Thursday, July 20, 2017

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने के आहार // Diet to increase disease resistance





रोग प्रतिरोधक क्षमता हमें कई बीमारियों से सुरक्षित रखती है. छोटी-मोटी ऐसी कई बीमारियां होती हैं जिनसे हमारा शरीर खुद ही निपट लेता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने पर बीमारियों का असर जल्दी होता है. ऐसे में शरीर कमजोर हो जाता है और हम जल्दी-जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं.
हमारा इम्यून सिस्टम हमें कई तरह की बीमारियों से सुरक्ष‍ित रखता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता कई तरह के बैक्टीरियल संक्रमण, फंगस संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करता है. इन बातों से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इम्यून पावर के कमजोर होने पर बीमार होने की आशंका बढ़ जाती है. ऐसे में ये बहुत जरूरी है कि हम अपनी इम्यून पावर को बनाए रखें.
रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने के कई कारण हो सकते हैं. कई बार ये खानपान की लापरवाही की वजह से होता है, कई बार नशा करने की गलत आदतों के चलते और कई बार यह जन्मजात कमजोरी की वजह से भी होता है.
अब सवाल ये उठता है कि अगर इम्यून पावर कमजोर हो जाए तो उसे बढ़ाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? यहां ऐसे ही कुछ उपायों का जिक्र है जिन्हें आजमाकर आप एक सप्ताह के भीतर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं :



*ओट्स में पर्याप्त मात्रा में फाइबर्स पाए जाते हैं. साथ ही इसमें एंटी-माइक्राबियल गुण भी होता है. हर रोज ओट्स का सेवन करने से इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है.
* विटामिन डी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. इससे कई रोगों से लड़ने की ताकत मिलती है. साथ ही हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए और दिल संबंधी बीमारियों को दूर रखने के लिए भी विटामिन डी लेना बहुत जरूरी है.
* संक्रामक रोगों से सुरक्षा के लिए विटामिन सी का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है. नींबू और आंवले में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को दुरुस्त रखने में मददगार होता है.
* ग्रीन टी और ब्लैक टी, दोनों ही इम्यून सिस्टम के लिए फायदेमंद होती हैं लेकिन एक दिन में इनके एक से दो कप ही पिएं. ज्यादा मात्रा में इसके सेवन से नुकसान हो सकता है.
*. कच्चा लहसुन खाना भी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बूस्ट करने में सहायक होता है. इसमें पर्याप्त मात्रा में एलिसिन, जिंक, सल्फर, सेलेनियम और विटामिन ए व ई पाए जाते हैं.
*दही के सेवन से भी इम्यून पावर बढ़ती है. इसके साथ ही यह पाचन तंत्र को भी बेहतर रखने में मददगार होती है.

Wednesday, July 19, 2017

फिशर होने के कारण लक्षण और उपचार // Symptoms and Ayurvedic Remedies to treat fissure



क्या होता है फिशर-
आमतौर पर गुदा से संबधित सभी रोगों को बवासीर या पाइल्स ही समझ लिया जाता है, लेकिन इसमें कई और रोग भी हो सकते हैं। जिन्हें हम पाइल्स समझते हैं। ऐसा ही एक रोग है फिशर। इसे आयुर्वेद में गुदचीर या परिकर्तिका भी कहते हैं। इस रोग में गुदा के आसपास के क्षेत्र में एक चीरे या क्रैक जैसी स्थिति बन जाती है, जिसे फिशर कहते हैं।
फिशर होने के कारण -
फिशर होने का मूल कारण मन का कड़ा होना या कब्ज़ का होना है। जिन लोगों में कब्ज़ की समस्या होती है, उनका मल कठोर हो जाता है, जब यह कठोर मल गुदा से निकलता है तो यह चीरा या जख्म बनाता हुआ निकलता है। यह प्रथम बार फिशर बनने की संभावित प्रक्रिया है।




फिशर के लक्षण-
फिशर से पीड़ित रोगी को टॉयलेट जाते समय गुदा द्वार (Anus) बहुत अधिक दर्द होता है, यह दर्द ऐसा होता है जैसे किसी ने काट दिया हो, और यह दर्द काफी देर तक (2-4 घंटों) बना रहता है। कभी कभी तो पूरे दिन ही रोगी दर्द से परेशान रहता है। इस रोग के बढ़ जाने पर रोगी को बैठना भी मुश्किल हो जाता है। दर्द के कारण इससे पीड़ित रोगी टॉयलेट जाने से डरने लगता है।
कभी कभी गुदा में बहुत अधिक जलन होती है, जो कि कई बार तो टॉयलेट जाने के ४-५ घंटे तक बनी रहती है।
गुदा में कभी कभी खुजली भी रहती है।
फिशर के 1 साल से अधिक पुराना होने पर गुदा के ऊपर या नीचे या दोनों तरफ सूजन या उभार सा बन जाता है, जो एक मस्से या जैसे खाल लटक जाती है, ऐसा महसूस होता है। इसे बादी बवासीर या सेंटीनेल टैग (sentinel tag or sentinel piles) कहते हैं। इसको स्थायी रूप से हटाने के लिए सर्जरी या क्षार सूत्र चिकित्सा की जरुरत होती है. यह दवाओं से समाप्त नहीं होता।
टॉयलेट के समय खून कभी कभी बहुत थोडा सा आता है या आता ही नहीं है। यह खून सख्त मल (लेट्रीन) पर लकीर की तरह या कभी कभी बूंदों के रूप में हो सकता है।



किसे होती है फिशर होने की अधिक संभावना? 

फिशर की बीमारी स्त्री, पुरुष, बच्चों, वृद्ध, या युवा किसी भी ऐसे व्यक्ति को हो सकती है, जिसे कब्ज़ रहती हो या मल कठिनाई से निकलता हो। ज़्यादातर निम्न लोगों को ये बीमारी होने की संभावना अधिक होती है : –
ऐसे लोग जिन्हें बाजार का जंक फूड जैसे पिज्जा, बर्गर, नॉन वेज, अत्यधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन खाने का शौक होता है
जो पानी कम पीते हैं
जो ज़्यादातर समय बैठे रहते हैं और किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम नहीं करते
महिलाओं मे गर्भावस्था के समय कब्ज़ हो जाती है जिससे, फिशर या पाईल्स हो सकते हैं। फिशर सामान्यतः भी महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है।
कैसे बचा जा सकता है फिशर से?
चूंकि फिशर होने का मूल कारण कब्ज़ व मल का सख्त होना होता है। अतः इससे बचने के लिए हमें भोजन संबंधी आदतों में ऐसे कुछ बदलाव करने होंगे जिससे पेट साफ रहे व कब्ज़ ना हो। जैसे: –
भोजन में फलों का सेवन
सलाद व सब्जियों का प्रचुर मात्रा में नियमित सेवन करना
पानी और द्रवों का अधिक मात्रा में सेवन करना
हल्के व्यायाम, शारीरिक श्रम, मॉर्निंग वॉक आदि का करना
छाछ (मट्ठे) और दही का नियमित सेवन करना
अत्यधिक मिर्च, मसाले, जंक फूड, मांसाहार का परहेज करना



क्या है फिशर का आयुर्वेद इलाज़? Ayurvedic treatment for Fissure

फिशर की तीव्र अवस्था में जब फिशर हुए ज्यादा समय न हुआ हो और कोई मस्सा या टैग न हो तो आयुर्वेद औषधि चिकित्सा से काफी लाभ मिल सकता है. साथ साथ यदि गर्म पानी में बैठकर सिकाई भी की जाए और खाने- पीने का ध्यान रखा जाये तो फिशर पूरी तरह से ठीक भी हो सकता है. आयुर्वेद में त्रिफला गुग्गुल, सप्तविंशति गुग्गुलु, आरोग्यवर्धिनी वटी, चित्रकादि वटी, अभयारिष्ट, त्रिफला चूर्ण, पंचसकार चूर्ण, हरीतकी चूर्ण आदि औषधियों का प्रयोग रोगी की स्थिति के अनुसार किया जाता है. इसके अतिरिक्त स्थानीय प्रयोग हेतु जात्यादि या कासिसादि तैल का प्रयोग किया जाता है.
पुराने फिशर में यदि सूखा मस्सा या सेंटिनल टैग फिशर के जख्म के ऊपर बन जाता है तो उसे हटाना आवश्यक होता है. तभी फिशर पूरी तरह से ठीक हो पाता है. टैग को हटाने के लिए या तो सीधा औज़ार या ब्लेड से काट देते हैं या क्षार सूत्र से बांधकर छोड़ देते हैं, 5 -7 दिनों में टैग स्वतः कटकर निकल जाता है. एक अन्य विधि जिसे अग्निकर्म कहते हैं, भी टैग को काटने के लिए अच्छा विकल्प हैं. इसमें एक विशेष यंत्र (अग्निकर्म यंत्र) की सहायता से टैग को जड़ से आसानी से अग्नि (heat ) के प्रभाव से काट दिया जाता है.
सेंटिनल टैग के निकलने के बाद चिकित्सक द्वारा गुदा विस्फ़ार (anal dilation ऐनल डाईलेशन) की कुछ सिट्टिंग्स देनी पड़ती हैं तथा कुछ औषधियाँ भी दी जाती हैं. क्षार सूत्र अग्निकर्म चिकित्सा से फिशर को पूरी तरह ठीक होने में लगभग 15 से 20 दिन लग जाते हैं.

हर्निया का घरेलु आयुर्वेदिक इलाज // Hernia's home ayurvedic treatment



   पेट की मांसपेशिया या कहें पेट की दीवार कमजोर हो जाने से जब आंत बाहर निकल आती है तो उसे हर्निया कहते हैं। वहां एक उभार हो जाता है, जिसे आसानी से देखा जा सकता है। लंबे समय से खांसते रहने या लगातार भारी सामान उठाने से भी पेट की मांसपेशिया कमजोर हो जाती है। ऐसी स्थिति में हर्निया की संभावना बढ़ जाती है। इसके कोई खास लक्षण नहीं होते हैं लेकिन कुछ लोग सूजन और दर्द का अनुभव करते हैं, जो खड़े होने पर और मांसपेशियों में खिंचाव होने या कुछ भारी सामान उठाने पर बढ़ सकता है।
   हर्निया की समस्या जन्मजात भी हो सकती है। इसे कॉनजेनाइटल हर्निया कहते हैं। हर्निया एक वक्त के बाद किसी को भी हो सकता है और बिना सर्जरी के ठीक भी नहीं हो सकता। इसमें पेट की त्वचा के नीचे एक असामान्य उभार आ जाता है, जो नाभि के नीचे होता है। आंत का एक हिस्सा पेट की मांसपेशियों के एक कमजोर हिस्से से बाहर आ जाता है। इसके अलावा इंगुइंल हर्निया, फेमोरल हर्निया, एपिगास्त्रिक हर्निया, एम्ब्लाइकल हर्निया भी होता है, जो बहुत कम दिखता है।



हर्निया के घरेलू इलाज 

अगर हर्निया बड़ी हो, उसमें सूजन हो और काफी दर्द हो रहा हो तो बिना सर्जरी के इसका इलाज संभव नहीं है। लोकिन हर्निया के लक्षण पता लगने पर आप उसे घरेलू इलाज से कम कर सकते हैं। हालांकि, इन घरेलू उपायों से सिर्फ प्राथमिक इलाज ही संभव है और इसे आजमाने पर कभी उल्टे परिणाम भी हो सकते हैं। इसलिए घरेलू इलाज आजमाने से पहले डॉक्टर से जरुर संपर्क कर लें।
मुलैठी (Licorice)
कफ, खांसी में मुलैठी तो रामबाण की तरह काम करता है और आजमाय हुआ भी है। हर्निया के इलाज में भी अब यह कारगर साबित होने लगा है, खासकर पेट में जब हर्निया निकलने के बाद रेखाएं पड़ जाती है तब इसे आजमाएं।
अदरक के जड़ (Ginger Root)
अदरक की जड़ पेट में गैस्ट्रिक एसिड और बाइल जूस से हुए नुकसान से सुरक्षा करता है। यह हर्निया से हुए दर्द में भी काम करता है।



