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Wednesday, June 29, 2016

पसीने की बदबू दूर करने के उपचार : Foul odor of sweat removal treatment


पसीने की बदबू, प्रकृति का दिया हुआ एक सबसे बड़ा श्राप है. हमारे देश में, गर्मियोंके आते ही कई तरह की परेशानियों की भी शुरूआत हो जाती है जिनमें पसीना और उससे होने वाले तनाव सबसे बुरी परेशानियों में से एक है. सोशल जगहों पर या ऑफिस की लिफ्ट और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अक्सर पसीने के बदबू की वजह से हमें कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है. अगर आपको भी इस परेशानी का अक्सर सामना करना पड़ता है यहां जानिए इससे निपटने के आसान से घरेलू नुस्खे.
पसीने की बदबू, प्रकृति का दिया हुआ एक सबसे बड़ा श्राप है. हमारे देश में, गर्मियोंके आते ही कई तरह की परेशानियों की भी शुरूआत हो जाती है जिनमें पसीना और उससे होने वाले तनाव सबसे बुरी परेशानियों में से एक है. सोशल जगहों पर या ऑफिस की लिफ्ट और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अक्सर पसीने के बदबू की वजह से हमें कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है. अगर आपको भी इस परेशानी का अक्सर सामना करना पड़ता है यहां जानिए इससे निपटने के आसान से घरेलू नुस्खे.-


*आर्म्पिट को रखें साफ - अंडरआर्म के बाल बैक्टेरिया और कीटाणुओं के लिए किसी जन्नत से कम नहीं होते. गर्मियों में बॉडी से काफी पसीना निकलता है और बॉडी हेयर, जो नेचुरल पोर्स होता है, पूरे पसीने को सोख लेता है और नतीजा होता कि ये बैक्टेरिया के लिए ब्रीडिंग ग्राउंड बन जाता है. इसकी वजह से बॉडी से काफी बदबू आने लगती है. इससे छुटकारा पाने का नेचुरल सॉल्यूशन है|

*बेकिंग सोडा - जी हां, बेकिंग सोडा को केक में इस्तेमाल करने के अलावा, पसीने की बदबू को भी खत्म करने के लिए किया जा सकता है. ये आपकी बॉडी से पसीने को कम करके आपको कई घंटो तक बदबू से दूर रखेगा. एक चम्मच बेकिंग सोडा को ताजे नींबू के रस में मिलाएं और इसे बदबू वाली जगह पर लगाएं.|
*नहाने के बाद पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर शरीर में लोशन की तरह मल लें और फिर दो मग पानी डाल लें। पूरे दिन आप तरोताजा महसूस भी करेंगे और पसीने की बदबू भी दूर होगी।
*विनेगर से करें उपाय - ये सुनने में अजीब ज़रूर लग रहा हो, लेकिन असल में ये लिक्विड भी बदबू को खत्म करने का नेचुरल सॉल्यूशन है. विनेगर को आप आमतौर पर एप्पल साइडर या व्हाइट विनेगर की तरह इस्तेमाल करती हैं, लेकिन इससे आप पसीने की बदबू को भी दुर कर सकती हैं. ये नेचुरल तरीके से स्किन के pH लेवल को कम कर, स्किन में बैक्टेरिया की ब्रीडिंग क्षमता को कम करता और इसकी वजह से बॉडी में होने वाली बदबू भी कम हो जाती है. विनेगर को अपने आर्म्पिट पर लगाएं और विश्वास करें एक बार ये आपकी आदत बन गई तो डेयोडरेंट से आपका लगाव बिल्कुल कम हो जाएगा.
*फिटकरी का नहाते समय इस्तेमाल एंटीसेप्टिक भी है और यह पसीने की दुर्गंध भी दूर करता है। नहीने के पाने में एक चुटकी फिटकरी मिलाएं और फिर उस पानी से नहाएं।
*. नींबू का रस - नींबू, शरीर के दुर्गंध से लड़ने में काफी मददगार होता है. इसमें बदबू को दूर करने की कई प्रॉपटीज़ होती है और साथ ही ये स्किन के pH लेवल को भी एडजस्ट करता है. उन जगहों पर जहां नींबू के रस का इस्तेमाल होता है, वहां बैक्टेरिया जल्दी नहीं पनपते. तो अपने पसंदीदा परफ्यूम लगाने से पहले, प्रॉब्लम एरिया में एक बार नींबू का इस्तेमाल करने के बारे में ज़रूर सोचे. ये एक बेहतरीन और टेस्टेड सॉल्यूशन है जिसका रिज़ल्ट आपको एक या दो दिन में महसूस होगा.|
*नहाने के पानी में एक चम्मच वेनेगर या कपूर का तेल मिलाकर नहाने से भी पसीने से बदबू नहीं आती है। यह नैचुरल एंटीबैक्टीरियल भी है।
*गर्मियों में खुद को बदबू से बचा कर रखने का सबसे आसान तरीका है - अपने आपको साफ रखें साफ सुथरा रखना. बदबू कभी भी पसीने की वजह से नहीं होती बल्कि उन बैक्टेरिया से होती जो आपकी स्किन में रहते हैं. इसीलिए अपनी स्किन को हमेशा साफ रखें. पसीने की बदबू से छुटकारा पाने के ये एक बेस्ट सॉल्यूशन है जो आप आसानी से कर सकती हैं.
*पुदीने के पत्तों को उबालकर उसका पानी नहाने के पानी में मिलाएं और फिर नहाएं। इससे पसीने की बदबू भी दूर होती है और मूड भी अच्छा रहता है। तनाव मुक्त होने के लिए यह अच्छा उपाय है।




Saturday, June 25, 2016

गुहेरी ,अंजनहारी के सरल उपचार Home remedies for stye


आँखों की दोनों पलकों के किनारों पर बालों (बरौनियों) की जड़ों में जो छोटी-छोटी फुंसियां निकलती हैं,उसे ही अंजनहारी,गुहेरी या नरसराय भी कहा जाता है | कभी-कभी तो यह मवाद के रूप में बहकर निकल जाती है पर कभी-कभी बहुत ज़्यादा दर्द देती है और एक के बाद एक निकलती रहती हैं | चिकित्सकों के मत मे विटामिन A और D की कमी से अंजनहारी निकलती है | कभी-कभी कब्ज से पीड़ित रहने कारण भी अंजनहारी निकल सकती हैं |
अंजनहारी के कारण-
डॉक्टर अंजनहारी का कारण विटामिन A और D की कमी मानते हैं।
अंजनहारी का कारण, आम तौर पर एक स्टाफीलोकोकस बैक्टीरिया (staphylococcus bacteria) के कारण होने वाला संक्रमण भी माना जाता है।
पाचन क्रिया में खराबी भी अंजनहारी का कारण है।
अंजनहारी का एक कारण, लगातार रहने वाली कब्ज भी मानी जाती है।
धूल और धुंए समेत अन्य हानिकारक कणों का आँखों में जाना।
बिना हाथ धोए आँखों को छूना।



संक्रमण होना।
आँखों की सफाई पर ध्यान न देना। निरंतर रूप से पानी से न धोना।
वैसे अंजनहारी होने के सटीक कारणों की जानकारी नहीं है, लेकिन ये कुछ कारण हैं जिनकी वजह से यह दिक्क्त आती है।
अंजनहारी के घरेलू उपचार -
१. लौंग को जल के साथ किसी सिल पर घिसकर अंजनहारी पर दिन में दो तीन लेप करने से शीघ्र ही अंजनहारी नष्ट हो जाती है।
२. बोर के ताजे कोमल पत्तों को कूट पीसकर, किसी कपड़े में बांधकर रस निकालें। इस रस को अंजनहारी पर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।
३. इमली के बीजों को सिल पर घिसकर उनका छिलका अलग कर दें। अब इमली के सफेद बीज को जल के साथ सिल पर घिस कर दिन में कई बार अंजनहारी (फुसी) पर लगाएं । इसके लगाने से अंजनहारी शीघ्र नष्ट होता है।
४. १० ग्राम त्रिफला के चूर्ण को ३०० ग्राम जल में डालकर रखें। सुबह बिस्तर से उठने पर त्रिफला के उस जल को कपड़े से छानकर नेत्रों को साफ करने से गुहेरी की विकृति नष्ट होती है। त्रिफला के जल से नेत्रों की सब गंदगी निकल जाती है। प्रतिदिन त्रिफला का ३ ग्राम चूर्ण जल के साथ सुबह शाम सेवन करने से गुहरी की विकृति से राहत मिलती है।
५. काली मिर्च को जल के साथ पीसकर या जल के साथ घिसकर अंजनहारी पर लेप करने से प्रारंभ में थोड़ी सी जलन होती है, लेकिन जल्दी ही गुहेरी का निवारण हो जाता है।



६. ग्रीष्म ऋतु में पसीने के कारण अंजनहारी की विकृति बहुत होती है। प्रतिदिन सुबह और रात्रि को नेत्रों में गुलाब जल की कुछ बूंदे डालने से बहुत लाभ होता है।
७. त्रिफला चूर्ण ३ ग्राम मात्रा में उबले हुए दूध के साथ सेवन करने से अंजनहारी से सुरक्षा होती है।
८. लौंग को चंदन और केशर के साथ जल के छींटे डालकर, घिसकर अंजनहारी का लेप करने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
९. सहजन के ताजे व कोमल पत्तों को कूट पीसकर कपड़े में बांधकर रस निकालें। इस रस को दिन में कई बार अंजनहारी पर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।
१०. नीम के ताजे व कोमल पत्तों का रस मकोय का रस बराबर मात्रा में कपड़े से छानकर नेत्रों में लगाने से अंजनहारी के कारण शोथ व नेत्रों की लालिमा शीघ्र नष्ट होती है।
११. अंजनहारी में शोथ के कारण तीव्र जलन व पीड़ा हो तो चंदन के जल के साथ घिसकर दिन में कई बार लेप करने से तुरंत लाभ होता है।


१२) छुहारे के बीज को पानी के साथ घिस लें | इसे दिन में २-३ बार अंजनहारी पर लगाने से लाभ होता है |


१३) तुलसी के रस में लौंग घिस लें | अंजनहारी पर यह लेप लगाने से आराम मिलता है |


१४) हरड़ को पानी में घिसकर अंजनहारी पर लेप करने से लाभ होता है |


१५) आम के पत्तों को डाली से तोड़ने पर जो रस निकलता है,उस रस को गुहेरी पर लगाने से गुहेरी जल्दी समाप्त हो जाती है |

हर्निया ,आंत उतरने के उपचार Home remedies for hernia




आम तौर पर हर्निया होने का कारण पेट की दीवार का कमजोर होना है |पेट और जांघों के बीच वाले हिस्से मे जहां पेट की दीवार कमजोर पड़ जाती है वहाँ आंत का एक गुच्छा उसमे छेद बना कर बाहर निकल आता है | उस स्थान पर दर्द होने लगता है | इसी को आंत्र उतरना,आंत्रवृद्धि या हर्निया कहते हैं|


एबडॉमिनल वॉल के कमजोर भाग के अंदर का कोई भाग जब बाहर की ओर निकल आता है तो इसे हर्निया कहते हैं। हर्निया में जांघ के विशेष हिस्से की मांसपेशियों के कमजोर होने के कारण पेट के हिस्से बाहर निकल आते हैं। हर्निया की समस्या जन्मजात भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में इसे कॉनजेनाइटल हर्निया कहते हैं। हर्निया एक वक्त के बाद किसी को भी हो सकता है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि हर्निया का एकमात्र इलाज सर्जरी है जिसकी वजह से वे डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है हर्निया बिना सर्जरी के भी ठीक हो सकता है।


