार फेफड़ो के कैंसर को बढने से रोकता है|
        *अनार का जूस रोज़ पीने से ये शरीर में PSA के स्तर को कम करता है और कैंसर से लड़ने वाली कोशिकाओं की मदद करता है|- खून की कमी को दूर करने के लिए अनार का जूस सबसे अच्छा माना जाता है।
        *अनार का जूस कम ब्लड प्रेशर वाले लोगो के लियें बहुत फायदा करता है|
         *दिल की बीमारियों के लिए भी अनार को बहुत पौष्टिक माना जाता है।
        *अनार के छिलके को पीसकर, उससे चेहरे पर मसाज करने से डेड स्किन साफ हो जाती है. साथ ही ब्लैकहेड्स की समस्या भी दूर हो जाती है. आप चाहें तो इसे ब्राउन शुगर और हनी के साथ मिलाकर भी लगा सकते हैं.
        कैंसर से बचाव करने में भी अनार कारगर होता है।




        *जो लोग प्रोस्टेट और ब्रेस्ट कैंसर से परेशान हैं अगर वो अनार का जूस रोज़ पियें तो उनका कैंसर बढने से रुक सकता है|
        *इसके साथ ही यह हडि्डयों को मजबूत करने, ब्लड सर्कुलेशन को सही रखने, वजन कम करने में भी बहुत लाभकारी होता है।
        *अनार, त्वचा की ऊपरी परत को सुर‍क्षित करने का काम करता है. साथ ही ये कोशिकाओं के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जिससे चेहरे पर निखार आता है.
        * अनार खाने से शरीर में खून का प्रवाह ठीक तरह से होता है। इसके साथ-साथ ये हर्ट अटेक और हर्ट स्ट्रोक को भी ठीक कर देता है।
        *हाल ही में 58 लोगों पर अध्ययन किया गया जिसमें 21 से 64 वर्ष तक के लोगों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान महिला और पुरूष दोनों को ही लगातार 15 दिन तक अनार का जूस पीने के लिए कहा गया। इसमें पाया गया कि जो स्‍त्री-पुरूष रोजाना अनार का जूस पी रहे थे उनमें सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन की मात्रा बहुत बढ़ी हुई थी।
        *गर्भवती महिला को अनार का जूस पीने से उसका बच्चा स्वस्थ पैदा होता है। उसके होने वाले बच्चे को कम वजन जैसी बीमारी का सामना नहीं करना पड़ता।
        *अनार में बढ़ती उम्र के लक्षणों को कम करने का विशेष गुण होता है. हर रोज अनार का जूस पीने से चेहरे पर निखार आता है. साथ ही ये कील-मुंहासों की समस्या में भी फायदेमंद है.

         *इसका जूस अधिक उम्र के लोगो को होने वाली अलजाईमर  नामक बीमारी को रोकता है।
        *अनार का जूस धमनियों  की  रक्षा करता है! यह धमनियों  में पट्टिकाओं को बनने से रोकता है|
        *ये शरीर में बेकार केलोस्ट्रोल को कम करता है और अच्छे केलोस्ट्रोल को बढ़ाता है|
        * इसका जूस अधिक उम्र मे  झुर्रियां रोकने में मदद करता है। इसका जूस पीने से चेहरा चमकता और जवान बना रहता है और ये बुढ़ापा भी जल्दी आने नहीं देता।
        * इसका जूस पीने से शरीर की गर्मी भी कम होती है।
        *आमतौर पर लोग अपनी सेक्स क्षमता बढ़ाने के लिए वियाग्रा का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं वियाग्रा का काम अनार भी कर सकता है। हाल ही में हुए शोध में इस बात का खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं की मानें तो रोजाना अनार का जूस पीने से सेक्स क्षमता में उतना ही इजाफा होता है, जितना कि वियाग्रा दवा के सेवन से।

        Thursday, March 17, 2016

        केला खाने के फायदे Benefits of eating bananas







        केला सेहत के लिए बहुत लाभदायक है। रोज एक केला खाना तन-मन को तंदुरुस्त रखता है। केला शुगर और फाइबर का बेहतरीन स्रोत होता है। केले में थाइमिन, नियासिन और फॉलिक एसिड के रूप में विटामिन ए और बी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होता है। केले को ऊर्जा का अच्छा स्रोत माना जाता है। साथ ही इसमें पानी की मात्रा 64.3 प्रतिशत, प्रोटीन 1.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 24.7 प्रतिशत तथा चिकनाई 8.3 प्रतिशत होती है। आइए हम आपको बताते हैं कि केला खाने के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं।;


        दिल के लिए – दिल के मरीजों के लिए केला बहुत फायदेमंद होता है। हर रोज दो केले को शहद में डालकर खाने से दिल मजबूत होता है और दिल की बीमारियां नहीं होती हैं।





        नकसीर के लिए – अगर नाक से खून निकलने की समस्या है तो केले को चीनी मिले दूध के साथ एक सप्ताह तक इस्तेमाल कीजिए। नकसीर का रोग समाप्त हो जाएगा।
        वजन बढ़ाने के लिए – वजन बढ़ाने के लिए केला बहुत मददगार होता है। हर रोज केले का शेक पीने से पतले लोग मोटे हो सकते हैं। इसलिए पतले लोगों को वजन बढाने के लिए केले का सेवन करना चाहिए।

        गर्भवती के लिए –गर्भावस्था  के दौरान महिलाओं को सबसे ज्यादा विटामिन व मिनरल्स की आवश्यकता होती है। इसलिए गर्भवती को यह सलाह दी जाती है कि वह अपने आहार में केला अवश्य शामिल करें।
        बच्चों के लिए – बच्चों के विकास के लिए केला बहुत फायदेमंद होता है। केले में मिनरल और विटामिन पाया जाता है जिसका सेवन करने से बच्चों का विकास अच्छे से होता है। इसलिए बच्चों की डाइट में केले को जरूर शमिल करना चाहिए।
        * मैग्निशियम की वजह से केला जल्दी पच जाता है और मेटोबोलिस्म (उपापचय) को दुरुस्त रखता है, कोलेस्ट्रोल कम करता है|
        * केला ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखता है |
        * केले में आसानी से रक्त में मिलने वाला आयरन तत्व होता है, केला खाने से खून में हीमोग्लोबिन बढ़ता है इसलिए एनीमिया (रक्ताल्पता) के रोगियों को केला अवश्य खाना चाहिए|