एक्यूपंक्चर (Acupuncture)
हर्निया के दर्द में एक्यूपंक्चर काफी आराम पहुंचाता है। खास नर्व पर दबाव से हर्निया का दर्द कम होता है।
बर्फ (Ice)
बर्फ से हर्निया वाले जगह दबाने पर काफी आराम मिलता है और सूजन भी कम होती है। यह सबसे ज्यादा प्रचलन में है।
बबूने का फूल (Chamomile)
पेट में हर्निया आने से एसिडिटी और गैस काफी बनने लगती है। इस स्थिति मेंम बबूने के फूल के सेवन से काफी आराम मिलता है। यह पाचन तंत्र को ठीक करता है और एसिड बनने की प्रक्रिया को कम करता है।
मार्श मैलो (Marshmallow)
यह एक जंगली औषधि है जो काफी मीठी होती है। इसके जड़ के काफी औषधीय गुण हैं। यह पाचन को ठीक करता है और पेट-आंत में एसिड बनने की प्रक्रिया को कम करता है। हर्निया में भी यह काफी आराम पहुंचाता है।
हावथोर्निया (Hawthornia)
यह एक हर्बल सप्लीमेंट है जो पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है और पेट के अंदर के अंगों की सुरक्षा करती है। यह हर्निया को निकलने से रोकने में काफी कारगर है। हावथोर्निया में Citrus Seed, Hawthorn और Fennel मिली होती है।
हर्निया में इन चीजों को नहीं करें (Don’ts in Hernia)

हर्निया में ज्यादा तंग और टाइट कपड़ें नहीं पहनें।
बेड पर अपने तकिए को 6 इंच उपर रखें, ताकि पेट में सोते समय एसिड और गैस नहीं बन पाए।
एक ही बार ज्यादा मत खाएं, थोड़ी-थोड़ी देर पर हल्का भोजन लें।
खाने के तुरंत बाद झुकें नहीं।
शराब पीना पूरी तरह बंद कर दें।
प्रभावित जगह को कभी भी गर्म कपड़े या किसी भी गर्म पदार्थ से सेंक नहीं दें।
हर्निया में कसरत करने से परहेज करें।

Tuesday, July 18, 2017

चर्म रोग नाशक आयुर्वेदिक घरेलु उपचार // Ayurvedic home remedies for skin diseases


अधिकतर समय धूप में बिताने वाले लोगों को चर्म रोग होने का खतरा ज्यादा होता है।
किसी एंटीबायोटिक दवा के खाने से साइड एफेट्स होने पर भी त्वचा रोग हो सकता है।
महिलाओं में मासिक चक्र अनियमितता की समस्या हो जाने पर भी उन्हे चर्म रोग होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
उल्टी, छींक, डकार, वाहर (Fart), पिशाब, और टट्टी इन सब आवेगों को रोकने से चर्म रोग होने का खतरा रहता है।
शरीर पर लंबे समय तक धूल मिट्टी और पसीना जमें रहने से भी चर्म रोग हो सकता है।
और भोजन के बाद विपरीत प्रकृति का भोजन खाने से कोढ़ का रोग होता है। (उदाहरण – आम का रस और छाछ साथ पीना)।
शरीर में ज़्यादा गैस जमा होने से खुश्की का रोग हो सकता है।
अधिक कसे हुए कपड़े पहेनने पर और नाइलोन के वस्त्र पहनने पर भी चमड़ी के विकार ग्रस्त होने का खतरा होता है।
नहाने के साबुन में अधिक मात्रा में सोडा होने से भी यह रोग हो सकता है।
खुजली का रोग ज़्यादातर शरीर में खून की खराबी के कारण उत्पन्न होता है।
गरम और तीखीं चिज़े खाने पर फुंसी और फोड़े निकल आ सकते हैं।
आहार ग्रहण करने के तुरंत बाद व्यायाम करने से भी चर्म रोग होने की संभावना रहती है।
त्वचा रोग के लक्षण 
दाद-खाज होने पर चमड़ी एकदम सूख जाती है, और उस जगह पर खुजलाने पर छोटे छोटे दाने निकल आते हैं। समान्यतः किसी भी प्रकार के चर्म रोग में जलन, खुजली और दर्द होने की फरियाद रहती है। शरीर में तेजा गरमी इकट्ठा होने पर चमड़ी पर सफ़ेद या भूरे दाग दिखने लगते हैं या फोड़े और फुंसी निकल आते हैं और समय पर इसका उपचार ना होने पर इनमें पीप भी निकलनें लगता है।
*त्वचा रोग होने पर भोजन में परहेज़ / Food Sobriety in Skin Disease in Hindi
त्वचा रोग होने पर बीड़ी, सिगरेट, शराब, बीयर, खैनी, चाय, कॉफी, भांग, गांजा या अन्य किसी भी दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन ना करें।
*बाजरे और ज्वार की रोटी बिलकुल ना खाएं। शरीर की शुद्धता का खास खयाल रक्खे।
त्वचा रोग हो जाने पर, समय पर सोना, समय पर उठना, रोज़ नहाना, और धूप की सीधी किरणों के संपर्क से दूर रहेना अत्यंत आवश्यक है।
त्वचा रोग में आयुर्वेदिक व घरेलू उपचार /
नहाते समय नीम के पत्तों को पानी के साथ गरम कर के, फिर उस पानी को नहाने के पानी के साथ मिला कर नहाने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है।
नीम की कोपलों (नए हरे पत्ते) को सुबह खाली पेट खाने से भी त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
त्वचा के घाव ठीक करने के लिए नीम के पत्तों का रस निकाल कर घाव पर लगा कर उस पर पट्टी बांध लेने से घाव मिट जाते हैं। (पट्टी समय समय पर बदलते रहना चाहिए)।
मूली के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से किसी भी प्रकार के त्वचा रोग में राहत हो जाती है।
प्रति दिन तिल और मूली खाने से त्वचा के भीतर जमा हुआ पानी सूख जाता है, और सूजन खत्म खत्म हो जाती है।
मूली का गंधकीय तत्व त्वचा रोगों से मुक्ति दिलाता है।
मूली में क्लोरीन और सोडियम तत्व होते है, यह दोनों तत्व पेट में मल जमने नहीं देते हैं और इस कारण गैस या अपचा नहीं होता है।
मूली में मेग्नेशियम की मात्रा भी मौजूद होती है, यह तत्व पाचन क्रिया नियमन में सहायक होता है। जब पेट साफ होगा तो चमड़ी के रोग होने की नौबत ही नहीं होगी।
हर रोज़ मूली खाने से चहरे पर हुए दाग, धब्बे, झाईयां, और मुहासे ठीक हो जाते हैं।
त्वचा रोग में सेब के रस को लगाने से उसमें राहत मिलती है। प्रति दिन एक या दो सेब खाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। त्वचा का तैलीयपन दूर करने के लिए एक सेब को अच्छी तरह से पीस कर उसका लेप पूरे चहरे पर लगा कर दस मिनट के बाद चहरे को हल्के गरम पानी से धो लेने पर “तैलीय त्वचा” की परेशानी से मुक्ति मिलती है।
खाज और खुजली की समस्या में ताज़ा सुबह का गौमूत्र त्वचा पर लगाने से आराम मिलता है।
जहां भी फोड़े और फुंसी हुए हों, वहाँ पर लहसुन का रस लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
लहसुन और सूरजमुखी को एक साथ पीस कर पोटली बना कर गले की गांठ पर (कण्ठमाला की गील्टियों पर) बांध देने से लाभ मिलता है।
सरसों के तेल में लहसुन की कुछ कलीयों को डाल कर उसे गर्म कर के, (हल्का गर्म) उसे त्वचा पर लगाया जाए तो खुजली और खाज की समस्या दूर हो जाती है।
सूखी चमड़ी की शिकायत रहती हों तो सरसों के तैल में हल्दी मिश्रित कर के उससे त्वचा पर हल्की मालिश करने से त्वचा का सूखापन दूर हो जाता है।
हल्दी को पीस कर तिल के तैल में मिला कर उससे शरीर पर मालिश करने से चर्म रोग जड़ से खत्म होते हैं।
चेहरे के काले दाग और धब्बे दूर करने के लिए हल्दी की गांठों को शुद्ध जल में घिस कर, उस के लेप को, चेहरे पर लगाने से दाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।
करेले के फल का रस पीने से शरीर का खून शुद्ध होता है। दिन में सुबह के समय बिना कुछ खाये खाली पेट एक ग्राम का चौथा भाग “करेले के फल का रस” पीने से त्वचा रोग दूर होते हैं।



दाद, खाज और खुजली जैसे रोग, दूर करने के लिए त्वचा पर करेले का रस लगाना चाहिए।

रुई के फाये से गाजर का रस थोड़ा थोड़ा कर के चहेरे और गरदन पर लगा कर उसके सूखने के बाद ठंडे पानी से चहेरे को धो लेने से स्किन साफ और चमकीली बन जाती है।
-प्रति दिन सुबह एक कप गाजर का रस पीने से हर प्रकार के त्वचा रोग दूर होते हैं। सर्दियों में त्वचा सूखने की समस्या कई लोगों को होती है, गाजर में विटामिन A भरपूर मात्रा में होता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने से त्वचा का सूखापन दूर होता है।
-पालक और गाजर का रस समान मात्रा में मिला कर उसमें दो चम्मच शहद मिला कर पीने से, सभी प्रकार के चर्म रोग नाश होते हैं।
-गाजर का रस संक्रमण दूर करने वाला और किटाणु नाशक होता है, गाजर खून को भी साफ करता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने वाले व्यक्ति को फोड़े फुंसी, मुहासे और अन्य चर्म रोग नहीं होते हैं।
-काली मिट्टी में थोड़ा सा शहद मिला कर फोड़े और फुंसी वाली जगह पर लगाया जाए तो तुरंत राहत हो जाती है।
-फुंसी पर असली (भेग रहित) शहद लगाने से फौरन राहत हो जाती है।
शहद में पानी मिला कर पीने से फोड़े, फुंसी, और हल्के दाग दूर हो जाते हैं।
-सेंधा नमक, दूध, हरड़, चकबड़ और वन तुलसी को समान मात्रा में ले कर, कांजी के साथ मिला कर पीस लें। तैयार किए हुए इस चूर्ण को दाद, खाज और खुजली वाली जगहों पर लगा लेने से फौरन आराम मिल जाता है।
-हरड़ और चकबड़ को कांजी के साथ कूट कर, तैयार किए हुए लेप को दाद पर लगाने से दाद फौरन मीट जाता है।
-पीपल की छाल का चूर्ण लगा नें पर मवाद निकलने वाला फोड़ा ठीक हो जाता है। चार से पाँच पीपल की कोपलों को नित्य सुबह में खाने से एक्ज़िमा रोग दूर हो जाता है। (यह प्रयोग सात दिन तक लगातार करना चाहिए)।
-नीम की छाल, सहजन की छाल, पुरानी खल, पीपल, हरड़ और सरसों को समान मात्रा में मिला कर उन्हे पीस कर उसका चूर्ण बना लें। और फिर इस चूर्ण को गौमूत्र में मिश्रित कर के त्वचा पर लगाने से समस्त प्रकार के जटिल त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
-अरण्डी, सौंठ, रास्ना, बालछड़, देवदारु, और बिजौरे की छड़ इन सभी को बीस-बीस ग्राम ले कर एक साथ पीस लें। उसके बाद इन्हे पानी में मिला कर लेप तैयार कर लें और फिर उस लेप को त्वचा पर लगा लें। इस प्रयोग से समस्त प्रकार के चर्म रोग दूर हो जाते हैं।
-अजवायन को पानी में उबाल कर जख्म धोने से उसमे आराम मिल जाता है।
-गर्म पानी में पिसे हुए अजवायन मिला कर, उसका लेप दाद, खाज, खुजली, और फुंसी पर लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।