जब किसी व्यक्ति की आंत अपने जगह से उतर जाती है तो उस व्यक्ति के अण्डकोष की सन्धि में गांठे जैसी सूजन पैदा हो जाती है जिसे यदि दबाकर देखा जाए तो उसमें से कों-कों शब्द की आवाज सुनाई देती हैं। आंत उतरने का रोग अण्डकोष के एक तरफ पेड़ू और जांघ के जोड़ में अथवा दोनों तरफ हो सकता है। जब कभी यह रोग व्यक्ति के अण्डकोषों के दोनों तरफ होता है तो उस रोग को हार्निया रोग के नाम से जाना जाता है। वैसे इस रोग की पहचान अण्डकोष का फूल जाना, पेड़ू में भारीपन महसूस होना, पेड़ू का स्थान फूल जाना आदि। जब कभी किसी व्यक्ति की आंत उतर जाती है तो रोगी व्यक्ति को पेड़ू के आस-पास दर्द होता है, बेचैनी सी होती है तथा कभी-कभी दर्द बहुत तेज होता है और इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। कभी-कभी तो रोगी को दर्द भी नहीं होता है तथा वह धीरे से अपनी आंत को दुबारा चढ़ा लेता है। आंत उतरने की बीमारी कभी-कभी धीरे-धीरे बढ़ती है तथा कभी अचानक रोगी को परेशान कर देती है।



प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार देखा जाए तो आंत निम्नलिखित कारणों से उतर जाती है-
1. कठिन व्यायाम करने के कारण आंत उतरने का रोग हो जाता है।
2. पेट में कब्ज होने पर मल का दबाव पड़ने के कारण आंत उतरने का रोग हो जाता है।
3. भोजन सम्बन्धी गड़बड़ियों तथा शराब पीने के कारण भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
4. मल-मूत्र के वेग को रोकने के कारण भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
5. खांसी, छींक, जोर की हंसी, कूदने-फांदने तथा मलत्याग के समय जोर लगाने के कारण आंत अपनी जगह से उतर जाती है।6. पेट में वायु का प्रकोप अधिक होने से आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
7. अधिक पैदल चलने से भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।



8. भारी बोझ उठाने के कारण भी आंत अपनी जगह से उतर जाती है।
9. शरीर को अपने हिसाब से अधिक टेढ़ा-मेढ़ा करने के कारण आंत अपनी जगह से उतर जाती है।

जिस हर्निया में आंत उलझ कर गाँठ लग गयी हो और मरीज को काफी तकलीफ हो रही हो, ऐसे बिगड़े केस में तत्काल ऑपरेशन जरुरी है. बाकी सभी मामलों में हार्निया बिना आपरेशन के ही ठीक हो सकता है.


हर्निया की प्रारम्भिक स्थिति मे  पेट की दीवार मे कुछ उभार सा  प्रतीत होता है| इस आगे बढ़ी हुई आंत को पीछे भी धकेला जा सकता है लेकिन ज्यादा ज़ोर लगाना उचित नहीं है| 


*अगर  आगे बढ़ी आंत को आराम से पीछे  धकेलकर  अपने स्थान पर पहुंचा दिया जाए तो  उसे उसी स्थिति मे रखने के लिए कस कर बांध  देना चाहिए| यह तरीका असफल हो जाये तो फिर आपरेशन की सलाह  देना उचित है| 

*पेट की तोंद ज्यादा निकली हुई हो तो उसे भी घटाने के उपचार जरूरी होते हैं| 

*अरंडी का तेल दूध मे मिलाकर  पीने से हर्निया ठीक हो  जाता है |इसे एक माह तक करें| 


*काफी पीने से भी बढ़ी हुई आंत के रोग मे फायदा होता है|

हार्निया या आंत उतरने का मूल कारण पुराना कब्ज है। कब्ज के कारण बडी आंत मल भार से अपने स्थान से खिसककर नीचे लटकने लगती है। मल से भरी नीचे लटकी आंत गांठ की तरह लगती है। इसी को हार्निया या आंत उतरना कहते हैं।

*कुन कुना पानी पीकर 5 मिनिट तक कौआ चाल (योग क्रिया) करके फिर पांच या अधिक से अधिक दस बार तक सूर्य नमस्कार और साथ ही 200 से 500 बार तक कपाल-भांति करने से फूली हुई आंत वापस ऊपर अपने स्थान पर चली जाती है। भविष्य में कभी भी आपको हार्निया और पाइल्स होने की सम्भावना नही होगी।

हर्निया के होम्योपैथिक उपचार -


*सुबह उठते ही सबसे पहले आप सल्फर 200  7 बजे,  दोपहर को आर्निका 200 और रात्रि को खाने के एक से दो घंटे बाद या नौ बजे नक्स वोम 200 की पांच-पांच बूँद आधा कप पानी से एक हफ्ते तक ले, फिर हर तीन से छह माह में तीन दिन तक लें.


*केल्केरिया कार्ब 200 की पांच बूँद आधा कप पानी से पांच दिन तक लें.


*जब भी अचानक जलन, दर्द, सूजन होना, घबराहट, ठंडा पसीना और मृत्यु भय हो, तो एकोनाइट 30 की पांच बूँद आधा कप पानी से हर घंटे में लें.


*जब दाहिने भाग में हार्निया हो, तो लाइकोपोडियम 30 की पांच बूँद आधा कप पानी से दिन में तीन बार लें.


आंत उतरने से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-





1. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार जब किसी व्यक्ति की आंत उतर जाती है तो रोगी व्यक्ति को तुरन्त ही शीर्षासन कराना चाहिए या उसे पेट के बल लिटाना चाहिए। इसके बाद उसके नितम्बों को थोड़ा ऊंचा उठाकर उस भाग को उंगुलियों से सहलाना और दबाना चाहिए। जहां पर रोगी को दर्द हो रहा हो उस भाग पर दबाव हल्का तथा सावधानी से देना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया करने से रोगी व्यक्ति की आंत अपने स्थान पर आ जाती है। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने के बाद रोगी को स्पाइनल बाथ देना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोगी व्यक्ति की पेट की मांसपेशियों की शक्ति बढ़ जाती है तथा अण्डकोष संकुचित हो जाते हैं।
2. रोगी की आंत को सही स्थिति में लाने के लिए उसके शुक्र-ग्रंथियों पर बर्फ के टुकड़े रखने चाहिए जिसके फलस्वरूप उतरी हुई आंत अपने स्थान पर आ जाती है।


3. यदि किसी समय आंत को अपने स्थान पर लाने की क्रिया से आंत अपने स्थान पर नहीं आती है तो रोगी को उसी समय उपवास रखना चाहिए। यदि रोगी के पेट में कब्ज हो रही हो तो एनिमा क्रिया के द्वारा थोड़ा पानी उसकी बड़ी आंत में चढ़ाकर, उसमें स्थित मल को बाहर निकालना चाहिए इसके फलस्वरूप आंत अपने मूल स्थान पर वापस चली जाती है।


4. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इस रोग का उपचार करने के लिए हार्निया की पट्टी का प्रयोग करना चाहिए। इस पट्टी को सुबह के समय से लेकर रात को सोने के समय तक रोगी के पेट पर लगानी चाहिए। यह पट्टी तलपेट के ऊपर के भाग को नीचे की ओर दबाव डालकर रोके रखती है जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से उसकी मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। ठीक रूप से लाभ के लिए रूग्णस्थल (रोग वाले भाग) पर प्रतिदिन सुबह और शाम को चित्त लेटकर नियमपूर्वक मालिश करनी चाहिए। मालिश का समय 5 मिनट से आरम्भ करके धीरे-धीरे बढ़ाकर 10 मिनट तक ले जाना चाहिए। रोगी के शरीर पर मालिश के बाद उस स्थान पर तथा पेड़ू पर मिट्टी की गीली पट्टी का प्रयोग लगभग आधे घण्टे तक करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।


5. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी व्यक्ति के पेट पर मालिश और मिट्टी लगाने तथा रोगग्रस्त भाग पर भाप देने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।


6. इस रोग का इलाज करने के लिए पोस्ता के डोण्डों को पुरवे में पानी के साथ पकाएं तथा जब पानी उबलने लगे तो उसी से रोगी के पेट पर भाप देनी चाहिए और जब पानी थोड़ा ठंडा हो जाए तो उससे पेट को धोना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।


निम्नलिखित व्यायामों के द्वारा आंत उतरने के रोग को ठीक किया जा सकता है-
1. यदि आंत उतर गई हो तो उसका उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी के पैरों को किसी से पकड़वा लें या फिर पट्टी से चौकी के साथ बांध दें और हाथ कमर पर रखें। फिर इसके बाद रोगी के सिर और कन्धों को चौकी से 6 इंच ऊपर उठाकर शरीर को पहले बायीं ओर और फिर पहले वाली ही स्थिति में लाएं और शरीर को उठाकर दाहिनी ओर मोड़े। फिर हाथों को सिर के ऊपर ले जाएं और शरीर को उठाने का प्रयत्न करें। यह कसरत कुछ कठोर है इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि अधिक जोर न पड़े। सबसे पहले इतनी ही कोशिश करें जिससे पेशियों पर तनाव आए, फिर धीरे-धीरे बढ़ाकर इसे पूरा करें। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।


2. प्राकृतिक चिकित्सा से इस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को सीधे लिटाकर उसके घुटनों को मोड़ते हुए पेट से सटाएं और तब तक पूरी लम्बाई में उन्हें फैलाएं जब तक उसकी गति पूरी न हो जाए और चौकी से सट न जाए। इस प्रकार से रोगी का इलाज करने से रोगी का रोग ठीक हो जाता है।


3. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी व्यक्ति का इलाज करने के लिए रोगी के दोनों हाथों को फैलाकर चौकी के किनारों को पकड़ाएं और उसके पैरों को जहां तक फैला सकें उतना फैलाएं। इसके बाद रोगी के सिर को ऊपर की ओर फैलाएं। इससे रोगी का यह रोग ठीक हो जाता है।


4. रोगी व्यक्ति का इलाज करने के लिए रोगी व्यक्ति को हाथों से चौकी को पकड़वाना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी अपने पैरों को ऊपर उठाते हुए सिर के ऊपर लाएं और चौकी की ओर वापस ले जाते हुए पैरों को लम्बे रूप में ऊपर की ओर ले जाएं। इसके बाद अपने पैरों को पहले बायीं ओर और फिर दाहिनी ओर जहां तक नीचे ले जा सकें ले जाएं। इस क्रिया को करने में ध्यान इस बात पर अधिक देना चाहिए कि जिस पार्श्व से पैर मुड़ेंगे उस भाग पर अधिक जोर न पड़े। यदि रोगी की आन्त्रवृद्धि दाहिनी तरफ है तो उस ओर के पैरों को मोड़ने की क्रिया बायीं ओर से अधिक बार होनी चाहिए। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से रोगी की आंत अपनी जगह पर आ जाती है।

5. कई प्रकार के आसनों को करने से भी आंत अपनी जगह पर वापस आ जाती है जो इस प्रकार हैं- अर्द्धसर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, शीर्षासन और शलभासन आदि।
6. आंत को अपनी जगह पर वापस लाने के लिए सबसे पहले रोगी को पहले दिन उपवास रखना चाहिए। इसके बाद रोग को ठीक करने के लिए केवल फल, सब्जियां, मट्ठा तथा कभी-कभी दूध पर ही रहना चाहिए। यदि रोगी को कब्ज हो तो सबसे पहले उसे कब्ज का इलाज कराना चाहिए। फिर सप्ताह में 1 दिन नियमपूर्वक उपवास रखकर एनिमा लेना चाहिए। इसके बाद सुबह के समय में कम से कम 1 बार ठंडे जल का एनिमा लेना चाहिए और रोगी व्यक्ति को सुबह के समय में पहले गर्म जल से स्नान करना चाहिए तथा इसके बाद फिर ठंडे जल से। फिर सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर वाष्पस्नान भी लेना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को तख्त पर सोना चाहिए तथा सोते समय सिर के नीचे तकिया रखना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को अपनी कमर पर गीली पट्टी बांधनी चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

7. इस रोग से पीड़ित रोगी को गहरी नीली बोतल के सूर्यतप्त जल को लगभग 50 मिलीलीटर की मात्रा में रोजाना लगभग 6 बार लेने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।



Thursday, June 23, 2016

त्वचा की झुर्रियां मिटाने के उपचार How to remove skin wrinkles.