        * दुनिया में केले की 300 से भी ज्यादा किस्मे है, केले की लम्बाई 4 इंच से 15 इंच तक पाई जाती है.|

        *ज्यादा केला खाने से अपच हो गयी होतो इलायची खाएं, आराम मिलेगा|

        * केले पर पड़ने वाले भूरे दाग का मतलब होता है कि केले का स्टार्च पूर्णतः प्राकृतिक शर्करा में बदल चुका है, ऐसा केला आसानी से पचता है|

        * केला पोषक तत्वों का खजाना है, केले में थाईमिन, रिबोफ्लेविन, नियासिन, फोलिक एसिड, विटामिन A, B, B6, आयरन, कैल्शियम, मैगनिशियम, पोटैशियम जैसे तत्व पाए जाते हैं|

        *केले का प्रोबायोटिक बैक्टीरिया पाचन भी ठीक करता है, डायरिया में ये खास फायदेमंद है, केले में पाए जाने वाला पेसटिन तत्व कब्ज को दूर रखता है|

        * अपनी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए केला का सेवन अवश्य करें, इसमें पाए जाने वाला कैरोटिनॉएड एंटीओक्सिडेंट रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है और आपको संक्रमण से बचाता है|
        * केला मधुर, पाचक, वीर्यवर्धक, मांस की वृद्धि करने वाला, भूख-प्यास शांत करने वाला होता है|
        * हड्डी मजबूत बनाना होतो केला प्रतिदिन खाइए ,केले में खास प्रोबायोटिक बैक्टीरिया होता है जिसका कार्य होता है आपके खाने से कैल्शियम को सोखना और हड्डियों को मजबूत करना|
        *. केला में पोटैशियम भरपूर पाया जाता है जोकि रक्त-संचार ठीक रखता है जिससे ब्लड-प्रेशर ठीक रहता है|
        * परीक्षा से पहले केला खाना अच्छा होता है क्योंकि इसमें पाए जाने वाला पोटैशियम दिमाग को चुस्त और अलर्ट रखता है|
        * बच्चों को केला अवश्य खिलाएं क्योंकि यह पोषक तत्वों ,विटामिन ,खनिज तत्वों का खजाना है जिसकी बढ़ते बच्चों को खास आवश्यकता होती है |
        * बवासीर के उपचार के लिए केले के बीच में चीरा लगा के एक चने के बराबर देसी कपूर रख कर केला खा लें, लाभ होगा|
        * खाने के बाद प्रतिदिन केला खाने से मांसपेशियां मजबूत होती है, पाचन सुगम होता है.
        *मुलायम, चमकदार बाल चाहियें हो तो केला में अवोकेडो या कोको पाउडर, नारियल का दूध मिलाकर बालों में 15 मिनट लगे रहने दें|
        *केला शरीर में हर प्रकार की सूजन को दूर करता है|
        * जले हुए स्थान पर केला मसल कर लगायें, जलन शांत होगी|
        * ड्राई आँखों की समस्या में केले का सेवन अवश्य करें, यह सोडियम का स्तर सामान्य करता है और कोशिकाओं में द्रव प्रवाहित करता है|
        *चोट से खून बहना न रुके तो केले के डंठल का रस लगायें|
        *पित्त शांत करने के लिए पका केला देशी घी के साथ खाएं|
        * केला पेट के अल्सर के लिए बहुत राहत देता है, यह पेट में मोटी रक्षक म्युकस लेयर बनाता है जोकि घाव को ठीक करने में सहायक होती है,|साथ ही प्रोटीज तत्व पेट में पाए जाने वाले अल्सरकारक बैक्टीरिया से मुक्ति दिलाता है|





        *. 2 केला दही के साथ खाने से पेचिश, दस्त में आराम मिलता है.
        * शारीरिक श्रम करने वालो को केला सेवन मांशपेशियों की जकड़न से बचाता है.
        * केला किडनी के कैंसर से रक्षा करता है.
        *रूखी त्वचा के लिए पका केला मसल कर चेहरे पर लगायें, 20-25 मिनट लगे रखने दें फिर हलके गर्म पानी से धो लें, चेहरा मुलायम, स्निग्ध हो जायेगा.
        *फटी एड़ियों के उपचार के लिए केले का गूदा एड़ियों पर 10 मिनट लगे रखने दें फिर धो लें.
        *कील, मुहांसों की समस्या से निजात पाने के लिए एक केला को मसल कर, शहद, नींबू रस मिलाकर चेहरे पर लगायें, लाभ होगा. 34. मुंह में छाले के उपचार के लिए गाय के दूध की दही के साथ केला सेवन करें.
        * कच्चा केला मसल कर उसमे दूध मिलाकर चेहरे पर लगायें, चंमक और निखार आयेगा.
        *. केला विटामिन B6 का एक बढ़िया स्रोत है जोकि नर्वस सिस्टम को सबल बनाता है, इसके अतिरिक्त याददाश्त और दिमाग तेज करता है.
        * केला एसिडिटी दूर करता है और पाचन प्रक्रिया ठीक रखता है.
        का स्तर बढ़ा कर आपको शक्ति देगा
        *केला जठराग्नि बढाता है साथ ही आमाशय, आंतो की सूजन दूर करने में भी केला लाभप्रद माना जाता है.
        *शराब ज्यादा पीने की वजह से हुए हैंगओवर को ठीक करने के लिए केला-शेक पियें.
        * दिल को मजबूत रखना होतो, 2 केला शहद मिला कर खाएं.
        * वजन बढ़ाने के लिए केला खास असरकारक होता है इसलिए केला ,दूध ,शहद और चुटकी भर इलायची पाउडर मिलाकर प्रतिदिन सुबह केला-शेक पियें या केला खाकर ऊपर से दूध पियें.