-नमक मिले गर्म पानी से त्वचा को धोने या सेक करने से हाथ-पैर और ऐडियों की दरारें दूर होती हैं और दर्द में फौरन आराम मिल जाता है।

-खीरा खाने से चमड़ी के रोग में राहत मिलती है। ककड़ी के रस को चमड़ी पर लगाने से त्वचा से मैल दूर होता है, और चेहरा glow करता है। ककड़ी का रस पीने से भी शरीर को लाभ होता है।
-प्याज को आग में भून कर फोड़ों और फुंसियों और गाठों पर बांध देने से वह तुरंत फुट जाती हैं। अगर उनमें मवाद भरा हों तो वह भी बाहर आ निकलता है। हर प्रकार की जलन, सूजन और दर्द इस प्रयोग से ठीक हो जाता है। इस प्रयोग से infection का जख्म भी ठीक हो जाता है। प्याच को कच्चा या पक्का खाने से त्वचा में निखार आता है।
-प्रति दिन प्याज खाने वाले व्यक्ति को लू (Heat stroke) कभी नहीं लगती है।
-पोदीने और हल्दी का रस समान मात्रा में मिश्रित कर के दाद खाज खुजली वाली जगहों पर लगाया जाए तो फौरन राहत मिल जाती है।
*भोजन में अचार, नींबू, नमक, मिर्च, टमाटर तैली वस्तुएं, आदि चीज़ों का सेवन बिलकुल बंद कर देना चाहिए। (चर्म रोग में कोई भी खट्टी चीज़ खाने से रोग तेज़ी से पूरे शरीर में फ़ेल जाता है।)।
*अगर खाना पचने में परेशानी रहती हों, या पेट में गैस जमा होती हों तो उसका उपचार तुरंत करना चाहिए। और जब यह परेशानी ठीक हो जाए तब कुछ दिनों तक हल्का भोजन खाना चाहिए।
*खराब पाचनतत्र वाले व्यक्ति को चर्म रोग होने के अधिक chances होते हैं।
*त्वचा की किसी भी प्रकार की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को हररोज़ रात को सोने से पूर्व एक गिलास हल्के गुनगुने गरम दूध में, एक चम्मच हल्दी मिला कर दूध पीना चाहिए।
-पिसा हुआ पोदीना लेप बना कर चहेरे पर लगाया जाए और फिर थोड़ी देर के बाद चहेरे को ठंडे पानी से धो लिया जाए तो चहेरे की गरमी दूर हो जाती है, तथा स्किन चमकदार बनती है।
-गरम पानी में नमक मिला कर नहाने से सर्दी के मौसम में होने वाले त्वचा रोगों के सामने रक्षण मिलता है। और अगर रोग हो गए हों तो इस प्रयोग के करने से रोग समाप्त हो जाते हैं।
विशिष्ट परामर्श-

सभी प्रकार के चर्म रोगों और त्वचा की विकृतियों में हर्बल मेडीसीन सर्वाधिक सफल सिद्ध होती है|दाद,खाज,खुजली,एक्जीमा  सोरायसीस ,मुहासे  आदि चर्म विकारों में  वैध्य दामोदर 98267-95656 की हर्बल मेडीसीन आश्चर्यकारी परिणाम देती है||इसके प्रयोग से पुराने चर्म रोग भी नष्ट हो जाते हैं|

वात रोगों के प्राकृतिक ,आयुर्वेदिक घरेलू उपचार // Natural, Ayurvedic home remedies for Vata diseases



वात, पित्त और कफ तीनों में से वात सबसे प्रमुख होता है क्योंकि पित्त और कफ भी वात के साथ सक्रिय होते हैं। शरीर में वायु का प्रमुख स्थान पक्वाशय में होता है और वायु का शरीर में फैल जाना ही वात रोग कहलाता है। हमारे शरीर में वात रोग 5 भागों में हो सकता है जो 5 नामों से जाना जाता है।
वात के पांच भाग निम्नलिखित हैं-
• उदान वायु - यह कण्ठ में होती है।
• अपान वायु - यह बड़ी आंत से मलाशय तक होती है।
• प्राण वायु - यह हृदय या इससे ऊपरी भाग में होती है।
• व्यान वायु - यह पूरे शरीर में होती है।
• समान वायु - यह आमाशय और बड़ी आंत में होती है।
वात रोग के प्रकार :-
आमवात के रोग में रोगी को बुखार होना शुरू हो जाता है तथा इसके साथ-साथ उसके जोड़ों में दर्द तथा सूजन भी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगियों की हडि्डयों के जोड़ों में पानी भर जाता है। जब रोगी व्यक्ति सुबह के समय में उठता है तो उसके हाथ-पैरों में अकड़न महसूस होती है और जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है। जोड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने से रोगी के शरीर के अंगों की आकृति बिगड़ जाती है।
सन्धिवात :-
जब आंतों में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तो शरीर की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द तथा अकड़न होने लगती है।
गाउट :-
गाउट रोग बहुत अधिक कष्टदायक होता है। यह रोग रक्त के यूरिक एसिड में वृद्धि होकर जोड़ों में जमा होने के कारण होता है। शरीर में यूरिया प्रोटीन से उत्पन्न होता है, लेकिन किसी कारण से जब यूरिया शरीर के अंदर जल नहीं पाता है तो वह जोड़ों में जमा होने लगता है और बाद में यह पथरी रोग का कारण बन जाता है।
मांसपेशियों में दर्द:-
मांस रोग के कारण रोगी की गर्दन, कमर, आंख के पास की मांस-पेशियां, हृदय, बगल तथा शरीर के अन्य भागों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण रोगी के शरीर के इन भागों में दर्द होने लगता है। जब इन भागों को दबाया जाता है तो इन भागों में तेज दर्द होने लगता है।
   इस रोग के कारण हडि्डयों को जोड़ने वाली तथा जोड़ों को ढकने वाली लचीली हडि्डयां घिस जाती हैं तथा हडि्डयों के पास से ही एक नई हड्डी निकलनी शुरू हो जाती है। जांघों और घुटनों के जोड़ों पर इस रोग का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण इन भागों में बहुत तेज दर्द होता है।>


वात रोग के लक्षण :-

• रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द रहता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के जोड़ों में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का मुंह सूखने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी को डकारें या हिचकी आने लगती है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में खुश्की तथा रूखापन होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की त्वचा का रंग मैला सा होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति को अपने शरीर में जकड़न तथा दर्द महसूस होता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के सिर में भारीपन होने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लगता है तथा उसका पेट भारी-भारी सा लगने लगता है।
वात रोग होने का कारण :-
• वात रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पक्वाशय, आमाशय तथा मलाशय में वायु का भर जाना है। 
• जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।
• जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।
• ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
• भोजन करने के बाद भोजन के ठीक तरह से न पचने के कारण भी वात रोग हो सकता है।

• जब अपच के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है और अजीर्ण के कारण कब्ज होता है तथा इन सबके कारण गैस बनती है तो वात रोग पैदा हो जाता है।
• पेट में गैस बनना वात रोग होने का कारण होता है।
• जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।



• जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।

• ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
वात रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए। इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।
• कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।
• कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है। 
• शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है। 
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। 
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। फिर इसके बाद इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए। 




• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए। इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। 

• वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को एक टब में गरम पानी लेकर उसमें आधा चम्मच नमक डाल लेना चाहिए। इसके बाद जब टब का पानी गुनगुना हो जाए तब रोगी को टब के पास एक कुर्सी लगाकर बैठ जाना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को अपने पैरों को गरम पानी के टब में डालना चाहिए और सिर पर एक तौलिये को पानी में गीला करके रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अपनी गर्दन के चारों ओर कंबल लपेटना चाहिए। इस प्रकार से इलाज करते समय रोगी व्यक्ति को बीच-बीच में पानी पीना चाहिए तथा सिर पर ठंडा पानी डालना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी को कम से कम 20 मिनट में ही शरीर से पसीना निकलने लगता है जिसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वात रोग ठीक होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए 2 बर्तन लें। एक बर्तन में ठंडा पानी लें तथा दूसरे में गरम पानी लें और दोनों में 1-1 तौलिया डाल दें। 5 मिनट बाद तौलिये को निचोड़कर गर्म सिंकाई करें। इसके बाद ठंडे तौलिये से सिंकाई करें। इस उपचार क्रिया को कम से कम रोजाना 3 बार दोहराने से यह रोग ठीक होने लगता है।

Monday, July 17, 2017

होठों को निखारने के घरेलू उपाय//Home remedies for making lips beautiful





   खूबसूरत गुलाबी होठ की चाहत सभी महिलाओं को होती है, लेकिन कम ही ऐसी होती हैं, जिन्हें ये मिल पाता है. गुलाबी होठ पाने के लिए महिलाएं कई तरह के कॉस्मेटिक प्रोडक्ट तक खरीद लेती हैं पर फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ता है. आगे की स्लाइड में हम आपको कुछ घरेलू उपचार बताएंगे, जिससे आपके होंठ गुलाबी हो सकते हैं:
   नींबू के रस को रोज रात को सोने से पहले अपने होठ में लगाएं. इस उपाय को कम से कम दो महीने करें.
नारियल पानी, खीरे का रस और नींबू के रस को मिलाकर होठ पर लगाने से होठों का कालापन दूर होता है.




संतरे को अपने होठ पर रगड़ें. इसका रस होठों को मुलायम और खूबसूरत बनाता है.

   चुकंदर का रस लगाने से भी होठों का रंग गुलाबी होता है. बीट में लाल रंग प्राकृतिक रूप में मौजूद होता है, जिससे होंठ गुलाबी होते हैं. बीटरूट का रस होठ के कालेपन को भी दूर करता है.
सोने से पहले ग्लीसरीन, गुलाब जल और केसर को मिलाकर होठ में लगाने से भी होंठ निखरते हैं.
   हल्दी पाउडर को मलाई के साथ मिलाकर होठ में लगाने से भी होंठों का कालापन दूर होता है.
अनार के दानों को मलाई के साथ पीसकर होठों पर लगाएं. इस उपाय को कुछ दिन करें. आपको फर्क दिखने लगेगा. होंठ गुलाबी और खूबसूरत हो जाएंगे.

Friday, July 14, 2017

स्त्रियों के मासिक धर्म (पीरियड्स) की विस्तृत जानकारी //Detailed information about menstrual periods



     पीरियड जिसे आम बोल चाल के भाषा में माहवारी और मासिक-धर्म के नाम से भी जानते है | ईश्वर के द्वारा पुरुष और स्त्रियो में कई विषमताएं बनायीं गयी है इन्हीं विषमताओं में से एक हैं स्त्रियों में मासिक-धर्म ।
हमारे समाज में कई लोगो को यह जानने की खासी उत्सुकता रहती है की लड़कियों में मासिक धर्म कब और कैसे शुरू होता है । आज हम माहवारी से जुड़े ऐशे कई अनसुलझे सवालो के जवाब बताने जा रहे हैं जिनके बारे में आपको पहले से नहीं पता होगा ।
मासिकधर्म (अथवा माहवारी) पीरियड क्‍या है? |
    मासिक-धर्म महिलाओ में होने वाली सामान्य शारीरिक गतिविधि है । महिलाओं को भी माहवारी के दौरान खुद अपने शरीर को समझने में परेशानी आती है । जब कोई लड़की पैदा होती है, तो उसके अण्‍डाशयों में पहले से लाखों अपरिपक्‍व अण्‍डाणु मौजूद होते हैं। जवान होने पर, उनमें से दसियों अण्‍डे महीने में एक बार हार्मोन उत्तेजित (हार्मोनल स्टिमुलेशन) होने की वजह से विकसित होने शुरू हो जाते है । महिलाओं के शरीर में चक्रीय (साइक्लिकल) हार्मोस में होने वाले बदलावों की वज़ह से गर्भाशय से नियमित तौर पर ख़ून और अंदरुनी हिस्से से स्राव होना मासिकधर्म (अथवा माहवारी) कहलाता है । आमतौर पर, प्रत्‍येक चक्र के दौरान अण्‍डाशय में केवल एक ही अण्‍डा परिपक्‍व होता है और गर्भाशय में छोड़ा जाता है (जिसे अण्‍डोत्‍सर्ग कहा जाता है) उसी समय, गर्भावस्‍था की तैयारी में गर्भाशय का भीतरी हिस्सा मोटा होना शुरू हो जाता है। यदि यह अण्‍डाणु निषेचित नहीं होता, तो यह गर्भाशय के भीतरी हिस्से के अतिरिक्‍त ऊतकों के साथ माहवारी ख़ून के रूप में योनि से निकलना शुरू हो जाता है। इसके बाद अगला माहवारी चक्र फिर से शुरू हो जाता है ।



माहवारी किस उम्र में शुरू और बंद हो जाती है?