प्रदूषण, धूल-मिट्‌टी, तनाव, धूप और दौड़भाग न जाने कितनी चीजों का सामना हमारी त्वचा को प्रतिदिन करना पड़ता है। ऐसे में समय रहते उचित देखभाल न करने से उम्र के पहले ही चेहरे पर झुर्रियों पड़ जाती हैं। चिरयुवा बने रहने तथा सौंदर्य कायम रखने में सबसे बड़ी बाधा हैं झुर्रियों की समस्या। बढ़ती उम्र के निशान सबसे पहले चहरे पर ही नजर आते हैं। यदि त्वचा की उचित तरीके से देखभाल की जाए तो वर्षो तक चेहरा स्निग्ध व कमनीय बना रहेगा।

नैसर्गिक रूप से महिलायें अपने सौंदर्य के प्रति सचेत रहती हैं, कभी-कभी असमय ही झाईयां-झुरियां होने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। आमतौर पर झुर्रियां बढ़ती उम्र की निशानी मानी जाती है लेकिन जिस तरह से हमारे खानपान व जीवनशैली में बदलाव आया है, उम्र में ही चेहरे पर झुर्रियां नजर आने लगी है। झुर्रियां अक्सर शरीर के भागों में होती हैं जो अक्सर खुला, नाजुक और कोमल रहता है।

कैसे पड़ती है झुर्रियां -
झुर्रियों का प्रमुख कारण त्वचा की खुश्की है। त्वचा की प्राकृतिक चिकनाई होने लगती है। जिसके कारण त्वचा और आंखों के आसपास लकीरें होने लगती है। क्रोध, चिंता, शोध, झुंझलाहट, तनाव आदि का असर त्वचा पर पड़ता है। तनावयुक्त रहने पर हमारे माथे पर सलवटें पड़ती है जिससे वहां की त्वचा में ढीलापन आकर त्वचा लटक जाती है और झुर्रियां पड़ने लगती है।

अधिक धूप आंतरिक त्वचा के लिये नुकसानदायक है। तीव्र धूप त्वचा की स्कीन को सोखकर उसे सिकोड़ देती है जो अंखों के नीचे झुर्रियों का कारण होते हैं। ठंड के प्रकोप से भी त्वचा कठोर हो जाती है और झुर्रियां नजर आने लगती है।

साबुन में मौजूद कॉस्टिक सोडा त्वचा के रहे- सहे तेल को भी सोख लेता है। जिससे कम उम्र में ही हमारे चेहरे पर झुर्रियां नजर आने लगती हैं। कॉस्मेटिक का अधिक उपयोग भी त्वचा के लिए हानिकारक है।

कॉस्मेटिक्स त्वचा के भीतर जाकर उसके रोमछिद्रों को अवरूद्ध कर देते है। जिससे त्वचा की सही तरीके से सफाई नहीं हो पाती और धीरे-धीरे हमारे चेहरे पर झुर्रियां नजर आने लगती है।

कहां होती है झुर्रियां -

झुर्रियां अक्सर हमारे चेहरे और गर्दन पर होती है। चूँकि ये शरीर के वे भाग हैं, जो सबसे ज्यादा धूप व बाहरी वायु के सम्पर्क में होते है। आंखों के नीचे से शुरू होकर झुर्रियां गर्दन के आसपास भी होने लगती है।

झुर्रियों से बचाव तथा उपचार-

झुर्रियों से मुक्ति पाने का एकमात्र व सर्वश्रेष्ठ उपाय है, इससे बचाव। झुर्रियों से त्वचा को बचाने के लिए हमें अपने खानपान व जीवनशैली पर विशेष ध्यान देना होगा।

* प्रोटीन तथा तैलीय तत्वों से युक्त भोजन लें, किन्तु वह गरिष्ठ न हो इसका भी ध्यान रखें। बादाम, गाजर व आंवले का सेवन अत्यंत लाभप्रद है।
*. नियमित व्यायाम करें। योग अभ्यास से भी त्वचा कसावदार व कांतिपूर्ण होती है।

*त्वचा को रूखा न रहने दें मलाई या माइश्चराइजर का प्रयोग करें। चेहरे के लिए हमेशा ग्लिसरीनयुक्त साबुन का प्रयोग करें।

* नियमित रूप से चेहरे की मालिश झुर्रियां रोकने में सहायक है।

* तनाव चिंता से दूर रहें दैनिक व्यवहार में सौम्य व प्रसन्न रहें।
6. पानी भरपूर पिएं।

झुर्रियां समाप्त करने के नुस्खे: -
1. कच्चे दूध से चेहरा साफ करने तथा फेस पैक में शहद और संतरे का रस मिलाकर लगाने से त्वचा में निखार आता है।

*नीम, पुदीना, तुलसी की पत्ती का पाउडर और मेथी पाउडर एंटीसेप्टिक का काम करता है।
लाल चंदन शीतलता और चिकनाहट प्रदान करता है।
* टमाटर और नीबू का रस मिलाकर शरीर पर लगाएं। नहाते समय इस लेप को रगड़कर छुड़ा दें। कुछ सप्ताह तक ऐसा करने से त्वचा कोमल हो जाती है।
*शहद में मलाई और नीबू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिक्स कर चेहरे व आंखों के नीचे लगाएं। इससे आंखों के नीचे का कालापन दूर होकर झुर्रियां समाप्त होती है।

* मूली कसकर रस निकालें व समान मात्रा में मक्खन मिलाकर चेहरे व गर्दन पर लगाएं, एक घण्टे बाद कुनकुने पानी से धो लें।

* गरम पानी में संतरे के छिलके डाल दें, रात भर पड़ा रहने दें। सुबह इसी पानी से चेहरा धोएं । ऐसा करने से त्वचा में कसाव आता है।

* पपीते का गुदा मसलकर चेहरे पर लगाएं। कुछ देर बाद चेहरा साफ कर लें। कुछ दिन लगातार ऐसा करने से झुर्रियों से मुक्ति मिलती है।

*आधा चम्मच मलाई में नींबू की चार- पांच बूंदे मिलाकर सोने से पहले चेहरे पर अच्छी तरह मलें। दोनों हाथों से मलाई तब तक मलते रहें जब तक कि मलाई घुलकर त्वचा में एकसार न हो जाए।

*खीरे को कद्दूकस कर चेहरे पर लगाने से त्वचा कांतिमय होती है।

*. त्वचा की झुर्रियां मिटाने के लिए गाजर, टमाटर और चुकंदर का रस नियमित पिएं।

* ई और ओ बोलते हुये एक बार चेहरे को फैलाएं और फिर सिकोड़ें। इससे गालों का अच्छा व्यायाम होता है। जिसमें गालों की पुष्टि होती है और झुर्रियों से बचाव।


 *   त्वचा पर बढ़ती झुर्रियां समय से पहले आपकी आयु बढ़ा देती हैं। इन्हें छिपाने के लिए लोग भांति भांति के कास्मेटिक्स प्रयोग करते हैं किन्तु मुख्य सफलता इन्हें छिपाने के बजाए हटाने में है। 


*हल्दी शहद पेस्टः हल्दी में शहद मिलाकर पेस्ट बना लें और उसे गले और चेहरे पर लगाएं। 10-15 मिनट बाद इसे पानी से धो लें।


* चावल के आटे का पेस्टः एक कप चावल के आटे में दूध और गुलाब जल मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाएं। इसे चेहरे, गले और माथे पर लगाएं और 20 मिनट तक छोड़ दें और फिर पानी से धो लें।


*चंदन पाउडरः छाछ पाउडर न केवल त्वचा से झुर्रियां हटाने में सहायक है बल्कि चेहरे से मुंहासो को भी दूर करता है। चंदन पाउडर में गुलाब जल डालकर चेहरे पर लगाएं और 7-10 मिनट बाद पानी से धो लें।


*दूध, टमाटर और हल्दी पेस्टः कच्चे दूध में टमाटर की प्योरी, चावल का आटा और हल्दी पाउडर मिलाकर पेस्ट बना लें और चेहरे पर लगाएं। थोड़ी देर प्रतीक्षा करें और सूखने के बाद नर्म हाथों से अच्छी तरह धोएं। इससे त्वचा टाइट रहती है।


*टमाटर और हल्दी पेस्ट में छाछ या गन्ने का रस मिलाकर लगाने से झुर्रिया तो कम होती ही हैं झाईं भी दूर होती हैं।


*अदरक शहदः प्रतिदिन नहार मुंह एक चमम्मच शहद में बारीक कटी अदरक डालकर खाएं। इससे आप लंबे समय तक झुर्रियों से दूर रहेंगे।

