Sunday, February 19, 2017

सदाबहार (vinca rosea) पौधा ही नही औषिधि भी है

   


    सदाफूली या सदाबहार या सदा सुहागन  बारहों महीने खिलने वाले फूलों का एक पौधा है। इसकी आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है। भारत में पायी जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है। इसे पश्चिमी भारत के लोग सदाफूली के नाम से बुलाते है।
    *सदाबहार नाम के अनुसार ही सदाबहार (evergreen) पौधा है जिसको उगाने से आस-पास में सदैव हरियाली बनी रहती है। कसैले स्वाद के कारण तृष्णभोजी जानवर (herbivores) इस पौधे का तिरस्कार करते हैं। सदाबहार पौधों के आस-पास कीट, फतिगें, बिच्छू तथा सर्प आदि नहीं फटकते (शायद सर्पगंधा समूह के क्षारों की उपस्थिति के कारण) जिससे पास-पड़ोस में सफाई बनी रहती है। सदाबहार की पत्तियाँ विघटन के दौरान मृदा में उपस्थित हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट कर देती हैं।बवासीर होने की स्थिति में इसके पत्तियों और फूलों को कुचलकर लगाने से बेहद फायदा मिलता है, ऐसा रोज़ाना करें।




*सदाबहार की जड़ों में रक्त शर्करा को कम करने की विशेषता होती है। अतः पौधे का उपयोग मधुमेह के उपचार में किया जा सकता है। दक्षिण अफ्रीका में पौधे का उपयोग घरेलू नुस्खा (folk remedy) के रूप में मधुमेह के उपचार में होता रहा है। पत्तियों के रस का उपयोग हड्डा डंक (wasp sting) के उपचार में होता है। जड़ का उपयोग उदर टानिक के रूप में भी होता है। पत्तियों का सत्व मेनोरेजिया (Menorrhagia) नामक बिमारी के उपचार में दिया जाता है। इस बिमारी में असाधारण रूप से अधिक मासिक धर्म होता है।

*त्वचा पर खुजली, लाल निशान, रशेस या किसी तरह की एलर्जी होने पर सदाबहार (vinca rosea) की पत्तियों के रस को लगाने पर आराम मिलता है।
* त्वचा पर घाव या फोड़े-फुंसी हो जाने पर इसकी पत्तियों का रस दूध में मिला कर लगाते हैं।

*. दो फूल को एक कप उबले पानी या बिना शक्कर की उबली चाय में पीने से मधुमेह में फायदा पहुंचाता है।
*कैंसर ऐसी बीमारी है जिसका पता सामान्यत: रोग बढऩे के बाद ही चल पाता है। इस स्थिति में सर्जरी ही बीमारी के विकल्प के रूप में सामने आती है। आयुर्वेद शोधकर्ताओं ने सफेद फूल वाले सदाबहार पौधे को इस बीमारी में प्रभावी माना है।
इस तरह हैं कैंसर में लाभकारी:
ये पत्तियां कैंसररोधी हैं। ये रोग बढ़ाने वाली कोशिकाओं के विकास को रोकती हैं साथ ही इस दौरान क्षतिग्रस्त हो गई कोशिकाओं को फिर से सेहतमंद बनाने का काम करती हैं। यदि इसकी पत्तियों से बने रस को कैंसर की पहली स्टेज वाले मरीज को दिया जाए तो उसके रोग के बढऩे की आशंका कम हो जाती है। वहीं दूसरी व आखिरी स्टेज के दौरान इसके प्रयोग से मरीज की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होकर उसके जीवित रहने की अवधि बढ़ सकती है।



*क्षारों में जीवाणुनाशक गुण पाये जाते हैं इसलिए पत्तियों का सत्व का उपयोग ‘स्टेफाइलोकाकल’ (Staphylococcal) तथा ‘स्टेªप्टोकाकल’ (Streptococcal) संक्रमण के उपचार में होता है। आमतौर से ये दोनों प्रकार के संक्रमण मनुष्य में गले (throat) एवं फेफड़ों (lungs) को प्रभावित करते हैं।
*पत्तियों में मौजूद विण्डोलीन नामक क्षार डीप्थिरिया के जीवाणु कारिनेबैक्टिीरियम डिप्थेरी Corynebacterium diptherae) के खिलाफ सक्रिय होता है। अतः पत्तियों के सत्व का उपयोग डिप्थिीरिया रोग के उपचार में किया जा सकता है।

*इसकी पत्तियों को तोड़े जाने पर जो दूध निकलता है, उसे घाव पर लगाने से किसी तरह का संक्रमण नहीं होता, खुजली होने पर भी लगाया जा सकता है।
*सदाबहार के फूलों और पत्तियों के रस को पिम्पल्स पर लगाने से कुछ ही दिनों में इनसे छुटकारा मिल जाता है।
*पौधे के जड़ का उपयोग सर्प, बिच्छू तथा कीट विषनाशक (antidote) के रूप में किया जा सकता है।
उपर्युक्त के अतिरिक्त आज सदाबहार ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है क्योंकि इसमें कैंसररोधी (Anticancer) गुण पाये जाते हैं। सदाबहार से प्राप्त विनक्रिस्टीन तथा विनब्लास्टीन नामक क्षारों का उपयोग रक्त कैंसर (Leukaemia) के उपचार में किया जा रहा है।*सदाबहार की तीन - चार कोमल पत्तियाँ चबाकर रस चूसने से मधुमेह रोग से राहत मिलती है |



* सदाबहार के पौधे के चार पत्तों को साफ़ धोकर सुबह खाली पेट चबाएं और ऊपर से दो घूंट पानी पी लें | इससे मधुमेह ,मिटता है 

| यह प्रयोग कम से कम तीन महीने तक करना चाहिए |
*सदाबहार के फूलों और पत्तियों के रस को पिम्पल्स पर लगाने से कुछ ही दिनों में इनसे छुटकारा मिल जाता है।
प्रयोग का तरीका:
 इसके पत्तों को सुखाकर चूर्ण बना लें व रोजाना नाश्ते के बाद आधा ग्राम चूर्ण को सादा पानी से लें। इसके अलावा रस को भी प्रयोग में लाया जा सकता है। रोजाना पांच ताजा पत्तियों को पानी के साथ पीसकर बारीक कपड़े से छानकर रस निकालें व इसे भोजन करने के बाद पिएं।
* आधे कप गरम पानी में सदाबहार के तीन ताज़े गुलाबी फूल 05 मिनिट तक भिगोकर रखें | उसके बाद फूल निकाल दें और यह पानी सुबह ख़ाली पेट पियें | यह प्रयोग 08 से 10 दिन तक करें | अपनी शुगर की जाँच कराएँ यदि कम आती है तो एक सप्ताह बाद यह प्रयोग पुनः दोहराएँ |विंका फूल का कैंसर के कुछ प्रकार जैसे ल्यूकेमिया (leukemia) और लिम्फोमा (lymphoma) के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है। इस फूल से साइटोटोक्सिक (cytotoxic) प्रभाव पड़ता है, जो इसे कैंसर के खिलाफ प्रभावी बनाता है। इसे अन्‍य दवाओं में मिलाकर कीमोथेरेपी (chemotherapy) में भी प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग एंटी-माइक्रोबियल (anti-microbial), एंटी हाइपरटेंसिव (anti-hypertensive) और एंटी डायबिटीक (anti-diabetic) के खिलाफ किया जाता है।
ध्यान रहे: 
कड़वा स्वाद होने के कारण इसे खाली पेट लेने से उल्टी हो सकती है। इसलिए इसका प्रयोग कुछ खाकर ही करें। छोटे बच्चों को इसके रस में शक्कर या चूर्ण में गुड़ मिलाकर गोलियों के रूप में दिया जा सकता है।
साइड इफेक्‍ट
सदाबहार में कई सारे गुण होते हैं, लेकिन इसके साथ कुछ साइड इफेक्‍ट भी होते हैं। इसके उपयोग के बाद कई बार उल्टी, सिर दर्द, मतली, खून बहना और थकान आदि समस्याएं भी हो सकती हैं।

Saturday, February 18, 2017

चिरायता के गुण,लाभ उपयोग

    



     चिरायता (Swertia chirata Ham) यह जेंशियानेसिई (Gentianaceae) कुल का पौधा है, जिसका प्रेग देशी चिकित्सा पद्धति में प्राचीन काल से होता आया है। यह तिक्त, बल्य (bitter tonic), ज्वरहर, मृदु विरेचक एवं कृमिघ्न है, तथा त्वचा के विकारों में भी प्रयुक्त होता है। इस पौधे के सभी भाग (पंचांग), क्वाथ, फांट या चूर्ण के रूप में, अन्य द्रव्यों के साथ प्रयोग में जाए जाते हैं। इसके मूल को जंशियन के प्रतिनिधि रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।चिरायता के बारे में आमतौर पर अधिकांश लोग जानते हैं, क्योंकि प्राचीन समय से इसका उपयोग आयुर्वेदिक व घरेलू उपचारों में होता आया है। चिरायता स्वाद में कड़वा होता है। चिरायता मूल रूप से नेपाल, कश्मीर और हिमाचल में पाया जाता है। इसके फूल बरसात और फल सर्दियों के मौसम में आते हैं।
चिरायता एक एंटीबॉयोटिक औषधि है, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। इसका रोजाना सेवन करने पर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और बीमारियां दूर रहती हैं।
चिरायता बनाने की विधि (Method of Swertia Chirata)
सूखी तुलसी पत्ते का चूर्ण, नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, सूखे चिरायते का चूर्ण समान मात्रा (100 ग्राम) मिलाकर एक डिब्बे में भर कर रख लीजिए। मलेरिया, बुखार व अन्य रोगों की स्थिति में दिन में 3 बार दूध से सेवन करने से लाभ होगा।



चिरायता इस्‍तेमाल का तरीका

चिरायता बनाने का आसान और सरल उपाय है कि इसका चाय की तरह सेवन किया जाए। जिस तरह आप चाय बनाते हैं यानी सबसे पहले पानी उबालें। इसके बाद इसमें एक चम्मच चिरायता की जड़ का इस्तेमाल करें। इस मिक्सचर को तकरीबन आधा घंटे तक रखें। इसके बाद इसे छानें और चिरायता चाय का मजा लें।
कैंसर और ट्यूमर से बचाव
तमाम अध्ययनों से पता चला है कि चिरायता के जड़, पत्तों, टहनी, फल में 24 किस्म के तत्व मौजूद होते हैं। ये तमाम तत्व कैंसर को प्राकृतिक रूप से ठीक करने में मदद करते हैं। आस्ट्रेलिया में स्थित यूनिवर्सिटी आफ क्वीन्सलैंड में हुए अध्ययन के मुताबिक चिरायता में पांच किस्म के स्टेराइडल सैपोनिन्स होते हैं। वास्तव में यही सैपोनिन्स कैंसर से लड़ने में सहायक है। इसके अलावा इसमें कई किस्म के एंटीआक्सीडेंट एसिड, एंटी-इन्फ्लेमेटरी, तेल, रसायन आदि होते हैं जो कि इस बीमारी से बचाव के जरूरी है। यही नहीं चिरायता की सेल की हो रही क्षति रोकन में भी महति भूमिका है।
खून साफ करें चिरायता
हजारों सालों से चिरायता नामक जड़ी-बूटी का इस्‍तेमाल त्‍वचा संबंधी रोगों के लिए किया जाता है, क्‍योंकि इसके सेवन से रक्‍त को साफ करने में मदद मिलती है। इसके अलावा चिरायता एक एंटी-बायोटिक औषधि है, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ान में मदद करती है। इसके रोजाना सेवन करने से कीटाणु नष्‍ट होते हैं और बीमारियां दूर रहती है। आयुर्वेद के अनुसार चिरायता का रस कई किस्म की बीमारियों से लड़ने में सहायक है मसलन कैंसर, ट्यूमर का विकास, सर्दी-जुखाम, रुमेटाइड अर्थराइटिस, दर्द, जोड़ों के दर्द, त्वचा सम्बंधी बीमारी, थकन, कमजोरी, मस्लस में दर्द, सेक्स सम्बंधी समस्याएं, सिरदर्द, गठिया, पाचनतंत्र सम्बंधी समस्या, लिवर सम्बंधी समस्या, संक्रमण आदि। आइए चिरायता के त्‍वचा और स्‍वास्‍थ्‍य लाभों की जानकारी लेते हैं।