        Sunday, March 13, 2016

        हींग के फायदे The advantages of asafoetida










        हींग पेट की समस्याओं को दूर करने के लिए हमेशा से ही कारगर साबित हुआ है. जानिए, एक चुटकी हींग से किन-किन समस्याओं से आसानी से निजात पाई जा सकती है.
        थोडी सी हींग पीसकर पानी में घोल लें और शीशी में भर लें। इसे सूंघने से सर्दी-जुकाम, सिर का भारीपन व दर्द में आराम मिलत है। पीठ, गले और सीने पर पानी का लेप करने से खांसी, कफ, निमोनिया और श्वास कष्ट में आराम मिलता है। हींग सूंघने से जुकाम से बंद हुई नाक खुल जाती है।
        पेट की समस्याओं को करता है दूर- पेट की होने वाली कई तरह की दिक्कतों को हींग के सेवन से ठीक किया जा सकता है. हींग में मौजूद तत्वों जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स से हाजमें की दिक्कत, अपसेट स्टमक, गैस्ट्रिक प्रॉब्लम, फूड प्वॉइजनिंग और पेट में कीडें जैसी समस्याओं को भी ठीक किया जा सकता है|




        अपने फूड या करी में एक चुटकी हींग डालकर खाएं. इसके अलावा आधे गिलास पानी के साथ एक चुटकी हींग खाना खाने के बाद लेने से भी आराम मिलता है|


        सांस की बीमारियों का इलाज- हींग से अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, ड्राई कफ, कोल्ड जैसी दिक्कतों को भी ठीक किया जा सकता है. चेस्ट कंजेशन को ठीक करने में भी हींग कारगर है|

        यदि दाद हो गया हो तो थोडी सी हींग पानी में घिसकर प्रभावित अंग पर लगाएं, इससे दाद ठीक हो जाते हैं। त्वचा के रोगों में हींग बहुत ही प्रभावशाली होती है।
        * हींग को पानी में डालकर पीस लें और इसके तैयार पेस्ट को छाती पर लगाने से कफ से निजात मिलेगी. आप चाहे तो आधी चम्मच हींग पाउडर को सूखी अदरक पाउडर में दो चम्मच शहद के साथ मिलाएं. इस मिक्चर को दिन में तीन बार ड्राई कफ, ब्रॉन्काइटिस और अस्थमा से बचने के लिए पीएं.|

        *छाछ में या भोजन के साथ हींग का सेवन करने से अजीर्ण वायु, हैजा, पेट दर्द, आफरा में आराम मिलता है।
        *पेट पर विशेषकर नाभि के आसपास गोलाई में इस पानी का लेप करने से पेट दर्द, पेट फूलना व पेट का भारीपन दूर हो जाता है।
        *पीरियड्स में दिक्कत- हींग महिलाओं के लिए तो वरदान है. पीरियडस के दर्द से निजात पाने के लिए अनियमित पीरियड्स की समस्या को दूर करने के लिए और पीरियडस के दौरान अधिक ब्लड आने की समस्या से बचने के लिए हींग का सेवन करे|
         *एक चुटकी हींग को आधे चम्मच मेथी पाउडर और एक चुटकी नमक के साथ एक कप छाछ में मिलाएं. इस मिक्चर को रोजाना दिन में दो से तीन बार एक महीने के लिए पीएं. इससे पीरियड्स की हर समस्या दूर हो जाएगी|




        *हींग के चूर्ण में थोडा सा नमक मिलाकर पानी के साथ लेने से लो ब्लड प्रेशर में आराम मिलता है।
        *सिरदर्द को करता है दूर- जब भी आपको कोल्ड की वजह से सिरदर्द हो, माइग्रेन हो तो हींग निश्चित तौर पर आपकी ये समस्या दूर कर सकता है. हींग में मौजूद सूजन विरोधी तत्वों से सिरदर्द आसानी से कम हो जाता है.
        विधीः एक चुटकी हींग को डेढ़ कप पानी में डाले और 15 मिनट तक उबालें. इस मिश्रण को कुछ दिनों तक पीने से सिरदर्द गायब  हो जाएगा.
        *कांटा या कांच चुभने पर हींग का घोल उस जगह लगाने पर कुछ ही समय में आराम आ जाता है।
        *दांत में दर्द- एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट तत्व होने से हींग से दांत के दर्द और इंफेक्शन को भी दूर किया जा सकता है. यहां तक की मसूडों में दर्द और गम्स ब्लीडिंग को भी ठीक किया जा सकता है|

        *दांत के दर्द से निजात पाने के लिए दर्द वाले हिस्से में एक बहुत छोटा टुकड़ा हींग रख दें. आप चाहे तो हींग को हल्के गुनगुने पानी में डालकर कुल्ला भी कर सकते हैं.
        भुनी हुई हींग को रूई के फाहे में लपेटकर दाढ़ पर रखने से राहत मिलती है। दांत में कीडा लगने पर भी इससे आराम मिलता है।
        *कान में दर्द- इंफेक्शन के कारण कान में होने वाले दर्द से भी हींग से छुटकारा पाया जा सकता है|

        * नारियल तेल गर्म कर लें. हींग के कुछ छोटे टुकड़े इस तेल में डालें और गलने तक तेल गर्म करें. जब ये तेल हल्का गर्म हो तो कानों में ईयरड्रॉप्स के रूप में डालें.
        पसलियों में दर्द होने पर हींग रामबाण की तरह से काम करता है। ऎसे में हींग को गरम पानी में घोलकर लेप लगाएं, सूखने पर प्रक्रिया दोहराएं। आराम मिलेगा।
        नवजात में होने वाली गैस प्रॉब्लम को ठीक करना है तो हींग को हल्के गुनगुने पानी में गर्म करके बच्चे की नाभि पर लगाएं. लेकिन ध्यान रहे बच्चे को पेट दर्द गैस्ट्रिक प्रॉब्लम की वजह से हो तभी ऐसा करें|





