Sunday, January 22, 2017

चर्म रोग दूर करने के घरेलू उपाय

   
  चर्म रोग कई प्रकार के होते हैं। जैसे कि- दाद, खाज, खुजली, छाछन, छाले, खसरा, फोड़े, फुंसी आदि। बहुत से मामलों में हम आयुवेदिक व घरेलू उपचार से रोग को ठीक कर सकते हैं, पर कई मामलो में एक अच्छे dermatologist से सलाह लेना उचित होता है। Skin disease में बहुत से लोगों को होमियोपैथी की दवाओं से भी काफी लाभ मिलता है।

चर्म रोग होने के कारण -
चर्म रोग होने के कई कारण हो सकते हैं|खुजली का रोग ज़्यादातर शरीर में खून की खराबी के कारण उत्पन्न होता है।
गरम और तीखीं चिज़े खाने पर फुंसी और फोड़े निकल आ सकते हैं।
आहार ग्रहण करने के तुरंत बाद व्यायाम करने से भी चर्म रोग होने की संभावना रहती है।
उल्टी, छींक, डकार, वाहर (Fart), पिशाब, और टट्टी इन सब आवेगों को रोकने से चर्म रोग होने का खतरा रहता है।
शरीर पर लंबे समय तक धूल मिट्टी और पसीना जमें रहने से भी चर्म रोग हो सकता है।
और भोजन के बाद विपरीत प्रकृति का भोजन खाने से कोढ़ का रोग होता है। (उदाहरण – आम का रस और छाछ साथ पीना)।
अधिक कसे हुए कपड़े पहेनने पर और नाइलोन के वस्त्र पहनने पर भी चमड़ी के विकार ग्रस्त होने का खतरा होता है।
नहाने के साबुन में अधिक मात्रा में सोडा होने से भी यह रोग हो सकता है।
अधिकतर समय धूप में बिताने वाले लोगों को चर्म रोग होने का खतरा ज्यादा होता है।
किसी एंटीबायोटिक दवा के खाने से साइड एफेट्स होने पर भी त्वचा रोग हो सकता है।
महिलाओं में मासिक चक्र अनियमितता की समस्या हो जाने पर भी उन्हे चर्म रोग होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
शरीर में ज़्यादा गैस जमा होने से खुश्की का रोग हो सकता है।
त्वचा रोग के लक्षण- 
दाद-खाज होने पर चमड़ी एकदम सूख जाती है, और उस जगह पर खुजलाने पर छोटे छोटे दाने निकल आते हैं। समान्यतः किसी भी प्रकार के चर्म रोग में जलन, खुजली और दर्द होने की शिकायत  रहती है। शरीर में तेजा गरमी इकट्ठा होने पर चमड़ी पर सफ़ेद या भूरे दाग दिखने लगते हैं या फोड़े और फुंसी निकल आते हैं और समय पर इसका उपचार ना होने पर इनमें पीप भी निकलनें लगता है।
त्वचा रोग होने पर भोजन में परहेज़-

* भोजन में अचार, नींबू, नमक, मिर्च, टमाटर तैली वस्तुएं, आदि चीज़ों का सेवन बिलकुल बंद कर देना चाहिए। (चर्म रोग में कोई भी खट्टी चीज़ खाने से रोग तेज़ी से पूरे शरीर में फ़ेल जाता है।)।
*अगर खाना पचने में परेशानी रहती हों, या पेट में गैस जमा होती हों तो उसका उपचार तुरंत करना चाहिए। और जब यह परेशानी ठीक हो जाए तब कुछ दिनों तक हल्का भोजन खाना चाहिए।
*बाजरे और ज्वार की रोटी बिलकुल ना खाएं। शरीर की शुद्धता का खास खयाल रक्खे।
त्वचा रोग हो जाने पर, समय पर सोना, समय पर उठना, रोज़ नहाना, और धूप की सीधी किरणों के संपर्क से दूर रहेना अत्यंत आवश्यक है।
*खराब पाचनतत्र वाले व्यक्ति को चर्म रोग होने के अधिक chances होते हैं।
*त्वचा की किसी भी प्रकार की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को हररोज़ रात को सोने से पूर्व एक गिलास हल्के गुनगुने गरम दूध में, एक चम्मच हल्दी मिला कर दूध पीना चाहिए।
*त्वचा रोग होने पर बीड़ी, सिगरेट, शराब, बीयर, खैनी, चाय, कॉफी, भांग, गांजा या अन्य किसी भी दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन ना करें।
त्वचा रोग में  घरेलू उपचार- 
*पिसा हुआ पोदीना लेप बना कर चहेरे पर लगाया जाए और फिर थोड़ी देर के बाद चहेरे को ठंडे पानी से धो लिया जाए तो चहेरे की गरमी दूर हो जाती है, तथा स्किन चमकदार बनती है।

*अजवायन को पानी में उबाल कर जख्म धोने से उसमे आराम मिल जाता है।
गर्म पानी में पिसे हुए अजवायन मिला कर, उसका लेप दाद, खाज, खुजली, और फुंसी पर लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
*नमक मिले गर्म पानी से त्वचा को धोने या सेक करने से हाथ-पैर और ऐडियों की दरारें दूर होती हैं और दर्द में फौरन आराम मिल जाता है।
*गरम पानी में नमक मिला कर नहाने से सर्दी के मौसम में होने वाले त्वचा रोगों के सामने रक्षण मिलता है। और अगर रोग हो गए हों तो इस प्रयोग के करने से रोग समाप्त हो जाते हैं।
*नहाते समय नीम के पत्तों को पानी के साथ गरम कर के, फिर उस पानी को नहाने के पानी के साथ मिला कर नहाने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है।
*नीम की कोपलों (नए हरे पत्ते) को सुबह खाली पेट खाने से भी त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
त्वचा के घाव ठीक करने के लिए नीम के पत्तों का रस निकाल कर घाव पर लगा कर उस पर पट्टी बांध लेने से घाव मिट जाते हैं। (पट्टी समय समय पर बदलते रहना चाहिए)।
*मूली के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से किसी भी प्रकार के त्वचा रोग में राहत हो जाती है।
*प्रति दिन तिल और मूली खाने से त्वचा के भीतर जमा हुआ पानी सूख जाता है, और सूजन खत्म खत्म हो जाती है।
*मूली का गंधकीय तत्व त्वचा रोगों से मुक्ति दिलाता है।
*मूली में क्लोरीन और सोडियम तत्व होते है, यह दोनों तत्व पेट में मल जमने नहीं देते हैं और इस कारण गैस या अपचा नहीं होता है।
*मूली में मेग्नेशियम की मात्रा भी मौजूद होती है, यह तत्व पाचन क्रिया नियमन में सहायक होता है। जब पेट साफ होगा तो चमड़ी के रोग होने की नौबत ही नहीं होगी।
हर रोज़ मूली खाने से चहरे पर हुए दाग, धब्बे, झाईयां, और मुहासे ठीक हो जाते हैं।
*त्वचा रोग में सेब के रस को लगाने से उसमें राहत मिलती है। प्रति दिन एक या दो सेब खाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। त्वचा का तैलीयपन दूर करने के लिए एक सेब को अच्छी तरह से पीस कर उसका लेप पूरे चहरे पर लगा कर दस मिनट के बाद चहरे को हल्के गरम पानी से धो लेने पर “तैलीय त्वचा” की परेशानी से मुक्ति मिलती है।
*सूखी चमड़ी की शिकायत रहती हों तो सरसों के तैल में हल्दी मिश्रित कर के उससे त्वचा पर हल्की मालिश करने से त्वचा का सूखापन दूर हो जाता है।
*हल्दी को पीस कर तिल के तैल में मिला कर उससे शरीर पर मालिश करने से चर्म रोग जड़ से खत्म होते हैं।
*चेहरे के काले दाग और धब्बे दूर करने के लिए हल्दी की गांठों को शुद्ध जल में घिस कर, उस के लेप को, चेहरे पर लगाने से दाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।
*करेले के फल का रस पीने से शरीर का खून शुद्ध होता है। दिन में सुबह के समय बिना कुछ खाये खाली पेट एक ग्राम का चौथा भाग “करेले के फल का रस” पीने से त्वचा रोग दूर होते हैं।
*दाद, खाज और खुजली जैसे रोग, दूर करने के लिए त्वचा पर करेले का रस लगाना चाहिए।
*रुई के फाये से गाजर का रस थोड़ा थोड़ा कर के चहेरे और गरदन पर लगा कर उसके सूखने के बाद ठंडे पानी से चहेरे को धो लेने से स्किन साफ और चमकीली बन जाती है।
*प्रति दिन सुबह एक कप गाजर का रस पीने से हर प्रकार के त्वचा रोग दूर होते हैं। सर्दियों में त्वचा सूखने की समस्या कई लोगों को होती है, गाजर में विटामिन A भरपूर मात्रा में होता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने से त्वचा का सूखापन दूर होता है।
*पालक और गाजर का रस समान मात्रा में मिला कर उसमें दो चम्मच शहद मिला कर पीने से, सभी प्रकार के चर्म रोग नाश होते हैं।
*गाजर का रस संक्रमण दूर करने वाला और किटाणु नाशक होता है, गाजर खून को भी साफ करता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने वाले व्यक्ति को फोड़े फुंसी, मुहासे और अन्य चर्म रोग नहीं होते हैं।
*काली मिट्टी में थोड़ा सा शहद मिला कर फोड़े और फुंसी वाली जगह पर लगाया जाए तो तुरंत राहत हो जाती है।
*फुंसी पर खाज,शहद लगाने से फौरन राहत हो जाती है।
*शहद में पानी मिला कर पीने से फोड़े, फुंसी, और हल्के दाग दूर हो जाते हैं।
*सेंधा नमक, दूध, हरड़, चकबड़ और वन तुलसी को समान मात्रा में ले कर, कांजी के साथ मिला कर पीस लें। तैयार किए हुए इस चूर्ण को दाद, खाज और खुजली वाली जगहों पर लगा लेने से फौरन आराम मिल जाता है।
*हरड़ और चकबड़ को कांजी के साथ कूट कर, तैयार किए हुए लेप को दाद पर लगाने से दाद फौरन मीट जाता है।
*पीपल की छाल का चूर्ण लगा नें पर मवाद निकलने वाला फोड़ा ठीक हो जाता है। चार से पाँच पीपल की कोपलों को नित्य सुबह में खाने से एक्ज़िमा रोग दूर हो जाता है। (यह प्रयोग सात दिन तक लगातार करना चाहिए)।
*नीम की छाल, सहजन की छाल, पुरानी खल, पीपल, हरड़ और सरसों को समान मात्रा में मिला कर उन्हे पीस कर उसका चूर्ण बना लें। और फिर इस चूर्ण को गौमूत्र में मिश्रित कर के त्वचा पर लगाने से समस्त प्रकार के जटिल त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
*अरण्डी, सौंठ, रास्ना, बालछड़, देवदारु, और बिजौरे की छड़ इन सभी को बीस-बीस ग्राम ले कर एक साथ पीस लें। उसके बाद इन्हे पानी में मिला कर लेप तैयार कर लें और फिर उस लेप को त्वचा पर लगा लें। इस प्रयोग से समस्त प्रकार के चर्म रोग दूर हो जाते हैं।
*खीरा खाने से चमड़ी के रोग में राहत मिलती है। ककड़ी के रस को चमड़ी पर लगाने से त्वचा से मैल दूर होता है, और चेहरा glow करता है। ककड़ी का रस पीने से भी शरीर को लाभ होता है।
*प्याज को आग में भून कर फोड़ों और फुंसियों और गाठों पर बांध देने से वह तुरंत फुट जाती हैं। अगर उनमें मवाद भरा हों तो वह भी बाहर आ निकलता है। हर प्रकार की जलन, सूजन और दर्द इस प्रयोग से ठीक हो जाता है। इस प्रयोग से infection का जख्म भी ठीक हो जाता है। प्याच को कच्चा या पक्का खाने से त्वचा में निखार आता है।
*प्रति दिन प्याज खाने वाले व्यक्ति को लू (Heat stroke) कभी नहीं लगती है।
*पोदीने और हल्दी का रस समान मात्रा में मिश्रित कर के दाद खाज खुजली वाली जगहों पर लगाया जाए तो फौरन राहत मिल जाती है।
*खाज और खुजली की समस्या में ताज़ा सुबह का गौमूत्र त्वचा पर लगाने से आराम मिलता है।
*जहां भी फोड़े और फुंसी हुए हों, वहाँ पर लहसुन का रस लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
*लहसुन और सूरजमुखी को एक साथ पीस कर पोटली बना कर गले की गांठ पर (कण्ठमाला की गील्टियों पर) बांध देने से लाभ मिलता है।
*सरसों के तेल में लहसुन की कुछ कलीयों को डाल कर उसे गर्म कर के, (हल्का गर्म) उसे त्वचा पर लगाया जाए तो खुजली और खाज की समस्या दूर हो जाती है।
एक्जिमा रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
एक्जिमा रोग को ठीक करने के लिए नाड़ी शोधन, भस्त्रिका, प्राणायाम क्रिया करना भी लाभदायक है। लेकिन इस क्रिया को करने के साथ-साथ रोगी व्यक्ति को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार भी करना चाहिए तभी एक्जिमा रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज कराने के साथ-साथ कुछ खाने पीने की चीजों जैसे- चाय, कॉफी तथा उत्तेजक पदार्थों का परहेज भी करना चाहिए तभी यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
*एक्जिमा रोग को ठीक करने के लिए हरे रंग की बोतल के सर्यूतप्त नारियल के तेल से पूरे शरीर की मालिश करनी चाहिए और धूप में बैठकर या लेटकर शरीर की सिंकाई करनी चाहिए। इससे एक्जिमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 28 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन कम से कम 8 बार पीना चाहिए तथा रोगग्रस्त भाग पर हरे रंग का प्रकाश कम से कम 25 मिनट तक डालना चाहिए। इस प्रकार से कुछ दिनों तक उपचार करने से एक्जिमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*औषधियों के द्वारा एक्जिमा रोग का कोई स्थायी इलाज नहीं हैं, लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा एक्जिमा रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
*एक्जिमा रोग में सबसे पहले रोगी व्यक्ति को गाजर का रस, सब्जी का सूप, पालक का रस तथा अन्य रसाहार या पानी पीकर 3-10 दिन तक उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 15 दिनों तक फलों का सेवन करना चाहिए और इसके बाद 2 सप्ताह तक साधारण भोजन करना चाहिए। इस प्रकार से भोजन का सेवन करने की क्रिया उस समय तक दोहराते रहना चाहिए जब तक कि एक्जिमा रोग पूरी तरह से ठीक न हो जाए।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को फल, हरी सब्जी तथा सलाद पर्याप्त मात्रा में सेवन करना चाहिए तथा 2-3 लीटर पानी प्रतिदिन पीना चाहिए।
*एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को नमक, चीनी, चाय, कॉफी, साफ्ट-ड्रिंक, शराब आदि पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को शाम के समय में लगभग 15 मिनट तक कटिस्नान करना चाहिए। इसके बाद पीड़ित रोगी को नीम की पत्ती के उबाले हुए पानी से स्नान करना चाहिए। इस पानी से रोगी को एनिमा क्रिया भी करनी चाहिए जिससे एक्जिमा रोग ठीक होने लगता है।
*प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सूत्रनेति, कुंजल तथा जलनेति करना भी ज्यादा लाभदायक है। इन क्रियाओं को करने के फलस्वरूप एक्जिमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में उपचार करने के साथ-साथ हलासन, मत्स्यासन, धनुरासन, मण्डूकासन, पश्चिमोत्तानासन तथा जानुशीर्षसन क्रिया करनी चाहिए। इससे उसका एक्जिमा रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
*सुबह के समय में रोगी व्यक्ति को खुली हवा में धूप लेकर शरीर की सिंकाई करनी चाहिए तथा शरीर के एक्जिमा ग्रस्त भाग पर कम से कम 2-3 बार स्थानीय मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। जब रोगी के रोग ग्रस्त भाग पर अधिक तनाव या दर्द हो रहा हो तो उस भाग पर भाप तथा गर्म-ठंडा सेंक करना चाहिए।
*प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 1-2 दिन भापस्नान तथा गीली चादर लपेट स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद रोगग्रस्त भाग की कपूर को नारियल के तेल में मिलाकर मालिश करनी चाहिए या फिर सूर्य की किरणों के द्वारा तैयार हरा तेल लगाना चाहिए। रोगी व्यक्ति को इस उपचार के साथ-साथ सूर्यतप्त हरी बोतल का पानी भी पीना चाहिए।
*नीम की पत्तियों को पीसकर फिर पानी में मिलाकर सुबह के समय में खाली पेट पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप एक्जिमा रोग धीरे-धीरे ठीक होने लगता है।
चरम रोग नुस्खे -
*गर्मी की घमौरियों पर बर्फ का टुकड़ा मलने से घमौरियां मुरझा जाती है और राहत मिलती है.
-तुलसी का अर्क लगाने से सभी तरह के चरम रोग चले जाते है .
- लहसुन पिस क्र उसमे पानी मिलकर लगाने से भी ठीक होता है .
-हाथ पाँव में जलन की शिकायत होने पर सौंफ के साथ बराबर मात्रा में धनिया व मिश्री मिलाकर पीस कर छान ले. खाना खाने के बाद 5-6 ग्राम की मात्रा में यह चूर्ण लेने से राहत मिलती है.
-नीम की पत्तियों को पीसकर हाथ पेरों पर लेप करने से जलन शांत होती है.
-चर्म रोगों में फिटकरी बड़ी गुणकारी होती है. जिस स्थान पर चर्म रोग हुआ हो उस स्थान को बार -बार फिटकरी के पानी से धोने से लाभ होता है.
-बादाम का तेल चहरे पर विशेषकर आँखों के आसपास मलने से झुर्रियां नहीं पड़ती.
-जड़ सहित तुलसी का हरा भरा पौधा लेकर धो लें, इसे पीसकर इसका रस निकालें। आधा लीटर पानी- आधा लीटर तेल डालकर हल्की
20 ग्राम शहद ठंडे पानी में मिलाकर चार पांच महीने तक रोज सुबह पीवे |
-प्रतिदिन 10 ग्राम सौंफ बिना मीठा मिलाये वैसे ही चबा -चबा कर नियमित कुछ दिनों तक खाने से रक्त शुद्ध होता है और त्वचा का रंग साफ़ होता है.
-गर्मी के दिनों में नींबू का शरबत पीये. इससे खून साफ़ होता है और ठंडक भी मिलती है.
-नीम के पत्ते डाल कर उबाले गए पानी से स्नान करने से चर्म रोग मिटते है.
-दाद, खाज, फुंसी, फोड़े इत्यादि चर्म रोगों में ताजे संतरे के छिलके पीस कर लगाने से लाभ होता है.
-सर्दी के दिनों में तिल का शुद्ध तेल शरीर पर मलने से शरीर में गर्मी आती है. रक्त की गति तीव्र होती है और त्वचा का रूखापन भी समाप्त होता है.