लिवर की सुरक्षा

चूंकि चिरायता पेशाब की स्थिति को भी बेहतर करता है। यही नहीं पसीने आने में भी यह मदद करता है। इसका मतलब साफ है कि यह लिवर के लिए लाभकारी तत्व है। यह सूजन और जलन से तो बचाता ही है। साथ पेट में हा रही तमाम किस्म की समस्याओं को भी रोकता है। इससे लिवर की सुरक्षा तो होती है साथ ही कई अन्य समस्याएं आने से पहले ही निपट जाती हैं। यह हमारे रक्त को साफ करता है और रक्त संचार को बेहतर करता है। इसके अलावा चिरायता का एक बड़ा गुण यह भी है कि रक्त से टाक्सिन को निकाल बाहार करता है। इसके अलावा यह टिश्यू को क्षति होने से रोकता है जिससे लिवर के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
त्वचा सम्बंधी समस्या का निदान
एग्जीमा, फंगस, कील-मुंहासे आदि तमाम त्वचा सम्बंधी समस्याओं को चिरायता से निदान किया जा सकता है। यही नहीं इससे बैक्टीरियल इंफेक्शन को भी दूर किया जा सकता है। जिन महिलाओं को मौसम बदलने से या फिर बरसात के मौसम में मुंहासों की समस्या होती है, उन्हें आवश्यक तौर पर इसका उपयोग करना चाहिए।
सर्दी-जुखाम



यह इसका सबसे आम और सर्वविदित गुण है। तमाम जड़ी बूटियों की तरह चिरायता भी सर्दी-जुखाम से लड़ने में सहायक है। इसका सेवन कोई भी कर सकता है। जिन लोगों को ठंड लगने की शिकायत होती है खासकर उन्हें जिन्हें सर्दी के कारण फ्लू तक हो जाता है, उन्हें चिरायता का सेवन आवश्यक तौरपर करना चाहिए। हालांकि अकसर यह माना जाता है कि जड़ी बूटियां गंभीर बीमारियों को ठीक करने में मददगार नहीं होती। लेकिन चिरायता के साथ ऐसा नहीं है। यह रेसपिरेटरी संक्रमण को न सिर्फ ठीक करता है वरन किसी को यदि परिवार से यह बीमारी मिली है तो भी इसमें सुधार लाया जा सकता है।

कारगर एंटीबॉयोटिक-
बुखार ना होने की स्थिति में भी यदि इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें तो यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु मर जाते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। इसके सेवन से खून साफ होता है तथा धमनियों में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से संचालित होता है।

Friday, February 17, 2017

कुंदरु के आयुर्वेदिक गुण ,उपयोग




   कुंदरू को तिंदूरी भी कहा जाता है। यह ककड़ी वर्ग यानी कुकुरबिटेसी परिवार की सदस्य है। इसे ग्रीष्मकालीन (मार्च से जून) या बरसाती (जून-जुलाई से अक्टूबर-नवंबर) फसल के रूप में उगाया जा सकता है। इसे पुरानी लताओं की कटिंग से बोया जाता है। एक बार उगाए जाने पर सही देखरेख, पोषण एवं पौध संरक्षण के साथ पाँच-छः साल तक इससे फल प्राप्त किए जा सकते हैं|



*कुंदरू की सब्जी के अलावा फूल और पत्ते भी हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है। साथ ही यह प्रोटीन, कैल्शियम और कार्बोहाइड्रेट्स का भी बेहतर सोर्स है। कुंदरू खाने से पथरी की संभावना कम होती है। जिन्हें किडनी स्टोन है वो अगर कुंदरू खाते हैं तो स्टोन निकल जाता है। कुंदरू की जड़ों, तनों और पत्तियों में कई गुण हैं। ये चर्म रोगों, जुकाम, फेफड़ों के शोथ तथा डायबिटीज़ में लाभदायक बताया गया है। इसके अलावा अगर आप अपने खान-पान में सुधार करके आंखों से चश्मा हटाना चाहते हैं, तो भी कुंदरू का सेवन लाभ पहुंचाता है। कुंदरू एक स्वादिष्ट सब्जी होने के साथ पौष्टिक भी है। आयुर्वेदिक दृष्टि से इसके मूल (जड़) वमनकारक, रेचक, शोधघ्न (सूजन को कम करने वाले) होते हैं। इसके फल गरिष्ठ, मधुर व शीतल होते हैं।कुंदरू के फायदे भले ही आपको नजर न आते हों लेकिन यह सब्जी ऐसी है जिसके पत्ते और फूल भी उतने ही गुणकारी हैं जितना इसका फल है। हाल में एक शोध में यह माना गया है कि खाने में रोज 50 ग्राम कुंदरू का सेवन करने से हाई बीपी के मरीजों को आराम मिलता है।
*100 ग्राम कुंदरू में 93.5 ग्राम पानी होता है, 1.2 ग्राम प्रोटीन, 18 के कैलोरी ऊर्जा, 40 मिलीग्राम कैल्शियम, 3.1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 30 मिलीग्राम पोटैशियम, 1.6 ग्राम फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं।
*कुंदरू के कडुवे फल साँस रोगों, बुखार एवं कुष्ठ रोग के शमन के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। मधुमेह में इसकी पत्तियों का चूर्ण जामुन की गुठली के चूर्ण व गुड़मार के साथ दिया जाना लाभदायक है
चश्मा हटाए कुंदरू का सेवन-
आदिवासियों के अनुसार कुंदरू के फल की अधकच्ची सब्जी लगातार कुछ दिनों तक खाने से आखों से चश्मा तक उतर जाता है। साथ ही माना जाता है कि इसकी सब्जी के निरंतर उपभोग से बाल झड़ने का क्रम बंद हो जाता है। यह गंजेपन से भी बचा जा सकता है|

Thursday, February 16, 2017

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त Principles of nature cure

    प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी / naturopathy) एक सहज चिकित्सा पद्धति है। इस चिकित्सा के द्वारा उपचार के क्रम में रोगी व्यक्ति के शरीर के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमताओं को विकशित किया जाता है जिससे वो रोगाणुओं ले लड़ सके।
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत निम्न प्रकार की चिकित्सा की जाती है
जल चिकित्सा, सूर्य चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, मृदा चिकित्सा आदि। प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा देने में विश्व की कई महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धतियों का विशेयोगदान है। जैसे भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा और यूरोप का नेचर क्योर।

प्राकृतिक−चिकित्सा−प्रणाली का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषतः प्रकृति के पाँच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य−रक्षा और रोग निवारण का उपाय करना। विचारपूर्वक देखा जाय तो यह कोई गुह्य विषय नहीं है और जब तक मनुष्य स्वाभाविक और सीधा−सादा जीवन व्यतीत करता रहता है तब तक वह बिना अधिक सोचे−विचारे भी प्रकृति की इन शक्तियों का प्रयोग करके लाभान्वित होता रहता है। पर जब मनुष्य स्वाभाविकता को त्याग कर कृत्रिमता की ओर बढ़ता है, अपने रहन−सहन तथा खान−पान को अधिक आकर्षक और दिखावटी बनाने के लिये प्रकृति के सरल मार्ग से हटता जाता है तो उसकी स्वास्थ्य−सम्बन्धी उलझनें बढ़ने लगती हैं और समय−समय पर उसके शरीर में कष्टदायक प्रक्रियाएँ होने लगती हैं, जिनको ‘रोग’ कहा जाता है। इन रोगों को दूर करने के लिये अनेक प्रकार की चिकित्सा−प्रणालियाँ आजकल प्रचलित हो गई हैं जिनमें हजारों तरह की औषधियों, विशेषतः तीव्र विषात्मक द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इन तीव्र दवाओं से जहाँ कुछ रोग अच्छे होते हैं वहाँ उन्हीं की प्रतिक्रिया से कुछ अन्य व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और संसार में रोगों के घटने के बजाय नित्य नवीन रोगों की वृद्धि होती जाती है। इस अवस्था को देख कर पिछले सौ−डेढ़−सौ वर्षों के भीतर योरोप अमरीका के अनेक विचारशील सज्जनों का ध्यान प्राकृतिक तत्वों की उपयोगिता की तरफ गया और उन्होंने मिट्टी, जल, वायु, सूर्य−प्रकाश आदि के विधिवत् प्रयोग द्वारा शारीरिक कष्टों, रोगों को दूर करने की एक प्रणाली का प्रचार किया। वही इस समय प्राकृतिक चिकित्सा या ‘नेचर क्योर’ के नाम से प्रसिद्ध है।
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में भोज्य पदार्थों को विशेषकर दालों और सब्जियों को उनकी प्राकृतिक अवस्था में सेवन करने की सलाह दी जाती है। अपक्वाहार (यानी बिना पकाये हुए भोजन ) प्राकृतिक चिकित्सा का मूलभूत सिद्धान्त है। सब्जियों को कच्चे सलाद के रूप में और दालों को भिंगोंकर अंकुरित खाने की अवधारणा ही प्राकृतिक चिकित्सा है।
पर यह समझना कि प्राकृतिक−चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार इन्हीं सौ−दो−सौ वर्षों के भीतर हुआ है, ठीक न होगा। हमारे देश में अति प्राचीन काल से प्राकृतिक पंच−तत्वों की चमत्कारी शक्तियों का ज्ञान था और उनका विधिवत् प्रयोग भी किया जाता था। और तो क्या हमारे वेदों में भी, जिनको अति प्राचीनता के कारण अनादि माना जाता है और जिनका उद्भव वास्तव में वर्तमान मानव सभ्यता के आदि काल में हुआ था प्राकृतिक चिकित्सा के मुख्य−सिद्धान्तों का उल्लेख है।


ऋग्वेद का एक मंत्र देखिये—
आपः इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः।आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ (10−137−6)
“जल औषधि रूप है, यह सभी रोगों को दूर करने वाली महान औषधि के तुल्य गुणकारी है। यह जल तुमको औषधियों के समस्त गुण (लाभ) प्राप्त करावे।”
इस तरह के वचन ऋग्वेद और अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। साथ ही सूर्य−प्रकाश तथा वायु के आरोग्यप्रदायक गुणों का भी उल्लेख मिलता है। तामिल भाषा में वेदों के समान ही पूजनीय माना जाने वाले ‘कुरल’ नामक ग्रन्थ में प्राकृतिक चिकित्सा की विधियों की बड़े उत्तम ढंग से शिक्षा दी गई हैं। यह ग्रन्थ दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है। इसी प्रकार योरोप के सर्वप्रथम चिकित्साशास्त्री माने जाने वाले ‘हिप्पोक्रेट्स’ ने मनुष्यों को स्वास्थ्य विषयक उपदेश देते हुये स्पष्ट लिखा है “तेरा आहार ही तेरी औषधि हो और तेरी औषधि तेरा आहार हो।” आजकल भी प्राकृतिक चिकित्सकों का एक बहुत बड़ा सिद्धांत यही है कि आहार ही ऐसा दिया जाय जो औषधि का काम दे और जिससे शरीर के विकार स्वयं दूर हो जायें। हिप्पोक्रेट्स का सिद्धान्त पूर्णतया भारतीय विद्वानों के मत से मिलता हुआ है, और उसे भारतवर्ष की विद्याओं का ज्ञान हो तो कोई आश्चर्य भी नहीं। क्योंकि उस ढाई हजार पुराने युग में भारत की सभ्यता और संस्कृति का संसार के सभी भागों में प्रचार हो चुका था।
इस प्रकार जब तक मनुष्य प्रकृति की गोद में पलते−खेलते थे, उनका रहन−सहन भी प्राकृतिक नियमों के अनुकूल था तो वे अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्राकृतिक ढंग से ही करते थे। पर मध्यकाल में जब बड़े−बड़े राज्यों और साम्राज्यों की स्थापना हो गई तो बड़े आदमियों के रहन−सहन में भोग विलास की अधिकता होने लगी और उसकी पूर्ति के लिये भाँति−भाँति के कृत्रिम उपायों का प्रयोग भी बढ़ने लगा। साधारण लोग भी उनकी नकल करके नकली चीजों को अधिक सुन्दर और आकर्षक समझने लगे, जिसके फल से लोगों का स्वास्थ्य निर्बल पड़ने लगा, तभी तरह−तरह के रोगों की वृद्धि होने लगी। जब काल क्रम से यह अवस्था बहुत बिगड़ गई और संसार की जनसंख्या तरह−तरह के भयानक तथा गन्दे रोगों के पंजे में फँस गई तो विचारशील लोगों का ध्यान इसके मूल कारण की तरफ गया और उन्होंने कृत्रिम आहार−बिहार की हानियों को समझ कर “प्रकृति की ओर लौटो” (बैक टू नेचर) का नारा लगाया।
प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त
१) इसे अपनाने से कोई हानि नहीं कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं।
२) रोग कर कारण पहचानना और उसका समूल नास।
३) स्वस्थ जीवन जीने की शिक्षा, प्राकृतिक जीवन शैली का अनुपालन शीखाना।
४) व्यक्तिगत उपचार द्वारा रोगी को ठीक करना। प्रत्येक रोक रोगी के प्रकृति के अनुसार अलग अलग उपचार मांगते हैं। एक ही व्याधि अलग अलग व्यक्तियों में अलग अलग उपचार मांगती है।
५) रोग का उपचार तथा इसके रोकथाम पर विशेष ध्यान देना।
६) रोग प्रतिरोधक क्षमता (शरीर की जीवनी शक्ति) को बलवती बनानायदि हम भारतीय धर्म और संस्कृति की दृष्टि से इस चिकित्सा−प्रणाली की व्याख्या करें तो हम कह सकते हैं कि मनुष्य के स्वास्थ्य और रोगों के भीतर भगवान की दैवी शक्ति ही काम कर रही है। व्यवहारिक क्षेत्र में यह रोगों और व्याधियों के निवारण के लिये केवल उन्हीं आहारों तथा पञ्च तत्वों का औषधि रूप में प्रयोग करना बतलाती है जो सर्वथा प्रकृति के अनुकूल हैं। इस प्रकार इस चिकित्सा के छह विभाग हो जाते हैं−मानसिक चिकित्सा, उपवास, सूर्य−प्रकाश−चिकित्सा, वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा, आहार अथवा मिट्टी चिकित्सा।