Wednesday, June 8, 2016

गोखरू किडनी रोगों की महोषधि Caltrap beneficial remedy in kidney diseases


किड्नी के लिए राम बाण  औषधि है गोखरू | बंद किड्नी को चालू करता है| किड्नी मे स्टोन को टुकड़े टुकड़े करके पेशाब के रास्ते बाहर निकल देता है| क्रिएटिन ,यूरिया को तेजी  से  नीचे लाता है ,पेशाब मे जलन हो पेशाब ना होती है ,इसके लिए भी यह काम करता है इसके बारे मे आयुर्वेद के जनक आचार्य श्रुशूत ने भी लिखा इसके अलावा कई विद्वानो ने इसके बारे मे लिखा है इसका प्रयोग हर्बल दवाओं मे भी होता है आयुर्वेद की दवाओं मे भी होता है यह स्त्रियो के बंध्यत्व  मे तथा पुरुषों के नपुंसकता मे भी बहुत उपयोगी होता है इस दवा का सेवन कई लोगो ने किया है जिनका क्रिएटिन 10 पाईंट से भी अधिक था उन्हे भी 15 दिनो मे  संतोषप्रद  लाभ हुआ |आत: जिन लोगो को किडनी की प्राब्लम है वो इसका सेवन करे तो लाभ होना निश्चित है
गोखरू की दो जातियां होती हैं बड़ा गोखरू और छोटा गोखरू। औषधि के रूप में छोटा गोखरू प्रयोग होता है। औषधि के रूप में पौधे की जड़ और फल का प्रयोग होता है।
गोखरू के आयुर्वेदिक गुण Ayurvedic Properties
गोखरू के गुणकर्म संबंधी मत-
*आचार्य चरक ने गोक्षुर को मूत्र विरेचन द्रव्यों में प्रधान मानते हुए लिखा है-गोक्षुर को मूत्रकृच्छानिलहराणाम् अर्थात् यह मूत्र कृच्छ (डिसयूरिया) विसर्जन के समय होने वाले कष्ट में उपयोगी एक महत्त्वपूर्ण औषधि है । आचार्य सुश्रुत ने लघुपंचकमूल, कण्टक पंचमूल गणों में गोखरू का उल्लेख किया है । अश्मरी भेदन (पथरी को तोड़ना, मूत्र मार्ग से ही बाहर निकाल देना) हेतु भी इसे उपयोगी माना है ।
श्री भाव मिश्र गोक्षुर को मूत्राशय का शोधन करने वाला, अश्मरी भेदक बताते हैं व लिखते हैं कि पेट के समस्त रोगों की गोखरू सर्वश्रेष्ठ दवा है । वनौषधि चन्द्रोदय के विद्वान् लेखक के अनुसार गोक्षरू मूत्र पिण्ड को उत्तेजना देता है, वेदना नाशक और बलदायक है ।
गोखरू के औषधीय उपयोग-
*पथरी रोग :- पथरी रोग में गोक्षुर के फलों का चूर्ण शहद के साथ 3 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम दिया जाता है । महर्षि सुश्रुत के अनुसार सात दिन तक गौदुग्ध के साथ गोक्षुर पंचांग का सेवन कराने में पथरी टूट-टूट कर शरीर से बाहर चली जाती है । मूत्र के साथ यदि रक्त स्राव भी हो तो गोक्षुर चूर्ण को दूध में उबाल कर मिश्री के साथ पिलाते हैं ।पथरी की चिकित्सा में सबसे महत्वपूर्ण औषधी है गोखरू :- पथरी के रोगी को इसके बीजो का चूर्ण दिया जाता है तथा पत्तों का पानी बना के पिलाया जाता है | इसके पत्तों को पानी में कुछ देर के लिए भिगो देते है | उसके बाद पतो को १५ बीस बार उसी पानी में डुबोते है और निकालते है इस प्रक्रिया में पानी चिकना गाढा लार युक्त हो जाता है | यह पानी रोगी को पिलाया जाता है स्वाद हेतु इसमे चीनी या नमक थोड़ी मात्रा में मिलाया जा सकता है | यह पानी स्त्रीयों में श्वेत प्रदर ,रक्त प्रदर पेशाब में जलन आदि रोगों की राम बाण औषधी है | यह मूत्राशय में पडी हुयी पथरी को टुकड़ों में बाट कर पेशाब के रास्ते से बाहर निकाल देता है |
*सुजाक रोग :- सुजाक रोग (गनोरिया) में गोक्षुर को घंटे पानी में भिगोकर और उसे अच्छी तरह छानकर दिन में चार बार 5-5 ग्राम की मात्रा में देते हैं । किसी भी कारण से यदि पेशाब की जलन हो तो गोखरु के फल और पत्तों का रस 20 से 50 मिलीलीटर दिन में दो-तीन बार पिलाने से वह तुरंत मिटती है । प्रमेह शुक्रमेह में गोखरू चूर्ण को 5 से 6 ग्राम मिश्री के साथ दो बार देते हैं । तुरंत लाभ मिलता है ।
*प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने में :- मूत्र रोग संबंधी सभी शिकायतों यथा प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने से पेशाब का रुक-रुक कर आना, पेशाब का अपने आप निकलना (युरीनरी इनकाण्टीनेन्स), नपुंसकता, मूत्राशय की पुरानी सूजन आदि में गोखरू 10 ग्राम, जल 150 ग्राम, दूध 250 ग्राम को पकाकर आधा रह जाने पर छानकर नित्य पिलाने से मूत्र मार्ग की सारी विकृतियाँ दूर होती हैं ।
*प्रदर में, अतिरिक्त स्राव में, स्री जनन अंगों के सामान्य संक्रमणों में गोखरू एक प्रति संक्रामक का काम करता है । स्री रोगों के लिए 15 ग्राम चूर्ण नित्य घी व मिश्री के साथ देते हैं ।
गोक्षुर चूर्ण प्रोस्टेट बढ़ने से मूत्र मार्ग में आए अवरोध को मिटाता है, उस स्थान विशेष में रक्त संचय को रोकती तथा यूरेथ्रा के द्वारों को उत्तेजित कर मूत्र को निकाल बाहर करता है । बहुसंख्य व्यक्तियों में गोक्षुर के प्रयोग के बाद ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं रह जाती । इसे योग के रूप न देकर अकेले अनुपान भेद के माध्यम से ही दिया जाए, यही उचित है, ऐसा वैज्ञानिकों का व सारे अध्ययनों का अभिमत है ।
*नपुंसकता impotence arising from bad practice में, बराबर मात्रा में गोखरू के बीज का चूर्ण और तिल के बीज sesame seeds powder के चूर्ण, को बकरी के दूध और शहद के साथ दिया जाता है।
*धातु की कमजोरी में इसके ताजे फल का रस 7-14 मिलीलीटर या 14-28 मिलीलीटर सूखे फल के काढ़े, को दिन में दो बार दूध के साथ लें।
*मूत्रकृच्छ painful urination में 5g गोखरू चूर्ण को दूध में उबाल कर पीने से आराम मिलता है। यह मूत्र की मात्रा बढ़ाने में मदद करता है और सूजन कम करता है।
*मूत्रघात urinary retention में 3-6 ग्राम फल का पाउडर, पानी के साथ दिन में दो बार लें।
रक्तपित्त में गोखरू के फल को 100-200 मिलीलीटर दूध में उबाल कर दिन में दो बार लें।
*धातुस्राव, स्वप्नदोष nocturnal fall, प्रमेह, कमजोरी weakness, और यौन विकारों sexual disorders में 5 ग्राम गोखरू चूर्ण को बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करें।
*यौन शक्ति को बढ़ाने के लिए, गोखरू, शतावर, नागबला, खिरैटी, असगंध, को बराबर मात्रा में कूट कर, कपड़चन कर लें और रोज़ १ छोटा चम्मच दूध के साथ ले। इसको ४० दिन तक लगातार लें।
*अश्मरी urinary stones में 5 ग्राम गोखरू चूर्ण (फल का पाउडर) शहद के साथ दिन में दो बार, पीछे से गाय का दूध लें।
गोखरू का काढ़ा बनाने की विधि:


250 ग्राम गोखरू लेकर 4 लीटर पानी मे उबालिए जब पानी एक लीटर रह जाए तो पानी छानकर एक बोतल मे रख लीजिए|इस काढे को सुबह शाम हल्का सा गुनगुना करके 100 ग्राम के करीब पीजिए शाम को खाली पेट का मतलब है दोपहर के भोजन के 5, 6 घंटे के बाद काढ़ा पीने के एक घंटे के बाद ही कुछ खाइए और अपनी पहले की दवाई ख़ान पान का रूटीन पूर्ववत ही रखिए 15 दिन के अंदर यदि आपके अंदर अभूतपूर्व परिवर्तन हो जाए तो चिकित्सक  की सलाह लेकर  धीरे धीरे दवा बंद कर दीजिए| जैसे जैसे आपके अंदर सुधार होगा काढे की मात्रा कम कर सकते है या दो बार की बजाए एक बार भी कर सकते है |मेरा निवेदन है कि खराब किडनी रोगी को किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के पहिले यह औषधि जरूर सेवन करके चमत्कारिक परिणाम की उम्मीद करनी चाहिए|

Thursday, June 2, 2016

Brief repertory of bio chemic medicines


Brief repertory of bio chemic medicines-


1.Absess-
ferrum phos+kali mure
2.Aneurism-
ferrum phos+cal flure
3.Angina-
ferrum phos +mag phos
4.Aphonia-
kali mure+kali sulp
5.Asthma-
a.kali mure+kali phos
b.natrum mure+kali phos
c.cal flure+kali phos
6.Albuminuria-
cal phos+kali sulp
7.Arthritis-kali mure+ferrum phos
8.Brain-
kali phos+kali mure
9.Bronchitis-
a.kali mure+ferrum phos
b.kali sulp+ferr phos
10.Burn and scalds-
a.ferrum phos+kali mure
b.cal sulp+natrum mure
11.Carboncle-
kali mure+ferrum phos
12.Chickenpox-
ferrum phos+kali sulp
13.Croup-
a.ferrum phos+kali mure
b.kali phos+kali mure
14.Conjunctivitis-
kali mure +kali sulp
15.Cardiac palpitation-
ferrum phos+kali phos
16.Circulatory disfunction-
kali mure +ferrum phos
17.Fever-
a.General-kali mure +ferrum phos
b.Nevous-kali phos+ferrum phos
c.Blood poisoning-kali sulp+ferrum phos
d.Hay fever-nat mure+ferrum phos
e.Pureperal fever-ferrum phod+kali phos
18.Dysentry-
ferrum phos+kali mure
19.Dysmenorrhoea-
kali phos+ferrum phos
20.Epilepsy-
natrum phos+kali mure
21.Enlargement of joint-
cal flure+natrum sulp
22.Gall stone-
natrum sulp+cal sulp
23.Gonorrhea-
a.ferrum phos+kali mure
b.natrum mure+cal phos
24.Gout-
natrum sulp+ferrum phos
25.Hemorrhoid-
kali mure / kalisulp/natrum sulp/kali phos+cal flure
26.Hip joint disease-
cal sulp+ferrum phos
27.Horseness-
kali mure +kali sulp
28.Hydrocele-
natrum sulp+natrum mure
29.Hysteria-
natrum mure+kali sulp
30.Influenza-
kali sulp+ferrum phos
31.Leuchoeehea-
kali phos+natrum mure
32.Lambago-
ferrum phos=others
33.Meningitis-
ferrum phos+kali mure
34.Mumps-
kali mure+ferrum phos
35.Peritonitis-
kali mure+ferrum phos
36.Pneumonia-
kali mure/kali sulp+ferrum phos
37.Quick puls-
ferrum phos+kali sulp
38.Rheumatism-
cal phos+ferrum phos
39.Scrofulous-
cal flure+kali mure
40.Sciatica with gout-
natrum sulp+kali phos
41Sleeplessness-
ferrum phos+kali phos
42.T B-natrum mure+ferrum phos
43.Thyphoid-
a.Fevrile condition-kali phos+ferrum phos
b.Costiveness-kali mure+kali phos
c.Sleeplessness-natrum mure+kali phos
44.thread worm-
kali mure=natrum phos
45.Uterine hypertrophy-
cal flure+kali mure

Tuesday, May 24, 2016

श्वसन तंत्र के रोग के उपचार Treatment of respiratory disease












सांस फूलना या सांस ठीक से न लेने का अहसास होना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क से मिलने वाला संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देता है। फेफड़ों से संबंधित पूरी प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों की वजह से भी सांसों की समस्या आती है। फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य  विजातीय पदार्थों  की वजह से श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट के कारण भी सांस लेने में दिक्कत आती है। दिल की बीमारियों और खून में प्राणवायु  का स्तर कम होने से भी सांस फूलती है।इस वजह से 2  किस्म की बीमारियां आमतौर पर हो जाती है -
1..दमा
२. ब्रोंकाइटिस
दमा
जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं।
दमा रोग के  लक्षण:-
दमा रोग में रोगी को सांस लेने तथा छोड़ने में काफी जोर लगाना पड़ता है। जब फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती हैं) की छोटी-छोटी तन्तुओं (पेशियों) में अकड़न युक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़े वायु (श्वास) की पूरी खुराक को अन्दर पचा नहीं पाते हैं। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है। इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है। दमा रोग की स्थिति तब अधिक बिगड़ जाती है जब रोगी को श्वास लेने में बहुत दिक्कत आती है क्योंकि वह सांस के द्वारा जब वायु को अन्दर ले जाता है तो प्राय: प्रश्वास (सांस के अन्दर लेना) में कठिनाई होती है तथा नि:श्वास (सांस को बाहर छोड़ना) लम्बे समय के लिए होती है। दमा रोग से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेते समय हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।
जब दमा रोग से पीड़ित रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसे दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत आती है तथा व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है।
जब दमा रोग से पीड़ित रोगी को दौरा पड़ता है तो उसे सूखी खांसी होती है और ऐंठनदार खांसी होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है।मेरे विचार मे  दमा रोग प्राकृतिक चिकित्सा से पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
दमा रोग होने का कारण:-
*धूल के कण, खोपड़ी के खुरण्ड, कुछ पौधों के पुष्परज, अण्डे तथा ऐसे ही बहुत सारे प्रत्यूजनक पदार्थों का भोजन में अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।
*भूख से अधिक भोजन खाने से दमा रोग हो सकता है।
*मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य पदार्थों तथा गरिष्ठ भोजन करने से दमा रोग हो सकता है।
*फेफड़ों में कमजोरी, हृदय में कमजोरी, गुर्दों में कमजोरी, आंतों में कमजोरी तथा स्नायुमण्डल में कमजोरी हो जाने के कारण दमा रोग हो जाता है।
*मनुष्य की श्वास नलिका में धूल तथा ठंड लग जाने के कारण दमा रोग हो सकता है।
*मनुष्य के शरीर की पाचन नलियों में जलन उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से भी दमा रोग हो सकता है।
*मल-मूत्र के वेग को बार-बार रोकने से दमा रोग हो सकता है।
*औषधियों का अधिक प्रयोग करने के कारण कफ सूख जाने से दमा रोग हो जाता है।
*खान-पान के गलत तरीके से दमा रोग हो सकता है।
*मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय के कारण भी दमा रोग हो सकता है।
*खून में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न हो जाने के कारण भी दमा रोग हो सकता है।
*नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।
*खांसी, जुकाम तथा नजला रोग अधिक समय तक रहने से दमा रोग हो सकता है।