माहवारी शुरू होने और बंद होने का कोई निश्चित उम्र शीमा नहीं है । यह स्त्री विशेष में क्षेत्रीय वातावरण और रहन सहन के आधार पर अलग-अलग हो सकती है । अमूमन माहवारी के शुरू होने की जो सामान्य समय शीमा है वह 11-12 वर्ष है। अधिकतर महिलाओं की प्राकृतिक रज्‍जोनिवृत्ति यानि की माहवारी बंद 45-55 वर्ष की आयु में हो जाती है। इस आयु में, माहवारी आना हमेशा के लिए बंद हो जाती है (रज्‍जोनिवृत्ति हो जाती है) और इसके बाद महिलाएं बच्‍चे पैदा करने में सक्षम नहीं रहती।
मासिक धर्म की अनियमितता 
सभी महिलाओं को प्रत्‍येक महीने माहवारी नहीं आती । जिन लड़कियों की माहवारी हाल ही में शुरू हुई और जो महिलाएं रज्‍जोनिवृत्ति की आयु पर पहुंचने वाली हैं, उनको अनियमित माहवारी आ सकती है । किसी महिला का चक्र उसकी स्थितिके अनुसार अलग-अलग हो सकता है
एक माहवारी चक्र 21-35 दिनों का हो सकता है। चक्र की अवधि से तात्‍पर्य है, माहवारी आने के पहले दिन से लेकर अगली माहवारी आने के पहले दिन तक की अवधि
उदाहरण के लिए:
पिछली माहवारी का पहला दिन: 1 January
मौजूदा माहवारी का पहला दिन: 29 January
चक्र की अवधि: 28 दिन
कुछ परिस्थितियों की वजह से माहवारी अनियमित हो सकती है। इनमें शामिल है:
-स्‍थाई (क्रॉनिक) बीमारियां होना, हार्मोन संबंधी विकार होना (उदाहरण के लिए पॉलिसि‍स्टिक ओवरी सिंड्रम, थायराइड बीमारी आदि)



-गर्भाशय के अंदरुनी हिस्से विकार, पौलिप्स, सरविक्स अथवा योनि के संक्रमण, अथवा योनि के कैंसर आदि की वजह से दो माहवारियों के बीच में योनि‍ से रक्‍त-स्राव हो सकता है। इसकी वजह से ‘अनियमित माहवारी’ आने का भ्रम हो सकता है

 कुछ दवाएं लेना (उदाहरण के लिए गर्भनिरोधक इंजेक्‍शन लेना)
- मादक पदार्थों का सेवन करना
- स्‍तनपान कराना
- वज़न सामान्‍य से अधिक अथवा कम होना
- खान-पान संबंधी विकार होना (उदाहरण के लिए एनोरेक्सिया नर्वोसा होना)
- बहुत अधिक कसरत करना
- तनाव होना
पीरियड प्रत्येक 28 दिनों पर आना जरुरी है ?
माहवारी का चक्र महिला-महिला पर निर्भर करता है । समान्यतः माहवारी का चक्र 20 दिनों से लेकर 35 दिनों के बीच हो सकता है। माहवारी आने में थोड़ी देरी हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं की आप गर्भवती हैं। यदि आपका पीरियड तय समय से थोड़ा देरी से आता है तो इसे लेकर आपको घबड़ाने की जरूरत नहीं है।
माहवारी का दर्द क्‍या है? 
माहवारी का दर्द आमतौर पर माहवारी शुरू होने के कुछ समय पहले अथवा माहवारी शुरू होने पर होता है। आमतौर पर पेट के निचले हिस्‍से में हल्‍के से लेकर तेज़ पेट दर्द महसूस होता है । दर्द की वजह से पेट में गड़बड़ी हो सकती है, जैसे कि उल्‍टी आना अथवा पतला मलत्‍याग करना आमतौर पर भारी रक्‍तस्राव होने की स्थिति में तेज़ दर्द होता है ।
मासिकधर्म (अथवा माहवारी) पीरियड के लक्षण 
यदि आपको निम्‍नलिखित में से कोई लक्षण दिखाई दे, तो अपने डॉक्‍टर से संपर्क करें:
*आपकी आयु 16 वर्ष हो चुकी हो और आपको माहवारी आनी शुरू नहीं हुई है




* आपकी आयु 45 वर्ष से कम है और आपको एक वर्ष से माहवारी नहीं हुई है
* माहवारी के दौरान तेज़ दर्द होना / पेट दर्द होना
* मासिक चक्र 21 दिन से कम अवधि का होना
* बहुत अधिक माहवारी आना
* आपकी माहवारी अचानक से अनियमित हो गई है
* दो माहवारियों के बीच में योनि से रक्‍तस्राव होना
* संभोग के बाद योनि से ख़ून निकलना
* आपको माहवारी आना बंद हुए एक साल होने के बाद योनि से ख़ून निकलना
* 40 वर्ष की आयु में अथवा इसके बाद माहवारी के दौरान दर्द होना शुरू होना
क्या माहवारी के समय आप गर्भधारण नहीं कर सकतीं?
यह धारणा बिल्कुल गलत है । आप के समयधर्म  भी गर्भधारण कर सकती हैं। उन महिलाओं का जिनका महावारी चक्र 28 दिनों से कम होता है, उन्हें गर्भधारण की संभावना अधिक होती है।
माहवारी के समय सेक्स नहीं करना चाहिए?
ज्यादातर लोग माहवारी के समय अपने पार्टनर के साथ सेक्स करना पसंद नहीं करते । लेकिन सुरक्षित तरीके से सावधानी पूर्वक माहवारी के समय सेक्स करने से आपको ऐंठन/मरोड़ से आराम मिलता है। शोध के मुताबिक माहवारी के समय सेक्स करने से दर्द में कमी आती है।
कॉटन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए?
कई लोगों का मानना है कि कुंवारी लड़कियों को कॉटन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। भ्रांति यह भी है कि यदि कोई कुंवारी कॉटन का इस्तेमाल करती है तो उसका कौमार्य नष्ट हो जाता है। लेकिन वर्जिन उसे माना जाता है जिसने यौन शुचिता खोई न हो। तो ऐसे में कॉटन के इस्तेमाल और वर्जिनिटी खोने में कोई संबंध नहीं है।

Tuesday, July 11, 2017

पेशाब मे बदबू दूर करने के उपाय //Measures to remove odor in urine






शरीर के विषाक्त पदार्थ पसीने और पेशाब के जरिये शरीर से बाहर जाते हैं। इसलिए जब भी आप बाथरूम जाते होंगे पेशाब से हल्की बदबू आती ही होगी। लेकिन जब पेशाब से अजीब तरह की बदबू आने लगे तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है।हमारे शरीर में हर फंक्शन का अच्छे से होना बहुत जरूरी है। अगर इन फंक्शन में थोड़ी सी भी खराबी आने लग जाती है तो इसका मतलब है कि हम बीमार होने वाले हैं। शारीरिक फंक्शन का एक हिस्सा है 'मूत्र विसर्जन'। इस क्रिया से शरीर के सारे विषाक्त निकल जाते हैं। यही वजह है कि यूरीन से हल्की सी बदबू भी आती है, लेकिन जब आपके यूरीन से अचानक से बहुत बदबू आने लग जाए तो इसके कई कारण हो सकते हैं।
डिहाइड्रेशन के कारण
शरीर के लिए पानी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि शरीर के हर हिस्से में पानी होता है चाहे वह हड्डी ही क्यों न हो। हमें नियमित रूप से 10 से 12 गिलास पानी पीने की सलाह दी जाती है। लेकिन जरूरत के अनुसार यह मात्रा कम या अधिक भी हो सकती है। आप पर्याप्त पानी पी रहे हैं या नहीं इसकी पहचान आप अपने पेशाब के रंग से जा सकते हैं, अगर पेशाब का रंग सामान्य है तो आप पानी पर्याप्त मात्रा में ले रहे हैं। लेकिन अगर पेशाब का रंग पीला है और इससे बदबू भी आ रही है तो समझ जायें कि आपके अंदर पानी की कमी है।



कुछ आहारों से

कुछ आहार ऐसे हैं जिनका सेवन करने से आपके पेशाब से अजीब तरह की बदबू आने लगती है। अधिक मसालेदार खाना हो या फिर खाने में प्याज, लहसुन, आदि का अधिक सेवन करने से से भी पेशाब बदबूदार हो जाता है। अगर आप एल्कोहल का सेवन करते हैं तो इसकी दुर्गंध आपके पेशाब से आयेगी।
यूटीआई होने से
यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन एक ऐसी बीमारी है जिसके कारण महिलाओं के पेशाब से अजीब तरह की बदबू आती है। यूटीआई एक तरह का संक्रमण है जो पेशाब की थैली में होता है। यूटीआई होने पर पेशाब से बदबू आती है साथ पेशाब में जलन भी होने लगती है। इसलिए अगर आपके पेशाब में बदबू आ रही है तो चिकित्सक से संपर्क करें, कहीं आपको यूटीआई तो नहीं।
डायबिटीज का अंदेशा
मधुमेह ऐसी बीमारी है जो एक बार हो जाये तो जीवनभर साथ निभाती है। मधुमेह ब्लड में शुगर की मात्रा अधिक होने से होती है। मधुमेह का संकेत देने वाले लक्षणों में से एक लक्षण यह भी है। किडनी से जब अधिक मात्रा में शुगर का स्राव होने लगता है तब अजीब बदबू आने लगती है। यह मधुमेह का इशारा है इसे समझें और तुरंत इसका उपचार करायें।



सफाई न करने के कारण

अगर आप अपने गुप्तांगों की सफाई पर ध्यान नहीं दे रही हैं तो संभल जायें। इसके कारण कई तरह के संक्रमण हो सकते हैं जो कि धीरे-धीरे खतरनाक हो सकते हैं। अगर आपने समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया तो इसके कारण ओवेरियन कैंसर भी हो सकता है।
आनुवांशिक बीमारी
कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो परिवार की देन होती हैं और आप चाहे जितना बचाव करें आप उनकी गिरफ्त में आ ही जाते हैं। महिलाओं को ऐसी ही एक समस्या होती है – ट्राइमेथीलेमिनुरिया। इस बीमारी में आप कितना भी सफाई रखें, खानपान का कितना भी ध्यान रखें, इसके कारण पेशाब से अजीब बदबू आयेगी ही। इसके कारण माहवारी अनियमित हो सकती है।
*आप अल्कोहल या कॉफी का अधिक सेवन करते हैं तो यह आपके लिए समस्या का कारण बन सकते है क्योंकि इनके अधिक सेवन से पेशाब से इन्हीं के जैसी गंध आने लगती है|इसमें कोई संसय होना ही नही चाहिए|
गर्भवती होना
गर्भावस्था के शुरूआती दिनों यानी गर्भधारण करने के कुछ दिनों बाद महिला को इस बात का पता नहीं चला पाता कि वह गर्भवती है। गर्भावस्था के लक्षण यूरीन के जरिये भी मिल जाता है। अगर आपके पेशाब से अजीब तरह की बदूब आने लगी है तो किट से जांचें कि कहीं आप गर्भवती तो नहीं हैं।