आजकल जिस डाक्टरी चिकित्सा−पद्धति का विशेष प्रचलन है उसका उद्देश्य किसी भी उपाय से रोग में तत्काल लाभ दिखला देना होता है, फिर चाहे वह लाभ क्षण स्थायी−धोखे की टट्टी ही क्यों न हो। हम देखते हैं कि अस्पतालों में एक−एक रोगी को महीनों तक प्रतिदिन तीव्र इंजेक्शन लगते रहते हैं, पर एक शिकायत ठीक होती है तो दूसरी उत्पन्न हो जाती है। पर पीड़ा के कुछ अंशों में मिटते रहने के कारण लोग इस बाह्य चिह्नों की चिकित्सा के फेर में पड़े रहते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में रोगों के विभिन्न नामों तथा रूपों की चिन्ता न करके उनके मूल कारण पर ही ध्यान दिया जाता है और उसी को निर्मूल करने का प्रयत्न किया जाता है। इतना ही नहीं इस चिकित्सा का वास्तविक लक्ष्य केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्राप्त कराना भी माना गया है, क्योंकि मानसिक तथा आध्यात्मिक सुधार के बिना शारीरिक स्वास्थ्य स्थायी नहीं हो सकता। इसलिये भारतीय चिकित्सा प्रणाली में जहाँ शुद्ध आहार−बिहार का विधान है वहाँ उच्च और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर भी जोर दिया गया है। प्राकृतिक चिकित्सा के तत्व का यथार्थ रूप में हृदयंगम करने वाला व्यक्ति गीता के “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” वाले वाक्य पर पूर्ण श्रद्धा रखकर ‘सत्य−आचरण’ को ध्यान रखता है और फल को भगवान के ऊपर छोड़ देता है। सत्य−आचरण वाला व्यक्ति प्रथम तो रोगी ही नहीं होगा और यदि किसी गलती या दुर्घटना से हो भी गया तो उसी आचरण के प्रभाव से रोग का निवारण शीघ्र ही हो जायेगा। रोग की अवस्था में यह ‘सत्य−आचरण’ उपवास शुद्ध वायु, प्रकाश, जल स्नान तथा औषधि रूप आहार का प्रयोग करना ही हो सकता है, इन साधनों से हम सब प्रकार के रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा करने में सक्षम हो सकते हैं।
आगे चलकर जब रोगों के कारण और स्वरूप पर विचार करते हैं तो मालूम होता है कि रोग जीवित शरीर में ही उत्पन्न हो सकता है। जीवित शरीर एक मशीन या यंत्र की तरह है जिसका संचालन एक सूक्ष्मशक्ति (प्राण) द्वारा होता है। यही शक्ति भौतिक पदार्थों का सार ग्रहण करके उससे शरीर का निर्माण कार्य करती रहती है और दूसरी ओर इसी के द्वारा सब प्रकार के आहार से बचे हुये निस्सार मल रूप अंश का निष्कासन किया जाता है। ये दोनों क्रियाऐं एक दूसरे से सम्बन्धित हैं और इन दोनों के बिना ठीक तरह सञ्चालित हुये न तो जीवन और न स्वास्थ्य स्थिर रह सकता है। पर हम देखते हैं कि अधिकाँश लोग ग्रहण करने की—भोजन की क्रिया के महत्व को तो कुछ अंशों में समझते हैं और अपनी बुद्धि तथा सामर्थ्य के अनुसार पौष्टिक, शक्ति प्रदायक, ताजा, रुचिकारक भोजन की व्यवस्था करते हैं, पर निष्कासन की क्रिया के महत्व को समझने वाले और उस पर ध्यान देने वाले व्यक्तियों की संख्या अत्यन्त न्यून है। लोग समझते हैं कि उत्तम भोजन को पेट में डाल लिया जायेगा तो वह लाभ ही करेगा। पर यह भोजन यदि नियमानुसार परिमित मात्रा में पथ्य−अपथ्य का ध्यान रख कर न किया जायेगा तो निष्कासन की क्रिया का बिगड़ जाना अवश्यम्भावी है। उसके परिणामस्वरूप शरीर के भीतर मल और विकार जमा होने लगते हैं और स्वास्थ्य का संतुलन नष्ट हो जाता है।



यह विकार या विजातीय द्रव्य शरीर के स्वाभाविक तत्वों के साथ मिल नहीं पाता और एक प्रकार का संघर्ष अथवा अशान्ति उत्पन्न कर देता है। हमारी जीवनी−शक्ति यह कदापि पसन्द नहीं करती कि उस पर विजातीय द्रव्य का भार लादकर उसके स्वाभाविक देह−रक्षा के कामों में बाधा उपस्थित की जाय। वह हर उपाय से उसे शीघ्र से शीघ्र बाहर निकालने का प्रयत्न करती है। यदि वह उसे पूर्ण रूप से निकाल नहीं पाती तो ऐसे अंगों में डाल देने का प्रयत्न करती है जो सबसे कम उपयोग में आते हैं और जहाँ वह कम हानि पहुँचा कर पड़ा रह सकता है। इस प्रकार जब तक जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य के कुप्रभाव को मिटाती रहती है तब तक हमें किसी रोग के दर्शन नहीं होते। पर जब हम बराबर गलत मार्ग पर चलते रहते हैं और विजातीय द्रव्य का परिमाण बढ़ता ही जाता है, तो लाचार होकर जीवनी शक्ति को उसे स्वाभाविक मार्गों के बजाय अन्य मार्गों से निकालना पड़ता है। चूँकि यह कार्य नवीन होता है, हमारे नियमित अभ्यास और आदतों के विरुद्ध होता है, इस लिये उससे हमको असुविधा, कष्ट, पीड़ा का अनुभव होता है और हम उसे ‘रोग’ या बीमारी का नाम देते हैं। पर वास्तविक रोग तो वह विजातीय द्रव्य या विकार होता है जिसे हम अनुचित आहार−विहार द्वारा शरीर के भीतर जमा कर देते हैं। ये कष्ट और पीड़ा के ऊपरी चिह्न तो हमारी शारीरिक प्रकृति अथवा जीवनीशक्ति द्वारा उस रोग को मिटाने का उपाय होते हैं। अगर हम इस तथ्य को समझ कर तथा कष्ट और पीड़ा को प्रकृति की चेतावनी के रूप में ग्रहण करके सावधान हो जायें तो रोग हमारा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकता। उस समय हमारा कर्तव्य यही होना चाहिये कि हम प्रकृति के काम में किसी तरह का विघ्न बाधा न डालें वरन् अपने गलत रहन−सहन को बदलकर प्राकृतिक−जीवन के नियमों का पालन करने लगें। इससे विजातीय द्रव्य के बाहर निकालने के कार्य में सुविधा होगी और हम बिना किसी खतरे के अपेक्षाकृत थोड़े समय में रोग−मुक्त हो जायेंगे। संक्षेप में यही प्राकृतिक चिकित्सा का मूल रूप है, जिसको उपवास, मिट्टी और जल के प्रयोग, धूप−स्नान आदि कितने ही विभागों में बाँट कर सर्वसाधारण को बोधगम्य बनाने का प्रयत्न किया गया है।

Wednesday, February 15, 2017

प्रोस्टेट कैंसर के लिए घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार For prostate cancer, domestic, ayurvedic treatment

   

    घरेलू उपाय जीवनशैली का हिस्‍सा होते हैं। इनकी खास बात यह होती है कि आप इनका सेवन सामान्‍य चिकित्‍सा के साथ भी ले सकते हैं। प्रोस्‍टेट कैंसर में भी घरेलू उपाय चिकित्‍सीय सहायता से प्राप्‍त होने वाले लाभ को तो बढ़ाते ही हैं साथ ही आपके ठीक होने की गति में भी इजाफा करते हैं।
प्रोस्टेट कैंसर के इलाज के लिए घरेलू नुस्खे बहुत कारगर हो सकते हैं। प्रोस्टेट एक ग्रंथि होती है जो पेशाब की नली के ऊपरी भाग के चारों ओर स्थित होती है। यह ग्रंथि अखरोट के आकार जैसी होती है। आमतौर पर प्रोस्टेट कैंसर 50 साल की उम्र के बाद सिर्फ पुरुषों में होने वाली एक बीमारी है। प्रोस्टेट कैंसर की शुरूआती अवस्था में अगर पता चल जाए तो उपचार हो सकता है।
   इसका इलाज रेक्टल एग्जाममिनेशन से होता है। इसके लिए सीरम पीएसए की खून में जांच व यूरीनरी सिस्टम का अल्ट्रासाउंड भी करवाया जाता है। इसके अलावा घरेलू नुस्खों को अपनाकर कुछ हद तक इस प्रकार के कैंसर का इलाज हो सकता है। आइए हम आपको प्रोस्टेट कैंसर के लिए घरेलू उपचार बताते हैं।



प्रोस्टेट कैंसर के लिए घरेलू नुस्खे:

ग्रीन टी-
प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त आदमी को नियमित रूप से एक से दो कप ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए। ग्रीन टी में कैंसर रोधी तत्वे पाये जाते हैं।
व्हीटग्रास-
प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए व्हीटग्रास बहुत लाभकारी होता है। व्हीसट ग्रास कैंसर युक्त कोशिकाओं को कम करता है। इसके अलावा व्हीटग्रास खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर से विषैले तत्व भी हटते हैं।
एलोवेरा-
अलोवेरा को प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त मरीजों को नियमित रूप से एलोवेरा का सेवन करना चाहिए। एलोवेरा में कैंसररोधी तत्व पाये जाते हैं जो कि कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने से रोकते हैं।
ब्रोकोली-
ब्रोकोली के अंकुरों में मौजूद फायटोकेमिकल कैंसर की कोशाणुओं से लड़ने में सहायता करते हैं। यह एंटी ऑक्सीडेंट का भी काम करते हैं और खून को शुद्ध भी करते हैं। प्रोस्टेंट कैंसर होने पर ब्रोकोली का सेवन करना चाहिए।
अंगूर-



प्रोस्टे़ट कैंसर के उपचार के लिए अंगूर भी कारगर माना जाता है। अंगूर में पोरंथोसाइनिडीस की भरपूर मात्रा होती है, जिससे एस्ट्रोजेन के निर्माण में कमी होती है। इसके कारण प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में मदद मिलती है।

