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Aug 29, 2015

दांतों का पीलापन : सरल उपचार

      खाने की कुछ चीजों के लगातार उपयोग, बढ़ती उम्र या अधिक दवाइयों का सेवन दांतों के पीलेपन के कारण हो सकते हैं। यदि आपके साथ भी यह समस्या है तो दांतो को सफेद बनाने के लिए  निम्न उपाय  लाभदायक  साबित होंगे -

तुलसी:- तुलसी में दांतों का पीलापन दूर करने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है। साथ ही, तुलसी मुंह और दांत के रोगों से भी बचाती है। तुलसी के पत्तों को धूप में सुखा लें। इसके पाउडर को टूथपेस्ट में मिलाकर ब्रश करने से दांत चमकने लगते हैं।

नमक:- नमक दांतों को साफ करने का सदियों पुराना नुस्खा है। नमक में थोड़ा सा चारकोल मिलाकर दांत साफ करने से पीलापन दूर हो जाता है और दांत चमकने लगते हैं।

संतरे के छिलके:- संतरे के छिलके और तुलसी के पत्तों को सुखाकर पाउडर बना लें। ब्रश करने के बाद इस पाउडर से दांतों पर हल्के से रोजाना मसाज करें। संतरे में मौजूद विटामिन सी और कैल्शियम के कारण दांत मोती जैसे चमकने लगते हैं।

गाजर:- रोजाना गाजर खाने से भी दांतो का पीलापन कम हो जाता है। दरअसल, भोजन करने के बाद गाजर खाने से इसमें मौजूद रेशे दांतों की अच्छे से सफाई कर देते हैं।

नीम:- नीम का उपयोग प्राचीनकाल से ही दांत साफ करने के लिए किया जाता रहा है। नीम में दांतों को सफेद बनाने व वैक्टीरिया को खत्म करने के गुण पाए जाते हैं। यह नेचुरल एंटीबैक्टिीरियल और एंटीसेप्टिक है। रोजाना नीम की दातून से मुंह धोने पर दांतों के रोग नहीं होते हैं।

बेकिंग सोडा:- बेकिंग सोडा पीले दांतों को सफेद बनाने का सबसे अच्छा घरेलू तरीका है। ब्रश करने के बाद थोड़ा सा बेकिंग सोडा लेकर दांतों को साफ करें। इससे दांतों पर जमी पीली पर्त धीरे-धीरे साफ हो जाती है। बेकिंग सोडा और थोड़ा नमक टूथपेस्ट में मिलाकर ब्रश करने से भी दांत साफ हो जाते हैं।

नींबू:- नींबू एक ऐसा फल है जो मुंह की लार में वृद्धि करता है। इसलिए यह दांतों और मसूड़ों की सेहत के लिए फायदेमंद होता है। एक नींबू का रस निकालकर उसमें उतनी ही मात्रा में पानी मिला लें। खाने के बाद इस पानी से कुल्ला करें। इस नुस्खे को अपनाने से दांत सफेद हो जाते हैं और सांसों की दुर्गंध भी दूर हो जाती है।


केला:- केला पीस लें, इसके पेस्ट से दांतों को रोज 1 मिनट तक मसाज करें। उसके बाद दांतों को ब्रश करें। रोजाना ये उपाय करने से धीरे-धीरे दांतों का पीलापन खत्म हो जाएगा।

विनेगर:- एक चम्मच जैतून के तेल में एप्पल विनेगर मिला लें। इस मिश्रण में अपना टूथब्रश डुबाएं और दांतों पर हल्के-हल्के घुमाएं। ये प्रक्रिया तब तक दोहराएं, जब तक मिश्रण खत्म न हो जाएं। इस नुस्खे को अपनाने से दांतों का पीलापन मिट जाता है। साथ ही, सांसों की दुर्गंध की समस्या भी नहीं रहती है।

Jul 25, 2015

बरसात मे नेत्र रोगों से रहें सतर्क :





     मानसून के सीजन में आखों की विशेष देखभाल जरूरी होती है। तरह-तरह के आंखों के संक्रमण इसी मौसम में पनपते है। बच्चें एवं स्कूल कॉलेज जाने वाले छात्रों को विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें ही संक्रमण अधिक फैलता है। मध्य अगस्त से सितम्बर तक की गर्मी में काफी उमस एवं धूप तीखी होती है।   वर्षा एवं गर्मी का मिला-जुला मौसम रहता है। जिसके कारण मानव शरीर का सबसे संवेदनशील अंग आंख बाहरी वातावरण के उतार चढ़ाव झेलती है। इस प्रदूषण भरे वातावरण एवं भागदौड़ की जिंदगी में लोगों द्वारा आंखों की देखभाल के प्रति लापरवाही बरती जाती है।  जिस समस्या से व्यक्ति सबसे अधिक प्रभावित होता है वह कन्जकटीवाईटिस का इंफेक्शन है। जिसे नेत्र फ्लू भी कहा जाता है। इससे प्रभावित व्यक्तियों को हर समय यही लगता रहता है कि उसकी आंख में रेत जैसा कुछ गड़ रहा है। 

       इस मौसम में थोड़ी सी लापरवाही आंखों को काफी नुकसान पहुंचा सकती है।  कन्जकटीवाईटिस के अलावा भी बरसात में और कई तरह के इंफेक्शन होते है। बरसात में होने वाले सामान्य इंफेक्शन इस प्रकार से है:- 