*नजला रोग होने के समय में संभोग क्रिया करने से दमा रोग हो सकता है।
*धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने या धूम्रपान करने से दमा रोग हो सकता है।



दमा रोग के लक्षण:-
दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक कठिनाई होती है।
सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक कठिनाई होती है।
सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं।


दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
*दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को नारियल पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी को भिगोकर खायें तथा इसके पानी में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिएं तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिलाकर पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं।
*1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी हैं जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभांति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तानमन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।





दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्रल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी के लिए कुछ सावधानियां:-
दमा रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में लेसदार पदार्थ तथा मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को धूल तथा धुंए भरे वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है।
रोगी व्यक्ति को मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ों से बचना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब, तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।

2.ब्रोंकाइटिस

तेज ब्रोंकाइटिस-
इस रोग के कारण रोगी को सर्दियों में अधिक खांसी और गर्मियों में कम खांसी होती रहती है लेकिन जब यह पुरानी हो जाती है तो खांसी गर्मी हो या सर्दी दोनों ही मौसमों में एक सी बनी रहती है।
तेज ब्रोंकाइटिस के लक्षण:-
तेज ब्रोंकाइटिस रोग में रोगी की सांस फूल जाती है और उसे खांसी बराबर बनी रहती है तथा बुखार जैसे लक्षण भी बन जाते हैं। रोगी व्यक्ति को बैचेनी सी होने लगती है तथा भूख कम लगने लगती है।
तेज ब्रोंकाइटिस के कारण:-
जब फेफड़ों में से होकर जाने वाली सांस नली के अन्दर से वायरस (संक्रमण) फैलता है तो वहां की सतह फूल जाती है, सांस की नली जिसके कारण पतली हो जाती है। फिर गले में श्लेष्मा जमा होकर खांसी बढ़ने लगती है और यह रोग हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस-
पुराना ब्रोंकाइटिस रोग रोगी को बार-बार उभरता रहता है तथा यह रोग रोगी के फेफड़ों को धीरे-धीरे गला देता है और तेज ब्रोंकाइटिस में रोगी को तेज दर्द उठ सकता है। इसमें सांस की नली में संक्रमण के कारण मोटी सी दीवार बन जाती हैं जो हवा को रोक देती है। इससे फ्लू होने का भी खतरा होता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस का लक्षण:-
इस रोग के लक्षणों में सुबह उठने पर तेज खांसी के साथ बलगम का आना शुरू हो जाता है। शुरू में तो यह सामान्य ही लगता है। पर जब रोगी की सांस उखडने लगती है तो यह गंभीर हो जाती है जिसमें एम्फाइसीमम का भी खतरा हो सकता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण रोगी के चेहरे का रंग नीला हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस होने का कारण:-
ब्रोंकाइटिस रोग होने का सबसे प्रमुख कारण धूम्रपान को माना जाता है। धूम्रपान के कारण वह खुद तो रोगी होता ही है साथ जो आस-पास में व्यक्ति होते हैं उनको भी यह रोग होने का खतरा होता है।
तेज ब्रोंकाइटिस तथा पुराना ब्रोंकाइटिस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:–
जब किसी व्यक्ति को तेज ब्रोंकाइटिस रोग हो जाता है तो उसे 1-2 दिनों तक उपवास रखना चाहिए तथा फिर फलों का रस पीना चाहिए तथा इसके साथ में दिन में 2 बार एनिमा तथा छाती पर गर्म गीली पट्टी लगानी चाहिए। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
गहरी कांच की नीली बोतल का सूर्यतप्त जल 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन 6 बार सेवन करने तथा गहरी कांच की नीली बोतल के सूर्यतप्त जल में कपड़े को भिगोकर पट्टी गले पर लपेटने से तेज ब्रोंकाइटिस रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस रोग कभी-कभी बहुत जल्दी ठीक नहीं होता है लेकिन इस रोग को ठीक करने के लिए नमकीन तथा खारीय आहार का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए तथा शारीरिक शक्ति के अनुसार उचित व्यायाम करना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
पुराने ब्रोंकाइटिस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को 2-3 दिनों तक फलों के रस पर रहना चाहिए और अपने पेट को साफ करने के लिए एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके बाद सादा भोजन करना चाहिए। इस प्रकार से रोगी व्यक्ति यदि नियमित रूप से प्रतिदिन उपचार करता है तो उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के क्षारधर्मी आहार (नमकीन, खारा, तीखा तथा चरपरा) है जिनका सेवन करने से ब्रोंकाइटिस रोग ठीक हो जाता है। क्षारधर्मी आहार (नमकीन, खारा, तीखा तथा चरपरा) इस प्रकार हैं-आलू, साग-सब्जी, सूखे मेवे, चोकर समेत आटे की रोटी, खट्ठा मट्ठा और सलाद आदि।
पुराने ब्रोंकाइटिस रोग से पीड़ित रोगी को गर्म पानी पिलाकर तथा उसके सिर पर ठण्डे पानी से भीगी तौलिया रखकर उसके पैरों को गर्म पानी से धोना चाहिए। उसके बाद रोगी को उदरस्नान कराना चाहिए और उसके शरीर पर गीली चादर लपेटनी चाहिए। इसके बाद रोगी के शरीर में गर्मी लाने के लिए कम्बल ओढ़कर रोगी को पूर्ण रूप से आराम कराना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया कम से कम 2 बार करनी चाहिए।
जब इस रोग की अवस्था गंभीर हो जाए तो रोगी की छाती पर भापस्नान देना चाहिए और इसके बाद रोगी के दोनों कंधों पर कपड़े भी डालने चाहिए।
इस रोग के साथ में रोगी को सूखी खांसी हो तो उसे दिन में कई बार गर्म पानी पीना चाहिए और गरम पानी की भाप को नाक तथा मुंह द्वारा खींचना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी का यह रोग ठीक हो जाता है।
नींबू के रस को पानी में मिलाकर अधिक मात्रा में पीना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को खुली हवा में टहलना चाहिए और सप्ताह में कम से कम 2 बार एप्सम साल्टबाथ (पानी में नमक मिलाकर उस पानी से स्नान करना) लेना चाहिए। इसके फलस्वरूप पुराना ब्रोंकाइटिस रोग ठीक हो जाता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी पर मालिश करनी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर सिंकाई करनी चाहिए इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक आराम मिलता है और उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
रोगी को प्रतिदिन अपनी छाती पर गर्म पट्टी लगाने से बहुत आराम मिलता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में प्राणायाम क्रिया करनी चाहिए। इससे श्वसन-तंत्र के ऊपरी भाग को बल मिलता है और ये साफ रहते हैं। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।

ब्रोंकाइटिस रोग से पीड़ित रोगी के लिए कुछ सावधानियां:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ध्रूमपान करने से इस रोग की अवस्था और गंभीर हो सकती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को लेसदार पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इनसे बलगम बनता है।
जीर्ण जुकाम को ब्रोंकाइटिस भी कहते हैं। इस रोग के कारण रोगी की श्वास नली में जलन होने लगती है तथा कभी-कभी तेज बुखार भी हो जाता है जो 104 डिग्री तक हो जाता है। यह रोग संक्रमण के कारण होता है जो फेफड़ों में जाने वाली सांस की नली में होता है। यह पुराना ब्रोंकाइटिस और तेज ब्रोंकाइटिस 2 प्रकार का होता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को सूखी खांसी, स्वरभंग, श्वास कष्ट, छाती के बगल में दर्द, गाढ़ा-गाढ़ा कफ निकलना और गले में घर्र-घर्र करने की आवाज आती है।

Sunday, May 15, 2016

गर्मी से बचाव के उपाय How to protect against heat





मई का महीना आ गया है और सूरज अपनी प्रखर किरणों की तीव्रता से प्रकृति के जलियांश (स्नेह )को सुखा कर वायु में रूखापन और ताप बढ़ा कर मनुष्यों के शरीर के ताप की भी वृद्धि कर रहा है!
गर्मी में होने वाले आम रोग –गर्मी में लापरवाही के कारण सरीर में निर्जलीकरण (dehydration),लू लगना, चक्कर आना ,घबराहट होना ,नकसीर आना, उलटी-दस्त, sun-burn,घमोरिया जैसी कई diseases हो जाती हैं
    इन बीमारियों के होने में प्रमुख कारण- गर्मी के मोसम में खुले शरीर ,नंगे सर ,नंगे पाँव धुप में चलना , तेज गर्मी में घर से खाली पेट या प्यासा बाहर जाना,
  1. कूलर या AC से निकल कर तुरंत धुप में जाना ,
    बाहर धुप से आकर तुरंत ठंडा पानी पीना ,सीधे कूलर या AC में बेठना ,
    तेज मिर्च-मसाले,बहुत गर्म खाना ,चाय ,शराब इत्यादि का सेवन ज्यादा करना ,
    सूती और ढीले कपड़ो की जगह सिंथेटिक और कसे हुए कपडे पहनना
    इत्यादि कारण गर्मी से होने वाले रोगों को पैदा कर सकते हैं
    हम कुछ छोटी-छोटी किन्तु महत्त्वपूर्ण बातो का ध्यान रख कर ,इन सबसे बचे रह कर ,गर्मी का आनंद ले सकते हैं!
  2. उपचार से बचाव बेहतर होता है-
 वचाव के तरीके बताते हैं –

*गर्मी में सूती और हलके रंग के कपडे पहनने चाहिये
*चेहरा और सर रुमाल या साफी से ढक कर निकलना चाहिये




*प्याज का सेवन तथा जेब में प्याज रखना चाहिये
*बाजारू ठंडी चीजे नहीं बल्कि घर की बनी ठंडी चीजो का सेवन करना चाहिये
*ठंडा मतलब आम(केरी) का पना, खस,चन्दन गुलाब फालसा संतरा का सरबत ,ठंडाई सत्तू, दही की लस्सी,मट्ठा,गुलकंद का सेवन करना चाहिये
*इनके अलावा लोकी ,ककड़ी ,खीरा, तोरे,पालक,पुदीना ,नीबू ,तरबूज आदि का सेवन अधिक करना चाहिये
शीतल पानी का सेवन ,2 से 3 लीटर रोजाना
*गर्मी में सूरज अपनी प्रखर किरणों से जगत के स्नेह को पीता रहता है,इसलिए गर्मी में मधुर(मीठा) ,शीतल(ठंडा) ,द्रव (liquid)तथा इस्निग्धा खान-पान हितकर होता है!
*गर्मी में जब भी घर से निकले ,कुछ खा कर और पानी पी कर ही निकले ,खाली पेट नहीं
*गर्मी में ज्यादा भारी (garistha),बासी  भोजन नहीं करे,क्योंकि गर्मी में सरीर की जठराग्नि मंद रहती है ,इसलिए वह भारी खाना पूरी तरह पचा नहीं पाती और जरुरत से ज्यादा खाने या भारी खाना खाने से उलटी-दस्त की शिकायत हो सकती है
*अगर आप योग के जानकार हैं ,तो सीत्कारी ,शीतली तथा चन्द्र भेदन प्राणायाम एवं शवासन का अभ्यास कीजिये ये शारीर में शीतलता का संचार करते हैं