        *कैंसर- हींग एक पॉवरफुल एंटीऑक्सी‍डेंट है. ये शरीर में कैंसर के सेल्स को बढ़ने से रोकता है.
        *यदि नासूर हो गया है और घाव सडने लगता है तो हींग को नीम के पत्तों के साथ पीसकर घाव पर लगाने से कुछ ही दिनों में आराम आ जाता है।
        *उत्तेजना की समस्या हो या नपुंसकता का इलाज करना हो पुरुषों के लिए हींग रामबाण हैं|
        * एक चौथाई चम्मच हींग को थोड़े से मक्खन में भून लें. ठंडा होने पर इसमें बरगद के पेड़ की छाल और थोड़ा सा शहद मिलाओ. इस मिश्रण  को रोजाना 40 दिन तक सुबह लें. आपको अपनी स्थिति  में सुधार दिखेगा|
        *कीट दंश - अगर आपको किसी कीड़े ने काट लिया है और दर्द से निजात पाना चाहते हैं तो हींग का इस्तेमाल करें.
        *हींग का पाउडर बनाकर उसमें पानी मिलाएं. इसे दर्द वाली जगह पर लगाएं. सूखने दें और बाद में हटाएंगे तो दर्द से राहत मिलेगी. इस पेस्ट को बार-बार लगाए|
        *प्रसव के उपरांत हींग का सेवन करने से गर्भाशय की शुद्धि होती है और उस महिला को पेट संबंधी कोई परेशानी नहीं होती है।
        * जो लोग उच्च रक्तचाप  के लिए दवाईयां ले रहे हैं या ब्लड क्लॉटिंग की समस्या से जूझ रहे हैं उन्हें हींग का सेवन नहीं करना चाहिए. साथ ही गर्भवती महिलाओं को भी हींग नहीं लेना चाहिए|

        Saturday, March 12, 2016

        शिमला मिर्च खाने के फायदे The advantages of Shimala chili










        आम तौर पर सब्जी, नूडल्स और गार्निशिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली शिमला मिर्च को कई लोग सलाद के रूप में भी खाना पसंद करते हैं. शिमला मिर्च में कैलोरी न के बराबर होती है जिससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ नहीं पाता है. इसके अलावा शिमला मिर्च के और भी ढेरों फायदे हैं:शिमला मिर्च एक ऐसी सब्जी है जो कि न सिर्फ सलाद के रूप में बल्कि सब्जी बनाकर भी बहुत चाव से खाई जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ये सब्जी केवल स्वाद ही नहीं है इसके अलावा इसे खाने के कुछ स्वास्थ्य वर्धक फायदे भी हैं। आज हम आपको परिचित करवाने जा रहे हैं शिमला मिर्च खाने के कुछ ऐसे ही अनोखे गुणों से.....


        शिमला मिर्च स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जियों में से एक है। इससे बनने वाली हर डिश बेहद स्वादिष्ट और लाजबाव होती है इसमें कई पोषक तत्व , विटामिन सी, फाइबर और एंटी आक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते है। इसमें मिनरल्स भी काफी मात्र मे है। इसे अपनी डाइट में शामिल करने से कई स्वस्थ्य लाभ होते है।

















        पाचन तंत्र मजबूत बनाएं इसमें पाचन से संबन्धित समस्याओं को दूर करने के कई गुण होते है। इसे खाने से पाचन क्रिया ठीक जाती है और पेट में दर्द, गैस, कब्ज आदि की समस्याएँ दूर हो जाती है। इसके सेवन से पेट में होने वाले छालों की तकलीफ भी दूर हो सकती है।


        मधुमेह में राहत शिमला मिर्च के सेवन से डायबटीज में राहत मिलती है और शरीर में रक्त शर्करा का लेविल सही रहता है। इसमें कैलोरी की मात्रा कम होती है जिससे शरीर में ज्यादा कैलोरी का संचय नहीं होता है। इसके सेवन से शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा ज्‍यादा नहीं होती

        इम्यूनिटी बढ़ाने में कारगर

        विटामिन सी से भरपूर होने की वजह से संक्रामक रोगों से लड़ने में भी मदद करता है. ये रोग-प्रतिरक्षा को भी बढ़ाने में कारगर है. इंफेक्शन, अस्थमा में भी ये फायदेमंद है. यह श्वेत रक्त कणो को इंफेक्शन से लडऩे में उत्तेजित करती है। इससे इम्युन सिस्टम मजबूत होता है। साथ ही शिमला मिर्च सास संबंधित समस्याएं जैसे फेफड़े का इंफेक्शन, अस्थमा आदि से बचाव करती है।


        बॉडी का मेटॉबालिज्म बढ़ाए-यह शरीर में समाए ट्राइग्लिसराइड के लेवल को कम करती है, जिससे कैलोरी को बर्न करने में मदद मिलती है।अगर आप वजन घटाने को लेकर फिक्रमंद हैं तो शिमला मिर्च आपके लिए बहुत ही अधिक फायदेमंद है. इसमें बहुत ही कम मात्रा में कैलोरी होती है जो वजन घटाने में मददगार है. इससे मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया बढ़ती है. कैलोरीज बर्न करने के साथ ही ये कोलेस्ट्राल का स्तर बढ़ने नहीं देता है.