    आंखों का सफेद भाग एवं पलक का अन्दरूनी भाग कन्जकटीवा कहलाता है। आंख के इस भाग में जलन, लाली और सूजन होने को कन्जकटीवाईटिस या नेत्रशोथ कहते है। इसके मुख्य कारण हैं इन्फेक्शन और एलर्जी, इस मौसम में आने वाले वायरल बुखार जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देते है उसकी वजह से भी नेत्रशोथ हो जाता है। इस मौसम में सबसे ज्यादा फैलने वाली आम बीमारी यही है। कन्जकटीवाईटिस का संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है। आंखों को सबसे अधिक कन्जकटीवाईटिस से ही बचाने की जरूरत होती है। स्टाई पलकों के आसपास लाली लिए हुए आई सूजन को कहते है। इसमें पस बन जाता है और पस के पूरी तरह साफ  होने पर ही ठीक होती है। इसके होने का मुख्य कारण बिना धूले हाथों से आंखों को रगडऩा एवं बैक्ट्रीरिया है। ये बीमारी भी इस मौसम में होना एक आम बात है।

      आंखों में किर-किराहट व जलन होने लगती है। ऐसा लगता है कि उनमें कुछ गिर गया हो। रोगी को काफी तकलीफ  होती है। आंखों को धूप तथा तेज रोशनी चुभती है। जिससे आंखों को पूरी तरह खोलने से रोगी हिचकता है। आंखों में थकान तथा दर्द भी महसूस होता है। कभी-कभी आंखों की पुतलियों पर दाने पड़ जाते हैं। उपयुक्त उपचार न होने की स्थिति में दूसरे बैक्ट्रीरिया भी आंखों को प्रभावित कर देते हैं। जिससे सफेद गाढ़ा पदार्थ आंखों के कोने तथा पलकों के किनारों पर एकत्र हो जाता है। यह कीचड़ इतना हो सकता है कि जब सुबह व्यक्ति उठता है उसकी दोनों पलकें चिपकी होती है।


     इन सभी समस्याओं के बावजूद बरसात में अगर कुछ बातों का ख्याल रखा जाए तो आप और हम इस इंफेक्शन से बचाव कर सकते है। आपको उपर्युक्त में से यदि कोई लक्षण खुद में या आस-पास किसी में नजर आते है तो इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:- 

     कंजक्टिवाइटिस होने पर चिकित्सक की सलाह जरूर लें। आखों को दिन में तीन से चार बार धोएं। घरेलू उपचार भी आँखों के रोगों  मे  काफी कारगर साबित  होते हैं| समय पर  रोग का इलाज नहीं किया गया तो कार्निया में जख्म हो सकता है जो बेहद नुकसानदेह  साबित हो सकता है। कंजक्टिवाइटिस संक्रामक बीमारी है। यानी सम्पर्क में आने पर यह एक व्यक्ति से दूसरे में फैलती है।  घर के बाहर निकलने से पहले धूप का चश्मा लगाएं। यह न सिर्फ  धूप से बचाता है बल्कि धुंए और गंदगी से होने वाली एलर्जी से भी रक्षा करता है। आंखों को तेज रोशनी से होने वाली परेशानी से बचाने के लिए कोशिश करे कि आंखों पर गहरे रंग का शीशें वाला धूप का चश्मा पहनें। आई फ्लू होने पर चश्में का प्रयोग करें। तीन-चार दिन रोगी को आराम करना चाहिए धूप में बाहर न निकलें।

मानसून के दौरान, कन्जकटीवाईटिस और स्टाई आखों की इंप्रेक्शन से लोग अधिक पीडि़त हो रहे हैं। इसका इंफेक्शन रोजाना के सामानों के इस्तेमाल से आसानी से फैलता है जैसे तौलिया, रूमाल, लैंसिस, चश्मा और अन्य सामान जो एक हाथ से दूसरे हाथ जाते है। 

    इन इंफेक्शन वाली चींजों से दूर ही रहें। साथ ही साफ -सफाई का ध्यान रखें। इसके लिए आपको निश्चित रूप के तय करना होगा कि परिवार में जो व्यक्ति संक्रमित है, उसका सामान अलग रखें। आंखों को साफ  करने के लिए साफ  तौलिया या रुमाल का इस्तेमाल करें व अपना तौलिया रूमाल एवं साबुन आदि किसी के साथ शेयर न करें। किसी भी संक्रमक चीज को छूने के बाद जैसे(फोन, टीवी रिमोट, दरवाजे इत्यादि)छूने पर हाथ धोकर ही खाना खाएं।

     आंखों में दवा डालने के पहले और बाद में हाथों को अच्छी तरह धो लें। बार-बार अपनी आखों को हाथ से न छुएं। आंखों को हमेशा साफ  और ठंडे पानी से धोएं। आंखों को हाथ से नहीं रगडऩा चाहिए। बिना धुले हाथों से आंखों को ना छूएं।

     कम रोशनी में पढ़ाई न करें। आंख में कुछ गिर जाने पर उसे मले नहीं। उसे साफ  पानी से धुलें। आराम न मिले तो तुरंत चिकित्सक की सलाह लें।

उपचार-

    रोग की प्रारंभिक व्यवस्था आरंभ होते ही तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ की राय लें। बिना डॉक्टरी सलाह लिए कोई दवा न लें। साथ ही मेडिकल स्टोर से स्टेरायड वाली दवा न लें। आंखों का तेज रोशनी से बचाव करें। आंखों को तेज रोशनी से होने वाली परेशानी से बचने के लिए आंखों पर गहरे रंग का शीशे वाला धूप का चश्मा पहनना चाहिए। आंखों को पट्टी बांधकर बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे आखों से निकलने वाले पानी की स्वतंत्र निकासी रूक जाती है तथा पट्टी बांधने से हुई गर्मी आंख में इन्फेक्शन को और बढ़ावा देती है। 

     इस रोग की चिकित्सा केवल दो बातों पर निर्भर करती है, पहली किसी उचित विसंक्रामक द्रव से आंखों की बार-बार सफाई एवं दूसरी आंखों में सेकेन्डरी इंफेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग करें। इसका प्रमुख कारण आंखों से निकलने वाले हानि कारक पदार्थों को ठीक करना होता है।  इस तरह आंखों को तब तक धुलना चाहिए जब तक कि आंखों से निकलने वाला पदार्थ कीचड़ पूरी तरह से साफ  न हो जाए। यदि फिर भी परेशानी संभल ना रही हो तो तुंरत किसी नेत्र विशेषज्ञ के पास जाएं और इलाज करवाएं चूंकि थोड़ी सी भी देरी हमेशा के लिए आपको नेत्रहीन कर सकती है।