Thursday, May 12, 2016

डीटॉक्स आहार से गर्मियों मे स्वस्थ रहें




गर्मियों में तुरंत ऊर्जा चाहते हैं? तो इसके लिए आप डीटॉक्स आहार अपना सकते हैं यानी ऐसे आहार जो आपके शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में आपकी मदद करें। गर्मियों में तरबूज, खीरे और नींबू को अपने आहार में शामिल करें।
*ऑरिफ्लेम इंडिया की आहार विशेषज्ञ सोनिया नारंग ने कुछ डीटॉक्स टिप्स दिए हैं, जो हमारे शरीर की सफाई करने और हमें स्वस्थ, हल्का और तरोताजा महसूस करने में मदद करेंगे।
*तरबूज : तरबूज गर्मियों में डीटॉक्स के लिए एक बेहतरीन आहार है। तरबूज शरीर में क्षार का निर्माण करता है और इसमें उच्च मात्रा में सिट्रुलाइन (citrulline) होता है। यह आर्गिनिन (arginine) के उत्पादन में मदद करता है, जो हमारे शरीर से अमोनिया और अन्य विषैले पदार्थ को निकालने में मदद करता है। इसी के साथ तरबूज पोटैशियम का एक बेहतरीन स्रेत है, जो हमारे आहार में सोडियम की मात्रा को संतुलित करता है जो गुर्दों की मदद करता है और शरीर की भीतरी सफाई के लिए बेहतरीन है।
*खीरा : खीरे शरीर से विषैले पदार्थों को निकालने में मदद करते हैं। खीरे में मौजूद पानी की उच्च मात्रा मूत्र प्रणाली को दुरुस्त रखती है। आधा कप कटे हुए खीरे में केवल आठ कैलोरीज होती हैं।
*नींबू : नींबू यकृत के लिए बेहद फायदेमंद है। यह यूरिक ऐसिड और अन्य विषैले पदार्थों को घोलता है और यकृत की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
*भाप में पकाना : सब्जियों को भाप में पकाना एक अच्छा तरीका है क्योंकि इससे इनका पोषण नष्ट नहीं होता
*व्यायाम : शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने के लिए थोड़ा व्यायाम करें। डीटॉक्स के दौरान कैफीन और शराब से दूर रहना जरूरी है।

    Sunday, May 8, 2016

    लू से बचने के सरल उपाय Tips to avoid heat stroke




    गर्मी के मौसम में गर्म हवा और बढ़े हुए तापमान से लू लगने का खतरा बढ़ जाता है. चिलचिलाती गर्मी में लू से बचने के लिए घरेलू उपाय काफी कारगर साबित होते हैं-
    जानिए लू से बचने के घरेलू उपाय -
    *तेज धूप से आते ही और ज्यादा पसीना आने पर फौरन ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए.
    * गर्मी के दिनों में बार-बार पानी पीते रहना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो.
    *पानी में नींबू और नमक मिलाकर दिन में दो-तीन बार पीते रहने से लू लगने का खतरा कम रहता है.
    *धूप में बाहर जाते वक्त खाली पेट नहीं जाना चाहिए.



    *सब्जियों के सूप का सेवन करने से भी लू से बचा जा सकता है.
    *धूप में निकलते वक्त छाते का इस्तेमाल करना चाहिए. सिर ढक कर धूप में निकलने से भी लू से बचा जा सकता है.
    *घर से पानी या कोई ठंडा शरबत पीकर बाहर निकलें. जैसे आम पना, शिकंजी, खस का शर्बत ज्यादा फायदेमंद है.
    *गर्मी के दिनों में हल्का भोजन करना चाहिए. भोजन में दही को शामिल करना चाहिए.
    नहाने से पहले जौ के आटे को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाकर बॉडी पर लगाकर कुछ देर बाद ठंडे पानी से नहाने से लू का असर कम होता है.
    *धूप से आने के बाद थोड़ा सा प्याज का रस शहद में मिलाकर चाटने से लू लगने का खतरा कम होता है.
    *गर्मी के मौसम में खाने के बाद गुड़ खाने से भी लू लगने का डर कम होता है.




    *टमाटर की चटनी, नारियल और पेठा खाने से भी लू नही लगती.
    *लू से बचने के लिए कच्चे आम का लेप बनाकर पैरों के तलवों पर मालिश करनी चाहिए. लू लगने और ज्यादा *गर्मी में शरीर पर घमौरियां हो जाती हैं. बेसन को पानी में घोलकर घमौरियों पर लगाने से फायदा होता है.
    *लू लगने पर जौ के आटे और प्याज को पीसकर पेस्ट बनाएं और उसे शरीर पर लगाएं. जरूर राहत मिलेगी.
    *धूप में निकलने से पहले नाखून पर प्याज घिसकर लगाने से लू नहीं लगती. यही नहीं धूप में बाहर निकलते वक्‍त अगर अाप छिला हुआ प्‍याज लेकर साथ चलेंगे तो भी आपको लू नहीं लगेगी.

    Tuesday, May 3, 2016

    मखाना के फायदे Advantages of Makhana





    मखाना एक ऐसा हर्ब है जो बड़ा स्वादिष्ट इलाज है पुरुषों की सेक्स समस्याओं का |मखाने में प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेड, फैट, मिनरल और फॉस्फोरस के अलावा भी कई पौष्टिक तत्व होते हैं जो कामोत्तेजना को बढ़ाने का काम करते हैं।



    1.  मखाने की शर्करा रहित खीर बनाकर उसमें मिश्री का चूर्ण डालकर खिलाने से प्रमेह में लाभ होता है।    मखानों को घी में भूनकर खाने से दस्त में बहुत लाभ होता है।
    2. आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा की बात करें, तो पति-पत्नी के संबंधों को भी मजबूती प्रदान करता है मखाना। निजी पलों को मजबूत बनाने में कारगर है।
    3.   एक से तीन ग्राम मखानों को गर्म पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से पेशाब के रोग दूर हो जाते हैं। 
    4. मसल्स को फिट रखना है, तो मखाना खाएं। इसमें प्रोटीन होता है।
    5. तनाव रहता हो या फिर नींद कम आती हो, तो रात को सोने से पहले मखाने का सेवन करें। सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। 
    6. लंबे समय तक जवां दिखना है, तो एंटीऑक्सीडेंट़्स से भरपूर मखाने खाएं। दरअसल ये एंटी एजिंग डाइट है। कैल्शियम से भरपूर मखाना जोड़ों के दर्द में लाभकारी है। गठिया में भी इसे खाने आराम मिलता है।
    7.  मखानों को दूध में मिलाकर खाने से दाह (जलन) में आराम मिलता है।  
    8.  मखानों के सेवन से दुर्बलता मिटती है तथा शरीर पुष्ट होता है। 
    9.  कच्चे कमल बीज को पीसकर लगाने से आमवात तथा संधिवात में लाभ होता है। 
    10. . इसमें ढेर सारा एंटीऑक्‍सीडेंट होता है जिससे झुर्रियों का असर कम हो जाता है। 
    11.  इससे ब्लड प्रेशर पर भी निंयत्रण पाया जा सकता है। यह शरीर के अंग सुन्‍न होने से बचाता है तथा घुटनों और कमर में दर्द पैदा होने से रोकता है।
    12.  . प्रेगनेंट महिलाओं और प्रेगनेंसी के बाद कमजोरी महसूस करने वाली महिलाओं को मखाना खाना चाहिये। 
    13. . मखानों का सेवन करने से शरीर के किसी भी अंग में हो रही दर्द से राहत मिलती है। कमर दर्द और घुटने में हो रही दर्द से छुटकारा पाया जा सकता है।


        Thursday, April 14, 2016

        ज्यादा पसीने के सरल उपचार Simple treatment of the sweat






        गर्मी के मौसम में पसीना आना शरीर के लिए अच्छा होता है. पसीना आने से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है. लेकिन ज्यादा पसीना आना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता.

        पसीना लगातार आए तो शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह की असहजता पैदा हो सकती है। अत्यधिक पसीने से जब हाथ, पैर और बगलें (कांख) तर हो जाती हैं तो इस स्थिति को प्राइमरी या फोकल हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है। प्राइमरी हाइपरहाइड्रोसिस से 2-3 प्रतिशत आबादी प्रभावित है, लेकिन इससे पीड़ित 40 प्रतिशत से भी कम व्यक्ति ही डॉक्टरी सलाह लेते हैं। इसके ज्यादातर मामलों में किसी कारण का पता नहीं चल पाता। हो सकता है कि यह समस्या परिवार में पहले से चली आ रही हो। यदि अत्यधिक पसीने की शिकायत किसी डॉक्टरी स्थिति के कारण होती है तो इसे सेकेंडरी हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है। पसीना पूरे शरीर से भी निकल सकता है या फिर यह किसी खास स्थान से भी आ सकता है। दरअसल, हाइपरहाइड्रोसिस से पीड़ित व्यक्तियों को मौसम ठंडा रहने या उनके आराम करने के दौरान भी पसीना आ सकता है।
        गर्मियों में ज्यादा पसीना आने की वजह से लोग बेहाल हो जाते हैं. कुछ लोगों के पसीने में ज्यादा बदबू होती है जिसकी वजह से पब्लिक प्लेस और दोस्तों के बीच शर्मिंदा होना पड़ता है.
        कुछ आसान तरीकों को अपनाकर इस परेशानी से निजात पाया जा सकता है.
        * कुछ लोग ज्यादा पसीना आने के डर से कम पानी पीते हैं जिसकी वजह से पसीने में ज्यादा बदबू आती है. पसीनेकी बदबू से निजात पाने के लिए अधिक पानी पीना चाहिए.
        * पसीने वाली जगहों के लगातार गीला रहने से बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जिसकी वजह से बदबू आने लगती है. इसलिए साफ-सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए.
        * रोज दिन में एक बार टमाटर का जूस पीने से ज्यादा पसीने से राहत मिलती है.
        * पैरों के तलवों में पसीना आने पर पानी में फिटकरी पाउडर डालकर थोड़ी देर उसमें पैर डालकर बैठने से पसीना कम आता है.
        * साबुत मूंग को हल्का भूनकर उसमें एक चम्मच बिना उबला दूध मिलाकर पेस्ट बनाकर फेस पर लगाने से पसीना नहीं आता. मूंग फेस की नमी को सोखती है, जिससे पसीना निकलना बंद हो जाता है.
        * गर्मी में बाहर जाने से पहले पसीना आने वाली जगहों पर बर्फ रगड़ने से पसीना कम आता है.
        * शरीर के जिस हिस्से पर ज्यादा पसीना आता है उस पर आलू के पीस काटकर मलने से पसीना आना कम हो जाता है.
        * चेहरे पर ज्यादा पसीना आने पर खीरे के रस को चेहरे पर लगाने से पसीने से राहत मिलती है.
        * जिन लोगों को ज्यादा पसीना आता है उन्हें खाने में नमक की मात्रा कम कर देनी चाहिए.

        Thursday, April 7, 2016

        दांतों को सेहतमंद रखने के उपाय / Measures to keep teeth healthy






        दांतों की कुछ समस्याएं जो पहले 40 की उम्र के बाद सुनने को मिलती थीं, वे कम उम्र में ही सामने आ रही हैं। तमाम जागरूकता के बावजूद आज भी हम दांतों पर उतना ध्यान नहीं देते जितना जरूरी है। यही वजह है कि युवाओं में दांतों में सड़न, सूजन व दर्द के मामले बढ़ रहे हैं। आज युवाओं में दांत से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। युवा भी सांसों में बदबू, मसूढ़ो में सूजन, दांत में सड़न जैसे रोगों से जूझ रहे हैं। जबकि ऐसे शोधों की कमी नहीं, जिनके निष्कर्ष बताते हैं कि दांतों की बीमारी हमारे दिल तक को प्रभावित करती है। बदलते वक्त के साथ हमारी जीवनशैली बदली है। मगर नहीं बदला, तो दांतों की उपेक्षा करना।
        दांतों में बढ़ती सड़न