Friday, January 20, 2017

प्रसव पीड़ा का सामना कैसे करें?

 
  आप नौ महीने तक इस कीमती पल का इंतज़ार करते हैं। और यदि आपकी निर्धारित तारीख आने वाली है तो आप और भी अधिक अधीर हो जाते हालाँकि इस स्थिति से आप आसानी से और धैर्य से निपट सकते हैं। कभी कभी गर्भवती महिला अस्पताल पहुँचने से पहले प्रसव पीड़ा प्रेरित करने के लिए कई घरेलू उपचार लेती है।
    अगर आपको पता हो कि प्रसव के दौरान अपनी मदद के लिए आप क्या कर सकती हैं, तो यह आपके प्रसव अनुभव को सकारात्मक बनाने में मददगार हो सकता है। नीचे दी गईं हमारी तकनीकें भी आपको प्रसव पीड़ा का सामना करने में मदद करेंगी।
प्रसव का अनुभव दर्दभरा होता है। मगर, इस अनुभव को थोड़ा आसान बनाने के लिए आप काफी कुछ कर सकती हैं। देखें कि आप इस स्थिति में खुद को यथासंभव सहज कैसे रख सकती हैं, ताकि आप हर संकुचन का पूरा फायदा उठा सकें और अपने प्रसव को और आगे बढ़ा सकें।
*प्रसव के साथी
प्रसव के दौरान अपने साथ ऐसे व्यक्ति को रखें जिन पर आप स्नेह और विश्वास रखती हैं। यह व्यक्ति आपके पति, माँ या सास हो सकती हैं। ये आपकी हिम्मत को बढ़ा सकते हैं और आपको सहयोग कर सकते हैं। ये आपकी बात को डॉक्टर या नर्स तक पहुंचाने का काम भी कर सकते हैं।

*सही मुद्रा चुनें
आप प्रसव के दौरान किस मुद्रा में हैं, इससे आपको होने वाले दर्द और प्रसव की अवधि पर काफी असर पड़ता है। माना जाता है कि सीधे खड़े रहने से प्रसव में तेजी आती है और गुरुत्वाकर्षण बल आपके शिशु के जन्म को और आसान बनाता है। पीठ के बल लेटे रहने से आपका रक्त प्रवाह सीमित हो जाता है और आपके शिशु का जन्म हो पाना मुश्किल बना देता है। यह आपके पीठ के दर्द को भी और बढ़ा सकता है।
इसलिए, अगर आप बिस्तर पर हैं, तो अपनी पीठ के पीछे तकिये लगा लें, ताकि आप बैठी हुई स्थिति में आ जाएं। अगर, आपकी डॉक्टर अनुमति दें, तो आप खड़े होने या पलंग या दीवार को पकड़कर आगे की तुरफ झुकने का प्रयास कर सकती हैं।
*संकुचनों के बीच चहलकदमी
यह साबित हो चुका है कि संकुचनों के बीच चहलकदमी करना, आपके प्रसव की समयावधि घटा देता है। अपने पति या माँ को अपने साथ चलने के लिए कहें, ताकि आप संकुचन के दौरान उनका सहारा ले सकें।
*जीरे की चाय पियें: 

जीरे का उपयोग पाचन सम्बन्धी परेशानियों के लिए किया जा सकता है और यह मासिकधर्म की शुरुआत कराने और गैस में राहत दिलाने के लिए भी उपयोग किया जा सकता है |जीरे की एक कप चाय का उपयोग करते हुए प्रसव लायें |
चाय की कडवाहट को दूर करने के लिए थोड़ी चीनी या शहद मिलाएं |
*निप्पल को उत्तेजित करना-
यदि आप बिना किसी जटिलताओं के एक सुरक्षित और आरामदायक गर्भावस्था से गुज़र रहे हैं तो प्रसव पीड़ा को प्रेरित करने का यह एक उत्तम तरीका है। निप्पल को उत्तेजित करना बहुत आसान है तथा तथा इसके कारण प्रसव पीड़ा प्रेरित होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है क्योंकि इसके कारण ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का स्त्राव होता है जिसके कारण गर्भाशय में संकुचन होता है। यदि आप 40 सप्ताह से अधिक समय से गर्भवती हैं तो यह पद्धति काफी प्रभावी होती है। आपको इसे दिन में तीन बार एक एक घंटे करना होगा। परंतु ध्यान रहे कि इसे हल्के हाथों से करें। असके अलावा ऐसी गर्भावस्था जिसमें अधिक खतरा हो जैसे गर्भावस्था में मधुमेह, प्रीक्लाम्पसिया या उच्च रक्तदाब आदि

*प्रसव के दौरान श्वसन व्यायाम-
लयबद्ध तरीके से सांस लेने से आपको ऊर्जा संरक्षण में मदद कर सकता है। यह ऊर्जा आपको प्रसव से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती हैं। इससे आपके शिशु को भी पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है, ताकि वह भी जन्म के तनाव का सामना बेहतर ढंग से कर सके।
*मुलहटी खाएं: 
काली मुलहटी (ब्लैक लिकोरिस) के बारे में कहा जाता है कि यह प्रसव को प्रेरित करती है | प्राकृतिक मुलहटी का उपयोग करें जिसमे शर्करा कम मात्रा में पाई जाती है | आप इसे पिल्स के रूप में भी ले सकती हैं | मुलहटी अपने लेक्सेटिव (laxative) प्रभाव के द्वारा आँतों में ऐंठन उत्पन्न कर सकती है | आँतों की ऐंठन से गर्भाशय की ऐंठन को प्रेरित करने में मदद मिल सकती है
*आरामदायक स्नान करें- 