Jul 9, 2015

त्वचा के रोग : सरल उपचार ; Skin Disease: Simple Remedies






मुहासे के लिए -

**खाने का सोडा (सोडा बाई कार्ब ) लें  और पानी  की थोंड़ी  सी  मात्रा मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाएँ|  दवा तैयार है | मुहासे पर लगाएँ| समय 20 मिनिट |  गुनगुने पानी से धोलें|





 **ककड़ी का रस  और टमाटर  का गुदा  अच्छी तरह मिक्स करें  | इसे मुहासे पर लगाएँ| समय 15 मिनिट | बाद मे पानी से साफ कर लें|  इससे न केवल  मुहासे ठीक होंगे ,चेहरे की चमक भी बढ़ेगी| 


**नीम के पत्ते डाल कर उबाले गए पानी से स्नान करने से चर्म रोग मिटते है.


 **नीम की पत्तियों को पीसकर हाथ पेरों पर लेप करने से जलन शांत होती है|


 **गर्मी की घमौरियों पर बर्फ का टुकड़ा मलने से घमौरियां मुरझा जाती है और राहत मिलती है|.


चर्म रोगों में फिटकरी बड़ी गुणकारी होती है. जिस स्थान पर चर्म रोग हुआ हो उस स्थान को बार -बार फिटकरी के पानी से धोने से लाभ होता है


 **दाद, खाज, फुंसी, फोड़े इत्यादि चर्म रोगों में ताजे संतरे के छिलके पीस कर लगाने से लाभ होता है.


 **रोज सुबह 20 ग्राम शहद ठंडे पानी में मिलाकर चार पांच महीने तक पीने से त्वचा सम्बन्धी रोग दूर होते है.


**हाथ पाँव में जलन की शिकायत होने पर सौंफ के साथ बराबर मात्रा में धनिया व मिश्री मिलाकर पीस कर छान ले. खाना खाने के बाद 5-6 ग्राम की मात्रा में यह चूर्ण लेने से राहत मिलती है.|


 **बादाम का तेल चहरे पर विशेषकर आँखों के आस पास मलने से झुर्रियां नहीं पड़ती.|


 **गर्मी के दिनों में नींबू का शरबत पीये. इससे खून साफ़ होता है और ठंडक भी मिलती है.|


 **सौंफ रक्त को शुद्ध करने वाला एवं चर्म रोग नाशक है. प्रतिदिन 10 ग्राम सौंफ बिना मीठा मिलाये वैसे ही चबा -चबा कर नियमित कुछ दिनों तक खाने से रक्त शुद्ध होता है और त्वचा का रंग साफ़ होता है.|


**त्वचा रोगों मे बादाम बहुत  काम की चीज है| 5 बादाम  रात को पानी  मे भिगोकर  रखें सुबह छिलका उतारें  थौड़े  से गुलाब जल मे पीसकर  पेस्ट  बनाएं| रुग्ण त्वचा पर लगाएँ | फायदा होगा|


**शकर ,बादाम का तेल और नींबू का रस मिलाएँ | इसे चेहरे पर मालिश करें | समय 10 मिनिट | गुब गुबे जल से धोलें| मुहासे दूर होंगे |


**लहसुन मुहासे दूर करने मे उपयोगी है| चेहरा धोकर भली प्रकार साफ कर पोंछ कर सूखा लें | अब लहसुन या इसके रस को मुहासे पर लगाकर उंगली से रगड़ें| चेहरे पर 15 मिनिट लगा रहने दें फिर गुन गुने पानी से साफ कर लें| दिन मे तीन मर्तबा प्रयोग करना है| एक माह मे परिणाम आएंगे |


**नींबू का रस रुई के फाये से मुहासे पर लगाएँ कुछ देर लगा रहबे के बाद ठंडे जल से साफ कर लें,| दिन मे तीन बार प्रयोग करें| अच्छे परिणाम की आशा की जा सकती है|



* चमेली के फूलों को पीसकर चहेरे पर लेप करने से 2 - 3 माह में झांइयां व मुंहासे दूर हो जाते हैं !

* हल्दी व एक चुटकी नमक दूध में मिला सोते समय चेहरे पर लगाएं और सुबह गुनगुने पानी से मुंह धो लें !


कुछ दिनों तक लगातार ऐसा करने से चेहरे पर निखार आता है !


* बेसन में दही मिलाकर चेहरे पर लगा सूखने पर पानी से धो लें - चेहरे के दाग व झुर्रियां दूर होती हैं !


* दाग मिटाने के लिए नीम की ताजी पत्तियों को पीसकर रात के समय चेहरे पर लगाएं व सुबह सामान्य पानी से धो लें !


* गाजर - टमाटर - संतरे और चुकंदर का 25 - 25 ग्राम रस दो - तीन माह तक रोजाना पीने से चेहरे के दाग - धब्बे ~ मुंहासे व कालापन दूर होता है !


* शतावरी की जड़ को पीस पानी में मिलाएं व इस पानी से सिर धोने से बाल लंबे होते हैं !


* 50 ग्राम मुल्तानी मिट्टी व 50 ग्राम आंवला चूर्ण को 10 ग्राम दही में मिला बालों पर लगाएं और एक घंटे बाद धो लें - इससे बाल काले व चमकदार होते हैं !


* आंखों के नीचे का कालापन दूर करने के लिए आलू के रस से सुबह - शाम मसाज करें !


* आलू - टमाटर और नींबू का रस मिला आंखों के नीचे हल्की मालिश करें - इससे भी कालापन दूर होगा !