        एंटीआक्सीडेंट
        की तरह काम करता है-शिमला मिर्च में विटामिन ए और सी होता है जो कि बहुत ही ताकतवर एंटीऑक्सीडेंट हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट शरीर को हार्ट अटैक, ओस्टीयोपोरोसिस , अस्थमा और मोतियाबिंद से लडऩे में सहायता करता है|

        कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करता है- इसके अंदर बिल्कुल भी कैलोरी नहीं होती इसलिए यह खराब कोलेस्ट्रॉल को नहीं बढ़ाती। साथ ही यह वजन को संतुलित करने मे हितकारी है |इसमें दिल को ठीक रखने वाले कई गुण होते हैं। इसके सेवन से ह्दय की धमनियां भी बंद नहीं होती है क्योंकि इसमें कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा की बहुत कम होती है।

        दर्द निवारक- इसमें एक तत्व पाया जाता है, जो कि माना जाता है कि वह दर्द को त्वचा से स्पाइनल कॉर्ड तक जाने से रोक देती है। इससे दाद, नसों के दर्द के इलाज आदि में प्रयोग किया जा सकता है।शिमला मिर्च का प्रमुख तत्व केयेनिन होता है जो शरीर में दर्द के प्रभाव को घटाने का काम करता है। इसके सेवन से गठिया की समस्या से भी राहत मिलती है। पेनकिलर ट्यूब या जेल में भी यही तत्व मौजूद होता है, जिसे लगाते ही दर्द गायब हो जाता है।





        अस्थमा और कैंसर में फायदेमंद-शिमला मिर्च को कई पुराने सालों से अस्थमा और कैंसर जैसी बीमारियों को ठीक करने के लिये प्रयोग किया जाता जा रहा है। शिमला मिर्च में पाए जाने वाले विटामिन सी, विटामिन ए और बीटा कैरोटीन भरा पड़ा होता है। इसीलिए इन बीमारियों में फायदेमंद होती है।

        Friday, March 11, 2016

        दाल चावल खाने के फायदे Benefits of eating rice , pulses




        आमतौर पर  लोगों के घर में हर रोज दाल-चावल बनता है| . कुछ लोगों के घर में ये दोपहर का मुख्य आहार होता है तो कुछ के घर में रात का. पर दाल-चावल एक ऐसी चीज है जिसे हम रोज खा सकते हैं|




        दाल-चावल को पसंद किए जाने की बहुत सी वजहें हैं. पहली तो इसका स्वाद. सादा और मीठास भरा. दाल-चावल को पसंद किए जाने की दूसरी और सबसे बड़ी वजह ये है कि ये झटपट तैयार हो जाता है. कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे होते हैं जो केवल एक वर्ग विशेष को ही पसंद आते हैं, पर दाल-चावल एक ऐसी चीज है जो हर वर्ग  के लोग चाव से खाते  है|

        दाल में भरपूर मात्रा में प्रोटीन,और फाइबर होता  है और चावल  मे पर्याप्त  कार्बोहाइड्रेट  होता है| ऐसे में ये एक हेल्दी डाइट है.|

        दाल-चावल खाने के फायदे :-
        1. दाल में कई ऐसे अमीनो एसिड्स होते हैं जो चावल में नहीं होते. ऐसे में जब आप दाल और चावल साथ खाते हैं तो आपको ये सारे पोषक तत्व मिल जाते हैं.






        2. दाल और चावल दोनों में ही फाइबर की भरपूर मात्रा होती है.ये एक सुपाच्य व्यंजन है. फाइबर की मौजूगी से पाचन क्रिया बेहतर बनती है. अगर आप सफेद चावल की जगह ब्राउन राइस का इस्तेमाल करते हैं तो ये और भी फायदेमंद है. ब्राउन राइस में सेलेनियम, मैंगनीज, कॉपर, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम जैसे आवश्यक लवण पाए जाते हैं.

        3. मांसाहार करने वालों में प्रोटीन की कमी नहीं होने पाती लेकिन शाकाहारी लोगों के लिए दाल ही प्रोटीन का प्रमुख माध्यम है. इसमें मौजूद फोलेट दिल को सुरक्षित रखने में भी मददगार होता है.

        4. ऐसा माना जाता है कि चावल खाने से वजन बढ़ जाएगा. पर ऐसा नहीं है. दाल-चावन खाने से काफी देर तक पेट भरे होने का अहसास होता है. जिससे दिनभर कुछ-कुछ खाने की जरूरत नहीं पड़ती और एक्स्ट्रा कैलोरी जमा नहीं होने पाती है.

        Monday, March 7, 2016

        पेट दर्द मे घरेलू उपाय : Home Remedies to cure upset Stomach









        वैसे तो पेट दुखने के अलग-अलग कई कारण हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर पेट दर्द का एक मुख्य कारण अपच, मल सूखना, गैस बनना यानी वात प्रकोप होना और लगातार कब्ज बना रहना भी है। पेट दर्द को दूर करने के लिए कुछ घरेलू उपाय है, जो दर्द तो दूर करते है, साथ ही साथ पेट की क्रियाओं को भी ठीक करते है।अगर आपका पेट खराब हो गया है और आप दवाई खाने से बचना चाहते हैं तो इन घरेलू उपायों का अपनाकर आप राहत पा सकते हैं. ये उपाय पूरी तरह घरेलू हैं इसलिए इन पर भरोसा करने में कोई नुकसान भी नहीं है-