यौन संक्रमण

एसटीडीज यानी यौन संक्रमण बीमारियां बहुत खतरनाक और जानलेवा भी हो सकती हैं। यौन संक्रमित बीमारी का निदान अगर आपके अंदर नहीं हुआ है और आपके पेशाब से अजीब बदबू आ रही है तो आपको यौन संक्रामित संक्रमण हो सकता है। क्लैमाइडिया यौन संक्रामित बीमारी का एक ऐसा प्रकार है जिसके कारण यूरीन से बदबू आने लगती है।
कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो परिवार की देन होती हैं और आप चाहे जितना बचाव करें आप उनकी गिरफ्त में आ ही जाते हैं|महिलाओं को ऐसी ही एक समस्या होती है – ट्राइमेथीलेमिनुरिया|इस बीमारी में आप कितना भी सफाई रखें, खानपान का कितना भी ध्यान रखें, इसके कारण पेशाब से अजीब बदबू आयेगी ही|इसके कारण माहवारी अनियमित हो सकती है|

Monday, July 10, 2017

ब्राह्मी बूटी के अद्भुत फायदे //Wonderful Benefits of Bacapa monnieri



    ब्राह्मी मस्तिष्क, सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह, खून की खराबी, खांसी, पित्त, सूजन, गले, दिल, मानसिक रोग जैसे पागलपन, कब्ज, गठिया, याददाश्त, नींद, तनाव, बालों आदि रोगो के लिए बेहतरीन औषिधि हैं।
ब्राह्मी का प्रभाव मुख्यतः मस्तिष्क पर पडता है। यह मस्तिष्क के लिए एक पौष्टिक टॉनिक तो है ही साथ ही यह मस्तिष्क को शान्ति भी देती है। लगातार मानसिक कार्य करने से थकान के कारण जब व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है तो ब्राह्मी का आश्चर्यजनक असर होता है। ब्राह्मी स्नायुकोषों का पोषण कर उन्हें उत्तेजित कर देती है और हम पुनः स्फूर्ति का अनुभव करने लगते हैं।
सही मात्रा के अनुसार इसका सेवन करने से निर्बुद्ध, महामूर्ख, अज्ञानी भी श्रुतिधर (एक बार सुनकर जन्म भर न भूलने वाला) और त्रिकालदर्शी (भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य को जानने वाला) हो जाता है, व्याकरण को पढ़ने वाले अक्सर इस क्रिया को करते हैं। ब्राह्मी घृत, ब्राही रसायन, ब्राही पाक, ब्राह्मी तेल, सारस्वतारिष्ट, सारस्वत चूर्ण आदि के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। अग्निमंदता, रक्त विकार तथा सामान्य शोथ में यह तुरंत लाभ करती है। ब्राह्मी बुद्धि तथा उम्र को बढ़ाता है। यह रसायन के समान होती है। बुखार को खत्म करती है। सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह और खून की खराबी को दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजन को रोकती है। बैठे हुए गले को साफ करती है। ब्राह्मी का उपयोग दिल के लिए लाभदायक होता है। यह उन्माद (मानसिक पागलपन) को दूर करता है। ब्राह्मी कब्ज को दूर करती है।आइये जाने इसके बारे में।
   ब्राह्मी हरे और सफेद रंग की होती है। ब्राह्मी का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्धार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है। जो बहुत उत्तम किस्म का होता है। यह मुख्यतः जला सन्न भूमि में पाई जाती है इसलिए इसे जल निम्ब भी कहते हैं । विशेषतः यह हिमालय की तराई, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि में नदी नालों, नहरों के किनारे पाई जाती है । गंगा के किनारे बारहों महीने हरी-भरी पाई जाती है । इसका क्षुप फैलने वाला तथा मांसल चिकनी पत्तियाँ लिए होता है । पत्तियाँ चौथाई से एक इंच लम्बी व 10 मिलीमीटर तक चौड़ी होती है । ये आयताकार या सु्रवाकार होती है तथा काण्ड व शाखाओं पर विपरीत क्रम में व्यवस्थित रहती हैं । फूल नीले, श्वेत या हल्के गुलाबी होते हैं, जो पत्रकोण से निकलते हैं । फल लंबे गोल आगे से नुकीले होते हैं, जिनमें छोटे-छोटे बीज निकलते हैं । काण्ड अति कोमल होता है । इसमें छोटे-छोटे रोम होते हैं व ग्रंथियाँ होती हैं । ग्रन्थि से जड़ें निकल कर भूमि पकड़ लेती हैं, जिस कारण काण्ड 2 से 3 फुट ऊँचा होने पर भी छोटा व झुका हुआ दिखाई देता है । ब्राह्मी का पौधा पूरी तरह से औषधीय है। इसके तने और पत्तियां मुलायम, गूदेदार और फूल सफेद होते हैं। ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है। इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं। यह पौधा नम स्थानो में पाया जाता है, तथा मुख्यत: भारत ही इसकी उपज भूमि है।
    इसे भारत वर्ष में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे हिंदी में सफेद चमनी, संस्कृत में सौम्‍यलता, मलयालम में वर्ण, नीरब्राम्‍ही, मराठी में घोल, गुजराती में जल ब्राह्मी, जल नेवरी आदि, इसका वैज्ञानिक नाम बाकोपा मोनिएरी(Bacapa monnieri) है। इस पौधे में हायड्रोकोटिलिन नामक क्षाराभ और एशियाटिकोसाइड नामक ग्लाइकोसाइड पाया जाता है।
इसे बुद्धिवर्धक होने के कारण ‘ब्राह्मी’ नाम दिया गया है । मण्डूकपर्णी मण्डूकी से इसे अलग माना जाना चाहिए जो आकार में मिलते-जुलते हुए भी इससे अलग है ।
स्वभाव :
यह शीतल (ठंडी) होती है।
पहचान तथा मिलावट-
शुद्ध ब्राह्मी हरिद्वार के आसपास गंगा के किनारे सर्वाधिक होती है । यहीं से यह सारे भारत में जाती है । उसमें दो पौधों की मिलावट होती है ।
(१) मण्डूकपर्णी (सेण्टेला एश्याटिका) तथा बकोपा फ्लोरीबण्डा । गुण एक समान होते हुए भी मण्डूकपर्णी ब्राह्मी से कम मेद्य है और मात्र त्वचा के बाह्य प्रयोग में ही उपयोगी है ।
‘जनरल ऑफ रिसर्च इन इण्डियन मेडीसिन’ के अनुसार (डॉ. सिन्हा व सिंह) विस्तृत अध्ययनों ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि ‘बकोपा मोनिएरा’ ही शास्रोक्त गुणकारी है । ब्राह्मी के पत्ते मण्डूकपर्णी की अपेक्षा पतले होते हैं । पुष्प सफेद व नीलापन लिए होते हैं जब कि मण्डूकपर्णी के पुष्प रक्त लाल होते हैं । ब्राह्मी का सारा क्षुप ही तिक्त कड़वापन लिए होता है जबकि मण्डूकपर्णी का पौधा मात्र तीखा होता है तथा मसलने पर गाजर जैसी गंध देता है । सूखने पर मण्डूकपर्णी के सभी गुण प्रायः जाते रहते हैं । जबकि ब्राह्मी का हरा या हरा-भरा रंग का सूखा चूर्ण एक वर्ष तक इसी प्रकार प्रयोग किया जा सकता है ।
संग्रह  संरक्षण कालावधि-
गंगादि पवित्र नदियों के किनारे पायी जानेवाली ब्राह्मी वस्तुतः गुणकारी होती है । इसकी पत्तियों को छाया में सुखाकर पंचांग का चूर्ण कर बोतल में बंद करके रखना चाहिए । इसे एक वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है ।
गुण कर्म संबंधी विभिन्न मत-महर्षि चरक के अनुसार ब्राह्मी मानस रोगों की एक अचूक गुणकारी औषधि है ।
सुश्रुत संहिता के अनुसार ब्राह्मी का उपयोग मस्तिष्क विकृति, नाड़ी दौर्बल्य, अपस्मार, उन्माद एवं स्मृति नाश में किया जाना चाहिए ।
भाव प्रकाश के अनुसार ब्राह्मी मेधावर्धक है ।
श्री खोरी एवं नादकर्णी ने इसे एक प्रकार का नर्वटॉनिक माना है । उनके अनुसार ब्राह्मी पंचांग का सूखा चूर्ण रोगियों को देने पर मानसिक कमजोरी, तनाव तथा घबराहट एवं अवसाद की प्रवृत्ति में लाभ हुआ । पागलपन तथा मिर्गी के लिए डॉ. नादकर्णी ब्राह्मी पत्तियों का स्वरस घी में उबाल कर दिए जाने पर पूर्ण सफलता का दावा करते हैं । हिस्टीरिया जैसे मनोरोगों में ब्राह्मी तुरंत लाभ करती है तथा सारे लक्षण तुरंत मिट जाते हैं । सिर दर्द, चक्कर, भारीपन तथा चिंता में ब्राह्मी तेल का प्रयोग कई वैज्ञानिकों ने बताया है । सी.एस.आई.आर. द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ग्लासरी ऑफ इण्डियन मेडीसिन प्लाण्ट्स’ में ब्राह्मी को पागलपन व मिर्गी की औषधि बताया गया है ।
वनौषधि चन्द्रोदय’ के विद्वान लेखक के अनुसार ब्राह्मी की मुख्य क्रिया मस्तिष्क और मज्जा तंतुओं पर होती है । मस्तिष्क को शांति देने के अतिरिक्त यह एक पौष्टिक टॉनिक का काम भी करती है । मस्तिष्कीय थकान से जब व्यक्ति की कार्य क्षमता घट जाती है तो ब्राह्मी के घटक स्नायु कोषों का पोषण कर उत्तेजित करते हैं तथा मनुष्य स्फूर्ति का अनुभव करता है । अपस्मार के रोगों में वे विद्युतीय स्फुरणा के लिए उत्तरदायी केन्द्र का शमन करते हैं । स्नायुकोषों की उत्तेजना कम होती है व धीरे-धीरे मिर्गी के दौरों की दर घटते-घटते नहीं के बराबर हो जाती है । उन्माद में भी यह इसी प्रकार काम करती है । दो परस्पर विरोधी मनोविकारों पर विरोधी प्रकार के प्रभाव इस औषधि की विलक्षणता है । उसे सरस्वती पत्रकों का घटक मानकर इसी कारण मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए चिर पुरातन काल से प्रयुक्त किया जा रहा है ।होम्योपैथी मतानुसार एकान्त को अधिक पसंद करने वाले अवसाद ग्रस्त व्यक्तियों को ब्राह्मी व मण्डूकपर्णी दोनों ही लाभ करते हैं । चक्कर, नाड़ियों में खिंचाव, सिर दर्द में ब्राह्मी का प्रभाव अधिक होता पाया गया है । यूनानी चिकित्सा में इसे ‘वाष्पन’ नाम दिया गया है । इसका प्रधान प्रयोग मस्तिष्क व नाड़ी बलवर्धक के रूप में है ।



आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोग निष्कर्ष-

ब्राह्मी की प्रख्यात मेधावर्धक शकित पर प्रायोगिक रूप से विशद अध्ययन हुआ है । वैज्ञानिक बताते हैं कि इससे डायजेपाम औषधि समूह की तरह सोमनस्यकारक-तनावनाशक गुण है । इण्डियन जनरल ऑफ मेडिकल रिसर्च में डॉ. मल्होत्रा और दास (40, 290, 1951) लिखते हैं कि ब्राह्मी का सारभूत निष्कर्ष प्रायोगिक जीवों पर शामक प्रभाव डालता है । इसी प्रभाव को बाद में अन्य वैज्ञानिकों ने भी प्रमाणित किया । ब्राह्मी की इस शामक सामर्थ्य की तुलना में प्रचलित एलोपैथिक औषधि ‘क्लोरप्रोमाजीन’ से की गई है । इससे न केवल तनाव समाप्त होकर प्रसन्नता का भाव आता है, अपितु सीखने की क्षमता भी बढ़ जाती है । व्यक्ति की संवेदना तंतुओं से ब्राह्म संदेशों को ग्रहण करने की सामर्थ्य में अप्रतिम वृद्धि होती है ।
ब्राह्मी का एक रासायनिक घटक हर्सेपोनिन सीधे पीनियल ग्रंथि पर प्रभाव डालकर ‘सिरॉटानिन’ नामक न्यूरोकेमीकल का उत्सर्ग कर सचेतन स्थिति को बढ़ाता है । यह हारमोन मस्तिष्कीय क्रियाओं के लिए अनिवार्य माना जाता है ।
ब्राह्मी का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रभाव है इसका आक्षेपहर एण्टीकन्वल्सेण्ट-मिर्गीनाशक होना । डॉ. डे और डॉ. चटर्जी के अनुसार इस औषधि के घटक सीधे विद्युत्सक्रिय उत्तेजक केन्द्र तक जाकर उसे शांत करते हैं तथा अन्य स्नायुओं को उत्तेजित होने से रोकते हैं । इस क्रिया के लिए उत्तरदायी केमिकल प्रक्रिया की अवधि को यह बढ़ा देता है । प्रायोगिक जीवों में सेमीकार्बाजाइड के आक्षेपजनक एवं मारक प्रभावों को यह पूर्णतया शांत कर देती है । इनके अतिरिक्त सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए उत्तरदायी विभिन्न स्नायु तंतुओं के केन्द्रकों से संबंध को यह सशक्त बनाती है । इस प्रकार मेधावर्धन-स्मृतिवर्धन में सहायता करती है । साइको सीमेटिक रोगों में तो यह हाइपोथेलेक्स के स्तर पर कार्य कर चक्र को ही तोड़ देती है । इस प्रकार वैज्ञानिक प्रयोग इसे सर्वश्रेष्ठ बहुमुखी स्नायु संस्थान के रोगों की औषधि सिद्ध करते हैं ।
;अनिद्रा
अनिद्रा में ब्राह्मी चूर्ण 3 माशा (3 ग्राम) गाय के दूध के साथ देते हैं अथवा ब्राह्मी के ताजे 20-25 पत्रों को साफ गाय के आधा सेर दूध में घोंट छानकर 7 दिन तक देते हैं । वर्षों पुराना अनिद्रा रोग इससे ठीक हो जाता है ।
निद्राचारित या नींद में चलना :-
ब्राह्मी, बच और शंखपुष्पी इनको बराबर मात्रा में लेकर ब्राह्मी के रस को 12 घंटे छाया में सुखाकर और 12 घंटे धूप में रखकर पूरी तरह से सुखाकर इसका चूर्ण तैयार कर लें। लगभग 480 मिलीग्राम से 960 मिलीग्राम सुबह और शाम को समान मात्रा में घी और शहद के साथ मिलाकर नींद में चलने वाले रोगी को देने से उसका स्नायु तंत्र मजबूत हो जाता है। इसका सेवन करने से नींद में चलने का रोग दूर हो जाता है।
चिन्ता तथा तनाव
चिन्ता तथा तनाव में ठंडाई के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है, इसके अतिरिक्त किसी बीमार या अन्य बीमारी के कारण आई निर्बलता के निवारण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कुष्ठ और चर्म रोगों में भी यह उपयोगी है। खांसी तथा गला बैठने पर इसके रस का सेवन काली मिर्च तथा शहद के साथ करना चाहिए। यूनानी चिकित्सक इसका माजूम बनाकर खिलाते हैं, पर सर्वश्रेष्ठ स्वरूप चूर्ण का मधु के अनुपान के साथ सेवन है ।
बालों के लिए : –
100 ग्राम ब्राह्मी की जड़, 100 ग्राम मुनक्का और 50 ग्राम शंखपुष्पी को चौगुने पानी में मिलाकर रस निकाल लें। इस रस का सेवन करने से बालों के सभी रोग दूर हो जाते हैं।



मिर्गी में अपस्मार में :-

मिर्गी तथा उन्माद में भी यह बहुत लाभकारी होती है । मिरगी के दौरों में यह विद्युत स्फुरण के लिए उत्तरदायी केन्द्र को शांत करते हैं इससे स्नायुकोषों की उत्तेजना कम होती है तथा दौरे धीरे धीरे घटते हुए लगभग बिल्कुल बंद हो जाते हैं । ब्राह्मी के स्वरस 1/2 चम्मच मधु के साथ अथवा चूर्ण को मधु के साथ दिया जाता है । प्रारंभ में ढाई ग्राम एवं प्रभाव न होने पर पाँच ग्राम तक दिया जा सकता है । मिर्गी के रोग में ब्राह्मी (जलनीम) से निकाले गये घी का सेवन करने से लाभ होता है। ब्राह्मी, कोहली, शंखपुष्पी, सांठी, तुलसी और शहद को मिलाकर मिर्गी के रोगी को पिलाने से मिर्गी से छुटकारा मिल जाता है।
अवसाद उदासीनता सुस्ती :-
लगभग 10 ग्राम ब्राह्मी (जलनीम) का रस या लगभग 480 से 960 मिलीग्राम चूर्ण को लेने से उदासीनता, अवसाद या सुस्ती दूर हो जाती है।



बच्चों की स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए

बच्चों की स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए सौ ग्राम की मात्रा में ब्राह्मी, पचास ग्राम की मात्रा में शंखपुष्पी के साथ चार गुना पानी मिलाकर इसका अर्क निकाल लें और नियमित प्रयोग करें। बस ध्यान रहे कि खट्टी चीजें न खाएं आपको जल्द ही फायदा होगा।
हकलाना, तुतलाना :-ब्राह्मी घी 6 से 10 ग्राम रोजाना सुबह-शाम मिश्री के साथ खाने से तुतलाना (हकलाना) ठीक हो जाता है। जन्मजात तुतलाने में भी ब्राह्मी सफलता पूर्वक कार्य करती पायी गई है ।
बुद्धिवैकल्प, बुद्धि का विकास कम होना : –
ब्राह्मी, घोरबच (बच), शंखपुष्पी को बराबर मात्रा में लेकर ब्राह्मी रस में तीन भावनायें (उबाल) देकर छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और रोजाना 1 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम को असमान मात्रा में घी और शहद के साथ मिलाकर काफी दिनों तक चटाने से बुद्धि का विकास हो जाता है।
पागलपन (उन्माद) में :-
*6 मिलीलीटर ब्राह्मी का रस, 2 ग्राम कूठ का चूर्ण और 6 ग्राम शहद को मिलाकर दिन में 3 बार पीने से पुराना उन्माद कम हो जाता है। 3 ग्राम ब्राह्मी, 2 पीस कालीमिर्च, 3 ग्राम बादाम की गिरी, 3-3 ग्राम मगज के बीज तथा सफेद मिश्री को 25 गाम पानी में घोंटकर छान लें, इसे सुबह और शाम रोगी को पिलाने से पागलपन दूर हो जाता है।
*3 ग्राम ब्राह्मी के थोड़े से दाने कालीमिर्च के पानी के साथ पीसकर छान लें। इसे दिन में 3 से 4 बार पिलाने से भूलने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
*ब्राह्मी के रस में कूठ के चूर्ण और शहद को मिलाकर चाटने से पागलपन का रोग ठीक हो जाता है।
*ब्राह्मी की पत्तियों का रस तथा बालवच, कूठ, शंखपुष्पी का मिश्रण बनाकर गाय के पुराने घी के साथ सेवन खांसी, पित्त बुखार और पुराने पागलपन
3 ग्राम ब्राह्मी, 3 ग्राम शंखपुष्पी, 6 ग्राम बादाम गिरी, 3 ग्राम छोटी इलायची के बीज को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को थोड़े-से पानी में पीसकर, छानकर मिश्री मिलाकर पीने से खांसी, पित्त बुखार और पुराने पागलपन में लाभ मिलता है।
हिस्टीरिया
हिस्टीरिया जैसे रोगों में यह तुरन्त प्रभावी होती है। 10-10 ग्राम ब्राह्मी और वचा को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुबह और शाम 3-3 ग्राम की मात्रा में त्रिफला के जल से खाने पर हिस्टीरिया के रोग में बहुत लाभ होता है।
;बल्य रसायन
ब्राह्मी बल्य रसायन भी है इसलिए किसी भी प्रकार की गंभीर व्याधि ज्वर आदि के बाद निर्बलता निवारण के लिए इसका प्रयोग कर सकते हैं ।
कमजोरी :-
40 मिलीलीटर केवांच की जड़ का काढ़ा सुबह-शाम सेवन करने से स्नायु की कमजोरी मिट जाती है। इसके जड़ का रस अगर 10-20 मिलीलीटर सुबह-शाम लिया जाए तो भी कमजोरी में लाभ होता है।
धातु क्षय (वीर्य का नष्ट होना)
15 ब्राह्मी के पत्तों को दिन में 3 बार सेवन करने से वीर्य के नष्ट होने का रोग कम हो जाता है। ब्रह्मी, शंखपुष्पी, खरैटी, ब्रह्मदंडी तथा कालीमिर्च को पीसकर खाने से वीर्य रोग दूर होकर शुद्ध होता है।
पेशाब करने में कष्ट होना (मूत्रकृच्छ)
ब्राह्मी के 2 चम्मच रस में, 1 चम्मच मिश्री मिलाकर सेवन करने से पेशाब करने की रुकावट दूर हो जाती है। 4 मिलीलीटर ब्राह्मी के रस को शहद के साथ चाटने से मूत्ररोग में लाभ होता है।
आंखों की बीमारी में
3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों को घी में भूनकर सेंधानमक के साथ दिन में 3 बार लेने से आंखों के रोग में लाभ होता है।
दिमाग की स्फूर्ति :-
ब्राह्मी और बादाम की गिरी की एक भाग ,काली मिर्च का चार भाग लेकर इनको पानी में घोटकर छोटी- छोटी गोली बनाकर एक-एक गोली नियमित रूप से दूध के साथ सेवन करने पर दिमाग की स्फूर्ति बनी रहती है।
स्मरण शक्ति वर्द्धक : –
10 मिलीलीटर सूखी ब्राह्मी का रस, 1 बादाम की गिरी, 3 ग्राम कालीमिर्च को पानी से पीसकर 3-3 ग्राम की टिकिया बना लें। इस टिकिया को रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ रोगी को देने से दिमाग को ताकत मिलती है। ब्राह्मी के ताजे रस और बराबर घी को मिलाकर शुद्ध घी में 5 ग्राम की खुराक में सेवन करने से दिमाग को ताकत प्रदान होती है।
याददाश्त, स्मृति दौर्बल्य तथा अल्पमंदता
याददाश्त, स्मृति दौर्बल्य तथा अल्पमंदता में ब्राह्मी स्वरस अथवा चूर्ण पानी के साथ या मिश्री के साथ देते हैं । एक सेर नारियल के तल में 15 तोला ब्राह्मी स्वरस मिलाकर उबालने पर ब्राह्मी तेल तैयार हो जाता है । इसकी मालिश करने से मस्तिष्क की निर्बलता व खुश्की दूर होती है तथा बुद्धि बढ़ती है ।
दिल की धड़कन
20 मिलीलीटर ताजी ब्राह्मी का रस और 5 ग्राम शहद को मिलाकर रोजाना सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होकर तेज धड़कन भी सामान्य हो जाती है। हृदयाघात के बाद दुर्बलता निवारण हेतु यह एक श्रेष्ठ टॉनिक है।
उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर)
ब्राह्मी के पत्तों का रस एक चम्मच की मात्रा में आधे चम्म्च शहद के साथ लेने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है।
कुष्ठ तथा अन्य चर्म रोगों में
वाह्य प्रयोगों में तेल के अतिरिक्त इसे कुष्ठ तथा अन्य चर्म रोगों में भी प्रयुक्त करते हैं
खांसी व् गले के रोग
खाँसी व गला बैठ जाने पर इसके स्वरस का काली मिर्च व मधु के साथ सेवन करते हैं । विभिन्न प्रकार के विषों तथा ज्वर में यह लाभ पहुँचाती है । उदासी निराशा भाव तथा अधिक बोलने से उत्पन्न हुए स्वर भंग में भी ब्राह्मी लाभकारी होती है ।
खसरा :
ब्राह्मी के रस में शहद मिलाकर पिलाने से खसरा की बीमारी समाप्त होती है।
पीनस : –
मण्डूकपर्णी की जड़ को नाक से लेने से पीनस (पुराना जुकाम) के रोग में लाभ होता है।
दांतों के दर्द :
दांतों में तेज दर्द होने पर एक कप पानी को हल्का गर्म करें। फिर उस पानी में 1 चम्मच ब्राह्मी डालकर रोजाना दो बार कुल्ला करें। इससे दांतों के दर्द में आराम मिलता है।
एड्स : –
ब्राह्मी का रस 5 से 10 मिलीलीटर अथवा चूर्ण 2 ग्राम से 5 ग्राम सुबह शाम देने से एड्स AIDS में लाभ होता है क्योंकि यह गांठों को खत्म करता है और शरीर के अंदर गलने को रोकता है। निर्धारित मात्रा से अधिक लेने से चक्कर आदि आ सकते हैं।
गठिया
इसके पत्‍ते के रस को पेट्रोल के साथ मिलाकर लगाने से गठिया दूर करती है। ब्राह्मी में रक्‍त शुद्ध करने के गुण भी पाये जाते है।
बालों से सम्बंधित रोग
यदि आपको बालों से सम्बंधित कोई समस्या है जैसे बाल झड़ रहे हों तो परेशान न हों बस ब्राह्मी के पांच अंगों का यानी पंचाग का चूर्ण लेकर एक चम्मच की मात्रा में लें और लाभ देखें।
खाँसी व छुटपन के क्षय रोग में
बच्चों की खाँसी व छुटपन के क्षय रोग में इसका गरम लेप छाती पर किया जाता है । बालकों के सांस और बलगम में ब्राह्मी को थोड़ा-सा गर्म करके छाती पर लेप करने से लाभ होता है।
ब्राह्मी तेल
तेल बनाने के लिए 1 लीटर नारियल तेल में लगभग 15 तोला ब्राह्मी का रस उबाल लें . यह तेल सिरदर्द, चक्कर, भारीपन, चिंता आदि से भी राहत दिलाता है .
हानिकारक प्रभाव :
ब्राह्मी का अधिक मात्रा में सेवन करने से सिर दर्द, घबराहट, खुजली, चक्कर आना और त्वचा का लाल होना यहां तक की बेहोशी भी हो सकती है। ब्राह्मी दस्तावर (पेट को साफ करने वाला) होता है। अत: सेवन में सावधानी बरतें और मात्रा के अनुसार ही सेवन करें।
हानिकारक प्रभाव मिटाने के उपाय :
ब्राह्मी के दुष्प्रभाव को मिटाने के लिए आप सूखे धनिये का प्रयोग कर सकते हैं।
दोषों को दूर करने वाला : 
दूध और वच इसके गुणों को सुरक्षित रखते हैं एवं इसमें व्याप्त दोषों को दूर करते हैं।
सामान्यतया मानस रोगों के लिए ही प्रयुक्त यह औषधि अब धीरे-धीरे बलवर्धक रसायन के रूप में भी मान्यता प्राप्त करती जा रही है । यह हर दृष्टि से हर वर्ग के लिए हितकर है तथा प्रकृति का मनुष्य को एक श्रेष्ठ अनुदान है । किसी न किसी रूप में इसका नियमित सेवन किया जाए तो हमेशा स्फूर्ति से भरी प्रफुल्ल मनःस्थिति बनाए रखती है ।