Jul 1, 2015

मेथी के स्वास्थ्यकारी लाभ :health benefits of fenugrik seeds





     मेथी  सेहत के लिहाज से बहुत गुणकारी है। मेथी में भरपूर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन सी, नैसिन, पौटेशियम, आयरन और अल्कालाड्यस होता है। इसमें डाइसोजेनिन भी होता है जो ऑस्ट्रियोजेन जैसे गुणों से भरपूर होता है। मेथी में कई स्वास्थ्यवर्धक गुण होते है जो कई शारीरिक समस्याओं को दूर भगा देते है। मेथी के दाने बालों की जड़ों को मजबूत करते हैं और उसे पुनर्जीवित भी करते हैं। इसमें प्रोटीन होता है, इसलिए मेथी दानों को अपनी डाइट में शामिल करने से आपके बाल खूबसूरत बनेंगे।
मेथी के दानों में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है। खाली पेट मेथी दानों को चबाने से एक्सट्रा कैलरी बर्न होती है। सुबह दो गिलास मेथी का पानी पीने से मोटापा दूर होता है। मेथी का पानी बनाने क लिए एक बड़ा चम्मच मेथी के दानों को दो गिलास पानी में रातभर भिगो दें और सुबह इसे छानकर पी लें। मेथी के सेवन से किडनी भी स्वस्थ होती है। पथरी के इलाज में भी मेथी फायदा करती है। इस जादुई औषधि से पथरी पेशाब के साथ शरीर से बाहर निकल जाती है।

मेथी के दानों के सेवन से पेट दर्द और जलन दूर होती है। साथ ही पाचन क्रिया भी दुरुस्त होती है। मेथी दाने में फॉस्फेट, लेसिथिन और न्यूक्लिओ अलब्यूमिन होने से यह पोषक होती है। इसमें फोलिक एसिड, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक, कॉपर आदि भी मिलते हैं जो शरीर के लिए बेहद जरूरी हैं। पेट ठीक रहे तो स्वास्थ्य भी ठीक रहता है और खूबसूरती भी बनी रहती है। मेथी पेट के लिए काफी अच्छी होती है।




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Jun 23, 2015

गर्मी में दही का उपयोग सेहत के लिए उपकारी Use yogurt in Summer to promote health





    दूध से जमनेवाला दही एक रुचिकर और सेहतमंद माध्यम है। दही में अच्छी किस्म के बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो शरीर को कई तरह से लाभ मिलता है। आयुर्वेद के मुताबिक गर्मियों में दूध के मुकाबले दही खाने के फायदे बहुत अधिक होते हैं। रोजाना एक कटोरी दही न सिर्फ बीमारियों को दूर रखता है बल्कि शरीर स्वस्थ बनाता है। दूध में मिलने वाला फैट और चिकनाई शरीर को एक उम्र के बाद नुकसान पहुंचाता है। इस के मुकाबले दही से मिलने वाला फास्फोरस और विटामिन डी शरीर के लाभकारी होता है। दही में कैल्सियम को एसिड के रूप में समा लेने की भी खूबी होती है। रोज दही दूध के मुकाबले दही खाना सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद है। दूध में मिलने वाला फैट और चिकनाई शरीर को एक उम्र के बाद नुकसान पहुंचाता है। इस के मुकाबले दही से मिलने वाला फास्फोरस और विटामिन डी शरीर के लाभकारी होता है। 

      गर्मी के मौसम में दही की छाछ या लस्सी बनाकर पीने से पेट की गर्मी शांत हो जाती है। इसे पीकर बाहर निकलें तो लू लगने का डर भी नहीं रहता है। दही को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिसके कारण यह दूध की अपेक्षा जल्दी पच जाता है। जिन लोगों को पेट की परेशानियां जैसे- अपच, कब्ज, गैस बीमारियां घेरे रहती हैं, उनके लिए दही या उससे बनी लस्सी,मट्ठा, छाछ का उपयोग करने से आंतों की गरमी दूर हो जाती है। पाचन अच्छी तरह से होने लगता है और भूख खुलकर लगती है।


 

     दही के नियमित सेवन से आंतों के रोग और पेट की बीमारियां नहीं होती हैं तथा कई प्रकार के विटामिन बनने लगते हैं। दही में जो बैक्टीरिया होते हैं, वे लेक्टेज बैक्टीरिया उत्पन्न करते हैं। दही में हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की अद्भुत क्षमता है। यह हमारे रक्त में बनने वाले कोलेस्ट्रोल नामक घातक पदार्थ को बढऩे से रोकता है, जिससे वह नसों में जमकर ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित न करे और हार्टबीट सही बनी रहे। दही में कैल्शियम की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो हमारे शरीर में हड्डियों का विकास करती है। दांतों एवं नाखूनों की मजबूती एवं मांसपेशियों के सही ढंग से काम करने में भी सहायक है।

May 13, 2015

गर्मी के मौसम में बच्चों का ऐसे रखें ख़याल

      ज्यादा देर  तक घर से बाहर रहने  की अनुमति न दें|  गर्मी के दुष्प्रभाव से बचने की  कुछ सावधानियां   नीचे  लिखी जाती है|







  बाहर ज्यादा डॉ तक रहकर आने पर बच्चे  कूलर  या पंखे से गर्मी शांत करने और पसीना सुखाने  का प्रयास करते हैं|  उन्हें ऐसा करने से मना करें| यह  स्वास्थ्य  के लिए अच्छा नहीं है|  उन्हें कपड़े बदलने के लिए कहना चाहिए|  बच्चों को बताएं कि गर्मी में शरीर को पानी की जरूरत ज्यादा होती है\ इसलिए जब भी प्यास लगे ज्यादा मात्रा में पानी पियें|  

  जब बच्चों को बाहर जाना पड़े  तो उनकी त्वचा की देख-भाल के लिए उन्हें काटन ग्लोव्स ही पहनाएं ,और धुप के दुष्प्रभाव से बचाने  के लिए   सन स्क्रीन  लोशन  का इस्तेमाल करें| | 