        *सेब का सिरका
        बात जब पेट दर्द में घरेलू उपाय की हो तो सेब के सिरके से बेहतर कुछ भी नहीं. सेब के सिरके में पेक्ट‍िन की पर्याप्त मात्रा होती है जिससे पेट दर्द और मरोड़ में राहत मिलती है. इसका अम्लीय गुण खराब पेट के संक्रमण को ठीक करने में भी कारगर है.|एक चम्मच सिरके को एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से जल्दी आराम होता है|.
        *अगर पेट दर्द एसिडीटी (अम्लता) से हो रहा हो तो पानी में थोड़ा सा मीठा सोडा डालकर पीने से फ़ायदा होता है।एक चम्मच शुद्ध घी में हरे धनियें का रस मिलाकर लेने से पेट की व्याधि दूर होती है।
        *अदरक
        उदर मे असुविधा में अदरक का इस्तेमाल काफी कारगर होता है. इसमें एंटीफंगल और एंटी-बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं, जो पेट दर्द में राहत देता है. एक चम्मच अदरक पाउडर को दूध में मिलाकर पीने से आराम मिलता है.
        *अदरक का रस एक चम्मच, नींबू का रस 2 चम्मच लेकर उसमें थोडी सी शक्कर मिलाकर प्रयोग करें। पेट दर्द में लाभ होगा। दिन में 2-3 बार ले सकते हैं।
        *अदरक का रस और अरंडी का तेल प्रत्येक एक-एक चम्म च मिलाकर दिन में 3 बार लेने से पेट दर्द दूर होता है।
        *मेथी के बीज पानी में भिगोएं। पीसकर पेस्ट बनाएं। और इस पेस्ट को 200 ग्राम दही में मिलाकर दिन में दो बार लेने से पेट के विकार नष्ट होते हैं।
        *जीरा-अगर आपको लगातार दस्त हो रहे हों तो एक चम्मच जीरा चबा लें. अमूमन सभी घरों में मिलने वाला ये मसाला दस्त में काफी फायदेमंद है. जीरा चबाकर पानी पी लेने से दस्त बहुत जल्दी रुक जाते हैं.




        *पेट दर्द निवारक चूर्ण बनाएं। इसके लिए भुना हुआ जीरा, काली मिर्च, सौंठ, लहसून, धनिया, हींग सूखी पुदीना पत्ती, सबकी बराबर मात्रा लेकर बारिक चूर्ण बनाएं। इसमें थोडा सा काला नमक भी मिलाएं। खाने के बाद एक चम्मच थोड़े से गर्म पानी के साथ लें। पेट दर्द में आशातीत लाभकारी है।बिना दूध की चाय पीने से भी कुछ लोग पेट दर्द में आराम महसूस करते हैं।
        *दही-पेट दर्द में दही का इस्तेमाल काफी फायदेमंद रहता है. दही में मौजूद बैक्टीरिया संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जिससे पेट जल्दी ठीक होता है. साथ ही ये पेट को ठंडा भी रखता है|
        *बेल का शरबत  बेल फाइबर से युक्त होता है और इससे बना शरबत भी काफी गाढ़ा और फाइबर युक्त होता है. फाइबर पेट को बांधने का काम करता है, जिससे दस्त जल्दी रुक जाते हैं||
        *आयुर्वेद के अनुसार हींग दर्द निवारक और पित्तव‌र्द्धक होती है। छाती और पेट दर्द में हींग का सेवन बेहद लाभकारी होता है। छोटे बच्चों के पेट में दर्द होने पर एकदम थोडी सी हींग को एक चम्मच पानी में घोलकर पका लें। फिर बच्चे की नाभि के चारों लगा दें। कुछ देर बाद दर्द दूर हो जाता है।

        * पुदीना पुदीना एक बेहद हेल्दी हर्ब है. सदियों से इसका प्रयोग  पेट से जुड़ी समस्याओं के समाधान में किया जाता रहा है. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाचन क्रिया को सुधारने में भी सहायक होता है.
        *अनार पेट दर्द मे फ़ायदेमंद है। अनार के बीज निकालें। थोडी मात्रा में नमक और काली मिर्च का पाउडर डालें। और दिन में दो बार लेते रहें।इसबगोल के बीज दूध में 4 घंटे भिगोएं। रात को सोते समय लेते रहने से पेट में मरोड का दर्द और पेचिश ठीक होती है।

        * ज्यादा से ज्यादा करें पानी का सेवन -पेट खराब होने पर शरीर में पानी की कमी हो जाती है. ऐसे में कोशिश करें कि ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं| 




        *आप फलोें का जूस और सब्जियों का रस भी ले सकते हैं| बेहतर होगा अगर पानी में लवण मिला हो. आप चाहें तो नींबू पानी, नमक-चीनी का घोल या फिर नारियल पानी ले सकते हैं.|गाजर का जूस भी ऐसे समय में काफी फायदेमंद होता है.
        *सौंफ़ में पेट का दर्द दूर करने के गुण होते है। 15 ग्राम सौंफ़ रात भर एक गिलास पानी में भिगोएं। छानकर सुबह खाली पेट पीयें। बहुत गुणकारी उपचार है।

        *केला -अगर आप बार-बार हो रहे मोशन से परेशान हो चुके हैं तो केले का इस्तेमाल आपको राहत देगा| इसमें मौजूद पेक्टिन पेट को बांधने का काम करता है.|इसमें मौजूद पोटै‍शियम की उच्च मात्रा भी शरीर के लिए फायदेमंद होती है|नींबू के रस में काला नमक, जीरा, अजवायन चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार पीने से पेट दर्द से आराम मिलता है।

        Sunday, March 6, 2016

        पेशाब मे जलन के उपचार








        धूप में व तेज गर्मी में काम करने से व घूमने से उष्ण प्रकृति के पदार्थों के अति सेवन से मूत्राशय पर गर्मी का प्रभाव हो जाता है, जिससे पेशाब में जलन होती है।
        कभी-कभी जोर लगाने पर पेशाब होती है, पेशाब में भारी जलन होती है, ज्यादा जोर लगाने पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पेशाब होती है। इस व्याधि को आयुर्वेद में मूत्र कृच्छ कहा जाता है। इसका उपचार इस प्रकार है-

        उपचार : कलमी शोरा, बड़ी इलायची के दाने, मलाई रहित ठंडा दूध व पानी। कलमी शोरा व बड़ी इलायची के दाने महीन पीसकर दोनों चूर्ण समान मात्रा में लाकर मिलाकर शीशी में भर लें।
        *एक भाग दूध व एक भाग ठंडा पानी मिलाकर फेंट लें, इसकी मात्रा 300 एमएल होनी चाहिए। एक चम्मच चूर्ण फांककर यह फेंटा हुआ दूध पी लें। यह पहली खुराक हुई। दूसरी खुराक दोपहर में व तीसरी खुराक शाम को लें।
        दो दिन तक यह प्रयोग करने से पेशाब की जलन दूर होती है व मुँह के छाले व पित्त सुधरता है। शीतकाल में दूध में कुनकुना पानी मिलाएँ।
        *पेशाब में जलन होना आम समस्या  है लेकिन बहुत से लोग इसे नजरअंदाज कर जाते हैं। कभी-कभी यह कुछ समय के लिये ही होती है और कभी यह महीनो तक चलती है। यह बीमारी महिलाओं और पुरुष दोनों को ही होती है। इस समस्या के कई कारण हो सकते हैं जैसे, मूत्र पथ संक्रमण, किडनी में पथरी या डीहाइड्रेशन आदि।
        अब मैं बताऊंगा कि पेशाब में जलन को किस तरह से घरेलू उपचार से ठीक किया जा सकता है।