सोयाबीन-
सोयाबीन से भी प्रोस्टेट कैंसर के उपचार में सहायता मिलती है। प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को रोज के खानपान के साथ सोयाबीन के अंकुर या पकाए हुए सोयाबीन का सेवन करना चाहिए। सोयाबीन में कुछ ऐसे एंजाइम पाये जाते हैं जो हर प्रकार के कैंसर से बचाव करते हैं।
लहसुन-
लहसुन में औषधीय गुण होते हैं। लहसुन में बहुत ही शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं जैसे - एलीसिन, सेलेनियम, विटामिन सी, विटामिन बी। इसके कारण कैंसर से बचाव होता है और कैंसर होने पर लहसुन का प्रयोग करने से कैंसर बढ़ता नही है।



अमरूद और तरबूज-

प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए अमरूद और तरबूज भी बहुत कारगर हैं। अमरूद और तरबूज में लाइकोपीन तत्व ज्यादा मात्रा में पाया जाता है जो कि कैंसररोधी है। इसलिए प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को इन फलों का ज्यादा मात्रा में सेवन करना चाहिए।
इसके अलावा प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को ताजे फलों और सब्जियों  का भी सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए। प्रोस्टेट कैंसर के ये घरेलू उपाय चिकित्सीय सहायता के साथ साथ चल सकते हैं। कैंसर के लक्षण नजर आते ही आपको डॉक्टर से मिलना चाहिए। हां इन उपायों को आप अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना सकते हैं|
 विशिष्ट परामर्श-
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित हुई हैं| यहाँ तक कि लंबे समय से केथेटर नली लगी हुई मरीज को भी केथेटर मुक्त होकर स्वाभाविक तौर पर खुलकर पेशाब आने लगता है| प्रोस्टेट के विभिन्न रोगों मे  रामबाण औषधि|आपरेशन की जरूरत नहीं होती | जड़ी -बूटियों से निर्मित औषधि हेतु वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|

रोजाना कच्‍चा अंडा खाने के स्‍वास्‍थ्‍य लाभ:health benefits of eating raw egg




   पहले लोग अंडे को माँसाहारी खाना मानते थे, वैसे अभी भी कुछ लोग मानते है. लेकिन अंडे खाने वालों का एक अलग वर्ग बन गया है, जहाँ पहले सिर्फ वेजिटेरियन व् नॉन वेजिटेरियन वर्ग होता था, अब एक तीसरा वर्ग भी है एग्गिटेरियन मतलब जो लोग मांस नहीं खाते लेकिन अंडे खाते है. अंडे में मौजूद पोषक तत्व के कारण इसे कोई नज़रअंदाज नहीं कर पाता. डॉक्टर सभी को इसे खाने की सलाह देते है.क्या आपने कभी अंडे को बिना पकाए खाने की बात सोची है? अगर नहीं, तो आपको बता दें कि अंडे को उसके नेचुरल रूप में उसी तरह खाने के ढ़ेरों फायदे हैं. अंडे को बिना पकाए खाने से उसमें मौजूद विटामिन, ओमेगा 3, जिंक, प्रोटीन और दूसरे पोषक तत्व नष्ट नहीं होते हैं जो कई बार पकाने के दौरान या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर उस मात्रा में नहीं मिल पाते हैं जिस रूप में मिलना चाहिए.
   अंडे को उसके मूल रूप में खाना थोड़ा अलग हो सकता है और अगर ये आपके लिए पहला मौका है तो आपको खराब भी लग सकता है. पर अगर आपने कच्चा अंडा खाने का फैसला कर लिया है तो सबसे पहले अंडे को अच्छी तरह, साबुन से धो लीजिए. इससे उसकी खोल पर जमी गंदगी साफ हो जाएगी.खाने-पीने की किसी भी चीज को आजमाने के दौरान इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि आप जो कुछ भी खाएं वो नियंत्रित मात्रा में हो. अति किसी भी चीज की बुरी हो सकती है.
अंडे को उबालकर (boil egg), या किसी रेसिपी के रूप में उपयोग किया जाता है. एक उबले हुए अंडे में मौजूद पोषक तत्व व् उनकी मात्रा इस प्रकार है –




अंडे में मौजूद पोषक तत्व (Egg/ Ande ingredients list) व् उसके फायदे इस प्रकार है –

आयरन
एनीमिया को दूर करता है, ओक्सीजन का प्रवाह पुरे शरीर में करवाता है. अंडे में मौजूद आयरन आसानी से शरीर में घुल जाता है.
विटामिन A
त्वचा को हेल्थी रखता है, व् आँखों की रौशनी को बढाता है.
विटामिन डी
हड्डी व् दांत मजबूत होते है, साथ ही कैंसर व् इम्यून सिस्टम से जुड़ी परेशानी दूर करता है.
विटामिन E
इसमें मौजूद एंटीओक्सिडेंट रोगों से बचाता है, व् स्वास्थ्य अच्छा रखता है.
विटामिन B12
दिल की सुरक्षा करता है.
फोलेट
पुरानी कोशिकाओं की रक्षा करता है, साथ ही नई कोशिकाओं का निर्माण करता है. एनीमिया से भी बचाता है.
प्रोटीन
मसल, स्किन, ऑर्गन, बाल को सुरक्षित रखता है. अंडे में प्रोटीन की अधिकता बहुत होती है, जो वजन बढ़ाने में भी करिगर है, ये शरीर में आसानी से घुल जाती है.
कॉलिन
दिमाग के विकास व् कार्य में यह अहम भूमिका निभाता है

;*अंडे में एंटी-ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा होती है. साथ ही शरीर के लिए आवश्यक अमीनो एसिड की मात्रा की पूर्ति भी इससे हो जाती है. अगर आपके घर में कोई बुजुर्ग है तो आप उसे कच्चा अंडा दे सकते हैं. इससे मांस पेशियों को ताकत मिलती है.
* कोलेस्ट्रॉल दो प्रकार के होते हैं. एक वो जो शरीर के लिए बेहतर होता है और दूसरा वो जो शरीर को नुकसान पहुंचाता है. को‍शिकाओं और हॉर्मोन के निर्माण के लिए कोलेस्ट्रॉल की आवश्यकता होती है. अंडे से मिलने वाला कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए अच्छा होता है.
आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि कच्चा अंडा, पकाए गए अंडे की तुलना में कम संक्रमित होता है. कई बार ऐसा होता है कि पकाने के दौरान अंडे में मौजूद प्रोटीन की मूल संरचना बदल जाती है. जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
* कच्चा अंडा विटामिन का खजाना होता है. इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन बी-12 मौजूद होता है. कच्चा अंडा खाने से एनीमिया की समस्या दूर हो जाती है और इससे दिमाग भी तेज होता है.
*अंडे के पीले भाग में बायोटिन मिलता है जो बाल और त्वचा को मजबूती देने का काम करता है. अंडे के पीले भाग को बालों में लगाने से बाल कोमल-मुलायम होते हैं.
अंडे से स्वास्थ्य व् स्किन/बालों दोनों में फायदा होता है. इसे खाने के साथ साथ स्किन व् बालों में लगाने से भी फायदा मिलता है. नीचे आपको इन फायदों को डिटेल में बताया गया है-
प्रोटीन का मुख्य स्त्रोत –
 अंडे में सबसे प्रमुख प्रोटीन होता है. प्रोटीन के उपयोग से शरीर में सारे टिश्यू बनते है, साथ ही पुराने की देखभाल की जाती है. प्रोटीन से अमीनो एसिड बनता है, लेकिन ये शरीर में नहीं बनता, हमें इसके लिए ऐसा भोज्य पदार्थ लेना होगा. एक अच्छे प्रोटीन से युक्त भोजन में बराबर मात्रा में अमीनो एसिड भी होता है, जिसकी हमारे शरीर को जरुरत होती है. अंडा प्रोटीन का खजाना है.

हड्डी मजबूत करे –
 कैल्शियम की कमी से हड्डी, दांत, नाख़ून कमजोर हो जाते है. फिर हड्डी मजबूत करने के लिए हमें तरह तरह की दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है. दवाई से अच्छा है कि हम प्राकतिक रूप से अंडे का प्रयोग करें, इससे हड्डी दांत धीरे-धीरे मजबूत होने लगेंगें.
एग्ग वाइट के फायदे (egg white benefits) –

 अंडे की सफेदी में 0 कोलेस्ट्रोल होता है, इसमें 52 कैलोरी व् प्रोटीन 11 ग्राम होता है. अंडे की सफेदी में, उसके पीले भाग से ज्यदा प्रोटीन होता है. इसमें 0 कोलेस्ट्रोल होता है, जिससे इसे कोई भी आसानी से खा सकता है. इसमें फैट भी बहुत कम होता है.
एग्ग योल्क के फायदे (egg yolk benefits) – अंडे की सफेदी से ज्यादा पोषक तत्व उसके पीले भाग में होते है. इसमें विटामिन, मिनिरल्स सब अधिक होता है, जिससे ये स्किन, बालों के लिए बेस्ट होता है.
अंडे को दूध के फायदे (egg with milk benefits ) – 

अंडे को दूध के साथ मिला कर पीने से भी यह सेहत के लिए बहुत फायदे मंद होता है.
आयरन की कमी दूर करे – कई लोगों को शरीर में आयरन की कमी होती है, जिससे उन्हें सर दर्द, चिड़चिड़ापन, बदन दर्द, खून की कमी की शिकायत होती है. अंडे के पीले भाग में आयरन की अधिकता होती है, जिसे खाने से खून बढ़ता है, मेटापोलिस्म बढ़ता है. गर्भवती महिलाओं को अक्सर इसकी शिकायत होती है, इसलिए उन्हें अंडे खाने के लिए मुख्य रूप से बोला जाता है.

बालों व् आँखों की सुरक्षा (Egg benefits for hair)– 

इसमें विटामिन A होता है, जो बालों व् आँखों के लिए अच्छा होता है. कहते है जो बच्चे बचपन से ही अंडा का सेवन करते है, उनकी आई साईट (eye sight) जो अंडे का सेवन नहीं करते है उनके मुकाबले अधिक होती है. इससे बालों को भी मजबूती मिलती है. अंडा खाने के अलावा लगाने से बाल में अच्छा कंडीशनर होता है. अंडे को बालों में लगाने के लिए उसे हिना के साथ मिलाकर भी लगा सकते है, या इसके अलावा आप उसकी सफेदी को कुछ देर बालों में लगाकर छोड़ दे फिर धोएं. बाल सॉफ्ट चमकदार हो जायेंगें.
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये – इसमें मौजूद विटामिन डी शरीर के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है.
वजन कम करने वालों के लिए –

 आप अगर अपना वजन कम कर रहे है तो आप अंडे को जरुर अपनी डाइट में शामिल करें. लेकिन आपको सिर्फ इसका सफ़ेद वाला हिस्सा खाना है, इसमें कैलोरी बस 17 (1 अंडे) होती है, जिसे खाने से हमें बाकि पोषक तत्व मिल जाते है.
दिमाग मजबूत करे – 

अंडे में कॉलिन दिमाग के विकास के लिए बहुत जरुरी है. कॉलिन एक ऐसा पोषक तत्व है, जो दिमाग को तेज बनाने व् विकास के लिए बहुत जरुरी होता है. छोटे बच्चे से लेकर बड़े बूढों तक के दिमाग को इसकी जरुरत पड़ती है. इसकी कमी से याददाश्त कम होती है. इसी की कमी से बच्चे मंद बुद्धि पैदा होते है. गर्भकाल के समय कॉलिन महिलाओं के लिए बहुत जरुरी पोषक तत्व है. ऐसे में अंडे से अच्छा कुछ नहीं जो एक साथ इतने फायदे देता है.
स्टेमिना बढ़ाये –

 एक अंडा खाने से आपको 6 gm प्रोटीन मिलती है, साथ ही एक बड़ी मात्रा में नुट्रीशियन मिलते है. बस इसमें विटामिन C नहीं होता है. अंडे को नीम्बू या संतरे के जूस के साथ सुबह के नाश्ते में खाना चाहिए, जिससे आपके शरीर में विटामिन C की भी पूर्ति हो जाये. इससे स्टेमिना बढ़ता है.
अंडे से फायदे तो बहुत है, लेकिन इससे कुछ नुकसान भी है, जिसका जानकारी आपको होना बहुत जरुरी है, ताकि आप इसे एक निर्धारित मात्रा में ही अपनी डाइट में शामिल करें.
अंडे से होने वाले नुकसान (Egg harmful effects)–

फ़ूड पोइजनिंग व् पेट से जुड़ी तकलीफ – अंडे को खाने से पहले ये जरुर देख ले कि वो अच्छे से पका है कि नहीं. कच्चा या आधा पका अंडा स्वास्थ्य के लिए हानि कारक होता है, इससे फ़ूड पोइजनिंग होती है. आधा पका अंडा खाने से उलटी, पेट दर्द, पेट ख़राब होना जैसी शिकायतें होती है.
सोडियम की अधिकता –

 अंडे की सफेदी में बहुत अधिक सोडियम होता है. जिस किसी इन्सान को सोडियम न खाने की सलाह दी जाती है, उन्हें अंडा सोच समझकर अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए.