  बच्चों को हमेशा घर का बना खाना खिलाएं  और बाजार की वस्तुएँ  खाने से  मना करें| जंक फ़ूड  बच्चों के लिए ठीक नहीं होता है|  गर्मी के मौसम में बच्चों को डॉ बार नहलाएं ताकि पसीने  से होने वाले  त्वचा के नुकसान  से बचाया जा सके\ 

Apr 13, 2015

रक्त शोधक कुदरती भोजन पदार्थ : Blood purifier natural foods





         रक्त हमारे शरीर का अत्यधिक महत्व पूर्ण  हिस्सा है | यह शरीर के विभिन्न अंगों को पौषक तत्व तथा  आक्सीजन  पहुंचाने जैसे  कार्य करता है|शरीर की कोशिकाओं से अपशिष्ट  पदार्थ और कार्बन डाई आक्साईड  बाहर निकालने का काम करता है| यहाँ मैं  कुछ भोजन पदार्थों का उल्लेख करूँगा  जो  रक्त प्रवाह  से जहरीले और केंसर  युक्त सेल्स  को समाप्त कर रक्त की शुद्धि  करते हैं|





 हरी पत्तेदार  सब्जिया-  हरी सब्जियां  पौषक तत्वों से  परिपूर्ण होती हैं | स्वास्थ्य  की  दृष्टि से सब्जियों के अनगिनत लाभ हैं| सब्जियां रक्त साफ़ करने  में मददगार होती हैं|  ब्रोकली ,बंद गोभी और पालक  में पर्याप्त  केंसर रोधी  तत्व मौजूद  होते हैं| इनमें एंटी आक्सीडेंट  तत्व भी  भरपूर होते हैं| सब्जियां लीवर  को सहयोग कर रक्त के जहरीले तत्वों को  नष्ट  करती हैं| 

   रसदार फल - संतरा,तरबूज,सेवफल,अनार,पाईनेपल ,अंगूर  प्रमुख  रक्त शोधक  फल हैं| इन फलों में  प्रचुर केंसर  रोधी  और एन्टी आक्सीडेंट  तत्व  होते हैं  जो खून में उपस्थित फ्री रेडिकल्स  को नष्ट करते हैं|  इन फलों के जूस  से भी शरीर लाभान्वित होता है|  इन फलों का नियमित रूप से थोड़ी मात्रा में उपयोग करना  हितकारी है| अनार और अंगूर का रस  नाश्ते के वक्त पीना उत्तम है|




लहसुन और प्याज- वैसे तो लहसुन कुदरती  एंटी बायोटिक  है  लेकिन साथ  ही यह प्रभाव शाली रक्त शोधक भी है| भोजन में लहसुन  का प्रयोग करने से  खून की वसा  कम होती है  जिससे खून  के  खराब कोलेस्ट्रोल  का लेविल  नीचे आता है|| लहसुन में  उपस्थित फायटो केमिकल्स  लीवर की मदद  करते हुए रक्त शोधन का  कार्य सम्पादित करते हैं|  लहसुन और प्याज को भोजन  का अंग बनाना  चाहिए| लहसुन की कुछ कुली  चबाकर  भी खा सकते हैं|
   चाय  में अदरक और पुदीने का  व्यवहार  करने से  रक्त शोधन का कार्य  संपन्न होता है| खून के विषैले  तत्वों को बाहर निकालने  में सहायक है|| चुकंदर,गाजर और निम्बू भी  उत्तम कोटि  के रक्त शोधक माने गए हैं|

   रोज सुबह एक चम्मच हल्दी   पानी के साथ लेने से खून साफ़ होता है|


Feb 24, 2015

अंकुरित आहार से रखें सेहत का ख़याल ::health benifits of sprouts.





   शरीर को स्वस्थ  बनाए रखने  में  अंकुरित अनाज यानी स्प्राउट्स  बेहद महत्त्व पूर्ण है|   अगर आप रोजाना अंकुरित सलाद को अलग-अलग तरीके से लें, तो इससे आपकी सेहत बनी रहती है। अनाज, दाल या बीज को अंकुरित कर के खाने से उसकी पौष्टिकता कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए आहार विशेषज्ञ नाश्ते में स्प्राउट्स खाने की सलाह भी देते हैं। 



विटामिन्स का भंडार-

                    

विटामिन ए, सी, बी-6 और ‘के’ के साथ-साथ इसमें कई तरह के मिनरल्स जैसे मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम, मैंगनीज और पोटैशियम भी होते हैं। 

एंटी-ऑक्सीडेंट्स-

अंकुरित अनाजों में एंटी-ऑक्सीडेंट्स भी होते हैं।
इसलिए इसके सेवन से ना सिर्फ झुर्रियां दूर रहती हैं, बल्कि त्वचा पर नेचुरल ग्लो भी आता है। इसके अलावा स्प्राउट्स में डाइटरी फाइबर, प्रोटीन आयरन,,ओमेगा-3 फैटी एसिड जैसे पौष्टिक तत्‍व भी होते हैं। इस कारण यह शाकाहारी लोगों के लिए सबसे अच्छा विकल्प भी है.