Sunday, July 9, 2017

सुबह जल्दी उठने के अद्भुत लाभ // Wonderful benefits of waking up early in the morning



ये तो सभी जानते हैं कि सुबह जल्दी उठना चाहिए या सुबह उठना अच्छा होता है, पर क्या आप जानते हैं की सुबह जल्दी उठने से कितने फायदे होते हैं शायद नहीं कई लोग तो सुबह जल्दी उठते ही नहीं हैं सुबह जल्दी न उठना बहुत गलत बात हैं इससे हमें कई नुकसान हो सकते हैं.
अच्छे हेल्थ के लिए रात को जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना अच्छा माना जाता है। लेकिन, आज के समय और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं। हालाँकि, अगर आप सुबह जल्दी उठते हैं तो आपकी पूरी दिनचर्चा सही और समय पर होती है। इसके साथ ही आपका दिमाग तेज होता है, और काम करने के बाद भी आपको थकान का एहसास नहीं होता है।
ऐसे में सुबह उठने के कुछ नायाब फायदे हैं, जो निम्न हैं-



मानसिक विकास-

 इस समय व्यायाम, वॉक, जॉगिंग या स्विमिंग कर सकते हैं। क्योंकि, इस समय ताजी हवा और सूर्य की पहली किरणें सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। ऐसे में सुबह के समय उठने से आपके अंदर ऊर्जा का संचार होता है, जो आपके शारीरिक और मानसिक विकास को बढ़ावा देने में आपकी मदद करता है।
तनाव से मुक्ति-
 सुबह जल्दी उठने से आपको पूरे दिन में आराम करने का भी समय मिलता है। साथ ही आप अपने परिवार वालों या दोस्तों के साथ समय बिता सकते हैं। इसके अलावा यदि आप चाहें तो गार्डनिंग या वह काम करें जो आपको बहुत पसंद हो। ऐसा करने से आप पूरा दिन तनाव से दूर रहेंगे।
प्लानिंग करें-
 अपने पूरे दिन की चेकलिस्ट बनाएं जिसमें आप दिन भर में क्या करने वाले हैं वह लिखें। इससे आप को अपने दिन की प्लानिंग ही नहीं बल्कि किसी जरुरी चीज को याद रखने में भी आपको मदद मिलेगी।
ऊर्जा का स्तर (Energy level) –
अक्सर हमने देखा होगा कि दिन सुरु होते जो ऊर्जा होती है वो शाम के समय नहीं होती। इसलिए अगर आप सुबह जल्दी उठकर अपने दिन की शुरुवात करते हैं तो आपका पूरा दिन ऊर्जावान रहेगा और आप अपने सभी काम अच्छे से पुरे कर पाएंगे.



देश-दुनिया पर नज़र रखें- 
सुबह उठने का एक फायदा यह भी होता है कि आपको अखबार पढ़ने का टाइम मिल जाता है, जिससे कि आप देस-दुनिया में क्या चल रहा है उससे अवगत होते हैं। क्योंकि आज के समय में किसी भी व्यक्ति का इन्फॉर्मटिव होना बहुत जरूरी होता है।
शरीर में ताजगी- 



जल्दी उठने से शरीर में ताजगी बनी रहती है, क्योंकि इस समय वातावरण बिल्कुल शुद्ध और शांत होता है। इतना ही नहीं यह हमारे शारीरिक और मानशिक विकास दोनों के लिए फायदेमंद होता है।
ऐसे में यदि आप आप चुस्त-दुरूस्त रहना चाहते हैं तो आपको सुबह जल्दी उठने की आदत डालनी चाहिए।
समय (Time) –
आप सुबह जल्दी उठे ही अपने सभी काम समय पर पुरे कर लेते हैं, जिससे आपको ऑफिस या स्कूल जाने में देरी नहीं होती और आप आराम से जा सकते हैं. अगर आप सुबह जल्दी उठते हो तो आपका टाइम टेबल कभी नहीं बिगड़ेगा।

ठंडे पानी से नहाने के फ़ायदे// Benefits of bathing with cold water




    डॉक्टरों के अनुसार हमें सर्दियों में भी गर्म पानी से नहीं नहाना चाहिए। हाँ, सर्दी में हमें रोज नहाना चाहिए। ठण्डे पानी से और वह भी जल्दबाजी में नहीं। यह जरूरी नहीं कि पानी बर्फीला ठण्डा हो। सामान्य नल के पानी से नहाया जा सकता है। हम देखते हैं कि हमारे अनेक मेले तथा पवित्र स्नान पर्व सर्दियों में ही पड़ते है। शुरू में तो हम में से अधिकतर लोगों को ठण्डे पानी से नहाने का नाम लेने से ही कँपकँपी महसूस होने लगेगी लेकिन यदि हम ठण्डे पानी से नहाना शुरू करें तो शीघ्र ही ठण्डे पानी से लगने वाला भय दूर हो जाएगा।
स्नान विधि – 
ठण्डे पानी से स्नान करने का आसान तरीका यह है कि पहले सिर पर पानी डालें। नदियों में स्नान करते हुए लोग पहले अपने सिर को पानी में डुबोते हैं, अक्सर आपने ऐसा देखा होगा। ठण्डे पानी से नहाते समय पहले सिर को गीला करने से सिर की गर्मी सारे शरीर में से होती हुई पैरों से निकल जाती है लेकिन पहले पैर और लातें भिगोने से या शरीर का निचला भाग भिगोने से शरीर की गर्मी सिर से निकलती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से ऐसा नहीं होने देना चाहिए।
    नहाने में जल्दबाजी भी नहीं करनी चाहिए। अपनी हथेलियों से अपने शरीर में विभिन्न अंगों को रगड़ना चाहिए। इस प्रकार स्नाना का पूरा लाभ उठाना चाहिए। शरीर के विभिन्न अंगों को रगड़ने से हमारे शरीर में स्थित छिद्रों में गतिशीलता आती है और वे खुलते हैं। इन छिद्रों से काफी मात्रा में पसीना और अन्य मैल बाहर निकलता है। अपने हाथों से शरीर को रगड़ने के बाद साफ सूखे तौलिये से शरीर को रगड़ें। तौलिए से बदन पौंछने का मतलब केवल यही नहीं है कि हम अपने शरीर से पानी पौंछे बल्कि तौलिए से त्वचा को अच्छी तरह से रगड़ना भी है।
ठण्डे पानी से स्नान करने के फौरन बाद हमें गर्म कपड़े पहन लेने चाहिए क्योंकि ठण्डे पानी
से स्नान के बाद हमारा शरीर गर्म हो जाता है, ऐसे में ठण्डी हवा का झोंका हमारे शरीर को नुकसान दे सकता है।