कोलेस्ट्रोल रिस्क – 

जिस किसी को ब्लडप्रेशर, डायबटीज व् हाई कोलेस्ट्रोल की परेशानी हो, उन्हें अंडा सोच समझकर खाना चाइये, हफ्ते में 2 से ज्यादा ना खाएं, क्यूंकि इसमें कोलेस्ट्रोल की अधिकता होती है.
कुछ ध्यान देने वाली बातें-
वैसे तो आप अंडा करी बनाकर या उबालकर या फ्राई करके किसी भी तरह दिन में एक या दो बार खा सकते हैं लेकिन हेल्दी तरीके से खाने पर ही यह शरीर के लिए उपयोगी सिद्ध होता है।
• ऑमलेट बनाकर या स्क्रैब्लड रूप में अंडा कभी भी न खायें क्योंकि यह वज़न घटाने के प्रक्रिया पर पानी फेर देता है। इसको बनाने में बहुत तेल की ज़रूरत होती है, इसलिए यह उतना हेल्दी नहीं होता है।
• उबला हुआ अंडा वज़न घटाने की प्रक्रिया में सहायता करता है। फैट कम और पौष्टिकता से भरपूर होता है। लेकिन हजम आसानी से हो जाता है, सिर्फ अंडे की जर्दी का सेवन रोज न करें।
• अगर आप होलसम ब्रेकफास्ट करना चाहते हैं तो होल ग्रेन ब्रेड के साथ उबला हुआ अंडा या पोच्ड अंडा खा सकते हैं। इसमें फाइबर होता है और प्रोटीन पूरे दिन के लिए आपको ऊर्जा से भरपूर कर देता है।
*लोगों की यह धारणा गलत है कि अंडा में फैट उच्च मात्रा में होता है, इसलिए इसको रोज खाने से वज़न बढ़ने का भय होता है। लेकिन आहार विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग हेल्दी तरीके से वज़न घटाना चाहते हैं, वे ज़रूर अंडा को अपने डायट में शामिल करें।

Tuesday, February 14, 2017

पेट के अल्सर (छाले) के घरेलू उपचार Home remedies for stomach ulcer


अल्सर की बीमारी कैसे होती हैं.
जब मानव शरीर में स्थित भोजन को पचाने वाला अम्लीय पदार्थ अमाशय की दीवारों को क्षति पहुंचाने लगता हैं तो व्यक्ति को अल्सर का रोग हो जाता हैं.अल्सर व्यक्ति के अमाशय या छोटी आंत के ऊपरी हिस्से में फोड़े निकलते हैं. अल्सर को अमाशय का अल्सर, पेप्टिक अल्सर तथा गैस्ट्रिक अल्सर के नाम से भी जाना जाता हैं.
कारण (Causes) –
अत्याधिक दर्द निवारक दवाओं का सेवन करना।
अधिक चाय या काफी पीना।
अधिक गरम मसालें खाना।
अधिक तनाव लेना।
गलत तरह के खान-पान करना।
अनियमित दिनचर्या।
अधिक धूम्रपान करना।
*अल्सर अधिक गर्म खट्टे, मिर्च मसलों वाला भोजन करने के कारण हो कसता हैं.
इसके अलावा जो व्यक्ति ज्यादा क्रोध करते हैं,तनावग्रस्त रहते हैं, जल्दी किसी भी कार्य को करने के लिए उत्तेजित रहते हैं, चिंता अधिक करते हैं, दूसरों सेइर्ष्या करते हैं. उन्हें भी यह बीमारी हो सकती हैं
*जो व्यक्ति अधिक चाय, कॉफ़ी तथा शराब का सेवनकरते हैं. उन्हें भी अल्सर हो सकता हैं
लक्षण (Symptoms) –
* अल्सर होने पर मानव शरीर में स्थित अमाशय तथा पक्वाशय में घाव होता हैं.
*धीरे – धीरे इस घाव से मनुष्य के ऊतक भी प्रभावितहोने लगते हैं.
*अमाशय में घाव होने के बाद पाचक रसों की क्रिया ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पाती. जिससे ये घाव फोड़ों का रूप धारण कर लेते हैं.
पेट में कब्ज की शिकायत रहती हैं तथा मल के साथ खून भी आता हैं.
* इस रोग से ग्रस्त होने के बाद व्यक्ति शरीरिक रूप से अधिक कमजोर हो जाता हैं और उसके पेट की जलन उसकी छाती को भी प्रभावित करती हैं. जिससे उसके पेट के साथ – साथ छाती में भी जलन होने लगती हैं.
* इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अधिकतर समय बुझा – बुझा सा रहता हैं, उसका स्वभाव चिडचिडा हो जाता हैं, जिसके परिणाम स्वरूप उसे छोटी – छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता हैं.
इलाज व सावधानी- पेप्टिक अल्सर का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है। अपनी दिनचर्या व खान-पान में बदलाव करना ज़रूरी है। समय पर सोये व सुबह नियम से जल्दी उठने की आदत डाले। प्रातः व्यायाम करे या भ्रमण के लिए अवश्य जाये। इससे फेफड़ो को अधिक ऑक्सीजन मिलती है। पेट में कब्ज न होने दे। तेज मसालेदार, या तेज नमक मिर्च वाले खाने तथा तले - भुने खाद्य पदार्थो से परहेज करे।
भोजन में कच्ची सब्जिया जैसे, लौकी, टमाटर, गाजर, मूली, चुकंदर, व फलो में अमरुद, पपीता, अंजीर का सेवन करना फायदेमंद होगा। बेल फल का सेवन अलसर में लाभकारी साबित होगा। ३-५ ग्राम मुलैठी पाउडर गरम दूध के साथ पीने से अलसर से आराम मिलता है। ताजे फलो का रस व मट्ठा आदि का सेवन भी लाभकारी है।-

*पानी अधिक मात्रा में पिए। दिन में कम से कम ३ -४ लीटर पानी पीना उचित है। धूम्रपान व शराब का सेवन न करें। किसी भी तरह का उपचार शुरू करने से पहले डॉक्टर का परामर्श अवश्य ले। तनाव व चिंता से मुक्त रहे। हमेशा खुश रहे।

*अल्सर का रोग होने पर व्यक्ति के पेट में हमेशा जलन होती रहती हैं, उसे अधिक खट्टी ढकारें आती हैं, सिर में दर्द होने लगता हैं और चक्कर आने लगते हैं.
*.अल्सर के होने पर मनुष्य की भोजन के प्रति रूचि ख़त्म हो जाती हैं, उसके शरीर में पित्त की मात्रा बढती जाती हैं.
अल्सर के लिए घरेलू उपचार (Treatment Of Ulcer Disease)
*संतरे का रस (Orange Juice)
यदि जांच कराने के बाद आपको पता चले की आपके पेट में घाव हो गया हैं तो इस घाव को जल्द भरने के लिए रोजाना दिन में दो बार एक छोटा गिलास संतरे का रस पियें. संतरे का रस रोजाना पीने से घाव जल्द ही भर जाएगा.गुडहल : गुडहल की पत्तियों के रस का शरबत बनाकर पीने से अल्सर रोग ठीक होता है।
बेलफल की पत्तियों का सेवन :
 बेल की पत्तियों में टेनिन्स नामक गुण होता है जो पेट के अल्सर को ठीक करते हैं। बेल का जूस पीने से पेट का दर्द और दर्द ठीक होता है।
गाजर और पत्ता गोभी का रस :
 पत्तागोभी पेट में खून के प्रभाव को बढ़ाती है और अल्सर को ठीक करती है। पत्ता गोभी और गाजर का रस मिलाकर पीना चाहिए। पत्ता गोभी में लेक्टिक एसिड होता है जो शरीर में एमीनो एसिड को बनाता है।
सहजन :
 दही के साथ सहजन के पत्तों का बना पेस्ट बना लें और दिन में कम से कम एक बार इसका सेवन करें। इस उपाय से पेट के अल्सर में राहत मिलती है।
मेथी का दाना : 
अल्सर को ठीक करने में मेथी बेहद लाभदायक होती है। एक चम्मच मेथी के दानों को एक गिलास पानी में उबालें और इसे ठंडा करके छान लें। अब आप शहद की एक चम्मच को इस पानी में मिला लें और इसका सेवन रोज दिन में एक बार जरूर करें। ये उपाय अल्सर को जड़ से खत्म करता है।
.केला (Banana) -
 अल्सर के रोग से पीड़ित होने पर आप केलों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. केलों का इस्तेमाल करने के लिए दो केले लें और उन्हें छिल लें. इसके बाद इन केले के गुदे को मैश कर लें और उसमें थोडा सा तुलसी के पत्तों का रस मिला दें. इसके बाद इसका सेवन करें. आपको अल्सर के रोग में काफी राहत मिलेगी.

अल्सर के रोग से पीड़ित रोगी के लिए कच्चे केले भी बहुत ही लाभकारी सिद्ध होते हैं. इसलिए इसका भी प्रयोग वह इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए कर सकत़ा हैं. इस रोग को दूर करने के लिए अधिक से अधिक कच्चे केले की सब्जी बनाएं और उसमें हिंग पाउडर मिलाकर खाएं.

पेट में दर्द (Abdominal Pain) –
 यदि अल्सर कारोग होने के बाद आपके पेट में हेमशा दर्द रहता हैं तो इस दर्द को दूर करने के लिए एक काम्म्च जीरा, एक चुटकी सेंधा नमक, दो रत्ती घी में भुनी हुई हिंग लेकर इन सभी को एक साथ मिला लें. इसके बाद इस चुर्ण का सेवन दिन में दो बार भोजन ग्रहण करने के पश्चात् करें. आपको लाभ होगा.


अजवायन (Parsley) – 

अल्सर के रोग से जल्द मुक्त होने के लिए 3 छोटी हरड, कुछ मुनक्का जिनमें बीज न हो, डेढ़ चम्मच अजवायन लें. इसके बाद इन सभी चीजों को मिलाकर चटनी बना लें और इस चटनी का सेवन रोजाना करें.
चुर्ण (Powder) – 
अल्सर के रोग को से बचने एक लिए आप चुर्ण का प्रयोग भी कर सकते हैं. चुर्ण बनाने के लिए
 * 1 चम्मच अजवायन, 3 चम्मच धनिया पाउडर, 2 चम्मच जीरा पाउडर और एक चुटकी हिंग पाउडर लें और इन सबको मिला लें. अब इस चुर्ण का सेवन भोजन करने के पश्चात् करें. जल्द ही आपको इस रोग से मुक्ति मिल जायेगी.
* आंवले का मुरब्बा (Amla ’s Jam) – 
अगर अल्सर के रोग से पीड़ित व्यक्ति दिन में एक बार आंवले के मुरब्बे के रस में आधा गिलास अनार का जूस मिलाकर पियें तो भी उसे इस रोग से जल्द ही आराम मिल जाता हैं.
शहद : 