हाजमा ठीक रखता है-
यह हाजमे के लिए जरूरी एन्जाइम का अच्छा स्रोत भी है।  कैलोरी की मात्रा कम होने के कारण यह वजन कम करने वाले लोगों के लिए अच्छा विकल्प है। 






  • अंकुरित आहार शरीर को नवजीवन देने वाला अमृतमय आहार कहा गया है।




  • अंकुरित भोजन क्लोरोफिल, विटामिन (`ए´, `बी´, `सी´, `डी´ और `के´) कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, मैगनीशियम, आयरन, जैसे खनिजों का अच्छा स्रोत होता है।

  • अंकुरीकरण की प्रक्रिया में अनाज/दालों में पाए जाने वाले कार्बोहाइट्रेड व प्रोटीन और अधिक सुपाच्य हो जाते हैं।
  • अंकुरित दानों का सेवन केवल सुबह नाश्ते के समय ही करना चाहिये।





अंकुरित आहार को अमृत आहार   कहा गया है \अंकुरित आहार भोजन की सप्राण खाद्यों की श्रेणी में आता है। यह पोषक तत्वों का श्रोत मन गया है । अंकुरित आहार न सिर्फ हमें उन्नत रोग प्रतिरोधी व उर्जावान बनाता है बल्कि शरीर का आंतरिक शुद्धिकरण कर रोग मुक्त भी करता है । अंकुरित आहार अनाज या दालों के वे बीज होते जिनमें अंकुर निकल आता हैं इन बीजों की अंकुरण की प्रक्रिया से इनमें रोग मुक्ति एवं नव जीवन प्रदान करने के गुण प्राकृतिक रूप से आ जाते हैं।

अंकुरित भोजन क्लोरोफिल, विटामिन (`ए´, `बी´, `सी´, `डी´ और `के´) कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, मैगनीशियम, आयरन, जैसे खनिजों का अच्छा स्रोत होता है। अंकुरित भोजन से काया कल्प करने वाला अमृत आहार कहा गया है अर्थात् यह मनुष्य को पुनर्युवा, सुन्दर स्वस्थ और रोगमुक्त बनाता है। यह महँगे फलों और सब्जियों की अपेक्षा सस्ता है, इसे बनाना खाना बनाने की तुलना में आसान है इसलिये यह कम समय में कम श्रम से तैयार हो जाता है। बीजों के अंकुरित होने के पश्चात् इनमें पाया जाने वाला स्टार्च- ग्लूकोज, फ्रक्टोज एवं माल्टोज में बदल जाता है जिससे न सिर्फ इनके स्वाद में वृद्धि होती है बल्कि इनके पाचक एवं पोषक गुणों में भी वृद्धि हो जाती है।
     खड़े अनाजों व दालों के अंकुरण से उनमें उपस्थित अनेक पोषक तत्वों की मात्रा दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है, मसलन सूखे बीजों में विटामिन 'सी' की मात्रा लगभग नहीं के बराबर होती है लेकिन अंकुरित होने पर लगभग दोगुना विटामिन सी इनसे पाया जा सकता है।
     अंकुरण की प्रक्रिया से विटामिन बी कॉम्प्लेक्स खासतौर पर थायमिन यानी विटामिन बी१, राइबोप्लेविन यानी विटामिन बी२ व नायसिन की मात्रा दोगुनी हो जाती है। इसके अतिरिक्त 'केरोटीन' नामक पदार्थ की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो शरीर में विटामिन ए का निर्माण करता है। अंकुरीकरण की प्रक्रिया में अनाज/दालों में पाए जाने वाले कार्बोहाइट्रेड व प्रोटीन और अधिक सुपाच्य हो जाते हैं। अंकुरित करने की प्रक्रिया में अनाज पानी सोखकर फूल जाते हैं, जिनसे उनकी ऊपरी परत फट जाती है व इनका रेशा नरम हो जाता है। परिणामस्वरूप पकाने में कम समय लगता है और वे बच्चों व वृद्धों की पाचन क्षमता के अनुकूल बन जाते हैं।

    अंकुरित करने के लिये चना, मूँग, गेंहू, मोठ, सोयाबीन, मूँगफली, मक्का, तिल, अल्फाल्फा, अन्न, दालें और बीजों आदि का प्रयोग होता है। अंकुरित भोजन को कच्चा, अधपका और बिना नमक आदि के प्रयोग करने से अधिक लाभ होता है। एक दलीय अंकुरित (गेहूं, बाजरा, ज्वार, मक्का आदि) के साथ मीठी खाद्य (खजूर, किशमिश, मुनक्का तथा शहद आदि) एवं फल लिए जा सकते हैं।

द्विदलीय अंकुरित (चना, मूंग, मोठ, मटर, मूंगफली, सोयाबीन, आदि) के साथ टमाटर, गाजर, खीरा, ककड़ी, शिमला मिर्च, हरे पत्ते (पालक, पुदीना, धनिया, बथुआ, आदि) और सलाद, नींबू मिलाकर खाना बहुत ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यदायक होता है। इसे कच्चा खाने बेहतर है क्यों कि पकाकर खाने से इसके पोषक तत्वों की मात्रा एवं गुण में कमी आ जाती है। अंकुरित दानों का सेवन केवल सुबह नाश्ते के समय ही करना चाहिये। एक बार में दो या तीन प्रकार के दानों को आपस में मिला लेना अच्छा रहता है। यदि ये अंकुरित दाने कच्चे खाने में अच्छे नहीं लगते तो इन्हें हल्का सा पकाया भी जा सकता है। फिर इसमें कटे हुए प्याज, कटे छोटे टमाटर के टुकड़े, बारीक कटी हुई मिर्च, बारीक कटा हुई धनिया एकसाथ मिलाकर उसमें नींबू का रस मिलाकर खाने से अच्छा स्वाद मिलता है।





अंकुरण की विधि -
  • अंकुरित करने वाले बीजों को कई बार अच्छी तरह पानी से धोकर एक शीशे के जार में भर लें शीशे के जार में बीजों की सतह से लगभग चार गुना पानी भरकर भीगने दें अगले दिन प्रातःकाल बीजों को जार से निकाल कर एक बार पुनः धोकर साफ सूती कपडे में बांधकर उपयुक्त स्थान पर रखें ।

  • गर्मियों में कपडे के ऊपर दिन में कई बार ताजा पानी छिडकें ताकि इसमें नमी बनी रहे।