लाभ –

ठण्डे पानी से नहाने में हमें अनेक लाभ हैं जो गर्म पानी से नहाने में हमें प्राप्त नहीं हो पाते। गर्म पानी से नहाने से पूर्ण रूप से संतुष्टि नहीं होती और गर्म पानी समाप्त होते ही कँपकँपी शुरू हो जाती है। इसके अतिरिक्त नियमित रूप से गर्म पानी से नहाने से हमारी ऊपरी त्वचा पर रक्त का संचालन कम हो जाता है। गर्म पानी से नहाने से हमारे शरीर की बाहरी त्वचा की ऊपरी सतह तक रक्त का संचालन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त बाहरी त्वचा के समीप हमारे शरीर की रक्त कोशिकायें भी कमजोर पड़ जाती है। जबकि ठण्डे पानी से स्नान करने से वे मजबूत होती है। जब हमारे शरीर की बाहरी त्वचा ठण्डे पानी के सम्पर्क में आती है तो हमारी त्वचा सिकुड़ती है। इस प्रकार तापक्रम के अंत के कारण त्वचा के संकुचित होने से इसके आराम मिलता है और इससे त्वचा की मालिश होने जैसा प्रभाव उत्पन्न होता है। कभी-कभी गुनगुनें पानी में स्नान कर लेना ठीक रहता है लेकिन इसकी नियमित आदत नहीं बना लेनी चाहिए।
नहाने के लिए जब हम ठण्डे पानी का प्रयोग करते हैं तो हमारे शरीर में रक्त का संचालन तेजी से होने लगता है। यह हम नहाते हुए महसूस भी कर सकते हैं मजेदार बात तो यह है कि जब ठण्डे पानी से नहाते हैं तो हमारा शरीर एक प्रकार की भीतरी गर्भी महसूस करता है। ऐसा हमारे शरीर में रक्त संचार तेजी से होने के कारण होता है।
जो लोग ठण्डे पानी से नहाते हैं उन्हें बुत कम ही बीमार होते देखा गया है। ठण्डे पानी से नहाने से आदमी बीमार नहीं होता। हाँ, ठण्डे पानी से स्नान करना उस व्यक्ति के लिए हानिकारक हो सकता है जो कि पहले से ही बीमार चल रहा हो। जो लोग सर्दियों में नियमित रूप से नदी में या ठण्डे पानी से स्नान करते हैं वे लोग अन्य लोगों के मुकाबले अधिक हष्ट पुष्ट पाए जाते है|
पुरुष प्रजनन क्षमता
शायद बहुत ही कम लोग इस तथ्य को जानते होंगे कि, ठंडे से पानी से स्नान करना पुरुषों में प्रजनन क्षमता को बढ़ा सकता है। वहीं दूसरी ओर गर्म पानी से स्नान करने से अंडकोष पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि संभवतः गर्म पानी से नहाना शुक्राणुओं की संख्या कम कर सकता है। यदि आप घर में नए बच्चे को लाने की तैयारी कर रहे हैं तो ठंडे पानी से ही नहाएं



मूड को करे फ्रेश

सुबह को ठंडे पानी से नहाने से आलस तो दूर होता ही है, आप पूरे दिन तरो-ताजा भी महसूस करते हैं। एक शोध में ये बात सामने आई है कि ठंडे पानी से नहाने से मूड फ्रेश रहता है। दरअसल जब आप ठंडे पानी से नहाते हैं, तो हल्का सा शॉक जैसा लगा है जिससे आपकी सांसे तेज़ चलने लगती है और दिल की धड़कन भी थोड़ी बढ़ जाती हैं। इससे आपके शरीर कार रक्त प्रवाह बढ़ जाता है और आप तरोताज़ा महसूस करने लगते हैं।
* . ठंडे पानी के साथ नहाने से हमे अच्छी और गहरी नींद आती हैं ।* व्ययाम करने के बाद अगर हम ठंडे पानी के साथ नहाते हैं तो हम पूरा दिन तरोताजा रहते हैं।
* अगर आप के चेहरें पर पीपल्स होते हैं तो आप ठंडे पानी के साथ नहायें। कुछ ही दिनों में आप को फर्क लगने लगेगा और आप के चेहरे पर निखार आने लगेगा ।
* ठंडे पानी के साथ नहाने से हमारा मोटापा कम होता है।
*. ठंडे पानी दिमाग को ठंडा रखता हैं ।डे पानी के साथ नहाने से हमारा शरीर चुस्त रहता है।
* ठंडे पानी के साथ नहाने से आलस नहीं पड़ता। जिससे हम अपना काम तेज़ी से कर सकते हैं ।
* जब भी आप ठंडे पानी के साथ नहाते हो तो आप कि सांस तेज चलने लगती है जिसके साथ आप कि धड़कन भी तेज हो जाती हैं यही कारण है कि हमारे खून का रक्त संचार तेजी से काम करता हैं। इससे कई बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है।
* ठंडे पानी के साथ नहाने से रक्त साफ़ होता है जिससे आप के चेहरे पर निखार बना रहता हैं ।
* ठंडे पानी के साथ बाल साफ़ करने से बाल काले और घने होते हैं ।
*ठंडे पानी के साथ नहाने से खुजली और जलन दूर होती हैं ।अगर कही जलन हो तो ठंडे पानी का इस्तेमाल करना चाहिए ।
इम्युनिटी और रक्तसंचार होता है बेहतर
ठंडे पानी से नहाने से रक्तसंचार तो अच्छा रहता ही है, साथ ही ठंडे पानी से आपकी इम्युनिटी अर्थात प्रतिरक्षा प्रणाली भी मजबूत होती है। इम्युनिटी के मज़बूत होने से शरीर में वाइट ब्लड सेल्स बढ़ती हैं जो कई प्रकार की बिमारियों से लड़ने में मदद करती हैं।



मोटापा करे कम

हमारे शरीर में दो तरह का फैट होता है, पहला वाइट फैट जो शरीर के लिए बुरा होता है और दूसरा होता है ब्राउन फैट जो शरीर के लिए अच्छा होता है। वाइट फैट वह फैट है जिसे हम अपने भोजन में खाते हैं, यह हमारे शरीर के कई हिस्सों में जमा हो जाता है। विशषज्ञों के मुताबिक जब हम बहुत ज्यादा ठंडे पानी से नहाते हैं तो हमारी कैलोरी बर्न होने लगती है और हम व जन कम कर पाते हैं।
ठंडे पानी के साथ नहाने के नुकसान
ठंडे पानी के साथ नहाने से अगर हमें कई तरह के फायदे मिलते हैं तो हमें कई तरह के नुकसान भी होते है जो कुछ इस तरह से हैं।
1. जब आप बीमार होते हो और आप ठंडे पानी के साथ नहा लेते हो तो आप का बुख़ार और तेज हो सकता है।
2. जुकाम होने पर अगर आप ठंडे पानी के साथ नहाते हो तो आप का जुकाम जाम हो सकता है।
3. सर्दियों के दिनों में अगर हम ठंडे पानी के साथ अपने बाल साफ़ करते है तो वो अच्छे से साफ़ नहीं होते जिसके कारण बाल कमज़ोर होने लगते हैं और काफी मात्रा में बाल झड़ जाते हैं।
4. सर्दियों में अगर हम बच्चों को ठंडे पानी के साथ नहलाते हैं तो वो बीमार हो जाते हैं। इसलिए बच्चों को सर्दियों में गुनगुना पानी करके नहलाना चाहिए।
5. बार बार ठंडे पानी के साथ नहाने से बच्चें बीमार हो सकते हैं। उन्हें सर्दी – जुकाम भी हो सकता हैं।

नमक के पानी से नहाने के कई फायदे// Many benefits of bathing with salt water





     नमक भोजन का मुख्य मसाला है| इसके अलावा यह कई बिमारियों और इन्फेक्शंस को भी ठीक करता है| नमक को नहाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है| नमक के पानी से नहाने के कई फायदे हैं| यदि सीधे शब्दों में कहें तो नमक आपकी सोच से ज्यादा फायदेमंद है|
नमक के पानी में मौजूद तत्व फंगल इंफेक्शन बढ़ने से रोकते हैं। रोज इससे नहाने पर डैंड्रफ में काफी आराम मिलता है।   
यह आपकी त्वचा के लिए अच्छा है यदि अपने प्राकृतिक और शुद्ध रूप से इस्तेमाल किया जाए तो नमक के   पानी में कई मिनरल्स और पोषक तत्व होते हैं जो आपकी त्वचा को जवां बनाते हैं| मैग्नीशियम, कैल्शियम, ब्रोमाइड, सोडियम जैसे मिनरल्स त्वचा के रोम छिद्रों में प्रवेश करते हैं| ये त्वचा की सतह को साफ़ कर इसे स्वस्थ और चमकदार बनाते हैं|
यह त्वचा को जवां बनाये रखता है 

नियमित रूप से नमक के पानी से नहाने से दाग और झुर्रियां कम होती हैं| त्वचा नरम और मुलायम बनती है| यह त्वचा को फुलावट भरा बनाता है और स्किन मॉइस्चर का संतुलन बनाये रखता है|
यह डिटॉक्सीफिकेशन बढ़ाता है 
नमक के पानी से नहाने से त्वचा से जहरीले तत्व बाहर निकलते हैं| गर्म पानी त्वचा के रोम छिद्रों को खोलता है| इससे मिनरल्स त्वचा के अंदर जाकर गहराई तक सफाई करते हैं| नमक का पानी जहरीले और नुकसानकारी पदार्थों और बैक्टीरिया को त्वचा से बाहर निकालता है और इसे जवां बनाता है|
    यह कई समस्याओं का समाधान करता है| यह ऑस्टियोआर्थराइटिस और टेन्डीनिटिस के इलाज में भी कारगर है| ऑस्टियोआर्थराइटिस हड्डियों की खराबी से सम्बंधित बीमारी है और टेन्डीनिटिस नसों की सूजन से सम्बंधित बीमारी है| नमक के पानी से नहाने से खुजली और अनिद्रा का ईलाज भी होता है|
एसिडिटी के ईलाज में कारगर
एसिडिटी एक ऐसी समस्या है जिससे आजकल अधिकतर लोग ग्रसित हैं| इसके ईलाज के लिए महँगी और साइड इफ़ेक्ट करने वाली दवाइयों की बजाय आप नमक के पानी से नहाने के नुस्खे को आजमा सकते हैं| क्षारीय प्रकृति के कारण यह अम्ल की मात्रा को कम करने में मददगार है|
मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है
नमक के पानी से स्नान शारीरिक के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है| इस पानी से स्नान करने के बाद आप ज्यादा शांत, खुश और आराम महसूस करेंगे| यह एक शानदार स्ट्रेस बस्टर है| यह मानसिक शांति भी बढ़ाता है|
यह मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन को भी ठीक करता है नमक के पानी से नियमित स्नान कर ऐंठन को भी ठीक किया जा सकता है| यह गठिया, शुगर या अन्य किसी चोट के कारण हुए मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन को भी ठीक कर देता है|
अच्छी नींद आती है
नमक के पानी से नहाने पर थकान और स्ट्रेस दूर हो जाता है। इससे दिमाग को शांति मिलती है और रात में अच्छी नींद आती है। यह पैरों की मांसपेशियों के लिए भी लाभकारी है
पैरों पर शरीर में सबसे ज्यादा दबाव पड़ता है| ये अधिकतर समय मूव करते हैं और शरीर को सपोर्ट प्रदान करते हैं| इससे यहाँ की मांसपेशियां मुलायम हो जाती है और इनमे जूते चप्पलों के कारण छाले भी हो जाते हैं| नमक के पानी से नहाने से मांसपेशियों में दर्द और जकड़न से निजात मिलती है| यह पैरों की दुर्गन्ध को भी दूर करता है|



इंफेक्शन

नमक के पानी में भरपूर मात्रा में मैग्नीशियम, कैल्शियम, सोडियम जैसे मिनरल्स होते हैं। ये स्किन के पोर्स में जाकर सफाई करते हैं। इससे स्किन इंफेक्शन का खतरा कम हो जाता है।   यह स्किन को मॉइस्चराइज करता है
त्वचा के लिए मॉइस्चराइजिंग बहुत जरूरी है| नमक के पानी में मौजूद मैग्नीशियम त्वचा में पानी को ज्यादा देर तक रोकता है| इससे त्वचा मॉइस्चराइज होती है और त्वचा की कोशिकाओं की ग्रोथ भी ज्यादा होती है
हेल्दी हो जाते हैं बाल
इसके पानी से नहाने पर ब्लड सर्कुलेशन अच्छा हो जाता है। साथ ही बालों के बैक्टीरिया भी खत्म होते हैं। इसलिए नमक के पानी से सिर धोने पर बाल हेल्दी और शाइनी हो रहते हैं। ध्यान रहे नमक की मात्रा संतुलित होनी चाहिए। इतना नमक न मिलाएं कि पानी खारा हो जाए।
   नमक के पानी से नहाने पर हड्डियों में होने वाले दर्द से राहत मिलती है। इससे ऑस्टियोऑर्थराइटिस और टेंडीनिटिस जैसी जॉइंट पेन की समस्या में आराम मिलता है।फेयरनेस
   नमक का पानी स्किन की डेड सेल्स को निकालने में मदद करता है। रोज इसके पानी से नहाएंगे तो स्किन सॉफ्ट और ग्लोइंग बनेगी। रंग भी खिलेगा