गरम पानी से नहायें और आपकी प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो जायेगी। आपकी भावनात्मक स्थिति भी आपके गर्भाशय में संकुचन उत्पन्न करने में सहायक होती है। सावधान रहें, पानी बहुत ज़्यादा गरम न हो क्योंकि इसके कारण आपके बच्चे को तनाव हो सकता है क्योंकि वह आपके शरीर के अंदर हैं जहाँ पहले से ही तापमान अधिक होता है। नहाने के इस पानी में आप लैवेंडर तेल की 1-2 बूंदे भी डाल सकते हैं इससे आपके शरीर को भी आराम मिलेगा तथा आपका मूड भी अच्छा हो जाएगा
*प्रसव के दौरान खान-पान-
कई महिलाओं को प्रसव के दौरान भूख व प्यास लगती है। ऐसा होना संभव है, क्योंकि अगर यह आपका पहला बच्चा है, तो आपका प्रसव लंबा चल सकता है। ऐसे भोजन खाएं, जो आपको लंबे समय के लिए ऊर्जा प्रदान करें, जैसे कि केले या एनर्जी बार। जितनी बार आपको प्यास लगे, आप पानी पीएं।
*अनानास-
अनानास भी प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में सहायक है क्योंकि इसमें ब्रोमेलैन नामक एंजाइम होता है जो गर्भाशय को नरम करता है और उसे पकता है। यदि आपकी गर्भावस्था के 40 महीने पूरे हो चुके हैं तो आप ताज़े अनानास खाकर भी स्वयं की सहायता कर सकते हैं। परंतु आपको सावधान रहने की आवश्यकता है क्योंकि इसे अधिक मात्रा में खाने से डायरिया हो सकता है और निश्चित रूप से जब आप प्रसव पीड़ा से गुज़र रहे हों तब आप यह नहीं चाहेंगे कि आपका पेट ख़राब हो। अनानास का जूस न पीयें क्योंकि जूस में ब्रोमेलैन नामक तत्व समाप्त हो जाता है।
*प्रसव के दौरान आराम-
प्रसव के दौरान आराम करना वास्तव में आसान नहीं है, मगर ऐसी कई तकनीक हैं जो आपकी इस काम में मदद कर सकती हैं। आराम करने से आप अपनी ऊर्जा का संरक्षण कर सकती हैं, ताकि आपको अपने संकुचन मजबूत करने या शिशु को जन्म देने में व्यवधान की जरुरत न पड़े|
*मसालेदार खाना खाएं-
अधिकाँश महिलाएं मसालेदार खाना खाना पसंद करती हैं विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान क्योंकि उनकी स्वादेन्द्रियाँ मसालेदार और स्वादिष्ट खाने की मांग करती हैं। अत: मसालेदार खाना भी प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करता है। हालाँकि यह पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हुआ है। प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में लहसुन एक बड़ी भूमिका निभाता है। यह आपके मल निष्कासन को उत्तेजित करता है तथा परिणामस्वरूप आपका मल पतला हो जाता है। इससे आपका गर्भाशय उत्तेजित हो जाता है तथा परिणामस्वरूप गर्भाशय में संकुचन प्रारंभ हो जाता है। इसके अलावा इसके द्वारा बच्चे को नीचे की ओर आने में सहायता मिलती है। इससे आपके बच्चे को बाहर आने में सहायता मिलती है।

*प्रसव के दौरान मालिश-
प्रसव के दौरान मालिश आपको आराम दे सकती है, क्योंकि इससे आपके शरीर में अच्छा महसूस करने वाले हॉर्मोन पैदा होते हैं। ये हॉर्मोन आपको आराम करने में मदद करेंगे। हालांकि, सभी महिलाओं को प्रसव के दौरान मालिश करना पसंद नहीं आता है। अपने प्रसव के सहयोगी को बताएं कि आप क्या चाहती हैं।
*कैस्टर ऑइल (एरंड का तेल)-
एरंड का तेल बहुत अधिक रेचक है तथा कुछ मामलों में यह प्रसव पीड़ा को उत्तेजित कर सकता है। अपने डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही इसकी कुछ मात्रा (114 मिली.) संतरे के रस में मिलकर लें। एरंड के तेल की चिकनाई पेट को उत्तेजित करती है जिसके कर्ण आपका मल पतला हो जाता है जिसके कारण गर्भाशय में संकुचन आना प्रारंभ हो जाते हैं। याद रखें इसकी थोड़ी मात्रा लेने से भी आपको मितली आ सकती है। आप प्रसव पीड़ा उत्तेजित करने के लिए पूर्ण रूप से इस पद्धति पर निर्भर नहीं रह सकते क्योंकि कभी कभी इसका उपयोग कोई असर नहीं करता। एरंड का तेल केवल पेट ख़राब करता है। इसके कारण मां या बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

Thursday, January 19, 2017

तुलसी से करें मधुमेह का पक्का इलाज

  

 मधुमेह के साथ लोगों को हर दिन स्वास्थ्य समस्याओं के साथ सौदा करना पड़ता है. मधुमेह खराब खान-पान और अनियंत्रित आदतों की वजह से बढ़ जाता है. मधुमेह का कोई ऐसा इलाज नहीं है जिससे उससे पूरी तरह से खत्म किया जा सके इसलिए लोग अक्सर उसे अनुपचारित छोड़ देते है. यह अंधापन, गुर्दे की बीमारी, रक्त वाहिनियों को नुकसान, संक्रमण, हृदय रोग, तंत्रिका क्षति, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक, अंग विच्छेदन और कोमा आदि बीमारियों को पैदा कर सकता है. वैसे तो बाजार में मधुमेह का इलाज इन्सुलिन और मेडिसिन्स द्वारा उपलब्ध है
   लेकिन  हम आपको कुछ ऐसे देसी इलाज बताएंगे जो आप घर बैठे कर सकते है.



*प्राकृतिक कच्चा भोजन सभी प्रकार के रोगों के लिए सबसे अच्छी दवा है. कच्चा भोजन शरीर के एंजाइमों में मिल जाता है. ऐसे खाद्य पदार्थ जिन्हें कच्चा खाया जा सकता है उन्हें कच्चा भोजन बोलते है जैसे की स्प्राउट्स, फल, जूस, नट आदि.
*ऐसा आहार जो सब्जियों और फलों का एक परफेक्ट मिक्स हो जिसमें सभी विटामिन्स और मिनरल्स हो जोकि शरीर के लिए एंटीऑक्सीडेंट के रूप में शरीर को अनचाहे रोगों से बचाए और ब्लड शुगर के हाई लेवल को कम करके शुगर को संतुलन में रखे.
*ऐसा कच्चा भोजन जिनमें फाइबर अधिक अधिक होता यही वो धीरे-धीरे शुगर लेवल को शरीर से खींच लेते है और इससे शरीर में ब्लड शुगर का लेवल संतुलित रहता है. फाइबर ब्लड शुगर के लेवल को स्थिर रखने का सबसे अच्छा काम करता है. सेब, खुमानी, चुकंदर, जामुन, गाजर, खट्टे फल आदि फाइबर से भरपूर होते है.
*तुलसी के पत्तों में ब्लड शुगर के स्तर को कम करने की शक्ति है. तुलसी के पत्तों में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट होता है जो की ब्लड शुगर को कंट्रोल करके एक्स्ट्रा शुगर कंटेंट को शरीर से निकलने में मदद करता है.

स्त्रियों के प्रमुख योन रोग, कारण,लक्षण,और उपचार

    अधिकांश महिला व पुरुष ऐसे होते हैं, जो संक्रमण के कारण इन रोगों की चपेट में आते हैं। सर्दियों की शुरुआत से ही ऐसे मरीजों की संख्या अचानक से बढ़ जाती है। सर्दियों में लोग शरीर की सफाई ठीक से नहीं रखते। कपड़े कई दिनों तक नहीं बदले जाते हैं। लोग नहाने से परहेज करते हैं। नहाने से परहेज करने और कपड़ों के लगातार न बदलने के कारण संक्रमण से फैलने वाले गुप्त रोगों की संभावना बढ़ जाती है।सर्दियों में शरीर की सफाई न रखने और नहाने से परहेज करने के कारण लोगों में गुप्त रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।



स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा
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सफेद कपड़ा, लाल कपड़ा प्रतिमास दो-चार बार होना, पेट में तकलीफ होना तथा कमर में दर्द बढ़ जाना आदि के उपचार में कच्चा पुदीना एक कट्टा लेकर दो गिलास पानी में उबालकर एक कप जूस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह (निराहार) एक बार और रात में सोते समय दूसरी बार पी लेना चाहिए। इस प्रकार 40 दिनों तक करते रहें। पथ्य में अचार, बैंगन, मुर्गी, अंडे तथा मछली आदि का प्रयोग न करें।
मासिक धर्म का रुक जाना-
:तीन-तीन महीने तक मासिक धर्म का न होना तथा पेट में पीड़ा होना आदि के लिए एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह निराहार पेट रात में भोजनोपरांत सोते समय पी लेना चाहिए। इस प्रकार सेवन एक महीने तक करते रहें। आलू तथा बैंगन वर्जित हैं।
पेशाब में जलन-
मूत्र नलियों में रक्त संचार सुचारू रूप से न होना और पेशाब से रक्त का जाना आदि में एक कप मौसम्मी का जूस लेकर उसमें आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर उसका सेवन करें। सुबह एक बार और दूसरी बार रात में सोने से पूर्व। दस दिन तक इस इलाज को जारी रखिए। खाने में गर्मी पैदा करने वाली वस्तुएं, मिर्च और खट्टी वस्तुओं का उपयोग कम करना चाहिए।
बवासीर का मस्सा-
एक चम्मच सिरके में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में दो बार मस्से की जगह पर लगाएं।
*तेल चुपड़ी रोटी शनिवार को कुत्ते को खिलाएं।
*एक कटोरी केसर पानी में घोलकर मरीज के कमरे में रख दें।
क्या सावधानी रखें गुप्त रोग होने पर-
* नहाने से परहेज न करें।



*प्रतिदिन अंत: वस्त्र व अन्य कपड़ों को बदलें।

*शौच के बाद शरीर के अंदरुनी अंगों को ठीक से साफ करें।
*पूर्व में संक्रमण से पीड़ित या एलर्जी वाले लोगों को अधिक सतर्क होने की है जरूरत।
*किसी भी प्रकार की समस्या होने पर उसे छुपाने की बजाय चिकित्सक से संपर्क करें।
खुजली के लिए आयुर्वेदिक उपचार-
जब त्वचा की सतह पर जलन का एहसास होता है और त्वचा को खरोंचने का मन करता है तो उस बोध को खुजली कहते हैं। खुजली के कई कारण होते हैं जैसे कि तनाव और चिंता, शुष्क त्वचा, अधिक समय तक धूप में रहना, औषधि की विपरीत प्रतिक्रिया, मच्छर या किसी और जंतु का दंश, फंफुदीय संक्रमण, अवैध यौन संबंध के कारण, संक्रमित रोग की वजह से, या त्वचा पर फुंसियाँ, सिर या शरीर के अन्य हिस्सों में जुओं की मौजूदगी इत्यादि से।
*खुजली वाली जगह पर चन्दन का तेल लगाने से काफी राहत मिलती है।
*दशांग लेप, जो आयुर्वेद की 10 जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है, खुजली से काफी हद तक आराम दिलाता है।

डेंगू बुखार से न घबराएँ, करें ये उपाय



  डेंगू बुखार मच्छरों द्वारा फैलाई जाने वाली बीमारी है. एडीज मच्छर (प्रजाति) के काटने से डेंगू वायरस फैलता है. बुखार के दौरान प्लेटलेट्स कम होना इसका मुख्य लक्षण हैं. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता. बुखार के साथ सबसे सामान्य लक्षण है सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और त्वचा का खराब हो जाना|
1)बुखार होने पर रोगी को लगातार पानी पिलाते रहें|,अगर सादा पानी ना पीया जाए तो नारियल पानी,शिकंजी,शरबत आदि पीते रहे,सबसे अधिक प्रयास बुखार उतारने का करें |पानी की पट्टियां बदते रहें|
2)अगर डेंगू का टेस्ट पोसिटिव भी आया है तो घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है |अगर लगातार पानी पीया जा रहा है और रोगी दो तीन घंटे में पेशाब कर रहा है तो तनिक भी घबराने की आवश्यकता नहीं है| बिना दवा के भी ,,डेंगू और अन्य वाइरल बुखार एक से डेढ़ हफ्ते में ठीक हो जाते है बशर्ते रोगी लगातार पानी पीता रहे |
3) डेंगू में आम तौर पर खतरनाक स्थिति तब नहीं बनती जब तक रोगी को बुखार रहता है| असली ख़तरा बुखार उतरने के बाद बढ़ता है जब रोगी लापरवाही से शारीरिक श्रम करने लगता है|सावधानी रखें ,पूर्ण विश्राम करें और पानी लगातार पीते रहे अगर बुखार के बाद रोगी उठने तक में असमर्थ अनुभव कर रहा है जोड़ों में भयानक दर्द अनुभव कर रहा है तो फिर तुरंत चिकित्सक से सलाह लें |