पेट के अल्सर को कम करता है शहद। क्योकिं शहद में ग्लूकोज पैराक्साइड होता है जो पेट में बैक्टीरिया को खत्म कर देता ह। और अल्सर के रोगी को आराम मिलता है।
नारियल :
नारियल अल्सर को बढ़ने से रोकता है साथ ही उन कीड़ों को भी मार देता है जो अल्सर को बढ़ाते हैं। नारियल में मौजूद एंटीबेक्टीरियल गुण और एंटी अल्सर गुण होते हैं। इसलिए अल्सर के रोगी को नारियल तेल और नारियल पानी का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिए। www.allayurvedic.org
बादाम :
 बादाम को पीसकर इसे अल्सर के रोगी को देना चाहिए। इन बादामों को इस तरह से बारीक चबाएं कि यह दूध की तरह बनकर पेट के अंदर जाएं।
लहसुन : 
लहुसन की तीन कच्ची कलियों को कुटकर पानी के साथ सेवन करें।
गाय का दूध :
 गाय के दूध में हल्दी को मिलाकर पीना चाहिए। हल्दी में मौजूद गुण अल्सर को बढ़ने नहीं देते हैं।
*आंवला (Amla) -
 अल्सर से जल्द छुटकारा पाने के लिए के लिए 2 चम्मच आंवले का पिसा हुआ चुर्ण लें और इसे रात को पानी में भिगोकर सो जाएँ. इसके बाद एक चम्मच पीसी हुई सोंठ लें, 2 चम्मच मिश्री का पाउडर लें. अब इन सभी को उस पानी में मिला दें.इसके बाद इस पानी का सेवन करें. अल्सर में काफी लाभ होगा.
अल्सर के लिए जरूरी परहेज :
*अधिक मिर्च मसाले और जंक फूडस से परहेज करें।
*चाय, काफी और कोल्ड ड्रिंक्स का सेवन करना बंद कर दें।
*अपने को तनाव मुक्त रखें। हर रोज सुबह-शाम पैदल घूमें।
*अधिक दवाओं का सेवन न करें।
*अल्सर का अधिक बढ़ने पर इसका ऑपरेशन ही एक मात्र उपाय है। यदि यह कैंसर में बदल जाता है तो अल्सर की कीमोथैरेपी की जाती है।
*यदि आप चाहते हैं कि अल्सर का रोग आपको न लगें तो आपको अपने खान-पान और गलत लतों को छोड़ना होगा।

Monday, February 13, 2017

बच्चों के रोग: आयुर्वेद से इलाज Children's disease Ayurveda treatment


आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति मे हर बीमारी का इलाज है।
बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए आयुर्वेद से बेहतर कुछ भी नहीं हैं क्‍योंकि यह बिना किसी साइड इफेक्‍ट के आपके बच्‍चे को स्‍वस्‍थ रखती है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति मे हर बीमारी का इलाज है। कुछ बीमारियां ऐसी हैं जिनका आयुर्वेद में स्थायी इलाज है। आयुर्वेद में नवजात शिशु, शिशु आहार, नैदानिक परीक्षा, दांत निकलना, बचपन के रोगों के प्रबंधन की देखभाल, बच्चों में उपचार और थैरेपी के सिद्धांत शामिल है। आयुर्वेद बचपन की बीमारियों के प्रबंध उनके संकेत और लक्षण और संभावित जटिलताओं को दूर करने में मदद करती है। अधिकांश आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां और हर्बल यौगिक बचपन की आम बीमारियों के मामलों में सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किये जा सकते है।
खांसी जुकाम होने पर बच्‍चे को तुलसी का रस दें।
बच्‍चे को खसरा हो जाने पर
* ब्राम्‍ही के रस में शहद मिलाकर पिलाने से बच्‍चे को आराम मिलता है।
* एक लीटर पानी को उबालें फिर जब ढाई सौ मिली. लीटर पानी शेष रह जाए तो इसे उतार कर ठंडा कर लें। फिर बच्‍चे को थोड़ा थोड़ा पिलाएं। इससे खसरे में बच्‍चे को बार बार लगने वाली प्‍यास से राहत मिलेगी।
* खसरे के दानों को नीम और गूलर की छाल का क्‍वाथ बनाकर साफ करें और फिर उन पर नीम का तेल लगाएं। काफी फाएदा होगा।
* खसरे के दानों में खुजली होने और जलन होने पर चंदन को पत्‍थर पर घिसकर लेप लगाएं।
* खसरा होने की वजह से यदि शरीर में खुजली या जलन हो रही हो तो सूखे आंवले को पानी में उबालकर उसे ठंडा कर लें और फिर उसमें कपड़ा भिगोकर शरीर में फेरें। बच्‍चे को बहुत आराम मिलेगा।
* आंवले को पीसकर उसका लेप लगाने से भी बहुत लाभ होता है।
* आप खस, गिलोय, धनिया, आंवला और नागरमोथा सबको मिलाकर पाउडर तैयार करें। एक टेबलस्‍पून पाउडर को दो ग्‍लास पानी में उबालें। फिर जब एक ग्‍लास पानी बचे तो इसे उतार लें और बच्‍चे को आधा आधा चम्‍मच थोड़ी थोड़ी देर में पिलाएं। बच्‍चे को बहुत राहत मिलेगी।
जायफल घिसकर शहद के साथ सुबह और शाम चटाएं।
शहद में सुहागा पीसकर निकल रहे दांतों पर मलें।
यदि बच्‍चे को नींद में डर लगता हो तो...
* गर्मी के मौसम में छोटी इलायची का एक ग्राम अर्क सौंफ के उबले हुए पानी के साथ पिलाएं। इससे बच्‍चे की नींद में डरने की आदत खत्‍म हो जाएगी।



* सर्दी के मौसम में १ – २ ग्राम सौंफ पानी में उबालकर छान लें और इसे रात में सोने से पहले बच्‍चे को पिला दें। बच्‍चे को राहत मिलेगी।

दांत निकल रहे हों तो …
दांत निकलते समय मसूढ़ों में खुजली के कारण बच्‍चे बहुत परेशान होते है। इस समस्‍या से बच्‍चे को बचाने के लिए छोटी पीपली को बारीक पीसकर ऐसा चूर्णं तैयार करें जो कपड़े से छन जाए। फिर इसे चुटकी भर लेकर शहद में मिलाकर दिन में दो–तीन बार बच्‍चों के मसूढ़ों पर मलें। या अनार के रस में तुलसी का रस मिलाकर बच्‍चे को चटाने से दांत आसानी से निकल आते हैं। इसके अलावा शहद में सुहागा पीसकर निकल रहे दांतों पर मलें। इससे दांत आसानी से निकलते हैं।
यदि बच्‍चे को मतली आ रही हो तो ...
*छोटी इलायची को भूनकर उसका कपड़े से छन जाने योग्‍य चूर्णं बनाएं। फिर चुटकी भर चूर्णं आधा चम्‍मच नींबू के रस में मिलाकर बच्‍चे को खिलाने से मतली में आराम मिलता है।
* इलायची के छिलकों को जलाकर उसकी भस्‍म बनाएं, फिर यह भस्‍म बच्‍चे को चटाने से भी आराम मिलता है।
* नारियल की जटा को जलाकर भस्‍म बनाएं। फिर २ ग्राम भस्‍म को शहद के साथ चटाने से बच्‍चे को मतली में आराम मिलेगा।
*कब्‍ज की समस्‍या हो जाये तो…
यह आयुर्वेद में रोगों के उपचार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, यदि आपके बच्चे को कब्ज की समस्‍या है तो प्राकृतिक फाइबर से भरपूर आहार जैसे भीगी हुई किशमिश या खज़ूर, शहद, चोकर, तिल के बीज, आम, पपीता, अंगूर और ताजा अंजीर आपके बच्‍चे के लिए बहुत उपयोगी होता है। अपने बच्चे को कब्ज की रोकथाम के लिए, पानी की पर्याप्‍त मात्रा, उच्च गुणवत्ता वाले तेल, और उच्च फाइबर खाद्य पदार्थों का सेवन करायें।
* रूई के फाहे को नीम के तेल में डुबो कर गुदामार्ग में लगाने से कब्‍ज की शिकायत दूर हो जाएगी।
* बड़ी हरड़ को पानी के साथ घिस कर उसमें मूंग के दाने के बराबर काला नमक मिलाएं। फिर इसे थोड़ा सा गुनगुना करके दिन में जरूरत के हिसाब से दो – तीन बार बच्‍चे को दें।
रात में भिगो कर रखे गए छुहारे का पानी बच्‍चे को जरूरत के हिसाब से तीन – चार बार पिलाएं। ऐसा करने से कब्‍ज दूर जाएगा।
बच्‍चे के पेट में कीड़े होने पर
* केले की जड़ को सुखा कर चूर्णं बना लें। फिर २ ग्राम चूर्णं को पानी के साथ बच्‍चे को खिलाएं। ऐसा करने से बच्‍चे के पेट में मौजूद कीड़े बाहर निकल जाएंगें।



* बच्‍चे को काले जीरे (स्‍याह जीरा) का पाउडर शहद में मिलाकर चटाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

* आप बच्‍चे को अजवायन के तीन – चार दाने के साथ बच्‍चे को पान खिलाएं। इससे पेट के कीड़े मरने लगते हैं।
*बच्‍चे को दस्‍त आ रहे हो तो ….
अगर आपका बच्‍चा दस्‍त की समस्‍या से परेशान है तो बच्‍चे को जायफल घिसकर शहद के साथ सुबह और शाम चटाएं। बच्‍चे को आराम मिलेगा। या सौंफ और सोंठ का काढ़ा बनाकर बच्‍चे को एक या दो चम्‍मच पिलाएं। आराम मिलेगा। इसके अलावा जौ के पानी और थोड़ी सी अंडे की सफेदी को घोलकर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाएं से भी आराम मिलता है। और बच्‍चे को हरे दस्‍त आ रहे हों तो थोड़ा सा अरंडी का तेल यानी कैस्‍टर ऑयल चटाएं।
बच्‍चे को यदि हिचकियां आ रही हो
* नारियल का ऊपरी भाग यानि उसकी जटा को जलाकर उसकी थोड़ी सी राख १ – ३ ग्राम पानी में घोलकर और उसे छानकर बच्‍चे को पिलाएं, तो उसकी हिचकी बंद हो जाएगीं।
* अदरक के २ – ३ बूंद रस में चुटकी भर पिसी हुई सोंठ, काली मिर्च और २ बूंद नीबू का रस मिलाकर बच्‍चे को चटाएं। बच्‍चे को आराम मिलेगा।
*बच्‍चे को खांसी जुकाम हो जाए तो
*खांसी जुकाम होने पर बच्‍चे को तुलसी का रस दें। इससे सर्दी का प्रकोप नहीं होगा। या आधा इंच अदरक व एक ग्राम तेजपत्‍ते को एक कप पानी में भिगो कर काढ़ा बनाएं। फिर इसमें एक चम्‍मच मिश्री मिलाकर 1-1 चम्‍मच की मात्रा में दिन में तीन बार पिलाएं।
बच्‍चा बिस्‍तर में पेशाब करे तो...
* यदि बच्‍चा रोजाना बिस्‍तर पर पेशाब करने लगे तो उसे छुहारा खिलाएं।
* छुहारे को बारीक पीसकर चटाने से या खिलाने से भी पेशाब करने की आदत छूट जाती है।
* बच्‍चे को पन्‍द्रह – बीस दिनों तक सोते समय एक छोटा चम्‍मच शहद चटाने से भी यह आदत छूट जाती है।
* सोने से पहले बच्‍चे के पैरों को गुनगुने पानी से पोंछे। काफी सुधार होगा।
*यदि बच्‍चा थोड़ा बड़ा हो गया हो और फिर भी बिस्‍तर में पेशाब कर रहा हो तो, ऐसे बच्‍चे को नियमित रूप से २ अखरोट और १० – १२ किशमिश खिलाने से बच्‍चे की पेशाब करने की आदत छूट जाएगी।
* बड़ी इलायची का पाउडर 2-2 ग्राम दिन में तीन बार पानी के साथ लेने से सभी प्रकार की खांसी में आराम मिलता है। इससे दो दिन में ही खांसी जुकाम ठीक हो जाएगा। बच्‍चे की छाती में कफ जम जाए तो आप थोड़ा सा गाय का घी हल्‍का सा गर्म करके छाती पर मलें। इससे कफ पिघल कर बाहर आ जाएगा।
नैपकिन से रैशैज़ होने पर...
* हरी दूब को अच्‍छी तरह पीस कर लेप करने से बच्‍चे को नैपकिन रैशैज़ में राहत मिलती है।
* लहसुन की ८ – १० कलियों का रस निकालकर चार गुना पानी में मिलाकर रैशैज़ वाले स्‍थान पर लगाएं। बच्‍चे को आराम मिलेगा।
* तुलसी के पत्‍तों का रस निकालकर अथवा उसके पत्‍तों को पीसकर उसका लेप करने से नैपकिन रैशैज़ में आराम मिलता है।
यदि बच्‍चा तुतलाता हो तो...