        हमारा मुंह अनेक कीटाणुओं का घर है। ये सभी कीटाणु दांत, मसूढ़े, जीभ जैसे हिस्सों पर चिपके रहते हैं। इनमें से कुछ हमारे लिए काफी फायदेमंद भी होते हैं। मगर कई हमारे लिए मुसीबतें खड़ी करते हैं। हमें नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे ही कीटाणु दांतों में सड़न की वजह बनते हैं। दांत मूल रूप से तीन परतों से बनता है- इनामेल, डेंटिन और पल्प। इनामेल ऊपरी ठोस परत है, जबकि डेंटिन मध्य का हिस्सा है और पल्प बीच का। सड़न का हमला सबसे पहले इनामेल पर होता है और फिर धीरे-धीरे वह रिसते हुए पल्प तक पहुंचता है। चिकित्सकीय परिभाषा में कहें, तो सड़न तब बढ़ती है, जब कुछ खास तरह के कीटाणु ऐसे अम्ल पैदा करते हैं, जो दांत के इनामेल और डेंटिन को नुकसान पहुंचाते हैं। और ये बैक्टीरिया कहीं बाहर से नहीं आते, बल्कि हमारी आदतों से ही पनपते हैं।
        आदतों से मजबूर हम
        अत्याधुनिक जीवनशैली ने सहूलियतें जरूर दी हैं, मगर इसने कई बुरी आदतों की सौगात भी हमें दी है। रात को देर से सोना और नींद भगाने के लिए मीठे पेय पदार्थों का सेवन बढ़ा है। कंप्यूटर पर भी काम करते वक्त टेबल पर चाय, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक के गिलास हमने रखने शुरू कर दिए हैं। ये तमाम मीठे पेय पदार्थ एसिडिक ड्रिंक हैं। यानी ये एसिड (अम्ल) पैदा करते हैं, जो दांतों के लिए नुकसानदेह है। आज किसी भी ऑफिस में वातानुकूलन की वजह से सदैव  एक नियत तापमान बना रहता है। इस वजह से हम पहले की तुलना में पानी कम पीने लगे हैं। पानी कम पीने की वजह से थूक या लार अपेक्षाकृत कम बनता है। चूंकि ये भी प्राकृतिक एंटीबायोटिक हैं, इसलिए इसकी कमी हमें कई रोगों का शिकार बनाती है।
        सड़न की एक बड़ी वजह नशे का सेवन भी है। पान, गुटका, सिगरेट, अल्कोहल की तरफ युवाओं का रुझान बढ़ा है। वे पौष्टिक भोजन से बचने लगे हैं और उनका रुझान पिज्जा, बर्गर, नूडल्स जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेड पदार्थों की तरफ बढ़ा है। ये खाद्य वस्तुएं दांतों से चिपक जाती हैं, जो सड़न की वजह बनती हैं। रही सही कसर व्यायाम से दूर रहने की मानसिकता ने पूरी कर दी है। दांत चिकित्सकों का मत है कि इन तमाम आदतों से उम्र से पहले दांतों के गिरने की समस्या बढ़ी है।





        अब दर्द नहीं देती आरसीटी-
        दांत की तकलीफ न बढ़े, इसके लिए तमाम तरह के उपाय किए जा सकते हैं। मगर यदि सड़न की वजह से दांतों के गिरने की नौबत आ रही है, तो एक ही उपाय है, आरसीटी। आरसीटी यानी रूट कैनल ट्रीटमेंट। यह एक ऐसी विधि है, जिसके जरिये दांतों से संक्रमित हो चुके प्राकृतिक पल्प को निकालकर उसकी जगह कृत्रिम पल्प लगाया जाता है  और दांतों में मौजूद नसों के संजाल की सफाई की जाती है। यह तकनीक दांतों को नया जीवन देती है। हालांकि आरसीटी किए दांत में खून का बहाव नहीं होता और वह संवेदनहीन हो जाता है। बावजूद इसके वह बखूबी अपना काम करता है। यह करीब 30-40 वर्ष पुरानी तकनीक है, जो पिछले 15 वर्षों में खूब प्रचलित हुई है। अब इसके लिए दांतों को निकालना नहीं पड़ता।
        हाल के वर्षों तक आरसीटी को दुखदायी इलाज माना जाता था। फाइल और रीमर जैसे औजार स्टेनलेस स्टील के होते थे और मैनुअल तरीके से दांतों के अंदर की नसों को साफ किया जाता था। तब इलाज के क्रम में चार-पांच बार डॉक्टरों के पास जाना जरूरी होता था। और अगर कीटाणु का प्रभाव बढ़ जाता, तो मरीज को दर्द निवारक दवाइयां और एंटीबायोटिक दिए जाते थे। यह तकनीक करीब दो दशकों तक प्रचलन में रही। साल 2000 के दशक की शुरुआत में निकल टाइटेनियम रोटरी फाइल का उपयोग शुरू हुआ। यानी जिन सुई का इस्तेमाल पहले मैनुअल तरीके से होता था, उसके लिए मशीन आ गई।  निकल टाइटेनियम अपेक्षाकृत लचीला होता है, इसलिए दांत की भीतरी जड़ों को साफ करना आसान हो गया। नतीजतन एक या दो विजिट में ही मरीजों का काम होने लगा। इससे सफलता की दर भी 65-70 फीसदी से बढ़कर 90 फीसदी तक पहुंच गई।
        नए सुधार भी हैं जारी





        हाल के वर्षों से आरसीटी में सेल्फ एडजस्टमेंट फाइल का प्रयोग हो रहा है। असल में दातों की नसें अंडाकार होती हैं और जो औजार इस्तेमाल किए जा रहे थे, वे गोल थे। कैपिंग भी दो-तीन वर्षों में विफल हो जाती थी। नई फाइल एक तरह की जाली है। नसों के तंत्र में यह खुद-ब-खुद उसी का आकार ग्रहण कर लेती है।  इस कारण अब आरसीटी के लिए सिर्फ एक ही बार डॉक्टर के पास जाने की जरूरत होती है। इसमें दर्द भी बहुत कम होता है। एंटीबायोटिक की जरूरत भी नहीं होती। दो-तीन दिन में सामान्य तरह से भोजन कर सकते हैं।
        फिलिंग है जरूरी-
        रूट कैनल के बाद फिलिंग जरूरी है, ताकि कीटाणु फिर से हमला न बोल दें। आमतौर पर इसके लिए रबड़ की तरह का मैटीरिअल, जिसे गट्टा-परचा कहा जाता है, इस्तेमाल होता है। यह थर्मोप्लास्टिक मैटीरियल होता है। पहले यह नियत आकार में आया करता था और नसों को साफ करने के बाद इसे फिट करने के लिए जगह बनानी होती थी। मगर अब मॉल्टन रबड़ की तरह का पदार्थ उपयोग में लाया जाने लगा है, जिसे जड़ से ऊपर तक भर दिया जाता है। यह उस जगह को हमेशा के लिए सील कर देता है। अब अगर आरसीटी के बाद दांतों पर उम्दा किस्म के क्राउन लगा दिए जाएं, तो दांत की आयु दस-पंद्रह वर्षों तक बढ़ जाती है।
        इलाज अपेक्षाकृत आसान होने के बावजूद बेहतर यही है कि दांतों की सड़न को शुरुआती दौर में ही रोक लिया जाए। इसके लिए कुछ आदतें हमें अपने जीवन में भी उतारनी होंगी। सबसे पहले सहीब्रश करने की  तकनीक को अपनाना चाहिए। दो दांतों के बीच की जगह को अच्छे से साफ करने के साथ ही कभी कभी  माउथ वॉश का इस्तेमाल जरूरी है। इसी तरह, रात में खाना खाने के बाद ब्रश करना चाहिए। बेहतर है कि हर भोजन के बाद ढंग से कुल्ला अवश्य करें। इससे दांतों पर चिपके भोजन साफ हो जाते हैं। जरूरत दांतों की कतार सीधी रखने की भी है। चूंकि जीभ एक तरह का कपड़ा है, जो दांतों को साफ रखता है, इसलिए यदि दांत सीधे होंगे, तो गाल व जीभ स्वाभाविक तौर पर उसकी सफाई करेंगे। अगर 13-14 वर्ष तक दांतों की कतार सीधी नहीं हुई हो, तो दांत चिकित्सक  से सलाह लें। 

        Sunday, March 20, 2016

        लोबिया फली (चवली की फली) के फायदे Benefits of Black Eye Peas










        लोबिया जिन्हे हिंदी में चवली (चवली की फली) के नाम से जाना जाता है ये एक प्रकार की फली है| ब्लैक आई पीज के नाम से जानी जानी वाली ये फलियां भारत के अधिकांश घरों में इस्तेमाल की जाती हैं|
        इनमें शानदार टेस्ट और फ्लेवर होने के साथ ही ये पोषक तत्वों से भरपूर हैं जो शरीर के लिए जरूरी हैं| 6 प्रमुख कारण जो लोबिया को टेस्ट और स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर बनाते हैं|आइये जानते हैं लोबिया को खाने से सेहत को होने वाले लाभ।

        दालें न्यूट्रीशन का प्रमुख स्त्रोत हैं. लोबिया की दाल (Lobhia Dal) में ये और भी अधिक होता है. बढ़ते बच्चों के लिये तो लोबिया की दाल (Black Eye Beans ) और भी अधिक लाभप्रद है

        लोबिया का सलाद आप खाने के समय या फिर सुबह नाश्‍ते के समय बना सकती हैं। लोबिया में बहुत सारा प्रोटीन और विटामिन होता है जो कि हर किसी के लिये फायदेमंद है। अगर आप डाइटिंग कर रहे हैं तो भी आपको ज्यादा इधर-उधर देखने की जरुरत नहीं है , लोबिया सलाद आपकी हर जरुरत को पूरा करेगा।





        एक डाईजेस्टीव के रूप में मददगार लोबिया में फाइबर और प्रोटीन की अधिकता होती है जो कि पेट पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और पाचन क्रिया में मदद करती है| फाइबर की उपस्थिति पेट से सम्बंधित बिमारियों को दूर रखती है, पेट को आराम प्रदान करती है और भोजन को बेहतर तरीके से पचाती है|

        ब्लैक आई पीज ब्लड कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करने के लिए जानी जाती हैं और कई प्रकार की दिल की बिमारियों को दूर रखती हैं| पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे फ्लेवोनॉयडस और लिग्निन (एक साइटोस्ट्रोजिन) की उपस्थिति लोबिया को हृदय से सम्बंधित बिमारियों को दूर करने में उपयोगी बनती है|

        संक्रमण से बचाव विटामिन ए जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स का खजाना होने के कारण ये फलियां कई प्रकार की बिमारियों को दूर रखती हैं| ये फलियां शरीर को स्वस्थ रखने में उपयोगी हैं क्योंकि ये शरीर से विभिन्न विषाक्त पदार्थों और हानिकारक ऑक्सीजन रहित तत्वों को बाहर करने में मदद करती हैं|

        स्वस्थ त्वचा के लिए उपयोगी स्किन को सुचारू रूप से रिपेयर करते हुए लोबिया त्वचा को हेल्दी रखती हैं| इन फलियों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट में विटामिन ए और सी की उपस्थिति होती है जो कि फ्री रेडिकल्स से स्किन को हुए नुकसान को दूर करती हैं|




        मधुमेह के रोगियों के लिए बेहतर लोबिया का ग्लायसेमिक इंडक्स अन्य सामान्य इस्तेमाल की जाने वाली फलियों और दालों के मुकाबले कम होता है| ऐसे खाद्य जिनका ग्लायसेमिक इंडक्स कम होता है, वे ब्लड शुगर को सामान्य रखते हैं इसलिए ये डाईबिटीज के पेशेंट्स के लिए अच्छा आहार है|

        वजन कम करने में मददगार इन ब्लैक आई पीज को खाने से कैलोरी कम होती है इसलिए ये वजन कम करने की दृष्टि से एक अच्छा आहार है| लोबिया डाइटरी फाइबर का एक अच्छा स्त्रोत है जिससे आपका पेट ज्यादा समय तक भरा रहता है|



        Saturday, March 19, 2016

        अनार खाने के फायदे Benefits of eating pomegranate




        एक अनार सौ बीमार.. ये मुहावरा काफी पुराना है और सही भी है। अनार एक ऎसा फल है जिससे सौ तरह की समस्याओं का समाधान हो सकता है। अनार के दाने या जूस दोनो ही फायदा करते हैं अपने टेस्ट के अनुसार कुछ भी ले सकते हैं।
        अनार के बहुत सारे स्वास्थ्य लाभ है। ये विटामिन्स का बहुत अच्छा स्त्रोत है, इसमें विटामीन ए, सी और ई के साथ-साथ फोलिक एसिड भी होता है। इसमें एंटी आक्सीडेंट, एंटी वाइरल की विशेषता पाई जाती है।
        इसको हम स्वास्थ्य का खजाना कह सकते हैं। नीचे इसके ऎसे ही चमत्कारी लाभ हम आपको बता रहे हैं।