4)अगर उच्च और निम्न रक्तचाप में 40 से अधिक का अंतर आये ,लगातार पेट में दर्द बना रहे ,शरीर पर लाल चकत्ते बन रहे हो तब चिकित्सक से अवश्य परामर्श करें,लेकिन उस अवस्था में भी अगर रोगी लगातार पानी पी रहा है और घंटे दो घंटे में पेशाब करने जा रहा है तो घबराने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है|

5) गिलोय का आयुर्वेद में बहुत महत्व है. यह मेटाबॉलिक रेट बढ़ाने, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने और बॉडी को इंफेक्शन से बचाने में मदद करती है. गिलोय की बेल का लगभग 8 इंच का टुकडा एक गिलास पानी में उबाले ,आधा रहने पर रोगी को पिलायें अगर पीने में असुविधा हो रही हो तो उसे शरबत में मिला कर पिला दें इसमें तुलसी के पत्ते भी डाले जा सकते हैं|,लाभ अवश्य होगा|
6)एक बात जान लें कि डेंगू की कोई वेक्सीन नहीं बनी है इसलिए किसी लालची डॉ के पास धन और समय की बर्बादी ना करें |अगर बुखार उतारने के लिए कोई अंगरेजी दवा लेनी ही हो तो केवल पेरासीटामोल ही लें ,अन्य कोई भी दवा किसी भी हालत में ना लें|
7)यदि किसी को डेगूँ या साधारण बुखार के कारण प्लेटलेट्स कम हो गयी है तो एक होम्योपैथिक दवा है-
यूपेटर पर्फ़ 3x
   इस दवा की डायलुशन की 3 या 4 बूँदें प्रत्येक 2-2 घँटें में साधारण पानी में ड़ाल कर मात्र 2 दिन पिलायें । प्लेटलेट्स कम नहीं होगीं।

Wednesday, January 18, 2017

Homoeopathic Leucoderma Treatment – सफेद दाग का इलाज


सफेद दाग के कारण
यह रोग त्वचा द्वार ‘मिलेनिन’ नामक पदार्थ (जो कि त्वचा का रंग निर्धारित करता है) का बनना बंद हो जाने के कारण होता है, लेकिन त्वचा ग्रंथियों एवं कोशिकाओं में ऐसी कौन-सी खराबी आ जाती है कि मिलेनिन का बनना रुक जाता है, यह अभी तक अबूझ पहेली ही है। यह अण्डाकार अथवा छितरे हए धब्बों के रूप में शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इसमें किसी प्रकार की खुजली अथवा अन्य कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। अब    वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि संभवतया मानसिक दबाव के साथ-साथ थायराइड ग्रंथि से संबंधित बीमारियों में शरीर के ऊतकों में किसी वजह से कठोरता एवं सिकुड़ाव आ जाने के कारण,गंजापन होने के कारण एवं खून की कमी होने पर सफेद दाग के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। सिफिलिस रोग की वजह से भी सफेद दाग बन सकता है।
सफेद दाग का होमियोपैथिक इलाज



वैसे, व्यक्ति के हाव-भाव, आचार-विचार, पूर्व इतिहास, खान-पान आदि को देखते हुए समान लक्षणों के आधार पर कोई भी दवा दी जा सकती है, किन्तु निम्न दवाएं उपयोगी हैं- 
‘एल्युमिना’,
 ‘आर्सेनिक एल्बम’,
 ‘नेट्रमम्यूर’,
 ‘सीपिया’,
 ‘साइलेशिया’,
 ‘सल्फर’,
 ‘कैल्केरिया कार्ब’,
 ‘काबोंएनीमेलिस’,
 ‘मरक्यूरियस’,
 ‘एसिडफास’, 
‘माइका’,
 ‘हाइड्रोकोटाइल’, 
‘क्यूप्रम आर्स’,
 ‘कालमेघ
 ‘चेलीडोनियम’।
    सम्पूर्ण बातें रोगी से जानने के बाद एक व्यवस्थित मानसिक एवं शारीरिक आधार पर खोजी गई दवा अत्यन्त उपयोगी है, जिसे होमियोपैथी की भाषा में कान्सटीट्यूशनल रेमेडी कहते हैं। फिर बीमारी के कारणों के आधार पर दवा देते हैं, 
जैसे किसी रोग में ताम्र धातु का अभाव परिलक्षित होने पर ‘क्यूप्रम आर्स’ 3 × दवा, यकृत संबंधी परेशानियों के साथ सफेद दाग होने पर ‘कालमेघ’, ‘चेलीडोनियम’ दवाओं का अर्क,
 पेट की गड़बड़ी के साथ सफेद दाग होने पर ‘वेरवोनिया’ दवा का अर्क एवं ‘क्यूप्रम आक्स नाइग्रम’ दवा,
 सिफिलिस रोग होने पर ‘सिफिलाइनम’ नामक दवा दी जा सकती है।
त्वचा मोटी एवं पपड़ीदार होने पर ‘हाइड्रोकोटाइल’ दवा का अर्क अत्यंत कारगर है। बेचैनी, रात में डर, ठंड लगना, जाड़े में अधिकतर परेशानियों का बढ़ना, जल्दी-जल्दी ठंड का असर पड़ना, खुली हवा में घूमने से परेशानी बढ़ना, बहुत कमजोरी एवं हर वक्त लेटे रहने की इच्छा, सीधी करवट लेटने पर अन्य सभी परेशानियों का बढ़ जाना, जलन, सूखी त्वचा खुजलाने पर जलन बढ़ जाना, घुटने में पीड़ा, छाती में सुइयों की चुभन एवं सांस लेन में तकलीफ होने पर ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × अत्यधिक कारगर पाई गई है। 
लगभग 6 माह से लेकर तीन वर्ष तक लगातार दवा के सेवन से यह रोग पूर्णरूपेण ठीक हो जाता है।
 रात में परेशानियों का बढ़ जाना एवं शरीर में जगह-जगह घाव होने पर ‘सिफिलाइनम’ भी दी जा सकती है।‘माइक-30′ नामक दवा भी सफेद दाग के रोगियों में अत्यंत कारगर पाई गई है। 



आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी ‘अभ्रक’ के नाम से इस दवा के अनेकानेक गुण ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रंथ में वर्णित हैं, किन्तु इसके साथ भी ‘ट्यूबरकुलाइनम’, ‘सोराइनम’, ‘बेसिलाइनम’ अथवा ‘सिफिलाइनम’ जैसी कान्सटीट्यूशनल दवाएं दिया जाना आवश्यक है।

चिकित्सावधि में खट्टी वस्तुएं, खट्टे फल, विटामिन सी (एस्कार्विक एसिड), मैदा आदि पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में ही होना चाहिए। कुछ समय के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खाना बंद कर दें, तो ज्यादा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।

सफेद दाग ठीक हो सकता है
कुछ रोगी, जिनका शरीर 30 प्रतिशत से अधिक सफेद हो गया है या उनके होंठ, उंगलियों के पोर, हथेली, जननेन्द्रिय आदि से प्रभावित रोगियों का विशेष रक्त-परीक्षण करवाया गया है, जिसमें लोहा, तांबा, रांगा का प्रतिशत जरूरत से ज्यादा या कम पाया गया। रक्त की सफेद कोशिकाओं, जिसे ‘लिम्फोसाइट’ कहा जाता है, में टी और बी का प्रतिशत कम पाया गया।
• यदि स्त्रियों में रोने की प्रवृत्ति हो, तो ‘नेट्रमम्यूर’ दवा 1000 शक्ति की एक खुराक देकर अगले दिन से ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × में खिलानी चाहिए। पंद्रह दिन बाद ‘नेट्रमम्यूर’ की एक खुराक और ले लें इसके पंद्रह दिन बाद’बेसीलाइनम’ 1000 की एक खुराक लें।

Tuesday, January 17, 2017

जड़ी बूटियों से करें प्राकृतिक उपचार

     दवाओं की तुलना में उनका हर्बल उपचार करना ज्यादा बेहतर होता है। सैकड़ों वर्षों से हमारे देश में आयुर्वेद के अनुसार इलाज होता आ रहा है। एक अध्ययन के अनुसार आयुर्वेदिक उपचार ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी होते हैं इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। हम आपको कुछ हर्ब्स के बारे में बता रहे हैं जिनका आप रोज सेवन करेंगे तो आप छोटी मोटी स्वास्थ्य समस्याओं से बचे रहेंगे।
लहसुन
डायरिया, कब्ज, जुकाम, खांसी और साइनस में फायदेमंद, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।
उपयोग करने का तरीका:
प्रतिदिन 2-3 ताजा कली खाएं, लहसुन में एलिसिन मौजूद होता है इसके बाजार में कैप्सूल उपलब्ध हैं जिन्हें आप खा सकते हैं।
अदरक
फायदे:
जी मिचलाना, उल्टी, पेट की बीमारियों में फायदेमंद, सर्दी और फ्लू से निजात दिलाता है।
उपयोग करने का तरीका:
अदरक की चाय बनाकर पियें।
नुकसान:
ज्यादा मात्रा में अदरक का सेवन करने पर सीने में जलन की समस्या होने लगती है। गर्भवती महिलाओं को एक दिन में इसकी 1500 मिग्रा से अधिक मात्रा नहीं लेनी चाहिए।
अश्वगंधा
फायदे:
त्वचा चमकदार बनती है, दर्द निवारक के रुप में इस्तेमाल होता है, तनाव को कम करता है, वजन बढ़ाने में सहायक, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ावा देता है
उपयोग करने का तरीका:
आप अश्वगंधा की चाय बनाकर पी सकते हैं। इसके लिए एक कप पानी या दूध में एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण या एक उसकी जड़ के साथ उबाल लें इसे दिन में दो बार पियें। आजकल बाजार में अश्वगंधा कैप्सूल भी उपलब्ध हैं।
नुकसान:



अश्वगंधा के ज्यादा सेवन से नींद आती है, थायराइड हार्मोन को उत्तेजित कर देता है, शरीर की गर्मी बढ़ जाती है।

एल्डरबेरी
फायदे:
एल्डरबेरी के फूलों का इस्तेमाल सर्दी, जुकाम, फ्लू के इलाज के लिए होता है और इसमें जीवाणुरोधी गुण भी होता है।
उपयोग करने का तरीका:
दो चम्मच एल्डरबेरी के फूल की पत्तियां को एक कप पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इसे दिन में 2-3 बार पियें।
क्रैनबेरी

फायदे:
मूत्राशय के संक्रमण, प्रोस्टेंट ग्रंथि में होने वाला संक्रमण, सूजन प्रोस्टेटाइटिस को रोकने में उपयोग करने का तरीका:
प्रतिदिन आधा या तिहाई कप क्रैनबेरी का जूस पिएं। बाजार में उपलब्ध क्रैनबेरी कैप्सूल भी आप दिन में दो बार ले सकते हैं।



सेज


फायदे:
गले में खराश, खांसी और जुकाम में आराम मिलता है, जिन्हें ज्यादा पसीना आता है और रात में सोते वक्त पसीना आता है उनके लिए भी फायदेमंद है।
उपयोग करने का तरीका:
1 कप पानी में सेज की पत्तियां डालकर उबालें और ठंडा होने पर पियें। एक गले में खराश होने पर कुल्ला या गरारा करें।
सुझाव:
महिलायें गर्भावस्था के दौरान इसका उपयोग न करें।
गुड़हल

फायदे:
ब्लड प्रेशर को कम करता है, गले की बीमारियों और जुकाम को ठीक करने में फायदेमंद
उपयोग करने का तरीका:
1-2 चम्मच गुड़हल की पत्तियों को 10 मिनट तक पानी में उबालकर पियें।
मार्शमैलो

फायदे:



मार्शमैलो की जड़ या पत्ती एसिडिटी, गले में खराश और पेट की सूजन में फायदेमंद है।

उपयोग करने का तरीका:
एक चम्मच सूखी कटी हुई जड़ या पत्तियों को 2 कप पानी में उबालें और ठंडा होने पर इसे पियें।
सुझाव:
यदि मार्शमैलो के साथ कोई अन्य दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो इनके बीच कम से कम एक घंटे का गैप रखें क्योंकि तुरंत लेने पर मार्शमैलो उनके प्रभाव को कम कर सकता है।
कैटनिप

फायदे:
पेट ठीक रखता है, चिंता और तनाव को कम करता है
उपयोग करने का तरीका:
एक कप पानी में 4 से 5 ताजी या सूखी पत्तियों को डालकर 5 मिनट तक उबालें। इस काढें में आप चाहें तो स्वाद के लिए चीनी भी मिला सकते हैं। इसे दिन में कम से कम दो बार पियें।

पिलपिले टमाटरों को फिर से ताजा करें


    टमाटर हर सब्जी की शान होते है, ये हर सब्जी के स्वाद को बढाने के काम आता है|इस सादा, जूस, सलाद, सब्जी में और अन्य तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है. यही नहीं इसमें अनेक ऐसे तत्व भी होते है जिनके कारण इसका आयुर्वेद में भी अहम स्थान है.|गुणों की खान कही जाने वाली इस सब्जी की इतनी सारी खासियत है कि आप सोच भी नहीं पाओगे. जिस तरह इसका रंग लाल है वैसा ही रंग इसका इस्तेमाल करने वालों का हो जाता है|कहने का तात्पर्य है कि ये शरीर में खून बनाता है और चेहरे पर लाली लाता है|
   टमाटर हर मौसम में उपलब्ध होता है किन्तु गर्मियाँ हर सब्जी पर अपना प्रभाव डालती है और सब्जियों को सडाना आरम्भ कर देती है|इसीलिए आपने देखा भी होगा कि सर्दियों में तो हम सब्जियों को कही भी रख देते है फिर भी वे कई दिनों तक वैसी ही ताज़ी बनी रहती है|किन्तु गर्मियों में अगर किसी सब्जी को कुछ घंटों के लिए भी बाहर सामान्य तापमान पर रख दिया जाए तो वे गलने लगती है|टमाटर तो इतने पिलपिले हो जाते है कि आप उन्हें छूना तक पसंद ना करें|इसीलिए गर्मियों में फ्रीज का इस्तेमाल अधिक किया जाता है ताकि फल सब्जियां उसमें ताज़ी बनी रहें|
   लेकिन अगर कभी आप अपने टमाटरों को फ्रीज में रखना भूल गयी हो और वे पिलपिले हो गए हो तो उन्हें बाहर फेंकने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योकि आज हम आपको एक ऐसे घरेलू नुस्खे से अवगत कराने जा रहे है जिनकी मदद से आप पिलपिले हुए टमाटरों को फिर से ताजा कर सकते हो. ये तरीका बहुत आसान और सरल है तो आओ इस नुस्खे के बारे में जानते है|



सामग्री ( Material Required ) :
* 1 बर्तन
*ठंडा पानी
* 1 चम्मच नमक
· विधि :
   सबसे पहले तो आपको एक बर्तन ( कटोरा ) लेना है, अब उसमें आप ठंडा पानी भर दें. साथ ही इसमें 1 चम्मच नमक भी डाल दें. अब इसमें पिलपिले हुए सारे टमाटर डालें और फिर करीब 3 – 4 घंटों के लिए भीगने के लिए छोड़ दें|कुछ समय बाद आप देखोगे कि उन पिलपिले टमाटरों की ताजगी फिर से लौट आई है|वे फिर से गोल मटोल हो गये है और पहले की तरह लाल लाल दिख रहे है.|

कोलेस्ट्राल से बचना है तो खूब खाइए टमाटर
    लाल टमाटर बड़ा ही स्वादिष्ट होता है इसे लोग बड़े चाव से खाते है. इसके बारे में बहुत से लोग अलग अलग राय देते है| कुछ लोग इसे फल बताते है तो कुछ लोग इसे सब्जी भी कहते है| चाहे जो भी हो इसके स्वाद ने सभी को दीवाना बना रखा है. इसके अनेको गुणों के कारण इसके प्रति लोगो की दीवानगी और भी बढती है|
एक अध्ययन के अनुसार जोकि यूरोप में हुआ था उससे पता चला है जो व्यक्ति भोजन करते समय भोजन में लाइकोपीन की मात्रा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है वे ह्रदय घात के खतरे से बचे रहते है| उनको हृदयघात आने की सम्भावना कम हो जाती है.|यह सिर्फ टमाटर खाने से ही हो सकता है क्योकि टमाटर में ही लाइकोपीन नामक तत्व पाया जाता है| वह अध्ययन जिन लोगो पर किया गया था उन लोगो में ज्यादातर प्रोढ़ावस्था के थे| और उनमे से जिन लोगो को दिल का दौरा पड़ चूका था उनकी संख्या थी 662. अध्ययन में शरीर में इस तत्व की, जो कि टमाटर में होता है| उपस्थिति की मात्रा की भी जांच की गयी थी. यह अध्ययन 1379 लोगो पर किया गया थ||



उदाहरण के लिए हम आपको बताते है कि एक प्रकार का पदार्थ जिसे हम कोलेस्ट्रोलिमोआ कहते है वो हमारी धमनियों में जम जाता है और इससे  हमें एक आघात होने का खतरा बना रहता है. इसके बाद ये जेनेटिक परिवर्तन करते है और कैंसर को उत्पन्न कर सकते है| फ्री रेडिक्ल से हमें ऐसा कैंसर हो सकता है जो सूर्य के प्रकाश के कारण होता है अथवा ऐसी बीमारियाँ हो सकती है जैसे कि ओजोन के प्रदुषण में सांस लेने से हो सकती है|
   अगर हमें प्रदुषण भरे वातावरण से बचना है तो टमाटर का खूब इस्तेमाल करना होगा क्योंकि इसके इस्तेमाल से ही हम कोलेस्ट्राल जैसी बीमारी से बच सकते है और हृदय सम्बन्धी रोगों को भी अपने से दूर रख सकते है और स्वस्थ जीवन का भरपूर आनंद ले सकते है 
   तो अब हम कह सकते है टमाटर अपने इन्ही गुणों के कारण इतना महत्वपूर्ण हो गया है की असाधारण होते हुए भी कई रोगों से निजात दिलाने में सहायक है| और इसके इस्तेमाल पर खर्च भी ज्यादा नहीं होता. यह तो हमारे आस पास ही आसानी से और कम दामो पर उपलब्ध रहता है. तो अब आप टमाटर को खूब खाइए और अपने शरीर को रोगों से दूर बनाये रखिये|

Sunday, January 15, 2017

एक्ज़ीमा का होम्योपैथिक इलाज



    एक्जिमा के लक्षणों में त्वचा में खुजली, लालिमा और छोटे उभार या फफोले शामिल हैं। अगर इन लक्षणों का इलाज नहीं किया जाए, तो त्वचा मोटी, खुरदुरी, और शुष्क हो सकती है। जिसके साथ कुछ ऐसे क्षेत्र उत्पन्न हो सकते हैं जहाँ के बाल झड़ जाते हैं और रंग में परिवर्तन आ जाता है। लंबी अवधि के एक्जिमा से प्रभावित त्वचा, बैक्टीरिया जनित अग्रिम संक्रमण के लिए आमतौर पर अधिक संवेदनशील हो जाती है।
एक्जिमा कई प्रकार का होता है, लेकिन एक्जिमा के लक्षणों को सामान्‍य करके देखा जा सकता है। चाहे कारण कुछ भी हों, कम या ज्‍यादा एक्जिमा के लक्षण आमतौर पर इस प्रकार के होते हैं-संक्रमित त्‍वचा में खुजली और लालिमा
शुष्‍क और पपड़ीदार त्‍वचा। और खुजली करने पर त्‍वचा के उस हिस्‍से का मोटा हो जाता।
प्रभावित क्षेत्र में गांठ पड़ जाना
छाले नमी भरी त्‍वचा
एक्जीमा त्वचा का दीर्घजीवी रोग हैं। होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार  यह रोग सोरा दोष के कारण होते हैं। यदि मनुष्य की प्रकृति में ‘सोरा’ दोष के तत्त्व नहीं होंगे, तो एक्जीमा होगा ही नहीं। वास्तव में ‘सोरा’ हमारी भौतिकवादी प्रवृत्ति एवं मानसिक और वैचारिक विषाक्तता का ही परिणाम है। वैसे भी ‘सोरा’ शब्द का उदभव ‘सोरेट’ से हुआ है जिसका हिंदी रूपान्तर ‘खुजली’ होता है।
एक्जीमा : इसे हिन्दी में अकौता, छाजन और पामा भी  कहते हैं। यह रोग ज्यादातर पैर के टखनों के पास या पिण्डलियों में, जोड़ों में, कान के पीछे गर्दन पर, हाथों में और जननांग प्रदेश में होता पाया जाता है। वैसे, यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इस रोग में तीव्र खुजली होती है। जननांग प्रदेश में इस रोग का होना सबसे ज्यादा कष्टदायक होता है।
एक्जिमा के कारण
यह रोग अनुचित आहार-विहार करने, अजीर्ण बने रहने, मांसाहार करने, डायबिटीज रोग होने और त्वचा को ज्यादा रगड़ लगने आदि कारणों से भी होता है।
होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार ‘सोरा’ दोष का होना आवश्यक है।
• जीवाणुओं, फफूंद एवं परजीवी (जैसे साटकोप्ट्स-स्केबियाई) आदि सूक्षम जीवों द्वारा भी यह रोग होता है।
एक्जिमा के लक्षण एवं उपचार
सूखा एक्जीमा – सूखा एक्जीमा होने पर निम्नलिखित औषधियों में से,जिस औषधि के सर्वाधिक लक्षण रोगी में पाए जाएं, उस औषधि का सेवन रोगी को करना चाहिए।
एलुमिना : त्वचा का बेहद खुश्क, रूखा, सूखा और सख्त हो जाना, दरारें पड़ जाना और बेहद तेज खुजली होना और खुजाने पर फुसियां उठ आना विशेष लक्षण है। कब्ज रहना, बिस्तर में पहुंचकर गरमाई मिलने के बाद अत्यधिक खुजलाहट, सुबह उठने पर और गर्मी से परेशानी बढ़ना और खुली हवा में एवं ठंडे पानी से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर उक्त दवा 30 एवं 200 शक्ति में अत्यंत कारगर है।





कैल्केरिया सल्फ : यह बच्चों के खुश्क एक्जीमा की उत्तम औषधिहै। सिर पर छोटी-छोटी पुंसियां हो जाएं, जिन्हें खुजाने पर खून निकलने लगे, मुख्य लक्षण हैं। 3 × से 12 x शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
सल्फर : रोगी मैला और गंदा हो, शरीर से दुर्गध आती हो, फिर भी अपने को राजा महसूस करें, रोगी शरीर में गर्मी का अनुभव करता हो, पैरों में जलन होती हो, मीठा खाने की प्रबल इच्छा, अत्यधिक खुजली, किन्तु खुजाने पर आराम मिलता है और अधिक खुजाने पर खून निकलने लगे, बिस्तर की गर्मी से परेशानी बढ़ना, खड़े रहना दुष्कर, सुबह के वक्त अधिक परेशानी, किन्तु सूखे एवं गर्म मौसम में बेहतर महसूस करें। इन लक्षणों के आधार पर ‘सल्फर’ की 30 एवं 200 शक्ति की दवा की एक-दो खुराक ही चमत्कारिक असर दिखाती हैं। इस दवा के रोगी की एक अन्य विशेषता यह है कि शरीर के सारे छिद्र-यथा नाक, कान, गुदा अत्यधिक लाल रहते हैं, अत्यधिक खुजली एवं जलन रहती है। साथ ही पहले कभी एक्जीमा वगैरह होने पर अंग्रेजी दवाओं के लेप से उन्हें ठीक कर लेना और उसके बाद कोई अंदरूनी परेशानी लगातार महसूस करते रहना इसका मुख्य लक्षण है।
रसवेनेनेटा : किसी भी प्रकार का खुश्क एक्जीमा, जिसमें त्वचा पर दाने की पुंसियां हों और तेज खुजली होती हो ,श्रेष्ठ दवा है। रात में अधिक खुजली, गर्म पानी से धोने पर आराम मिलना, त्वचा में लाली, त्वचा की ऊपरी सतह (एपिडर्मिस) में ‘वेसाइकिल’ बन जाना आदि लक्षणों के आधार पर 200 एवं 1000 शक्ति की दवा की दो-तीन खुराकें ही पर्याप्त होती हैं।