* बच्‍चा दो – तीन साल का होने पर भी तुतलाए तो आप ब्राम्‍ही के हरे पत्‍ते (यदि बच्‍चा खा सके तो) खिलाएं। इससे क जुबान (जीभ) का मोटापन व कड़ापन दूर होगा और वह साफ बोलने लगेगा।

* बड़े बच्‍चों को रोजाना सुबह आंवला चबाने को दें और रात को सोते समय एक टीस्‍पून आंवला पाउडर कुनकुने पानी के साथ दें। तुतलाहट में लाभ होगा।
यदि बच्‍चे को बुखार आ रहा हो तो...
* बुखार में सिरदर्द हो तो गर्म पानी या दूध में सोंठ का पाउडर मिलाकर सिर पर लेप करें या फिर जायफल पीसकर लगाएं।
* काली मिर्च के १२५ मि.ग्रा. पाउडर में तुलसी का रस और शहद मिलाकर बच्‍चे को दिन में तीन बार दें। बच्‍चे को काफी आराम मिलेगा।
* बुखार में पसीना अधिक आ रहा हो और हाथ पैरों में ठंड लग रही हो तो सोंठ पाउडर को हल्‍के हाथों से लगाएं। इससे काफी आराम मिलेगा।
* बुखार तेज हो तो प्‍याज को बारीक काटकर पेट और सिर पर रखें। बुखार कम होने लगेगा।

Saturday, February 11, 2017

कंप्यूटर पर ज़्यादा देर तक काम करने के दुष्प्रभाव To work on the computer for too long side effects

   

  आजकल कंप्यूटर के बिना ज़िन्दगी अधूरी लगने लगी है. बहुत बड़ी जनसँख्या कंप्यूटर के सामने रोजाना बहुत से घंटे गुजारती है. चाहे स्टूडेंट हो, बिजनेसमैन हो या अकाउंटेंट हो, घर में समय काटने के लिए चैटिंग करती महिलाएं हो या विडियो गेम्स खलेते हुए बच्चे हो, सभी कंप्यूटर के सामने अपना काफी समय बिताते है, लेकिन कंप्यूटर के सामने ज्यादा बैठने से आँखों से सम्बंधित समस्याएं हो सकती हैं. ऐसी ही एक समस्या है कंप्यूटर विजन सिंड्रोम.
   इससे पीडि़त व्यक्ति की पलकें एक मिनट में 5-7 बार ही झपक पाती हैं. इस से आंखों में जलन और भारीपन हो जाता है. इस के साथ ही आंखों का पानी कम होने से आंखें सूखी महसूस होती हैं और थकान से दर्द करने लगती हैं. इस के अलावा सिर, गर्दन और कंधों में भी दर्द होने लगता है. कंप्यूटर के सामने बैठे रहने से उनकी आंख में धीरे-धीरे जलन सी महसूस होने लगती है. कुछ देर आराम करने पर थोड़ी राहत मिलती है लेकिन कंप्यूटर पर काम के लिए लौटते ही फिर से दिक्कत होने लगती है.   आज 21वीं सदी में कंप्यूटर अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है. फिर चाहे नौकरी, व्यापार, हॉस्पिटल, दुकानें, स्कूल या फिर घर ही क्यो ना हो. हर जगह कंप्यूटर की भूमिका अहम है. सीधे शब्दों में यह कह सकते है कि अगर आज के समय में आपको कंप्यूटर चलाना नही आता है तो तरक्की तो क्या नौकरी मिलना भी मुश्किल है. सिर्फ़ कंप्यूटर ही नही बल्कि मोबाइल, टेबलेट, लैपटॉप आदि आधुनिक चीज़ें इंसानों की अहम ज़रूरत बन गई है. सिर्फ़ देश-विदेशों में ही नही बल्कि गाँवों में भी इन साधनों ने अपनी पकड़ बनायें रखी है. जहाँ ये मशीने हमें सुख-सुविधायें दे रही है, जीवन को आसान और सहज बना रही है. वही दूसरी और खामोशी से हमें नुकसान भी पहुँचा रही है. देखा जायें तो पहले की तुलना में इंसान बहुत ही सक्षम हुआ है. लेकिन इस सक्षमता के पीछे इंसानों ने बहुत बड़ी कीमत अदा की है, जैसे कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तीनों रूप में ही इंसान दिनों दिन कमजोर हो रहा है. कंप्यूटर पर लगातार बैठकर काम करने से शरीर को नुकसान होता है यह आप जानते है. लेकिन इससे क्या-क्या नुकसान है और इन परेशानियों से कैसे बचा जायें, यह हम आपको इस लेख से अवगत करायेंगे.



हाल ही ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च ने यह दावा किया है कि अधिक समय तक एक ही मुद्रा में कंप्यूटर के सामने बैठ कर काम करने से शरीर के प्रत्येक अंग को किसी ना किसी रूप में नुकसान ज़रूर होता है. यह उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी है जो बिना वज़ह कंप्यूटर का इस्तेमाल करते है. वे अपने स्वास्थ्य के लिए सतर्क हो जायें. कई लोग काम ख़त्म होने के बाद भी chatting, gaming, Facebook आदि पर अपना समय नष्ट करते है और बिमारियों को न्यौता देते है. कंप्यूटर से निकलने वाली हानिकारक किरणें आपकी ऑंखें और गलत तरीके से बैठने की आदत से आपकी पीठ, कमर, पैर आदि कई अंग दर्द की चपेट में आ जाते है. इसके अलावा अनिंद्रा, स्ट्रेस, उच्च-रक्तचाप, मोटापा जैसी कई गंभीर समस्या भी एक ही जगह लगातार बैठ कर काम करने की आदत से उत्पन्न होती है.
  हम यह नही कहना चाहते कि कंप्यूटर का इस्तेमाल घातक है, बल्कि यह समझाना चाहते है कि ज़रा सी सावधानी और सतर्कता के साथ कंप्यूटर का उचित उपयोग करें. जिससे आपका काम भी ना रुके और आप एक स्वस्थ जीवन भी जी सके. बस ज़रूरत है तो अपने इस आधुनिक जीवन शैली में ज़रा से परिवर्तन की, जिससे आप अपने आप को काम करते हुए भी तरोताज़ा महसूस करे.
तो आइये जाने अधिक समय तक कंप्यूटर पर काम करते रहने के दुष्प्रभावों को और सतर्कता को
लगातार कम्प्यूटर , लैपटॉप या मोबाइल पर काम करने के कारण आँखों व शरीर को नुकसान पहुंचता है। बिना आँखों को आराम दिए लगातार लंबे समय तक स्क्रीन पर आँखें गढ़ा कर काम करने से ऑंखें ख़राब हो सकती है। सामान्य तौर पर एक मिनट में 15 -18 बार पलक झपकती है। स्क्रीन देखते समय पलक इसकी आधी बार ही झपक पाती है। इस वजह से आँखों की नमी सूख जाती है। ऑंखें भारी-भारी लगने लगती है। आंख में पानी कम हो जाता है। आँखों की नमी सूख जाती है। आँखों में जलन , लाली व खुजली हो सकती है , आँखों से धुंधला दिखने लगता है। ऑंखें थक जाती है और दर्द करने लगती है। सिरदर्द होने लगता है। गर्दन और पीठ में दर्द भी हो सकता है।अगर आपकी कोई सिटींग जॉब है तो आप लगातार घंटो तक स्क्रीन पर काम नहीं करें और बीच बीच में ब्रेक लेते रहे. कंप्यूटर पर काम करते समय खास तरह का चश्मा पहनना चाहिए. अगर आंखों में किसी भी तरह की तकलीफ हो तो डाक्टर से सलाह लेने में देर न करें. कंप्यूटर पर काम करने के दौरान सीधे बैठे और अपनी आँखों को बार बार ब्लिंक करें ताकि आपकी आँखों की नमी बनी रहे.
सिर और गर्दन:-
 अधिक समय तक बैठे रहने से खून के थक्के बन जाते हैं, जो मस्तिक तक पहुँच कर स्ट्रोक का कारण बन सकते है. अधिक देर तक काम करने से सिर दर्द की समस्या हो सकती है. लेकिन हमें यह समझना होगा कि यह समस्या बिल्कुल भी साधारण नहीं है, लंबे अंतराल के पश्चात् यह समस्या माइग्रेन तथा डिप्रेशन में भी बदल सकती है. इतना ही नही लगातार सर में दर्द रहने के कारण हमारे कार्य और सोचने की क्षमता पर भी असर पड़ता है. साथ ही यह आदत गर्दन को भी हानि पहुँचाती है. दिन भर बैठे रहने के दौरान टांगों में इकट्ठा हुआ तरल गर्दन तक चला जाता है, जिसके चलते स्लीप एप्निया(नींद में सांस का रुकना) जैसी समस्या पैदा हो सकती है. इसके अलावा गर्दन की मांसपेशियों में खिंचाव के चलते दर्द भी हो सकता है.
* आँखों को नुकसान:-
 एक ही मुद्रा में बैठकर लगातार कई घंटे तक कंप्यूटर पर कार्य करते रहने से आँखों को हानि पहुँचती है. क्योंकि कंप्यूटर स्क्रिन से निकलने वाली नीली तरंगें आपकी आँखों को क्षति पहुँचाती है. आप कितना भी अपनी आंखों को सुरक्षा प्रदान करें किंतु ज्यादा देर तक कंप्यूटर के आगे बैठे रहने से आंखों में दर्द और आँखों का कमजोर होना तय है.



* रक्त संचार का कम होना:-
 ज्यादा देर तक कंप्यूटर के आगे बैठे रहने से सबसे पहले आपकी शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती है जिसके कारण रक्त संचार भी कम होता जाता है. यह शरीर के लिए बहुत ही ख़तरनाक हो सकता है, जिसके कारण आपको दमा, उच्च-रक्तचाप, तनाव आदि बिमारियाँ होने की आशंका रहती है.
* लंग और हार्ट पर असर:- 
यदि आप दिन में ज़्यादातर समय बैठ कर बिताते हैं तो पल्मोनरी एम्बोलिज्म यानी लंग में खून के थक्के जमने की आशंका दोगुना हो जाती है, जिसका असर दिल पर भी पड़ता है. क्‍योंकि असंतुलित जीवन शैली का अनुसरण करने वाले लोगों में लगातार चलते फिरते रहने वालों लोगों की तुलना में मधुमेह तथा हृदय रोग पैदा होने कि संभावना अधिक होती है.
* पैर, उंगलियाँ और बाँहों पर असर:-
 कई देर तक बैठे रहने के कारण पैर सुन्न हो जाते है जिस कारण रक्त प्रवाह कम हो जाता है. जिसका नुकसान पैरों की नाड़ियों को पहुँचता है. बैठे रहने की आदत से नाड़ियों पर दबाव पड़ता है. इसके अलावा इस आदत का असर बांहों पर भी पड़ता है. शारीरिक गतिविधि की कमी से उच्च-रक्तचाप व हाइपरटेंशन की समस्या उत्पन्न हो जाती है. कंप्यूटर के की-बोर्ड पर घंटों टाइप करने के कारण उँगलियों और कलाई में दर्द शुरू हो जाता है. जिससे आपका हाथ भी प्रभावित हो जाता है. अधिक समय तक कलाई को एक ही जगह पर रखकर शीघ्रता से की-बोर्ड पर टाइपिंग करते रहने से उँगलियों में सूजन, दर्द, झंझनाहट की समस्या हो जाती है.
* गलत तरीके से बैठे रहने के कारण शरीर में दर्द रहना:-
कंप्यूटर पर अधिक देर तक गलत तरीके से बैठ कर काम करने के कारण आपके शरीर में दर्द शुरू हो सकता है. यह समस्या सभी व्यक्तियों को अलग-अलग समय पर शुरू होती है, जैसे कि कुछ व्यक्तियों को शुरू के कुछ माह में तो कुछ लोगो को कुछ समय के बाद यह समस्या शुरू हो जाती है. गलत तरीके से बैठने के कारण सर में, गर्दन में तथा कंधे में दर्द रहने लग जाता है तथा रीढ़ के अंदर हल्के-हल्के दर्द के आप आदि हो जाते है.
* पीठ व पेट पर असर:लम्बे अंतराल तक बैठे रहने से पीठ पर अधिक दबाव पड़ता है. जिससे भविष्‍य में रीढ़ की हड्डी में संकुचन पैदा हो जाती है. क्योंकि दबाव के कारण मांसपेशियां कड़क हो जाती हैं और ऐसी हालत में एकदम उठना चोट का कारण बन सकता है. लगातार बैठने से पीठ के अलावा पेट पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है. ज़्यादा देर तक बैठे रहने से मोटापा और कोलोन कैंसर की समस्‍या पैदा हो सकती है.>इन सभी समस्याओं को आप ज़रा सी सावधानी और सजगता से दूर कर सकते है. नीचे दिए गये कुछ टिप्स का पालन करे.
कंप्यूटर कि स्क्रीन कलर को कंट्रास्‍ट रखें. फॉन्‍ट को गहरा और बैकग्राउंड हल्के रंग का रखे. जिससे आँखों पर अधिक ज़ोर नही पड़ेगा.