        *चिकित्सा अध्ययनों ने ये साबित हुआ है कि अनार फेफड़ो के कैंसर को बढने से रोकता है|
        *अनार का जूस रोज़ पीने से ये शरीर में PSA के स्तर को कम करता है और कैंसर से लड़ने वाली कोशिकाओं की मदद करता है|- खून की कमी को दूर करने के लिए अनार का जूस सबसे अच्छा माना जाता है।
        *अनार का जूस कम ब्लड प्रेशर वाले लोगो के लियें बहुत फायदा करता है|
         *दिल की बीमारियों के लिए भी अनार को बहुत पौष्टिक माना जाता है।
        *अनार के छिलके को पीसकर, उससे चेहरे पर मसाज करने से डेड स्किन साफ हो जाती है. साथ ही ब्लैकहेड्स की समस्या भी दूर हो जाती है. आप चाहें तो इसे ब्राउन शुगर और हनी के साथ मिलाकर भी लगा सकते हैं.
        कैंसर से बचाव करने में भी अनार कारगर होता है।




        *जो लोग प्रोस्टेट और ब्रेस्ट कैंसर से परेशान हैं अगर वो अनार का जूस रोज़ पियें तो उनका कैंसर बढने से रुक सकता है|
        *इसके साथ ही यह हडि्डयों को मजबूत करने, ब्लड सर्कुलेशन को सही रखने, वजन कम करने में भी बहुत लाभकारी होता है।
        *अनार, त्वचा की ऊपरी परत को सुर‍क्षित करने का काम करता है. साथ ही ये कोशिकाओं के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जिससे चेहरे पर निखार आता है.
        * अनार खाने से शरीर में खून का प्रवाह ठीक तरह से होता है। इसके साथ-साथ ये हर्ट अटेक और हर्ट स्ट्रोक को भी ठीक कर देता है।
        *हाल ही में 58 लोगों पर अध्ययन किया गया जिसमें 21 से 64 वर्ष तक के लोगों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान महिला और पुरूष दोनों को ही लगातार 15 दिन तक अनार का जूस पीने के लिए कहा गया। इसमें पाया गया कि जो स्‍त्री-पुरूष रोजाना अनार का जूस पी रहे थे उनमें सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन की मात्रा बहुत बढ़ी हुई थी।
        *गर्भवती महिला को अनार का जूस पीने से उसका बच्चा स्वस्थ पैदा होता है। उसके होने वाले बच्चे को कम वजन जैसी बीमारी का सामना नहीं करना पड़ता।
        *अनार में बढ़ती उम्र के लक्षणों को कम करने का विशेष गुण होता है. हर रोज अनार का जूस पीने से चेहरे पर निखार आता है. साथ ही ये कील-मुंहासों की समस्या में भी फायदेमंद है.

         *इसका जूस अधिक उम्र के लोगो को होने वाली अलजाईमर  नामक बीमारी को रोकता है।
        *अनार का जूस धमनियों  की  रक्षा करता है! यह धमनियों  में पट्टिकाओं को बनने से रोकता है|
        *ये शरीर में बेकार केलोस्ट्रोल को कम करता है और अच्छे केलोस्ट्रोल को बढ़ाता है|
        * इसका जूस अधिक उम्र मे  झुर्रियां रोकने में मदद करता है। इसका जूस पीने से चेहरा चमकता और जवान बना रहता है और ये बुढ़ापा भी जल्दी आने नहीं देता।
        * इसका जूस पीने से शरीर की गर्मी भी कम होती है।
        *आमतौर पर लोग अपनी सेक्स क्षमता बढ़ाने के लिए वियाग्रा का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं वियाग्रा का काम अनार भी कर सकता है। हाल ही में हुए शोध में इस बात का खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं की मानें तो रोजाना अनार का जूस पीने से सेक्स क्षमता में उतना ही इजाफा होता है, जितना कि वियाग्रा दवा के सेवन से।

        Thursday, March 17, 2016

        केला खाने के फायदे Benefits of eating bananas







        केला सेहत के लिए बहुत लाभदायक है। रोज एक केला खाना तन-मन को तंदुरुस्त रखता है। केला शुगर और फाइबर का बेहतरीन स्रोत होता है। केले में थाइमिन, नियासिन और फॉलिक एसिड के रूप में विटामिन ए और बी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होता है। केले को ऊर्जा का अच्छा स्रोत माना जाता है। साथ ही इसमें पानी की मात्रा 64.3 प्रतिशत, प्रोटीन 1.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 24.7 प्रतिशत तथा चिकनाई 8.3 प्रतिशत होती है। आइए हम आपको बताते हैं कि केला खाने के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं।;


        दिल के लिए – दिल के मरीजों के लिए केला बहुत फायदेमंद होता है। हर रोज दो केले को शहद में डालकर खाने से दिल मजबूत होता है और दिल की बीमारियां नहीं होती हैं।





        नकसीर के लिए – अगर नाक से खून निकलने की समस्या है तो केले को चीनी मिले दूध के साथ एक सप्ताह तक इस्तेमाल कीजिए। नकसीर का रोग समाप्त हो जाएगा।
        वजन बढ़ाने के लिए – वजन बढ़ाने के लिए केला बहुत मददगार होता है। हर रोज केले का शेक पीने से पतले लोग मोटे हो सकते हैं। इसलिए पतले लोगों को वजन बढाने के लिए केले का सेवन करना चाहिए।

        गर्भवती के लिए –गर्भावस्था  के दौरान महिलाओं को सबसे ज्यादा विटामिन व मिनरल्स की आवश्यकता होती है। इसलिए गर्भवती को यह सलाह दी जाती है कि वह अपने आहार में केला अवश्य शामिल करें।
        बच्चों के लिए – बच्चों के विकास के लिए केला बहुत फायदेमंद होता है। केले में मिनरल और विटामिन पाया जाता है जिसका सेवन करने से बच्चों का विकास अच्छे से होता है। इसलिए बच्चों की डाइट में केले को जरूर शमिल करना चाहिए।
        * मैग्निशियम की वजह से केला जल्दी पच जाता है और मेटोबोलिस्म (उपापचय) को दुरुस्त रखता है, कोलेस्ट्रोल कम करता है|
        * केला ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखता है |
        * केले में आसानी से रक्त में मिलने वाला आयरन तत्व होता है, केला खाने से खून में हीमोग्लोबिन बढ़ता है इसलिए एनीमिया (रक्ताल्पता) के रोगियों को केला अवश्य खाना चाहिए|












        * दुनिया में केले की 300 से भी ज्यादा किस्मे है, केले की लम्बाई 4 इंच से 15 इंच तक पाई जाती है.|

        *ज्यादा केला खाने से अपच हो गयी होतो इलायची खाएं, आराम मिलेगा|

        * केले पर पड़ने वाले भूरे दाग का मतलब होता है कि केले का स्टार्च पूर्णतः प्राकृतिक शर्करा में बदल चुका है, ऐसा केला आसानी से पचता है|

        * केला पोषक तत्वों का खजाना है, केले में थाईमिन, रिबोफ्लेविन, नियासिन, फोलिक एसिड, विटामिन A, B, B6, आयरन, कैल्शियम, मैगनिशियम, पोटैशियम जैसे तत्व पाए जाते हैं|

        *केले का प्रोबायोटिक बैक्टीरिया पाचन भी ठीक करता है, डायरिया में ये खास फायदेमंद है, केले में पाए जाने वाला पेसटिन तत्व कब्ज को दूर रखता है|

        * अपनी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए केला का सेवन अवश्य करें, इसमें पाए जाने वाला कैरोटिनॉएड एंटीओक्सिडेंट रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है और आपको संक्रमण से बचाता है|
        * केला मधुर, पाचक, वीर्यवर्धक, मांस की वृद्धि करने वाला, भूख-प्यास शांत करने वाला होता है|
        * हड्डी मजबूत बनाना होतो केला प्रतिदिन खाइए ,केले में खास प्रोबायोटिक बैक्टीरिया होता है जिसका कार्य होता है आपके खाने से कैल्शियम को सोखना और हड्डियों को मजबूत करना|
        *. केला में पोटैशियम भरपूर पाया जाता है जोकि रक्त-संचार ठीक रखता है जिससे ब्लड-प्रेशर ठीक रहता है|
        * परीक्षा से पहले केला खाना अच्छा होता है क्योंकि इसमें पाए जाने वाला पोटैशियम दिमाग को चुस्त और अलर्ट रखता है|
        * बच्चों को केला अवश्य खिलाएं क्योंकि यह पोषक तत्वों ,विटामिन ,खनिज तत्वों का खजाना है जिसकी बढ़ते बच्चों को खास आवश्यकता होती है |
        * बवासीर के उपचार के लिए केले के बीच में चीरा लगा के एक चने के बराबर देसी कपूर रख कर केला खा लें, लाभ होगा|
        * खाने के बाद प्रतिदिन केला खाने से मांसपेशियां मजबूत होती है, पाचन सुगम होता है.
        *मुलायम, चमकदार बाल चाहियें हो तो केला में अवोकेडो या कोको पाउडर, नारियल का दूध मिलाकर बालों में 15 मिनट लगे रहने दें|
        *केला शरीर में हर प्रकार की सूजन को दूर करता है|
        * जले हुए स्थान पर केला मसल कर लगायें, जलन शांत होगी|
        * ड्राई आँखों की समस्या में केले का सेवन अवश्य करें, यह सोडियम का स्तर सामान्य करता है और कोशिकाओं में द्रव प्रवाहित करता है|
        *चोट से खून बहना न रुके तो केले के डंठल का रस लगायें|
        *पित्त शांत करने के लिए पका केला देशी घी के साथ खाएं|
        * केला पेट के अल्सर के लिए बहुत राहत देता है, यह पेट में मोटी रक्षक म्युकस लेयर बनाता है जोकि घाव को ठीक करने में सहायक होती है,|साथ ही प्रोटीज तत्व पेट में पाए जाने वाले अल्सरकारक बैक्टीरिया से मुक्ति दिलाता है|





        *. 2 केला दही के साथ खाने से पेचिश, दस्त में आराम मिलता है.
        * शारीरिक श्रम करने वालो को केला सेवन मांशपेशियों की जकड़न से बचाता है.
        * केला किडनी के कैंसर से रक्षा करता है.
        *रूखी त्वचा के लिए पका केला मसल कर चेहरे पर लगायें, 20-25 मिनट लगे रखने दें फिर हलके गर्म पानी से धो लें, चेहरा मुलायम, स्निग्ध हो जायेगा.
        *फटी एड़ियों के उपचार के लिए केले का गूदा एड़ियों पर 10 मिनट लगे रखने दें फिर धो लें.
        *कील, मुहांसों की समस्या से निजात पाने के लिए एक केला को मसल कर, शहद, नींबू रस मिलाकर चेहरे पर लगायें, लाभ होगा. 34. मुंह में छाले के उपचार के लिए गाय के दूध की दही के साथ केला सेवन करें.
        * कच्चा केला मसल कर उसमे दूध मिलाकर चेहरे पर लगायें, चंमक और निखार आयेगा.
        *. केला विटामिन B6 का एक बढ़िया स्रोत है जोकि नर्वस सिस्टम को सबल बनाता है, इसके अतिरिक्त याददाश्त और दिमाग तेज करता है.
        * केला एसिडिटी दूर करता है और पाचन प्रक्रिया ठीक रखता है.
        का स्तर बढ़ा कर आपको शक्ति देगा
        *केला जठराग्नि बढाता है साथ ही आमाशय, आंतो की सूजन दूर करने में भी केला लाभप्रद माना जाता है.
        *शराब ज्यादा पीने की वजह से हुए हैंगओवर को ठीक करने के लिए केला-शेक पियें.
        * दिल को मजबूत रखना होतो, 2 केला शहद मिला कर खाएं.
        * वजन बढ़ाने के लिए केला खास असरकारक होता है इसलिए केला ,दूध ,शहद और चुटकी भर इलायची पाउडर मिलाकर प्रतिदिन सुबह केला-शेक पियें या केला खाकर ऊपर से दूध पियें.