गीला एक्जीमा (वीपिंग एक्जीमा) –
ग्रेफाइटिस : गीले एक्जीमा को ठीक करने के लिए यह दवा बहुत कारगर रही है। अस्वस्थ त्वचा, जरा-से घाव से मवाद का स्राव, गाढ़ा, शहद जैसा मवाद, गर्मी में तथा रात के समय कष्ट बढ़ना, रगड़ने से दर्द होना, ग्रंथियों की सूजन, त्वचा अत्यंत खुश्क, खुश्की की वजह से स्तनों पर, हाथ-पैरों पर, गर्दन की त्वचा में दरारें पड़ जाना आदि लक्षणों के मिलने पर 30 शक्ति में एवं रोग अधिक पुराना हो, तो 200 शक्ति में अत्यंत लाभप्रद है।
स्थान विशेष का एक्जीमा
पेट्रोलियम : स्थान विशेष पर बार-बार एक्जीमा हो, गीला, जलन, रात में अधिक खुजली, जरा-सी खरोंच लगने के बाद मवाद पड़ जाना, लाली, माथे पर, कानों के पीछे, अण्डकोषों की त्वचा पर, गुदा पर, हाथ-पैरों पर इस प्रकार का एक्जीमा होना एवं मुख्य बात यह है कि एक्जीमा के लक्षण जाड़े के मौसम में ही प्रकट होते हैं। सिर्फ इसी लक्षण के आधार पर ‘पेट्रोलियम’ 200 शक्ति में दी जाए, तो मरीज दो-तीन खुराक खाने के बाद ही ठीक हो जाता है।
मेजेरियम : यह सिर के एक्जीमा की खास औषधि है। सिर पर, हाथों पर, पैरों पर पपड़ी जमे एवं उसके नीचे से बदबूदार मवाद निकले, जिसमें कृमि हों, सिर पर बालों के गुच्छे बन जाएं, ‘वेसाइकिल’ बन जाएं, हड्डियां भी प्रभावित हों, छूने से एवं रात्रि में अधिक दर्द एवं खुजली, जलन, खुली हवा में आराम मिलने पर उक्त दवा की 5-6 खुराक 30 अथवा 200 शक्ति में फायदेमंद रहती है।




एकजीमा रोगी के परहेज और आहार
लेने योग्य आहार
कच्चे फल जैसे कि सेब, नाशपाती, केले आदि।
ताज़ी सब्जियाँ।
तेल या घी बिना गर्म किया हुआ।
बच्चों के लिये स्तन दुग्ध।
इनसे परहेज करे
एसिड उत्पन्न करने वाले आहार जैसे कि माँस, चिकन, सूअर का माँस।
डेरी उत्पाद।
मक्के की चिप्स, पेस्ट्री, सफ़ेद चावल और मैदे का पास्ता (शक्कर की उच्च मात्रा)।
खमीर युक्त ब्रेड।
कृत्रिम मीठे तत्व।
सोया
अंडे
मेवे

Friday, January 13, 2017

बवासीर(मस्से) की अनुभूत चिकित्सा

    
 इस रोग में गुदा की भीतरी दीवार में मौजूद खून की नसें सूजने के कारण तनकर फूल जाती हैं। इससे उनमें कमजोरी आ जाती है और मल त्याग के वक्त जोर लगाने से या कड़े मल के रगड़ खाने से खून की नसों में दरार पड़ जाती हैं और उसमें से खून बहने लगता है। बवासीर दो तरह की होती है-भीतरी एवं बाहरी। भीतरी बवासीर की दशा में अंदरूनी रक्तपात होता है जिसमें दर्द नहीं होता। बाहरी बवासीर में इंसान को दर्द महसूस होता है क्योंकि इसमें गूदे में सूजन की वजह से काफी पीड़ा होती है। बवासीर के कई कारण हो सकते हैं जिनमें प्रमुख हैं वंशानुगत दशा,खानपान सही न होना, फाइबर की कमी गूदे की कैविटी में असामान्य वृद्धि ,लम्बे समय तक बैठे रहना और कब्ज़ की समस्या।इस बीमारी में गुदा द्वार पर मस्से हो जाते है। मलत्याग के समय इन मस्सो में असहनीय पीड़ा होती है। यह बहुत अधिक पीड़ादायक रोग है। अनियमित खान-पान और कब्ज की वजह से भी बवासीर हो सकती है। इस बीमारी को अर्श, पाइलस या मूलव्याधि के नाम से भी जाना जाता बवासीर को ठीक करने के लिए नीचे दिए गए घरेलू उपचारों में से किसी का भी सहारा लिया जा सकता है।
*एलोवेरा में काफी जलनरोधी गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह बवासीर की समस्या से छुटकारा दिलाने का काफी बेहतरीन तरीका साबित होता है। यह काफी आसान तरीकों से बवासीर के लक्षणों से आपको निजात दिलाता है। एलो वेरा की एक पत्ती लें तथा इसके सारे काँटों को तोड़कर फेंक दें। इसके बाद इसे फ्रिज (fridge) में रख दें। इसके बाद ठंडी सेंक का दोगुना प्रभाव प्राप्त करने के लिए इसका प्रयोग प्रभावित भाग पर करें। एलो वेरा जलन और सूजन को कम करने में आपकी मदद करता है। आप सूजी हुई धमनियों को ठीक करने के लिए एलो वेरा की पत्तियों से निकाले गए जेल (gel) का प्रयोग कर सकते हैं।
*सेब का सिरका बवासीर की समस्या को दूर करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक पात्र में थोड़ा सा सेब का सिरका लें और इसमें रुई का कपड़ा डुबोएं। इसे अपने बवासीर वाले भाग पर तुरंत आराम प्राप्त करने के लिए लगाएं। हालांकि सीधे इसे लगाने से आपको कुछ देर तक काफी जलन होगी। इस समय आप इसका प्रयोग करने से परहेज भी कर सकते हैं, पर यह खुजली और दर्द को तुरंत कम कर देता है। यह विधि सिर्फ बाहरी बवासीर के लिए ही है। अंदरूनी बवासीर के लिए एक चम्मच सेब के सिरके में थोड़ा सा पानी मिश्रित करके पियें। इसे दर्द और खून निकलने की समस्या से छुटकारा मिलता है।
    रक्त की मौजूदगी एक ऐसा लक्षण है, जो हमेशा बवासीर की स्थिति में दिखता है। अगर आपको अंदरूनी बवासीर है तो आपको टॉयलेट पेपर (toilet paper) पर खून दिख सकता है। पर अगर आपको बाहरी बवासीर है, तो आपके मलाशय के पास खून का थक्का या सूजन जमी देखी जा सकती है।ठंडी सेंक सिकुड़न में सहायता करती है। यह दर्द को कम करती है और खुजली से तुरंत आराम दिलाती है। ठंडी सेंक की मदद से सूजन काफी कम हो जाती है और इसके फलस्वरूप आपके लिए मलत्याग करना काफी आसान हो जाता है। अतः एक साफ़ कपड़े में बर्फ का टुकड़ा बांधें तथा इसका प्रयोग अपने बवासीर के ऊपर करें। इसका प्रयोग दिन में कई बार करें। इससे रक्त की धमनियां सिकुड़ जाती हैं, जिसके फलस्वरूप बवासीर से छुटकारा मिलता है।
*नींबू का रस एंटीऑक्सीडेंटस से युक्त होता है और बवासीर की समस्या से निपटने में आपकी काफी मदद करता है। इसका प्रयोग सीधे सूजन वाली प्रभावित जगह पर किया जा सकता है। आप नींबू के रस में अदरक और थोड़े से स्वाद के लिए शहद का मिश्रण करके इसका सेवन भी कर सकते हैं और इस फल के दर्द और जलन को कम करने के गुणों से अच्छी तरह वाकिफ हो सकते हैं।
गर्म पानी में डुबोकर रखें। पानी में खुद को डुबोये रखने से खुजली और दर्द से काफी छुटकारा प्राप्त होता है। इससे रक्त की धमनियों को सुकून मिलता है। 15 से 20 मिनट तक प्रभावित भागों को गर्म पानी में डुबोकर रखें। आप प्रभावित भाग को गीले तौलिये से भी पोंछ सकते हैं, क्योंकि इससे इसे सूखने में आसानी होती है। बेहतर परिणामों के लिए इस प्रक्रिया को बार बार दोहराएं।
*छाछ बवासीर के इलाज का एक बेहतरीन विकल्प है। अजवाइन का पाउडर और 1 ग्राम काला नमक 1 गिलास छाछ में मिश्रित करें। रोजाना दोपहर का खाना खाने के बाद एक गिलास छाछ का सेवन करें। इससे आपको बवासीर की समस्या से काफी आराम मिलेगा। छाछ आपको दर्द से बचाता है और शरीर में नमी का संचार करता है।
*खाना आसानी से हज़म करने और मलाशय का स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए फाइबर युक्त भोजन काफी फायदेमंद होता है। फाइबर के पोषक तत्व मल को नर्म करने में मदद करते हैं और आँतों की सारी प्रणाली को साफ़ सुथरा रखने में सहायता करते हैं। फाइबर युक्त भोजन के सेवन से कब्ज़ की समस्या से भी आराम प्राप्त होता है। फाइबर युक्त भोजनों में प्रमुख हैं पटसन के बीज, प्रून (prune), नाशपाती, सब्जियां और बीन्स (beans)।
*रोजाना कम से कम 8 गिलास पानी पिएं, क्योंकि इससे शरीर की अशुद्धियों को दूर करने में सहायता मिलती है। पानी आपके मलाशय को स्वस्थ बनाकर रखता है, जिससे ये नर्म और नमीयुक्त रहता है और आपका मल भी इससे नर्म होता है। अपनी अंदरूनी प्रणाली को साफ करने के लिए हमेशा पानी पियें। पानी आपके शरीर में नमी का संचार करता है और आपके मल को नर्म बनाता है। इसी तरह फाइबर युक्त भोजन भी मल नर्म करते हैं और मलत्याग की प्रक्रिया में होने वाले दर्द में काफी कमी करते हैं।
*दूध में बरगद का लैटेक्स मिलाने से भी फायदा होता है अगर रोज़ाना इसका प्रयोग किया जाए।
*बवासीर की समस्या को आसानी से दूर करने के लिए 1 कप दही लें और उसमें थोड़ा सरसों का पाउडर मिलाएं और इसे पीकर आराम करें। घर पर बनी दही का प्रयोग फायदेमंद है
*, बेर में जलन दूर करने के प्राकृतिक तत्व होते हैं। अच्छे परिणामों के लिए इनका रोज़ाना सेवन करें। आप काले जामुनों के अलावा अंगूरों का भी सेवन कर सकते हैं।
* अदरक,मीठे नींबू,पुदीने और शहद का मिश्रण तैयार करके उसका सेवन करने से भी बवासीर की दशा में काफी लाभ मिलता है।
* पके केलों को उबालें और उनका दिन में दो बार सेवन करें। यह बवासीर को प्राकृतिक रूप से ठीक करने की काफी कारगर विधि है क्योंकि यह लैक्सेटिव के लिए जाना जाता है।
*नसों में सूजन और जलन कम करने के लिए उस भाग में बेकिंग पाउडर लगाएं। आप गाजर या बीटरूट के रस का भी उपयोग कर सकते हैं। अगर सूजे हुए भाग में जलन है तो उसे दूर करने के लिए एलो वेरा का सेवन करें।