  • गर्मियों में सामान्यतः २४ घंटे में बीज अंकुरित हो उठते हैं सर्दियों में अंकुरित होने में कुछ अधिक समय लग सकता है । अंकुरित बीजों को खाने से पूर्व एक बार अच्छी तरह से धो लें तत्पश्चात इसमें स्वादानुसार हरी धनियाँ, हरी मिर्च, टमाटर, खीरा, ककड़ी काटकर मिला सकते हैं द्य यथासंभव इसमें नमक न मिलाना ही हितकर है।
जरूरी  निर्देश -
  • अंकुरित करने से पूर्व बीजों से मिटटी, कंकड़ पुराने रोगग्रस्त बीज निकलकर साफ कर लें। प्रातः नाश्ते के रूप में अंकुरित अन्न का प्रयोग करें । प्रारंभ में कम मात्रा में लेकर धीरे-धीरे इनकी मात्रा बढ़ाएँ।
  • अंकुरित अन्न अच्छी तरह चबाकर खाएँ।
  • नियमित रूप से इसका प्रयोग करें।
  • वृद्धजन, जो चबाने में असमर्थ हैं वे अंकुरित बीजों को पीसकर इसका पेस्ट बनाकर खा सकते हैं। ध्यान रहे पेस्ट को भी मुख में कुछ देर रखकर चबाएँ ताकि इसमें लार अच्छी तरह से मिल जाय।



Feb 11, 2015

हर्बल चाय से करें स्वाइन फ्लू से बचाव : Herbal tea to protect against swine flu





स्वाइन-फ्लू की बीमारी से बचाव के लिए हर्बल चाय बहुत लाभदायक हो सकती है। यह चाय आप अपने रसोई घर में भी आसानी बना सकते हैं।    यह हर्बल चाय लौंग, इलायची, सोंठ, हल्दी, दालचीनी, गिलौय, तुलसी, कालीमिर्च और पिप्पली को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर तैयार की जा सकती है। इस चूर्ण की दो ग्राम मात्रा एक कप चाय में डालकर उसे अच्छी तरह उबालकर सुबह-शाम पीने पर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्वाइन-फ्लू जैसी बीमारी से भी बचाव होता है।  सामान्य स्थिति में भी लोग इस हर्बल चाय का सेवन कर सकते हैं।






     स्वाइन फ्लू को लेकर भ्रमित होने और घबराने की जरूरत नहीं है। आम तौर पर मौसम में बदलाव के समय फ्लू अथवा सर्दी, जुकाम, बुखार की शिकायत होती रहती है, लेकिन सामान्य इलाज से ये शिकायतें दूर हो जाती हैं।कपूर और इलायची को पीसकर कपड़े में छोटी पोटली बनाकर रखें और उसे बार-बार सूंघते जाएं, तो स्वाइन-फ्लू सहित कई प्रकार के फ्लू यानी सर्दी, जुकाम, सिरदर्द, बुखार आदि से बचा जा सकता है। इसके अलावा चिरायता, गुडुची, अनंतमूल, सोंठ, हल्दी, कालमेघ, वासा और तुलसी का काढ़ा बनाकर पीने से भी इस बीमारी के इलाज में फायदा होता है। मरीज को नीलगिरी तेल का वाष्प लेना चाहिए। इसके साथ ही सितोपलादि चूर्ण, त्रिकटु चूर्ण, लक्ष्मी विलास रस, गोदंती, श्रंग-भस्म आदि का सेवन आवश्यकता अनुसार चिकित्सक के परामर्श से करना चाहिए।

 
  स्वाइन-फ्लू कोई नयी बीमारी नहीं है, बल्कि यह सामान्य प्रकार के फ्लू के लक्षणों के समान लक्षण वाला फ्लू (प्रतिश्याय) है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसका कारण एच-वन-एन-वन नामक विषाणुओं को माना गया है। प्रकृति में ऐसे असंख्य विषाणु वातावरण में मौजूद हैं, जिन्हें कभी नष्ट नहीं किया जा सकता, लेकिन उनसे बचाव किया जा सकता है। आयुर्वेद के आचार्यों ने हजारों वर्ष पहले इसका वर्णन कर दिया था। शरीर में त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) जीवाणुओं से प्रकोपित होकर शरीर में रोग उत्पन्न करते हैं। जब तक त्रिदोष संतुलित अवस्था में होते हैं, तब तक जीवाणुओं की शक्ति कम होती है, लेकिन त्रिदोष का संतुलन बिगडऩे पर बीमारी की स्थिति निर्मित होती है। प्रकृति ने इन जीवाणुओं और विषाणुओं के बीच ही मनुष्य को स्वस्थ बने रहने के लिए उच्च प्रतिरोधक क्षमता प्रदान की है, लेकिन दूषित आहार और अनियमित जीवन शैली की वजह से मनुष्य की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होती जा रही है।

    लगातार बुखार, खांसी, गले में खराश, निगलने में परेशानी, शरीर में दर्द, कमजोरी और थकान, भूख नहीं लगना, अरूचि, छींक आना, स्वाइन-फ्लू के लक्षण हो सकते हैं।आयुर्वेद के अनुसार स्वाइन-फ्लू वास्तव में वात-श्लैश्मिक ज्वर है। इससे बचे रहने के लिए शुद्ध और शाकाहारी भोजन करना चाहिए, वात एवं कफ शामक, गर्म और स्निग्ध आहार अल्प मात्रा में लेना चाहिए, पर्याप्त नींद लेनी चाहिए, खुली और साफ हवा में रहना चाहिए, यानी कमरे हवादार होने चाहिए और उनमें सूर्य की रौशनी पर्याप्त मात्रा में आनी चाहिए, उबालकर ठंडा किया हुआ पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए, सवेरे नियमित रूप से प्राणायाम करना चाहिए, फ्लू के रोगियों से दूर रहना चाहिए, यथासंभव भीड़ से बचना चाहिए, सुअर के बाड़े अथवा सुअरों से दूर रहना चाहिए, उल्टी, छींक, खांसी आदि शारीरिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए। 
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Jan 23, 2015