        पेशाब मे जलन के संभावित कारण-
        संकीर्ण मूत्र मार्गमूत्र पथ संक्रमण
        डीहाइड्रेशन
        किडनी में पथरी
        लीवर के रोग
        शुक्राणु या वीर्यकोष में संक्रमण
        यौन संचारित रोग
        बढ़ी हुई प्रॉस्टेट ग्रंथि
        डायबीटीज़
        *सबसे पहले तो खूब सारा पानी पिये नहीं तो शरीर में पानी की कमी हो जाएगी और पेशाब पीले रंग की दिखाई पड़ने लगेगी। दिन में कुछ घंटो के भीतर 2-3 गिलास पानी पिये। अगर पेशाब करने के बाद अधिक देर तक जलन हो तो आपको मूत्र पथ संक्रमण है।
        *खट्टे फल यानी की सिट्रस फ्रूट खाइये क्‍योकि इसमें सिट्रस एसिड होता है जो कि मूत्र संक्रमण पैदा करने वाले जीवाणुओं  को मारता है।
        *ताजे मक्के के भुट्टे पानी मेंं उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन में लाभ होता है।
        *पेशाब की जलन में कच्चे दूध में पानी मिलाकर रोज पिएं, लाभ होगा। ठंडे पानी या बर्फ के पानी में कपड़ा भिगोकर नाभि के नीचे बिछायें, रखें। लाभ होगा
        *आमला का रस भी पेशाब की जलन को ठीक करने में सहायक है।
        *नारियल का पानी डीहाइड्रेशन तथा पेशाब की जलन को ठीक करता है। आप चाहें तो नारिल पानी में गुड और धनिया पाउडर भी मिला कर पी सकते हैं।
        *ककड़ी गुणों का भंडार है। यह शीतल व पाचक है। ककड़ी खाने से पेशाब खुलकर लगती है। गर्मी के दिनों यह लू से बचाव में सहायक है। ककड़ी के बीजों में स्टार्च, तेल, शर्करा और राल पाए जाते है। ककड़ी में क्षारीय तत्व भी पाए जाते है, जो मूत्र संस्थान की कार्यप्रणाली के सुचारु रूप से संचालन में सहायक हैं। ककड़ी पेशाब की जलन को दूर करने में सहायक है। बदहजमी की स्थिति में ककड़ी के 8 से 10 बीजों का मट्ठे के साथ सेवन करने से राहत मिलती है। ककड़ी खाने केबाद 20 मिनट तक पानी न पिएं।
        *संभोग करते समय सावधानी  बरते | योनि में सूखापन आ जाने की वजह से पेशाब में जलन होने लगती है।
        *बूढ़े आदमी बार-बार पेशाब जाते हों तो नित्य छुआरे खिलायें। रात को छुआरे खाकर दूध पिएं।
        *नींबू के बीजों को पीसकर नाभि पर रखकर ठण्डा पानी डालें। रुका हुआ पेशाब होने लगता है।




        *रात को बार-बार पेशाब जाना शाम को पालक की सब्जी खाने से कम हो जाता है।
        *एक पानी के गिलास में 1 चम्मच धनिया  पाउडर मिला कर रातभर के लिये भिगो दें। सुबह उसे छान लें और उसमें चीनी या फिर गुड मिला कर पी लें।
        *एक केला खाकर आँवले के रस में शक्कर मिलाकर पिएं। लाभ होगा। अकेला केला खाने से भी लाभ होता है।
        *जामुन की गुठली का चूर्ण आधा चम्मच शाम को पानी के साथ लेने से पेशाब में शर्करा आना ठीक हो जाता है। जामुन की गुठली और करेले सुखाकर समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें और एक चम्मच सुबह शाम पानी से फंकी लें।
        *जननांग की स्वच्छता बनाए रखें। कई बार, योनि या लिंग में संक्रमण होने की वजह से भी मूत्र मार्ग को प्रभावित करते हैं। यदि आपको यह समस्‍या हो चुकी है तो अब से कुछ सावधानियां बरते जैसे, दिन में 2-3 बार जननांग को धोएं। 
        *तीन आँवलों का रस पानी में मिलाकर सुबह-शाम चार दिन पीने से बार-बार पेशाब जाना बंद हो जाता है
        *गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बंद हो जाए तो मूली का रस दो औंस प्रति मात्रा पीने से वह फिर बनने लगता है।

        Friday, March 4, 2016

        दही खाने के फायदे: Benefits of curd




        *दही को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिसके कारण यह दूध की तुलना में जल्दी पच जाता है। जिन लोगों को पेट की परेशानियां, जैसे अपच, कब्ज, गैस बीमारियां घेरे रहती हैं, उनके लिए दही या उससे बनी लस्सी, छाछ का उपयोग करने से आंतों की गर्मी दूर हो जाती है।
        *डाइजेशन अच्छी तरह से होने लगता है और भूख खुलकर लगती है। दूध से बनने वाले दही का उपयोग खाने में हजारों सालों से हो रहा है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, विटामिन बी जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। दांतों और हड्डियों को मजबूत बनाने वाले कैल्शियम की मात्रा दूध की अपेक्षा दही में 18 गुणा ज्यादा होती है।
        *दही के नियमित सेवन से आंतों के रोग और पेट की बीमारियां नहीं होती, तथा कई प्रकार के विटामिन बनने लगते हैं।
        *दही का नियमित सेवन शरीर के लिए अमृत के समान माना गया है। यह खून की कमी और कमजोरी दूर करता है। दूध जब दही का रूप ले लेता है। तब उसकी शर्करा अम्ल में बदल जाती है। इससे पाचन में मदद मिलती है। जिन लोगों को भूख कम लगती है। उन लोगों को दही बहुत फायदा करता है।