लगातार कंप्यूटर पर काम ना करे. हर 1-2 घंटे बाद कुछ मिनट का ब्रेक ले. टहल के आये, फिर फ्रेश मूड से कार्य करे|

कंप्यूटर के सामने काम करते-करते भी आप छोटी-मोटी कसरत कर सकते है जैसे कि हाथों को लंबा करना, पैरों को सीधा करके हिलाना, आँखों को कुछ क्षण के लिए बंद करके बैठना आदि|
कंप्यूटर पर काम करने के लिए एक खाश चश्‍मा आता है, जिसमें एंटी-लेयर ग्‍लास होते है. इससे आपकी आंखों की रोशनी पर दुष्प्रभाव नही पड़ेगा और आंखें हमेशा स्वस्थ रहेगी. जिन लोगों को अधिक समय तक स्क्रीन के सामने बैठने का काम पड़ता है, उन्हें इसका उपयोग जरुर करना चाहिए|
काम करते समय अधिक चकाचौंध वाली रोशनी से बचना चाहिए, ऐसी जगह काम करें जहां लाईट की सही व्‍यवस्‍था हो. बहुत ज्यादा या बहुत कम रोशनी वाली जगह पर बैठकर काम ना करे|
की-बोर्ड पर काम करते समय कलाई को सीधा रखें क्योंकि कलाई को मोड़ कर काम करने से नर्व के लिए कम जगह बचती है और उन पर दबाव पड़ता है. कोहनी को करीब 90 डिग्री पर रखना उचित है|
कुर्सी की इतनी ऊँचाई होनी चाहिए की कंप्यूटर की स्क्रीन आपकी आँखों की सीध पर हो और आपके पैर फर्श पर आयें जिससे आपका घुटना 90 डिग्री के एंगल पर और कमर को टिकाते वक्त यह एंगल 20 डिग्री अधिक हो, यानी आपकी कमर कुछ पीछे की ओर 110 डिग्री के एंगल पर हो.कंप्यूटर का आधुनिक युग में बहुत बड़ा योगदान है, इसलिए इसकी सेवा से हम वंचित नही रह सकते. क्योकि आजकल ज़्यादातर लोग अपना सभी काम कंप्यूटर पर ही करते है. अगर आप भी कंप्यूटर प्रेमी है तो इससे होने वाले दुष्प्रभाव और सावधानियों का ख्याल रखे. जिससे लंबे अंतराल तक आप बिना रुकावट के अपना काम कर पायें. इन सावधानियों के उपरांत भी अगर आपको कंप्यूटर के सामने सिटिंग में या कोई अन्य प्रॉब्लम हो रही है तो आप अतिशीघ्र अपने डॉक्टर से संपर्क करे और ईलाज करवायें|

भगंदर (फिश्चुला) के लक्षण और उपचार Fistula-in-ano (Fischula) Symptoms and Treatment

    

    भगन्दर गुदा क्षेत्र में होने वाली एक ऐसी बीमारी है जिसमें गुदा द्वार के आस पास एक फुंसी या फोड़ा जैसा बन जाता है जो एक पाइपनुमा रास्ता बनाता हुआ गुदामार्ग या मलाशय में खुलता है। शल्य चिकित्सा के प्राचीन भारत के आचार्य सुश्रुत ने भगन्दर रोग की गणना आठ ऐसे रोगों में की है जिन्हें कठिनाई से ठीक किया जा सकता है। इन आठ रोगों को उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में 'अष्ठ महागद कहा है।
   एनल फिस्टुला यानि भगंदर एक ऐसा रोग है जिस के इलाज में लापरवाही बरतने पर बाद में कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं जैसे गुदा यानी (Anus) में फोड़ा और सूजन आंतो में विकार या आंतों में कैंसर और रेक्टम (मलाशय) की तपेदिक आदि |
भगन्दर गुद प्रदेश में होने वाला एक नालव्रण है जो भगन्दर पीड़िका (abscess) से उत्पन होता है। इसे इंग्लिश में फिस्टुला (Fistula-in-Ano) कहते है। 
   बवासीर बहुत पुराना होने पर भगन्दर हो जाता है। जिसे अंग़जी में फिस्टुला कहते हें। इसलिए बवासीर को नज़र अंदाज़ ना करे। भगन्दर का इलाज़ अगर ज्यादा समय तक ना करवाया जाये तो केंसर का रूप भी ले सकता है। जिसको रिक्टम केंसर कहते हें। जो कि जानलेवा साबित होता है। ऐसा होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है ।यह गुद प्रदेश की त्वचा और आंत्र की पेशी के बीच एक संक्रमित सुरंग का निर्माण करता है जिस में से मवाद का स्राव होता रहता है। यह बवासीर से पीड़ित लोगों में अधिक पाया जाता है। सर्जरी या शल्य चिकित्सा या क्षार सूत्र के द्वारा इस में से मवाद को निकालना पड़ता है और कीटाणुरहित करना होता है। आमतौर पर यही चिकित्सा भगन्दर रोग के इलाज के लिए करनी होती है जिस से काफी हद तक आराम भी आ जाता है




भगन्दर रोग के लक्षण (Fistula-in-Ano Symtopms)

मलद्वार से खून का स्राव होना
मलद्वार के आसपास जलन होना
मलद्वार के आसपास सूजन
मलद्वार के आसपास दर्द
खूनी या दुर्गंधयुक्त स्राव निकलना
थकान महसूस होना
इन्फेक्शन (संक्रमण) के कारण बुखार होना और ठंड लगना
भगन्दर रोग उत्पंन होने के पहले गुदा के निकट खुजली, हडि्डयों में सुई जैसी चुभन, दर्द, दाह (जलन) तथा सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। भगन्दर के पूर्ण रुप से निकलने पर तीव्र वेदना (दर्द), नाड़ियों से लाल रंग का झाग तथा पीव आदि निकलना इसके मुख्य लक्षण हैं।
बार-बार गुदा के पास फोड़े का निर्माण होता
मवाद का स्राव होना
मल त्याग करते समय दर्द होना
भगन्दर रोग अधिक पुराना होने पर हड्डी में सुराख बना देता है जिससे हडि्डयों से पीव निकलता रहता है और कभी-कभी खून भी आता है। कुछ दिन बाद इसी रास्ते से मल भी आने लगता है।
नीम:
नीम की पत्तियां, घी और तिल 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर उसमें 20 ग्राम जौ के आटे को मिलाकर जल से लेप बनाएं। इस लेप को वस्त्र के टुकड़े पर फैलाकर भगन्दर पर बांधने से लाभ होता है।
नीम की पत्तियों को पीसकर भगन्दर पर लेप करने से भगन्दर की विकृति नष्ट होती है।
गुड़:
पुराना गुड़, नीलाथोथा, गन्दा बिरोजा तथा सिरस इन सबको बराबर मात्रा लेकर थोड़े से पानी में घोंटकर मलहम बना लें तथा उसे कपड़े पर लगाकर भगन्दर के घाव पर रखने से कुछ दिनों में ही यह रोग ठीक हो जाता है। अगर गुड पुराना ना हो तो आप नए गुड को थोड़ी देर धुप में रख दे, इसमें पुराने गुड जिने गुण आ जाएंगे।
शहद:



शहद और सेंधानमक को मिलाकर बत्ती बनायें। बत्ती को नासूर में रखने से भगन्दर रोग में आराम मिलता है।

केला और कपूर-
एक पके केले को बीच में चीरा लगा कर इस में चने के दाने के बराबर कपूर रख ले और इसको खाए, और खाने के एक घंटा पहले और एक घंटा बाद में कुछ भी नहीं खाना पीना।
चोपचीनी और मिस्री
भगंदर के लिए चोपचीनी और मिस्री पीस कर इनके बराबर देशी घी मिलाइए।20-20 ग्राम के लड्डू बना कर सुबह शाम खाइए। परहेज नमक तेल खटाई चाय मसाले आदि हैं। अर्थात फीकी रोटी घी शक्कर से खा सकते हैं। दलिया बिना नमक का हलवा आदि खा सकते हैं। इससे 21 दिन में भगन्दर सही हो जायेगा। इसके साथ सुबह शाम १-१ चम्मच त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी के साथ ले। इसके साथ रात को सोते समय कोकल का चूर्ण आपको बाजार से मिल जाएगा वो एक चम्मच गुनगुने पानी के साथ ले। 21 दिन में भगन्दर सही हो जायेगा। ये बहुत लोगो द्वारा आज़माया हुआ नुस्खा हैं।
पुनर्नवाः
पुनर्नवा, हल्दी, सोंठ, हरड़, दारुहल्दी, गिलोय, चित्रक मूल, देवदार और भारंगी के मिश्रण को काढ़ा बनाकर पीने से सूजनयुक्त भगन्दर में अधिक लाभकारी होता है। पुनर्नवा शोथ-शमन कारी गुणों से युक्त होता है।
पुनर्नवा के मूल को वरुण (वरनद्ध की छाल के साथ काढ़ा बनाकर पीने से आंतरिक सूजन दूर होती है। इससे भगन्दर के नाड़ी-व्रण को बाहर-भीतर से भरने में सहायता मिलती है।
योग और व्यायाम
30 मिनट तक मध्यम-तीव्रता वाले व्यायाम या पैदल चलने से आँतों की नियमित गतिविधि और मलत्याग होता है, जिससे मल की अधिक मात्रा संचित होकर सख्त या कड़क नहीं हो पाती और इसका त्याग भी कठिनाई भरा नहीं होता।
मध्यम-तीव्रता के अन्य व्यायामों में वेक्यूम क्लीनर द्वारा सफाई और घास काटना आदि आते हैं।



योग
भगंदर में आराम देने वाले योगासनों में हैं:
धनुरासन
पवनमुक्तासन
त्रिकोणासन

स्नान व्यायाम- 
इस व्यायाम द्वारा क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ता है, जिससे ठीक होने में वृद्धि होती है। शुरू करने के लिए, गर्म पानी से टब को अधिकतम संभव स्थिति तक भर लें। टब में बैठने के दौरान, गुदा में मल के त्याग को रोकने वाली पेशी को सिकोड़ लें। इसके पश्चात् इस पेशी को ढीला छोड़ने पर ध्यान केन्द्रित करें। टब में बैठे रहने के दौरान प्रत्येक 5 मिनटों में सिकोड़ने और ढीला छोड़ने की क्रिया दोहराएँ। दिन में तीन बार टब में स्नान करें, और प्रत्येक स्नान के दौरान इस व्यायाम को करें 
परहेज और आहार
लेने योग्य आहारअधिक मात्रा में सब्जियाँ, गेहूँ का चोकर, साबुत अनाज की ब्रेड और दलिया तथा फल लें। यह निश्चित करें कि आप पर्याप्त मात्रा में पानी  छः से आठ गिलास प्रतिदिन ले रहे हैं। अपर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेने से कब्ज में बढ़ोतरी होती है।
गाजर, अन्नानास और संतरे का कच्चा रस पियें।
सेब, अन्नानास, संतरे, आडू, नाशपाती, अंगूर और पपीता सेवन हेतु उत्तम वस्तुएँ हैं।
पर्याप्त मात्रा में मेवे, शीरा, दालें, फलियाँ, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, टमाटर, पत्तागोभी, प्याज आदि का सेवन करें।
इनसे परहेज करें
मैदे और शक्कर से बने उत्पाद बिलकुल ना लें। इनमें बिस्कुट, केक्स, पेस्ट्रीज आदि आते हैं।
चावल, पनीर, परिरक्षक भी अस्वास्थ्यकारी होते हैं।