प्रजनन क्षमता बढाता है जेतुन का तेल. Olive Oil increases Fertility





हाल में हुए शोध में प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए डाइट में खास तरह के बदलाव को फायदेमंद माना है। 

यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ हैंपटन के
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में माना है कि ऑलिव ऑयल से बनी डाइट के सेवन से प्रजनन दर 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।


शोधकर्ताओं ने छह हफ्तों तक 100 जोड़ों को आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान ऑलिव ऑयल से बनी डाइट का सेवन कराकर यह शोध किया है।



उनका मानना है कि ऑलिव ऑयल युक्त डाइट के सेवन से भ्रूण का विकास तेजी से होता है और गर्भावस्था के दौरान जच्चा-बच्चा अधिक सेहतमंद रहते हैं।

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Jan 2, 2015

मुलेठी के रोग नाशक गुण




मुलेठी बहुत गुणकारी औषधि है। मुलेठी के प्रयोग करने से न सिर्फ आमाशय के विकार बल्कि गैस्ट्रिक अल्सर के लिए 

फायदेमंद है। इसका पौधा 1 से 6 फुट तक होता है। यह मीठा होता है इसलिए इसे ज्येष्ठीमधु भी कहा जाता है। असली 

मुलेठी अंदर से पीली, रेशेदार एवं हल्की गंधवाली होती है।

यह सूखने पर अम्ल जैसे स्वाद की हो जाती है। मुलेठी की जड़ को उखाड़ने के बाद दो वर्ष तक उसमें औषधीय गुण विद्यमान 

रहता है। ग्लिसराइजिक एसिड के होने के कारण इसका स्वाद साधारण शक्कर से पचास गुना अधिक मीठा होता है।


मुलेठी के गुण -



- यह ठंडी प्रकृति की होती है और पित्त का शमन करती है .

- मुलेठी को काली-मिर्च के साथ खाने से कफ ढीला होता है। सूखी खांसी आने पर मुलेठी खाने से फायदा होता है। इससे खांसी 


तथा गले की सूजन ठीक होती है।- अगर मुंह सूख रहा हो तो मुलेठी बहुत फायदा करती है। इसमें पानी की मात्रा 50 प्रतिशत 

तक होती है। मुंह सूखने पर बार-बार इसे चूसें। इससे प्‍यास शांत होगी।

- गले में खराश
के लिए भी मुलेठी का प्रयोग किया जाता है। मुलेठी अच्‍छे स्‍वर के लिए भी प्रयोग की जाती है।

- मुलेठी महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद है। मुलेठी का एक ग्राम चूर्ण नियमित सेवन करने से वे अपनी सुंदरता को लंबे 

समय तक बनाये रख सकती हैं।

- लगभग एक महीने तक , आधा चम्मच मूलेठी का  चूर्ण  

सुबह शाम शहद के साथ चाटने से मासिक सम्बन्धी सभी रोग दूर 

होते है.

- फोड़े होने पर
मुलेठी का लेप लगाने से जल्दी ठीक हो जाते है.

- रोज़ ६ ग्रा. मुलेठी चूर्ण , ३० मि.ली. दूध के साथ पिने से शरीर में ताकत आती है.

- लगभग ४ ग्रा. मुलेठी का चूर्ण घी या शहद के साथ लेने से ह्रदय रोगों में लाभ होता है.

- इसके आधा ग्राम रोजाना सेवन से खून में वृद्धि होती है.

- जलने पर मुलेठी और चन्दन के लेप से शीतलता मिलती है.

- इसके चूर्ण को मुंह के छालों पर लगाने से आराम मिलता है.

- मुलेठी का टुकड़ा मुंह में रखने से कान का दर्द और सूजन ठीक होता है.

- उलटी होने
पर मुलेठी का टुकडा मुंह में रखने पर लाभ होता है.

- मुलेठी की जड़ पेट के घावों को समाप्‍त करती है, इससे पेट के घाव जल्‍दी भर जाते हैं। पेट के घाव होने पर मुलेठी की जड़ 

का चूर्ण इस्‍तेमाल करना चाहिए।

- मुलेठी पेट के अल्‍सर के लिए फायदेमंद है। इससे न केवल गैस्ट्रिक अल्सर वरन छोटी आंत के प्रारम्भिक भाग ड्यूओडनल 

अल्सर में भी पूरी तरह से फायदा करती है। जब मुलेठी का चूर्ण ड्यूओडनल अल्सर के अपच, हाइपर एसिडिटी आदि पर 

लाभदायक प्रभाव डालता है। साथ ही अल्सर के घावों को भी तेजी से भरता है।

]- खून की उल्टियां
होने पर दूध के साथ मुलेठी का चूर्ण लेने से फायदा होता है। खूनी उल्‍टी होने पर मधु के साथ भी इसे 

लिया जा सकता है।

- हिचकी
होने पर मुलेठी के चूर्ण को शहद में मिलाकर नाक में टपकाने तथा पांच ग्राम चूर्ण को पानी के साथ खिला देने से 

लाभ होता है।

- मुलेठी आंतों की टीबी के लिए भी फायदेमंद है।

- ये एक प्रकार की एंटीबायोटिक भी है इसमें बैक्टिरिया से लड़ने की क्षमता पाई जाती है। यह शरीर के अन्‍दरूनी चोटो में भी 




लाभदायक होती है।

- मुलेठी के चूर्ण से आँखों की शक्ति भी बढ़ती है सुबह तीन या चार ग्राम खाना चाहिये।

- यदि भूख न लगती हो तो एक छोटा टुकड़ा मुलेठी कुछ देर चूसे, दिन में ३,४, बार इस प्रक्रिया को दोहरा ले ,भूख खुल जाएगी .
- कोई भी समस्या न हो तो भी कभी-कभी मुलेठी का सेवन कर लेना चाहिए आँतों के अल्सर ,कैंसर का खतरा कम हो जाता है 


तथा पाचनक्रिया भी एकदम ठीक रहती है