        दही में हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की अद्भुत क्षमता होती है। यह हमारे रक्त में बनने वाले कोलेस्ट्रोल नामक घातक पदार्थ को बढ़ने से रोकता है, जिससे वह नसों में जमकर ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित न कर पाता और हार्टबीट सही बनी रहती है।
        *दही की छाछ या लस्सी बनाकर पीने से पेट की गर्मी शांत हो जाती है। पेट में गड़बड़ होने पर दही के साथ ईसबगोल की भूसी लेने या चावल में दही मिलाकर खाने से दस्त बंद हो जाते हैं। पेट के अन्य रोगों में दही को सेंधा नमक के साथ लेना फायदेमंद होता है। दही में हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की अद्भुत क्षमता होती है। यह हमारे रक्त में बनने वाले कोलेस्ट्रोल नामक घातक पदार्थ को बढ़ने से रोकता है, जिससे वह नसों में जमकर ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित न कर पाता और हार्टबीट सही बनी रहती है।
        *अमेरिकी आहार विशेषज्ञों के अनुसार दही का नियमित सेवन करने से आंतों के रोग और पेट संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।
        *दही में कैल्शियम की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो हमारे शरीर में हड्डियों का विकास करती है और उन्हें मजबूती प्रदान करती है। दांतों एवं नाखूनों की मजबूती एवं मांसपेशियों के सही ढंग से काम करने में भी दही सहायक होती है
        *दही में दिल के रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की गजब की क्षमता है। यह कोलेस्ट्रॉल को बढ़ने से रोकता है और दिल की धड़कन सही बनाए रखता है।
        *दही में कैल्शियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह हड्डियों के विकास में सहायक होता है। साथ ही, दांतों और नाखूनों को भी मजबूत बनाता है। इससे मांसपेशियों के सही ढंग से काम करने में मदद मिलती है।
        *हींग का छौंक लगाकर दही खाने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी है।
        *बवासीर रोग से पीड़ित रोगियों को दोपहर के भोजन के बाद एक गिलास छाछ में अजवायन डालकर पीने से फायदा मिलता है।
         *दही शरीर पर लगाकर नहाने से त्वचा कोमल और खूबसूरत बन जाती है। इसमें नींबू का रस मिलाकर चेहरे, गर्दन, कोहनी, एड़ी और हाथों पर लगाने से शरीर निखर जाता है। दही की लस्सी में शहद मिलाकर पीने से सुंदरता बढ़ने लगती है।




        *बालों को सुंदर और आकर्षक बनाए रखने के लिए दही या छाछ से बालों को धोने से फायदा होता है। इसके लिए नहाने से पहले बालों में दही से अच्छी मालिश करनी चाहिए।कुछ समय बाद बालों को धो लेने से बालों की खुश्की या रूसी खत्म हो जाती है।
        * पेट के रोगियों को चाहिए कि ज्वार की रोटी के साथ दही लें। दही का सेवन भुने हुए जीरे व सेंधा नमक के साथ करें।
        *दही की मलाई को मुंह के छालों पर दिन में दो-तीन बार लगाने से छाले दूर हो जाते हैं। दही और शहद को समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से भी मुंह के छाले दूर हो जाते हैं
         *दुबले व्यक्तियों को चाहिए कि दही में किशमिश, बादाम, छुहारा आदि मिलाकर पीएं। इससे वजन बढ़ता है।
        *दही और बेसन के मिश्रण से मालिश करें। कुछ देर बाद नहा लें। पसीने की दुर्गंध दूर हो जाएगी।
         *बालों को सुंदर, स्वस्थ व नीरोग रखने के लिए बालों को धोने के लिए दही या छाछ का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि दही में वे सब तत्व मौजूद रहते हैं, जिनकी बालों को आवश्यकता रहती है। स्नान से पूर्व दही को बालों में डालकर अच्छी तरह मालिश करें ताकि बालों की जड़ों तक दही पहुंच जाए। कुछ समय बाद बालों को धो दें। दही के प्रयोग से खुश्की, रूसी (ईखर) व फियास समाप्त हो जाती है।
        *दही के साथ शहद मिलाकर जिन बच्चों के दांत निकल रहे हों, उन्हें चटाना चाहिए। इससे दांत आसानी से निकल जाते हैं।
        *रात में नींद न आने की परेशानी से निपटने के लिए दही खाएं
        दही सेवन करने मे निम्न सावधानियाँ रखना  जरूरी है-
        1) त्वचा रोगों में दही का सेवन सावधानी पूर्वक चिकित्सक के निर्देशन में करना चाहिए।
        2) मात्रा से अधिक दही के सेवन से बचना चाहिए।
        3) अर्श (पाईल्स ) के रोगियों को भी दही का सेवन सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
        4) .दही सदैव ताजी एवं शुद्ध घर में मिटटी के बर्तन की बनी हो तो अत्यंत गुणकारी होती है।
        5) सायंकालीन भोजन व रात्रि में दही का सेवन नहीं करें।
        6) विद्यार्थियों को परीक्षा के दिनों में दही का सेवन जहां तक हो सके  नहीं  करना चाहिए। जिन छात्रों को दोपहर व सायंकाल परीक्षा का समय हो तो विशेष सावधानी रखना चाहिए। दही आलस्य लाता है।
        7) खट्टा दही सेवन न करें। ताजे दही का प्रयोग करें।
        8) सर्दी, खांसी, अस्थमा के रोगियों को भी दही से परहेज करना चाहिए।