Tuesday, January 10, 2017

पेट दर्द पेट मे गेस के घरेलू उपाय


पेट में संक्रमण की बहुत सी वजहें हो सकती हैं. अनहाइजीनिक खाना, पानी या फिर हाथों के माध्यम से शरीर में पहुंची गंदगी. जिसकी वजह से बार-बार मोशन होना, कमजोरी होना, उल्टी होना और कभी-कभी बुखार होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.
अगर आपका पेट खराब हो गया है और आप दवाई खाने से बचना चाहते हैं तो इन घरेलू उपायों का अपनाकर आप राहत पा सकते हैं. ये उपाय पूरी तरह घरेलू हैं इसलिए इन पर भरोसा करने में कोई नुकसान भी नहीं है.
* अदरक
पेट अपसेट होने पर अदरक का इस्तेमाल काफी कारगर होता है. इसमें एंटीफंगल और एंटी-बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं, जो पेट दर्द में राहत देता है. एक चम्मच अदरक पाउडर को दूध में मिलाकर पीने से आराम मिलता है.
*जीरा
अगर आपको लगातार दस्त हो रहे हों तो एक चम्मच जीरा चबा लें. अमूमन सभी घरों में मिलने वाला ये मसाला दस्त में काफी फायदेमंद है. जीरा चबाकर पानी पी लेने से दस्त बहुत जल्दी रुक जाते हैं.
* सेब का सिरका
बात जब पेट दर्द में घरेलू उपाय की हो तो सेब के सिरके से बेहतर कुछ भी नहीं. सेब के सिरके में पेक्ट‍िन की पर्याप्त मात्रा होती है जिससे पेट दर्द और मरोड़ में राहत मिलती है. इसका अम्लीय गुण खराब पेट के संक्रमण को ठीक करने में भी कारगर है. एक चम्मच सिरके को एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से जल्दी आराम होता है.
* बेल का शरबत
कई जगहों पर इसे श्रीफल के नाम से भी जाना जाता है. बेल फाइबर से युक्त होता है और इससे बना शरबत भी काफी गाढ़ा और फाइबर युक्त होता है. फाइबर पेट को बांधने का काम करता है, जिससे दस्त जल्दी रुक जाते हैं.
*दही
पेट दर्द में दही का इस्तेमाल काफी फायदेमंद रहता है. दही में मौजूद बैक्टीरिया संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जिससे पेट जल्दी ठीक होता है. साथ ही ये पेट को ठंडा भी रखता है.
* केला
अगर आप बार-बार हो रहे मोशन से परेशान हो चुके हैं तो केले का इस्तेमाल आपको राहत देगा. इसमें मौजूद पेक्टिन पेट को बांधने का काम करता है. इसमें मौजूद पोटै‍शियम की उच्च मात्रा भी शरीर के लिए फायदेमंद होती है.
* पुदीना
पुदीना एक बेहद हेल्दी हर्ब है. सदियों से इसका इस्‍तेमाल पेट से जुड़ी समस्याओं के समाधान में किया जाता रहा है. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाचन क्रिया को सुधारने में भी सहायक होता है.
* ज्यादा से ज्यादा  पानी का सेवन करें
पेट खराब होने पर शरीर में पानी की कमी हो जाती है. ऐसे में कोशिश करें कि ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं. आप फलोें का जूस और सब्जियों का रस भी ले सकते हैं. बेहतर होगा अगर पानी में लवण मिला हो. आप चाहें तो नींबू पानी, नमक-चीनी का घोल या फिर नारियल पानी ले सकते हैं. गाजर का जूस भी ऐसे समय में काफी फायदेमंद होता है.

Sunday, January 8, 2017

नेत्र रोगों मे हितकारी घरेलू उपचार


हम त्वचा और बालों पर तो बहुत कुछ लगाते है , पर आँखों के लिए कुछ नहीं करते . आइये देखे हम आँखों में क्या क्या लगा सकते है ....
* तेजपात को पीसकर आँख में लगाने से आँख का जाला और धुंध मिट जाती है|
* बेर के बीज को घीस कर आँख में लगाने से आँखों का बहना बंद हो जाता है|
* पुनर्नवा की जड़ को कूटकर इसका रस घी के साथ आँखों में लगाने से लाभ होता है.
* चमेली के फूलों का लेप बंद आँखों पर करने से लाभ होता है|
* आँखों में अगर कुछ गिर गया है और नहीं निकल रहा तो दूध की तीन बूंदे डाले|
* वासा के तीन चार फूलों को गर्म कर आँखों पर रखने से गोलक की सूजन में आराम मिलता है.
* शीशम के पत्तों का रस शहद के साथ आँख में डालने से दर्द ठीक होता है|
* जिस आँख में दर्द हो उसकी उलटी तरफ के कान में नीम के पत्तों का रस डालने से आराम मिलता है. नीम के पत्तों का रस आँख में भी लगाया जा सकता है|
* तिल के फूलों पर पड़ी ओस आँख में डालने से सभी प्रकार के रोग दूर होते है.
* १ ग्राम. सेंधा नमक और 5 ग्राम सत गिलोय को पीस कर शहद के साथ सुबह शाम आँखों में लगाने से मोतियाबिंद ठीक होता है|
* एरंड तेल की एक बूँद डालने से पानी बहता है. इसे नेत्र विरेचन कहते है|

* राई के चूर्ण को घी के साथ लगाने से आँखों की फुंसी से राहत मिलती है|
*गाय के दूध से निकले मक्खन को आँखों में लगाने से जलन शांत होती है|
* रीठे के पानी से आँख धोने से सरल मोतियाबिंद में लाभ होता है|
* ताज़ी डूब को पीस कर चपटी गोलियां बना ले. इसे आँखों पर रखने से ठंडक मिलती है और दर्द दूर होता हँ.
*मेथी दाने को पीस कर आँखों के नीचे लगाने से काले घेरे दूर होते है|
* अनंतमूल की जड़ को घीस कर आँख में लगाने से आँख की फूली कट जाती है. इसकी पट्टी के दूध या इसके काढ़े को शहद के साथ आँखों में लगाने से भी नेत्र रोग ठीक होते है|
* पलाश के जड़ के रस की एक बूँद आँख में डालने से झाई , खील , फूली , मोतियाबिंद ,रतौंधी आदि रोग समाप्त होते है|
* त्रिफला के पानी से आँखें धोने पर आँखों के हर प्रकार के रोग समाप्त होते है|
* गुलाबजल से आँखों में छींटे मारे|
* देशी गाय का घी आँख में काजल की तरह लगाए|
* यदि दाई आँख में दर्द हो तो बाए पैर के नाख़ून और बाई आँख में दर्द हो तो दाए पैर के नाख़ून आक के दूध से भिगोये. आक के दूध को कभी भी आँख में ना डाले. इससे आँख की रौशनी हमेशा के लिए चली जाती है|
* जीरा और मेहँदी को कूटकर गुलाबजल में भिगोकर सुबह इसे छान ले. ज़रासी फिटकरी मिलाले. इससे आँख धोने पर आँखों की गर्मी दूर होती है और आँखें स्वस्थ रहती है|
* अनार के पत्तों का रस आँख में लगाने से खुजली , आँखों से पानी बहना , पलकों की खराबी , आदि रोग दूर होते है. पत्तों की लुगदी आँखों पर रखी जा सकती है|
* शिरीष के पत्तों का रस आँख में लगाने से रतौंधी , आँख के दर्द में रौशनी बढाने में लाभ होता है|

Thursday, January 5, 2017

श्वास रोग (अस्थमा) का होम्योपैथिक ईलाज


श्वासतंत्र में किसी रुकावट की वजह से सांस फूलने लगती है इसी को दमा कहते हैं। फेफड़ों के कोष्ठों में श्लेष्मायुक्त पदार्थ (म्यूकस) जमने की वजह से, कोष्ठों में सिकुड़ाव एवं सूजन आने की वजह से अथवा इन सभी संयुक्त वजहों से दमा हो जाता है।
यह रोग मुख्यतः पौष्टिक भोजन का अभाव, शारीरिक परिश्रम बहुत ज्यादा करने, धूल-धुंये भरे वातावरण में रहने, सीलन एवं दुर्गन्ध भरे वातावरण में रहने, उपदंश आदि के कारण हो जाता है । इस रोग में जरा-से श्रम से ही रोगी का दम फूल जाता हैं और उसे खाँसी आने लगती है । साँस लेने में रोगी को बहुत कष्ट होता है, छाती में खिंचाव बना रहता है, खाँसी बार-बार तथा बड़ी तेज उठती है, गले से सॉय-सॉय की आवाज आती है। ठण्ड में यह रोग बहुत बढ़ जाता है ।



दमा के प्रकार

• एलर्जिक दमा – इस प्रकार के दमा में किसी वातावरणीय तत्त्व के प्रति प्रतिक्रियास्वरूप रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं और एक-दो घंटे में समाप्त हो जाते हैं। जैसे गर्त, धुआं इत्यादि । बुखार, एक्जीमा भी हो सकते हैं।
• नॉन एलर्जिक – इसमें फेफड़ों के अंदर ही रुकावट पैदा होने लगती है। जीवन के चौथे चरण में अधिकांशत: इस प्रकार का दमा प्रकट होता है। इस तरह के रोगियों में सांस की अन्य तकलीफें भी बहुतायत में होती है। टॉन्सिल, साइनस आदि की परेशानी साथ में हो सकती है।
• संयुक्त प्रकार का – कुछ प्रतिशत रोगियों में एलर्जिक एवं नॉन एलर्जिक प्रकार का दमा संयुक्त रूप में रह सकता है।
• वातावरणीय कारकों – जैसे तापमान, नमी, दबाव एवं शारीरिक परिश्रम आदि की वजह से भी दमा हो सकता है।
• मानसिक तनाव एवं हृदय रोग की वजह से भी दमा रोग हो सकता है
ब्लाटा ओरियेण्टेलिस Q, 30, 200, 3x- यह दमा-रोग की सर्वोत्तम दवा है । प्रायः सभी प्रकार का नया दमा इससे अवश्य ही आरोग्य हो जाता है । विशेष रूप से स्नायविक एवं ब्रॉकियल दमा में यह दवा अति उपयोगी है । जब कभी भी दमा का दौरा उठे तो इस दवा के मूलअर्क (Q) को पानी में मिलाकर देने से दौरा शीघ्र ही थम जाता है और शांति का अनुभव होता है । वैसे दवा की 30, 200 या 3x शक्ति का व्यवहार करने पर दमा का रोग मूल सहित नष्ट हो जाता है
यह दवा तिलचट्टा (कॉकरोच) से बनाई जाती है । वैसे ये तिलचट्टा प्रजातियाँ अमेरिका से आई हुई (अमेरिकन) हैं । व्लाटा ओरियेण्टेलिस प्रजाति अब दुर्लभ है, यही कारण है कि अब ब्लाटा ओरियेण्टेलिस नाम से जो दवा मिलती हैं, वह वास्तव में व्लाटा अमेरिकन ही है । तिलचट्टे से दमा-रोग के इलाज की परंपरा बहुत पुरानी है । आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में इस प्रकार का वर्णन देखने को मिलता है। चीन के चितांग वान की पुस्तक में एक ऐसे चिकित्सक का उल्लेख है जो मात्र दमा के उपचार के लिये प्रसिद्ध थे, वे चिकित्सक तिलचट्टे की सूखी टॉग को मरीज के एक्युपंक्चर के किसी बिन्दु पर लगाते थे । भारत के पं० ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम दम रोग के उपचार के लिये बहुत प्रसिद्ध था और उनके इलाज की सफलता ने उनकी ख्याति बहुत दूर-दूर तक फैला रखी थी । वे भी दमा के मरीजों को तिलचट्टे से बनी दवा ही दिया करते थे । वास्तव में, यह दमा रोग की उत्तम दवा है । मुझे भी इस दवा ने कभी भी निराश नहीं किया है ।
कैनाबिस इण्डिका Q- यह भाँग से बनने वाली दवा है । इसे देने से दमा का तीव्र से तीव्र दौरा भी तुरन्त घटने लगता है । डॉ० घोष ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि पहले वे एकोनाइट देकर ही सन्तुष्ट हो जाया करते थे लेकिन जब उन्होंने कैनाबिस इण्डिका Q की 5 बूंद से 4 ऑस तक दवा पानी में मिलाकर उसका एक-एक चम्मच घण्टे-घण्टे के अन्तर से दिया तो 2-3 घण्टे में ही दमे का दौरा घटने लगा ।
बैसिलिनम 30, 200– डॉ० घोष ने लिखा है कि दमा की तरह के खिंचाव होने या फेफड़ों में कफ भरा होने पर इस दवा का सेवन करने से दमा के लक्षणों में लाभ होता है और कफ साफ हो जाता है ।
सैम्बुकस नाइग्रा 3x- श्वास लेने में कष्ट, रोग का दौरा रात में उठे, आधी रात को दम घोंटने वाली खाँसी, रोगी बेचैन हो तो लाभ करती है।



मकरध्वज 1x, 2x- कुछ चिकित्सकों के अनुसार इस दवा से भी दमारोग में लाभ होता है 

इपिकाक 30, 200– यह दवा दमा-रोग में बहुत लाभकर है | फेफड़ों में रक्त एकत्र हो जाने के कारण श्वास लेने में कष्ट, हिलने-डुलने में कष्ट, आधी रात के बाद दम फूलना, श्वास-प्रश्वास की तीव्रता आदि में लाभ पहुँचाती है । इसे आवश्यकतानुसार आधा-आधा घण्टे बाद तक दे सकते हैं । डॉ० सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार ने इस दवा को अत्यन्त उपयोगी बताया है ।
हाइड़ोसियानिकम एसिड 3x- दमा के नये रोग में लाभप्रद हैं ।
कैनाबिस सैटाइवा Q- यह गाँजे से बनने वाली दवा है । इसे लेने से रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगती है जिससे रोगी को साँस लेने में कूल सकती की जाती है और कुल के लक्ष लाभ होता है ।
कैसिया सोफेरा Q- यह दवा कसौदी से बनती है। इसके सेवन से दमा की खाँसी और दम फूलने के लक्षणों में बहुत लाभ होता है ।
ओरेलिया रेसिमोसा : आधी रात के समय खांसी उठे, सोते समय शरीर से खूब पसीना निकले, लेटते ही खांसी उठे, नींद की झपकी लगते ही खांसी चले, गले में कुछ अटका-सा लगना, आधी रात को दमा उठना आदि लक्षणों पर इस दवा का मूल अर्क (मदरटिंचर) या 6 शक्ति वाला अर्क (टिंचर) प्रयोग करना चाहिए। आधे कप पानी में 5-6 बूंद दवा डालकर 1-1 चम्मच दवा 2-2 घण्टे पर दें।
एकोनाइट-30 : यह बहुत पेटेन्ट दवा है जो शीघ्र प्रभाव करती है। खुली हवा में आराम मालूम देना, खुश्क ठण्डी हवा या ठण्ड के प्रभाव से कष्ट उत्पन्न होना, रोगी को घबराहट और बेचैनी बहुत होना, प्यास ज्यादा लगती हो, भय व घबराहट से शरीर पसीने-पसीने हो रहा हो, जिस तरफ लेटे उसी तरफ के अंग से पसीना निकले, रोग का अचानक और प्रबल वेग से आक्रमण हो, तो यह लाभकारी है।
ग्रिण्डेलिया-Q : नींद आते ही श्वास कष्ट हो और नींद खुल जाए, ताकि सांस ली जा सके, गले से सांस निकलते समय सू-सू या सीटी बजने जैसी ध्वनि हो, रोगी लेट कर सांस न ले सके, तो उठ कर बैठ जाए, खांसने पर काफी मात्रा में कफ निकले, कफ निकल जाने पर आराम मालूम हो, श्वास धीरे-धीरे फूलती जाए और तेजी से फूलने लगे, तो इस दवा का मदरटिंचर चार बूंदें आधे कप पानी में डालकर 2-2 घण्टे पर 1-1 चम्मच पिलाना चाहिए। इसको 30 शक्ति में भी 2-2 घण्टे पर प्रयोग कर सकते हैं। दमा के पुराने रोगियों के लिए यह अच्छी गुणकारी दवा है।
ससुरिया लैप्पा Q- यह दवा कुटज से बनती है । यह कफ निकालने वाली और कफनाशक है अतः दमा में इसके प्रयोग से बहुत लाभ होता है । इसके सेवन से दमा का खिंचाव और बार-बार होने वाले कष्ट शीघ्र ही घट जाते हैं ।

Saturday, December 31, 2016

साईटिका (गृधसी) रोग के अचूक उपचार


साईटिका (गृधसी)
  मानव  शरीर में एक साईटिका नाड़ी होती है जिसका ऊपरी सिरा एक  इंच मोटा होता है। यह साईटिका नाड़ी शरीर में प्रत्येक नितम्ब के नीचे से शुरू होकर टांग के पीछे के भाग से होती हुई पैर की एड़ी पर खत्म होती है। इस साईटिका नाड़ी को साइटिका नर्व भी कहते हैं।
इस नाड़ी में जब सूजन तथा दर्द होने लगता है तो इसे साईटिका या फिर वात-शूल कहते हैं। जब यह रोग होता है तो व्यक्ति के पैर में अचानक तेज दर्द होने लगता है। यह रोग अधिकतर 30 से 50 वर्ष की आयु के लोगों को होता है। साईटिका का दर्द एक समय में एक ही पैर में होता है। जब यह दर्द सर्दियों में होता है तो यह रोगी व्यक्ति को और भी परेशान करता है। इस रोग में किसी-किसी रोगी को कफ प्रकोप भी हो जाता है। इस रोग के कारण रोगी को चलने में परेशानी होती है। रोगी व्यक्ति जब उठता-बैठता या सोता है तो उसकी टांगों की पूरी नसें खिंच जाती हैं और उसे बहुत कष्ट होता है।
साईटिका रोग होने के लक्षण:-
जब किसी व्यक्ति को साईटिका रोग हो जाता है तो उसके पैर के निचले भाग से होते हुए ऊपर के भागों तक तेज दर्द होता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति अपने पैर को सीधा नहीं कर पाता है तथा सीधा खड़ा भी नहीं हो पाता है। रोगी व्यक्ति को चक्कर आने लगते हैं। रोगी व्यक्ति को कभी-कभी धीरे-धीरे दर्द होता है तो कभी बहुत तेज दर्द होता है। इस दर्द के कारण रोगी व्यक्ति को बुखार भी हो जाता है।
साईटिका रोग होने का कारण:-
*जब किसी व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाती है तो उसे यह रोग हो जाता है।
यदि साईटिका नाड़ी के पास विजातीय द्रव (दूषित द्रव) जमा हो जाता है तो नाड़ी दब जाती है जिसके कारण साईटिका रोग हो जाता है।
*रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में आर्थराइटिस रोग हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*असंतुलित भोजन का सेवन करने तथा गलत तरीके के खान-पान से भी यह रोग हो जाता है।
*रात के समय में अधिक जागने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*अधिक समय तक एक ही अवस्था में बैठने या खड़े रहने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*अपनी कार्य करने की क्षमता से अधिक परिश्रम करने के कारण या अधिक सहवास करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।



साईटिका रोग का घरेलू और कुदरती पदार्थों से इलाज-
*100 ग्राम नेगड़ के बीजों को कूटकर पीस लें। फिर इसके 10 भाग करके 10  पुड़ियां बना लें। इसके बाद शुद्ध घी में सूजी या आटे का हलवा बना लें और जितना हलवा खा सकते हैं उसको अलग निकाल लें। इस हलवे में एक पुड़िया नेगड़ के चूर्ण की डालकर इसे खा लें और मुंह धो लें। लेकिन रोगी व्यक्ति को पानी नहीं पीना चाहिए। इस हलवे का कम से कम 10 दिनों तक सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*20 ग्राम आंवला, 20 ग्राम मेथी दाना, 20 ग्राम काला नमक, 10 ग्राम अजवाइन और 5 ग्राम नमक को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*प्रतिदिन 2 लहसुन की कली तथा थोड़ी-सी अदरक खाने के साथ लेने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*तुलसी की 5 पत्तियां प्रतिदिन सुबह के समय में खाने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को उपचार कराते समय क्रोध तथा चिंता को बिल्कुल छोड़ देना चाहिए।
*रोगी को प्रतिदिन अपने पैरों पर सरसों के तेल से नीचे से ऊपर की ओर मालिश करनी चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को गर्म पानी में आधे घण्टे के लिए अपने पैरों को डालकर बैठ जाना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को तुरंत आराम मिल जाता है। यह  क्रिया प्रतिदिन करने से यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए आधी बाल्टी पानी में 40-50 नीम की पत्तियां डाल दें और पानी को उबालें। फिर उबलते हुए पानी में थोड़े से मेथी के दाने तथा काला नमक डाल दें। फिर इस पानी को छान लें। इसके बाद गर्म पानी को बाल्टी में दुबारा डाल दें और पानी को गुनगुना होने दे। जब पानी गुनगुना हो जाए तो उस पानी में अपने दोनों पैरों को डालकर बैठ जाएं तथा अपने शरीर के चारों ओर कंबल लपेट लें। रोगी व्यक्ति को कम से कम 15 मिनट के लिए इसी अवस्था में बैठना चाहिए। इसके बाद अपने पैरों को बाहर निकालकर पोंछ लें। इस प्रकार से 1 सप्ताह तक उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*लगभग 250 ग्राम पारिजात (हारसिंगार) के पत्तों को 1 लीटर पानी में अच्छी तरह से उबाल लें और जब उबलते-उबलते पानी 700 मिलीलीटर बच जाए तब उसे छान लें। इस पानी में 1 ग्राम केसर पीसकर डाल दें और फिर इस पानी को ठंडा करके बोतल में भर दें। इस पानी को रोजाना 50-50 मिलीलीटर सुबह तथा शाम के समय पीने से यह रोग 30 दिनों में ठीक हो जाता है। अगर यह पानी खत्म हो जाए तो दुबारा बना लें।
*5 कालीमिर्चों को तवे पर सेंककर कर सुबह के समय में खाली पेट मक्खन के साथ सेवन करना चाहिए। इस प्रयोग को प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
करेला, लौकी, टिण्डे, पालक, बथुआ तथा हरी मेथी का अधिक सेवन करने से साईटिका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को पपीते तथा अंगूर का अधिक सेवन करना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*सूखे मेवों में किशमिश, अखरोट, अंजीर, मुनक्का का सेवन करने से भी यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है।
*फलों का रस दिन में 3 बार तथा आंवला का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद रोगी को अपने पैरों पर मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। इसके बाद रोगी को कटिस्नान करना चाहिए और फिर इसके बाद मेहनस्नान करना चाहिए। इसके बाद कुछ समय के लिए पैरों पर गर्म सिंकाई करनी चाहिए और गर्म पाद स्नान करना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*सुबह के समय में सूर्यस्नान करने तथा इसके बाद पैरों पर तेल से मालिश करने और कुछ समय के बाद रीढ़ स्नान करने तथा शरीर पर गीली चादर लपेटने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*सूर्यतप्त लाल रंग की बोतल के तेल की मालिश करने से तथा नारंगी रंग की बोतल का पानी कुछ दिनों तक पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*तुलसी के पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*हार-सिंगार के पत्तों का काढ़ा सुबह के समय में प्रतिदिन खाली पेट पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*सुबह तथा शाम के समय में अपने पैरों पर प्रतिदिन 2 मिनट के लिए ताली बजाने से भी यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है।
*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के व्यायाम तथा योगासन हैं जिनको करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
ये आसन तथा योगासन इस प्रकार हैं-
इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को पीठ के बल सीधे लेट जाना चाहिए। फिर रोगी को अपने पैरों को बिना मोड़े ऊपर की ओर उठाना चाहिए। इस क्रिया को कम से कम 20 बार दोहराएं। इस प्रकार से प्रतिदिन कुछ दिनों तक व्यायाम करने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*रोगी व्यक्ति को अपने दोनों पैरों को मोड़कर, अपने घुटने से नाभि को दबाना चाहिए। इस क्रिया को कई बार दोहराएं। इस प्रकार से प्रतिदिन कुछ दिनों तक व्यायाम करने से साईटिका रोग में बहुत लाभ मिलता है।



*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को पीठ के बल सीधे लेटकर अपने घुटने को मोड़ते हुए पैरों को साइकिल की तरह चलाना चाहिए। इस व्यायाम को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में करने से साईटिका रोग में आराम मिलता है।
*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं जिनको प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है, ये आसन इस प्रकार हैं- उत्तानपादासन, नौकासन, शवसान, वज्रासन तथा भुजंगासन आदि।
साईटिका रोग के व्यक्ति को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करते समय कुछ परहेज भी करने चाहिए जो इस प्रकार हैं-
*इस रोग से पीड़ित रोगी को खटाई, मिठाई, अचार, राजमा, छोले, दही तथा तेल आदि का भोजन में सेवन नहीं करना चाहिए।
*रोगी व्यक्ति को तली हुई चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*रोगी व्यक्ति को दालों का सेवन नहीं करना चाहिए तथा यदि दाल खाने की आवश्यकता भी है तो छिलके वाली दाल थोड़ी मात्रा में खा सकते हैं।
*साईटिका रोग से पीड़ित रोगी को ठंडे पेय पदार्थों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को जमीन या तख्त पर सोना चाहिए तथा अधिक से अधिक आराम करना चाहिए।
सावधानी-
इस प्रकार से रोगी का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करने से यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है लेकिन रोगी को कुछ चीजों का परहेज भी करना चाहिए तभी यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
विशिष्ट परामर्श-
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